आख़िरत की ज़िंदगी
आख़िरत की ज़िंदगी मौत से शुरू होती है
मरना मिट जाना नहीं है। यह ऐसा काम है जो वुजूद को ख़त्म नहीं करता। मौत रूह के बदन से जुड़े रहने का ख़त्म हो जाना है। यह रूह का बदन से जुदा होना है। मौत इंसान का एक हालत से दूसरी हालत में पलटना है। यह एक घर से दूसरे घर में मुंतक़िल होना है। उमर इब्ने अब्दुल अज़ीज़ (रहमतुल्लाहि अलैहि) ने फ़रमाया: “तुम तो सिर्फ़ अबदियत, यानी हमेशगी के लिए पैदा किए गए हो! लेकिन तुम एक घर से दूसरे घर में मुंतक़िल होते हो!” मौत मोमिन के लिए तोहफ़ा है, नेमत है। गुनाह वालों के लिए मुसीबत है। फ़क़ीरों के लिए राहत है, मालदारों के लिए अज़ाब। अक़्ल अल्लाह तआला का तोहफ़ा है। इंसान मौत को नहीं चाहता। हालाँकि मौत फ़ितने से बेहतर है। इंसान जीना पसंद करता है। हालाँकि मौत उसके लिए बेहतर है। नेक मोमिन मौत के ज़रिए दुनिया की तकलीफ़ और थकान से छुटकारा पा लेता है। मोमिन की रूह का बदन से जुदा होना ऐसा है जैसे क़ैदी का क़ैदख़ाने से छूट जाना। मोमिन मरने के बाद इस दुनिया में लौटना नहीं चाहता। सिर्फ़ शहीद चाहते हैं कि दुनिया में लौटकर एक बार और शहीद हों। दुनिया की भलाई चली गई। उसके ग़म रह गए। इसी लिए मौत हर मुसलमान के लिए तोहफ़ा है। आदमी के दीन की हिफ़ाज़त सिर्फ़ उसकी क़ब्र करती है। मोमिनों के साथ किए जाने वाले इकरामों में से पहला मौत के वक़्त की ख़ुशी है। मोमिन को राहत सिर्फ़ अल्लाह तआला से मिलने में है। हर मोमिन के लिए मौत उसकी ज़िंदगी से बेहतर है। काफ़िरों के लिए भी मौत फ़ायदेमंद है।
मुसलमान ख़वातीन की मौत के बारे में
जो औरत निफ़ास की हालत में, या हामिला होने की हालत में, या ताऊन (प्लेग) से, या पेट के दर्द से मरे, या इनमें से कुछ भी न हो, मगर ग़ैर-महरम मर्दों के सामने बेपर्दा न आती हो और उसका शौहर उससे ख़ुश हो, तो ऐसी ख़ातून के पास मरते वक़्त जन्नत के फ़रिश्ते आकर उसके सामने सफ़-दर-सफ़ खड़े हो जाते हैं और इज़्ज़त और इकराम के साथ उसे सलाम करते हैं और कहते हैं: “ऐ अल्लाह तआला की प्यारी, शहीद बाँदी! आओ, निकलो, दुनिया के महल में क्या कर रही हो? अल्लाह तआला तुमसे राज़ी हो गया, तुम्हारी इस बीमारी को बहाना बनाकर तुम्हारे गुनाह बख़्श दिए, तुम्हें जन्नत अता की, आओ, अपनी अमानत सौंप दो!” वह ख़ातून यह मर्तबा देखकर अपनी रूह सौंपना चाहती है, मगर अपने आस-पास देखकर कहती है: “जिन्होंने मुझसे दोस्ती रखी, (अल्लाह) उनकी मग़फ़िरत करे और उन पर रहम करे, फिर मैं सौंपूँ।” फ़रिश्ते उसकी यह दरख़्वास्त अल्लाह पाक के हुज़ूर पेश करते हैं। इस पर इज़्ज़त वाला ख़िताब आता है: “मेरी इज़्ज़त की क़सम, मैंने अपनी बंदी की सारी दुआएँ क़बूल कीं।” फ़रिश्ते भी उसे ख़ुशख़बरी देते हैं। फिर मलकुल मौत एक सौ बीस रहमत के फ़रिश्तों के साथ आते हैं। उनके चेहरों का नूर अर्श तक पहुँचा हुआ होता है, सिरों पर ताज, पीठ पर नूर के जोड़े, पाँवों में सोने की जूतियाँ और हरे पर होते हैं।
उनके हाथों में जन्नत के फल होते हैं जिनकी ख़ुशबू मुश्क जैसी होती है। वे आकर इज़्ज़त और इकराम के साथ सलाम करते हैं और कहते हैं: “ख़ल्लाक़-ए-आलम (जहान को पैदा करने वाला) तुम्हें सलाम कहता है, तुम्हें जन्नत अता करता है, तुम्हें अपने हबीब मुहम्मद अलैहिस्सलाम का पड़ोसी बनाता है और हज़रत आइशा की हमनशीन बनाता है।”
यह ईमान वाली औरत ये बातें सुनती है, उसकी आँखों का पर्दा उठ जाता है, और वह ईमान वाली ख़वातीन को भी देखती है और गुनाहगार होकर अज़ाब में पड़ी औरतों को भी, और इल्तिजा करती है: “ऐ मेरे रब! उनके गुनाह बख़्श दे!” अल्लाह-ए-अज़ीम की तरफ़ से एक ख़िताब आता है: “ऐ मेरी बाँदी! मैंने तुम्हारी सारी मुरादें पूरी कर दीं, अपनी अमानत सौंप दो। मेरे हबीब की बीवी और बेटी तुम्हारा इंतिज़ार कर रही हैं।” यह ख़िताब सुनते ही उसकी जान काँप उठती है, पाँव फड़कने लगते हैं, पसीना बहने लगता है, और जब वह जान देने के क़रीब होती है, तो दो फ़रिश्ते आते हैं। उनके हाथों में आग के डंडे होते हैं। एक उसके दाईं तरफ़ और दूसरा बाईं तरफ़ खड़ा हो जाता है। शैतान भी – उस पर लानत हो – दौड़ता हुआ आता है और यह कहकर कि “अगरचे इससे हमें कोई फ़ायदा नहीं, फिर भी ज़रा देख लूँ”, हाथ में जवाहरात जड़े प्याले में बर्फ़ीला पानी लिए इसी सूरत में आकर उसे पानी दिखाता है। वे फ़रिश्ते उस ख़बीस को देखते ही अपने हाथों के डंडों से मारकर उसके हाथ का प्याला तोड़ देते हैं और उसे भगा देते हैं। वह मुसलमान ख़ातून यह देखकर मुस्कुराती है। फिर हूरें उसे जवाहरात जड़े प्याले में कौसर की शराब देती हैं और वह पी लेती है। जन्नत की शराब की लज़्ज़त से उसकी जान उछलकर प्याले से लिपट जाती है, और मलकुल मौत उसकी जान उसी प्याले से निकाल लेते हैं। फ़रिश्ते एक-दूसरे को पुकारकर कहते हैं: “इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।” जान को लेकर उसे आसमानों की सैर कराते हैं, जन्नत में ले जाते हैं, वहाँ उसका मक़ाम दिखाते हैं और फ़ौरन फिर मय्यत के सिरहाने ले आते हैं। जब उसके कपड़े उतारते हैं और उसके बाल खोलते हैं, तो उसकी रूह फ़ौरन अपने जिस्म के सिरहाने आकर कहती है: “ऐ नहलाने वाले! आहिस्ता-आहिस्ता पकड़ो! क्योंकि इज़राईल के पंजे से मेरी जान ज़ख़्मी हुई है, मेरे जिस्म ने बहुत तकलीफ़ उठाई है और वह हिल गया है।” मय्यत को नहलाने के तख़्ते पर रखा जाता है, तो रूह फिर आकर कहती है: “पानी बहुत गर्म न करो! मेरा जिस्म बहुत कमज़ोर है। मुझे जल्दी अपने हाथों से छुटकारा दो, ताकि मुझे राहत मिले।” नहलाकर कफ़न में लपेट दिया जाता है, तो रूह थोड़ी देर ठहरती है और फिर पुकारकर कहती है: “इस जहान को यह मेरा आख़िरी बार देखना है। मैं अपने रिश्तेदारों और अज़ीज़ों को देख लूँ और वे भी मुझे देख लें और इबरत लें। चूँकि वे भी जल्द मेरी तरह मरेंगे, इसलिए मेरे पीछे चीख़-पुकार न करें। मुझे न भूलें, क़ुरआन-ए-करीम पढ़कर हमेशा याद करें। मेरी विरासत के लिए आपस में झगड़ा न करें, ताकि मुझे क़ब्र में अज़ाब न हो। जुमों और ईदों में भी मुझे याद करें।”
फिर जब मय्यत को जनाज़ा-गाह के पत्थर पर रखा जाता है, तो जान फिर पुकारती है: “चैन से रहो, ऐ मेरे बेटे और मेरी बेटी, मेरी माँ और मेरे बाप! ऐसी जुदाई का कोई दिन नहीं। हसरत भरी मुलाक़ात क़यामत पर रह गई। अलविदा, ऐ मेरे पीछे आँसू बहाने वालो!”
उसकी नमाज़ पढ़कर कंधों पर उठाया जाता है, तो वह फिर पुकारकर कहती है: “मुझे आहिस्ता-आहिस्ता ले चलो! अगर तुम्हारा मक़सद सवाब है, तो मुझे तकलीफ़ न दो! तुम्हारी तरफ़ से अल्लाह तआला के पास ख़ुशनूदी लेकर जाऊँ!”
उसे क़ब्र के किनारे रखा जाता है, तो वह फिर पुकारकर कहती है: “मेरा हाल देखो और इबरत लो! अब तुम मुझे एक अँधेरी जगह में रखकर चले जाओगे। मैं अपने अमल के साथ रह जाऊँगी। इन घड़ियों को देखकर बेवफ़ा, झूठी दुनिया के मक्र से धोखा न खाओ!”
“दुनिया के लिए उतनी मेहनत करो जितना तुम्हें यहाँ रहना है, और आख़िरत के लिए उतनी जितना तुम्हें वहाँ रहना है!” हदीस शरीफ़
उसे क़ब्र में रखा जाता है, तो रूह उसके सिरहाने आती है। किसी भी मय्यत को हरगिज़ तल्क़ीन के बिना नहीं छोड़ना चाहिए। [दफ़न के बाद किसी नेक शख़्स का तल्क़ीन करना सुन्नत है। वहाबी तल्क़ीन करने के सुन्नत होने को नहीं मानते। कहते हैं कि यह बिदअत है। कहते हैं कि मुर्दा न सुनता है, न महसूस करता है। अहले सुन्नत के आलिमों (रहिमहुमुल्लाहु तआला) ने तरह-तरह की किताबें लिखकर साबित किया कि तल्क़ीन करना सुन्नत है।] अल्लाह तआला के हुक्म से मय्यत क़ब्र में इस तरह जागती है जैसे नींद से जागी हो, और देखती है कि वह एक अँधेरी जगह में है। वह अपनी ख़ादिमा को, अपनी बाँदी को या उस शख़्स को, जो हमेशा उसकी मदद करता था, पुकारकर कहती है: “मेरे लिए मोमबत्ती लाओ!” कोई आवाज़ और सदा नहीं आती। क़ब्र फटती है और सवाल करने वाले दो फ़रिश्ते [मुनकर और नकीर] ज़ाहिर होते हैं। उनके मुँह से आग की लपटें और नाक से काला धुआँ निकल रहा होता है। इसी हालत में उसके क़रीब आकर कहते हैं: “मन रब्बुका व मा दीनुका व मन नबिय्युका (यानी तेरा रब कौन है, तेरा दीन कौन-सा दीन है और तेरा नबी कौन है)?” अगर वह इनके सही जवाब दे, तो वे फ़रिश्ते उसे हक़ तआला की उस पर होने वाली रहमत की ख़ुशख़बरी देकर चले जाते हैं। उसी पल क़ब्र की दाईं तरफ़ से एक खिड़की खुलती है, और एक चाँद जैसे चेहरे वाला शख़्स निकलकर उसके पास आता है। यह ईमान वाली ख़ातून उसे देखकर ख़ुश होती है। पूछती है: “तुम कौन हो?” वह जवाब देता है: “मैं दुनिया में तुम्हारे सब्र और तुम्हारे शुक्र से पैदा किया गया हूँ। क़यामत तक तुम्हारा साथी रहूँगा।”
काफ़िरों की मौत के बारे में
कोई काफ़िर, कोई मुरतद इस्लाम को पसंद नहीं करता, क़ुरआन-ए-करीम को “रेगिस्तान का क़ानून” कहता है और इल्म और अख़लाक़ से इतना ख़ाली है कि इंसानों में सबसे बुलंद, सबसे इज़्ज़त वाले, नबियों के सरदार मुहम्मद अलैहिस्सलाम को (मआज़अल्लाह) “ऊँटों का चरवाहा” कहता है। इस्लाम इंसानों को सुकून और सआदत देता है, इल्म, अख़लाक़, सफ़ाई, सेहत और इंसाफ़ का सरचश्मा है और तहज़ीब पर रौशनी बिखेरता है, मगर वह उसे अपने उस ख़बीस सिर से, जो एक बेरूह मुर्दार के डिब्बे के सिवा कुछ नहीं, मेल नहीं खिला पाता और इतना गिर जाता है कि कहता है: “दीनों की कोई ज़रूरत नहीं।” उसने अपनी लगाम अपने नफ़्स के हाथ में दे दी है। ऐसा अहमक़ जब मरने लगता है, तो उसकी आँख से पर्दा हटा दिया जाता है। उसे जन्नत दिखाई जाती है। एक ख़ूबसूरत फ़रिश्ता उससे कहता है: “ऐ काफ़िर! मुसलमानों को ‘दक़ियानूसी’ और अपनी शहवतों के पीछे भागने वालों, अख़लाक़ी उसूलों को रौंदने वालों को ‘रौशन-ख़याल, तरक़्क़ी-पसंद’ कहने वाले कमीने! तू ग़लत रास्ते पर था। तू हक़ दीन, दीन-ए-इस्लाम को पसंद नहीं करता था। जो लोग उस इल्म पर ईमान लाते हैं जिसे मुहम्मद अलैहिस्सलाम अल्लाह तआला की तरफ़ से लाए, और उसका एहतिराम करते हैं, वे इस जन्नत में जाएँगे।” वह जन्नत की नेमतें देखता है। जन्नत की हूरें भी कहती हैं: “ईमान लाने वाले अल्लाह तआला के अज़ाब से बच जाते हैं।” थोड़ी देर बाद शैतान एक पादरी की शक्ल में दिखाई देता है और कहता है: “ऐ फ़लाँ के बेटे फ़लाँ! वे आने वाले झूठ बोल गए। जो नेमतें तूने देखीं, वे सब तेरी होंगी।” फिर उसे जहन्नम दिखाया जाता है। उसमें आग के पहाड़, ख़च्चरों जैसे बड़े-बड़े बिच्छू और कनखजूरे हैं। वह हदीसों में बताए गए अज़ाब देखता है। जहन्नम के ज़बानिया कहलाने वाले अज़ाब के फ़रिश्ते आग के डंडों से मारते हैं। उनके मुँह से शोले निकलते हैं। उनके क़द मीनार जैसे और दाँत बैल के सींगों जैसे हैं। वे बादल की गरज जैसी आवाज़ में चिल्लाते हैं। काफ़िर उनकी आवाज़ से काँपकर अपना मुँह शैतान की तरफ़ फेरता है। शैतान डर के मारे टिक नहीं पाता और भाग जाता है। फ़रिश्ते शैतान को पकड़कर ज़मीन पर पटक देते हैं। वे इस काफ़िर के पास आकर कहते हैं: “ऐ इस्लाम के दुश्मन! दुनिया में तू रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) पर ईमान न लाया। अब भी तूने फ़रिश्तों की बात न मानी, और फिर मलऊन शैतान के धोखे में आ गया।”
उसकी गर्दन में आग की ज़ंजीरें डालते हैं, उसके पाँव सिर के ऊपर से उलट देते हैं, दाहिना हाथ बाईं कोख में और बायाँ हाथ दाईं कोख में घुसाकर पीछे से निकालते हैं। आयत-ए-करीमा इस हाल की ख़बर देती है।1 वह चीख़ता है, दुनिया के अपने चापलूसों को पुकारता है। ज़बानिया उसे जवाब देते हैं: “ऐ काफ़िर, ऐ मुसलमानों का मज़ाक़ उड़ाने वाले अहमक़! गिड़गिड़ाने का वक़्त निकल गया। अब न ईमान क़बूल होता है, न दुआ क़बूल होती है। अपने कुफ़्र की सज़ा भुगतने का वक़्त आ गया।” उसकी ज़बान गुद्दी से खींच निकालते हैं। उसकी आँखें निकाल लेते हैं। तरह-तरह के बहुत दर्दनाक अज़ाब देकर उसकी ख़बीस रूह निकालते हैं और उसे जहन्नम में फेंक देते हैं।
अल्लाह तआला हमें मुहम्मद अलैहिस्सलाम के दीन पर, और उस अक़ीदे पर जो बुलंद नबी के दीन को हम तक सही तरह पहुँचाने वाले अहले सुन्नत के आलिमों की किताबों में लिखा है, जान देना नसीब फ़रमाए! आमीन।
मोमिनों में से गुनाह वाले हों या बेगुनाह, सबके लिए क़ब्र का सवाल है। सिर्फ़ उन मोमिनों के लिए जिनके गुनाह माफ़ न किए गए हों और तमाम काफ़िरों के लिए क़ब्र का अज़ाब भी है। मुसलमानों के बीच चुग़ली करने वालों को और बैतुल ख़ला में अपने ऊपर पेशाब की छींटें पड़ने देने वालों को क़ब्र में अज़ाब होगा। [क़ब्र का अज़ाब सिर्फ़ रूह को नहीं, बल्कि रूह को भी और जिस्म को भी होगा। जिन बातों तक अक़्ल नहीं पहुँचती, उन्हें अक़्ल से सुलझाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।]
अगर वह शख़्स ईमान के बिना मरा हो, तो महशर के दिन तक [फिर जहन्नम में हमेशा] सख़्त अज़ाब भुगतता है।
“लोग नींद में हैं, मरते हैं तो जागते हैं” हदीस शरीफ़
आपकी असली क़द्र बयान करने से हम आजिज़ हैं,
इस पहलू से तारीफ़ करने से बेहतर है कि हम चुप रहें।
जान लो, नबी-ए-करीम सूरज की तरह हैं,
रसूलों के सितारे आप ही से रौशनी पाते हैं।
अल्लाह ने आपको अख़लाक़ से सजाकर पैदा किया,
अच्छी आदत और हँसते चेहरे से आपकी ज़ात को सँवारा।
गुलाब और फूल की तरह लतीफ़ पैदा किए गए,
चौदहवीं के चाँद की तरह रौशन और इज़्ज़त वाले हैं।
हिम्मत वाले और ग़ैरत वाले वह नबी ज़माने की तरह हैं,
आपकी सख़ावत के आगे समुंदर एक क़तरा हैं।
आपके मुबारक जिस्म को अपनी आग़ोश में लेने वाली मिट्टी की
ख़ुशबू मुश्क और अंबर जैसी प्यारी है, यक़ीन करो।
क्या ख़ुशनसीबी है उस मिट्टी को सूँघकर चूमने वालों की,
उस मुबारक ख़ुशबू को सीने में उतारने वालों की!
अरब हों या ग़ैर-अरब, सारे इंसानों के
आप सरदार हैं, और जहान की आबरू भी आप ही हैं।
बुराई से रोकते हैं, भलाई का हुक्म देते हैं,
आपके हुक्म और मनाही इलाही हुक्म हैं।
क़सीदा-ए-बुर्दा
