रोज़ा
इस्लाम की पाँच शर्तों में से चौथी, मुबारक रमज़ान के महीने में हर दिन रोज़ा रखना है। रमज़ान का मतलब है “जलना”, क्योंकि इस महीने में रोज़ा रखने वालों और तौबा करने वालों के गुनाह जलकर मिट जाते हैं। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “रमज़ान का महीना आता है तो जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, जहन्नम के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं और शैतान जकड़ दिए जाते हैं।”
“सहीह बुख़ारी” की एक हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “जो शख़्स रमज़ान के महीने में रोज़ा रखने को फ़र्ज़ जाने, अपना फ़रीज़ा समझे और रोज़े के सवाब की उम्मीद अल्लाह तआला से रखे, उसके पिछले गुनाह माफ़ हो जाते हैं।” मालूम हुआ कि रोज़े के अल्लाह का हुक्म होने पर ईमान रखना और सवाब की उम्मीद रखना ज़रूरी है। दिन के लंबा होने और रोज़ा रखने के मुश्किल होने की शिकायत न करना शर्त है। दिन के लंबा होने को और रोज़ा न रखने वालों के बीच मुश्किल से रोज़ा रखने को एक मौक़ा और ग़नीमत समझना चाहिए।
किसी शख़्स पर रोज़ा फ़र्ज़ होने की शर्तें सात हैं:
1. मुसलमान होना। 2. बालिग़ होना। बच्चे का रोज़ा सहीह होता है। 3. आक़िल होना। 4. दारुल हर्ब (काफ़िरों के मुल्क) में रहने वाले का यह सुन लेना कि रोज़ा फ़र्ज़ है। 5. मुक़ीम होना, यानी शरई मायनों में मुसाफ़िर न होना। 6. हैज़ (माहवारी) की हालत में न होना। 7. निफ़ास (बच्चे की पैदाइश के बाद आने वाले ख़ून) की हालत में न होना।
रोज़े के फ़र्ज़
रोज़े के फ़र्ज़ तीन हैं: 1. नीयत करना। 2. नीयत को उसके पहले और आख़िरी वक़्त के बीच करना। 3. सुब्ह-ए-सादिक़, यानी उफ़क़ पर सफ़ेदी फैलने से लेकर सूरज डूबने तक के वक़्त [यानी शरई दिन] में रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों से बचना।
चारों मज़हबों के आलिम इत्तिफ़ाक़ से बताते हैं कि रोज़ा उस वक़्त शुरू होता है जब सुब्ह-ए-सादिक़ कहलाने वाली सफ़ेदी ज़ाहिरी (दिखाई देने वाले) उफ़क़ की लकीर के किसी एक नुक़्ते पर फैलने लगे। “मुल्तक़ा” किताब में फ़रमाया गया है: “रोज़ा सुब्ह-ए-सादिक़ की सफ़ेदी से सूरज डूबने तक खाने, पीने और मियाँ-बीवी के मिलाप (जिमा) को छोड़ देना है। एक दिन पहले सूरज डूबने से लेकर रोज़े के दिन के ज़ह्वा-ए-कुबरा1 तक के बीच रमज़ान के रोज़े की दिल से नीयत करना भी फ़र्ज़ है। ज़ह्वा के वक़्त तक अगर कुछ खाया-पिया न हो, तो नीयत करता है और रोज़ा रखता है। ज़ह्वा के वक़्त के बाद नीयत जाइज़ नहीं। सुब्ह-ए-सादिक़ से पहले नीयत करते वक़्त कहा जाता है: ‘मैंने कल रोज़ा रखने की नीयत की।’ सुब्ह-ए-सादिक़ के बाद नीयत करते वक़्त कहा जाता है: ‘मैंने आज रोज़ा रखने की नीयत की।’ किसी मुक़र्रर दिन की मन्नत के रोज़े और नफ़्ल रोज़े की नीयत का वक़्त भी यही है। हर दिन अलग नीयत करना ज़रूरी है।”
रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ें
रमज़ान के महीने में, यह जानते हुए कि वह रोज़े से है, और सुब्ह-ए-सादिक़ से पहले नीयत कर चुकने के बाद, कोई फ़ायदा देने वाली चीज़ खाने या पीने से, यानी आम तौर पर ग़िज़ा या दवा के तौर पर खाई जाने वाली या लज़्ज़त और मज़ा देने वाली किसी चीज़ को मुँह के रास्ते मेदे में पहुँचाने से, या जिमा करने या कराने से रोज़ा टूट जाता है, और क़ज़ा और कफ़्फ़ारा दोनों लाज़िम होते हैं।2 इस तारीफ़ के मुताबिक़ सिगरेट पीना रोज़े को तोड़ देता है। क़ज़ा भी लाज़िम होती है और कफ़्फ़ारा भी, क्योंकि धुएँ के ठोस और तरल ज़र्रे थूक के साथ मेदे में चले जाते हैं। हिजामा (पछना लगवाना) और ग़ीबत जैसी चीज़ें, जिनके बारे में अच्छी तरह मालूम है कि वे रोज़ा नहीं तोड़तीं, उनके बाद अगर कोई यह समझकर कि रोज़ा टूट गया, जान-बूझकर खा ले, तो रोज़ा टूट जाता है और क़ज़ा और कफ़्फ़ारा लाज़िम होते हैं। रमज़ान में जिसने सुब्ह-ए-सादिक़ से पहले नीयत नहीं की, वह ज़ह्वा से पहले रोज़ा तोड़ने वाला कोई काम करे, तो दो इमामों के नज़दीक क़ज़ा भी लाज़िम होती है और कफ़्फ़ारा भी, क्योंकि नीयत करके रोज़ा रखने का मौक़ा मौजूद होते हुए उसने यह मौक़ा गँवा दिया। इमाम-ए-आज़म के नज़दीक सिर्फ़ क़ज़ा लाज़िम होती है। ज़ह्वा के वक़्त के बाद खाए-पिए, तो तीनों इमामों के नज़दीक कफ़्फ़ारा लाज़िम नहीं होता। कफ़्फ़ारे की सज़ा मुबारक रमज़ान के महीने की हुरमत और इज़्ज़त का पर्दा फाड़ने का बदला है। इमाम-ए-आज़म के नज़दीक यह चारों मज़हबों में सहीह रमज़ान के रोज़े को जान-बूझकर तोड़ने की सज़ा है। शाफ़ई मज़हब में सुब्ह-ए-सादिक़ से पहले नीयत शर्त है। जिन हनफ़ियों ने सुब्ह-ए-सादिक़ से पहले नीयत नहीं की, या मजबूर किए जाने पर या किसी उज़्र से रोज़ा तोड़ा, वे भी इमाम-ए-आज़म के नज़दीक कफ़्फ़ारा अदा नहीं करते। क़ज़ा, मन्नत और नफ़्ल रोज़े तोड़ने पर कफ़्फ़ारा अदा नहीं किया जाता। जो शख़्स रमज़ान के किसी दिन ऐसा काम करके रोज़ा तोड़े जिससे क़ज़ा लाज़िम होती है, और फिर किसी दूसरे दिन भी वही काम जान-बूझकर करे, तो कफ़्फ़ारा भी लाज़िम हो जाता है।
“रमज़ान का महीना आता है तो जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, जहन्नम के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं और शैतान जकड़ दिए जाते हैं” हदीस शरीफ़
नीचे लिखी सब सूरतों में रोज़ा टूट जाता है, और ईद के बाद हर दिन के बदले सिर्फ़ एक दिन की क़ज़ा करना लाज़िम होता है: रोज़ा ग़लती से टूट जाए, मसलन वुज़ू करते वक़्त गले में पानी चला जाए; किसी को रोज़ा तोड़ने पर मजबूर किया जाए; कोई हुक़ना (एनिमा) कराए; नाक में तरल दवा, कोलोन या धुआँ [दूसरे के पिए हुए सिगरेट का धुआँ] चढ़ाए, या अगर (ऊद की लकड़ी, Aquilaria) और अंबर की धूनी का धुआँ खींचे; कान में दवा टपकाए; खाल के ज़ख़्म पर लगाई दवा अंदर चली जाए [और इंजेक्शन से दवा चढ़ाए]; काग़ज़, पत्थर, धातु का टुकड़ा, रुई, घास, कच्चा चावल, बाजरा या मसूर के दाने जैसी कोई ऐसी चीज़ निगल जाए जो न दवा हो न ग़िज़ा; ज़ोर लगाकर मुँह भर क़ै करे; जिसके दाँत से ख़ून निकले, वह सिर्फ़ ख़ून या थूक के बराबर मिला हुआ ख़ून निगल जाए; सुब्ह-ए-सादिक़ हो जाने का पता न होने पर खा ले; यह समझकर रोज़ा खोल ले कि सूरज डूब गया; यह भूलकर कि रोज़े से है, खा ले और फिर यह समझकर कि रोज़ा टूट गया, जान-बूझकर खाना जारी रखे; सोते में उसके मुँह में पानी डाला जाए या उससे जिमा किया जाए; नीयत किए बिना रोज़ा रखे; या रमज़ान में सुबह तक नीयत न करे और फिर नीयत करे भी, मगर ज़ह्वा के वक़्त के बाद, यानी चाश्त की नमाज़ के वक़्त के बाद, रोज़ा न रखे। इन सूरतों में कफ़्फ़ारा लाज़िम नहीं होता। गले में बारिश या बर्फ़ चली जाए, तो रोज़ा भी और नमाज़ भी टूट जाती है। क़ज़ा लाज़िम होती है। गले लगाने, लिपटने और चूमने से जुनुबी हो जाए, तो रोज़ा टूट जाता है और क़ज़ा लाज़िम होती है। जुनुबी न हुआ हो, तो नहीं टूटता। रात से दाँतों के बीच रह जाने वाली चीज़ को जान-बूझकर निगल ले, और वह चने के दाने के बराबर हो, तो रोज़ा टूट जाता है और क़ज़ा लाज़िम होती है। चने से छोटी हो, तो नहीं टूटता।
भूलकर खाने वाला शख़्स, यह जानते हुए भी कि उसका रोज़ा इससे नहीं टूटा, फिर खाए या पिए, तो क़ज़ा और कफ़्फ़ारा दोनों लाज़िम होते हैं।
“मुल्तक़ा” में और तमाम किताबों में लिखा है: “सिर और धड़ के ज़ख़्म पर लगाई गई दवा अगर दिमाग़ या हाज़मे के रास्तों में रिस जाए, तो रोज़ा टूट जाता है। सिर्फ़ क़ज़ा लाज़िम होती है।” “मुल्तक़ा” की शरह में लिखा है: “इमाम-ए-आज़म फ़रमाते हैं कि ग़िज़ा ज़ख़्म से अंदर रिस जाए तो रोज़ा तोड़ देती है। दो इमामों ने फ़रमाया कि नहीं तोड़ती, क्योंकि उनके नज़दीक जिस्म में पैदाइशी तौर पर मौजूद सुराख़ों से अंदर जाए तो तोड़ती है।” तहतावी “मराक़िल फ़लाह” की शरह में इसे ख़ूब वाज़ेह करते हैं। वह फ़रमाते हैं: “सिर और धड़ के ज़ख़्म पर लगाई गई दवा, चाहे तरल हो चाहे ठोस, अगर मालूम हो जाए कि दिमाग़ और हाज़मे के रास्ते तक पहुँच गई, तो रोज़ा टूट जाता है। अगर अंदर जाना अच्छी तरह मालूम न हो, तो दवा तरल होने पर इमाम-ए-आज़म ने फ़रमाया कि टूट जाता है। दो इमामों ने फ़रमाया कि अंदर जाना अच्छी तरह मालूम न हो तो नहीं टूटता। जिस दवा का अंदर रिसना अच्छी तरह मालूम न हो, वह ठोस हो, तो तीनों इमामों ने फ़रमाया कि नहीं टूटता।” इससे मालूम होता है कि जिस दवा का रिसना अच्छी तरह मालूम हो, वह ठोस हो या तरल, तीनों इमामों के नज़दीक रोज़ा तोड़ देती है। इसी से यह भी मालूम होता है कि बाज़ू, टाँग और हर जगह से खाल के नीचे या पट्ठों में सुई से लगाए जाने वाले टीके और दवा के इंजेक्शन रोज़ा तोड़ देते हैं।
रोज़ा न तोड़ने वाली चीज़ें
मुबारक रमज़ान में, या क़ज़ा, कफ़्फ़ारे, मन्नत और नफ़्ल रोज़ों में, नीचे लिखी चीज़ों में से कोई भी चीज़ रोज़े को नहीं तोड़ती: कोई यह भूलकर कि रोज़े से है, खा ले, पी ले, जिमा कर ले; रोज़े की हालत में सोते में जुनुबी हो जाए, या जागते में देखने से जुनुबी हो जाए; आयोडीन या तेल मले; आँख में सुरमा लगाए [चाहे इनका रंग और बू थूक या पेशाब में मालूम हो]; शहवत से चूमे; ग़ीबत करे; हिजामा कराए; बिना चाहे मुँह भर क़ै करे, या ज़ोर लगाकर थोड़ी-सी क़ै करे; कान में पानी चला जाए; मुँह या नाक से गले में धूल, धुआँ या मक्खी चली जाए [या ऑक्सीजन सिलेंडर से मसनूई साँस दी जाए, या दूसरों के पिए हुए सिगरेट का धुआँ आकर मुँह और नाक में जाने से बचना मुमकिन न हो]; कुल्ली करने के बाद मुँह में रह जाने वाली नमी को थूक के साथ निगल ले; आँख में या दाँत के गड्ढे में दवा रखे, चाहे उसका मज़ा गले में महसूस हो।
[“बह्रुर राइक़” किताब के लेखक (रहमतुल्लाहि तआला अलैहि) फ़रमाते हैं: “मुँह कभी जिस्म का अंदरूनी हिस्सा माना जाता है। इसलिए रोज़ेदार अपना थूक निगल ले, तो उसका रोज़ा नहीं टूटता। यह ऐसा है जैसे इंसान के अंदर की नजासत मेदे से आँत में चली जाए। मुँह के ज़ख़्म से, दाँत निकलवाने से, सुई लगी जगह से या मेदे से मुँह में ख़ून आ जाना न वुज़ू तोड़ता है न रोज़ा। इस ख़ून को थूकने या निगलने पर, अगर थूक ख़ून से ज़्यादा हो, यानी पीला हो, तो भी ये नहीं टूटते। मेदे से आने वाली दूसरी चीज़ें मुँह में आ जाएँ, तब भी यही हुक्म है: न वुज़ू टूटता है न रोज़ा। मुँह भर हो और मुँह से बाहर निकल आए, तो दोनों टूट जाते हैं। मुँह का अंदरूनी हिस्सा कभी जिस्म के बाहरी हिस्से की तरह भी होता है। मुँह में पानी लेने से रोज़ा नहीं टूटता।” “जौहरा” में भी ऐसा ही लिखा है। इससे मालूम हुआ कि दाँत निकलवाने पर ज़्यादा ख़ून आए, तो उसे थूकने से रोज़ा नहीं टूटता। रोज़े से न हो और उसे निगल ले, तो वुज़ू नहीं टूटता। ख़ून थूक से कम हो, तो दोनों में से कुछ भी नहीं टूटता।
“फ़तावा-ए-हिन्दिय्या” में लिखा है: “हुक़ना (एनिमा) कराना और कान में तेल टपकाना अगरचे रोज़ा तोड़ देता है, मगर कफ़्फ़ारा लाज़िम नहीं होता। मर्द अपनी शर्मगाह में पानी या तेल डाले, तो चाहे वह मसाने तक पहुँच जाए, रोज़ा नहीं टूटता। औरत की शर्मगाह में डाले, तो टूट जाता है। भीगी या तेल लगी उँगली पिछली राह में या औरत की शर्मगाह में डाले, तो टूट जाता है। उँगली सूखी हो, तो नहीं टूटता। इस्तिंजा करते वक़्त पिछली राह में पानी चला जाए, तो टूट जाता है।”] खाने का मज़ा निगले बिना चखना, बिना मिलावट वाली, यानी क़ुदरती गोंद (च्युइंग गम) चबाना, जुनुबी होने का शक होते हुए चूमना, और ठंडक के लिए नहाना अगरचे रोज़ा नहीं तोड़ते, मगर मकरूह तन्ज़ीही हैं। सुरमा लगाना, मूँछों पर तेल लगाना और फूल, मुश्क और कोलोन सूँघना रोज़ा नहीं तोड़ता और मकरूह भी नहीं। जिस तरह सुरमा और मूँछों का तेल ज़ीनत के लिए हो तो मकरूह है, उसी तरह हाथ में या कॉलर पर फूल लगाए रखना भी मकरूह है। धूल या धुएँ वाली चीज़ सूँघना और चीनी वग़ैरा की मिलावट वाली च्युइंग गम चबाना रोज़ा तोड़ देता है। मिस्वाक और हिजामा मकरूह नहीं।
अगर कोई शख़्स मुबारक रमज़ान में अपना वह रोज़ा, जिसकी नीयत उसने इम्साक के वक़्त से पहले कर ली थी, जान-बूझकर तोड़ दे, तो कफ़्फ़ारा भी लाज़िम होता है और क़ज़ा भी।
नफ़्ल और क़ज़ा रोज़ों में कफ़्फ़ारा नहीं।
कफ़्फ़ारे के लिए रमज़ान के दिनों और उन पाँच दिनों के सिवा, जिनमें रोज़ा रखना हराम है, बाक़ी दिनों में लगातार साठ दिन रोज़े रखता है। इसके बाद, इनके अलावा, जितने रोज़े तोड़े उतने दिनों के क़ज़ा रोज़े रखता है। [ईदुल फ़ित्र के पहले दिन और ईदुल अज़हा के चार दिनों में रोज़ा रखना हराम है।] अगर इसकी ताक़त न हो, तो साठ फ़क़ीरों को एक दिन, या एक फ़क़ीर को साठ दिन, दो वक़्त पेट भरकर खाना खिलाता है। या उनमें से हर एक को फ़ितरे की मिक़दार माल देता है। एक दिन के क़ज़ा रोज़े के बदले एक दिन रोज़ा रखा जाता है। अगर कोई कहे: “रमज़ान है तो मैंने नीयत की, नहीं है तो मेरी नीयत नहीं”, तो इस तरह नीयत करके रोज़ा रखना बिल्कुल जाइज़ नहीं। जो लोग रमज़ान आसमान में नया चाँद देखकर नहीं, बल्कि पहले से तैयार किए गए कैलेंडरों के मुताबिक़ शुरू करते हैं, उन पर ईद के बाद क़ज़ा की नीयत से दो दिन रोज़े रखना लाज़िम है। मुबारक रमज़ान के शुरू होने के दिन का हिसाब “Se’âdet-i Ebediyye” किताब में तफ़सील से लिखा है।
इब्ने आबिदीन (रहिमहुल्लाहु तआला) फ़रमाते हैं: “बादल वाले मौसम में, चाहे अज़ान हो जाए, जब तक सूरज डूबने का यक़ीन न हो जाए, इफ़्तार नहीं करना चाहिए। ज़्यादातर सितारे दिखाई देने से पहले इफ़्तार कर लिया जाए, तो ‘ताजील’ (इफ़्तार में जल्दी करना) नाम का मुस्तहब अदा हो जाता है। किसी जगह सूरज डूबता देखकर इफ़्तार किया जाए, तो ऊँचाई पर, मसलन मीनार पर मौजूद शख़्स, जब तक यह न समझ ले कि उसके लिए भी सूरज डूब गया है, इफ़्तार नहीं करता। फ़ज्र की नमाज़ और सहरी का हुक्म भी यही है।”
“रोज़ा मोमिन को जहन्नम से बचाने वाली ढाल है” हदीस शरीफ़
ऐ नबियों के सरवर,
ऐ औलिया के रहबर,
सारे जहानों के नबी,
अहलन व सहलन मरहबा।
आप जानों के जानाँ हैं,
आप दिलों के फ़रमाँ हैं,
आप दोनों जहान के सुल्तान हैं,
अहलन व सहलन मरहबा।
आप ख़ुदा के महबूब हैं,
शफ़ाअत से जुदा न कीजिए,
अहमद, मुहम्मद, मुस्तफ़ा,
अहलन व सहलन मरहबा।
यूनुस सच्ची बात कहता है,
आपकी दरगाह पर चेहरा मलता है,
महशर के दिन हमारा इंतिज़ार है,
अहलन व सहलन मरहबा।
