तीसरा हिस्सा दीन-ए-इस्लाम
यह हिस्सा İhlas Vakfı Hakikat Kitabevi की तैयार की हुई “Tam İlmihâl Se’âdet-i Ebediyye”, “Herkese Lâzım Olan Îmân”, “İslâm Ahlâkı”, “Kıyâmet ve Âhiret” और “Namâz Kitabı” नाम की किताबों से चुनकर तैयार किया गया है। दीन-ए-इस्लाम वे उसूल और क़ायदे हैं जिन्हें अल्लाह तआला ने जिबराईल नाम के फ़रिश्ते के ज़रिए अपने प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम पर भेजा, और जो इंसानों के दुनिया और आख़िरत में आराम और ख़ुशहाली से रहने की ज़मानत देते हैं।
तमाम फ़ज़ीलतें और फ़ायदेमंद चीज़ें इस्लाम में हैं। इस्लाम ने पिछले दीनों की ज़ाहिर और छिपी तमाम भलाइयों को अपने अंदर जमा कर लिया है। तमाम सआदतें और तमाम कामयाबियाँ उसी में हैं। यह ऐसे उसूलों और अख़लाक़ का नाम है जिन्हें ग़लती न करने वाली और न भटकने वाली अक़्लें क़बूल करेंगी। जिनकी पैदाइश में कोई कमी नहीं, वे इसे रद्द नहीं करते और इससे नफ़रत नहीं करते। इस्लाम के अंदर कोई नुक़सान और उसके बाहर कोई फ़ायदा नहीं है, और हो भी नहीं सकता। इस्लाम के बाहर फ़ायदा ढूँढना सराब से पानी पीने की उम्मीद रखने जैसा है। इस्लाम मुल्कों को आबाद करने, इंसानों को आसूदा बनाने और ख़ुशहाली तक पहुँचाने का हुक्म देता है, अल्लाह तआला के हुक्मों का अदब करने और मख़लूक़ात पर रहम करने का मुतालबा करता है। इस्लाम खेती-बाड़ी, तिजारत और हुनर का पक्का हुक्म देता है। इल्म, साइंस, टेक्नोलॉजी और सनअत को उनके लायक़ अहमियत देता है। इंसानों से बड़ी ताकीद के साथ चाहता है कि वे एक-दूसरे की मदद करें, एक-दूसरे की ख़िदमत करें। यह अपनी निगरानी में रहने वाले इंसानों, औलाद, ख़ानदान और क़ौमों के हुक़ूक़ और उनके इंतिज़ाम का तरीक़ा सिखाता है; ज़िंदों, गुज़रे हुओं और आने वाली नस्लों के लिए हक़ और ज़िम्मेदारी का ख़याल रखता है। इस्लाम ने सआदत-ए-दारैन, यानी दुनिया और आख़िरत की सआदत को अपने अंदर जमा कर लिया है। यह इंसानों की रूहानी और माद्दी ख़ुशहाली को सबसे कामिल तरीक़े से यक़ीनी बनाने वाले उसूल लाया है। इसने इंसान के हुक़ूक़ और फ़राइज़ को सबसे वसीअ तौर पर मुनज़्ज़म किया है। मुख़्तसर यह कि दीन-ए-इस्लाम की ये बुनियादें हैं: ईमान, इबादत, मुनाकहात (शादी-ब्याह और निकाह के अहकाम), मुआमलात (लेन-देन और समाजी ज़िंदगी के अहकाम) और उक़ूबात (जुर्म और सज़ा के क़वानीन)।
ख़ुदा मेरा रब है, मेरे नबी, सच है, मुहम्मद रसूलुल्लाह हैं,
और मेरा दीन दीन-ए-इस्लाम है, मेरी किताब कलामुल्लाह है।
अक़ीदे में मेरा मज़हब अहले सुन्नत हुआ, अल्लाह का शुक्र है,
अमल में मेरा मज़हब अबू हनीफ़ा का मज़हब है, अल्लाह की क़सम।
नसीहत
अहले सुन्नत का अक़ीदा, ऐ जवान, नीचे
नज़्म में तेरे लिए साफ़ ज़बान में बयान हुआ है:
अगर सही अक़ीदा चाहता है, मेरे भाई,
तो रात-दिन यह किताब पढ़, और दिल-ओ-जान से!
हक़ तआला अबू हनीफ़ा की रूह पर रहमत फ़रमाए,
क़ुरआन का रास्ता हमें उन बुलंद नोमान ने दिखाया!
दुनिया से दिल न लगा, उम्र पानी की तरह बहती है,
इस्लाम पर चलने वाला हर दम ख़ुश रहता है।
“इस्लाम ने सआदत-ए-दारैन, यानी दुनिया और आख़िरत की सआदत को अपने अंदर जमा कर लिया है” सैयद अब्दुल हकीम अरवासी (रहमतुल्लाहि अलैहि)
सबसे पहले इल्म-ए-हाल सीख, अपने बच्चे को भी सिखा;
दीन का इल्म न सीखा तो बाद में पछताएगा!
देख, हमारे दुश्मन कैसी मक्कारी से हमला कर रहे हैं;
तू भी दीन फैलाने की कोशिश कर, वक़्त ज़ाया न कर!
बेदीन झूठ से नौजवानों को धोखा दे रहे हैं,
इस्लाम को मिटाना चाहते हैं; अब तो ग़फ़लत से जाग!
मुसलमान भी भटक गए, ज़्यादातर जाल में फँस गए;
कहने को सब अहले क़िब्ला हैं, लेकिन हक़ की राह से अलग हो गए।
जिसने इल्म-ए-हाल नहीं सीखा, वह अपने आपको बचा नहीं सकता।
जो अहले सुन्नत में से नहीं, वह काफ़िर है या गुमराह!
सही इल्म फैलाने वालों की मदद कर!
जिहाद का सवाब कमा, इस राह में तेरा माल बहता रहे!
क्या रसूलुल्लाह कभी चैन से बैठे, क्या आपके सहाबा सोए?
दीन फैलाने के लिए हर एक बहादुर बन गया था!
कोशिश कर, तू भी ख़ाली न बैठ: दीन का दुश्मन बहुत ताक़तवर है;
अंदर और बाहर से कुचलना चाहते हैं – दीन भी जाएगा, ईमान भी।
सहाबा को बुरा न कह, हर एक की क़द्र पहचान,
वे एक-दूसरे से मुहब्बत करते थे, इसका गवाह क़ुरआन है!
सबसे अफ़ज़ल अबू बकर हैं, फिर उमर,
उस्मान और अली; मुआविया से भी बहुत मुहब्बत कर – वही क़ुरआन लिखने वाले हैं!
हमारा रब जिस्म नहीं, उसका न ज़माना है, न मकान;
वह माद्दे में हुलूल नहीं करता – ईमान ऐसा ही होना चाहिए!
वह मख़लूक़ का मोहताज नहीं, उसका न कोई शरीक है, न कोई मिसाल;
हर चीज़ को पैदा करने वाला भी, वुजूद में क़ायम रखने वाला भी वही है।
अच्छा-बुरा, ईमान, कुफ़्र, माद्दा, क़ुव्वत, एनर्जी –
सबको वही वुजूद में लाता है, इंसान कुछ पैदा नहीं कर सकता!
हर एक को अक़्ल और इरादा दिया, रास्ता भी दिखाया,
जो भलाई चाहे, रहमान उसे फ़ौरन पैदा कर देता है।
सबसे पहले अपना अक़ीदा दुरुस्त कर, हुक्म और मनाही का ख़याल रख;
जो इस्लाम से अलग हुआ, वह सआदत नहीं पा सकता!
पहले से यही रीत है: जो बोता है, वही काटता है;
बड़ा धोखा खाया, नुक़सान उठाया उसने, जो बोए बिना गेहूँ की उम्मीद रखे!
तिहत्तर फ़िरक़ों में से सिर्फ़ अहले सुन्नत ही
नजात पाएँगे;
रसूलुल्लाह का रास्ता हमें उन्हीं ने दिखाया!
