मेरे प्यारे नबी

ज़कात देना

इस्लाम की तीसरी शर्त ज़कात देना है।

सोने, चाँदी और तिजारत के माल की ज़कात देने के लिए उनका निसाब की मिक़दार में होना ज़रूरी है। निसाब का मतलब है मालदारी और फ़क़ीरी के बीच की हद। सोने का निसाब 96 ग्राम है। चाँदी का 672 ग्राम है। ज़रूरत की चीज़ों के सिवा जिसके पास किसी भी क़िस्म का माल निसाब की मिक़दार में हो, उसे मालदार (ग़नी) कहते हैं। जिसके पास इतना माल न हो, उसे फ़क़ीर कहते हैं। सोने के सिक्कों और चीज़ों, औरतों के ज़ेवरात, दाँतों पर चढ़े सोने के ख़ोल और हर क़िस्म के तिजारती माल (की क़ीमत) – इन सबका कुल वज़न 96 ग्राम, और चाँदी की चीज़ों का 672 ग्राम हो जाए, और इसके बाद एक हिजरी साल, यानी 354 दिन का अरबी साल यह माल पास रहे, तो उस वक़्त उनके वज़न का (और तिजारती माल की क़ीमत का) चालीसवाँ हिस्सा अलग किया जाएगा और क़ुरआन-ए-करीम में बताए गए आठ क़िस्म के लोगों में से किसी एक को या कई को दिया जाएगा। इसे ज़कात कहते हैं। मसलन, जिसके पास 100 ग्राम सोना हो, वह एक अरबी साल के बाद ज़कात की नीयत से ढाई (2.5) ग्राम सोना अलग करके जिस मुसलमान फ़क़ीर को चाहे देगा। ज़कात उन फ़क़ीरों को देनी चाहिए जो क़ुरबानी के निसाब के मालिक न हों, क़र्ज़दार मुसलमान को, उस शख़्स को जो अपने वतन में मालदार हो मगर जहाँ है वहाँ फ़क़ीर हो, और जिहाद और हज के रास्ते में मोहताज रह जाने वाले को।

जिसके पास गुज़ारे से ज़्यादा, लेकिन क़ुरबानी के निसाब से कम माल हो, उसे फ़क़ीर कहते हैं। हर मुलाज़िम, चाहे उसकी तनख़्वाह कितनी भी हो, अगर घर चलाने में मुश्किल महसूस करता हो, तो ज़कात ले सकता है, और उस पर क़ुरबानी करना और फ़ितरा देना वाजिब नहीं होता। जो दीनी इल्म पढ़ा रहा हो या पढ़ रहा हो, वह ज़कात ले सकता है, चाहे उसके पास चालीस साल का गुज़ारा हो। ज़कात के पैसे से मस्जिद नहीं बनाई जाती, जिहाद और हज नहीं किया जाता। मालदार अपने माँ-बाप, अपनी औलाद और अपनी बीवी को ज़कात नहीं दे सकता। भाई-बहनों, बहू, दामाद, सास, ससुर, फूफी, चचा, मामूँ और ख़ाला को दे सकता है। इन्हें देने में ज़्यादा सवाब है। फ़क़ीर को निसाब से कम दिया जाता है। लेकिन अगर उसके बाल-बच्चे भी हों, तो इतना ज़्यादा दिया जा सकता है कि उनमें से हर एक के हिस्से में निसाब की मिक़दार न आए। जो अपना माल फ़ुज़ूलख़र्ची में उड़ाए या हराम में ख़र्च करे, उसे ज़कात नहीं दी जाती। सैयद हज़रात आजकल चूँकि ग़नीमत के माल से अपना हक़ नहीं ले पाते, इसलिए उन्हें भी दी जाती है।

माल-दौलत पर मग़रूर न हो, “क्या कोई है मुझ जैसा?” न कह!

एक उलटी हवा चलेगी और सब कुछ खलिहान की तरह उड़ा देगी!

ज़कात के माल की चार क़िस्में हैं:

1. सोना और चाँदी।

2. तिजारत के लिए ख़रीदा गया हर क़िस्म का सामान।

3. जंगल और चरागाहों में चरने वाले चौपाए। 4. ज़मीन की पैदावार, यानी उश्र।

“उस दिन मेरी रहमत सिर्फ़ उन लोगों के लिए ख़ास है जो मुझसे डरकर कुफ़्र और गुनाहों से बचते हैं, अपनी ज़कात देते हैं और क़ुरआन-ए-करीम और मेरे नबी (अलैहिस्सलाम) पर ईमान लाते हैं” आराफ़: 156

अबू हनीफ़ा (रहिमहुल्लाहु तआला) फ़रमाते हैं: “बारिश या नदी के पानी से सींचकर ज़मीन से उगने वाली फ़सल, फलों और सब्ज़ियों की, और शहद की भी, मिक़दार चाहे कितनी भी हो, पैदावार हाथ आते ही उसका दसवाँ हिस्सा फ़क़ीरों को देना फ़र्ज़ है। इसे उश्र कहते हैं। उश्र दिए बिना पैदावार खाना हराम है।”

तिजारती माल का निसाब अगर क़ीमत के लिहाज़ से 96 ग्राम सोने के सिक्कों के बराबर हो, तो तिजारती माल की ख़रीद-क़ीमत के हिसाब से उसका चालीसवाँ हिस्सा सोने की शक्ल में दिया जाता है। या तिजारती माल में से दिया जाता है। जिस शख़्स का किसी पर क़र्ज़ बाक़ी हो और उसके हाथ में उसके काग़ज़ात (दस्तावेज़) हों, उसे उनकी ज़कात देनी लाज़िम है। यह हाथ में मौजूद माल में से दी जाती है। माल फ़क़ीर के हाथ में सौंपना ज़रूरी है।

काग़ज़ी नोटों के निसाब का हिसाब सिर्फ़ सोने के सिक्कों से किया जाता है, और उनका चालीसवाँ हिस्सा सोने की शक्ल में दिया जाता है। ज़कात फ़र्ज़ होने की शर्तें छह हैं: 1. मुसलमान होना। 2. बालिग़ होना। 3. आक़िल होना। 4. आज़ाद होना। 5. ज़कात के निसाब की मिक़दार में हलाल ज़कात वाले माल का मालिक होना। 6. हाथ में मौजूद माल का अपनी ज़रूरत और क़र्ज़ से ज़्यादा होना। ज़कात फ़र्ज़ हो जाने के बाद जो उसे मुसलमान फ़क़ीर को न दे, या जिस पर कोई और क़र्ज़ हो, उसके भलाई के काम, नेकियाँ और सदक़े सवाब नहीं बनते, बल्कि गुनाह होते हैं। ज़कात देना और क़र्ज़ अदा करना उसका फ़र्ज़ है।

रमज़ान आ पहुँचा,
मस्जिदें नूर से जगमगा उठीं।
तोप दग़ी, क़िंदील जली,
हम सबने इस पर यक़ीन किया।
पहले दस दिनों में रहमत भरपूर है,
फिर गुनाह माफ़ होते हैं।
ईद की रात मोमिन
जहन्नम से आज़ाद होते हैं।
मेरे भाई, तुम भी रोज़ा रखो,
और अपनी नमाज़ें भी पढ़ो!
हर पल गुनाह से बचो,
जहन्नम में बड़ा अज़ाब है!
दुश्मन तुम पर हमला करता है,
कहता है: “रोज़ा कमज़ोर करता है।”
इल्म और साइंस को वह रौंदता है,
ग़द्दार, हमेशा झूठ बोलता है!
जागो! उम्र का ज़्यादातर हिस्सा बीत गया,
रोज़ा रखो, भूखे और भरे पेट का फ़र्क़ समझो!
इस्लामी किताबें पढ़ो,
इंसानियत की कुछ ख़ुशबू लो!