मेरे प्यारे नबी

आपका बचपन

रज़ाई माँ के सुपुर्द किया जाना

हमारी माँ हज़रत आमिना ने जब अपने नूरानी बच्चे को गोद में लिया, तो जैसे अपने शौहर हज़रत अब्दुल्लाह के इंतिक़ाल का दुख भूल-सी गईं। नबी-ए-करीम को आपकी वालिदा ने नौ दिन दूध पिलाया, उसके बाद अबू लहब की कनीज़ सुवैबा ख़ातून ने कुछ दिन रज़ाई माँ (दूध पिलाने वाली माँ) की ख़िदमत अंजाम दी। सुवैबा ख़ातून इससे पहले हज़रत हमज़ा को और बाद में अबू सलमा को भी दूध पिला चुकी थीं। हाफ़िज़ इब्नुल जज़री कहते हैं: “अबू लहब को ख़्वाब में देखकर उसका हाल पूछा गया तो उसने कहा: ‘मैं क़ब्र का अज़ाब भुगत रहा हूँ, लेकिन हर साल रबीउल अव्वल महीने की बारहवीं रात को मेरा अज़ाब हल्का हो जाता है। अपनी दो उँगलियों के बीच से निकलने वाला ठंडा पानी चूसकर मैं राहत पाता हूँ, क्योंकि जिस रात रसूलुल्लाह दुनिया में आए, उस रात मेरी कनीज़ सुवैबा ने मुझे यह ख़ुशख़बरी दी थी। मैंने ख़ुशी के मारे उसे आज़ाद कर दिया था और उसे हुक्म दिया था कि वह उन्हें दूध पिलाए। इसी वजह से इन रातों में मेरा अज़ाब हल्का हो जाता है।’” उस ज़माने में मक्का वालों का दस्तूर था कि वे अपने बच्चों को किसी रज़ाई माँ के सुपुर्द कर देते थे। बच्चों को आसपास के उन पहाड़ी चरागाहों में भेजा जाता था जिनकी आब-ओ-हवा अच्छी और पानी मीठा था, और वे कुछ मुद्दत अपनी रज़ाई माँओं के पास रहते थे। इसकी वजह मक्का की गर्म हवा थी। हर साल इस मक़सद से बहुत-सी औरतें मक्का आती थीं। वे दूध पिलाने के लिए एक-एक बच्चा लेकर चली जाती थीं। बच्चों को पाल-पोसकर लौटाने पर उन्हें अच्छी-ख़ासी उजरत और तोहफ़े मिलते थे। नबी-ए-करीम की पैदाइश वाले साल भी, हर साल की तरह, पहाड़ी चरागाहों में रहने वाले बनू साद क़बीले की बहुत-सी औरतें रज़ाई माँ बनने की नीयत से मक्का आईं। उनमें से हर एक ने दूध पिलाने के लिए एक-एक बच्चा ले लिया था। बनू साद क़बीला मक्का के आसपास के क़बीलों में शराफ़त, सख़ावत, मर्दानगी, तवाज़ो और अरबी ज़बान साफ़-सुथरी बोलने में बहुत मशहूर था। क़ुरैश के बड़े लोग चाहते थे कि उनके बच्चे ज़्यादातर इसी क़बीले को दिए जाएँ। उस साल बनू साद क़बीले के इलाक़े में सख़्त सूखा और क़हत पड़ा हुआ था। इसी क़बीले की हलीमा ख़ातून इस हालत को यूँ बयान करती हैं: “उस साल मैं जंगलों में घूमकर घास इकट्ठा करती थी और उसके मिल जाने पर भी अल्लाह तआला का शुक्र अदा करती थी। कभी-कभी तीन दिन गुज़र जाने पर भी मेरे मुँह में एक निवाला न जाता। इसी हालत में मेरे यहाँ एक बच्चा पैदा हुआ। एक तरफ़ भूख थी, दूसरी तरफ़ ज़चगी की तकलीफ़। ऐसे पल भी आते थे कि भूख से मैं ज़मीन और आसमान, रात और दिन में फ़र्क़ न कर पाती थी। एक रात मैं सहरा में सो गई। ख़्वाब में एक शख़्स ने मुझे दूध से भी सफ़ेद पानी में डुबो दिया और कहा: ‘इस पानी में से पियो।’ मैंने जी भरकर पिया। फिर उसने मुझे और पीने पर ज़ोर दिया। मैं पीती ही गई; वह शहद से ज़्यादा मीठा था। उसने पूछा: ‘ऐ हलीमा! तुम्हारा दूध ख़ूब हो! क्या तुमने मुझे पहचाना?’ मैंने कहा कि नहीं पहचाना, तो उसने कहा: ‘मैं तुम्हारी वह हम्द और शुक्र हूँ जो तुमने अपनी तंगी की हालत में किया। ऐ हलीमा! मक्का जाओ। वहाँ एक “नूर” तुम्हारा साथी बनेगा, और तुम बरकतों से भर जाओगी। यह ख़्वाब किसी को न सुनाना!’ जब मैं जागी, तो मैंने देखा कि मेरी छातियाँ दूध से भरी हुई हैं और तंगी और भूख ने भी मेरा साथ छोड़ दिया है।” उस साल क़हत की वजह से, उजरत पर बच्चों को दूध पिलाकर अपनी तंगी दूर करने के लिए, दूसरे सालों के मुक़ाबले ज़्यादा रज़ाई माँएँ मक्का आई थीं।

“हम खेलने के लिए पैदा नहीं किए गए” हदीस शरीफ़

बनू साद का सहरा

सब अमीर घरानों के बच्चे लेने की जल्दी में थीं। इन औरतों में से हर एक ने एक बच्चा ले लिया। नबी-ए-करीम यतीम थे, इसलिए ज़्यादा उजरत न मिलने के ख़याल से वे आपको लेने को तैयार न हुईं। इन औरतों में पाकदामनी, पाकीज़गी, हिल्म यानी नर्मी, हया और अच्छे अख़लाक़ के लिए मशहूर हलीमा ख़ातून भी थीं। उनकी सवारी का जानवर कमज़ोर था, इसलिए वे मक्का देर से पहुँचे थे। लेकिन इसी देरी की वजह से उन्हें जिस चीज़ की तलाश थी, उससे कहीं बढ़कर मिल गया। हलीमा और उनके शौहर ने मक्का की गलियों में घूमकर देखा कि अमीर घरानों के बच्चे लिए जा चुके हैं। लेकिन वे ख़ाली हाथ लौटना भी नहीं चाहते थे। अब उनकी एक ही आरज़ू थी कि किसी बच्चे को लेकर लौटें।

आख़िरकार उनकी मुलाक़ात एक ऐसी बुज़ुर्ग हस्ती से हुई जिन्हें देखकर दिल में एहतिराम पैदा होता था और जिनका चेहरा बड़ा प्यारा था। यह मक्का के सरदार अब्दुल मुत्तलिब थे। अब्दुल मुत्तलिब ने उनकी ख़्वाहिश जानकर उन्हें सलाह दी कि वे उनके पोते को ले लें, और बताया कि इसकी बदौलत वे बड़ी दौलत और सआदत पाएँगे। अब्दुल मुत्तलिब की मुहब्बत और अपनापन उन्हें अपनी तरफ़ खींच रहा था। उन्होंने उनकी पेशकश फ़ौरन क़बूल कर ली। फिर बुज़ुर्ग दादा हलीमा ख़ातून को हज़रत आमिना के घर ले गए।

हलीमा ख़ातून बयान करती हैं: “जब मैं बच्चे के सिरहाने पहुँची, तो वह पोतड़े में लिपटे, हरे रेशम की एक चादर पर मीठी नींद सो रहे थे, और चारों तरफ़ मुश्क की ख़ुशबू फैल रही थी। मैं हैरान रह गई और एक ही पल में उनसे ऐसा लगाव हो गया कि मेरा दिल उन्हें जगाने को न चाहा। जब मैंने अपना हाथ उनके सीने पर रखा, तो वह जाग गए और मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराए, और मैं इस मुस्कुराहट पर फ़िदा होकर अपने आप से बेख़बर हो गई। फिर यह सोचकर कि इनकी माँ इतना ख़ूबसूरत और मुबारक बच्चा मुझे नहीं देंगी, मैंने उनका चेहरा ढाँपा और फ़ौरन गोद में उठा लिया। मैंने अपनी दाईं छाती दी, तो वह दूध पीने लगे। बाईं छाती दी, तो नहीं पी। अब्दुल मुत्तलिब ने मेरी तरफ़ मुड़कर कहा: ‘तुम्हें मुबारक हो! औरतों में तुम्हारी तरह यह नेमत पाने वाली कोई न हुई!’1

अपना प्यारा बच्चा मुझे सौंपने के बाद बीबी आमिना ने कहा: ‘ऐ हलीमा, तीन दिन पहले मैंने एक आवाज़ सुनी जो कह रही थी: “तुम्हारे बेटे को दूध पिलाने वाली औरत बनू साद क़बीले की अबू ज़ुवैब की नस्ल से होगी।”’ इस पर मैंने जवाब दिया: ‘मैं बनू साद क़बीले से हूँ और मेरे वालिद की कुन्नियत अबू ज़ुवैब है।’”

हलीमा ख़ातून यह भी बयान करती हैं: “बीबी आमिना ने मुझे और भी बहुत-से वाक़िआत सुनाए और वसीयत की। मैंने भी उन्हें मक्का आने से पहले देखा हुआ अपना ख़्वाब सुनाया, और यह भी बताया कि आते हुए मेरे दाएँ-बाएँ से आवाज़ें आ रही थीं: ‘ऐ हलीमा, तुम्हें मुबारक हो! आँखों को चकाचौंध करने वाले और जहानों को रौशन करने वाले उस नूर को दूध पिलाना तुम्हारे नसीब में होगा।’”

हलीमा ख़ातून कहती हैं: “मैं मुहम्मद अलैहिस्सलाम को लेकर हज़रत आमिना के घर से निकली और अपने शौहर के पास आई। वह भी मेरी गोद के बच्चे का चेहरा देखकर अपने आप से बेख़बर हो गए और कहा: ‘ऐ हलीमा! मैंने आज तक ऐसा ख़ूबसूरत चेहरा नहीं देखा!’ और उन्हें अपने पास लेते ही जो बरकतें हमें मिलीं, उन्हें देखकर कहा: ‘ऐ हलीमा! जान लो कि तुमने एक बहुत मुबारक और बुलंद मर्तबे वाला बच्चा लिया है।’ मैंने जवाब दिया: ‘अल्लाह की क़सम, मैं तो यही चाहती थी, मेरी मुराद पूरी हो गई।’”

हलीमा ख़ातून और उनके शौहर मुहम्मद अलैहिस्सलाम को लेकर जिस घड़ी मक्का से रवाना हुए, उसी घड़ी से आपकी बरकत पाने लगे। उनका जो दुबला गधा पहले तेज़ नहीं चल पाता था, अब अरबी नस्ल के घोड़े की तरह दौड़ने लगा। साथ आया क़ाफ़िला उनसे पहले चलकर बहुत दूर निकल गया था, फिर भी वे क़ाफ़िले से जा मिले और उसे पीछे छोड़ दिया। बनू साद के इलाक़े में पहुँचकर उन्हें ऐसी फ़रावानी और बरकत मिली जो पहले कभी देखी न गई थी। उनके जिन जानवरों का दूध पहले थोड़ा होता था, उनके थन दूध से भरकर छलकने लगे। यह देखकर पड़ोसी हैरान हुए और साफ़ समझ गए कि यह उस बच्चे की वजह से है जिसे उन्होंने दूध पिलाने के लिए लिया था। नबी-ए-करीम हलीमा ख़ातून की सिर्फ़ दाईं छाती से दूध पीते थे।

“मेरे बाप-दादा में से किसी ने ज़िना नहीं किया। अल्लाह तआला मुझे पाक, नेक बापों और पाक माँओं से दुनिया में लाया” हदीस शरीफ़

बाईं छाती वह अपने रज़ाई भाई के लिए छोड़ देते थे। दो महीने के थे तो घुटनों के बल चलने लगे। तीन महीने के हुए तो खड़े होने लगे, चार महीने के थे तो दीवार का सहारा लेकर चलते थे। पाँच महीने के थे तो चलने लगे, छह महीने के थे तो तेज़ चलने लगे। सात महीने के थे तो हर तरफ़ जाने लगे। आठ महीने के थे तो ऐसी बातें करने लगे जो समझ में आ जाती थीं, और नौ महीने के थे तो बिल्कुल साफ़ बोलने लगे। दस महीने के थे तो तीर चलाने लगे।

हलीमा ख़ातून ने यूँ बयान किया: “जब उन्होंने पहली बार बोलना शुरू किया, तो कहा: ‘ला इलाह इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर। वलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन।’ उस दिन के बाद उन्होंने अल्लाह तआला का नाम लिए बग़ैर किसी चीज़ की तरफ़ हाथ नहीं बढ़ाया। बाएँ हाथ से कुछ नहीं खाते थे। जब चलने लगे, तो बच्चों के खेलने की जगहों से दूर रहते और उनसे फ़रमाते: ‘हम इसके लिए पैदा नहीं किए गए।’ हर दिन सूरज की रौशनी जैसा एक नूर उन्हें ढाँप लेता और फिर हट जाता। वह चाँद से बातें करते; जब भी उसकी तरफ़ इशारा करते, चाँद हरकत करता।”

सूखे की वजह से वे बड़ी तंगी में पड़ गए और एक बार बारिश की दुआ के लिए निकले। मुहम्मद अलैहिस्सलाम को अपने साथ ले गए और दुआ करके आपके सदक़े ख़ूब बारिश और बरकत पाई। हलीमा ख़ातून बयान करती हैं: “मुहम्मद अलैहिस्सलाम जब दो साल के हुए, तो मैंने उनका दूध छुड़ा दिया। फिर उन्हें उनकी माँ के सुपुर्द करने के लिए अपने शौहर के साथ मक्का गई। लेकिन हमें उनकी ऐसी बरकतें मिली थीं कि उनसे जुदा होना, उनका मुबारक चेहरा न देखना हमें बहुत भारी लग रहा था। मैंने उनके हालात उनकी माँ को सुनाए। बीबी आमिना ने कहा: ‘मेरे बेटे की बड़ी शान है।’ मैंने कहा: ‘अल्लाह की क़सम, मैंने इनसे ज़्यादा मुबारक कोई शख़्स नहीं देखा।’ फिर बहुत-से बहाने बनाकर बीबी आमिना से दरख़्वास्त की कि वह कुछ और दिन हमारे पास रहें। उन्होंने हमारा दिल नहीं तोड़ा और उन्हें हमारे पास रहने की इजाज़त दे दी। हम उन्हें लेकर फिर अपने क़बीले में लौट आए। इसकी बदौलत हमारा घर बरकत से भर गया, हमारा माल, जायदाद और शान बढ़ गई। हमें बेशुमार नेमतें मिलीं।”2

मुबारक सिर पर एक बादल

हलीमा ख़ातून ने बयान किया: “एक दिन सरवर-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने पूछा: ‘दिन में मेरे भाई-बहन दिखाई नहीं देते। इसकी वजह क्या है?’ मैंने कहा: ‘वे भेड़ें चराने जाते हैं। घर रात को ही लौटते हैं।’ इस पर उन्होंने कहा: ‘मुझे भी उनके साथ भेज दीजिए। मैं भी भेड़ें चराऊँगा।’ मैंने बहाने बनाए और बहुत-से उज़्र पेश किए। आख़िर उनका दिल रखने के लिए कहा: ‘अच्छा।’

अगले दिन मैंने उनके मुबारक बालों में कंघी की, उन्हें कपड़े पहनाकर उनके रज़ाई भाई-बहनों के साथ भेज दिया।

कुछ दिन वह उनके साथ आते-जाते रहे। एक दिन जब उनकी रज़ाई बहन शैमा जंगल से लौटी, तो मैंने पूछा: ‘मेरी आँखों का नूर, मेरा बेटा मुहम्मद कहाँ है?’ उसने कहा: ‘सहरा में।’ जब मैंने पूछा: ‘मेरे जिगर का टुकड़ा इस गर्मी को कैसे सहता है?’ तो शैमा ने जवाब दिया: ‘अम्मी जान! उन्हें कभी कोई नुक़सान नहीं पहुँच सकता, क्योंकि उनके मुबारक सिर पर एक बादल हमेशा उनके साथ चलता रहता है; इस तरह वह सूरज की गर्मी से बचे रहते हैं।’ मैंने कहा: ‘यह क्या कह रही हो? क्या तुम सच कह रही हो?’ तो उसने क़सम खाई। तब जाकर मुझे इत्मीनान हुआ।

मुबारक सीने का चाक किया जाना (शक़्क़-ए-सद्र)

फिर एक दिन दोपहर के वक़्त उनका रज़ाई भाई ज़मरा मेरे पास आया और बोला: ‘अम्मी जान! जल्दी दौड़िए!… हम अपने क़ुरैशी भाई के साथ भेड़ें चरा रहे थे। अचानक हरे कपड़े पहने तीन शख़्स आए। वे हमारे भाई को हमारे पास से उठाकर पहाड़ की चोटी पर ले गए। उन्हें पीठ के बल लिटाकर छुरी से उनका पेट चीर दिया। जब मैं आपको ख़बर देने आया, तब वे वहीं थे। मुझे नहीं मालूम कि मेरा भाई ज़िंदा बचा या नहीं।’ हलीमा ख़ातून ने बात आगे यूँ बयान की: उसी घड़ी मेरे होश उड़ गए। हम तेज़ी से वहाँ पहुँचे और उन्हें देखा। मैंने फ़ौरन उनके मुबारक चेहरे और सिर को चूमा और पूछा: ‘ऐ मेरी आँखों के नूर! ऐ सारे जहानों के लिए रहमत मेरे बेटे! यह क्या हाल है? तुम्हारे साथ क्या हुआ? तुम्हें किसने परेशान किया?’

उन्होंने कहा: ’घर से निकलने के बाद मैंने हरे कपड़ों वाले दो शख़्स देखे। एक के हाथ में चाँदी का लोटा और दूसरे के हाथ में हरे ज़मुर्रद का तश्त था। तश्त बर्फ़ से भी सफ़ेद किसी चीज़ से भरा हुआ था। वे मुझे पहाड़ की चोटी पर ले गए। एक ने मुझे पीठ के बल लिटाया। मैं देख रहा था और उन्होंने मेरा सीना नाफ़ तक चीर दिया। मुझे ज़रा भी दर्द या तकलीफ़ महसूस नहीं हुई। उन्होंने हाथ डालकर अंदर जो कुछ था, सब निकाल लिया। उसे उस सफ़ेद चीज़ से धोकर फिर उसकी जगह रख दिया। फिर एक ने दूसरे से कहा: “उठिए, अब मैं अपनी ख़िदमत अंजाम दूँ”, और हाथ डालकर मेरा दिल निकाला। उसके दो टुकड़े किए और उसमें से एक काली चीज़ निकालकर फेंक दी और कहा: “आपके जिस्म में शैतान का हिस्सा यही था। हमने इसे निकालकर फेंक दिया। ऐ अल्लाह तआला के प्यारे! हमने आपको वसवसे3 और शैतान के फ़रेब से महफ़ूज़ कर दिया।” फिर उन्होंने मेरे दिल को अपने पास मौजूद एक लतीफ़ और नर्म चीज़ से भर दिया। उस पर नूर की एक मुहर लगा दी। उस मुहर की ठंडक मैं अब भी अपने सारे बदन में महसूस करता हूँ। उनमें से एक ने जब चीरी हुई जगह पर हाथ रखा, तो मेरा ज़ख़्म भर गया। फिर उन्होंने मुझे मेरी उम्मत के दस आदमियों के साथ तौला, मैं भारी निकला। हज़ार आदमियों के साथ तौला, मैं फिर भी भारी निकला। इस पर उनमें से एक ने दूसरे से कहा: “अब इन्हें तौलना छोड़ दीजिए। अल्लाह की क़सम, अगर आप इन्हें इनकी सारी उम्मत के साथ भी तौलें, तब भी यही भारी निकलेंगे।” फिर उनमें से हर एक ने मेरे हाथ और चेहरे को चूमा, और वे मुझे यहीं छोड़कर चले गए।’ चीरी हुई जगह उनके मुबारक सीने पर साफ़ दिखाई देती थी।”4

हमारे प्यारे नबी के साथ पेश आया यह वाक़िआ, जिसका ज़िक्र क़ुरआन-ए-करीम की सूरह अलम नशरह की पहली आयत-ए-करीमा में है, “शक़्क़-ए-सद्र”, यानी सीने का चाक किया जाना कहलाता है।

मुहम्मद अलैहिस्सलाम को नुबुव्वत मिलने के बाद सहाबा-ए-किराम में से कुछ ने कहा: “या रसूलल्लाह! क्या आप हमें अपने बारे में कुछ बताएँगे?” तो आपने फ़रमाया: “मैं अपने दादा इब्राहीम की दुआ हूँ। मैं अपने भाई ईसा की ख़ुशख़बरी हूँ!

और मैं अपनी माँ का ख़्वाब हूँ। जब वह मुझसे हामिला थीं, तो उन्होंने देखा था कि उनसे एक ऐसा नूर निकला जिसने शाम के महलों को रौशन कर दिया… मैं बनू साद इब्ने बक्र के यहाँ दूध पीकर पला-बढ़ा।”

चार साल की उम्र के बाद हलीमा ख़ातून आपको मक्का ले आईं और आपकी वालिदा के सुपुर्द कर दिया। आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब ने हलीमा ख़ातून को बहुत बड़े तोहफ़े देकर उन पर एहसान किया। आपको मक्का में छोड़ते वक़्त हलीमा ख़ातून ने जुदाई का दुख इन लफ़्ज़ों में बयान किया: “जैसे मेरी जान और मेरा दिल भी उन्हीं के साथ रह गया।”

“मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को जितने दिन मैंने दूध पिलाया, मैं उनसे बेहद ख़ुश रही। वह कभी किसी चीज़ को गंदा नहीं करते थे। दिन और रात में एक-एक बार पेशाब करते, फिर अगले दिन उसी वक़्त तक दोबारा पेशाब न करते” हलीमा ख़ातून

मोहतरम वालिदा का इंतिक़ाल

हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) छह साल की उम्र तक अपनी वालिदा के पास पले-बढ़े। छह साल की उम्र में आप अपनी वालिदा और उम्मे ऐमन नाम की कनीज़ के साथ अपने रिश्तेदारों और अपने वालिद अब्दुल्लाह की क़ब्र की ज़ियारत के लिए मदीना गए।

वहाँ वे एक महीना ठहरे। नबी-ए-करीम ने मदीना में बनू नज्जार के हौज़ में तैरना सीखा। उसी दौरान एक यहूदी आलिम ने आपमें नुबुव्वत की निशानियाँ देखीं। वह आपके पास आया और आपका नाम पूछा। “अहमद” जवाब मिला तो उस आलिम ने चिल्लाकर कहा: “यह बच्चा आख़िरी ज़माने का नबी होगा!” इसके अलावा वहाँ के कुछ दूसरे यहूदी आलिमों ने भी आपमें नुबुव्वत की निशानियाँ देखीं और आपस में बातें कीं कि आप नबी होंगे।

उनकी ये बातें सुनकर उम्मे ऐमन ने हमारी माँ हज़रत आमिना को इसकी ख़बर दी, तो आपकी मुबारक वालिदा किसी नुक़सान के डर से आपको लेकर मक्का लौटने के लिए रवाना हुईं। अबवा नाम की जगह पर पहुँचे तो हज़रत आमिना बीमार हो गईं। बीमारी बढ़ती गई, और उन पर बार-बार बेहोशी छाने लगी।

सिरहाने खड़े अपने प्यारे बेटे मुहम्मद अलैहिस्सलाम की तरफ़ देखकर उन्होंने कहा: “ऐ उस हस्ती के बेटे जो मौत के ख़ौफ़नाक तीर से अल्लाह तआला की मेहरबानी और मदद से सौ ऊँटों के बदले बच निकली! अल्लाह तआला तुम्हें मुबारक करे। अगर ख़्वाब में मैंने जो कुछ देखा, वह सच निकला, तो तुम जलाल और बेहद इकराम वाले अल्लाह तआला की तरफ़ से आदम की औलाद को हलाल और हराम बताने के लिए भेजे जाओगे। अल्लाह पाक तुम्हें क़ौमों में चले आ रहे बुतों और बुतपरस्ती से महफ़ूज़ रखेगा और बचाएगा।” फिर उन्होंने ये शेर पढ़े:

पुराना होता है जो नया है, मरता है जो ज़िंदा है,
बहुत कुछ ख़त्म हो जाता है; कौन है जो सदा जवाँ है?
मैं भी मरूँगी, बस मेरा फ़र्क़ यही है:
तुम्हें मैंने जना है, मेरी इज़्ज़त यही है।
पीछे छोड़ी है मैंने नेक औलाद,
आँखें बंद कीं, दिल है बहुत शाद।
मेरा नाम हमेशा ज़बानों पर रहेगा,
तुम्हारा प्यार दिलों में हमेशा बसेगा।

फिर उन्होंने इंतिक़ाल फ़रमाया। वहीं उन्हें दफ़न किया गया। आमिना ने जब इंतिक़ाल फ़रमाया, तो वह बीस साल की थीं। उम्मे ऐमन सारे जहानों के सरदार को अपने साथ लेकर कुछ दिनों के सफ़र के बाद मक्का लाईं और आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब के सुपुर्द कर दिया।5

आपके वालिद और वालिदा मोमिन थे

हबीब-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के वालिद और वालिदा इब्राहीम अलैहिस्सलाम के दीन पर थे।6 यानी वे मोमिन थे। इस्लाम के आलिमों ने बताया है कि वे इब्राहीम अलैहिस्सलाम के दीन पर थे, और मुहम्मद अलैहिस्सलाम को नुबुव्वत मिलने के बाद आपकी उम्मत में शामिल होने के लिए उन्हें ज़िंदा किया गया, उन्होंने कलिमा-ए-शहादत सुना और पढ़ा, और इस तरह वे इस उम्मत में से भी हो गए।7

मुबारक दादा के पास

मुहम्मद अलैहिस्सलाम आठ साल की उम्र तक अपने दादा के पास पले-बढ़े। आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब मक्का के सबके चहेते सरदार थे और शहर के बहुत-से कामों का इंतिज़ाम उन्हीं के हाथ में था; वह रोबदार, सब्र वाले, अच्छे अख़लाक़ वाले, सच्चे, जवाँमर्द और सख़ी थे। ग़रीबों को पेट भर खिलाते, यहाँ तक कि भूखे-प्यासे जानवरों को भी चारा देते थे।

वह अल्लाह तआला और आख़िरत पर ईमान रखते थे। बुराइयों से बचते और जाहिलिय्यत (जहालत) के दौर की हर तरह की बुरी आदतों से दूर रहते थे। मक्का में ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी को रोकते और आने वाले मेहमानों की ख़ातिरदारी करते थे। रमज़ान के महीने में हिरा पहाड़ पर ख़लवत में बैठना उनकी आदत थी। अब्दुल मुत्तलिब बच्चों से बहुत मुहब्बत और शफ़क़त करते थे; वह अपने प्यारे पोते को सीने से लगाए रखते और दिन-रात अपने से जुदा न करते थे। वह आपसे बड़ी मुहब्बत और शफ़क़त से पेश आते थे। काबा के साये में अपनी ख़ास गद्दी पर आपके साथ बैठते, और जो लोग आपको वहाँ से हटाना चाहते, उनसे कहते: “मेरे बेटे को छोड़ दो, इनकी शान बुलंद है।”8 वह नबी-ए-करीम की दाई उम्मे ऐमन को बार-बार ताकीद करते कि आपकी अच्छी देखभाल करें: “मेरे बेटे का अच्छी तरह ख़याल रखना। अहले किताब मेरे बेटे के बारे में कहते हैं कि यह इस उम्मत के नबी होंगे।” उम्मे ऐमन ने कहा है: “मैंने उनके बचपन में कभी उन्हें भूख या प्यास की शिकायत करते नहीं देखा। सुबह को वह ज़मज़म के पानी का एक घूँट पी लेते थे। जब हम उन्हें खाना खिलाना चाहते, तो वह कहते: ‘मुझे नहीं चाहिए, मेरा पेट भरा है।’”

अब्दुल मुत्तलिब जब सोते या अपने कमरे में अकेले होते, तो आपके सिवा किसी को अपने पास आने की इजाज़त न देते। आपको शफ़क़त से सीने से लगाते, सहलाते, आपकी बातों और हरकतों से बेहद ख़ुश होते। दस्तरख़्वान पर आपको अपने पास बिठाते, अपने घुटने पर बिठाते, खाने की सबसे अच्छी, सबसे लज़ीज़ चीज़ आपको खिलाते, और आपके आए बिना दस्तरख़्वान पर न बैठते। आपके बारे में उन्होंने बहुत-से ख़्वाब देखे और बहुत-से वाक़िआत के गवाह बने।

एक बार मक्का में सूखा और क़हत पड़ गया। अब्दुल मुत्तलिब अपने एक ख़्वाब की वजह से मुहम्मद अलैहिस्सलाम का हाथ पकड़कर अबू क़ुबैस पहाड़ पर चढ़े और यह दुआ की: “या अल्लाह! इस बच्चे के सदक़े हमें बरकत वाली बारिश से ख़ुश कर दे!” उनकी दुआ क़बूल हुई और ख़ूब बारिश हुई। उस ज़माने के शायरों ने इस वाक़िए को अपनी नज़्मों में बयान किया।

नजरान का राहिब

एक दिन अब्दुल मुत्तलिब काबा के पास बैठे थे कि नजरान का एक राहिब उनके पास आकर बातें करने लगा। बातों-बातों में उसने कहा: “हमने पढ़ा है कि बनू इस्माईल में से सबसे आख़िर में आने वाले नबी की सिफ़ात किताबों में लिखी हुई हैं। यह जगह, यानी मक्का, उनकी पैदाइश की जगह है। उनकी सिफ़ात ऐसी-ऐसी हैं!” और वह उन्हें एक-एक करके गिनाने लगा। उसी वक़्त हमारे प्यारे नबी उनके पास आ गए। नजरान का राहिब आपको ग़ौर से देखने लगा; फिर क़रीब आकर आपकी आँखों, पीठ और पाँवों को देखा और जोश में आकर यूँ कहा:

“अल्लाह पाक तुम्हें क़ौमों में चले आ रहे बुतों और बुतपरस्ती से महफ़ूज़ रखेगा और बचाएगा” बीबी आमिना

“यह वही हैं। क्या यह बच्चा तुम्हारी नस्ल से है?” अब्दुल मुत्तलिब ने कहा: “यह मेरा बेटा है!” तो नजरान के राहिब ने कहा: “हमने किताबों में जो पढ़ा है, उसके मुताबिक़ इनके वालिद को ज़िंदा नहीं होना चाहिए!” अब्दुल मुत्तलिब ने कहा: “यह मेरे बेटे का बेटा है। इनके पैदा होने से पहले ही, जब इनकी माँ हामिला थीं, इनके वालिद का इंतिक़ाल हो गया था।” तो राहिब ने कहा: “अब तुमने सच कहा।” इस पर अब्दुल मुत्तलिब ने अपने बेटों से कहा: “अपने भाई के बेटे के बारे में जो कहा गया, उसे सुन लो, इनकी देखभाल करो और इनकी अच्छी तरह हिफ़ाज़त करो।”

मुबारक दादा का इंतिक़ाल

अब्दुल मुत्तलिब का इंतिक़ाल क़रीब आया तो उन्होंने अपने बेटों को जमा करके कहा: “अब दुनिया से आख़िरत की तरफ़ कूच करने का मेरा वक़्त आ गया है। मेरी एक ही फ़िक्र है, यह यतीम। काश मेरी उम्र लंबी होती और मैं यह ख़िदमत शौक़ से जारी रखता! लेकिन मेरे बस में क्या है? उम्र वफ़ा नहीं करेगी। अब मेरा दिल और मेरी ज़बान इसी जुदाई की आग में जल रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि यह मोती तुममें से किसी एक को अमानत के तौर पर सौंप दूँ। तुममें से कौन है जो इनके हक़ का ठीक-ठीक ख़याल रखे और इनकी ख़िदमत में कोई कोताही न करे?” अबू लहब घुटनों के बल बैठकर बोला: “ऐ अरब के सरदार! अगर यह अमानत सौंपने के लिए आपके ज़ेहन में कोई है, तो बहुत अच्छा; वरना यह ख़िदमत मैं अंजाम दूँगा।” अब्दुल मुत्तलिब ने उससे कहा: “तुम्हारे पास माल बहुत है, लेकिन तुम सख़्त दिल हो और तुममें रहम कम है, जबकि यतीम का दिल ज़ख़्मी और नाज़ुक होता है, जल्दी टूट जाता है।” दूसरे बेटों में से कुछ ने भी यही ख़्वाहिश दोहराई। अब्दुल मुत्तलिब ने हर एक की ख़ास बातें बताकर किसी को क़बूल नहीं किया। अबू तालिब की बारी आई तो उन्होंने कहा: “मैं यह सबसे ज़्यादा चाहता हूँ। लेकिन अपने बड़ों के होते हुए आगे बढ़ना मुनासिब न था। मेरा माल कम है, मगर मेरी वफ़ादारी मेरे भाइयों से ज़्यादा है।” अब्दुल मुत्तलिब ने कहा: “तुम सच कहते हो। इस ख़िदमत के लायक़ तुम ही हो। लेकिन मैं हर काम में इनसे मशवरा करता हूँ और इनकी मर्ज़ी के मुताबिक़ चलता हूँ। हर बार सही नतीजे पर पहुँचता हूँ। इस मामले में भी इनसे मशवरा कर लूँ। तुममें से जिसे यह चुनें, वही मुझे भी क़बूल है।”

फिर उन्होंने हमारे प्यारे नबी की तरफ़ मुड़कर पूछा: “ऐ मेरी आँखों के नूर! तुम्हारी याद दिल में लिए मैं आख़िरत की तरफ़ जा रहा हूँ। अपने इन चचाओं में से तुम किसे चुनते हो?”

नबी-ए-करीम उसी पल उठे, अबू तालिब के गले से लिपट गए और उनके घुटने पर बैठ गए। इससे अब्दुल मुत्तलिब के दिल को बड़ी राहत मिली और उन्होंने कहा: “अल्लाह तआला की हम्द हो। मैं भी यही चाहता था।” फिर अबू तालिब की तरफ़ मुड़कर कहा: “ऐ अबू तालिब! इस मोती ने माँ-बाप की शफ़क़त नहीं देखी। इसलिए इनका ख़याल रखना और इन पर जान छिड़कना। मैं तुम्हें अपने दूसरे बेटों से बढ़कर समझता हूँ। यह बड़ी और बहुत क़ीमती अमानत मैंने तुम्हारे सुपुर्द कर दी, क्योंकि तुम और इनके वालिद एक ही माँ से हो। अपनी जान की तरह इनकी हिफ़ाज़त करना। क्या तुमने मेरी यह वसीयत क़बूल की?” अबू तालिब ने कहा:

“हाँ, मैंने क़बूल की।” इस पर अब्दुल मुत्तलिब ने हमारे प्यारे नबी को गले लगाया, आपके मुबारक सिर और चेहरे को चूमा और सूँघा। फिर कहा: “तुम सब गवाह रहो कि मैंने इससे अच्छी ख़ुशबू कभी नहीं सूँघी और इससे ख़ूबसूरत चेहरा कभी नहीं देखा।”9

अबू तालिब की सरपरस्ती में

दादा के इंतिक़ाल के बाद कायनात के सरदार (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) आठ साल की उम्र से अपने चचा अबू तालिब के पास रहने लगे और उनकी सरपरस्ती में पले-बढ़े। उस वक़्त अबू तालिब भी अपने वालिद अब्दुल मुत्तलिब की तरह मक्का में क़ुरैश के बड़े लोगों में से थे; लोग उनसे मुहब्बत करते, उनकी इज़्ज़त करते और उनकी बात मानते थे। उन्होंने भी नबी-ए-करीम से बड़ी मुहब्बत और शफ़क़त का बर्ताव किया। आपको अपने बच्चों से ज़्यादा चाहते, आपको साथ लिए बग़ैर न सोते, कहीं न जाते और कहते: “तुम बहुत भलाई वाले हो, बहुत मुबारक हो!” अबू तालिब आपके हाथ बढ़ाए बग़ैर खाना शुरू न करते, चाहते कि पहले आप शुरू करें। कभी-कभी आपके लिए अलग दस्तरख़्वान भी लगवाते। सुबह जागने पर घर वाले देखते कि आपका चेहरा चाँद की तरह चमक रहा है और आपके बाल सँवरे हुए हैं। अबू तालिब के पास ज़्यादा माल न था, और उनका कुनबा भी बड़ा था। रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को अपनी सरपरस्ती में लेने के बाद उन्हें फ़रावानी और बरकत मिली। मक्का में सूखे की वजह से लोग तंगी में पड़ गए तो अबू तालिब आपको काबा के पास ले गए और दुआ की। आपकी बरकत से ख़ूब बारिश हुई। लोग सूखे और क़हत से छुटकारा पा गए।10

ग़ालिब की नस्ल से एक नबी ज़ाहिर होंगे,
ज़मज़म और हजर के दरमियान खड़े होंगे।
शहर के सब लोगों के साथ उनकी मदद करो,
ऐ बनू आमिर! उनकी मदद में ही सआदत होगी।

“अब दुनिया से आख़िरत की तरफ़ कूच करने का मेरा वक़्त आ गया है। मेरी एक ही फ़िक्र है, यह यतीम। काश मेरी उम्र लंबी होती और मैं यह ख़िदमत शौक़ से जारी रखता! लेकिन मेरे बस में क्या है? उम्र वफ़ा नहीं करेगी। अब मेरा दिल और मेरी ज़बान इसी जुदाई की आग में जल रहे हैं” अब्दुल मुत्तलिब

मक्का – बुसरा का सफ़र

बहीरा राहिब

हमारे प्यारे नबी जब बारह साल के क़रीब थे, तो एक दिन आपने देखा कि अबू तालिब तिजारत के सफ़र की तैयारी कर रहे हैं। जब आप समझ गए कि वह आपको साथ ले जाना नहीं चाहते, तो आपने ग़मगीन होकर अबू तालिब से फ़रमाया: “इस शहर में मुझे किसके पास छोड़कर जा रहे हैं? न मेरे वालिद हैं, न कोई मुझ पर तरस खाने वाला!…” यह बात अबू तालिब के दिल पर बहुत असर कर गई। उन्होंने आपको भी साथ ले जाने का फ़ैसला किया। लंबे सफ़र के बाद तिजारती क़ाफ़िला बुसरा में ईसाइयों की एक ख़ानक़ाह के पास ठहरा।11

इस ख़ानक़ाह में बहीरा नाम का एक राहिब रहता था। पहले वह यहूदी आलिमों में से था, बाद में ईसाई हो गया था। इस आलिम राहिब के पास एक किताब थी जो हाथों-हाथ चली आ रही थी और छिपाकर रखी गई थी; लोग जो सवाल पूछते, उनका जवाब वह उसी से देता था। क़ुरैश का क़ाफ़िला पिछले सालों में कई बार यहाँ से गुज़रा था, मगर उसने कभी उसकी तरफ़ ध्यान नहीं दिया था। वह हर सुबह ख़ानक़ाह की छत पर चढ़कर क़ाफ़िलों के आने की तरफ़ देखता और बड़ी बेचैनी से किसी चीज़ का इंतिज़ार करता रहता। इस बार बहीरा राहिब को कुछ हो गया था; वह जोश से चौंककर अपनी जगह से उछल पड़ा था, क्योंकि जब क़ुरैश का क़ाफ़िला दूर से दिखाई दिया, तो उसने देखा कि उसके ऊपर एक बादल भी उनके साथ-साथ तैरता हुआ आ रहा है। यह बादल नबी-ए-करीम पर साया किए हुए था। क़ाफ़िला ठहरा, तो बहीरा ने यह भी देखा कि हबीब-ए-अकरम जिस पेड़ के नीचे बैठे, उसकी शाख़ें आप पर झुक गईं, और वह और भी ज़्यादा जोश में आ गया। उसने फ़ौरन दस्तरख़्वान लगवाए। फिर आदमी भेजकर क़ुरैश के क़ाफ़िले के सब लोगों को खाने की दावत दी। क़ाफ़िले वाले हमारे प्यारे नबी को अपने सामान के पास छोड़कर राहिब के पास चले गए। बहीरा ने आने वालों को ग़ौर से देखकर पूछा: “ऐ क़ुरैश के लोगो, क्या तुममें कोई ऐसा है जो खाने पर नहीं आया?” उन्होंने कहा: “हाँ, एक शख़्स है।” दरअसल क़ुरैश के लोग तो आ गए थे, मगर बादल वहीं था। यह देखकर वह समझ गया था कि क़ाफ़िले में कोई रह गया है। बहीरा राहिब ने इसरार किया कि वह भी आएँ। आपके आते ही बहीरा आपको ग़ौर से देखने और परखने लगा। उसने अबू तालिब से पूछा: “क्या यह बच्चा तुम्हारी नस्ल से है?” अबू तालिब ने कहा: “मेरा बेटा है।” तो बहीरा ने कहा: “किताबों में लिखा है कि इस बच्चे के वालिद ज़िंदा नहीं होंगे; यह तुम्हारा बेटा नहीं है।” इस बार अबू तालिब ने जवाब दिया: “यह मेरे भाई का बेटा है।” बहीरा ने पूछा: “इनके वालिद को क्या हुआ?” तो उन्होंने कहा: “इनकी पैदाइश से कुछ पहले उनका इंतिक़ाल हो गया।” बहीरा ने कहा: “तुमने सच कहा। इनकी माँ को क्या हुआ?” तो उन्होंने जवाब दिया: “उनका भी इंतिक़ाल हो गया।” इस पर बहीरा ने “तुमने सच कहा” कहा और नबी-ए-करीम की तरफ़ मुड़कर आपको बुतों के नाम की क़सम दी। मगर हमारे प्यारे नबी ने बहीरा से फ़रमाया: “मुझे बुतों के नाम की क़सम न दो। दुनिया में मेरे लिए उनसे बड़ा कोई दुश्मन नहीं। मुझे उनसे नफ़रत है।”

इस पर बहीरा ने आपको अल्लाह तआला के नाम की क़सम देकर पूछा: “क्या तुम सोते हो?” आपने फ़रमाया: “मेरी आँखें सोती हैं, लेकिन मेरा दिल नहीं सोता।”

बहीरा ने और भी बहुत-से सवाल पूछे और उनके जवाब पाए। जो जवाब उसे मिले, वे उसकी पहले पढ़ी हुई किताबों से हूबहू मिलते थे। फिर उसने हमारे प्यारे नबी की मुबारक आँखों की तरफ़ देखकर अबू तालिब से पूछा:

“मैं गवाही देता हूँ कि आप अल्लाह तआला के रसूल हैं!… यह हैं सारे जहानों के सरदार… यह हैं सारे जहानों के रब के रसूल… यह हैं वह बड़े नबी जिन्हें अल्लाह तआला ने सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजा!” बहीरा राहिब

– “क्या यह सुर्ख़ी इनकी मुबारक आँखों में हमेशा रहती है?”

– अबू तालिब ने कहा: “हाँ, हमने इसे कभी जाते नहीं देखा।”

इस निशानी को भी मिलता देखकर बहीरा ने, अपने दिल को पूरा यक़ीन हो जाने के लिए, नुबुव्वत की मुहर देखनी चाही। लेकिन नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अदब की वजह से अपनी मुबारक पीठ खोलना नहीं चाहा।

इस पर आपके चचा ने कहा: “ऐ मेरी आँखों के नूर! इसकी यह ख़्वाहिश भी पूरी कर दो!” तो नबी-ए-करीम ने अपनी मुबारक पीठ खोली, और बहीरा नुबुव्वत की मुहर को उसकी पूरी ख़ूबसूरती के साथ देर तक जी भरकर देखता रहा। जोश में आकर उसने उसे चूमा, और उसकी आँखों से आँसू सैलाब की तरह बह निकले। फिर उसने कहा:

– “मैं गवाही देता हूँ कि आप अल्लाह तआला के रसूल हैं!” फिर अपनी आवाज़ और ऊँची करके कहा: “यह हैं सारे जहानों के सरदार… यह हैं सारे जहानों के रब के रसूल… यह हैं वह बड़े नबी जिन्हें अल्लाह तआला ने सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजा…”

वहाँ मौजूद क़ुरैश के लोगों ने हैरान होकर कहा: “इस राहिब की नज़र में मुहम्मद की कितनी क़द्र है!”

फिर बहीरा ने अबू तालिब की तरफ़ मुड़कर कहा:

– “यह नबियों में सबसे आख़िरी और सबसे इज़्ज़त वाले हैं। इनका दीन सारी ज़मीन पर फैलेगा और पुराने दीनों को मंसूख़ कर देगा। इस बच्चे को शाम मत ले जाओ, क्योंकि बनी इस्राईल इनके दुश्मन हैं। मुझे डर है कि वे इनके मुबारक जिस्म को कोई नुक़सान न पहुँचाएँ। इनके बारे में बहुत-से अहद और पैमान लिए गए हैं।”

अबू तालिब ने पूछा:

– “ये अहद और पैमान क्या हैं?” बहीरा ने जवाब दिया:

– “अल्लाह तआला ने तमाम नबियों से, और सबसे आख़िर में ईसा अलैहिस्सलाम से, यह वादा लिया कि वे अपनी उम्मतों को आख़िरी ज़माने के नबी के आने की ख़बर दें।”

बहीरा की इन बातों के बाद अबू तालिब ने शाम जाने का इरादा छोड़ दिया। उन्होंने अपना सामान बुसरा में बेचा और मक्का लौट आए।12 बहीरा से सुनी हुई बातें उम्र भर अबू तालिब के कानों में गूँजती रहीं। वह नबी-ए-करीम से और भी ज़्यादा मुहब्बत करने लगे। उन्होंने मरते दम तक आपकी हिफ़ाज़त की और आपके हर काम में मददगार रहे।

अपने चचा ज़ुबैर के साथ यमन जाना

हर हाल में फ़ज़ीलतों और ख़ूबियों के मालिक, बेमिसाल इंसान, हमारे प्यारे नबी बड़े होकर सत्रह साल के हो गए थे। उसी दौरान आपके चचा ज़ुबैर तिजारत के लिए यमन जा रहे थे; वह अपनी तिजारत में बरकत के लिए आपको भी अपने साथ ले गए। इस सफ़र में भी आपके बहुत-से हैरतअंगेज़ हालात देखे गए। मक्का लौटने पर आपके ये हालात बयान किए गए, और क़ुरैश क़बीले में कहा जाने लगा: “इनकी शान बहुत बुलंद होगी।”13