हज
इस्लाम की पाँचवीं शर्त हज को जाना है। यानी जिसमें ताक़त हो, वह उम्र में एक बार हज करे। जिसका रास्ता अमन वाला हो, जिस्म तंदुरुस्त हो, और जो मक्का मुकर्रमा शहर जाकर लौटने तक पीछे छोड़े गए बाल-बच्चों के गुज़ारे के लिए काफ़ी माल अलग रखने के बाद बचे हुए पैसों से वहाँ जाकर लौट सकता हो, उस पर उम्र में एक बार एहराम की हालत में काबा मुअज़्ज़मा का तवाफ़ करना और अरफ़ात के मैदान में ठहरना फ़र्ज़ है।
हज फ़र्ज़ होने की शर्तें
हज फ़र्ज़ होने की शर्तें आठ हैं: 1. मुसलमान होना। 2. बालिग़ होना। 3. आक़िल होना। 4. तंदुरुस्त होना। 5. ग़ुलाम न होना। 6. मौजूद माल का असली ज़रूरतों से ज़्यादा होना। 7. हज का वक़्त आ जाना। हज का वक़्त अरफ़ा का दिन और ईद के चार दिन हैं। रास्ते की मुद्दत भी हिसाब में ली जाती है। 8. जो औरत मक्का से सफ़र की मुद्दत जितनी दूर हो, उसके साथ उसके शौहर या ऐसे महरम का होना ज़रूरी है जिससे उसका निकाह हमेशा के लिए जाइज़ न हो।
जो शख़्स इन आठ शर्तों का मालिक हो, उस पर उम्र में एक बार हज को जाना फ़र्ज़ हो जाता है। एक बार से ज़्यादा जाए, तो बाद के सालों में जाना नफ़्ल हज होता है। नफ़्ल इबादत का मतलब है वह इबादत जो न फ़र्ज़ हो न सुन्नत, बल्कि अपनी ख़्वाहिश से की जाए। नफ़्ल इबादत का सवाब फ़र्ज़ इबादत के सवाब के मुक़ाबले में ऐसा कम है जैसे समुंदर के मुक़ाबले में पानी का एक क़तरा। इस्लाम के आलिमों ने मक्का से दूर के मुल्कों में रहने वालों को दोबारा हज को जाने की इजाज़त नहीं दी। अब्दुल्लाह देहलवी (क़ुद्दिसा सिर्रुहू) अपने तिरसठवें मकतूब में फ़रमाते हैं: “हज के रास्ते में अक्सर इबादतें पूरी तरह अदा नहीं हो पातीं। इसी लिए इमाम रब्बानी (रहमतुल्लाहि अलैहि) ने अपने 123वें और 124वें मकतूबात में बताया कि वह उमरे और नफ़्ल हज को जाने से राज़ी नहीं।” जो नफ़्ल हज किसी फ़र्ज़ के अदा होने में या औरतों के पर्दे में रुकावट बने, वह हराम है। ऐसे नफ़्ल हज को जाना सवाब नहीं, गुनाह है। उमरे को जाना भी इसी तरह है।
हज के फ़र्ज़
हज के फ़र्ज़ तीन हैं:
1. एहराम बाँधते वक़्त हज की नीयत करना।
2. अरफ़ात में वुक़ूफ़ (ठहरना)। 3. तवाफ़-ए-ज़ियारत करना।
हज के लिए एहराम की नीयत करना फ़र्ज़ है। एहराम की चादरें ओढ़ना सुन्नत है। सिले हुए कपड़ों से ख़ाली रहना वाजिब है।
अरफ़ात में वुक़ूफ़ का पहला वक़्त ज़िलहिज्जा की नौवीं तारीख़ को ज़वाल के वक़्त से अगले दिन सुबह होने तक है। [एक दिन पहले या एक दिन बाद अरफ़ात में वुक़ूफ़ किया जाए, तो हज बातिल हो जाता है। वहाबी नया चाँद देखे बिना एक दिन पहले ईद मना लेते हैं। जो वक़्त पर वुक़ूफ़ नहीं करते, उनका हज सहीह नहीं होता।]
आप ही हैं, या रसूलल्लाह
सारे रसूलों के सरदार
आप ही हैं, या रसूलल्लाह।
यक़ीन के आसमानों के पूरे चाँद
आप ही हैं, या रसूलल्लाह।
आपका नूर जगमगाता चिराग़,
सारे जहान आपके मोहताज,
ताज और मेराज वाले
आप ही हैं, या रसूलल्लाह।
रहमान का आईना,
सुब्हान का पाक नूर,
सात मआनी का राज़
आप ही हैं, या रसूलल्लाह।
इसरा की रात के गवाह,
“सुब्हानल्लज़ी असरा”,
सारे नामों को समेटने वाले
आप ही हैं, या रसूलल्लाह।
ऐ लुत्फ़ और सख़ावत के सरचश्मे,
आपकी जगह मक़ाम-ए-महमूद,
सारी मख़लूक़ात का मक़सूद
आप ही हैं, या रसूलल्लाह।
जानों में जानाँ,
इल्म और इरफ़ान की खान,
मेरे जद्द, मेरे पीर, मेरे सुल्तान
आप ही हैं, या रसूलल्लाह।
तौहीद की राह खोलने वाले,
तफ़रीद का राज़ पाने वाले,
हुदाई की उम्मीद
आप ही हैं, या रसूलल्लाह।
Aziz Mahmûd Hüdâyî
“सबसे क़ीमती अमल हज्ज-ए-मबरूर (क़बूल हुआ हज) है। हज्ज-ए-मबरूर करने वाले के गुनाह माफ़ हो जाते हैं। वह ऐसा हो जाता है जैसे अभी-अभी दुनिया में आया हो” हदीस शरीफ़
