मेरे प्यारे नबी

कुफ़्र का बयान

बुराइयों में सबसे बड़ी बुराई अल्लाह तआला पर ईमान न लाना, नास्तिक होना है। जिस चीज़ पर ईमान लाना ज़रूरी है, उस पर ईमान न लाना कुफ़्र है। मुहम्मद अलैहिस्सलाम पर ईमान न लाना कुफ़्र है। मुहम्मद अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला की तरफ़ से लाकर जो कुछ बताया है, उस सब पर दिल से यक़ीन करने और ज़बान से भी उसका इक़रार करने, यानी उसे कहने को ईमान कहते हैं। कहने में कोई रुकावट हो तो न कहना माफ़ है। ईमान हासिल होने के लिए यह भी ज़रूरी है कि जिन चीज़ों को इस्लाम ने कुफ़्र की अलामत बताया है, उन्हें कहने और इस्तेमाल करने से बचा जाए। इस्लाम के अहकाम, यानी इस्लाम के हुक्मों और मनाहियों में से किसी एक को हल्का समझना, क़ुरआन-ए-करीम का, किसी फ़रिश्ते का या नबियों (अलैहिमुस्सलवातु वत्तस्लीमात) में से किसी का मज़ाक़ उड़ाना कुफ़्र की अलामतों में से है। इनकार करने का मतलब है सुनने के बाद यक़ीन न करना, तस्दीक़ न करना। शक करना भी इनकार है। जो शख़्स ऐसी बातें कहे और ऐसे काम करे जिन्हें इस्लाम ने ईमान न होने की अलामत बताया है, वह काफ़िर हो जाता है, चाहे उसके दिल में तस्दीक़ हो और वह कहता भी हो कि मैं ईमान रखता हूँ। जिस चीज़ को हक़ीर समझने का इस्लाम ने हुक्म दिया है, उसकी ताज़ीम करना, और जिसकी ताज़ीम का हुक्म दिया है उसे हक़ीर समझना कुफ़्र है।

कुफ़्र का सबब बनने वाली कुछ बातें

1. “अल्लाह तआला अर्श से या आसमान से हमें देख रहा है” कहना कुफ़्र है, क्योंकि अल्लाह तआला मकान (जगह) से पाक है। उसके लिए “ज़मीन में, आसमान में, नीचे, ऊपर, दाएँ, बाएँ” नहीं कहा जा सकता। 2. “जिस तरह तूने मुझ पर ज़ुल्म किया, उसी तरह अल्लाह तआला भी तुझ पर ज़ुल्म कर रहा है” कहना कुफ़्र है। अल्लाह तआला ज़ालिम नहीं है। वह अपने बंदों पर ज़ुल्म नहीं करता। “ज़ुल्म” का लफ़्ज़ अल्लाह तआला के लिए नहीं बोला जाता। 3. “फ़लाँ मुसलमान मेरी नज़र में यहूदी जैसा है” कहना कुफ़्र है। 4. किसी झूठी बात के बारे में “अल्लाह तआला जानता है, यह सच है” कहना कुफ़्र है। 5. फ़रिश्तों को हक़ीर ठहराने वाली बातें कहना कुफ़्र है।

6. क़ुरआन-ए-करीम को, यहाँ तक कि उसके एक हर्फ़ को भी हक़ीर ठहराने वाली बात कहना, उसके एक हर्फ़ पर भी ईमान न लाना कुफ़्र है। 7. साज़ बजाकर क़ुरआन-ए-करीम पढ़ना, मुनाजात पढ़ना, अज़ान देना, मौलिद पढ़ना कुफ़्र है। 8. नबियों को हक़ीर ठहराने वाली बातें कहना कुफ़्र है। 9. बहुत भलाई करने वाले किसी शख़्स के बारे में “यह नबी से भी बेहतर है” कहना कुफ़्र है। 10. कोई शख़्स ख़ुद को नबी कहे तो उस पर यक़ीन करने वाले भी काफ़िर हो जाते हैं।

11. आख़िरत में होने वाली बातों का मज़ाक़ उड़ाना कुफ़्र है। 12. क़ब्र और क़यामत के अज़ाबों पर (“ये अक़्ल और साइंस के मुताबिक़ नहीं” कहकर) ईमान न लाना कुफ़्र है।

13. जन्नत में अल्लाह तआला के दीदार पर ईमान न लाना कुफ़्र है।

14. मशहूर सुन्नतों में से किसी एक को नापसंद करना कुफ़्र है।

15. इस्लामी इल्म पर ईमान न लाना, उसे और दीन के आलिमों को हक़ीर समझना भी कुफ़्र है। 16. जो शख़्स काफ़िर होना चाहे, वह जिस पल इसकी नीयत करता है, उसी पल काफ़िर हो जाता है।

17. जो शख़्स कुफ़्र के कलिमों को कुफ़्र का सबब जानते हुए भी अपनी मर्ज़ी से कहे, वह काफ़िर हो जाता है। अगर बिना जाने कहे, तब भी अक्सर आलिमों के नज़दीक काफ़िर हो जाता है। 18. कमर पर ज़ुन्नार नाम की पादरियों वाली पेटी बाँधना और कुफ़्र के लिए ख़ास कोई चीज़ पहनना कुफ़्र है। ताजिर का इन्हें दारुल हर्ब (काफ़िरों के मुल्क) में भी इस्तेमाल करना कुफ़्र है। इन्हें मज़ाक़ में, दूसरों को हँसाने के लिए इस्तेमाल करना भी कुफ़्र का सबब है।

19. किसी मुसलमान को बुरा कहने के लिए “काफ़िर” कहना कुफ़्र नहीं। उसके काफ़िर हो जाने की ख़्वाहिश से कहना कुफ़्र है। 20. जिस लड़की का निकाह बचपन में कर दिया गया हो, वह जब आक़िल और बालिग़ हो जाए और ईमान और इस्लाम को न जानती हो, पूछने पर बयान न कर सके या इन पर ईमान न रखती हो, तो वह अपने शौहर के निकाह से निकल जाती है और ख़ुद मुरतद हो जाती है। लड़का भी इसी तरह है।

21. किसी शख़्स को नाहक़ पीटने या क़त्ल करने वाले ज़ालिम से “तूने अच्छा किया, वह इसी के लायक़ था” कहना कुफ़्र है।

22. फ़र्ज़ होने पर ईमान न रखते हुए, हल्का समझकर नमाज़ न पढ़ना, रोज़ा न रखना, ज़कात न देना कुफ़्र है। 23. अल्लाह की रहमत से उम्मीद तोड़ लेना कुफ़्र है। 24. मुर्दार, सूअर, शराब जैसी जो चीज़ें ख़ुद अपनी ज़ात में हराम हैं, उन्हें “हराम लि-ऐनिही” कहा जाता है। इन्हें हलाल कहना कुफ़्र है। 25. जिन गुनाहों का हराम होना क़तई तौर पर मालूम है, उन सबको हलाल कहना भी कुफ़्र है।

26. अज़ान, मस्जिद, फ़िक़्ह की किताबें जैसी जिन चीज़ों को इस्लाम क़ीमती समझता है, उन्हें हक़ीर ठहराना कुफ़्र है। 27. यह जानते हुए कि वुज़ू नहीं है, नमाज़ पढ़ना कुफ़्र है। 28. जानते-बूझते क़िब्ले के सिवा किसी और तरफ़ नमाज़ पढ़ना कुफ़्र है। “नमाज़ क़िब्ले की तरफ़ रुख़ करके पढ़ना ज़रूरी नहीं” कहने वाला काफ़िर हो जाता है। 29. कोई शख़्स किसी इस्लामी आलिम से बेवजह बुग़्ज़ रखे या उसे गाली दे, तो उस शख़्स के कुफ़्र का डर है। 30. आलिमों ने फ़रमाया है कि अगर कोई शख़्स किसी नापसंद आदमी से कहे: “तेरा दीदार (चेहरा) मुझे जान निकालने वाले जैसा लगता है”, तो वह काफ़िर हो जाता है, क्योंकि जान निकालने वाला फ़रिश्ता (इज़राईल अलैहिस्सलाम) बड़ा फ़रिश्ता है।

“अल्लाह तआला अपने साथ शिर्क करने वालों, यानी काफ़िरों को माफ़ नहीं करता और शिर्क के सिवा, यानी कुफ़्र के सिवा दूसरे गुनाहों को माफ़ करता है” निसा: 116

31. ज़िना, लिवातत, सूद, झूठ जैसी कोई चीज़, जो हर दीन में हराम है, उसके बारे में “काश यह हलाल होती, तो मैं भी करता” – ऐसी तमन्ना करना कुफ़्र है। 32. जो यह न जाने कि मुहम्मद अलैहिस्सलाम आख़िरी ज़माने के नबी हैं, वह काफ़िर हो जाता है। 33. कोई शख़्स रेशम पहने और कोई दूसरा उसकी इस हालत पर “मुबारक हो” कहे, तो उसके कुफ़्र का डर है।

34. तफ़सीर और फ़िक़्ह की किताबों की तौहीन करने वाला, उन्हें नापसंद करने वाला, उन्हें बुरा कहने वाला काफ़िर हो जाता है। 35. कोई शख़्स कहे: “तू जिबराईल के बछड़े की तरह बिल्कुल नंगा हो गया है”, तो यह आफ़त है; यह फ़रिश्ते का मज़ाक़ उड़ाना है। 36. जो कहे: “नबी (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) काले थे”, वह काफ़िर हो जाता है। 37. जो कहे: “नमाज़ न पढ़ना अच्छा काम है”, वह काफ़िर हो जाता है। आलिमों ने फ़रमाया है कि अगर कोई शख़्स किसी से कहे: “आओ, नमाज़ पढ़ो”, और वह जवाब दे: “नमाज़ पढ़ना मेरे लिए मुश्किल काम है”, तो वह काफ़िर हो जाता है। 38. अल्लाह को “बाप” कहने वाला काफ़िर हो जाता है। 39. कोई कहे: “रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) खाना खाने के बाद अपनी मुबारक उँगली चाटते थे”, और कोई दूसरा कहे: “यह बदतमीज़ी है”, तो यह दूसरा काफ़िर हो जाता है। 40. क़ुरआन-ए-करीम के मायने अपनी अक़्ल से बयान करने वाला काफ़िर हो जाता है।

41. जिन कैसेटों और रिकॉर्डों में क़ुरआन-ए-करीम है, वे मुसहफ़ शरीफ़ (क़ुरआन-ए-करीम के नुस्ख़े) की तरह क़ीमती हैं। इनकी बेअदबी करना भी कुफ़्र है। 42. जिन्नों से जान-पहचान रखने वाले फ़ाल निकालने वाले, नुजूम की किताब देखकर हर पूछी गई बात का जवाब देने वाले और जादूगर – इनके पास जाकर उनकी बातों और कामों पर यक़ीन करना, चाहे वे कभी-कभी सही भी निकल आएँ, दरअसल अल्लाह तआला के सिवा किसी और के हर चीज़ जानने और जो चाहे कर सकने पर यक़ीन करना है, और यह कुफ़्र है। (साइंस की मालूमात पर यक़ीन न करना ऐसा नहीं है।) 43. सुन्नत को हल्का समझकर, अहमियत न देते हुए छोड़ देना कुफ़्र है। 44. जो शख़्स “जादूगर अपने जादू से जो चाहे ज़रूर कर लेता है, जादू यक़ीनन असर करता है” कहे और इस पर यक़ीन रखे, वह काफ़िर हो जाता है।

45. अगर कोई किसी मुसलमान को “काफ़िर” कहे और वह मुसलमान उसे “जी, हुज़ूर” जैसा, इस बात को क़बूल कर लेने वाला जवाब दे, तो वह भी काफ़िर हो जाता है। 46. जिस औरत से निकाह हराम है, उससे शादी करने को हलाल कहने वाला काफ़िर हो जाता है।

47. कोई शख़्स अपने पास मौजूद क़तई हराम माल से सदक़ा दे और उस पर सवाब की उम्मीद रखे, और लेने वाला फ़क़ीर यह जानते हुए कि माल हराम का है, देने वाले से कहे: “अल्लाह तुमसे राज़ी हो”, और देने वाला या कोई और “आमीन” कहे, तो ये सब काफ़िर हो जाते हैं।

48. अल्लाह तआला के सिवा किसी को, चाहे किसी भी मक़सद से हो, “पैदा करने वाला” कहना कुफ़्र है। 49. “अब्दुल क़ादिर” की जगह जान-बूझकर “अब्दुल क़ोयदुर” कहना कुफ़्र है। “अब्दुल अज़ीज़” की जगह “अब्दुल उज़ैज़”, “मुहम्मद” की जगह “मेमो”, “हसन” की जगह “हस्सो”, “इब्राहीम” की जगह “इबो” कहना भी ऐसा ही है। जो लोग ये नाम जूतों और चप्पलों पर लिखते हैं और जो उन पर पाँव रखते हैं, उनके ईमान चले जाने का डर है। 50. “जाहिल लोग औलिया को पैदा करने वाला समझ बैठेंगे, इस डर से हम मज़ारों को गिरा रहे हैं” – यह बात कुफ़्र है। 51. जिस काग़ज़, कपड़े या मुसल्ले पर कुछ लिखा हो, यहाँ तक कि एक हर्फ़ भी हो, उसे ज़मीन पर रखना (तौहीन के लिए बिछाना या इस्तेमाल करना) कुफ़्र है। 52. “अबू बकर सिद्दीक़ और उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुमा) का ख़िलाफ़त पर कोई हक़ न था” कहना कुफ़्र है। 53. जो किसी दूसरे के, ख़ास तौर पर अपनी औलाद के काफ़िर होने का सबब बने, वह ख़ुद भी काफ़िर हो जाता है। 54. रेडियो और लाउडस्पीकर से बोली और पढ़ी जाने वाली क़ुरआन-ए-करीम की हूबहू नक़ल की बेअदबी करना भी कुफ़्र है।

55. सुन्नत वाले किसी काम को नापसंद करना कुफ़्र है। सुन्नत को अहमियत न देना कुफ़्र है। 56. मय्यत को ज़मीन में दफ़न करना फ़र्ज़ है। इस फ़र्ज़ को अहमियत न देकर इस ख़िदमत से भागने वाले और इल्म और साइंस का बहाना बनाकर “मुर्दों को दफ़न करना पिछड़ापन है; बौद्ध, ब्राह्मण और कम्युनिस्ट काफ़िरों की तरह मुर्दों को जलाना बेहतर है” कहने वाले का ईमान चला जाता है, वह मुरतद हो जाता है। 57. “तेज़वेरेन दादा” (जल्दी मुराद देने वाला बाबा) कहना बहुत बुरा है और कुफ़्र का सबब है। 58. ज़िना और लिवातत को जाइज़ कहना कुफ़्र है। 59. नस्स (यानी आयत और हदीस) और इज्मा से बताए गए हराम को अहमियत न देना कुफ़्र है।

60. बड़े गुनाहों को जारी रखना, उन पर अड़े रहना कुफ़्र की तरफ़ खींच ले जाता है। नमाज़ को अहमियत न देना कुफ़्र है। 61. अल्लाह तआला के वलियों में से किसी का, मुर्दा हो या ज़िंदा, ज़बान या दिल से इनकार करना कुफ़्र है। 62. औलिया से और अपने इल्म पर अमल करने वालों से दुश्मनी कुफ़्र है। 63. “औलिया में इस्मत (गुनाहों से मासूम होने) की सिफ़त है” कहना कुफ़्र है। (इस्मत की सिफ़त सिर्फ़ नबियों में होती है।)

64. किसी भी वाक़िए के अपने आप हो जाने पर यक़ीन करना और “जानवर एक ख़लिये (सेल) वाले जानदारों से बदलते-बदलते ऊँची बनावट वाले जानदारों में तब्दील होते गए और आख़िर में इंसान बन गए” – यह कहना कुफ़्र है।

“या रब! मैं तुझसे ऐसा ईमान माँगता हूँ जिसका अंजाम कुफ़्र न हो!” हदीस शरीफ़

65. काफ़िरों की इबादतों को इबादत के तौर पर करना, मसलन ऑर्गन जैसे जो बाजे वे अपने गिरजों में बजाते हैं, उन्हें और घंटों को मस्जिदों में बजाना, और जिन चीज़ों को इस्लाम ने काफ़िरी की अलामत माना है, उन्हें बिना मजबूरी और बिना ज़बरदस्ती के इस्तेमाल करना कुफ़्र है। 66. सहाबा-ए-किराम को गाली देने वाले को मुलहिद कहते हैं। मुलहिद काफ़िर है। 67. तस्वीर या मुजस्समे वाली हस्ती में, सलीब में या सितारे, सूरज, गाय जैसी किसी भी चीज़ में उलूहियत (माबूद होने) की सिफ़त होने का यक़ीन करके, मसलन “यह जो चाहे पैदा करता है, जो चाहे करता है, बीमार को शिफ़ा देता है” कहकर उसकी ताज़ीम करना कुफ़्र है। 68. हज़रत आइशा पर क़ज़फ़ करने वाला (उन्हें बदकार कहने वाला) और उनके वालिद के सहाबी होने पर ईमान न रखने वाला काफ़िर हो जाता है। 69. ईसा अलैहिस्सलाम का आसमान से उतरना भी उन बातों में से है जिन्हें हर कोई ज़रूरी तौर पर जानता है। इस पर ईमान न रखने वाला काफ़िर हो जाता है। 70. क़ुरआन-ए-करीम और हदीस शरीफ़ में जिस शख़्स को जन्नत की ख़ुशख़बरी दी गई है, उसे काफ़िर कहना कुफ़्र है। 71. मुसलमान औरत का सिर, बाज़ू और पाँव खोलकर गली में निकलना, उन्हें मर्दों को दिखाना हराम है, गुनाह है। अगर वह इसे अहमियत न दे, परवाह न करे, तो उसका ईमान चला जाता है, वह काफ़िर हो जाती है। 72. फ़रिश्तों और जिन्नात के वुजूद पर ईमान न रखने वाला काफ़िर हो जाता है।

73. मुसलमान को “ऐ काफ़िर!” कहने वाला (या मुसलमान को फ़्रीमेसन, कम्युनिस्ट कहने वाला) अगर उसे काफ़िर समझता हो, तो ख़ुद काफ़िर हो जाता है। 74. नबियों की ठीक-ठीक तादाद मालूम नहीं। कोई ख़ास तादाद बताने से यह हो सकता है कि जो नबी नहीं, उसे नबी मान लिया जाए, या जो नबी है, उसे नबी न माना जाए, और यह कुफ़्र है, क्योंकि नबियों में से एक को न मानना सबको न मानना है। इस बारे में इस्लामी आलिमों ने फ़रमाया है कि नबियों की तादाद एक लाख चौबीस हज़ार से ज़्यादा है। कुछ बातों और कामों के कुफ़्र का सबब होने पर आलिमों का इत्तिफ़ाक़ है। मर्द हो या औरत, कोई मुसलमान अगर ऐसी कोई बात या काम, यह जानते हुए कि वह कुफ़्र का सबब है, अमदन (धमकी के बग़ैर, अपनी मर्ज़ी से) संजीदगी से या मज़ाक़ में, हँसाने के लिए कहे या करे, तो उसका ईमान चला जाता है, चाहे वह उसके मायने पर ग़ौर न करे। वह मुरतद हो जाता है। उसकी पिछली इबादतों के सवाब मिट जाते हैं। तौबा करे तब भी वे वापस नहीं आते। मालदार हो तो उस पर दोबारा हज करना ज़रूरी हो जाता है। तौबा के लिए सिर्फ़ कलिमा-ए-शहादत पढ़ लेना काफ़ी नहीं। कुफ़्र का सबब बनने वाली उस चीज़ से भी तौबा करना ज़रूरी है। (इस्लाम से जिस दरवाज़े से निकला है, उसी दरवाज़े से दाख़िल होना ज़रूरी है।) न जानना उज़्र नहीं, बल्कि बड़ा गुनाह है, क्योंकि हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है कि जो बातें जानना ज़रूरी हैं, उन्हें सीखे। जो शख़्स कुफ़्र का सबब बनने वाली बात ग़लती से, चूक से या तावील के साथ कहे, उसका ईमान और निकाह नहीं टूटता। बस उसके लिए तौबा और इस्तिग़फ़ार, यानी तजदीद-ए-ईमान करना अच्छा है।

जिस तरह एक काफ़िर एक कलिमा-ए-तौहीद कहने से मोमिन हो जाता है, उसी तरह एक मोमिन भी एक बात कहने से काफ़िर हो जाता है। हर मुसलमान को चाहिए कि सुबह और शाम यह ईमान की दुआ पढ़े, और दूसरी दुआ पढ़कर तौबा करे और अपने ईमान और निकाह की तजदीद करे:

“अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिन अन उशरिका बिका शैअन व अना आलमु व अस्तग़फ़िरुका लिमा ला आलमु इन्नका अन्ता अल्लामुल ग़ुयूब।”

“अल्लाहुम्मा इन्नी उरीदु अन उजद्दिदल ईमाना वन्निकाहा तजदीदन बि-क़ौलि ला इलाह इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह।”

ढूँढ-ढूँढकर पा लूँ अगर आपके क़दमों का निशाँ,
उस निशाँ की ख़ाक पे मल दूँ मैं अपना चेहरा,
हक़ नसीब करे तो देख लूँ आपका चेहरा…
या मुहम्मद! मेरी जान आपकी मुश्ताक़ है।
काश कोई मुबारक सफ़र हो और मैं चल पड़ूँ,
काबा की राहों में रेत में धँसता जाऊँ,
आपका हसीन जमाल एक बार ख़्वाब में देख लूँ…
या मुहम्मद! मेरी जान आपकी मुश्ताक़ है।
ज़र्रा भर भी फ़रेब मेरे दिल में न रहा,
सच्चे दिल से मैं इस हक़ राह में आ गया,
अबू बकर, उमर और उस्मान के साथ-साथ।
या मुहम्मद! मेरी जान आपकी मुश्ताक़ है।

“‘ला इलाह इल्लल्लाह’ कहकर अपने ईमान की तजदीद करो!” हदीस शरीफ़