मय्यत से मुताल्लिक़ दीनी फ़रीज़े
मौत की निशानियाँ दिखाई देने पर किए जाने वाले काम
मौत क़रीब आने की निशानी यह है कि पाँव ढीले पड़कर लंबे हो जाएँ, नाक टेढ़ी हो जाए और कनपटियाँ अंदर धँस जाएँ। ऐसे बीमार को दाईं करवट लिटाकर उसका चेहरा क़िब्ले की तरफ़ कर दिया जाता है। इस तरह लिटाना सुन्नत है। पाँव क़िब्ले की तरफ़ करके पीठ के बल लिटाना भी जाइज़ है। आजकल ऐसा ही किया जाता है। लेकिन सिर के नीचे कोई चीज़ रखनी चाहिए। इस तरह चेहरा क़िब्ले की तरफ़ हो जाता है। ये मुश्किल हों, तो जिस तरह आसान हो उस तरह लिटाना भी जाइज़ है। कलिमा-ए-तौहीद की तल्क़ीन करते वक़्त “मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” भी कहना अच्छा है। मौत की निशानी अकड़ जाना, ठंडा हो जाना और बू आना है। इन निशानियों से पहले भी मौत का पता चल जाए [साँस का रुकना मुँह के सामने रखे शीशे पर भाप न जमने से, और दिल का रुकना नब्ज़ से मालूम होता है], तो आँखें बंद करना और ठोड़ी बाँधना सुन्नत है।
इंतिक़ाल हो जाने पर किए जाने वाले काम
आँखें बंद करना और ठोड़ी बाँधना सुन्नत है। ठोड़ी को चौड़े कपड़े से सिर के ऊपर तक बाँधा जाता है। आँखें बंद करते वक़्त “बिस्मिल्लाहि व अला मिल्लति रसूलिल्लाह” कहना और उसकी दुआ पढ़ना सुन्नत है। जिस्म ठंडा होने से पहले हाथों की उँगलियों, कोहनियों और घुटनों को खोल-बंद करके बाज़ुओं और टाँगों को सीधा छोड़ देना सुन्नत है। इस तरह उसे नहलाना और कफ़न में लपेटना आसान होता है। ठंडा होने से पहले उसके कपड़े उतारकर एक चौड़ी, हल्की चादर से ढक दिया जाता है। चादर का एक सिरा सिर के नीचे और दूसरा सिरा पाँवों के नीचे दबा दिया जाता है। पेट के ऊपर, चादर के ऊपर या नीचे, कोई चीज़ [छुरी या कोई और लोहा] रख दी जाती है, ताकि पेट न फूले। उसका सौ ग्राम से ज़्यादा होना मुनासिब है। नहलाना, कफ़न पहनाना, जनाज़े की नमाज़ पढ़ना और दफ़न करना फ़र्ज़-ए-किफ़ाया है। यानी ज़रूरत के मुताबिक़ लोग अदा कर दें, तो बाक़ियों पर फ़र्ज़ नहीं रहता। बच्चे का नहलाना भी जाइज़ है। औरतें मौजूद न हों, तो औरत को मर्द नहीं नहला सकता। लेकिन मय्यत सिर से पाँव तक ढकी रहते हुए उसका कोई रिश्तेदार, और रिश्तेदार न हो तो कोई और, हाथ पर कपड़ा लपेटकर, हाथ को चादर के नीचे डालकर उसे तयम्मुम कराता है, क्योंकि मुर्दे का सतर ज़िंदा के सतर की तरह है। जिस जगह को देखना हराम है, उसे छूना भी हराम है। ज़्यादा अच्छा यह है कि किसी बच्चे को सिखाकर उससे नहलवाया जाए। हनफ़ी मज़हब में औरत को उसका शौहर न नहला सकता है, न छू सकता है, क्योंकि औरत के मरते ही निकाह फ़ौरन ख़त्म हो जाता है। देखना जाइज़ है। औरत को उसके शौहर का नहलाना बाक़ी तीनों मज़हबों में जाइज़ है। औरत का अपने शौहर को नहलाना हनफ़ी मज़हब में भी जाइज़ है, क्योंकि शौहर के इंतिक़ाल के बाद निकाह इद्दत ख़त्म होने तक [चार महीने दस दिन] बाक़ी रहता है। औरत को मर्द नहीं नहला सकता और मर्द को औरत नहीं नहला सकती। हाथ पर कपड़ा लपेटकर तयम्मुम कराता है। तयम्मुम कराने वाला मर्द ग़ैर-महरम औरत के बाज़ुओं को नहीं देख सकता। अगर वह उसका रिश्तेदार हो, तो हाथ पर कपड़ा लपेटने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि महरम रिश्तेदार के बाज़ुओं और चेहरे को देखना और छूना जाइज़ है। इंसान का सिर्फ़ सिर या जिस्म का आधा हिस्सा मिले, तो उसे न नहलाया जाता है, न उसकी नमाज़ पढ़ी जाती है। वैसे ही दफ़न कर दिया जाता है। जिस्म का आधे से ज़्यादा हिस्सा, चाहे सिर न हो, या जिस्म का आधा हिस्सा सिर के साथ मिले, तो उसे नहलाया जाता है और उसकी नमाज़ पढ़ी जाती है। मुर्दे को नहलाने वाले के लिए पहले ग़ुस्ल कर लेना मुस्तहब है। जुनुबी का और उज़्र वाली (हैज़ वाली) औरत का नहलाना मकरूह है। जिस पानी से मय्यत को नहलाया गया हो, वह (माए मुस्तामल) इस्तेमाल किया हुआ पानी हो जाता है। वह नापाक, गंदा होता है। इसलिए ज़रूरी है कि नहलाने वालों पर उसकी छींटें न पड़ें और वे तहबंद बाँधें। मय्यत नहलाए जाने के बाद पाक हो जाती है। नहलाने की जगह में नहलाने वाले और उसके मददगार के सिवा कोई दाख़िल नहीं होता। नहलाने वाले भरोसेमंद लोग होने चाहिएँ। वे मय्यत में देखी गई सआदत की निशानियाँ बताते हैं, बदबख़्ती की निशानियाँ नहीं बताते। मय्यत का ऐब ज़ाहिर नहीं करते। वली (मय्यत का सरपरस्त) अंदर जा सकता है। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को अब्बास के बेटे फ़ज़्ल और अली (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) ने ग़ुस्ल दिया। उसामा (रज़ियल्लाहु अन्हु) पानी डाल रहे थे। अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) आ-जा रहे थे। जो चीज़ ज़िंदा को तकलीफ़ देती है, वह मुर्दे को भी देती है। इसलिए उसे बहुत ठंडे और बहुत गर्म पानी से नहीं नहलाया जाता। [बू न आए, इसलिए उसे सर्द ख़ाने (कोल्ड स्टोरेज) में भी नहीं रखा जाता। बू न आए, इसलिए जल्दी दफ़न करना चाहिए, और दूर से आने वालों के इंतिज़ार में रोके नहीं रखना चाहिए।] ज़मज़म के पानी से नहलाना जाइज़ नहीं।
“मरने से पहले मर जाओ। हिसाब लिए जाने से पहले अपना हिसाब कर लो!” हदीस शरीफ़
मय्यत को नहलाना
ग़ुस्ल के तख़्ते (सरीर) के चारों तरफ़ पहले बख़ूर जलाकर तीन बार घुमाया जाता है और धूनी दी जाती है। पाँच बार भी हो सकता है। बख़ूर एक बूटी है। इसमें अगर (ऊद की लकड़ी, Aquilaria) का बुरादा और लोबान के पेड़ का गोंद मिलाकर किसी बर्तन की आग में रखते हैं और ग़ुस्ल के तख़्ते को उससे उठने वाले धुएँ के ऊपर किया जाता है। तख़्ता नाफ़ तक ऊँचा और थोड़ा ढलवाँ होना चाहिए। बेरी (सिद्र) के पत्तों या रीठे (साबुन बूटी) के साथ उबालकर गुनगुना किया हुआ, या काफ़ूर (कपूर) नाम की सफ़ेद, ख़ुशबूदार चीज़ मिला हुआ पानी तैयार किया जाता है। पानी बहुत गर्म नहीं होना चाहिए, नमकीन होना चाहिए। ठंडा और नमकीन पानी सड़ने में देर करता है। मय्यत को नहलाते वक़्त नीयत करना सुन्नत है। नीयत के बिना नहलाया जाए तो मय्यत पाक तो हो जाती है, मगर फ़र्ज़ अदा नहीं होता। ढकी हुई मय्यत को धूनी दिए गए तख़्ते पर पीठ के बल, या जिस तरह आसान हो, लिटाया जाता है। उसे नाफ़ और घुटने के बीच का हिस्सा ढका रखकर नहलाया जाता है, क्योंकि औरत की सतर की जगह औरतों के लिए वैसी ही है जैसी मर्द की सतर की जगह मर्दों के लिए। तख़्ते पर क़िब्ले की तरफ़ रुख़ करके लिटाना सुन्नत है। मय्यत को, चाहे बच्चा हो, पहले वुज़ू कराया जाता है। लेकिन मुँह और नाक में पानी न डालकर उन्हें कपड़े से साफ़ किया जाता है। मुँह में पानी चला जाए, तो जल्दी सड़ने का सबब बनता है। पहले चेहरा धोया जाता है। फिर बाज़ू धोकर सिर, कानों और गर्दन का मसह किया जाता है और पाँव धोए जाते हैं। सिर और दाढ़ी को ख़त्मी या साबुन से धोया जाता है। फिर बाईं करवट पर फेरकर दाईं तरफ़ पानी डालकर धोया जाता है। पानी उन जगहों तक बहाना चाहिए जो तख़्ते से लगी हों। इस तरह तीन बार पानी डालकर धोया जाता है। फिर इसी तरह दाईं करवट लिटाकर बाईं तरफ़ को कंधे से पाँव तक तीन बार पानी डालकर धोया जाता है। फिर बिठाकर पेट को हल्के से दबाया जाता है। कुछ निकले, तो उसे धो दिया जाता है [यानी पानी डालकर दूर कर दिया जाता है]। फिर बाईं करवट लिटाकर दाईं तरफ़ फिर धोई जाती है [यानी कंधे से पाँव तक पानी डाला जाता है]। इस तरह मय्यत सुन्नत के मुताबिक़ तीन बार नहला दी जाती है। नहलाने के बाद वुज़ू तोड़ने वाली चीज़ें निकलें, तो मय्यत को दोबारा न नहलाया जाता है, न वुज़ू कराया जाता है। बाल झड़ जाएँ, तो कफ़न के अंदर रख दिए जाते हैं। ज़िंदा के भी नाख़ून, बाल और दाँत दफ़न करना सुन्नत है। नहलाने के बाद तख़्ते पर ही कपड़े से पोंछकर सुखाया जाता है। बालों और दाढ़ी में हनूत कहलाने वाली ख़ुशबूदार चीज़ों से बना मसाला या काफ़ूर लगाया जाता है। ज़ाफ़रान लगाना मकरूह है। सज्दे के अंगों [पेशानी, नाक, घुटनों, हाथ और पाँव की उँगलियों] पर काफ़ूर छिड़की हुई रुई रखी जाती है। मुँह, नाक, कानों के सुराख़ों और आँखों पर रुई रखना जाइज़ है। पानी में डूबकर मरने वाले को भी तीन बार नहलाया जाता है, या नहलाने की नीयत से पानी में तीन बार हिलाया जाता है। बारिश में भीगी हुई मय्यत को भी नहलाया जाता है।
“क़ब्र में मुर्दा उस शख़्स की तरह है जो समुंदर में डूबने के क़रीब हो; वह अपने बाप, अपनी माँ, अपने भाई-बहनों और दोस्तों की तरफ़ से आने वाली किसी दुआ का बराबर इंतिज़ार करता रहता है” हदीस शरीफ़
मर्द का कफ़न
मर्द के कफ़न का तीन कपड़ों का होना सुन्नत है। इस्तांबुल में मर्दों के कफ़न के लिए सात मीटर और औरतों के कफ़न के लिए आठ मीटर लट्ठा (सूती कपड़ा) लेने का रिवाज है। इसकी चौड़ाई 130–140 सेंटीमीटर होती है। 1. इज़ार: सिर से पाँव तक होता है। इसकी चौड़ाई एक मीटर से ज़्यादा होती है। 2. क़मीस [कुर्ते जैसी लंबी क़मीज़]: इसकी लंबाई कंधों से पाँवों तक की लंबाई की दोगुनी होती है। इस लंबाई को बीच से दोहरा करके, मोड़ की जगह से इतना सीधा काटा जाता है कि सिर निकल सके। आस्तीन और दामन की जगहें नहीं काटी जातीं। 3. लिफ़ाफ़ा: यह सिर और पाँवों से ज़्यादा लंबा और ज़्यादा चौड़ा होता है। सिर के ऊपर और पाँवों के नीचे से इसके सिरे समेटकर कपड़े से बाँधे जाते हैं। हज़रत इमाम रब्बानी फ़रमाते हैं कि कफ़न का तीन से ज़्यादा होना बिदअत है। कफ़न को ताबूत में रखने से पहले उसके हर कपड़े को अलग-अलग धूनी देना अच्छा है। नेक लोगों और औलिया के अंदर के कपड़ों या लिबास से कफ़न बनाना, या उन्हें कफ़न के अंदर, चेहरे पर या सीने पर रखना फ़ायदेमंद है। ताबूत के अंदर पहले लिफ़ाफ़ा बिछाया जाता है। फिर उसके ऊपर इज़ार फैलाया जाता है। क़मीस भी ताबूत में रख दी जाती है। फिर ताबूत के चारों तरफ़ तीन या पाँच बार बख़ूर घुमाया जाता है। कफ़न के तीनों कपड़ों पर हनूत छिड़का जाता है। मय्यत को पोंछकर सुखाने के बाद क़मीस ताबूत से उठाकर सिर से पहनाई जाती है, और उसका आधा हिस्सा सामने से और आधा पीछे से पाँवों तक फैला दिया जाता है। मय्यत को बिस्मिल्लाह पढ़कर ताबूत के अंदर इज़ार के ऊपर लिटाया जाता है। पहले इज़ार का बायाँ हिस्सा, फिर दायाँ हिस्सा मय्यत के ऊपर लपेटा जाता है। लिफ़ाफ़ा भी इसी तरह लपेटा जाता है। यानी दाएँ किनारे बाएँ किनारों के ऊपर लपेटे जाते हैं।
औरत का कफ़न
औरत के कफ़न का पाँच कपड़ों का होना सुन्नत है: क़मीस, इज़ार, लिफ़ाफ़ा, ख़िमार और सीनाबंद। ख़िमार एक ओढ़नी है जो लगभग पचहत्तर सेंटीमीटर लंबी होती है। इसके सिरे चेहरे पर लटकते हैं, सिर पर लपेटी नहीं जाती। सीनाबंद कंधों से घुटनों तक होता है। ताबूत के अंदर पहले लिफ़ाफ़ा बिछाया जाता है। फिर उसके ऊपर इज़ार फैलाया जाता है। क़मीस भी ताबूत में रख दी जाती है। इज़ार से पहले या बाद सीनाबंद बिछाया जाता है। औरत की क़मीस पहना देने के बाद उसके बाल दो हिस्सों में बाँटकर दोनों तरफ़ से सीने पर, क़मीस के ऊपर रख दिए जाते हैं। बालों के ऊपर ख़िमार रखकर उसके ऊपर इज़ार लपेटा जाता है। इज़ार से पहले या बाद सीनाबंद लपेटा जाता है। फिर लिफ़ाफ़ा लपेटा जाता है। लिफ़ाफ़े के सिर और पाँव के सिरों और बीच के हिस्से को [यानी मेदे की सीध से] एक कपड़े से लपेटकर बाँध दिया जाता है। बड़े लड़के को मर्द की तरह कफ़न दिया जाता है। बड़ी लड़की को औरत की तरह कफ़न दिया जाता है। छोटे लड़के को एक और छोटी लड़की को दो कपड़ों में लपेटा जाता है। मुर्दा पैदा होने वाले बच्चे, गिरे हुए हमल और इंसान के किसी अंग [मसलन बाज़ू] को कफ़न नहीं दिया जाता, एक कपड़े में लपेटकर दफ़न कर दिया जाता है। ताबूत कीलों के बिना, तख़्तों को एक-दूसरे में फँसाकर बना हुआ होना चाहिए। एक मुख़्तसर दुआ और मय्यत के हुक़ूक़ माफ़ कर दिए जाने के बाद उसे जनाज़ा-गाह ले जाकर उसकी नमाज़ पढ़ी जाती है।
क़ब्रों की ज़ियारत और क़ुरआन-ए-करीम पढ़ना
“शिरअतुल इस्लाम” के आख़िर में लिखा है कि क़ब्र की ज़ियारत सुन्नत है। [हफ़्ते में एक बार, कम से कम ईदों में ज़ियारत की जाती है। जुमेरात, जुमा या शनिवार के दिन ज़ियारत करना ज़्यादा सवाब का काम है।] ज़ियारत करने वाला मय्यत के गल जाने के बारे में सोचकर इबरत लेता है। उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) क़ब्र के पास से गुज़रते तो बहुत रोते और उनकी दाढ़ी भीग जाती थी। मय्यत भी की गई दुआ से फ़ायदा उठाती है। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपने रिश्तेदारों और सहाबा (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम) की क़ब्रों की ज़ियारत फ़रमाते थे। सलाम और दुआ के बाद क़िब्ले की तरफ़ पीठ करके क़ब्र के सामने बैठा जाता है। क़ब्र पर हाथ और चेहरा मलना और मिट्टी चूमना ईसाइयों की आदत है। सिर्फ़ माँ-बाप की क़ब्र की मिट्टी चूमना जाइज़ है।
हदीसों में फ़रमाया गया:
“कोई शख़्स अपने किसी जानने वाले की क़ब्र पर जाकर सलाम करे, तो वह उसे पहचानता है और उसके सलाम का जवाब देता है।” “कोई शख़्स किसी मोमिन की क़ब्र की ज़ियारत करके ‘अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका बिहक़्क़ि मुहम्मदिंव व आलि मुहम्मदिन अन ला तुअज़्ज़िबा हाज़ल मय्यित’ कहे, तो मय्यत से अज़ाब उठा लिया जाता है।” “जो शख़्स अपने माँ-बाप की, या उनमें से किसी एक की क़ब्र की हर जुमा को ज़ियारत करे, वह बख़्श दिया जाता है।”
बड़ी हस्तियों की क़ब्रों की ज़ियारत के लिए दूर के मुल्कों में न जाना, बल्कि किसी और काम से जाने पर ज़ियारत कर लेना अच्छा है। सिर्फ़ नबी-ए-करीम (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) की ज़ियारत के लिए जाना सवाब का काम है। नबियों (अलैहिमुस्सलाम) और औलिया (अलैहिमुर्रहमा) की ज़ियारत करने वाला उनकी मुबारक रूहों से फ़ायदा उठाता है। उनसे जितनी मुहब्बत और वाबस्तगी होगी, उतना ही दिल पाक होगा। मज़ारों पर गुनाह करने वाले हों, मसलन बेपर्दा औरतें भी आती हों, तो ज़ियारत नहीं छोड़नी चाहिए; अगर उन्हें रोक न सके, तो दिल से नफ़रत करनी चाहिए। इसी तरह ऐसे मोमिन के जनाज़े में भी जाना ज़रूरी है जिसमें औरतें मौजूद हों और गाने, नातें और तक़रीरें पढ़ी जाती हों। क़ब्र के पास या किसी और जगह क़ुरआन-ए-करीम पढ़कर उसका सवाब मुर्दों को हदिया करना चाहिए और उनके लिए दुआ करनी चाहिए, क्योंकि जिस जगह क़ुरआन-ए-करीम पढ़ा जाता है, वहाँ रहमत और बरकत उतरती है। वहाँ की गई दुआ क़बूल होती है।
“जो शख़्स अपने माँ-बाप की, या उनमें से किसी एक की क़ब्र की हर जुमा को ज़ियारत करे, वह बख़्श दिया जाता है” हदीस शरीफ़
“जिलाउल क़ुलूब” में लिखा है: क़ब्रिस्तान आने वाला शख़्स खड़े होकर कहे: “अस्सलामु अलैकुम या अहला दारिल क़ौमिल मोमिनीन! इन्ना इंशाअल्लाहु अन क़रीबिन बिकुम लाहिक़ून।” फिर बिस्मिल्लाह के साथ ग्यारह बार सूरह इख़लास और एक बार फ़ातिहा पढ़े। फिर यह दुआ पढ़नी चाहिए: “अल्लाहुम्मा रब्बल अजसादिल बालियह, वल इज़ामिन नख़िरतिल्लती ख़रजत मिनद्दुनिया व हिया बिका मोमिनतुन, अद्ख़िल अलैहा रौहम मिन इन्दिका व सलामम मिन्नी।” क़ब्र के पास आए तो मय्यत के दाईं तरफ़ से [क़ब्र की क़िब्ले वाली तरफ़ से] और पाँवों की तरफ़ से क़रीब जाए। सलाम करे। खड़े होकर, उकड़ूँ बैठकर या बैठकर सूरह बक़रह का शुरू और आख़िर, मुबारक सूरह यासीन, तबारक (सूरह मुल्क), तकासुर, मुबारक इख़लास और फ़ातिहा सूरतें पढ़कर उनका सवाब मय्यत को हदिया करे। “किताबुल फ़िक़्ह अलल मज़ाहिबिल अरबआ” में लिखा है: “मुर्दे से इबरत लेने और आख़िरत के बारे में सोचने के लिए क़ब्र की ज़ियारत करना मर्दों के लिए सुन्नत है। नज़दीक और दूर की हर क़ब्र की ज़ियारत की जाती है। ख़ास तौर पर नेक लोगों और औलिया (रहिमहुमुल्लाहु तआला) की ज़ियारत के लिए दूर जाना सुन्नत है। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की मुबारक क़ब्र की ज़ियारत करना सबसे क़ीमती इबादतों में से है। बड़ी उम्र की औरतों के लिए भी पर्दे में ज़ियारत करना जाइज़ है। ज़ियारत करते वक़्त क़ब्र के इर्द-गिर्द तवाफ़ करना, पत्थर और मिट्टी चूमना और मुर्दे से कोई ऐसी चीज़ माँगना जो वह नहीं कर सकता, जाइज़ नहीं।” औलिया (रहिमहुमुल्लाहु तआला) से यह दरख़्वास्त की जाती है कि वे शफ़ाअत करें, माँगने वाले के लिए दुआ करें और अल्लाह तआला के अता करने का वसीला बनें।
वह सरवर हमारे रब के ऐसे बंदे हैं कि
हर ख़तरे की घड़ी में आपकी शफ़ाअत की उम्मीद की जाती है।
आप ऐसे रसूल हैं कि लोगों को
अल्लाह की इबादत की तरफ़ बुलाते हैं – आपकी पैरवी करो ज़रूर!
जो ऐसा करे, वह गोया कभी न टूटने वाली मज़बूत रस्सी को
थाम लेता है, ख़ुद को अमन में पाता है, चैन पाता है।
इलाही, इजाज़त दे कि आपकी आल और सहाबा पर भी,
और आपकी पैरवी करने वाले तक़्वा वालों पर भी
रहमत के बादल हमेशा बरसते रहें,
हलीम और करीम बंदे तेरी रहमत को पा लें।
या रब, जब तक सबा की हवा चलती रहे,
बान के पेड़ की डालियाँ सबा से झूमती रहें,
जब तक कारवाँ का सरदार अपने मीठे-मीठे नग़्मों से
अपने ऊँटों को इश्क़ में मस्त करता रहे,
फ़ख़्र-ए-कायनात पर और आपकी आल और सहाबा पर,
और आपकी पैरवी करने वालों पर रहमत का बादल भेज।
क़सीदा-ए-बुर्दा
मक़ाम-ए-इब्राहीम वह चट्टान जिस पर इब्राहीम अलैहिस्सलाम के मुबारक क़दम का निशान है; उन्होंने काबा की इमारत बनाते वक़्त इसे मचान और चढ़ने के पत्थर के तौर पर इस्तेमाल किया, और इसी पर खड़े होकर लोगों को अल्लाह की तरफ़ बुलाने का फ़रीज़ा अदा किया। इब्राहीम अलैहिस्सलाम के मोजिज़े से यह चट्टान लिफ़्ट की तरह उनकी मनचाही ऊँचाई तक ऊपर-नीचे होकर इमारत बनाने में मददगार बनी। इस मुबारक चट्टान वाला हुजरा (मक़सूरा) सऊदी बादशाह फ़ैसल के दौर में गिराकर हटा दिया गया, और उसकी जगह आज भी मौजूद छह कोनों वाला शीशे का हिफ़ाज़ती ढाँचा लगाया गया, और उसका ऊपरी हिस्सा पूरी तरह खोल दिया गया।
