दुनिया में तशरीफ़ लाना (पैदाइश)
सात तबक़ ज़मीन, सात आसमान, मुख़्तसर यह कि सारा आलम बड़े एहतिराम और ख़ुशी के साथ अपने उस सरदार का इंतिज़ार कर रहा था जो सय्यिदुल मुरसलीन, ख़ातमुल अंबिया और हबीब-ए-ख़ुदा हैं। तमाम मख़लूक़ात ज़बान-ए-हाल से “ख़ुश आमदीद, या रसूलल्लाह!” कहने के लिए तैयार थीं। हिजरत से 53 साल पहले, हाथी के वाक़िए के पचपन दिन बाद, रबीउल अव्वल महीने की बारह तारीख़ को पीर की रात, सुबह होने के क़रीब, मक्का के बनू हाशिम मोहल्ले में, सफ़ा पहाड़ी के पास एक घर में, जिनका बड़ी बेताबी से इंतिज़ार किया जा रहा था, वह अल्लाह तआला के नूर मुहम्मद मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) पैदा हुए। आपके तशरीफ़ लाने से आलम ने नई ज़िंदगी पाई। अँधेरे अचानक उस “नूर” से रौशन हो गए।1
यह रात वह रात है कि वह शरीफ़ हस्ती
अपने नूर से सारे जहानों को रौशन करती।
इस रात वह हस्ती दुनिया को जन्नत बनाती है,
इस रात हर शय पर हक़ की रहमत छा जाती है।
इस रात दिल वाले ख़ुशियाँ मनाते हैं,
इस रात पर दिल वाले जान लुटाते हैं।
सारे जहानों के लिए रहमत हैं मुस्तफ़ा,
गुनाहगारों की शफ़ाअत फ़रमाने वाले हैं मुस्तफ़ा।
मेरी उम्मत, मेरी उम्मत
शरफ़ों में सबसे बुलंद शरफ़ पाने वाली, माँओं में सबसे ख़ुशनसीब हज़रत आमिना अपने हमल का हाल यूँ बयान करती हैं: “उस सरवर के हमल के दिनों में मैंने कोई दर्द या तकलीफ़ नहीं देखी। मुझे अपने हामिला होने का एहसास तक न होता था। लेकिन छह महीने के बाद एक दिन, नींद और जागने के बीच की हालत में किसी ने मुझसे कहा: ‘क्या तुम जानती हो कि तुम किसकी माँ बनने वाली हो?’ मैंने जवाब दिया: ‘मैं नहीं जानती।’ तो उन्होंने ख़बर दी: ‘जान लो कि तुम नबियों में से आख़िरी नबी की माँ बनने वाली हो!’ पैदाइश का वक़्त क़रीब आया तो वही साहब फिर आए और कहा: ‘ऐ आमिना! बच्चा पैदा हो तो उसका नाम मुहम्मद रखना।’ एक और रिवायत में यूँ बताया गया है: ‘ऐ आमिना! बच्चा पैदा हो तो उसका नाम अहमद रखना!’”
हमारी माँ हज़रत आमिना पैदाइश की घड़ी का हाल भी यूँ बयान करती हैं: “जब पैदाइश की घड़ी आई, तो मैंने एक रोबदार आवाज़ सुनी। मेरे बदन में कँपकँपी छा गई। फिर मैंने एक सफ़ेद परिंदा देखा; उसने आकर अपने पर से मुझे सहलाया। डर और कँपकँपी का कोई निशान बाक़ी न रहा। उसी वक़्त मुझे सख़्त प्यास लगी, मानो मैं गर्मी से जल रही हूँ। अपने पास मैंने दूध जैसे सफ़ेद शरबत का एक प्याला देखा। वह शरबत मुझे पीने के लिए दिया गया। मैंने पिया; वह शहद से ज़्यादा मीठा और ठंडा था। मेरी प्यास बुझ गई। फिर मैंने एक बड़ा नूर देखा; मेरा घर इतना रौशन हो गया कि मुझे उस नूर के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता था।
जो चाहे कि आग से उसको मिले नजात,
इश्क़ और शौक़ से भेजे दुरूद की सौग़ात!
अस्सलातु वस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह!
अस्सलातु वस्सलामु अलैका या हबीबल्लाह!
अस्सलातु वस्सलामु अलैका या नूरा अर्शिल्लाह।
“मैं अल्लाह तआला का हबीब, उसका प्यारा हूँ। मैं नबियों का सरदार हूँ। यह मैं फ़ख़्र के लिए नहीं कहता” हदीस शरीफ़
नबी-ए-करीम की पैदाइश वाले घर की पुरानी जगह (आजकल यहाँ मक्का लाइब्रेरी है)
नबी-ए-करीम जिस घर में पैदा हुए, वह आपके परदादा हाशिम इब्ने अब्दे मनाफ़ का था। यह घर काबा से 300–400 मीटर उत्तर-पूर्व में था।
नबी-ए-करीम ने हिजरत के वक़्त यह मुबारक घर अक़ील इब्ने अबी तालिब के सुपुर्द कर दिया था। अक़ील के पोतों ने इसे मुहम्मद इब्ने यूसुफ़ सक़फ़ी के हाथ बेच दिया।
बाद में यह मुबारक घर हारून रशीद की वालिदा ख़ैज़ुरान ख़ातून ने ख़रीदकर मस्जिद में बदल दिया।
यह मस्जिद अब्बासियों और ममलूकों के दौर में हिफ़ाज़त में रही और उस्मानी दौर में भी बड़ी एहतियात से महफ़ूज़ रखी गई। क़ानूनी सुल्तान सुलेमान ख़ान ने इस मस्जिद को नए सिरे से बनवाया।
सदियों के दौरान इस मस्जिद की कई बार मरम्मत हुई।
1924 में यह मस्जिद गिरा दी गई। शैख़ अब्बास क़त्तान ने 1950 में यहाँ जो इमारत बनवाई, वह 1959 से मक्का पब्लिक लाइब्रेरी के तौर पर इस्तेमाल हो रही है।
उसी वक़्त मैंने बहुत-सी औरतें देखीं जिन्होंने मुझे चारों तरफ़ से घेर लिया और मेरी ख़िदमत करने लगीं। उनके क़द लंबे थे, चेहरे सूरज की तरह चमक रहे थे। वे अब्दे मनाफ़ क़बीले की लड़कियों जैसी लगती थीं। उनके अचानक ज़ाहिर हो जाने पर मैं हैरान थी। उनमें से एक ने कहा: ‘मैं फ़िरऔन की बीवी आसिया हूँ!’ दूसरी ने कहा: ’और मैं मरयम बिन्ते इमरान हूँ, और ये जन्नत की हूरें2 हैं।’
फिर उसी वक़्त मैंने आसमान से ज़मीन तक फैला हुआ सफ़ेद, लंबा, रेशमी कपड़ा देखा। उन्होंने कहा: ‘इसे लोगों की आँखों से ढाँप दो।’ उसी घड़ी परिंदों का एक झुंड ज़ाहिर हुआ। उनकी चोंचें ज़मुर्रद की और पर याक़ूत के थे। डर से मुझे पसीना आ गया था; टपकती हुई पसीने की बूँदों से मुश्क की ख़ुशबू फैल रही थी। मैं इसी हालत में थी कि मेरी आँखों से पर्दा उठा दिया गया। मैंने पूरब से पश्चिम तक सारी ज़मीन देखी। फ़रिश्तों ने मुझे चारों तरफ़ से घेर रखा था।
मुहम्मद अलैहिस्सलाम ने पैदा होते ही अपना मुबारक सिर सज्दे में रख दिया और शहादत की उँगली उठाई। फिर आसमान से सफ़ेद बादल का एक टुकड़ा उतरा और उसने उन्हें ढाँप लिया। मैंने एक आवाज़ सुनी जो कह रही थी: ‘इन्हें पश्चिम से पूरब तक हर जगह घुमाओ। घुमाओ, ताकि सारा आलम इन्हें इनके नाम, इनके जिस्म और इनकी सिफ़ात के साथ देख ले। सब जान लें कि इनका नाम माही है, यानी अल्लाह तआला इनके ज़रिए शिर्क के निशान मिटाता है।’
फिर वह बादल भी नज़रों से ग़ायब हो गया, और मैंने मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को सफ़ेद ऊनी कपड़े में लिपटा हुआ देखा। उसी वक़्त तीन शख़्स आए जिनके चेहरे सूरज की तरह चमक रहे थे। एक के हाथ में चाँदी का लोटा, दूसरे के हाथ में ज़मुर्रद का तश्त और तीसरे के हाथ में रेशम था। लोटे से जैसे मुश्क टपक रहा था। उन्होंने मेरे मुबारक बेटे को तश्त में रखा। उनका मुबारक सिर और पाँव धोकर उन्हें रेशम में लपेटा। फिर उनके मुबारक सिर पर ख़ुशबू लगाई, मुबारक आँखों में सुरमा लगाया और नज़रों से ग़ायब हो गए।”
आसमान से फ़रिश्ते उतरे सफ़-दर-सफ़,
काबा की तरह किया मेरे घर का तवाफ़।
हूरें आईं टोली-टोली, लिए बख़ूर,
उनके चेहरों के नूर से घर हो गया पुर-नूर।
हवा पर एक बिछौना बिछा दिया गया,
नाम उसका सुंदुस, फ़रिश्ते ने बिछाया।
हैरत से मैं रह गई बिल्कुल बेज़बान,
जब ये सारे हाल मुझ पर हुए अयाँ।
अचानक दीवार फटी, एक दम से,
तीन हूरें आईं मेरे पास जन्नत से।
कुछ कहते हैं कि उन तीन दिलरुबाओं में
एक चाँद-सी सूरत वाली आसिया थीं,
एक बेशक मरयम ख़ातून थीं,
और एक जन्नत की हूरों में से एक हसीना थीं।
लुत्फ़ के साथ आईं वे तीनों माहजबीं,
और उसी घड़ी मुझे सलाम किया वहीं।
मेरे चारों तरफ़ आकर बैठ गईं,
मुस्तफ़ा की एक-दूसरे को ख़ुशख़बरी देने लगीं।
मुहम्मद अलैहिस्सलाम की पैदाइश के वक़्त हज़रत आमिना के पास अब्दुर रहमान इब्ने औफ़ की वालिदा शिफ़ा ख़ातून, उस्मान इब्ने अबिल आस की वालिदा फ़ातिमा ख़ातून और हमारे नबी की फूफी सफ़िय्या ख़ातून मौजूद थीं। उन्होंने भी अपने देखे हुए नूर और पेश आने वाले दूसरे वाक़िआत की ख़बर यूँ दी:
शिफ़ा ख़ातून बयान करती हैं: “उस रात मैं मदद के लिए आमिना के पास थी। मैंने सुना कि मुहम्मद अलैहिस्सलाम पैदा होते ही दुआ और इल्तिजा कर रहे हैं। ग़ैब से आवाज़ आई: ‘यरहमुका रब्बुका।’ फिर एक नूर निकला और उसने इतनी रौशनी दी कि पूरब से पश्चिम तक हर जगह दिखाई देने लगी…” शिफ़ा ख़ातून और भी बहुत-से वाक़िआत की गवाह थीं। उन्होंने कहा: “जब उन्हें उनकी नुबुव्वत की ख़बर दी गई, तो बिना किसी झिझक के सबसे पहले ईमान लाने वालों में से एक मैं भी थी।”
“क़यामत के दिन, जब सब चुप होंगे, तब मैं बोलूँगा। जब कोई हिल भी न सकेगा, उस वक़्त मैं उनकी शफ़ाअत करने वाला हूँ” हदीस शरीफ़
सारी मख़लूक़ात ख़ुशी से झूम उठी,
ग़म दूर हुआ, आलम को नई जान मिली।
दुनिया के सारे ज़र्रों ने दी सदा,
एक-दूसरे को पुकारकर कहा: मरहबा!
मरहबा, ऐ बुलंद सुल्तान, मरहबा!
मरहबा, ऐ इरफ़ान की खान, मरहबा!
मरहबा, ऐ फ़ुरक़ान के राज़, मरहबा!
मरहबा, ऐ हर दर्द की दवा, मरहबा!
मरहबा, ऐ जमाल के बाग़ के बुलबुल,
मरहबा, ऐ ज़ुल जलाल के आशना!
मरहबा, ऐ ख़ुदा के चाँद और सूरज,
मरहबा, ऐ हक़ से कभी जुदा न होने वाले!
मरहबा, ऐ गुनाहगार उम्मत की पनाह, मरहबा!
मरहबा, ऐ बेसहारों की पनाह, मरहबा!
मरहबा, ऐ ख़लील की आँखों की ठंडक,
मरहबा, ऐ जलील के ख़ास महबूब!
मरहबा, ऐ सारे जहानों के लिए रहमत,
मरहबा, आप ही गुनाहगारों की शफ़ाअत करने वाले!
मरहबा, ऐ दोनों जहान के बादशाह,
आप ही के लिए बना यह कौन-ओ-मकान।
सफ़िय्या ख़ातून ने यूँ बयान किया: “मुहम्मद अलैहिस्सलाम की पैदाइश के वक़्त हर तरफ़ एक नूर छा गया। पैदा होते ही उन्होंने सज्दा किया, फिर अपना मुबारक सिर उठाकर साफ़ ज़बान से कहा: ‘ला इलाह इल्लल्लाह, इन्नी रसूलुल्लाह।’ मैंने उन्हें नहलाना चाहा तो आवाज़ आई: ‘हमने इन्हें नहलाकर भेजा है।’ हमने देखा कि उनकी नाल कटी हुई थी और उनका ख़तना पहले से हुआ था। पैदा होते ही उन्होंने सज्दा किया। उस वक़्त वह धीमी आवाज़ में कुछ कह रहे थे। मैंने अपना कान उनके मुबारक मुँह के क़रीब किया; वह कह रहे थे: ‘उम्मती, उम्मती!’ (मेरी उम्मत, मेरी उम्मत!)”3
बैतुल्लाह की तरफ़ रुख़ करके वह रसूल
चेहरा ज़मीन पर रखकर सज्दे में हुए मशग़ूल।
सज्दे में सिर और ज़बान हक़ की हम्द करते,
उँगली उठाकर तौहीद का इक़रार करते।
कहते थे: ऐ मौला! तेरी तरफ़ मैंने रुख़ किया,
या इलाही! मेरी उम्मत मुझको अता फ़रमा।
दिल की सारी हिम्मत हक़ से बाँधकर,
कहते थे वह: उम्मती, वा उम्मती!
हमारे प्यारे नबी की पैदाइश के वक़्त आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब काबा शरीफ़ के पास अल्लाह तआला से गिड़गिड़ाकर दुआ कर रहे थे। उन्हें इस पैदाइश की ख़ुशख़बरी यूँ दी गई:
काबा अचानक मक़ाम-ए-इब्राहीम की तरफ़ सज्दे में झुका और फिर अपनी पहली हालत पर आ गया। अब्दुल मुत्तलिब ने काबा को फ़सीह ज़बान से यह कहते सुना: “अल्लाहु अकबर! मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की आवाज़ मुझे बुतों से पाक कर देगी।” उसी वक़्त हुबल बुत मुँह के बल गिर पड़ा। फिर एक आवाज़ आई: “आमिना के यहाँ एक बेटा पैदा हुआ है। मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) लोगों को गुमराही के अँधेरे से निकालकर हिदायत के नूर तक पहुँचाएँगे। हक़ तआला ने उन्हें इंसानों और जिन्नों की तरफ़ नबी बनाकर भेजा है। ऐ फ़रिश्तो, गवाह रहो कि उन्हें तमाम ख़ज़ानों की कुंजियाँ दे दी गई हैं। उनकी पैदाइश का दिन मत भूलना; वह दिन क़यामत तक तुम्हारी ईद हो।” ये बातें सुनकर अब्दुल मुत्तलिब की ज़बान हैरत से बंद हो गई। “कहीं मैं ख़्वाब तो नहीं देख रहा?” यह सोचकर उन्होंने अपना हाथ सीने पर फेरा। फिर उन्होंने एक और आवाज़ सुनी: “ऐ क़ुरैश के सरदार! तुम्हें किस बात ने डरा दिया?” उनमें जवाब देने की ताक़त न थी।
जब वह आमिना के घर के क़रीब पहुँचे, तो उन्होंने घर की छत पर एक परिंदा देखा। उसने अपने पर घर के ऊपर फैलाकर उसे ढाँप रखा था। मक्का के पहाड़ उसके नूर से चमक रहे थे। एक सफ़ेद बादल घर पर साया किए हुए था। दरवाज़े पर खड़े दो फ़रिश्तों ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। “यह क्या हाल है? कहीं मैं ख़्वाब में तो नहीं हूँ?” वह यह सोच ही रहे थे कि अंदर से आती मुश्क की ख़ुशबू उनकी साँसों में उतर गई।
अब्दुल मुत्तलिब ने आपकी पैदाइश के दिन बहुत-से वाक़िआत देखे थे; वह इस ख़ुशख़बरी से बहुत ख़ुश हुए और कहा: “मेरे इस बेटे की शान और इज़्ज़त बहुत बुलंद होगी।”4
इतनी बड़ी ख़ुशी मनाने के लिए अब्दुल मुत्तलिब ने पैदाइश के सातवें दिन से मक्का वालों को तीन दिन तक दावत दी। इसके अलावा शहर के हर मोहल्ले में ऊँट ज़बह करके इंसानों और जानवरों के फ़ायदे के लिए छोड़ दिए।5 दावत के दौरान जो लोग पूछते कि बच्चे का क्या नाम रखा, उन्हें वह जवाब देते: “मैंने इनका नाम मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) रखा है।” और जो पूछते कि बाप-दादा में से किसी का नाम क्यों नहीं रखा, उन्हें यह जवाब देते: “इसलिए कि मैं चाहता हूँ कि अल्लाह तआला और लोग इनकी तारीफ़ करें, इनकी सराहना करें।”6 एक और रिवायत में बताया गया है कि “मुहम्मद” नाम बीबी आमिना ने रखा था।
ऐ वह जिनका चेहरा चौदहवीं का रौशन चाँद है,
ऐ हर बेकस और बेसहारा का सहारा आप हैं।
ऐ दिलों के दर्द की दवा आप हैं,
ऐ सारी मख़लूक़ात के सुल्तान आप हैं।
आप ही हैं सारे नबियों के सुल्तान,
औलिया और असफ़िया की आँखों के नूर।
ऐ रिसालत के तख़्त के आख़िरी वारिस आप हैं,
ऐ नुबुव्वत पर मुहर लगाने वाले आप हैं।
“क़यामत के दिन नबियों का इमाम, उनका ख़तीब और उन सबकी शफ़ाअत करने वाला मैं हूँ। ये बातें मैं फ़ख़्र के लिए नहीं कहता” हदीस शरीफ़
जब आपके नूर ने सारे आलम को रौशन किया,
आपके गुलाब-से चेहरे ने आलम को गुलशन किया।
जहालत और गुमराही का अँधेरा मिट गया,
मारिफ़त का बाग़ कमाल को पहुँच गया।
या हबीबल्लाह! हमारी मदद फ़रमाइए,
आख़िरी साँस में अपना दीदार दिखाकर ख़ुश कीजिए।
रसूलुल्लाह की पैदाइश की रात पेश आने वाले अहम वाक़िआत
रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की पैदाइश से पहले और पैदाइश के वक़्त, आपके दुनिया में तशरीफ़ लाने की निशानी के तौर पर बहुत-से वाक़िआत पेश आए। उस ज़माने के मशहूर लोगों ने नबी-ए-करीम की पैदाइश से पहले ही ख़्वाब देखे थे। जब उन्होंने अपने ख़्वाबों की ताबीर काहिनों और उस ज़माने के मशहूर आलिमों से पूछी, तो उन्होंने कहा कि ये ख़्वाब मुहम्मद अलैहिस्सलाम के आने की तरफ़ इशारा करते हैं।
हमारे प्यारे नबी के दादा अब्दुल मुत्तलिब ने यूँ बयान किया: “एक बार मैं सो गया था। एक ख़्वाब देखकर मैं बड़ी घबराहट के साथ जाग उठा। मैंने चाहा कि फ़ौरन किसी काहिन के पास जाकर उसकी ताबीर पूछूँ। जब मैं उसके पास पहुँचा, तो उसने मेरे चेहरे की तरफ़ देखकर कहा: ‘ऐ क़ुरैश के सरदार! तुम्हें क्या हुआ? तुम्हारे चेहरे पर बिल्कुल अलग हालत दिखाई दे रही है। कहीं कोई अहम वाक़िआ तो पेश नहीं आया जिसने तुम्हें इस हाल में पहुँचा दिया?’ मैंने कहा: ‘हाँ, मैंने एक ख़ौफ़नाक ख़्वाब देखा है जो अभी तक किसी को नहीं सुनाया।’ फिर मैं उसके पास बैठकर सुनाने लगा:
’आज रात मैंने ख़्वाब में एक बहुत बड़ा पेड़ देखा। उसका एक सिरा आसमान तक उठा हुआ था और उसकी शाख़ें पूरब और पश्चिम में फैली हुई थीं। उस पेड़ से ऐसा नूर बिखर रहा था कि सूरज भी उसके सामने बहुत फीका पड़ जाता था।
वह कभी दिखाई देता, कभी नज़रों से ओझल हो जाता। लोग उसकी तरफ़ रुख़ किए हुए थे। उसका नूर हर पल बढ़ता जा रहा था। क़ुरैश क़बीले के कुछ लोग उस पेड़ की शाख़ों को थामे हुए थे और कुछ उसे काटने की कोशिश कर रहे थे। एक जवान उन लोगों को रोक रहे थे जो उसे काटना चाहते थे। उनका चेहरा बहुत ख़ूबसूरत था; मैंने आज तक ऐसा चेहरा नहीं देखा। इसके अलावा उनके जिस्म से चारों तरफ़ ख़ुशबू फैल रही थी। मैंने पेड़ की एक शाख़ पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, मगर मेरा हाथ न पहुँच सका।’
मेरा ख़्वाब ख़त्म होते ही काहिन का चेहरा बदल गया।
उसका रंग पीला पड़ गया। फिर उसने कहा: ‘इसमें तुम्हारा कोई हिस्सा नहीं!’ मैंने पूछा: ‘तो किसका हिस्सा है?’ उसने कहा: ‘उन लोगों का जो उस पेड़ की शाख़ को थामे हुए हैं।’ और बात जारी रखते हुए कहा: ‘तुम्हारी नस्ल से एक नबी आएँगे, हर तरफ़ उनकी हुकूमत होगी, लोग उनके दीन में दाख़िल होंगे।’ फिर मेरे पास बैठे मेरे बेटे अबू तालिब की तरफ़ मुड़कर कहा: ‘यह शायद उनका चचा होगा।’” अबू तालिब ने यह वाक़िआ नबी-ए-करीम को नुबुव्वत मिलने के बाद सुनाया और कहा: “वह पेड़ यही अबुल क़ासिम, अल-अमीन मुहम्मद अलैहिस्सलाम हैं।”
हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम जिस रात दुनिया में तशरीफ़ लाए, उस रात एक सितारा निकला। उसे देखकर यहूदी आलिम समझ गए कि मुहम्मद अलैहिस्सलाम पैदा हो गए हैं।
सहाबा-ए-किराम में से हस्सान इब्ने साबित बयान करते हैं: “मैं आठ साल का था। एक सुबह एक यहूदी चीख़ता हुआ दौड़ रहा था: ‘ऐ यहूदियो!’ जब यहूदी उसके पास जमा होकर बोले: ‘क्या बात है, तू क्यों चिल्ला रहा है?’ तो उसने जवाब दिया: ‘जान लो, आज रात अहमद का सितारा निकल आया है! अहमद आज रात दुनिया में आ गए…’”
रसूल-ए-अकरम की पैदाइश की रात काबा के सारे बुत मुँह के बल ज़मीन पर गिर पड़े।
उरवा इब्ने ज़ुबैर रिवायत करते हैं: “क़ुरैश के एक गिरोह का एक बुत था। साल में एक बार वे उसका तवाफ़ करते, ऊँट ज़बह करते और शराब पीते थे। ऐसे ही एक दिन जब वे बुत के पास पहुँचे, तो उसे मुँह के बल ज़मीन पर गिरा हुआ पाया। उन्होंने उसे उठाया, वह फिर औंधा गिर गया। ऐसा तीन बार हुआ। इस पर जब वे उसे चारों तरफ़ से अच्छी तरह सहारा देकर खड़ा कर रहे थे, तो यह आवाज़ सुनाई दी: ‘एक हस्ती पैदा हुई है, ज़मीन पर हर जगह हलचल मच गई। जितने बुत थे, सब गिर पड़े। बादशाहों के दिल डर से काँप उठे!’” यह वाक़िआ ठीक उसी रात हुआ जिस रात मुहम्मद अलैहिस्सलाम पैदा हुए।
मदाइन शहर में ईरान के बादशाह (किसरा) के महल के चौदह बुर्ज गिर पड़े। उस रात किसरा और उसके लोग शोर और दहशत से जाग उठे। जब उन्होंने अपने कुछ बड़े लोगों के देखे हुए ख़ौफ़नाक ख़्वाबों की ताबीर करवाई, तो समझ गए कि यह किसी बड़ी बात की निशानी है।
सबसे मशहूर काहिनों ने इन ख़्वाबों की ताबीर यूँ की: “ये ख़्वाब ख़बर दे रहे हैं कि शाम (सीरिया), दजला, फ़ुरात, इराक़ और ईरान इस्लाम की सल्तनत बन जाएँगे।”
“मैं हर सदी में, हर ज़माने में रहने वाले इंसानों में से सबसे अच्छे और चुने हुए लोगों से दुनिया में लाया गया हूँ” हदीस शरीफ़
मक्का मुकर्रमा और उसके आसपास
उसी रात मजूसियों, यानी आग को पूजने वालों की हज़ार साल से जलती आ रही बड़ी आग अचानक बुझ गई। उन्होंने आग बुझने की तारीख़ लिख ली; यह वही रात थी जिसमें किसरा के महल के बुर्ज गिरे थे।
उस ज़माने में मुक़द्दस मानी जाने वाली सावा झील का पानी भी उस रात एक पल में उतरकर ग़ायब हो गया और झील सूख गई।
शाम की तरफ़ समावा नदी की वह वादी, जिसमें हज़ार साल से पानी नहीं बहा था और जो सूख चुकी थी, उस रात भरकर उमड़ पड़ी और बहने लगी।
मुहम्मद अलैहिस्सलाम की पैदाइश की रात से शैतान और जिन्नात क़ुरैश के काहिनों को वाक़िआत की ख़बरें न दे सके। काहिनों का ग़ैब की ख़बरें बताना ख़त्म हो गया…
हबीब-ए-अकरम की पैदाइश की रात और उसके बाद इन वाक़िआत के अलावा, जो उस वक़्त तक कभी देखे न गए थे, और भी बहुत-से वाक़िआत पेश आए। ये सब आख़िरी नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम की पैदाइश की तरफ़ इशारा थे।7
मौलिद की रात
नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की पैदाइश की रात को “मौलिद की रात” कहा जाता है। मौलिद का मतलब है “पैदाइश का वक़्त”।
यह शब-ए-क़द्र के बाद सबसे क़ीमती रात है, और इस रात हमारे प्यारे नबी की पैदाइश पर ख़ुश होने वालों को बख़्श दिया जाता है।
इस रात नबी-ए-करीम की पैदाइश के वक़्त ज़ाहिर होने वाले हालात और मोजिज़ों को पढ़ना, सुनना और सीखना बहुत सवाब का काम है। हमारे प्यारे नबी ख़ुद भी इन्हें बयान फ़रमाते थे।
सहाबा-ए-किराम भी इस रात एक जगह जमा होते, उस दिन को याद करते, पढ़ते और बयान करते थे।
दुनिया के हर कोने के मुसलमान हर साल रबीउल अव्वल महीने की 12वीं रात को मौलिद की रात के तौर पर मनाते हैं। हर जगह मौलिद के क़सीदे पढ़कर कायनात के सुल्तान को याद किया जाता है।
हर नबी की उम्मत ने अपने नबी की पैदाइश के दिन को ईद बनाया। यह दिन भी मुसलमानों की ईद, ख़ुशी और मसर्रत का दिन है।
“मेरी तारीफ़ करना (मौलिद, मुनाजात पढ़ना) इबादत है। दफ़ (बाजा) बजाते हुए, मौज-मस्ती और खेल-तमाशे के बीच इबादत करना जाइज़ नहीं” हदीस शरीफ़
बीबी आमिना थीं उनकी प्यारी माँ,
उसी सीप से निकला वह मोती बेबहा।
रबीउल अव्वल का वह महीना था,
बारहवीं रात थी, पीर की रात थी।
जिस रात पैदा हुए वह ख़ैरुल बशर,
उनकी वालिदा ने देखे क्या-क्या मंज़र!
बोलीं उस हबीब की वालिदा: मैंने देखा
एक अजब नूर, सूरज जिसका परवाना था।
बिजली-सा चमककर अचानक मेरे घर से निकला,
आसमानों तक नूर से भर गया सारा जहाँ।
आसमान खुल गए, अँधेरा हो गया ग़ायब,
तीन फ़रिश्ते देखे, हाथों में लिए तीन उजाले।
एक पूरब में खड़े हुए, एक पश्चिम में,
तीसरे काबा की छत पर जा खड़े हुए।
अचानक उसी दम काबा से आई एक सदा,
कहा: इस रात पैदा हुआ जहान का आफ़ताब।
या इलाही! उन्हीं मुहम्मद के हक़ के सदक़े,
शफ़ाअत की खान अहमद के हक़ के सदक़े,
उनकी उम्मत से राज़ी हो वह मददगार,
रहमतुल्लाहि अलैहिम अजमईन।
अस्सलातु वस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह!
अस्सलातु वस्सलामु अलैका या हबीबल्लाह!
अस्सलातु वस्सलामु अलैका या नूरा अर्शिल्लाह!
Süleyman Çelebi
