मेरे प्यारे नबी

आपकी जवानी और निकाह

आपकी जवानी

हर लिहाज़ से इंसानों में सबसे बुलंद मुहम्मद अलैहिस्सलाम जवानी के दिनों में ही मक्का वालों के बीच अपने हमउम्रों के मुक़ाबले बहुत पसंद किए जाते थे। अपने अच्छे अख़लाक़, लोगों के साथ बेमिसाल अच्छे बर्ताव, अपने सुकून, अपनी नर्मी और दूसरी बुलंद ख़ूबियों की वजह से आप सबके प्यारे थे। लोग आपकी इन ख़ूबियों पर फ़िदा थे। मक्का वालों ने आपमें जो हैरतअंगेज़ सच्चाई और अमानतदारी देखी, उसकी वजह से आपको “अल-अमीन”, यानी “जिस पर हमेशा भरोसा किया जा सके” का लक़ब दिया। इस तरह आप जवानी ही में इस नाम से मशहूर हो गए।

हमारे नबी की जवानी के सालों में अरब गहरी जाहिलिय्यत (जहालत) के दौर से गुज़र रहे थे। बुतपरस्ती, शराब, जुआ, ज़िना, सूद और दूसरे बहुत-से बुरे काम उनमें आम हो गए थे। मुहम्मद अलैहिस्सलाम को उनकी इन बिगड़ी हुई हालतों से सख़्त नफ़रत थी, और आप उनकी हर बुराई से हमेशा दूर रहते थे। सारे मक्का वाले आपकी इस हालत को जानते थे और हैरान होते थे। बुतों से सख़्त नफ़रत की वजह से आप कभी उनके पास न जाते थे। बुतों के लिए ज़बह की गई क़ुरबानियों का गोश्त आपने कभी नहीं खाया। बचपन और जवानी में आप अपनी भेड़ें जियाद पहाड़ और उसके आसपास चराते और इसी तरह रोज़ी कमाते थे। इस तरह आप हद से ज़्यादा बिगड़े हुए समाज से दूर रहते थे। एक बार आपने सहाबा-ए-किराम से फ़रमाया: “कोई नबी ऐसा नहीं जिसने भेड़ें न चराई हों।” उन्होंने पूछा: “या रसूलल्लाह! क्या आपने भी चराईं?” तो आपने फ़रमाया: “हाँ, मैंने भी चराईं।”

हमारे प्यारे नबी जब बीस साल के क़रीब थे, तो मक्का में अमन-ओ-अमान बिल्कुल बिगड़ चुका था। ज़ुल्म हद से ज़्यादा फैल गया था; न माल महफ़ूज़ था, न जान, न इज़्ज़त। मक्का के अपने बाशिंदे तिजारत और काबा की ज़ियारत के लिए आने वाले परदेसियों के साथ नाइंसाफ़ी और ज़ुल्म करते थे। ज़ुल्म के शिकार लोगों को अपना हक़ लेने के लिए फ़रियाद करने की कोई जगह न मिलती थी। इसी दौरान तिजारत के इरादे से मक्का आए एक यमनी सौदागर का माल आस इब्ने वाइल नाम के एक मक्का वाले ने ज़बरदस्ती छीनकर हड़प लिया। इस वाक़िए पर उस यमनी ने अबू क़ुबैस पहाड़ पर चढ़कर फ़रियाद की और अपना हक़ दिलवाने के लिए क़बीलों से मदद माँगी। ऐसे वाक़िआत से ज़ाहिर था कि ज़ुल्म आख़िरी हद तक पहुँच चुका है। इनके बाद बनू हाशिम, बनू ज़ुहरा और दूसरे क़बीलों के बड़े लोग अब्दुल्लाह इब्ने जुदआन के घर जमा हुए। उन्होंने तय किया कि किसी पर भी, चाहे वह मक्का का हो या बाहर का, ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी नहीं होने दी जाएगी, ज़ुल्म को रोका जाएगा और जिनके साथ नाइंसाफ़ी हुई है, उनके हक़ दिलवाए जाएँगे। इसी मक़सद से उन्होंने इंसाफ़ की एक अंजुमन क़ायम की।1

इस अंजुमन को, जिसमें हमारे प्यारे नबी कम उम्र में शामिल हुए और जिसके क़ायम होने में आपका बड़ा असर रहा, हिल्फ़ुल फ़ुज़ूल कहा गया।

इससे पहले फ़ज़्ल नाम के दो आदमियों और फ़ुज़ैल नाम के एक आदमी ने भी ऐसी ही एक अंजुमन बनाई थी। उनकी पहले बनाई हुई अंजुमन की निस्बत से यह नाम रखा गया था।

“सारी दुनिया जिनके कामिल इंसान होने की तस्दीक़ करती है, उन मुहम्मद अलैहिस्सलाम को उनकी हद दर्जे की सच्चाई और वफ़ादारी की वजह से उनके सबसे बड़े दुश्मन, सरकश काफ़िर भी मुहम्मदुल अमीन (भरोसे वाले मुहम्मद) कहते थे” Hüseyin Hilmi bin Sa’îd (रहमतुल्लाहि अलैहि)

अरब और उसके आसपास के मशहूर मेले और बाज़ार

इंसान को मिल जाता है उसका नसीब,
महरूम नहीं रखते किसी ग़रीब।
क्या करे अय्यूबी की यह जान,
जब तक ख़ुश न हो उसका जानाँ?
मेरे शाह, ऐ हबीब-ए-किबरिया,
आपका जमाल हर दर्द की दवा।
आपसे वफ़ा का हक़ कैसे हो अदा,
जब तक आशिक़ जान न करे फ़िदा?

इस अंजुमन ने ज़ुल्म को रोका और मक्का में बिगड़े हुए अमन-ओ-अमान को फिर से क़ायम किया। इसका असर लंबे अरसे तक बाक़ी रहा। नुबुव्वत मिलने के बाद रसूलुल्लाह ने सहाबा-ए-किराम को इसके बारे में बताया और फ़रमाया: “अब्दुल्लाह इब्ने जुदआन के घर में हुए अहद-ओ-पैमान में मैं भी मौजूद था। वह अहद मुझे सुर्ख़ बालों वाले ऊँटों (दौलत) का मालिक होने से भी ज़्यादा प्यारा है। अगर आज भी मुझे ऐसी किसी मजलिस में बुलाया जाए, तो मैं ज़रूर क़बूल करूँगा।”2

आपका तिजारत करना

मक्का वाले पुराने ज़माने से तिजारत करते थे और इसी से अपनी रोज़ी कमाते थे। नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के चचा अबू तालिब भी तिजारत करते थे। हमारे प्यारे नबी जब पच्चीस साल के क़रीब थे, तो मक्का में रोज़ी की तंगी बहुत बढ़ गई थी। इसी वजह से मक्का वालों ने शाम जाने के लिए एक बड़ा तिजारती क़ाफ़िला तैयार किया। उन्हीं दिनों अबू तालिब रसूलुल्लाह के पास आए और कहा: “ऐ मेरे मोहतरम भतीजे! ग़रीबी आख़िरी हद को पहुँच गई है। क़हत और जद्दोजहद में गुज़रे इन पिछले सालों ने हमारे हाथ में कुछ नहीं छोड़ा। देखो, क़ुरैश का क़ाफ़िला तैयार हो चुका है, शाम की तरफ़ रवाना होने वाला है। ख़दीजा ख़ातून भी क़ाफ़िले के साथ माल भेजेंगी। ज़रूर वह इस काम के लिए भरोसे वाले लोगों की तलाश में होंगी। बेशक उन्हें तुम जैसे अमानतदार, पाक और वफ़ादार शख़्स की ज़रूरत है। अगर हम जाकर बात करें और तुम्हें उनका वकील बनाकर भिजवा दें, तो अच्छा होगा। बेशक वह तुम्हें दूसरों पर तरजीह देंगी। असल में मैं नहीं चाहता कि तुम शाम जाओ, क्योंकि मुझे डर है कि वहाँ के यहूदी तुम्हें कोई नुक़सान न पहुँचाएँ। लेकिन मुझे कोई और चारा भी नहीं सूझ रहा।” नबी-ए-करीम ने उनसे फ़रमाया: “आप जैसा चाहें, वैसा करें।”

हज़रत ख़दीजा अपनी ख़ूबसूरती, माल, अक़्ल, पाकदामनी, हया और अदब की वजह से अरब में बड़ी शोहरत वाली एक ख़ातून थीं। इसलिए हर तरफ़ बहुत-से लोग उनसे निकाह के ख़्वाहिशमंद थे और उनकी तरफ़ रग़बत रखते थे। लेकिन अपने देखे हुए एक ख़्वाब की वजह से उन्होंने किसी की तरफ़ ध्यान नहीं दिया था। ख़्वाब में उन्होंने देखा था कि आसमान से चाँद उतरकर उनकी गोद में आ गया और चाँद का नूर उनकी बग़ल से निकलकर सारे आलम को रौशन कर गया। सुबह उन्होंने यह ख़्वाब अपने रिश्तेदार वरक़ा इब्ने नौफ़ल को सुनाया। वरक़ा ने कहा: “आख़िरी ज़माने के नबी दुनिया में आ चुके हैं। वह तुमसे निकाह करेंगे और तुम्हारे ज़माने में उन पर वह्य3 उतरेगी। उनके दीन का नूर आलम को भर देगा। सबसे पहले ईमान लाने वाली तुम होगी। वह नबी क़ुरैश में से और बनू हाशिम में से होंगे।”

हज़रत ख़दीजा इस जवाब से बहुत ख़ुश हुईं और उस नबी के आने का इंतिज़ार करने लगीं।

हज़रत ख़दीजा तिजारत करती थीं; जिन लोगों से उनकी बात तय हो जाती, उनके साथ शराकत करती थीं। अबू तालिब ने हमारी माँ हज़रत ख़दीजा को सारा हाल बताया। इस पर हज़रत ख़दीजा ने रसूलुल्लाह को देखने और आपसे बात करने के लिए अपने घर बुलाया।

आप तशरीफ़ लाए तो उन्होंने बड़ी ताज़ीम और इज़्ज़त से आपका इस्तिक़बाल किया। नबी-ए-करीम की नफ़ासत और आपके पाकीज़ा, पाक चेहरे को देखकर वह हैरान रह गईं। उन्होंने रसूलुल्लाह से कहा: “मैं जानती हूँ कि आप सच बोलने वाले, भरोसे वाले, अमानतदार और अच्छे मिज़ाज वाले हैं। इस काम के लिए मैंने आज तक किसी को जितनी उजरत दी है, आपको उससे कई गुना ज़्यादा दूँगी…” उजरत की मिक़दार भी तय हो जाने के बाद हज़रत ख़दीजा ने रसूलुल्लाह को इस ख़िदमत में काम आने वाले कपड़े दिए और दिल के इत्मीनान के साथ आपको अपने घर से रुख़सत किया। इसके अलावा उन्होंने मैसरा को भी दूसरे क़ीमती कपड़े दिए, ताकि रसूलुल्लाह उन्हें रास्ते में पहनें।

“कोई मुसलमान हलाल कमाई करे, किसी का मोहताज न हो और अपने पड़ोसियों और रिश्तेदारों की मदद करे, तो क़यामत के दिन वह चौदहवीं के चाँद की तरह चमकता हुआ, नूरानी होगा” हदीस शरीफ़

हज़रत ख़दीजा ने नुबुव्वत की निशानियाँ अपने चचाज़ाद भाई, इल्म वाले ईसाई वरक़ा इब्ने नौफ़ल से मालूम की थीं। रसूलुल्लाह से इस मुलाक़ात में भी उन्होंने आपमें नुबुव्वत की सिफ़ात पहचान ली थीं। इसलिए उन्होंने मैसरा नाम के अपने ग़ुलाम से कहा: “जब क़ाफ़िला मक्का से रवाना हो, तो ऊँट की नकेल मुहम्मद अलैहिस्सलाम के हाथ में दे देना, ताकि मक्का वाले कोई बात न बनाएँ। जब शहर से दूर निकलकर नज़रों से ओझल हो जाओ, तो ये क़ीमती कपड़े उन्हें पहना देना।”

फिर उन्होंने अपने ऊँटों में सबसे ख़ूबसूरत ऊँट को बादशाहों के लायक़ सजाया और मैसरा से कहा: “उन्हें बड़ी इज़्ज़त के साथ इस ऊँट पर सवार करना, नकेल अपने हाथ में लेना और अपने आपको उन हज़रत का ख़ादिम समझना! उनकी इजाज़त के बिना कोई काम न करना, और उनकी हिफ़ाज़त के लिए, उन्हें ख़तरों से बचाने के लिए अपनी जान की भी परवाह न करना! जहाँ जाओ, वहाँ ज़्यादा न ठहरना, जल्दी लौट आना, ताकि हम बनू हाशिम के सामने शर्मिंदा न हों। अगर मेरी इन बातों पर हर्फ़-ब-हर्फ़ अमल करोगे, तो मैं तुम्हें आज़ाद कर दूँगी और जितना माल चाहोगे, दूँगी।”

क़ाफ़िला तैयार हुआ। मक्का वाले अपने अज़ीज़ों से रुख़सत होने के लिए बड़ी भीड़ की शक्ल में जमा हुए। हमारे प्यारे नबी के रिश्तेदार, चचा और बनू हाशिम के बड़े भी वहाँ मौजूद थे। हमारे नबी की फूफी ने जब अल्लाह तआला के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को ख़ादिम के लिबास में, ऊँट की नकेल हाथ में थामे देखा, तो उनके घुटनों की ताक़त जवाब दे गई। वह रोईं, फ़रियाद की। आह-ओ-ज़ारी करते हुए, आँखों से आँसू बहाते हुए उन्होंने अपना दुख यूँ बयान किया: “ऐ अब्दुल मुत्तलिब! ऐ ज़मज़म का कुआँ खोदने वाली बुज़ुर्ग हस्ती! ऐ अब्दुल्लाह! अपनी क़ब्रों से उठो और सिर इस तरफ़ घुमाकर इस मुबारक हस्ती का हाल तो देखो!” अबू तालिब भी उन्हीं जज़्बात में थे, उसी हालत में थे। रसूलुल्लाह की हक़ को देखने वाली मुबारक आँखों से मोतियों जैसे आँसू गिरे और आपने फ़रमाया: “देखो, मुझे भूल न जाना। परदेस में मेरे ग़म और दुख उठाने को याद करते रहना।” ये बातें सुनने वाले सब रो पड़े। आसमान के फ़रिश्ते भी इस हाल में शरीक हो गए और कहा: “ऐ हमारे रब! यह मुहम्मद अलैहिस्सलाम हैं जिन्हें तूने अपना हबीब बनाकर सबसे बुलंद मर्तबा अता फ़रमाया। इस हाल में क्या हिकमत है?” इस पर अल्लाह तआला ने उनसे फ़रमाया: “हाँ, वह मेरे हबीब हैं। लेकिन तुम मुहब्बत का राज़ नहीं जान सकते। महबूब और मुहिब के बीच के राज़ों तक तुम्हारी पहुँच नहीं हो सकती। इस मर्तबे को कोई नहीं जानता। इस छिपे हुए मामले को कोई कुछ नहीं समझता।”

आख़िरकार क़ाफ़िला चल पड़ा और जब मक्का नज़र आना बंद हो गया, तो मैसरा ने, मिले हुए हुक्म के मुताबिक़, हमारे प्यारे नबी को क़ीमती कपड़े पहनाए। आपको तरह-तरह के कपड़ों से ढके और बहुत ख़ूबसूरती से सजे ऊँट पर सवार किया और नकेल अपने हाथ में ले ली।

इस सफ़र में क़ाफ़िले वालों ने देखा कि सफ़र ख़त्म होने तक एक बादल हमारे प्यारे नबी पर, जिन्हें सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजा गया, साया करता रहा और परिंदों की शक्ल में आए दो फ़रिश्ते आपके साथ-साथ चलते रहे।4

रास्ते में दो ऊँट इतने थक गए थे कि चल न सकते थे और क़ाफ़िले से पीछे रह गए थे; जब आपने उनके पाँवों पर अपना मुबारक हाथ फेरा, तो वे अचानक तेज़ चलने लगे। यह और इस जैसे बहुत-से हालात देखकर क़ाफ़िले वाले आपसे बेहद मुहब्बत करने लगे और समझ गए कि आपकी शान बहुत बुलंद होगी।

बुसरा नाम की जगह पर पहुँचे तो वे फिर वहाँ की ख़ानक़ाह के क़रीब ठहरे। बहीरा राहिब, जिसने बहुत-सी निशानियाँ देखकर समझ लिया था और बता दिया था कि आप आख़िरी नबी हैं, मर चुका था, और उसकी जगह नस्तूरा नाम का एक दूसरा राहिब आ गया था। नस्तूरा राहिब ख़ानक़ाह के क़रीब आकर ठहरे क़ुरैश के क़ाफ़िले को देख रहा था। उसने जब देखा कि पास के एक सूखे पेड़ के नीचे कोई बैठा है और वह पेड़ उसी पल हरा-भरा हो गया, तो उसने मैसरा से पूछा: “उस पेड़ के नीचे वह हस्ती कौन हैं?” मैसरा ने कहा: “यह क़ुरैश क़बीले के, हरम वालों में से एक हस्ती हैं।” राहिब ने कहा: “आज तक इस पेड़ के नीचे नबी के सिवा कोई नहीं बैठा।” फिर उसने पूछा: “क्या उनकी आँखों में कुछ सुर्ख़ी है?” मैसरा ने कहा: “हाँ, है, और उनकी आँखों से कभी जाती नहीं।” इस पर नस्तूरा ने कहा: “ईसा अलैहिस्सलाम पर इंजील उतारने वाले अल्लाह तआला के हक़ की क़सम, यह आख़िरी नबी होंगे। काश, मैं वह ज़माना पा लेता जब इन्हें नुबुव्वत का हुक्म दिया जाएगा!”

मुहम्मद अलैहिस्सलाम जब बुसरा के बाज़ार में ख़दीजा ख़ातून का माल बेच रहे थे, तो आपसे मोल-भाव करने वाले एक यहूदी ने यक़ीन न करते हुए कहा: “लात और उज़्ज़ा नाम के बुतों की क़सम खाओ, तो मैं यक़ीन करूँ।” इस पर मुहम्मद अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: “मैं उन बुतों के नाम की क़सम हरगिज़ नहीं खाता! उनके पास से गुज़रते वक़्त मैं अपना मुँह दूसरी तरफ़ फेर लेता हूँ।” आपमें दूसरी निशानियाँ भी देखकर उस यहूदी ने कहा: “तुम्हारी बात ही सच्ची बात है। अल्लाह की क़सम, यह नबी बनने वाले हैं।” और यह कहकर अपनी हैरत ज़ाहिर की: “हमारे आलिमों ने किताबों में इनकी सिफ़ात पाई हैं।”

मैसरा रसूलुल्लाह में जो कुछ देखता और आपके बारे में जो कुछ सुनता, उसे अपने ज़ेहन में नक़्श की तरह बिठाता जाता, और आपके लिए उसकी अक़ीदत दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी। मैसरा के दिल में सारे जहानों के सरदार के लिए बड़ी मुहब्बत पैदा हो गई थी। अब वह आपकी ख़िदमत शौक़ और एहतिराम से करता, आपके छोटे-से-छोटे इशारे को भी बड़े इश्क़ से पूरा करता था। जो माल ले जाया गया था, वह बिक गया, और नबी-ए-करीम की बरकत से हमेशा से कई गुना ज़्यादा नफ़ा हुआ। क़ाफ़िला वापसी के लिए चल पड़ा। मर्रुज़ ज़हरान नाम की जगह पर पहुँचे तो मैसरा ने हमारे प्यारे नबी से अर्ज़ किया कि आप मक्का ख़ुशख़बरी लेकर जाएँ। आपने यह बात क़बूल फ़रमाई और क़ाफ़िले से अलग होकर अपने ऊँट को मक्का की तरफ़ तेज़ दौड़ाया।

नफ़ीसा बिन्ते मुनय्या ख़ातून ने बयान किया: “क़ाफ़िले के लौटने का वक़्त क़रीब आ गया था। ख़दीजा ख़ातून हर दिन अपने ख़ादिमों के साथ अपने घर की छत पर चढ़कर क़ाफ़िले की राह देखती थीं। ऐसे ही एक दिन मैं ख़दीजा के पास थी। अचानक दूर से ऊँट पर सवार एक शख़्स दिखाई दिया। एक बादल और परिंदों की शक्ल में आए दो फ़रिश्ते उन पर साया कर रहे थे, और हमारे नबी की मुबारक पेशानी का नूर चाँद की तरह चमक रहा था। ख़दीजा ख़ातून समझ गईं कि आने वाला कौन है, और उनका दिल ख़ुश हो गया। लेकिन अनजान बनकर पूछा: ‘इस गर्म दिन में आने वाला कौन हो सकता है?’ ख़ादिमों ने कहा: ‘यह आने वाले मुहम्मद (अलैहिस्सलाम) जैसे लगते हैं’, और जो कुछ देखा, उस पर हैरान रह गए।”

थोड़ी ही देर में रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ख़दीजा की हवेली पर तशरीफ़ लाए और सारा हाल सुनाया। अपनी लाई हुई ख़ुशख़बरी से आपने उन्हें बहुत ख़ुश कर दिया।

कुछ देर बाद क़ाफ़िला मक्का में दाख़िल हुआ। मैसरा ने हज़रत ख़दीजा को सफ़र के दौरान नबी-ए-करीम पर साया किए जाने, नस्तूरा राहिब की बातों, कमज़ोर ऊँटों के तेज़ हो जाने और इस तरह के देखे हुए बहुत-से ग़ैर-मामूली हालात एक-एक करके सुनाए। उसकी ज़बान से जितनी हो सकी, उसने नबी-ए-करीम की उतनी तारीफ़ की। हज़रत ख़दीजा ये बातें जानती थीं, लेकिन इन बातों ने उनके यक़ीन को और बढ़ा दिया। उन्होंने मैसरा को ताकीद की: “ये देखी हुई बातें किसी को न बताना!”5

“मैं उन बुतों के नाम की क़सम हरगिज़ नहीं खाता! उनके पास से गुज़रते वक़्त मैं अपना मुँह दूसरी तरफ़ फेर लेता हूँ” हदीस शरीफ़

ख़दीजा ये सुनी हुई बातें बताने के लिए वरक़ा इब्ने नौफ़ल के पास गईं। वरक़ा ने सारा हाल बड़ी हैरत से सुना और कहा: “ऐ ख़दीजा, अगर तुम्हारी सुनाई हुई ये बातें सच हैं, तो मुहम्मद अलैहिस्सलाम इस उम्मत के नबी होंगे।”

नबी-ए-करीम 12 साल की उम्र में अपने चचा अबू तालिब के साथ तिजारत के लिए बुसरा तक, 17 साल की उम्र में अपने चचा ज़ुबैर के साथ यमन, 20 साल की उम्र में हज़रत अबू बकर के साथ शाम और 25 साल की उम्र में हज़रत ख़दीजा का माल बेचने के लिए फिर शाम गए।6 इस तरह आप कुल चार बार सफ़र पर निकले। इन सफ़रों के सिवा आपने कहीं का सफ़र नहीं किया।

हमारी माँ हज़रत ख़दीजा से निकाह

हमारी माँ हज़रत ख़दीजा ने, वरक़ा इब्ने नौफ़ल की दी हुई ख़ुशख़बरी के बाद और हमारे प्यारे नबी की अच्छी ख़ूबियाँ देखकर, चाहा कि आपकी बीवी बनकर आपकी ख़िदमत का शरफ़ पाएँ। नफ़ीसा बिन्ते मुनय्या ने यह बात भाँप ली और बीच में पड़ीं। इसी नीयत से वह रसूल-ए-अकरम की बुलंद ख़िदमत में हाज़िर हुईं और पूछा: “ऐ मुहम्मद! आपको निकाह से कौन-सी चीज़ रोक रही है?” हमारे नबी ने फ़रमाया: “निकाह के लिए मेरे पास काफ़ी माल नहीं है।” नफ़ीसा ख़ातून ने कहा: “ऐ मुहम्मद! अगर आप किसी पाकदामन और इज़्ज़त वाली, माल और जमाल वाली ख़ातून से निकाह करना चाहें, तो मैं ख़िदमत के लिए हाज़िर हूँ।” हमारे प्यारे नबी ने पूछा: “वह ख़ातून कौन हैं?” उन्होंने कहा: “वह ख़दीजा बिन्ते ख़ुवैलिद हैं।” रसूलुल्लाह ने पूछा: “इस काम का वसीला कौन बनेगा?” तो उन्होंने कहा: “यह काम मैं करूँगी”, और आपकी ख़िदमत से रुख़सत हो गईं। उन्होंने हज़रत ख़दीजा के पास जाकर ख़ुशख़बरी दी। हज़रत ख़दीजा ने अपने रिश्तेदारों अम्र इब्ने असद और वरक़ा इब्ने नौफ़ल को बुलाकर हाल बताया। साथ ही रसूलुल्लाह को भी पैग़ाम भेजकर एक मुक़र्रर वक़्त पर तशरीफ़ लाने की दावत दी। अबू तालिब और उनके भाइयों ने भी तैयारी की और नबी-ए-करीम के साथ गए।

हज़रत ख़दीजा ने अपने घर को सजाया-सँवारा। इस दिन के शुक्राने के तौर पर अपने सारे ज़ेवर अपनी ख़ादिमाओं को तोहफ़े में दे दिए और फिर उन्हें आज़ाद कर दिया। रसूलुल्लाह अपने चचाओं के साथ ख़दीजा के घर तशरीफ़ ले गए। अबू तालिब ने कहा: “हम्द है हमारे पैदा करने वाले की, जिसने हमें इब्राहीम अलैहिस्सलाम की औलाद और इस्माईल अलैहिस्सलाम की नस्ल से बनाया। उसने हमें बैतुल्लाह का निगहबान बनाया। लोगों का क़िब्ला और जहानों के तवाफ़ की जगह वह मुबारक घर, वह हरम शरीफ़ जिसे उसने हर बुराई से महफ़ूज़ रखा, हमें नसीब किया। मेरे भाई अब्दुल्लाह के बेटे मुहम्मद ऐसे शख़्स हैं कि क़ुरैश में से जिस किसी से भी उनका मुक़ाबला किया जाए, वही बढ़कर निकलते हैं। हाँ, उनका माल कम है, लेकिन माल का कोई एतिबार नहीं, क्योंकि माल साये की तरह है: हाथों-हाथ गुज़रता हुआ चला जाता है। मेरे भतीजे की इज़्ज़त और बड़ाई आप सबको मालूम है। अब वह ख़दीजा बिन्ते ख़ुवैलिद से निकाह चाहते हैं। आप मेरे माल में से कितना महर7 दिलवाना चाहते हैं? मैं क़सम खाता हूँ कि मुहम्मद का मर्तबा ज़रूर बुलंद होगा।” वरक़ा इब्ने नौफ़ल ने इन बातों की तस्दीक़ की।

ख़दीजा के चचा अम्र इब्ने असद ने कहा: “गवाह रहो कि मैंने ख़दीजा बिन्ते ख़ुवैलिद को मुहम्मद अलैहिस्सलाम के निकाह में दे दिया।” इस तरह निकाह का अक़्द पूरा हुआ। एक रिवायत के मुताबिक़ महर 400 मिस्क़ाल सोना, एक रिवायत के मुताबिक़ पाँच सौ दिरहम और एक और रिवायत के मुताबिक़ 20 ऊँट था।8

अबू तालिब ने शादी की दावत के लिए एक ऊँट ज़बह करके ऐसा खाना खिलाया जो उस दिन तक देखा न गया था। निकाह हो गया। हज़रत ख़दीजा ने अपनी सारी दौलत नबी-ए-करीम को तोहफ़े में दे दी और कहा: “यह सारा माल आपकी बुलंद ज़ात का है, और मैं आपकी मोहताज और आपकी एहसानमंद हूँ।”

हज़रत ख़दीजा अपनी पूरी शादीशुदा ज़िंदगी में हमारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम की हमेशा ख़िदमत करती रहीं और आपकी मददगार रहीं। नबी-ए-करीम का यह निकाह ख़दीजा के इंतिक़ाल तक पच्चीस साल रहा। इसके पंद्रह साल बेसत से पहले और दस साल बेसत (नुबुव्वत की ख़बर दिए जाने) के बाद थे। हमारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम ने अपनी पहली बीवी हज़रत ख़दीजा की ज़िंदगी में किसी और से निकाह नहीं किया। उनसे आपके छह बच्चे हुए, दो बेटे और चार बेटियाँ। वे ये हैं: क़ासिम, ज़ैनब, रुक़य्या, उम्मे कुलसूम, फ़ातिमा और अब्दुल्लाह (तय्यिब या ताहिर)। नुबुव्वत के ज़माने में जिनसे निकाह किया, उन हज़रत मारिया से भी आपके इब्राहीम नाम के एक बेटे हुए। दूसरी बीवियों से आपकी कोई औलाद नहीं हुई। ज़ैनब आपकी बेटियों में सबसे बड़ी थीं। सबसे छोटी बेटी फ़ातिमा अपने वालिद की सबसे प्यारी थीं। वह हिजरत से तेरह साल पहले पैदा हुईं। आपके बेटों का बचपन ही में इंतिक़ाल हो गया, और हज़रत फ़ातिमा के सिवा आपकी सारी बेटियों का भी आपसे पहले इंतिक़ाल हो गया। हमारी माँ हज़रत फ़ातिमा ने भी नबी-ए-करीम के छह महीने बाद इंतिक़ाल फ़रमाया। हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम की नस्ल हज़रत फ़ातिमा की औलाद से चली।9

रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ख़दीजा से निकाह के बाद भी तिजारत जारी रखी। अपनी कमाई से आप मेहमानों की ख़ातिरदारी करते, यतीमों और ग़रीबों की मदद करते थे।

ज़ैद इब्ने हारिसा

ज़ैद इब्ने हारिसा बचपन में अपनी वालिदा सुअदा के साथ अपने रिश्तेदारों से मिलने गए थे। उसी दौरान एक दूसरे क़बीले ने उन पर धावा बोल दिया। ज़ैद को क़ैदी बना लिया गया। उन्हें मक्का में सूक़-ए-उकाज़ कहलाने वाले मेले में लाकर बिक्री के लिए पेश किया गया। हज़रत ख़दीजा के भतीजे हकीम इब्ने हिज़ाम ने ज़ैद को 400 दिरहम में ख़रीद लिया। हकीम इब्ने हिज़ाम ने ज़ैद इब्ने हारिसा को अपनी फूफी हज़रत ख़दीजा को तोहफ़े में दे दिया, और उन्होंने नबी-ए-करीम को तोहफ़े में दे दिया। नबी-ए-करीम ने उन्हें फ़ौरन आज़ाद करके अपने पास रख लिया। दरअसल आज़ाद होने के बाद ज़ैद इब्ने हारिसा के पास न जाने की कोई जगह थी, न रसूलुल्लाह से बेहतर उनकी देखभाल करने वाला कोई था। वह भी बड़ी ख़ुशी से रसूलुल्लाह के पास रहे।

नबी-ए-करीम अदल, इंसाफ़, रहम, इंसानों से मुहब्बत, ख़ंदा-पेशानी, करम, सख़ावत, अहद की वफ़ा (वादा निभाना), अमानत की हिफ़ाज़त, मदद करने का जज़्बा, क़ुरबानी, भरोसेमंदी, मज़लूम, बेसहारा और ग़रीब की हिमायत, बच्चों से प्यार और मुहब्बत, ईमानदारी, सच बोलना, नफ़ासत, तवाज़ो, एतिदाल, लोगों का अच्छे ढंग से इंतिज़ाम करना, हिम्मत और बहादुरी जैसे ज़ाहिर और छिपे, जाने और अनजाने हर तरह के अच्छे अख़लाक़ को कमाल तक पहुँचाने के लिए पैदा किए गए थे। आप हर लिहाज़ से गुज़री हुई और आने वाली तमाम मख़लूक़ात से बुलंद थे, और सबका भरोसा जीतकर “अल-अमीन” का लक़ब पा चुके थे। आपकी नुबुव्वत की ख़बर दिए जाने से पहले भी ज़ैद इब्ने हारिसा आपका अच्छा बर्ताव देखकर नबी-ए-करीम को अपने बाप और अपनी माँ से भी ज़्यादा चाहते थे और आपके पास से कभी जुदा नहीं होना चाहते थे।

“यह सारा माल आपकी बुलंद ज़ात का है, और मैं आपकी मोहताज और आपकी एहसानमंद हूँ” ख़दीजतुल कुबरा (रज़ियल्लाहु अन्हा)

उनके माँ-बाप नहीं जानते थे कि उनके बेटे को कहाँ ले जाया गया है, उसके साथ क्या किया गया। बाप हारिसा औलाद की जुदाई की आग में जल रहे थे और शहर-शहर घूमकर अपने बेटे को ढूँढ रहे थे। यमन से अलग-अलग मुल्कों को जाने वाले अपने रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों को वह सख़्त ताकीद करते कि उनके बेटे ज़ैद की कोई ख़बर लाएँ, और शेर कहते हुए आँसू बहाते थे:

अपने ज़ैद के लिए रोया; नहीं जानता उसका क्या हुआ?
ज़िंदा है वह, या उसे मौत ने आ लिया?
ऐ दिल! बेकार उसके बारे में न पूछ!
तू जान न सकेगा: उसकी क़ब्र मैदान में है या किसी ऊँचे-नीचे पहाड़ पर।
बेटे की जुदाई के ग़म को बयान करने वाली उनकी एक और नज़्म यह है:
ऐ मेरे ज़ैद, मेरे बच्चे! काश जानता कि जाने वाला लौटेगा, आह!
अल्लाह की क़सम, तेरे सिवा किसी और का लौटना नहीं चाहता।
हवा चलती है तो, कहीं कोई बच्चा देखूँ तो, उसे याद करता हूँ,
और हर सुबह निकलता सूरज तेरी याद दिलाता है।
फ़रियाद, अपने जिगर के टुकड़े के लिए हज़ारों फ़रियाद,
सवारी पर चढ़कर ढूँढता हूँ, चाहे मेरा हाल हो बर्बाद।
न मैं जानता हूँ, न मेरी सवारी, उकताना या थकना,
जब तक उम्मीद है कि मेरा बेटा मिलकर सामने आ जाए।
उम्मीद इंसान को कितना ही धोखा दे, आख़िर वह फ़ानी है,
ऐ मेरे बेटो! क़ैस, अम्र, यज़ीद, जबल! मेरा ज़ैद तुम्हारे पास अमानत है।

आख़िरकार इस्लाम के आने से पहले ही बनू कल्ब क़बीले के कुछ लोग, जो काबा की ज़ियारत के लिए आए थे, हज़रत ज़ैद को देखकर पहचान गए। हज़रत ज़ैद ने उनसे कहा: “मैं जानता हूँ कि मेरे घर वाले मेरे लिए रो-रोकर फ़रियाद करेंगे; ये शेर उन तक पहुँचा देना”, और यह नज़्म कही:

जल रहा है दिल मेरा, मैं अपने घोंसले से दूर हूँ,
फिर भी काबा का पड़ोसी हूँ, चाहे माँ-बाप से दूर हूँ।
तुम्हारा ग़म तुम्हारे दिलों को न जलाए,
मेरे लिए तुम्हारी फ़रियाद अर्श तक न जाए।
मौला की हम्द हो, मैं ऐसे घोंसले में हूँ,
कि पाई हुई इज़्ज़त और भलाई के लिए हमेशा दुआ में हूँ।

यह ख़बर सुनकर हारिसा बहुत ख़ुश हुए। फ़ौरन अपने भाई कअब के साथ बहुत-सा पैसा लेकर मक्का आए। मक्का पहुँचकर उन्होंने हमारे नबी का घर मालूम किया और आपकी ख़िदमत में हाज़िर होकर यूँ कहा: “ऐ क़ुरैश क़ौम के सरदार, ऐ अब्दुल मुत्तलिब के पोते, ऐ बनू हाशिम की नस्ल के बेटे! आप हरम शरीफ़ के पड़ोसी हैं। आप मेहमानों की ख़ातिर करते हैं, क़ैदियों पर एहसान करते हैं, उन्हें क़ैद से छुड़ाते हैं। हमारा बेटा आपके यहाँ ग़ुलाम है; उसे छुड़ाने के लिए आप जितना पैसा चाहें, हम देंगे। उसे आज़ाद कर दीजिए, ख़ुदारा हमारी यह दरख़्वास्त न ठुकराइए!” हमारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “हम ज़ैद को बुलाकर उसे हाल बता देते हैं और उसे इख़्तियार दे देते हैं। अगर वह तुम्हारे पास जाना पसंद करे, तो तुम बिना कोई पैसा दिए उसे ले जा सकते हो। अगर वह मुझे चुने और मेरे पास रहना चाहे, तो अल्लाह की क़सम, जो मुझे चुन ले, उसे मैं किसी के हवाले नहीं करता; वह मेरे पास रहेगा।”

हारिसा और उनके भाई नबी-ए-करीम के इस जवाब से बहुत ख़ुश हुए और कहा: “आपने हमारे साथ बड़े इंसाफ़ और अदल का बर्ताव किया।”

इस पर नबी-ए-करीम ने ज़ैद को अपने पास बुलाकर उनसे पूछा: “क्या तुम इन्हें पहचानते हो?” उन्होंने कहा: “हाँ, एक मेरे वालिद हैं, दूसरे मेरे चचा।” तब आपने फ़रमाया: “ऐ ज़ैद! तुमने जान लिया कि मैं कौन हूँ, तुम पर मेरी शफ़क़त, मेरी मेहरबानी और मेरा बर्ताव देख लिया। ये तुम्हें लेने आए हैं। तो अब या तो मुझे चुनो और मेरे पास रहो, या इन्हें चुनो और चले जाओ।”

वालिद और चचा इस उम्मीद में थे कि ज़ैद उन्हीं को चुनेंगे और वे उन्हें अपने साथ ले जाएँगे। ज़ैद ने कहा: “मैं किसी को आप पर तरजीह नहीं देता। आप मेरे लिए चचा की जगह भी हैं और वालिद की जगह भी। मैं आपके पास रहना चाहता हूँ।”

वालिद और चचा हैरान रह गए। वालिद ने ग़ुस्से में ज़ैद से कहा: “अफ़सोस है तुम पर! यानी तुम ग़ुलामी को आज़ादी पर, अपनी माँ, अपने बाप और अपने चचा पर तरजीह देते हो!” ज़ैद ने अपने वालिद को जवाब दिया: “अब्बा जान, मैंने इस हस्ती से ऐसी शफ़क़त और ऐसा बर्ताव देखा है कि अब किसी को इन पर तरजीह नहीं दे सकता।”

नबी-ए-करीम ज़ैद से बहुत मुहब्बत करते थे। जब आपने अपने साथ ज़ैद का ऐसा लगाव और ऐसी मुहब्बत देखी, तो आप उन्हें काबा मुअज़्ज़मा में हिज्र के पास ले गए और वहाँ मौजूद लोगों से मुख़ातिब होकर फ़रमाया: “गवाह रहो, ज़ैद मेरा बेटा है। यह मेरा वारिस है, मैं इसका वारिस हूँ।” यह देखकर ज़ैद के वालिद और चचा का ग़ुस्सा ठंडा हो गया। वे ख़ुशी-ख़ुशी अपने वतन लौट गए। इसके बाद सहाबा-ए-किराम ज़ैद को ज़ैद इब्ने मुहम्मद (मुहम्मद के बेटे ज़ैद) कहने लगे। बाद में अल्लाह तआला ने सूरह अहज़ाब की 5वीं आयत में: “अपनी औलाद को उनके बापों के नाम से पुकारो, यही अल्लाह के नज़दीक ज़्यादा सही है” और 40वीं आयत में: “मुहम्मद (अलैहिस्सलाम) तुम मर्दों में से किसी के (ज़ैद की तरह) बाप नहीं हैं” के हुक्मों से मुँह-बोला बेटा बनाने का दस्तूर ख़त्म कर दिया, तो हज़रत ज़ैद को उनके वालिद के नाम से, यानी “हारिसा के बेटे ज़ैद” (ज़ैद इब्ने हारिसा) कहकर पुकारा जाने लगा।10

काबा के मामले में पंच बनना

रसूलुल्लाह जब पैंतीस साल के क़रीब थे, तो आप काबा के मामले में पंच बने। उस वक़्त बारिशों और सैलाबों ने काबा की दीवारों को बहुत कमज़ोर कर दिया था। इसके अलावा एक बार लगी आग ने भी काबा को नुक़सान पहुँचाया था।11 इमारत को नए सिरे से बनाना ज़रूरी था। इस पर क़ुरैश क़बीले ने काबा को इब्राहीम अलैहिस्सलाम की रखी हुई बुनियाद तक गिराकर फिर से बनाना शुरू किया। हर क़बीले को एक हिस्सा देकर उन्होंने दीवारें ऊँची कीं। यह जानते हुए कि यह काम बड़ी इज़्ज़त की बात है, क़बीले हजर-ए-असवद पत्थर को उसकी जगह रखने के मामले में एक राय न हो सके। हर क़बीला यह शरफ़ पाना चाहता था, इसलिए उनके बीच बड़ा झगड़ा खड़ा हो गया। बनू अब्दुद दार ने यह अहद किया: “अगर यह काम हमारे सिवा किसी और ने किया, तो हम ख़ून बहा देंगे।” यह झगड़ा चार-पाँच दिन चला, और ख़ूनख़राबा होते-होते रह गया।

“मैं किसी को आप पर तरजीह नहीं देता। आप मेरे लिए चचा की जगह भी हैं और वालिद की जगह भी। मैं आपके पास रहना चाहता हूँ” ज़ैद इब्ने हारिसा (रज़ियल्लाहु अन्हु)

वह पीर का दिन था। अब्दुल मुत्तलिब के मामूँ, उम्र रसीदा बुज़ुर्ग हुज़ैफ़ा इब्ने मुग़ीरा ने काबा की तरफ़ खुलने वाले बनू शैबा के दरवाज़े की तरफ़ इशारा करके कहा: “ऐ क़ुरैश के लोगो! जिस मामले में तुम एक राय नहीं हो पा रहे, उसका फ़ैसला करने के लिए उस दरवाज़े से सबसे पहले दाख़िल होने वाले शख़्स को अपने बीच पंच बना लो।” वहाँ मौजूद लोगों ने यह पेशकश क़बूल कर ली और बनू शैबा के दरवाज़े की तरफ़ देखते हुए उस शख़्स का इंतिज़ार करने लगे जो सबसे पहले दाख़िल होगा और इस नाज़ुक घड़ी में झगड़े का फ़ैसला करेगा। आख़िरकार उन्होंने देखा कि दरवाज़े से मुहम्मद अलैहिस्सलाम आ रहे हैं, जिनकी सच्चाई और बुलंद अख़लाक़ की वे बेहद क़द्र करते थे और जिन्हें वे अल-अमीन, यानी “हमेशा भरोसे के लायक़” कहते थे। उन्होंने कहा: “यह अल-अमीन हैं। हम इनके फ़ैसले पर राज़ी हैं।”

हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम को जब हाल बताया गया, तो आपने अपना चोग़ा उतारकर ज़मीन पर बिछा दिया। आपने हजर-ए-असवद को अपने मुबारक चोग़े पर रखा और फ़रमाया: “हर क़बीले से एक आदमी इसका एक किनारा पकड़ ले।” इस तरह आपने पत्थर को उसकी जगह तक उठवाया।

फिर आपने ख़ुद पत्थर को उठाकर अपने मुबारक हाथों से उसकी जगह पर रख दिया। इस तरह एक बड़ी लड़ाई, जो छिड़ने ही वाली थी, टल गई और सब क़बीले इस फ़ैसले से ख़ुश हो गए। उन्होंने दीवारों को जहाँ छोड़ा था, वहीं से बनाकर पूरा किया।12