मेरे प्यारे नबी

नबी-ए-करीम की कुछ ज़ाइद सुन्नतें

नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के किए हुए काम तीन क़िस्म के हैं। पहले वे काम जो मुसलमानों को भी करने चाहिए। इन्हें “सुन्नत” कहा जाता है। दूसरे वे काम जो सिर्फ़ हमारे नबी (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) के साथ ख़ास हैं। इन्हें “ख़साइस” कहा जाता है। दूसरों के लिए इन्हें करना जाइज़ नहीं। तीसरे वे काम जो आदत से जुड़े हैं। इन्हें हर मुसलमान को अपने इलाक़े की आदत के मुताबिक़ करना चाहिए। अगर आदत के ख़िलाफ़ किया जाए, तो फ़ितना उठता है, और फ़ितना उठाना हराम है।1

रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) जिन कामों को ख़ुद इबादत के तौर पर करते थे, अगर उन्हें छोड़ने वाले पर आपने एतिराज़ नहीं किया, यानी उससे नाराज़ नहीं हुए, तो ऐसी इबादतों को “सुन्नत-ए-हुदा” कहा जाता है। अगर आपने इन्हें हमेशा किया हो, तो इन्हें “सुन्नत-ए-मुअक्किदा” कहा जाता है। रसूलुल्लाह के आदत के तौर पर किए हुए कामों को “सुन्नत-ए-ज़ाइदा” या “मुस्तहब” कहा जाता है।2 मिसाल के तौर पर अच्छे कामों को दाईं तरफ़ से शुरू करना, दाहिने हाथ से करना, और इसी तरह इमारत बनाने, खाने, पीने, बैठने, उठने (लेटने), लिबास और औज़ारों में आपके किए हुए और इस्तेमाल किए हुए तरीक़े – ये सब ऐसे ही हैं। बाद में पैदा होने वाली चीज़ों को “बिदअत” कहा जाता है। आटा छानने की छलनी, चम्मच के इस्तेमाल जैसी “आदत में बिदअत” वाली चीज़ें, यानी बाद में पैदा होने वाली आदतें अपनाना गुमराही (ज़लालत) नहीं है। यह गुनाह नहीं है। इससे यह समझ में आता है कि मेज़ पर खाना खाना, काँटा और चम्मच इस्तेमाल करना, पलंग पर सोना, कॉन्फ़्रेंसों में, स्कूलों में अख़लाक़ और साइंस के दर्सों में रेडियो, टेलीविज़न और टेप रिकॉर्डर इस्तेमाल करना, हर क़िस्म की सवारियों पर सवार होना, चश्मा, हिसाब की मशीन जैसे साइंसी साधनों से फ़ायदा उठाना जाइज़ है, क्योंकि ये आदत में बिदअतें हैं। आदत वाली बिदअतों और नई चीज़ों को हराम काम करने में इस्तेमाल करना हराम है। नमाज़ में, अज़ान में और मस्जिद के वाज़ और ख़ुत्बे में रेडियो, लाउडस्पीकर और टेप रिकॉर्डर इस्तेमाल करने के बारे में “Se’âdet-i Ebediyye” और “İslâm Ahlâkı” किताबों में तफ़सीली मालूमात हैं। इबादत में बिदअत करना, बल्कि छोटी सी तब्दीली करना भी बहुत बड़ा गुनाह है।3 जिहाद, यानी हुकूमत और फ़ौज का दुश्मनों से जंग करना, इबादत है। लेकिन जंग में हर क़िस्म के साइंसी साधन इस्तेमाल करना बिदअत नहीं है, बल्कि इसमें बहुत सवाब है, क्योंकि जंग में हर क़िस्म के साइंसी साधन इस्तेमाल करने का हुक्म दिया गया है। इबादतों में जिन कामों का हुक्म दिया गया है, उन्हें करने में मदद देने वाली नई चीज़ें अपनानी चाहिए। मना किए गए कामों को करने में मदद देने वाली नई चीज़ें और तब्दीलियाँ करना बिदअत है। मिसाल के तौर पर अज़ान देने के लिए मीनार पर चढ़ना चाहिए, क्योंकि ऊँची जगह पर अज़ान देने का हुक्म दिया गया है। लेकिन लाउडस्पीकर से अज़ान देना बिदअत है, क्योंकि किसी आले से अज़ान देने का हुक्म नहीं दिया गया। इंसान के अज़ान देने का हुक्म दिया गया है। इसके अलावा रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने नमाज़ के वक़्तों की इत्तिला देने या दूसरी इबादतें करने के लिए घंटा बजाने, बिगुल फूँकने जैसे मौसीक़ी के आलात के इस्तेमाल से मना फ़रमाया है।4

“आदत से जुड़ी चीज़ों में भी रसूलुल्लाह की पैरवी करना इंसान को दुनिया और आख़िरत में बहुत कुछ दिलाता है और तरह-तरह की सआदतों का रास्ता खोलता है” मकतूबात-ए-रब्बानी, II, मकतूब 5

“सुन्नत-ए-हुदा” कहलाने वाली सुन्नत को छोड़ना मकरूह है, और “सुन्नत-ए-ज़ाइदा” कहलाने वाली सुन्नत को छोड़ना मकरूह नहीं है।5

नबी-ए-करीम के नज़दीक सफ़ाई, सलीक़े और निज़ाम की अहमियत

नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) सफ़ाई, सलीक़े और निज़ाम को बहुत अहमियत देते थे। आपको हर काम दाईं तरफ़ से शुरू करना और दाहिने हाथ से करना पसंद था।6 सिर्फ़ इस्तिंजा बाएँ हाथ से करते थे।

जहाँ तक मुमकिन होता, आप हर काम ताक़ (बेजोड़) गिनती में करते थे। आप फ़रमाते थे: “जिसके बाल हों, वह उनकी अच्छी तरह देखभाल करे!”

हमारे नबी मस्जिद में थे कि एक आदमी अंदर आया जिसके सिर और दाढ़ी के बाल बिखरे हुए थे। हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “क्या इस आदमी के बाल सँवारने के लिए गुलाब का तेल भी नहीं मिलता?” फिर उसे हाथ से इशारा किया कि फ़ौरन बाहर जाकर अपने सिर और दाढ़ी के बाल ठीक करे। जब वह आदमी ऐसा करके लौटा, तो हमारे नबी ने फ़रमाया: “क्या यह बेहतर है कि तुममें से कोई इस तरह आए, या यह कि उसके सिर और दाढ़ी के बाल शैतान की तरह बिखरे हों?”

सफ़र में भी आप शीशी में तेल साथ रखते थे। तेल लगाते वक़्त पहले सिर पर एक बारीक कपड़ा रखते और टोपी उस कपड़े के ऊपर पहनते थे। इस तरह बाहर से पता नहीं चलता था कि आपने तेल लगाया है। हमारे नबी हर दिन दो बार अपनी दाढ़ी में कंघी करते थे।

अनस इब्ने मालिक फ़रमाते हैं: “रसूल अलैहिस्सलाम अक्सर अपने मुबारक बालों में गुलाब का तेल लगाते और अपनी मुबारक दाढ़ी को पानी से भिगोकर कंघी करते थे।”7 नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपनी मुबारक दाढ़ी की लंबाई और दोनों तरफ़ से थोड़ा सा कतर लेते थे। जुमा की नमाज़ के लिए निकलने से पहले अपनी मुबारक मूँछें छोटी करते और अपने मुबारक नाख़ूनों में से बढ़े हुए हिस्से काटते थे। मुसलमानों को भी मूँछें छोटी करने का हुक्म देते थे।

हमारे नबी जब भी आईना देखते, अल्लाह तआला की हम्द करते और यह दुआ फ़रमाते: “या अल्लाह! जिस तरह तूने मेरी सूरत ख़ूबसूरत पैदा की, उसी तरह मेरे अख़लाक़ भी ख़ूबसूरत कर दे!”

हमारे नबी हर रात सोने से पहले अपनी मुबारक आँखों में तीन बार सुरमा लगाते थे। आप अपनी मुबारक दाईं आँख में तीन बार और मुबारक बाईं आँख में दो बार सुरमा लगाते थे। आप फ़रमाते थे: “सुरमा लगाया करो, क्योंकि यह आँख को चमकाता है और बाल (पलकें) उगाता है।”8

इस्लाम के आलिमों ने बताया है कि मर्द के लिए इलाज के तौर पर सुरमा लगाना जाइज़ है, लेकिन ज़ीनत के लिए लगाना जाइज़ नहीं। जमाल और ज़ीनत के लफ़्ज़ों को आपस में ख़लत-मलत नहीं करना चाहिए।

जमाल का मतलब है बदसूरती को दूर करना, वक़ार वाला होना और शुक्र अदा करने के लिए नेमत को ज़ाहिर करना। लोगों को दिखाने और फ़ख़्र जताने के लिए नेमत ज़ाहिर करना जमाल नहीं, तकब्बुर है। रसूलुल्लाह मिस्वाक के इस्तेमाल को बहुत अहमियत देते थे। आप इसे अपने पास से कभी अलग नहीं करते थे। हमारे नबी फ़रमाते थे: “अराक (पीलू) के पेड़ की टहनी से मिस्वाक किया करो!” मिस्वाक मुँह को ख़ुशबूदार बनाती है। हमारे नबी ने फ़रमाया: “यह मेरी भी सुन्नत है और मुझसे पहले के नबियों की भी सुन्नत है!”

नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “अगर मुझे अपनी उम्मत को मशक़्क़त में डालने का ख़याल न होता, तो मैं उन्हें हर नमाज़ के लिए मिस्वाक करने का हुक्म देता!”9 “मैं तुम्हें मिस्वाक करने की बहुत ताकीद करता हूँ!”

“मिस्वाक मुँह की सफ़ाई और मेरे रब की रज़ामंदी है!” हमारे प्यारे नबी जब घर में दाख़िल होते, तो आपका पहला काम अपने मुबारक दाँतों की मिस्वाक करना होता था। जब तक मिस्वाक पास न होती, आप सोते नहीं थे, और जागने पर भी अपने मुबारक दाँतों की मिस्वाक से शुरुआत करते थे। रात को तहज्जुद की नमाज़ के लिए उठते, तब भी अपने मुबारक दाँतों की मिस्वाक करते थे।10 हमारी माँ हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने फ़रमाया: “नबी अलैहिस्सलाम किसी रात या दिन में ऐसा नहीं सोए कि जागने के बाद वुज़ू से पहले मिस्वाक न की हो!” हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के बेटे इब्राहीम का इंतिक़ाल हो गया था। दफ़न के वक़्त क़ब्र में रखी गई ईंटों में से एक टेढ़ी रह गई। हमारे नबी ने ख़ुद दख़ल देकर उसे सीधा किया। आपने बताया कि टेढ़ी ईंट का मरने वाले को न कोई फ़ायदा है, न नुक़सान, लेकिन बेतरतीबी से आपके दिल को तकलीफ़ होती है।

नबी-ए-करीम का सआदत वाला घर

हमारे प्यारे नबी ने जब मदीना में अपनी मस्जिद बनवाई, तो मस्जिद के पास कच्ची ईंटों के दो कमरे बनवाए और उनकी छतें खजूर के तनों और शाख़ों से पटवाईं। मस्जिद शरीफ़ बनाते वक़्त आइशा और सौदा (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) के लिए एक-एक कमरा बनाया गया। हमारी माँ हज़रत आइशा के कमरे का दरवाज़ा मस्जिद को जाने वाले रास्ते की तरफ़ था। हमारी माँ हज़रत सौदा के लिए बनाए गए कमरे का दरवाज़ा मस्जिद के तीसरे दरवाज़े, आल-ए-उस्मान दरवाज़े की तरफ़ था। हमारे नबी ने जब दूसरी बीवियों से निकाह किया, तो कमरों की तादाद बढ़ती गई और वे नौ हो गए। ये हमारी माँ हज़रत आइशा के कमरे और क़िब्ले के बीच बनाए गए। कुछ कमरे कच्ची ईंटों के थे और कुछ पत्थर के। कुछ खजूर की शाख़ों से (बग़दादी अंदाज़ में) बनाकर ऊपर से गारे से लीपे गए थे और उनकी छतें भी खजूर की शाख़ों से बनी थीं। हसन इब्ने अबिल हसन (रज़ियल्लाहु अन्हु) फ़रमाते हैं: “मैं लड़कपन में रसूलुल्लाह के घरों में दाख़िल हुआ और हाथ बढ़ाकर उनकी छत को छू लिया। रसूलुल्लाह के कमरे की छत सरो या अरअर की लकड़ी के ऊपर तनी हुई बालों से बुनी एक चादर ही थी।”

इमाम बुख़ारी के बयान के मुताबिक़ “रसूलुल्लाह के घर के दरवाज़े पर कुंडा नहीं था, उसे कमान के सिरे से खटखटाया जाता था।” मुहम्मद इब्ने हिलाल और अता ख़ुरासानी ने भी हमारे नबी की बीवियों के कमरे देखे थे और बताया है कि वे खजूर की शाख़ों से बने थे और दरवाज़े की जगह काले बालों के टाट के पर्दे लटके हुए थे। अपनी आँखों से देखने वाले दाऊद इब्ने क़ैस के बयान के मुताबिक़ कमरों में से हर एक की चौड़ाई, दरवाज़े से बग़ल की दीवारों तक, 6–7 ज़िरा11 (3–3.5 मीटर) के क़रीब थी, और अंदर की गहराई अंदाज़न दस ज़िरा (4.8 मीटर) थी। (एक ज़िरा 48 सेंटीमीटर है।)

“मिस्वाक मुँह की सफ़ाई और मेरे रब की रज़ामंदी है!” हदीस शरीफ़

जिस दिन ख़लीफ़ा अब्दुल मलिक का यह फ़रमान मदीना पहुँचा और पढ़कर सुनाया गया कि नबी-ए-करीम की बीवियों के कमरे ख़रीदकर मस्जिद में शामिल कर दिए जाएँ, उस दिन बहुत से लोग अपने आँसू न रोक सके, और मदीना वाले उस तरह रोए जैसे हमारे नबी की वफ़ात के दिन रोए थे।12

सईद इब्ने मुसय्यब ने भी इस बारे में अपना ग़म इन लफ़्ज़ों में ज़ाहिर किया: “अल्लाह की क़सम, मेरी कितनी आरज़ू थी कि उन्हें उनकी पहली हालत पर छोड़ दिया जाता! मदीना वालों में से नई पीढ़ी के लोग और बाहर से मदीना आने वाले देखते कि रसूल अलैहिस्सलाम ने अपनी ज़िंदगी में किस चीज़ पर क़नाअत की, और लोग ज़्यादा माल रखने और उस पर फ़ख़्र करने की तरफ़ रग़बत न करते।”

नबी-ए-करीम का घर के अंदर का हाल

हज़रत हुसैन बयान करते हैं: “मैंने अपने वालिद से नबी-ए-करीम की घर के अंदर की मसरूफ़ियात के बारे में पूछा। मेरे वालिद ने यूँ बताया: नबी-ए-करीम घर में दाख़िल होने के बाद अपना वक़्त तीन हिस्सों में बाँट लेते थे – अल्लाह की इबादत के लिए, घर वालों के कामों के लिए और अपने निजी कामों के लिए। जो वक़्त अपने लिए अलग रखते, उसे भी अपने और लोगों के बीच बाँट देते थे। उस वक़्त आपके पास लोगों में से सिर्फ़ चुने हुए सहाबा आते थे। आप दीनी मसाइल उन्हीं के ज़रिए आम लोगों तक पहुँचाते थे, और आम लोगों से ताल्लुक़ रखने वाली कोई चीज़ अपने पास न रोकते, न जमा करते थे। नबी-ए-करीम की आदत थी कि उम्मत के लिए रखे गए वक़्त को फ़ज़ीलत वालों में, दीन में उनके दर्जों के मुताबिक़ बाँटते और उसी के हिसाब से उन्हें अपनी ख़िदमत में बुलाते थे। उनमें से किसी की एक ज़रूरत होती, किसी की दो, और किसी की इससे भी ज़्यादा। नबी-ए-करीम उनकी दीनी ज़रूरतों में मशग़ूल होते, उनके सवालों के मुनासिब जवाब देते, फिर फ़रमाते: ‘जो यहाँ मौजूद हैं, वे यह बातें उन तक पहुँचा दें जो यहाँ मौजूद नहीं! जो शख़्स ख़ुद आकर अपनी ज़रूरत मुझसे बयान न कर सके, उसकी ज़रूरत तुम मुझ तक पहुँचाओ। बेशक जो शख़्स अपनी ज़रूरत बयान न कर सकने वाले की ज़रूरत पहुँचाता है, क़यामत के दिन अल्लाह पुल-सिरात पर उसके क़दम जमाए रखेगा!’

नबी-ए-करीम के पास इसके सिवा कोई बात न छेड़ी जाती, न ज़बान पर लाई जाती थी। वैसे भी आप ख़ुद किसी से इसके सिवा कुछ क़बूल नहीं करते थे। नबी-ए-करीम की ख़िदमत में आने वाले इल्म के तालिब बनकर आते थे और सबसे बड़े आलिम बनकर, इल्म का मज़ा चखकर और दूसरों को भी उसकी राह दिखाने वाले बनकर निकलते थे!”

नबी-ए-करीम का घर के बाहर का हाल

हज़रत हुसैन ने अपने वालिद हज़रत अली से नबी-ए-करीम के घर के बाहर के हालात के बारे में पूछा। उन्होंने यूँ बयान फ़रमाया:

कायनात के सरदार बाहर बात नहीं करते थे। सिर्फ़ उसी वक़्त बात करते थे जब आपकी बात मुसलमानों के लिए फ़ायदेमंद हो, उन्हें एक-दूसरे के क़रीब करे, उनके बीच की फूट और सर्दमहरी को दूर करे। आप हर क़ौम के सबसे अच्छे औसाफ़ वाले शख़्स की इज़्ज़त करते और उसे उसकी क़ौम पर हाकिम मुक़र्रर करते थे।13 आप लोगों को बुरे लोगों और बुराइयों से बचाते, और ख़ुद भी ऐसी हालतों में पड़ने से बचते थे। आप किसी से भी अपनी ख़ंदापेशानी और अपने अच्छे अख़लाक़ में कमी नहीं करते थे।

अगर आप अपने सहाबा को न देखते, तो उन्हें ढूँढते, और सहाबा से उनके आपस के हालात पूछते थे। भलाई की तारीफ़ करते और उसे मज़बूत करते, और बुराई की मज़म्मत करते और उसे कमज़ोर करते थे। आपका हर काम एतिदाल पर और बिना इख़्तिलाफ़ के होता था। मुसलमान कहीं ग़फ़लत में न पड़ जाएँ, इस फ़िक्र से आप उन्हें तंबीह करने से कभी नहीं रुकते थे। आपका हर हाल एक जैसा, बिना बदलाव के होता था। रसूलुल्लाह में इबादत और इताअत की पूरी सलाहियत थी। आप न हक़ से आगे बढ़ते थे, न उसे अदा करने में कमी करते थे। आपके क़रीबी लोग इंसानों में सबसे बेहतर थे।

आपके नज़दीक सहाबा में सबसे बुलंद वह था जिसकी नसीहत सबसे ज़्यादा जामे हो, और दर्जे में सबसे बड़ा वह था जिसकी ज़रूरतमंदों की मदद और भलाई सबसे अच्छी हो। कायनात के सरदार अल्लाह का ज़िक्र किए बिना न बैठते थे, न उठते थे।

आप मजलिस में अपने लिए कोई ख़ास जगह मुक़र्रर नहीं करते थे, और ऐसा करने से मना फ़रमाते थे। जहाँ कहीं भी हों, जब किसी बैठी हुई जमाअत के पास जाते, तो सदर की जगह पर नहीं जाते, मजलिस के आख़िर में बैठ जाते और मुसलमानों को भी ऐसा ही करने का हुक्म देते थे।

आप अपने साथ बैठने वाले हर शख़्स को उसका हिस्सा देते और उसकी ऐसी इज़्ज़त करते कि हर कोई यह समझता कि रसूलुल्लाह के नज़दीक उससे ज़्यादा क़ीमती कोई नहीं। जो आपके साथ बैठता या आकर अपनी ज़रूरत बयान करता, उसके लौट जाने तक आप उसकी हर बात बर्दाश्त करते थे।14

जब कोई आपसे कोई ज़रूरत या दरख़्वास्त लेकर आता, तो आप उसे ठुकराते नहीं थे: या तो दे देते, या मीठे और नरम लफ़्ज़ों से लौटा देते। आपके अच्छे अख़लाक़ इतने वसीअ थे कि तमाम इंसानों को अपने दामन में ले लें। आप उनके लिए शफ़क़त वाले बाप बन गए थे। हक़ के मामले में आपके नज़दीक हर कोई बराबर था। नबी-ए-करीम की मजलिस इल्म, हया, सब्र और अमानत की मजलिस थी।

आपकी मजलिस में न आवाज़ें ऊँची होतीं, न किसी पर इल्ज़ाम लगाया जाता, न किसी की कोई ख़ता या ग़लती उछाली जाती थी। कायनात के सरदार की मजलिस में बैठने वाले एक-दूसरे के बराबर थे; एक-दूसरे पर उनकी बरतरी सिर्फ़ तक़्वा के लिहाज़ से थी। सब के सब आजिज़ी वाले थे। बड़ों की ताज़ीम करते, छोटों पर शफ़क़त और रहम करते, ज़रूरतमंदों को दूसरों पर तरजीह देकर उनकी ज़रूरतें पूरी करने की कोशिश करते, और परदेसियों और अजनबियों की हिफ़ाज़त और देखभाल करते थे। नबी-ए-करीम हमेशा ख़ंदापेशानी और नरम मिज़ाज वाले थे। आप बहुत शफ़क़त करने वाले थे और बहुत माफ़ करते थे। आप सख़्त दिल नहीं थे। किसी से झगड़ते नहीं थे। कभी चीख़ते-चिल्लाते नहीं थे, बुरी बात मुँह से नहीं निकालते थे। किसी को ऐब नहीं लगाते थे। कंजूस नहीं थे। जो बात पसंद न आती, उससे चश्मपोशी करते थे। उम्मीद रखने वाले को नाउम्मीद नहीं करते थे, और किसी चीज़ पर अपनी नापसंदगी खुलकर ज़ाहिर नहीं करते थे।

रसूलुल्लाह तीन चीज़ों से दूर रहते थे:

- लोगों से झगड़ने से,

- बहुत बोलने से,

“मैं किसी चीज़ से टेक लगाकर खाना नहीं खाता” हदीस शरीफ़

- बेफ़ायदा, फ़िज़ूल कामों में लगने से।

और लोगों को भी तीन बातों में उनके हाल पर छोड़ देते थे:

- किसी को न उसके मुँह पर, न उसकी पीठ पीछे मलामत करते, न ऐब लगाते थे,

- किसी के ऐब और कमी की टोह में नहीं रहते थे,

- किसी से ऐसी बात नहीं कहते थे जो उसके हक़ में सवाब और भलाई वाली न हो।

जब नबी-ए-करीम बात करते, तो आपकी मजलिस में बैठने वाले ऐसे ख़ामोश और बेहरकत बैठे रहते, जैसे उनके सिरों पर परिंदे बैठे हों; जब आप अपनी बात पूरी करके ख़ामोश हो जाते, तब वे अपनी बात कहते, लेकिन आपके पास कभी बहस और झगड़ा नहीं करते थे। नबी-ए-करीम के पास जब कोई बात करता, तो उसके बात पूरी करने तक बाक़ी लोग चुप रहते थे। नबी-ए-करीम के पास सबसे आख़िर में बोलने वाले और सबसे पहले बोलने वाले की बात में कोई फ़र्क़ नहीं था। आपकी मजलिस वाले किसी बात पर हँसते, तो आप भी उनके साथ हँसते, और किसी बात पर हैरान होते, तो आप भी उनके साथ हैरानी ज़ाहिर करते थे। आपकी ख़िदमत में आने वाले परदेसियों और अजनबियों की बातों और सवालों में जो रूखापन और दिल दुखाने वाली बात होती, उसे आप बर्दाश्त करते थे, ताकि आपके सहाबा भी आप ही की तरह बरताव करें। नबी-ए-करीम फ़रमाते थे: “जब तुम किसी ज़रूरतमंद को अपनी ज़रूरत माँगते देखो, तो उसकी ज़रूरत पूरी होने में उसकी मदद करो!”

नबी-ए-करीम हक़ीक़त के ख़िलाफ़ तारीफ़ क़बूल नहीं करते थे। जब तक कोई हक़ से आगे न बढ़ता, आप किसी की बात नहीं काटते थे, और जब कोई हक़ से आगे बढ़ता, तो या तो उसे रोककर उसकी बात काट देते, या मजलिस से उठकर चले जाते थे। कायनात के सरदार की ख़ामोशी चार चीज़ों पर टिकी थी – हिल्म पर, हज़र (एहतियात) पर, तक़दीर (अंदाज़ा करने) पर और तफ़क्कुर पर। आपका अंदाज़ा करना लोगों को बराबर नज़र से देखने और उन्हें बराबर सुनने में फ़ौरन ज़ाहिर हो जाता था। आपका तफ़क्कुर दुनिया और आख़िरत के कामों के बारे में आपके सोचने में नज़र आता था।

हिल्म और सब्र को आपने अपने अंदर जमा कर रखा था। दुनिया से ताल्लुक़ रखने वाली कोई चीज़ आपको ग़ुस्सा नहीं दिलाती थी। जहाँ तक हज़र (एहतियात) का ताल्लुक़ है, इस आदत की वजह से आपमें चार ख़ूबियाँ जमा हो गई थीं:

- सबसे अच्छी बात को इसलिए अपनाते थे कि उसकी पैरवी की जाए,

- बुरी चीज़ों को इसलिए छोड़ देते थे कि लोग उनसे बचें,

- अपनी राय उन चीज़ों में लगाते थे जो आपकी उम्मत के लिए फ़ायदेमंद हों,

- अपनी सारी कोशिश उन चीज़ों पर लगाते थे जो आपकी उम्मत की दुनिया और आख़िरत की सआदत का सामान करें।

कायनात के सरदार ने किसी चीज़ के लिए कभी “नहीं!” नहीं कहा। जब आपसे कोई ऐसी चीज़ माँगी जाती जिसे आप करना चाहते, तो फ़रमाते: “अच्छा!” और जब कोई ऐसी चीज़ माँगी जाती जिसे आप करना नहीं चाहते, तो ख़ामोश हो जाते, और आपकी इस ख़ामोशी से समझ में आ जाता कि आप यह नहीं करना चाहते। आप हर किसी की दुनिया और आख़िरत की सआदत के लिए कोशिश करते थे। एक ग़ज़वे में जब आपसे काफ़िरों के मिट जाने की दुआ करने को कहा गया, तो आपने फ़रमाया:

“मुझे लानत करने के लिए, लोगों के अज़ाब में पड़ने के लिए नहीं भेजा गया। मुझे हर किसी के साथ भलाई करने के लिए, लोगों को सुकून दिलाने के लिए भेजा गया है।”

सूरह अंबिया की एक सौ सातवीं आयत में फ़रमाया गया है, जिसका मफ़हूम है: “हमने तुम्हें सारे जहानों के लिए रहमत और भलाई बनाकर भेजा है।” इसी लिए आप हमेशा हर किसी की भलाई के लिए कोशिश करते थे। अनस इब्ने मालिक की ख़बर के मुताबिक़ नबी-ए-करीम जब किसी से मिलते, तो उससे मुसाफ़हा करते15, और जब तक वह शख़्स अपना हाथ न खींचता, नबी-ए-करीम भी अपना हाथ न खींचते, और जब तक वह शख़्स अपना चेहरा न फेरता, नबी-ए-करीम भी उससे अपना चेहरा न फेरते थे।

हज़रत अनस इब्ने मालिक यह भी बयान करते हैं: “हमने नबी-ए-करीम से पूछा: ‘या रसूलल्लाह! क्या हम एक-दूसरे के आगे झुकें?’ आपने फ़रमाया: ‘नहीं!’ हमने पूछा: ‘क्या हम एक-दूसरे से गले मिलें?’ आपने फ़रमाया: ‘नहीं! लेकिन मुसाफ़हा किया करो!’”16

हज़रत बरा इब्ने आज़िब ने बयान किया कि नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “जब दो मुसलमान मिलकर मुसाफ़हा करते हैं, तो एक-दूसरे से जुदा होने से पहले ही उनकी मग़फ़िरत कर दी जाती है!”

कायनात के सरदार हमेशा ग़ौर-ओ-फ़िक्र में रहते थे। आपकी ख़ामोशी आपके बोलने से ज़्यादा लंबी होती थी। रसूलुल्लाह बेज़रूरत बात नहीं करते थे। बात शुरू करते वक़्त भी और ख़त्म करते वक़्त भी अल्लाह का नाम लेते थे।

आप छोटे और मानी भरे लफ़्ज़ों में बात करते थे। रसूलुल्लाह की बातें हमेशा सच्ची और बरमहल होती थीं। रसूलुल्लाह बात करते वक़्त न ज़्यादा लफ़्ज़ इस्तेमाल करते थे, न कम। आप न किसी का दिल तोड़ते थे, न किसी को हक़ीर समझते थे।

रसूलुल्लाह दुनिया के लिए, दुनिया के कामों के लिए ग़ुस्सा नहीं होते थे। लेकिन जब किसी का हक़ पामाल किया जाने लगता, तो जब तक वह हक़ वापस न दिला देते, कोई चीज़ आपके ग़ुस्से को रोक न पाती थी।

अपनी ज़ात के लिए आप कभी ग़ुस्सा नहीं होते थे और न बदला लेते थे। किसी चीज़ की तरफ़ इशारा करते, तो उँगली से नहीं, पूरे हाथ से इशारा करते थे। जब हैरान होते, तो अपना हाथ पलट देते थे, यानी अगर हथेली आसमान की तरफ़ होती, तो उसे ज़मीन की तरफ़, और ज़मीन की तरफ़ होती, तो आसमान की तरफ़ कर देते थे। बात करते वक़्त हाथ से इशारे करते और अपने मुबारक दाहिने हाथ की हथेली को बाएँ हाथ के अँगूठे के अंदरूनी हिस्से पर मारते रहते थे। जब ग़ुस्सा आता, तो फ़ौरन ग़ुस्सा छोड़ देते और उसे ज़ाहिर नहीं होने देते थे। जब ख़ुश होते, दिल खिल उठता, तो अपनी मुबारक आँखें बंद कर लेते थे। आपकी ज़्यादा से ज़्यादा हँसी मुस्कुराहट होती थी। मुस्कुराते वक़्त आपके मुबारक दाँत मोती के दानों की तरह दिखाई देते थे।17

अच्छे कामों में दाईं तरफ़ को पहले रखना पसंद करते थे,
वुज़ू हो या लिबास, जल्दी करते थे वह सख़ावत की खान।
दाईं करवट पर, चेहरा क़िब्ले की तरफ़ करके लेटते थे,
हर साँस में ग़ैब की सैर करते थे वह सख़ावत की खान।

“जब दो मुसलमान मिलकर सलाम करते हैं और मुसाफ़हा करते हैं, तो एक-दूसरे से जुदा होने से पहले ही उनकी मग़फ़िरत कर दी जाती है!” हदीस शरीफ़

बिछौना चमड़े का था, तकिया खजूर की छाल से भरा हुआ,
रात को लेटते तो बहुत कम सोते, जागते रहते वह सख़ावत की खान।
आँखें सो जातीं, मगर दिल अपने दोस्त के साथ जागता रहता,
अज़ल से उसके हुस्न पर हैरान थे वह सख़ावत की खान।

नबी-ए-करीम का लेटना और सोना

नबी-ए-करीम जब अपने बिस्तर पर सोना चाहते, तो अपनी मुबारक दाईं करवट लेटते, अपना मुबारक दाहिना हाथ अपने मुबारक दाएँ गाल के नीचे रखते, फिर यह दुआ फ़रमाते: “या अल्लाह! मैंने अपने आपको तेरे सुपुर्द कर दिया। अपना चेहरा तेरी तरफ़ फेर लिया। अपना काम तुझे सौंप दिया। अपनी पीठ तेरे सहारे टिका दी। मैं तेरे अज़ाब से डरता हूँ और तेरी रहमत की उम्मीद रखता हूँ। तेरी रहमत के सिवा कोई पनाह की जगह नहीं, तेरे अज़ाब से तेरे सिवा कोई बचाने वाला नहीं।

सिर्फ़ तेरी रहमत ही में पनाह ली जा सकती है और सिर्फ़ तेरी रहमत ही से नजात पाई जा सकती है। मैं तेरी उतारी हुई किताब और तेरे भेजे हुए नबी पर ईमान लाया।

ऐ मेरे रब! मैंने तेरे नाम से अपना पहलू ज़मीन पर रखा। अगर तू मेरी रूह को रोक ले, तो उसके साथ अपनी रहमत का मामला फ़रमा! और अगर उसे वापस छोड़ दे, तो जिस तरह अपने नेक बंदों की हिफ़ाज़त करता है, उसी तरह उसकी भी हिफ़ाज़त फ़रमा!

या अल्लाह! मैं तेरे नाम से मरता हूँ और तेरे नाम से जीता हूँ। ऐ वह अल्लाह, जो हमें खिलाता है, पिलाता है, हमारी हर ज़रूरत पूरी करता है, हमें ठिकाना देता है, पनाह देता है! मैं तेरी बेहद हम्द करता हूँ। कितने ही लोग ऐसे हैं जिनकी न कोई ज़रूरत पूरी करने वाला है, न कोई ठिकाना देने वाला! या अल्लाह! जिस दिन तू अपने बंदों को अपने हुज़ूर जमा करेगा, उस दिन मुझे अपने अज़ाब से बचाना! या अल्लाह! अव्वल तू ही है! तुझसे पहले कोई चीज़ नहीं! आख़िर तू ही है! तेरे बाद कोई चीज़ नहीं! ज़ाहिर तू ही है! तुझसे ऊपर कोई चीज़ नहीं!”

जब जागते, तो यह दुआ फ़रमाते: “तेरे सिवा कोई माबूद नहीं, सिर्फ़ तू ही है! मैं तेरी तस्बीह और तंज़ीह करता हूँ। या अल्लाह! मैं तुझसे अपने गुनाहों की मग़फ़िरत और तेरी रहमत माँगता हूँ।

तमाम हम्द उस अल्लाह के लिए है जिसने हमें मौत के बाद ज़िंदा किया। और क़यामत के दिन हमें उसी की तरफ़ लौटना है।”18 फिर यह दुआ फ़रमाते: “या अल्लाह! मेरा इल्म बढ़ा दे! मुझे सीधा रास्ता दिखाने के बाद मेरे दिल को टेढ़ा न कर! अपनी बुलंद बारगाह से मुझे रहमत भी अता फ़रमा, क्योंकि सबसे ज़्यादा मग़फ़िरत करने वाला तू ही है!” हज़रत बरा इब्ने आज़िब बयान करते हैं: कायनात के सरदार ने मुझसे फ़रमाया:

“जब तुम अपने बिस्तर पर जाओ, तो नमाज़ के वुज़ू की तरह वुज़ू करो! फिर दाईं करवट लेटो और कहो: ‘या अल्लाह! मैंने अपने आपको तेरे सुपुर्द कर दिया। अपना चेहरा तेरी तरफ़ फेर लिया। अपनी पीठ तेरे सहारे टिका दी। मैं तेरे अज़ाब से डरता हूँ और तेरी रहमत की उम्मीद रखता हूँ। तेरी रहमत के सिवा कोई पनाह की जगह नहीं, तेरे अज़ाब से बचने की कोई जगह नहीं! सिर्फ़ तेरी रहमत ही में पनाह ली जा सकती है और सिर्फ़ तेरी रहमत ही से नजात पाई जा सकती है। मैं तेरी उतारी हुई किताब और तेरे भेजे हुए नबी पर ईमान लाया!’ अगर तुम उस रात मर गए, तो इस्लाम की फ़ितरत पर मरोगे। जो यह कहे और उसी रात मर जाए, वह इस्लाम की फ़ितरत पर मरेगा!”

नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “तुममें से कोई रात को अपने बिस्तर से उठे और फिर दोबारा लेटने के लिए लौटे, तो अपने बिस्तर को तीन बार झाड़ ले, क्योंकि वह नहीं जानता कि उसके उठने के बाद क्या हुआ, बिस्तर पर क्या आकर बैठ गया।” असहाब-ए-सुफ़्फ़ा में से अब्दुल्लाह इब्ने तिख़फ़ा (रज़ियल्लाहु अन्हु) बयान करते हैं: “मैं सहर के वक़्त मस्जिद में पेट के बल, यानी मुँह के बल लेटा सो रहा था कि किसी ने मुझे अपने पाँव से हिलाया।

– ‘यह कौन है?’ – पूछा गया।

– ‘मैं अब्दुल्लाह इब्ने तिख़फ़ा हूँ’ – मैंने जवाब दिया।

क्या देखता हूँ! वह तो कायनात के सरदार थे! मैं फ़ौरन उठकर बैठ गया।

– ‘यह लेटने का वह तरीक़ा है जो अल्लाह तआला को सबसे ज़्यादा नापसंद है!’ – आपने फ़रमाया।”19 नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बिना वुज़ू के ज़मीन पर क़दम नहीं रखते थे।

किसी ने कभी नहीं देखा कि रसूलुल्लाह बैतुल ख़ला से आए हों और वुज़ू न किया हो।

नबी-ए-करीम की चाल

हज़रत हिंद इब्ने अबी हाला बयान करते हैं: “कायनात के सरदार जब चलते, तो अपने क़दम ज़मीन से फुर्ती से उठाते, दाएँ-बाएँ झूमते नहीं थे, लंबे क़दम रखते, ऐसे आगे की तरफ़ थोड़ा झुककर चलते जैसे किसी ऊँची जगह से उतर रहे हों, और वक़ार और सुकून के साथ, आराम से चलते थे।

जिस तरफ़ देखना चाहते, उस तरफ़ पूरी तरह मुड़कर देखते थे। इधर-उधर बेवजह नहीं देखते थे।

आपका ज़मीन की तरफ़ देखना आसमान की तरफ़ देखने से ज़्यादा देर तक होता था।

ज़मीन की तरफ़ भी कनखियों से देखते थे। रास्ते में अपने सहाबा के पीछे चलते थे।

जब किसी से मिलते, तो पहले ख़ुद सलाम करते थे।”

हज़रत अबू हुरैरा बयान करते हैं: “चलने में मैंने कायनात के सरदार से ज़्यादा तेज़ किसी को नहीं देखा। जब आप चलते, तो ऐसा लगता जैसे ज़मीन आपके क़दमों के नीचे लिपटती जा रही हो! हम आपके साथ रहने के लिए अपने आप पर बहुत ज़ोर डालते थे। लेकिन कायनात के सरदार चलते वक़्त अपने आप पर ज़रा भी ज़ोर नहीं डालते थे।”20

नबी-ए-करीम का बैठना

आप ज़्यादातर घुटनों के बल बैठते थे। आपको क़ुरफ़ुसा के तरीक़े पर, यानी घुटने खड़े करके और उन्हें बाँहों से घेरकर बैठे हुए भी देखा गया है।21 आपने कभी अपनी मजलिस में बैठे लोगों की तरफ़ पाँव नहीं फैलाए। आम तौर पर आप क़िब्ले की तरफ़ रुख़ करके बैठते थे। अपने पास आने वाले मेहमानों के लिए अक्सर अपनी पीठ पर पड़ी अबा (चादर) बिछाकर उन्हें उस पर बिठाते थे। कभी-कभी अपने मेहमानों को अपना गद्दा भी दे देते थे। हंज़ला इब्ने हिज़्यम ने बयान किया: “जब मैं नबी-ए-करीम के पास गया, तो मैंने आपको चार ज़ानू (पालथी मारकर) बैठे देखा।” जाबिर इब्ने समुरा ने भी बताया कि नबी-ए-करीम फ़ज्र की नमाज़ पढ़ने के बाद सूरज निकलने तक अपनी नमाज़ की जगह पर चार ज़ानू बैठे रहते थे।

“अल्लाह तआला के अख़लाक़ को अपना अख़लाक़ बनाओ!” हदीस शरीफ़

शरीद इब्ने सुवैद बयान करते हैं: “नबी-ए-करीम मेरे पास तशरीफ़ लाए। उस वक़्त मैं अपना बायाँ हाथ पीछे रखकर आधी हथेली पर टेक लगाए बैठा था। तो कायनात के सरदार ने फ़रमाया: ’क्या तुम उन लोगों की तरह बैठे हो जिन पर अल्लाह का ग़ज़ब हुआ (यहूदियों की तरह)?’” अबू जुहैफ़ा बयान करते हैं: “नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: ‘मैं किसी चीज़ से टेक लगाकर खाना नहीं खाता।’”22

चार ज़ानू, या घुटनों के बल, या घुटने खड़े करके बैठते थे,
ज़ाहिर में भी, छिपे में भी अदब से भरे थे वह सख़ावत की खान।
तीन उँगलियों से खाते और उन्हें मज़े से चाटते थे,
तीन साँसों में पानी पीते थे वह सख़ावत की खान।
शहद, हलवा, कद्दू, सिरका और सरीद पसंद करते थे, मगर
जौ की रोटी भी पेट भरकर न खाई वह सख़ावत की खान।
भूख से कभी अपने मुबारक पेट पर पत्थर बाँध लेते थे,
“मेरा दिल न काँपे” – फ़रमाते थे वह सख़ावत की खान।
सआदत वाले घर में महीनों आग न जलती थी,
क़नाअत से खजूर और अनार खाते थे वह सख़ावत की खान।

नबी-ए-करीम का खाना और पीना

नबी-ए-करीम ने फ़रमाया:

“खाने की बरकत खाने से पहले वुज़ू करने और खाने के बाद हाथ धोने में है!”23

“जो शख़्स अपने हाथ पर लगी गोश्त और चिकनाई की बू और मैल को धोए बिना सो जाए और उस पर कोई मुसीबत आ जाए, तो वह अपने सिवा किसी को इल्ज़ाम न दे!” “खाने की बरकत उसके बीच में है! तुममें से कोई खाए, तो थाल के बीच से नहीं, किनारे से खाए, क्योंकि बरकत उसके बीच में उतरती है!” हमारी माँ हज़रत आइशा बयान करती हैं: “कायनात के सरदार ने फ़रमाया: ‘तुममें से कोई खाना खाने लगे, तो बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम कहे, अल्लाह तआला का नाम ले। अगर खाना शुरू करने से पहले यह कहना भूल जाए, तो कहे: खाने के शुरू और आख़िर के लिए बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम!’”24

उमय्या इब्ने मख़्शी की ख़बर के मुताबिक़ एक आदमी बिस्मिल्लाह कहे बिना खाना खा रहा था।

नबी-ए-करीम समझ गए कि उसने बिस्मिल्लाह नहीं कही, और फ़रमाया: “खाने के शुरू और आख़िर के लिए बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम कहो!” जब उस आदमी ने “बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम” कहा, तो नबी-ए-करीम मुस्कुराए और फ़रमाया: “शैतान तुम्हारे साथ खाता जा रहा था। जब तुमने अल्लाह तआला का नाम लिया, तो शैतान ने अपने पेट में जो कुछ था, सब उगल दिया!”

हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर की ख़बर के मुताबिक़ नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “तुममें से कोई खाए, तो दाहिने हाथ से खाए, और कुछ पिए, तो भी दाहिने हाथ से पिए, क्योंकि शैतान बाएँ हाथ से खाता है और बाएँ हाथ से पीता है!”25

सलमा इब्ने अकवा ने अपने वालिद से सुनकर यूँ बयान किया: नबी-ए-करीम ने अशजा क़बीले के बुस्र इब्ने राईउल ईर नाम के एक आदमी को अपने पास बाएँ हाथ से खाना खाते देखा, तो उससे फ़रमाया: “दाहिने हाथ से खाओ!” उस आदमी ने झूठ बोलते हुए कहा: “मुझमें इसकी ताक़त नहीं, मैं दाहिने हाथ से नहीं खा सकता!” इस पर नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “तुम्हें इसकी ताक़त न हो! उसे दाहिने हाथ से खाने से सिर्फ़ तकब्बुर और ग़ुरूर रोक रहा है!” उस दिन के बाद वह आदमी फिर कभी अपना हाथ मुँह तक न उठा सका!26 नबी-ए-करीम फ़रमाया करते थे: “अज़ीज़ और जलील अल्लाह तआला उस बंदे से ज़रूर राज़ी होता है, जो कोई खाने की चीज़ खाकर या पीने की चीज़ पीकर उस पर उसकी हम्द करे।”

नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मिट्टी पर बैठते और खाना भी ज़मीन पर बैठकर खाते थे। आप फ़रमाते थे: “मैं वैसे ही बैठता हूँ जैसे बंदा बैठता है, वैसे ही खाता हूँ जैसे बंदा खाता है। मैं तो बस एक बंदा हूँ! जो मेरी सुन्नत से मुँह मोड़े, वह मुझसे नहीं है!”27

उमर इब्ने अबी सलमा कहते हैं: “मैं कायनात के सरदार की तरबियत में पलने वाला एक बच्चा था। खाते वक़्त मेरा हाथ बरतन में इधर-उधर घूमता रहता था। कायनात के सरदार ने मुझसे फ़रमाया: ‘बेटे! बिस्मिल्लाह पढ़ो। दाहिने हाथ से खाओ! अपने सामने से खाओ!’28 उसके बाद मैं हमेशा इसी तरह खाने लगा।” नबी-ए-करीम ने कभी किसी खाने को हक़ीर नहीं जाना, कभी उसकी बुराई नहीं की। किसी नेमत की न इसलिए तारीफ़ करते कि वह पसंद आई, न इसलिए बुराई करते कि पसंद न आई। कोई खाना जी चाहता तो खा लेते, जी न चाहता तो छोड़ देते और ख़ामोश रहते। छोटी से छोटी नेमत की भी क़द्र करते, किसी नेमत की बुराई नहीं करते थे। रसूलुल्लाह कभी “यह पकाओ, वह पकाओ” नहीं फ़रमाते थे। जो कुछ मौजूद होता, वही खा लेते थे। हमारी माँ हज़रत आइशा बयान करती हैं: नबी-ए-करीम मेरे पास तशरीफ़ लाते और पूछते: “तुम्हारे पास खाने को कुछ है?” मैं कहती: “नहीं!” तो आप फ़रमाते: “तो फिर मैं रोज़े से हूँ!”29 हमारी माँ हज़रत आइशा बयान करती हैं: “नबी-ए-करीम के मदीना तशरीफ़ लाने से लेकर आपकी वफ़ात तक आपके घर वालों ने कभी लगातार तीन रात गेहूँ की रोटी से पेट नहीं भरा।30 अक्सर उनका खाना जौ की रोटी और खजूर ही होता था, और वह भी ज़्यादा नहीं होता था। नबी-ए-करीम के पेट में एक दिन में दो क़िस्म के खाने कभी इकट्ठे नहीं हुए: जिस दिन आपने मुबारक पेट खजूर से भरा, रोटी से नहीं भरा, और जिस दिन रोटी से भरा, खजूर से नहीं भरा। यही बात मुझे रुलाती है!”31

रसूलुल्लाह हलवा और शहद, रोटी का सरीद, खजूर का सरीद और सब्ज़ियों के खाने पसंद फ़रमाते थे। जब आपकी ख़िदमत में दूध पेश किया जाता तो फ़रमाते: “दूध में दो बरकतें हैं।”32

“तुममें से कोई खाए तो दाहिने हाथ से खाए। कुछ पिए तो वह भी दाहिने हाथ से पिए, क्योंकि शैतान बाएँ हाथ से खाता और बाएँ हाथ से पीता है!” हदीस शरीफ़

अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास बयान करते हैं: मैं, ख़ालिद इब्ने वलीद और कायनात के सरदार एक साथ मेरी ख़ाला मैमूना बिन्ते हारिस के घर गए। मेरी ख़ाला ने पूछा: “क्या मैं आप लोगों को दूध पेश करूँ?”

कायनात के सरदार ने फ़रमाया: “ठीक है!” मेरी ख़ाला गईं और एक बरतन में दूध ले आईं। कायनात के सरदार ने उसे लेकर पिया। मैं कायनात के सरदार की दाईं तरफ़ था और ख़ालिद इब्ने वलीद बाईं तरफ़। रसूलुल्लाह ने बचा हुआ दूध मुझे देकर फ़रमाया: “तुम पियो। चाहो तो तरजीह देकर ख़ालिद को पेश कर दो।”

मैंने अर्ज़ किया: “आपका बचा हुआ पीने में मैं कभी किसी को अपने ऊपर तरजीह नहीं देता!” इस पर रसूलुल्लाह ने यूँ फ़रमाया:

“जिसे अल्लाह तआला कोई खाना खिलाए, वह कहे: अल्लाहुम्मा बारिक लना फ़ीहि व अतइमना ख़ैरम मिन्हु (या अल्लाह! तू हमारे लिए इस खाने में बरकत अता फ़रमा! और हमें इससे बेहतर भी खिला!)!

और जिसे अल्लाह तआला दूध पिलाए, वह भी कहे: अल्लाहुम्मा बारिक लना फ़ीहि व ज़िदना मिन्हु (या अल्लाह! तू हमारे लिए इस दूध में बरकत अता फ़रमा और इसमें से हम पर अपनी अता बढ़ा दे!)! क्योंकि खाने और पीने, दोनों की जगह दूध के सिवा कोई चीज़ नहीं ले सकती।”33

मदीना के मुसलमान जब अपनी खजूरों का पहला फल देखते, तो उसे नबी-ए-करीम के पास ले आते। रसूलुल्लाह उसे हाथ में लेकर बरकत की दुआ फ़रमाते, फिर जो बच्चे दिखाई देते उनमें सबसे छोटे को बुलाकर उसे दे देते। आप फ़रमाते थे: “जिस घर में खजूर न हो, उस घर के लोग भूखे हैं।” नबी-ए-करीम बरतन की तह में बचा हुआ खाना खाना पसंद फ़रमाते थे। आप फ़रमाते थे: “जो कोई किसी थाली या बरतन में खाना खाने के बाद उसे पोंछकर साफ़ कर ले, वह बरतन उसके लिए इस्तिग़फ़ार (माफ़ी की दुआ) करता है!” नबी-ए-करीम का यह इरशाद भी बयान किया जाता है: “ऐ अबू ज़र! जब गोश्त पकाओ तो उसका शोरबा ज़्यादा कर लो और अपने पड़ोसियों का ख़याल रखो, उसमें से उन्हें भी हिस्सा दो।”34

“जिसका पड़ोसी भूखा हो और वह ख़ुद पेट भरकर खाए, वह कामिल मोमिन नहीं है!”

“अल्लाह की इबादत करो! खाना खिलाओ! सलाम को फैलाओ, ताकि जन्नतों में दाख़िल हो जाओ!”35

“एक आदमी का खाना दो आदमियों को काफ़ी होता है। तीन आदमियों का खाना चार को काफ़ी होता है। चार आदमियों का खाना आठ को काफ़ी होता है!”36

हज़रत अस्मा बिन्ते अबी बक्र ने बयान किया: रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पके हुए खाने को उसका उबाल और भाप ख़त्म होने तक ढका रखने की नसीहत फ़रमाते और फ़रमाते: “यह सबसे बड़ी बरकत है!” मक्का की फ़तह के मौक़े पर रसूलुल्लाह अपने चचा अबू तालिब की बेटी हज़रत उम्मे हानी के घर तशरीफ़ ले गए। उनसे पूछा: “तुम्हारे पास खाने को कुछ है?” हज़रत उम्मे हानी ने अर्ज़ किया: “नहीं! बस सूखी रोटी के टुकड़े और सिरका है! लेकिन इन्हें आपके सामने पेश करते हुए मुझे शर्म आती है!” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “उन्हें ले आओ। पानी में चूरा कर दो। नमक भी ले आओ!” उस पर सिरका डालकर तनावुल फ़रमाने के बाद आपने बुलंद व बरतर अल्लाह का शुक्र अदा किया और फ़रमाया: “ऐ उम्मे हानी! सिरका कितना अच्छा सालन है! जिस घर में सिरका हो, वह घर सालन से ख़ाली नहीं समझा जाता!”37 आप रोटी बिना सालन के भी खाते, या खजूर, सिरके, फल या शोरबे के साथ भी, या ज़ैतून के तेल में डुबोकर भी खाते थे। आप मुर्ग़ी, ख़रगोश, ऊँट, हिरन और मछली का गोश्त, पस्तिरमा (सुखाया हुआ गोश्त) और पनीर भी खाते थे। गोश्त में दस्ती (बाज़ू) का हिस्सा पसंद फ़रमाते थे। उसे हाथ से पकड़कर दाँतों से काटकर खाते थे। (छुरी से काटकर खाना भी जाइज़ है।) अक्सर दूध पीते या खजूर खाते थे। खाने की चीज़ों में भेड़ का गोश्त, गोश्त का शोरबा, कद्दू, मीठी चीज़ें, शहद, खजूर, दूध, मलाई, तरबूज़, ख़रबूज़ा, अंगूर और खीरा पसंद फ़रमाते थे।38 पानी जल्दी किए बग़ैर, बिस्मिल्लाह से शुरू करके तीन घूँट में पीते, आख़िर में “अलहम्दुलिल्लाह” कहते और दुआ फ़रमाते थे। नबी-ए-करीम बुयूतुस सुक़्या से लाया हुआ मीठा पानी पीते थे। बुयूतुस सुक़्या मदीना से दो दिन के फ़ासले पर था।39 जब पूछा गया: “पीने की चीज़ों में सबसे लज़ीज़ कौन-सी है?” तो नबी-ए-करीम ने जवाब में फ़रमाया: “मीठा और ठंडा पानी!”40

नबी-ए-करीम फ़रमाते थे: “तुममें से कोई कुछ पिए तो बरतन के अंदर साँस न छोड़े।” जिस तरह आप खाने-पीने की चीज़ों में साँस छोड़ने से मना फ़रमाते थे, उसी तरह सोने और चाँदी के बरतनों में खाने-पीने से भी मना फ़रमाते थे। नबी-ए-करीम पानी पीते वक़्त दो-तीन बार साँस लेते और फ़रमाते: “इस तरह ज़्यादा फ़ायदेमंद है और प्यास ज़्यादा अच्छी तरह बुझती है।” और फ़रमाते: “तुममें से कोई कुछ पिए तो एक साँस में न पिए।” और फ़रमाते: “ऊँटों की तरह एक साँस में न पियो! दो या तीन साँस में पियो! पीते वक़्त ‘बिस्मिल्लाह!’ कहो, और जब मुँह बरतन से हटाओ तो ‘अलहम्दुलिल्लाह!’ कहो!”41

हज़रत नौफ़ल इब्ने मुआविया बयान करते हैं: “कायनात के सरदार कुछ पीते वक़्त तीन बार साँस लेते थे। शुरू में बुलंद व बरतर अल्लाह का नाम लेकर ‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम’ पढ़ते और आख़िर में ‘अलहम्दुलिल्लाह’ कहकर हम्द करते थे।”42

अबू उमामा बाहिली के बयान के मुताबिक़ नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “अज़ीज़ और जलील मेरे रब ने जब मुझे मक्का की वादी को सोना बना देने की पेशकश फ़रमाई, तो मैंने कहा: ‘नहीं! या रब! एक दिन पेट भरा रहूँ और एक दिन भूखा। जब भूखा रहूँ तो तुझसे गिड़गिड़ाकर माँगूँ और तेरा ज़िक्र करूँ। और जब पेट भरा हो तो तेरी हम्द करूँ, तेरा शुक्र अदा करूँ!’”43

खाने-पीने का इल्म सीखना इबादत का इल्म सीखने से पहले आता है। खाने से पहले और खाने के बाद हाथ धोना, दाहिने हाथ से खाना और दाहिने हाथ से पीना रसूलुल्लाह की आदत थी। खाने से पहले हाथ धोते वक़्त पहले जवान धोते हैं, और खाने के बाद पहले बड़े-बूढ़े।44 थाली के किनारे से खाना, अपने सामने से खाना, दायाँ पाँव खड़ा करके बाएँ पाँव पर बैठना रसूलुल्लाह की सुन्नत है। बहुत गर्म चीज़ न खानी चाहिए, न सूँघनी चाहिए।

“जिसका पड़ोसी भूखा हो और वह ख़ुद पेट भरकर खाए, वह कामिल मोमिन नहीं है!” हदीस शरीफ़

खाते वक़्त बिल्कुल न बोलना नबी-ए-करीम मुनासिब नहीं समझते थे। यह आग को पूजने वालों की आदत है। ख़ुशदिली से बातचीत करनी चाहिए।

खाना नमक से शुरू करना और नमक पर ख़त्म करना रसूलुल्लाह की सुन्नत है, और इसमें शिफ़ा है। इस्लाम में सबसे पहले पैदा होने वाली बिदअतों में से एक पेट भरकर खाना है। हर दिन गोश्त खाना दिल पर बोझ डालता है। फ़रिश्ते इसे पसंद नहीं करते, और गोश्त बहुत कम खाना अख़लाक़ को बिगाड़ता है। दस्तरख़्वान, यानी बिछाए हुए कपड़े पर खाना और उसे ज़मीन पर बिछाना अच्छा है। पहले दस्तरख़्वान चमड़े का होता था। सब्ज़ियों का खाना बहुत अच्छा है। जिस दस्तरख़्वान पर सब्ज़ी न हो, उसे बेअक़्ल बूढ़े से तश्बीह दी गई है।

इमाम जाफ़र सादिक़ ने फ़रमाया: “जो चाहे कि उसका माल और औलाद ज़्यादा हो, वह सब्ज़ियाँ ज़्यादा खाए!” पहले दस्तरख़्वान पर बैठना चाहिए, खाना बाद में लाना चाहिए।

हमारे नबी ने फ़रमाया: “मैं बंदा हूँ। बंदों की तरह ज़मीन पर बैठकर खाता हूँ।”45

भूख लगे बिना नहीं खाना चाहिए, पेट भरने से पहले उठ जाना चाहिए [यानी ज़्यादा नहीं खाना चाहिए], ताज्जुब की कोई बात न हो तो हँसना नहीं चाहिए। नबी-ए-करीम फ़रमाते थे: “भलाइयों की जड़ भूख है। बुराइयों की जड़ पेट भरा होना है।” भूख जितनी ज़्यादा हो, खाने का मज़ा उतना ही बढ़ता है। पेट भरा होना भुलक्कड़ बनाता है। यह दिल को अंधा करता है, शराब की तरह ख़ून को बिगाड़ता है। भूख अक़्ल को साफ़ करती है, दिल को रौशन करती है। खुल्लम-खुल्ला गुनाह करने वालों (फ़ासिक़ों) और बुरे लोगों के साथ नहीं खाना-पीना चाहिए। उबलते हुए खाने को ढककर ठंडा करना चाहिए।

रसूलुल्लाह फ़रमाते थे: “दाहिने हाथ से खाओ। दाहिने हाथ से पियो।” तीन उँगलियों से खाना सुन्नत है। नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ऐ अली! खाना अपनी तीन उँगलियों से खाओ, क्योंकि शैतान दो उँगलियों से खाता है।” हमारे नबी रोटी दाहिने हाथ से लेते और तरबूज़ बाद में बाएँ हाथ से खाते थे। रोटी एक हाथ से नहीं, दोनों हाथों से तोड़नी चाहिए।46 लुक़्मा छोटा होना चाहिए और अच्छी तरह चबाया जाना चाहिए। दाएँ-बाएँ और ऊपर नहीं देखना चाहिए, अपने लुक़्मे और अपने सामने देखना चाहिए। मुँह बहुत नहीं खोलना चाहिए। दस्तरख़्वान पर हाथ कपड़ों या बालों से नहीं पोंछने चाहिए। खाँसते और छींकते वक़्त सिर पीछे की तरफ़ फेर लेना चाहिए। जिस दस्तरख़्वान पर बुलाया न गया हो, उस पर नहीं बैठना चाहिए। दस्तरख़्वान पर सबसे ज़्यादा नहीं खाना चाहिए। पेट भर जाए तो दुआ करनी चाहिए कि इस ताक़त को गुनाह में इस्तेमाल न करे। सोचना चाहिए कि क़यामत में इसका हिसाब कैसे देगा। इबादत के लिए ताक़त हासिल करने की नीयत से खाना चाहिए। भूखा हो तब भी जल्दबाज़ी के बग़ैर खाना चाहिए। पहले बड़ों को शुरू करना चाहिए। तीन बार से ज़्यादा “खाओ” कहकर किसी को तंग नहीं करना चाहिए। रसूलुल्लाह कम खाते और ज़्यादा खाने से बहुत सख़्ती से ख़बरदार फ़रमाते थे। आप फ़रमाते थे: “इंसान का दिल खेत की फ़सल की तरह है। खाना बारिश की तरह है। जिस तरह ज़्यादा पानी फ़सल को सुखा देता है, उसी तरह ज़्यादा ग़िज़ा दिल को मार देती है। ज़्यादा खाने वाले और ज़्यादा पीने वाले को अल्लाह तआला पसंद नहीं करता।”

रसूलुल्लाह नसीहत फ़रमाते थे कि मेदे का एक तिहाई खाने के लिए और एक तिहाई पीने के लिए रखा जाए। एक तिहाई हवा के लिए रहे, यानी ख़ाली रहे – यह सबसे निचला दर्जा है। सबसे अच्छा दर्जा कम खाना और कम सोना है। ज़्यादा खाना बीमारियों की जड़ है, और कम खाना दवाओं की जड़। मेहमान को मेज़बान से नमक और रोटी के सिवा किसी चीज़ की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। मेज़बान को मेहमान की तरफ़ लुक़्मा बढ़ाना चाहिए। उसके हाथों पर पानी डालना चाहिए। मेहमान की पसंद की चीज़ उसके मुँह में देनी चाहिए। मेहमान साफ़ जगह पर जो चीज़ गिरा दे, उसे उठाकर उसे देना चाहिए। अगर वह गंदी हो गई हो तो बिल्ली और दूसरे जानवरों के लिए छोड़ देनी चाहिए। ऐसे घर की बरकत बढ़ती है। वह पोतों तक भी पहुँचती है। ज़मीन पर गिरी हुई चीज़ें न उठाई जाएँ तो उन्हें शैतान खाता है।

बरतन में बचा हुआ खाना पोंछकर खाना सुन्नत है। ख़ुशाफ़ (मेवों का शरबत) और छाछ जैसी चीज़ों के बचे हुए हिस्से में पानी डालकर, हिलाकर पीना बहुत सवाब का काम है। थाली या गिलास में कुछ छोड़ देना जाइज़ है। रसूलुल्लाह मोमिन का बचा हुआ खाना पसंद फ़रमाते थे।

खाने के बाद दाँतों को मिस्वाक और ख़िलाल से साफ़ करना रसूलुल्लाह की सुन्नत है। यह सफ़ाई है। सफ़ाई ईमान को मज़बूत करती है। खाने के बाद मेज़बान के लिए बरकत, रहमत और मग़फ़िरत की दुआ की जाती है। फिर जाने की इजाज़त माँगी जाती है। मेज़बान को भी अपने यहाँ खाने की दावत दी जाती है।

खाते वक़्त डरावनी और घिनौनी बातें नहीं करनी चाहिए। मौत और बीमारी का ज़िक्र नहीं छेड़ना चाहिए। दस्तरख़्वान पर आने वाले खानों को ताकते नहीं रहना चाहिए। एक लुक़्मा निगलने से पहले दूसरा हाथ में नहीं लेना चाहिए। खाने के दौरान किसी काम के लिए, यहाँ तक कि नमाज़ के लिए भी, दस्तरख़्वान से नहीं उठना चाहिए। नमाज़ पहले पढ़ लेनी चाहिए। अगर तैयार खाने ठंडे हो जाने या ख़राब हो जाने वाले हों और नमाज़ का वक़्त खाने के बाद पढ़ने की गुंजाइश देता हो, तो नमाज़ से पहले खाना चाहिए। खाना उठा लिए जाने के बाद ही दस्तरख़्वान से उठना चाहिए। रास्ते में, खड़े होकर या चलते हुए नहीं खाना चाहिए। मुँह या हाथ में गोश्त और खाने की बू हो तो सोने के लिए नहीं लेटना चाहिए। बच्चों के हाथ भी धोने चाहिए। पेट भरा हो तो सोने के लिए नहीं लेटना चाहिए। खाने-पीने की चीज़ें ज़रूरत के मुताबिक़ नापकर लेनी चाहिए, बेहिसाब और ज़्यादा नहीं लेनी चाहिए, वरना इसराफ़ (फ़ुज़ूलख़र्ची) होता है। खाने और पीने के बरतनों पर ढक्कन होना चाहिए। नदी या हौज़ से झुककर मुँह से नहीं पीना चाहिए। लोटे या सुराही के मुँह से भी नहीं पीना चाहिए। प्याली या गिलास की टूटी हुई जगह से नहीं पीना चाहिए। गर्मियों में ठंडा पीना चाहिए। रसूलुल्लाह ठंडा शरबत पीना पसंद फ़रमाते थे। ज़मज़म का पानी खड़े होकर पिया जा सकता है। कहा गया है कि मुसाफ़िर हर पानी खड़े होकर पी सकता है। ख़ाली पेट पानी नहीं पीना चाहिए। पानी जल्दबाज़ी के बग़ैर, चुस्की लेकर पीना चाहिए। रसूलुल्लाह हरीसा (कश्कक) पसंद फ़रमाते थे। हरीसा, यानी कश्कक पकाना नबी-ए-करीम को जिबराईल अलैहिस्सलाम ने सिखाया। हरीसा इंसान को बहुत ताक़त देता है। तमाम नबियों ने जौ की रोटी खाई है। रसूलुल्लाह कद्दू का हलवा, मसूर का शोरबा, शिकार का गोश्त और भेड़ का गोश्त पसंद फ़रमाते थे। भेड़ की दस्ती (अगली टाँग), सीने और कंधे का गोश्त पसंद फ़रमाते थे। बकरी के बच्चे के कंधे का गोश्त बहुत पसंद फ़रमाते थे। बकरी के बच्चे का गोश्त आसानी से हज़म होता है। यह हर एक के लिए मुनासिब है।47

“भलाइयों की जड़ भूख है। बुराइयों की जड़ पेट भरा होना है” हदीस शरीफ़

नर जानवर का गोश्त मादा के गोश्त से और गहरे रंग का गोश्त सफ़ेद गोश्त से ज़्यादा आसानी से हज़म होता है। जल्दी हज़म होने और मज़े के लिहाज़ से भेड़ का गोश्त और गाय का दूध ज़्यादा अच्छा है।

शिकार के गोश्तों में सबसे अच्छा हिरन का गोश्त है। ख़रगोश का गोश्त हलाल है। हमारे नबी ने इसे खाया है। यह पेशाब लाता है, और ज़्यादा खाया जाए तो नींद उड़ा देता है। यह हर एक के लिए मुनासिब है। परिंदे और चूज़े का गोश्त हर एक के लिए अच्छा है। पालतू परिंदों में सबसे अच्छा गोश्त मुर्ग़ी का है।

हमारे नबी ने फ़रमाया: “सिरका कितनी अच्छी ग़िज़ा है!” सिरका सबसे फ़ायदेमंद खाना है। खजूर भी खाना है, यानी उसे रोटी के साथ खाया जाता है। अंगूर खाना भी है और फल भी। अंगूर रोटी के साथ खाना सुन्नत है। खजूर ताक़ गिनती में खाना सुन्नत है। किशमिश, अख़रोट और बादाम खाना सुन्नत है। शहद में शिफ़ा है। सत्तर नबियों ने शहद के लिए बरकत की दुआ की है। रसूलुल्लाह खजूर बहुत पसंद फ़रमाते थे। आप खजूर को ख़रबूज़े और तरबूज़ के साथ मिलाकर खाते थे। ख़रबूज़ा और तरबूज़ गुर्दों को साफ़ करते हैं, सिर का दर्द दूर करते हैं। ये पेट के कीड़े निकालते हैं। आँखों को ताक़त देते हैं। पुलाव खाते वक़्त दुरूद शरीफ़ पढ़ना चाहिए। नबी-ए-करीम ने बाक़ले को छिलके समेत खाने की तारीफ़ फ़रमाई। आपने फ़रमाया: “हब्बतुस सौदा, यानी कलौंजी, बीमारियों की दवा है।” अख़रोट को पनीर के साथ खाना शिफ़ा है। इन्हें अकेले खाना नुक़सानदेह है। इन्हें किसी चीज़ के साथ मिलाकर खाना चाहिए। नबी-ए-करीम अंगूर का गुच्छा बाएँ हाथ में लेते और अंगूर दाहिने हाथ से खाते थे।48 बिही दिल की घुटन दूर करती है। हर ख़रबूज़े, तरबूज़ और अनार में जन्नत के पानी की एक बूँद है। अनार अकेले खाना चाहिए, उसकी एक बूँद भी ज़ाया नहीं होनी चाहिए। अनार दिल की धड़कन के लिए अच्छा है। यह मेदे को मज़बूत करता है। उसे गूदे समेत निचोड़कर पिया जाए तो सफ़रा निकालता है और क़ब्ज़ दूर करता है। अंजीर दिल को फ़रहत देता है। यह पीठ और कंधों का दर्द और हाज़मे के अंगों का दर्द दूर करता है।

हरा खीरा नमक के साथ खाना, और अख़रोट को खजूर और शहद के साथ खाना रसूलुल्लाह की सुन्नत है।49 हमारे नबी ने बैंगन की तारीफ़ फ़रमाई और फ़रमाया: “इसे ज़ैतून के तेल में पकाओ।”

आपने कुलफ़े के साग की भी तारीफ़ फ़रमाई। अजमोद भुलक्कड़पन दूर करता है। यह पेशाब लाता है। ख़ून और दूध बनाता है। जिगर को साफ़ करता है। हरशफ़, यानी आर्टिचोक, पित्ते की पथरी को घुला देता है, ख़ून को साफ़ करता है, रगों की सख़्ती में फ़ायदा देता है। यह पसीने की बू भी दूर करता है। किसी मुल्क में आने वाले का पहले थोड़ा कच्चा प्याज़ खा लेना सेहत के लिए अच्छा है। प्याज़ जरासीम से मुक़ाबले की ताक़त बढ़ाता है। प्याज़ के बाद अजमोद खाया जाए तो वह उसकी बुरी बू दूर कर देता है। कहा गया है कि सुदाब की बूटी खाने के साथ खाने से भी उसकी बू चली जाती है। रसूलुल्लाह ने आख़िरी बार जो खाना तनावुल फ़रमाया, उसमें प्याज़ था। आप फ़रमाते थे: “प्याज़ और लहसुन पकाकर खाओ।” इनकी बू से फ़रिश्तों को तकलीफ़ होती है। मूली पेशाब लाती है। हाज़मे को आसान करती है।

नबी-ए-करीम की मुबारक दाढ़ी और बाल

नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के मुबारक बाल और दाढ़ी के बाल न बहुत घुँघराले थे, न बिल्कुल सीधे; पैदाइशी तौर पर लहरदार थे। आपके मुबारक बाल लंबे थे। शुरू में आप पेशानी पर बाल छोड़ते थे, बाद में माँग निकालकर उन्हें दोनों तरफ़ करने लगे। मुबारक बाल कभी बढ़ाते, और कभी कटवाकर छोटे कर लेते थे।

जब हज़रत अनस इब्ने मालिक से पूछा गया कि रसूलुल्लाह के मुबारक बाल कैसे थे, तो उन्होंने जवाब दिया: “न बहुत घुँघराले थे, न बिल्कुल सीधे। दोनों के बीच, दरमियाने थे। लंबाई में कानों और कंधों के ऊपरी हिस्से के बीच तक पहुँचते थे।”50 हज़रत इब्ने अब्बास ने कहा: “फ़ख़्र-ए-आलम अपने मुबारक बाल पेशानी पर छोड़ा करते थे। बाद में मुबारक बालों में माँग निकालने लगे।”51 आलिमों ने फ़रमाया: “बालों में माँग निकालकर उन्हें दोनों तरफ़ करना फ़ख़्र-ए-कायनात की सुन्नत है, क्योंकि बाद में आप ऐसा ही करने लगे थे। पेशानी पर छोड़ना भी जाइज़ है, और दोनों तरफ़ करना भी जाइज़ है। लेकिन माँग निकालना ज़्यादा अफ़ज़ल है।”

हमारी माँ हज़रत आइशा सिद्दीक़ा ने फ़रमाया: “नबी-ए-करीम के मुबारक बाल जुम्मा से ऊपर और वफ़रा से नीचे थे।”52 कंधों के सिरों तक पहुँचने वाले बालों को “जुम्मा” कहते हैं, और कान की लौ तक पहुँचने वाले बालों को “वफ़रा” कहते हैं। ग़रज़, हमारी माँ हज़रत आइशा की रिवायत के मुताबिक़ रसूलुल्लाह के मुबारक बाल कान की लौ से नीचे उतरते थे, लेकिन कंधों तक नहीं पहुँचते थे, यानी दोनों के बीच थे।

हज़रत क़ाज़ी इयाज़ ने फ़रमाया: “इन रिवायतों में मुताबक़त यूँ होती है: मुबारक कानों की तरफ़ के बाल मुबारक कानों की लौ तक आते थे, और पीछे के बाल मुबारक कंधों तक पहुँचते थे।” यह भी फ़रमाया गया है: “कुछ रिवायतों में यह कहा गया कि बाल कानों तक उतरते थे, और कुछ में यह कि मुबारक कंधों तक उतरते थे; इसकी वजह यह है कि एक वक़्त में ऐसे थे और दूसरे वक़्त में वैसे। सारी रिवायतें सही हैं। नबी-ए-करीम कभी अपने मुबारक बाल बढ़ाते थे, तो वे कंधों के सिरों तक उतर आते थे। और कभी कटवाते थे, तो वे मुबारक कानों की लौ या उनके बीच तक आते थे।” मर्दों के लिए सिर मुँडवाना, या बाल बढ़ाकर, कंघी करके माँग निकालना सुन्नत है। हालात, रिवाज और ज़माने के मुताबिक़ अमल करना चाहिए। बालों को बल देना और चोटी गूँथना मकरूह है। चेहरे को औरत की तरह चिकना बनाना, औरतों की मुशाबहत के लिए दाढ़ी मुँडवाना, ठोड़ी मुँडवाकर गालों पर दाढ़ी बढ़ाना हराम है।

हज़रत अनस रसूलुल्लाह की मुबारक दाढ़ी को यूँ बयान करते हैं: “नबी-ए-करीम की मुबारक दाढ़ी में सफ़ेदी बहुत कम थी। मुबारक सिर और मुबारक दाढ़ी में सफ़ेद बाल सत्रह या अठारह से ज़्यादा नहीं थे।”

एक दिन हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ ने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! आपके बाल सफ़ेद हो गए।” तो रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “मुझे हूद, वाक़िआ, मुरसलात, नबा (अम्मा यतसाअलून) और तकवीर (इज़श शम्सु कुव्विरत) सूरतों ने बूढ़ा कर दिया।”53

यानी इन सूरतों में जन्नत और जहन्नम के हालात का बहुत ज़िक्र है। आपने फ़रमाया: “मेरी उम्मत का क्या हाल होगा, इसी ग़म और फ़िक्र से मेरे बाल और मेरी दाढ़ी सफ़ेद हो गए।” अम्र इब्ने शुऐब ने फ़रमाया: “रसूलुल्लाह अपनी मुबारक दाढ़ी की चौड़ाई और लंबाई में से कुछ कतर लेते थे।” हज़रत तिरमिज़ी की बयान की हुई हदीस शरीफ़ में नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “जो अपनी मूँछ छोटी न करे, वह हम में से नहीं।”54 एक और हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “अपनी दाढ़ियाँ बढ़ाओ और मूँछें अच्छी तरह कतरो।”55 इब्ने अब्दुल हकीम ने फ़रमाया: “मूँछ अच्छी तरह कतरनी चाहिए और दाढ़ी नहीं काटनी चाहिए। मूँछ अच्छी तरह कतरने से मुराद उसे मुँडवाना नहीं है।” हज़रत इमाम नववी ने फ़रमाया: “मूँछ कतरने में मुनासिब यह है कि होंठ का किनारा दिखाई देने तक कतरी जाए, बिल्कुल जड़ से न काटी जाए, बस छोटी की जाए।”

“प्याज़ और लहसुन पकाकर खाओ” हदीस शरीफ़

आलिमों ने मूँछ का ऊपरी हिस्सा कतरकर दोनों तरफ़ उसके सिरे लटकते छोड़ देने को मकरूह समझा है। इब्ने उमर बयान करते हैं: “रसूलुल्लाह के सामने मजूसियों (आतिशपरस्तों) के एक गिरोह का ज़िक्र किया गया। इस पर रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: ‘वे अपनी मूँछों के सिरे बढ़ाते हैं और दाढ़ियाँ मुँडवाते हैं। तो तुम उनकी मुख़ालफ़त करो।’”56

अबू उमामा ने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! अहले किताब अपनी दाढ़ियाँ कतरते हैं और मूँछें बढ़ाते हैं।” तो रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “तुम अपनी मूँछों के सिरे कतरो और अपनी दाढ़ियाँ बढ़ाओ।”

आलिमों के बयान के मुताबिक़ मूँछों को कतरकर भौंहों के बालों जितना छोटा करना सुन्नत है। दाढ़ी को एक मुट्ठी लंबी रखना और एक मुट्ठी से ज़्यादा हिस्से को काट देना सुन्नत है। दाढ़ी को एक मुट्ठी से छोटी रखना भी सुन्नत के मुताबिक़ नहीं है। सुन्नत पर चलने की नीयत से छोटी दाढ़ी रखना बिदअत है, और बिदअत हराम है। दाढ़ी रखना सुन्नत-ए-ज़वाइद है। अम्र बिल मारूफ़ के लिए, रोज़ी (नफ़क़ा) कमाने के लिए और फ़ितना पैदा होने से बचने के लिए दाढ़ी को बिल्कुल मुँडवा देना जाइज़, बल्कि ज़रूरी हो जाता है। ये बातें सुन्नत छोड़ने के लिए उज़्र हैं। लेकिन छोटी दाढ़ी रखकर बिदअत करने के लिए उज़्र नहीं बनतीं।

नबी-ए-करीम के पहने हुए कपड़े

पहनने के लिए जाइज़ कपड़ों में से जो कुछ मिल जाता, आप वही पहन लेते थे। मोटे कपड़े की एहराम की तरह बिना सिली चीज़ें ओढ़ते, तहबंद बाँधते, कुरता और जुब्बा भी पहनते थे। ये रुई, ऊन या बालों से बुने हुए होते थे। अक्सर सफ़ेद, कभी हरा पहनते थे। कभी सिला हुआ लिबास भी पहनते थे। जुमा और ईदों में, विदेशी सफ़ीरों के आने पर और जंग के मौक़ों पर क़ीमती कुरते और जुब्बे पहनते थे। आपके कपड़ों का रंग अक्सर सफ़ेद होता था। कभी हरे, लाल और काले भी होते थे। आपके कपड़े बाज़ुओं को कलाइयों तक और मुबारक टाँगों को पिंडली के बीच तक ढकते थे। इमाम तिरमिज़ी (रहिमहुल्लाहु तआला) “शमाइल शरीफ़” किताब में फ़रमाते हैं: “रसूलुल्लाह क़मीस, यानी कुरता पहनना पसंद फ़रमाते थे। आपके कुरते की आस्तीनें कलाइयों तक लंबी थीं। कुरते की आस्तीनों और गरेबान में बटन नहीं थे। आपका जूता चमड़े का था, उसका एक तस्मा और दो क़िबाल थे। क़िबाल वह तस्मा है जिसका एक सिरा उस तस्मे से और दूसरा सिरा जूते के अगले सिरे से सिला होता है। यह दो उँगलियों के बीच से गुज़रता है। कपड़े और जूते पहनने में रिवाज की पैरवी की जाती है। रिवाज से हटना शोहरत का सबब बनता है। शोहरत से बचना ज़रूरी है। मक्का में दाख़िल होने के वक़्त आपके मुबारक सिर पर काला अमामा बँधा हुआ था।” आप अक्सर सफ़ेद, कभी काला मलमल सिर पर अमामे की तरह बाँधते और उसका सिरा दोनों कंधों के बीच एक बालिश्त के क़रीब लटकाते थे। आपका अमामा न बहुत बड़ा था, न बहुत छोटा; लगभग साढ़े तीन मीटर लंबा था। आप अमामा टोपी के बग़ैर भी बाँधते थे, और कभी अमामे के बग़ैर सिर्फ़ सिलाईदार टोपी पहनते थे। नबी-ए-करीम का रुई और कतान के धागे से बुने हुए धारीदार यमनी कपड़े का हिबरा नाम का एक लिबास था। आप यह लिबास पहनना बहुत पसंद फ़रमाते थे। नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का एक सफ़ेद लिबास भी था। आप फ़रमाते थे: “अपने कपड़ों में से सफ़ेद पहनो! तुम्हारे ज़िंदा लोग सफ़ेद कपड़े पहनें। और अपने मुर्दों को भी सफ़ेद कफ़न में लपेटो, क्योंकि यह तुम्हारे लिबासों में सबसे बेहतर और सबसे अच्छा है!”57

“जो शोहरत और दिखावे के लिए कपड़ा पहनता है, अल्लाह उससे मुँह फेर लेता है, जब तक वह उसे उतार न दे! क़यामत के दिन वह उसे ज़िल्लत का लिबास पहनाएगा!” हदीस शरीफ़

हमारे नबी को हरा लिबास पहने हुए भी देखा गया है। हज़रत अबू रिम्सा बयान करते हैं कि उन्होंने हमारे नबी को ऊपर-नीचे दो टुकड़ों वाला हरा लिबास पहने देखा।58 हमारे नबी धारीदार हुल्ला भी पहनते थे। हज़रत बरा इब्ने आज़िब ने कहा: “लाल (धारीदार) हुल्ला नाम का लिबास पहने हुए, कान की लौ तक बालों वाले लोगों में मैंने रसूलुल्लाह (अलैहिस्सलाम) से ज़्यादा ख़ूबसूरत किसी को नहीं देखा!”59 हमारे नबी का एक लाल जुब्बा था, जिसे आप जुमे और ईदों में पहनते थे। हमारे नबी का यमन का सिला हुआ एक जुब्बा भी था। हमारे नबी दमिश्क़ में सिला हुआ तंग आस्तीनों वाला जुब्बा सफ़र में पहनते थे। हमारे नबी का एक जुब्बा ईरान के बादशाहों के पहनने के तैलसान कपड़े से बना था; उसके गरेबान पर अतलस का टुकड़ा लगा था और दामन के आगे-पीछे के दोनों चाकों और आस्तीनों पर अतलस की गोट थी। यह जुब्बा हमारे नबी जंगों में दुश्मन से आमना-सामना होने के वक़्त पहनते थे।

यह जुब्बा हज़रत आइशा की वफ़ात तक उनके पास रहा, उनके बाद अस्मा बिन्ते अबी बक्र ने उसे ले लिया। हमारे नबी का पहना हुआ यह जुब्बा जिस पानी से धोया जाता, उस पानी से बीमारों को नहलाया जाता और वे शिफ़ा पाते थे।60 दूमतुल जंदल के ग़ज़वे में हासिल हुए माल-ए-ग़नीमत में से एक जुब्बा हमारे प्यारे नबी के हिस्से में आया। उसका ताना-बाना कच्चे रेशम के धागे से बुना हुआ था, कपड़ा अतलस का था, और कढ़ाई की जगहों पर सोने के तार से खजूर के पत्ते काढ़े गए थे। नबी-ए-करीम यह जुब्बा पहनकर मिम्बर पर तशरीफ़ ले गए, बैठे, और कुछ फ़रमाए बग़ैर मिम्बर से उतर आए। सहाबा-ए-किराम उसे हाथ लगाते, देखते और उसकी ख़ूबसूरती पर हैरान होते थे। नबी-ए-करीम ने पूछा: “क्या तुम इसकी ख़ूबसूरती पर ताज्जुब कर रहे हो? क्या यह तुम्हें बहुत पसंद आया?” उन्होंने अर्ज़ किया: “हमने इससे ज़्यादा ख़ूबसूरत लिबास कभी नहीं देखा!” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “उस अल्लाह की क़सम, जिसके क़ब्ज़ा-ए-क़ुदरत में मेरी जान है, जन्नत में साद इब्ने मुआज़ के रूमाल उस चीज़ से कहीं ज़्यादा ख़ूबसूरत और अच्छे हैं जो तुम देख रहे हो!”

नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “जो शोहरत और दिखावे के लिए कपड़ा पहनता है, अल्लाह उससे मुँह फेर लेता है, जब तक वह उसे उतार न दे! क़यामत के दिन वह उसे ज़िल्लत का लिबास पहनाएगा!”

और नबी-ए-करीम ने यह भी फ़रमाया: “जो शोहरत और दिखावे के लिए कपड़ा पहनता है, क़यामत के दिन अल्लाह उसे वैसा ही लिबास पहनाएगा। फिर उसमें आग भड़का देगा!”

हज़रत सह्ल इब्ने साद कहते हैं: “एक औरत रसूलुल्लाह (अलैहिस्सलाम) के पास अपनी बुनी हुई किनारीदार एक बुर्दा61 लाई और अर्ज़ किया: ‘या रसूलल्लाह! इसे मैंने अपने हाथ से बुना है। आपकी बुलंद ज़ात के लिए तोहफ़े के तौर पर लाई हूँ।’ रसूलुल्लाह ने उसका तोहफ़ा क़बूल फ़रमाया। आप उस बुर्दा को ओढ़े हुए हमारे पास तशरीफ़ लाए। लोगों में से एक साहब ने उसे हाथ लगाकर कहा: ‘या रसूलल्लाह! इस बुर्दा से ज़्यादा ख़ूबसूरत कोई चीज़ नहीं हो सकती! क्या आप यह मुझे देंगे?’ रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: ‘ठीक है!’ मस्जिद में हमसे बातचीत और नसीहत फ़रमाने के बाद आप घर लौटे और बुर्दा लपेटवाकर उन साहब के पास भेज दी। लोगों ने उन्हें यह कहकर मलामत की: ‘तुमने बिल्कुल अच्छा नहीं किया! रसूलुल्लाह जो चीज़ पहने हुए थे और जिसकी आपको ज़रूरत थी, वह तुमने आपसे माँग ली! तुम भी जानते हो कि रसूलुल्लाह (अलैहिस्सलाम) किसी माँगने वाले को कभी रद्द नहीं करते, ख़ाली हाथ नहीं लौटाते!’ उन्होंने कहा: ‘अल्लाह की क़सम, मैंने इसे पहनने के लिए नहीं माँगा, बल्कि इसलिए माँगा कि जिस दिन मैं मरूँ, यह मेरा कफ़न बने!’ और सचमुच वह बुर्दा उनके इंतिक़ाल के दिन उनका कफ़न बनी।”62 हमारे नबी ने काला ऊनी लिबास भी पहना है। हमारी माँ हज़रत आइशा ने कहा: “रसूलुल्लाह (अलैहिस्सलाम) के लिए काली ऊन का एक लिबास बनाया गया था। उसे पहनकर जब आपको पसीना आया, तो आपने ऊन की बू महसूस की। आपने फ़ौरन उसे उतारकर रख दिया, क्योंकि आप सिर्फ़ अच्छी ख़ुशबू ही पसंद फ़रमाते थे।” नबी-ए-करीम ऊपर पहने जाने वाले क़फ़्तान (लंबे चोग़े) का दामन सिर्फ़ पिंडली के बीच तक, या उससे कुछ नीचे टख़नों तक लटकाने की इजाज़त देते थे, और टख़नों से नीचे, यानी ज़मीन पर घिसटने जितना लटकाने से मना फ़रमाते थे। आप फ़रमाते थे कि जो मर्द तकब्बुर से अपने क़फ़्तान ज़मीन पर घसीटते हैं, क़यामत के दिन बुलंद व बरतर अल्लाह उनकी तरफ़ रहमत की नज़र से नहीं देखेगा।

एक दिन नबी-ए-करीम ने हज़रत जाबिर इब्ने सुलैम से फ़रमाया: “अपने क़फ़्तान का दामन पिंडली के बीच तक लटकाओ! यह न कर सको तो टख़नों तक लटकाओ! ज़मीन पर घिसटने जितना लटकाने से बचो, क्योंकि यह तकब्बुर की निशानी है, और अल्लाह तआला तकब्बुर को पसंद नहीं करता!” इसी वजह से अब्दुल्लाह इब्ने उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) अपना क़फ़्तान पिंडलियों के बीच तक लटकाकर पहनते थे।63

“मैं यमन की तरफ़ से रहमत की हवा चलती महसूस करता हूँ” हदीस शरीफ़

नबी-ए-करीम का एक तह वाले सूती धागे से बुने हुए कपड़े का एक कुरता था। हमारी माँ हज़रत आइशा बयान करती हैं: हज़रत अबू जह्म ने नबी-ए-करीम को एक नक़्शदार जानमाज़ तोहफ़े में दी थी। एक दिन नबी-ए-करीम उस जानमाज़ पर नमाज़ पढ़ रहे थे कि आपकी मुबारक आँखें उसके नक़्श पर अटक गईं। सलाम फेरने के बाद आपने फ़रमाया: “इसे अबू जह्म के पास ले जाओ। अभी इसने मुझे मेरी नमाज़ में मशग़ूल कर दिया। वह मुझे बिना नक़्श की सादा जानमाज़ ला दें।”

मदीना की मिट्टी नम और शोर वाली होने की वजह से नबी-ए-करीम की वफ़ात पर यह जानमाज़ आपकी मुबारक क़ब्र की तह में बिछाई गई।

हज़रत उवैस क़रनी को भेजा हुआ ख़िरक़ा-ए-शरीफ़

उवैस इब्ने आमिर क़रनी (रज़ियल्लाहु अन्हु) ताबिईन के बुज़ुर्गों में से हैं। वह यमन के क़र्न गाँव के थे। मुसलमान होने के बाद पूरी ज़िंदगी वह हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के इश्क़ में जलते-तड़पते रहे, एक पल के लिए भी अपने रब को नहीं भूले। बंदगी में वह इस दर्जे तक पहुँचे कि उनका हर हाल, हर हरकत और हर बात लोगों के लिए इबरत और नसीहत बन गई। न वह किसी से रंजीदा हुए, न उन्होंने किसी को रंज पहुँचाया। उनकी सबसे अहम सिफ़तें नबी-ए-करीम से इश्क़, जान-ओ-दिल से इबादत पर क़ायम रहना और अपनी वालिदा का अदब थीं। उन्होंने अपनी वालिदा की बहुत ख़िदमत की और उनकी नेक दुआ हासिल की। हमारे प्यारे नबी से उनकी यह मुहब्बत और इस्लाम से उनका लगाव ही वह सबब बना जिसकी वजह से नबी-ए-करीम ने उनकी तारीफ़ फ़रमाई। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) वक़्तन-फ़वक़्तन अपना मुबारक चेहरा यमन की तरफ़ फेरकर फ़रमाते: “मैं यमन की तरफ़ से रहमत की हवा चलती महसूस करता हूँ।” और यह भी फ़रमाया: “क़यामत में अल्लाह तआला उवैस की सूरत में सत्तर हज़ार फ़रिश्ते पैदा करेगा, और वे उवैस को अपने बीच अरसात में ले जाएँगे। वह जन्नत में जाएँगे, और अल्लाह तआला जिसे चाहे (जिसे बता दे), उसके सिवा कोई मख़लूक़ नहीं जानेगी कि उनमें उवैस कौन हैं।” “मेरी उम्मत में एक शख़्स है, जो क़यामत में रबीआ और मुज़र क़बीलों की भेड़ों के बालों की गिनती के बराबर लोगों की शफ़ाअत करेगा।” सहाबा-ए-किराम ने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! वह कौन हैं?” आपने फ़रमाया: “अल्लाह के बंदों में से एक।” उन्होंने अर्ज़ किया: “हम सब बंदे हैं; उनका नाम क्या है?” आपने फ़रमाया: “उवैस।” उन्होंने पूछा: “वह कहाँ के हैं?” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “क़र्न के।” जब पूछा गया: “क्या उन्होंने आपको देखा है?” तो आपने फ़रमाया: “सिर की आँखों से नहीं देखा।”

उन्होंने अर्ज़ किया: “ताज्जुब है कि वह आपके इतने आशिक़ हों और फिर भी आपकी ख़िदमत और सोहबत के लिए दौड़े चले न आएँ।” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “दो वजहों से। पहली यह कि वह अपने हाल से मग़लूब हैं। दूसरी, मेरे दीन से उनकी वफ़ादारी की वजह से। उनकी एक बूढ़ी वालिदा हैं, जो ईमान ला चुकी हैं। उनकी आँखें नहीं देखतीं, उनके हाथ-पाँव हरकत नहीं करते। उवैस दिन में ऊँट चराने का काम करते हैं और जो मज़दूरी मिलती है उसे अपनी और अपनी वालिदा की रोज़ी पर ख़र्च करते हैं।” उन्होंने अर्ज़ किया: “क्या हम उन्हें देखेंगे?” आपने हज़रत अबू बकर से फ़रमाया: “तुम उन्हें अपने ज़माने में नहीं देखोगे।” और हज़रत उमर और हज़रत अली से फ़रमाया: “तुम उन्हें देखोगे। उनके बदन पर बाल बहुत हैं। उनकी बाईं पसली पर और हथेली में चाँदी के एक सिक्के के बराबर सफ़ेदी है। यह बरस की बीमारी की सफ़ेदी नहीं है। जब उनके पास जाओ तो मेरा सलाम कहना और उनसे कहना कि मेरी उम्मत के लिए दुआ करें।”

हज़रत उवैस क़रनी (उवैस अल-क़रनी) अपनी वालिदा के इंतिक़ाल के बाद क़र्न गाँव से निकलकर कूफ़ा शहर चले गए। जब नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की वफ़ात क़रीब आई तो अर्ज़ किया गया: “आपका ख़िरक़ा हम किसे दें?” आपने फ़रमाया: “उवैस अल-क़रनी को देना।” रसूलुल्लाह की वफ़ात के बाद जब हज़रत उमर और हज़रत अली कूफ़ा आए, तो हज़रत उमर ने फ़रमाया: “ऐ नज्द वालो! क्या तुम्हारे बीच क़र्न का कोई आदमी है?” उन्होंने कहा: “हाँ।” उन्होंने उनसे हज़रत उवैस के बारे में पूछा। उन्होंने कहा: “हम उसे जानते हैं। जिसे आप ढूँढ रहे हैं, उसके मुक़ाबले में वह बहुत मामूली आदमी है। वह दीवाना है, बेअक़्ल है और लोगों से भागता फिरता है।”

“या रब! इस ख़िरक़ा-ए-शरीफ़ के सदक़े, हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सदक़े, पूरी उम्मत-ए-मुहम्मदिया को माफ़ फ़रमा दे” हज़रत उवैस (रज़ियल्लाहु अन्हु)

ख़िरक़ा-ए-शरीफ़

हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हज़रत उवैस क़रनी (रहमतुल्लाहि अलैहि) को तोहफ़े में जो मुबारक ख़िरक़ा दिया था, उसकी ज़ियारत मुबारक रमज़ान के महीने में इस्तांबुल के फ़ातिह इलाक़े की ख़िरक़ा-ए-शरीफ़ मस्जिद में की जा सकती है।

हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने फ़रमाया: “मैं उसी को ढूँढ रहा हूँ; वह कहाँ है?” उन्होंने कहा: “वह अरना की वादी में हमारे ऊँट चराता है, और बदले में हम उसे रात का खाना देते हैं। उसके बाल और दाढ़ी बिखरे रहते हैं, शहरों में नहीं आता, किसी से बातचीत नहीं करता, लोग जो खाते हैं वह नहीं खाता। वह न ग़म जानता है, न ख़ुशी: लोग हँसते हैं तो वह रोता है, लोग रोते हैं तो वह हँसता है।” हज़रत उमर ने फ़रमाया: “मैं ठीक उसी को ढूँढ रहा हूँ।” उन्होंने उनकी जगह का पता बता दिया। हज़रत उमर और हज़रत अली उनके पास गए। उन्होंने उन्हें नमाज़ पढ़ते पाया। अल्लाह तआला ने उनके ऊँट चराने के लिए एक फ़रिश्ता मुक़र्रर कर दिया था। उवैस ने नमाज़ पूरी करके सलाम फेरा, तो हज़रत उमर उठे और सलाम किया। उन्होंने सलाम का जवाब दिया। हज़रत उमर ने पूछा: “तुम्हारा नाम क्या है?” उन्होंने कहा: “अब्दुल्लाह, यानी अल्लाह का बंदा।” हज़रत उमर ने पूछा: “हम सब अल्लाह के बंदे हैं; तुम्हारा असली नाम क्या है?” तो उन्होंने कहा: “उवैस।” हज़रत उमर ने फ़रमाया: “अपना दाहिना हाथ दिखाओ।” जब उन्होंने दिखाया, तो हज़रत उमर ने यूँ फ़रमाया:

“नबी-ए-करीम ने तुम्हें सलाम कहा है। आपने अपना मुबारक ख़िरक़ा तुम्हारे लिए भेजा है और यह वसीयत फ़रमाई है: ‘वह इसे लेकर पहन लें और मेरी उम्मत के लिए दुआ करें।’”

उवैस ने कहा: “ऐ उमर! मैं एक कमज़ोर, आजिज़ और गुनाहगार बंदा हूँ।

ग़ौर से देख लीजिए, कहीं यह वसीयत किसी और के बारे में तो नहीं?” इस पर हज़रत उमर ने जवाब दिया: “नहीं, ऐ उवैस! जिसे हम ढूँढ रहे हैं, वह तुम ही हो। नबी-ए-करीम ने तुम्हारी शक्ल-सूरत और सिफ़तें साफ़-साफ़ बता दी थीं।”

इस पर हज़रत उवैस ने ख़िरक़ा-ए-शरीफ़ को अदब से लिया, उसे चूमा, सूँघा, अपने चेहरे और आँखों से लगाया। वह बहुत रोए और “आप लोग यहीं इंतिज़ार कीजिए” कहकर उनके पास से चले गए। कुछ दूर जाकर सज्दे में गिर पड़े। आँसुओं के साथ अल्लाह तआला से गिड़गिड़ाने लगे, उम्मत-ए-मुहम्मदिया की माफ़ी के लिए दुआ करने लगे। हिचकियाँ ले-लेकर रोते और गिड़गिड़ाते हुए उन्होंने यूँ दुआ की: “या रब! हमारे प्यारे नबी ने, हालाँकि मैं इसके लायक़ नहीं, तेरे इस फ़क़ीर और आजिज़ बंदे को हज़रत उमर और हज़रत अली के हाथ अपना ख़िरक़ा-ए-शरीफ़ भेजा है। फ़रमाया है कि वह मेरी गुनाहगार उम्मत के लिए दुआ करे। या रब! इस ख़िरक़ा-ए-शरीफ़ के सदक़े, हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सदक़े, पूरी उम्मत-ए-मुहम्मदिया को माफ़ फ़रमा दे… माफ़ फ़रमा दे, या अल्लाह, माफ़ फ़रमा दे… या अल्लाह…” जब उन्हें बताया गया कि बहुत-से गुनाहगार मुसलमान माफ़ कर दिए गए हैं, तो उन्होंने ख़िरक़ा-ए-शरीफ़ अदब से पहन लिया।

उवैस क़रनी को तोहफ़े में दिया गया यह ख़िरक़ा-ए-शरीफ़ वान के आस-पास के इरिसान बेगों तक पहुँचा और 1618 में उस्मानी बादशाहों में से सुल्तान ओस्मान ख़ान सानी के पास लाकर तोहफ़े में पेश किया गया। सुल्तान अब्दुल मजीद ख़ान ने इस ख़िरक़ा-ए-शरीफ़ के लिए फ़ातिह में “ख़िरक़ा-ए-शरीफ़ मस्जिद” नाम की मस्जिद बनवाई। शहद के झाग जैसे क्रीम रंग का यह मुबारक ख़िरक़ा-ए-शरीफ़ हमारे प्यारे और इज़्ज़त वाले नबी के मुबारक जिस्म की गुलाब जैसी ख़ुशबू आज भी उसी ताज़गी के साथ अपने अंदर लिए हुए है। यह हर साल मुबारक रमज़ान के महीने में शीशे के पीछे लोगों को ज़ियारत के लिए दिखाया जाता है।

हज़रत कअब इब्ने ज़ुहैर को दिया हुआ ख़िरक़ा-ए-सआदत

शायरों के ख़ानदान के बेटे हज़रत कअब इब्ने ज़ुहैर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ख़ुद भी शायर थे। पहले वह नबी-ए-करीम और इस्लाम के ख़िलाफ़ शेर कहता था। नबी-ए-करीम को इसकी ख़बर दी गई, तो आपने हुक्म दिया कि वह जहाँ भी दिखाई दे, उसे क़त्ल कर दिया जाए।

“मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ माबूद नहीं। मुहम्मद अलैहिस्सलाम उसके बंदे और रसूल हैं” कअब इब्ने ज़ुहैर (रज़ियल्लाहु अन्हु)

उसके भाई हज़रत बुजैर (रज़ियल्लाहु अन्हु) उससे पहले मुसलमान हो चुके थे। उन्होंने उसे ख़त लिखकर इस फ़ैसले की ख़बर दी और लिखा कि अगर वह मुसलमान हो जाए, तो रहमत के समुंदर हमारे प्यारे नबी उसे माफ़ कर देंगे। ख़त पढ़कर हज़रत कअब गहरी सोच में डूब गए। वह समझने लगे कि बुतों को पूजना बेमानी है, इस्लाम कितना बुलंद है और नबी-ए-करीम की अज़मत क्या है; उनका दिल रौशन होने लगा। आख़िरकार मुसलमान होने का इरादा करके वह नूरानी मदीना की राह पर निकल पड़े। उन्होंने नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की तारीफ़ में और अपने तौबा करके मुसलमान हो जाने के एलान में एक लंबी नज़्म लिखी। मदीना पहुँचकर वह जुहैना क़बीले के अपने एक दोस्त के साथ नबी-ए-करीम की ख़िदमत में हाज़िर हुए। नबी-ए-करीम अपने सहाबा के साथ बातचीत फ़रमा रहे थे। हज़रत कअब ने अपना तआरुफ़ कराने से पहले अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! कअब इब्ने ज़ुहैर अपने किए पर शर्मिंदा होकर, मुसलमान बनकर अमान माँगने आया है। अगर मैं उसे आपके पास ले आऊँ, तो क्या आप उसे अमान देकर उसका मुसलमान होना क़बूल फ़रमाएँगे?” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “हाँ।” इस पर हज़रत कअब ने कहा: “मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ माबूद नहीं। मुहम्मद अलैहिस्सलाम उसके बंदे और रसूल हैं।” नबी-ए-करीम ने पूछा: “तुम कौन हो?” उन्होंने अर्ज़ किया: “मैं कअब इब्ने ज़ुहैर हूँ, या रसूलल्लाह।” अन्सार में से एक साहब ने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह, इजाज़त दीजिए, आपकी मुख़ालफ़त करने वाले इस शख़्स की गर्दन उड़ा दूँ।” तो नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “इसे छोड़ दो। यह अपनी पिछली हालत पर शर्मिंदा होकर और हक़ की तरफ़ लौटकर आया है।” इसके बाद कअब इब्ने ज़ुहैर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अपना वह मशहूर क़सीदा पढ़ा, जिसमें उन्होंने अपने मुसलमान होने का हाल बयान किया था और हमारे प्यारे नबी और सहाबा-ए-किराम की अज़मत और क़द्र की तारीफ़ की थी। “बानत सुआद / महबूबा दूर हो गई” के अल्फ़ाज़ से शुरू होने वाला और यूँ आगे बढ़ने वाला यह क़सीदा नबी-ए-करीम को बहुत पसंद आया:

हर इंसान को एक दिन ज़रूर ताबूत पर उठाया जाएगा…
उज़्र पेश करता हुआ आया हूँ, या रसूलल्लाह, आपके बुलंद दरबार में…
उनकी माफ़ी ही सबसे बढ़कर उम्मीद की चीज़ है…
उनके दरबार में उज़्र क़बूल किया जाता है…
मुझ पर रहम कीजिए, या रसूलल्लाह…
मुझे माफ़ कर दीजिए, या रसूलल्लाह…
बेशक रसूलुल्लाह हक़ तआला की
बुराइयों को मिटाने वाली तेज़ तलवारों में से एक नंगी तलवार हैं…
वह हिदायत बिखेरने वाले, सीधा रास्ता दिखाने वाले नूर हैं…

आपने उन्हें माफ़ कर दिया, और जब कअब इस शेर पर पहुँचे:

इन्नर रसूला ल नूरुन युस्तज़ाउ बिही,
मुहम्मदुन मिन सुयूफ़िल्लाहि मस्लूलू।
रसूलुल्लाह एक नूर हैं, जिनसे मख़लूक़ रौशनी पाती है,
वह हक़ तआला की खिंची हुई तलवारों में से एक तलवार हैं।

तो दोनों जहान के सरवर, फ़ख़्र-ए-आलम मुहम्मद मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने मुबारक कंधों से “ख़िरक़ा-ए-सआदत” नाम का अपना ख़िरक़ा उतारकर हज़रत कअब इब्ने ज़ुहैर के कंधों पर डाल दिया।64

हज़रत मुआविया ने अपनी ख़िलाफ़त के ज़माने में कअब इब्ने ज़ुहैर को पैग़ाम भेजा: “रसूलुल्लाह का ख़िरक़ा हमें बेच दो!” और उन्हें दस हज़ार दिरहम भेजे। कअब इब्ने ज़ुहैर ने यह कहकर हज़रत मुआविया की ख़्वाहिश ठुकरा दी: “रसूलुल्लाह का ख़िरक़ा पहनने के मामले में मैं किसी को अपने ऊपर तरजीह नहीं दे सकता!” जब हज़रत कअब इब्ने ज़ुहैर का इंतिक़ाल हुआ, तो हज़रत मुआविया ने वह ख़िरक़ा कअब के बेटों से बीस हज़ार दिरहम में ख़रीद लिया। हमारे नबी का हज़रत कअब इब्ने ज़ुहैर को दिया हुआ यह मुबारक ख़िरक़ा ख़लीफ़ा से ख़लीफ़ा तक विरासत में चलता रहा।

उमवी सल्तनत के ख़ात्मे के बाद अब्बासियों के पहले ख़लीफ़ा अबुल अब्बास सफ़्फ़ाह इब्ने अब्दुल्लाह इब्ने मुहम्मद ने इसे तीन सौ दीनार में ख़रीद लिया। ईदों में ख़लीफ़ा इसे पहनते रहे। अब्बासी जब मिस्र आए तो इसे अपने साथ ले आए। जब हज़रत यावुज़ सुल्तान सलीम ख़ान मिस्र फ़तह करके ख़लीफ़ा बने, तो यह मुबारक ख़िरक़ा मिस्र में मौजूद दूसरी “मुबारक अमानतों” के साथ इस्तांबुल लाया गया। इस्तांबुल में तोपकापी महल के “ख़िरक़ा-ए-सआदत के दाइरे” में हर कोई इसकी ज़ियारत कर सकता है।

यह मुबारक ख़िरक़ा 124 सेंटीमीटर लंबा, चौड़ी आस्तीनों वाला और काले ऊनी कपड़े का बना हुआ है। ख़िरक़े का अस्तर क्रीम रंग के ऊनी कपड़े का है। कई बुक़चों में लपेटा हुआ यह ख़िरक़ा सुल्तान मुराद ख़ान सालिस के बनवाए हुए, ऊपर से खुलने वाले ढक्कन के सोने के एक संदूक़ में रखा हुआ है। ख़िरक़ा-ए-सआदत का यह संदूक़ फ़न के लिहाज़ से बेमिसाल है, और इस पर ज़मुर्रद भी जड़े हुए हैं। संदूक़ पर लिखा है:

“ला इलाह इल्लल्लाह, व मा अर्सलनाका इल्ला रहमतल लिल आलमीन। ला इलाह इल्लल्लाहुल मलिकुल हक़्क़ुल मुबीन, मुहम्मदुर रसूलुल्लाह, अस-सादिक़ुल वअदिल अमीन।”

नबी-ए-करीम का बिस्तर

नबी-ए-करीम जिस बिस्तर पर लेटकर सोते थे, उसका ग़िलाफ़ चमड़े का था। उसके अंदर खजूर की छाल का रेशा भरा हुआ था। उस पर आप भी सोते थे और आपकी ज़ौजा भी। हमारे नबी अपने मुबारक सिर के नीचे जो तकिया रखते थे, उसका ग़िलाफ़ भी चमड़े का था और उसमें खजूर का रेशा भरा हुआ था। नबी-ए-करीम दुनिया और दुनिया की चीज़ों को अहमियत नहीं देते थे।

अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद बयान करते हैं: कायनात के सरदार एक चटाई (हसीर) पर लेटकर सो गए थे, और चटाई ने आपके मुबारक पहलू पर निशान डाल दिए थे। जब आप जागे तो मैंने आपके मुबारक पहलू को सहलाते हुए अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह, मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान! काश आप हमें बता देते, तो हम चटाई के ऊपर आपके लिए कोई ऐसी चीज़ बिछा देते जो आपको इससे बचाती!” फिर अर्ज़ किया: “क्यों न हम आपके लिए एक नर्म बिस्तर ले लें?”

कायनात के सरदार ने फ़रमाया: “दुनिया की चीज़ों से मुझे क्या ग़रज़? दुनिया के साथ मेरी मिसाल, मेरा हाल उस सवार की मिसाल और हाल की तरह है, जो एक पेड़ के नीचे थोड़ी देर छाँव में आराम करने के बाद उसे छोड़कर अपनी राह पर चल पड़ता है!”65 हमारी माँ हज़रत आइशा बयान करती हैं: अन्सार में से एक औरत मेरे पास आई। रसूल अलैहिस्सलाम का बिस्तर देखकर वह चली गई और ऊन भरा हुआ एक बिस्तर भेज दिया।

रसूल अलैहिस्सलाम मेरे पास तशरीफ़ लाए और पूछा: “यह क्या है?” मैंने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! अन्सार की फ़ुलाँ औरत मेरे पास आई थी। आपका बिस्तर देखकर गई और आपके लिए यह भेज दिया।” आपने फ़रमाया: “इसे अभी उसे वापस कर दो!” लेकिन मैंने वापस नहीं किया। उसका मेरे घर में होना मुझे अच्छा लगा था। रसूल अलैहिस्सलाम ने अपनी यह बात तीन बार दोहराई। आख़िर में फ़रमाया: “अल्लाह की क़सम, ऐ आइशा! अगर मैं चाहता, तो अल्लाह सोने और चाँदी के पहाड़ मेरे साथ चला देता!”66 नबी अलैहिस्सलाम का गद्दा भी दो अबाओं से बना था।

“रसूलुल्लाह सोने और लोहे की अँगूठियाँ उतरवा देते थे, चाँदी की अँगूठियों से मना नहीं फ़रमाते थे” अम्र इब्ने शुऐब (रज़ियल्लाहु अन्हु)

एक रात जब आप मेरे पास तशरीफ़ लाए, तो मैंने इस अबा को दोहरा तह करके तंग कर दिया था। आप उस पर सोए। फिर पूछा: “ऐ आइशा! आज रात मेरा बिस्तर हमेशा जैसा क्यों नहीं था?” मैंने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! मैंने उसे आपके लिए तह करके तंग कर दिया था।” आपने फ़रमाया: “तुम उसे पहले जैसा कर दो!”67

हज़रत आइशा यह भी बयान करती हैं: “क़ुरैश के लिए मक्का में तख़्त (सरीर) पर सोने से ज़्यादा आरामदेह कोई चीज़ नहीं थी। रसूल अलैहिस्सलाम जब मदीना तशरीफ़ लाकर अबू अय्यूब के घर ठहरे, तो उनसे पूछा: ‘ऐ अबू अय्यूब! क्या तुम्हारे पास कोई तख़्त नहीं है?’ अबू अय्यूब ने अर्ज़ किया: ‘अल्लाह की क़सम, नहीं है।’ अन्सार में से साद इब्ने ज़ुरारा (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने यह सुना, तो रसूलुल्लाह के लिए एक तख़्त भेजा, जिसके पाए सागौन की लकड़ी के बने थे और जिस पर कतान के रेशे से बुनी हुई चटाई चढ़ी हुई थी। रसूलुल्लाह अपने घर में मुंतक़िल होने तक उसी पर सोते रहे, और वफ़ात तक भी उसी पर सोए। रसूलुल्लाह (अलैहिस्सलाम) को ग़ुस्ल देकर कफ़न पहनाया गया तो आपको उसी तख़्त पर रखा गया, और जनाज़े की नमाज़ भी इसी हाल में पढ़ी गई कि आप उसी तख़्त पर थे। लोग अपने मुर्दों को उठाने के लिए उसे हमसे माँगते और उससे बरकत हासिल करते थे। हज़रत अबू बकर और हज़रत उमर के जनाज़े भी उसी पर उठाए गए।”

हज़रत आइशा फ़रमाती हैं: “रसूल अलैहिस्सलाम की एक चटाई थी, जिस पर आप रात को नमाज़ पढ़ते और दिन में उसे बिछाकर उस पर लोगों के साथ बैठते थे।”68

नबी-ए-करीम की अँगूठियाँ

हमारे नबी ने बताया कि मर्दों के लिए सिर्फ़ चाँदी की अँगूठी हलाल है, और सोने, लोहे और पीतल की अँगूठी पहनना हराम है। आपने ख़ुद भी वफ़ात तक सिर्फ़ चाँदी की अँगूठी ही पहनी।

रसूलुल्लाह अपनी अँगूठी मुबारक दाहिने हाथ में पहनते थे। आपको बाएँ हाथ में पहने हुए भी देखा गया है। दाहिने हाथ में भी और बाएँ हाथ में भी पहनना जाइज़ है। अँगूठी छोटी उँगली में या उसके पास वाली उँगली में पहनी जाती है। ईदों में हर एक का अँगूठी पहनना मुस्तहब है। दिखावे और फ़ख़्र के लिए पहनना हराम है।

हब्शा के नज्जाशी असहमा ने हमारे नबी को जो तोहफ़े भेजे थे, उनमें सोने की एक अँगूठी भी थी, जिसका नगीना हब्शी पत्थर का था। हमारे प्यारे नबी ने अबुल आस की बेटी, अपनी नवासी हज़रत उमामा को बुलाकर फ़रमाया: “बेटी! इसे तुम पहन लो!”69

एक दिन हज़रत नोमान इब्ने बशीर रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पास आए। उनकी उँगली में सोने की अँगूठी थी। नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “जन्नत में दाख़िल होने से पहले तुमने जन्नत का ज़ेवर क्यों इस्तेमाल किया?” उन्होंने लोहे की अँगूठी पहननी शुरू कर दी। यह देखकर नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “जहन्नम का सामान क्यों उठाए फिरते हो?” उन्होंने वह भी उतार दी और काँसे की अँगूठी पहन ली। यह देखकर नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “तुमसे बुत की बू क्यों आ रही है?” उन्होंने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! फिर मैं कैसी अँगूठी पहनूँ?” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “चाँदी की अँगूठी पहन सकते हो। उसका वज़न एक मिस्क़ाल (4.8 ग्राम) से ज़्यादा न हो, और उसे दाहिने हाथ में पहनो!”

हज़रत अम्र इब्ने शुऐब कहते हैं: “रसूलुल्लाह सोने और लोहे की अँगूठियाँ उतरवा देते थे, चाँदी की अँगूठियों से मना नहीं फ़रमाते थे।”

हमारे प्यारे नबी ने जब ईरान के शाह, रूम के क़ैसर और हब्शा के नज्जाशी को ख़त लिखवाने का इरादा फ़रमाया, तो आपसे अर्ज़ किया गया: “या रसूलल्लाह! वे कोई ख़त, जब तक उस पर मुहर न लगी हो, नहीं पढ़ते!” इस पर हमारे नबी ने चाँदी की एक अँगूठी बनवाई, जिसके नगीने पर तीन सतरों में “मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” कंदा था।

मुहर वाली अँगूठी की लिखावट ऊपर से नीचे की तरफ़ तीन सतरों में थी: “अल्लाह” – एक सतर, “रसूल” – एक सतर और “मुहम्मद” – एक सतर। नबी-ए-करीम की चाँदी की अँगूठी का नगीना हब्शी पत्थर का था।70 यह भी रिवायत किया जाता है कि इस चाँदी की अँगूठी का नगीना भी चाँदी का था।

हज़रत अम्र इब्ने सईद हमारे नबी के पास आए थे। हमारे प्यारे नबी ने उनकी उँगली में अँगूठी देखी तो पूछा: “तुम्हारे हाथ में यह अँगूठी क्या है?” हज़रत अम्र इब्ने सईद ने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! यह एक छल्ला है। इसे मैंने ख़ुद बनाया है।” हमारे नबी ने पूछा: “इस पर क्या कंदा है?” अम्र इब्ने सईद (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अर्ज़ किया: “मुहम्मदुर रसूलुल्लाह।” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ज़रा मुझे दिखाओ।” आपने उसे लेकर अपनी ज़ाती मुहर के तौर पर इस्तेमाल किया, और दूसरों को अपनी अँगूठियों पर “मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” के अल्फ़ाज़ कंदा करवाने से मना फ़रमा दिया।71 हमारे प्यारे नबी की वफ़ात इस हाल में हुई कि आपकी मुबारक उँगली में यही मुहर वाली अँगूठी थी।

हमारे नबी अपनी अँगूठी का नगीने वाला हिस्सा मुबारक हथेली की तरफ़ फेरकर पहनते थे। जब बैतुलख़ला में जाना होता, तो अँगूठी मुबारक उँगली से उतार लेते थे। हमारे प्यारे नबी की वफ़ात के बाद आपकी मुहर वाली अँगूठी हज़रत अबू बकर ने, उनके बाद हज़रत उमर ने और हज़रत उमर के बाद हज़रत उस्मान ने पहनी। हज़रत उस्मान की ख़िलाफ़त के ज़माने में एक दिन जब वह अरीस कुएँ के किनारे बैठे थे, तो वह अँगूठी उनसे कुएँ में गिर गई। कुएँ का सारा पानी निकलवा दिया गया, तीन दिन तक आ-जाकर तलाश की गई, फिर भी यह मुबारक अँगूठी नहीं मिली।72 अँगूठी के नगीने पर इबारत लिखवाने का रिवाज हमारे नबी के बाद भी जारी रहा।

हज़रत अबू बकर की अँगूठी पर “निअमल क़ादिरु अल्लाह” (अल्लाह तआला की हर चीज़ पर क़ुदरत कितनी ख़ूब काफ़ी है) और हज़रत उमर की अँगूठी पर “कफ़ा बिल मौति वाइज़न या उमर” (ऐ उमर, नसीहत के लिए मौत काफ़ी है) लिखा हुआ था।

हज़रत उस्मान की अँगूठी पर “ल नस्बिरन्ना” (हम ज़रूर सब्र करेंगे) और हज़रत अली की अँगूठी पर “अल मुल्कु लिल्लाह” (मुल्क सिर्फ़ अल्लाह तआला का है) लिखा हुआ था।

“यहूदियों की मुशाबहत से बचने के लिए अपनी नमाज़ें नालैन के साथ पढ़ो” हदीस शरीफ़

हज़रत हसन की अँगूठी पर “अल इज़्ज़तु लिल्लाह” (अज़मत और बड़ाई अल्लाह तआला की है) लिखा हुआ था।

हज़रत मुआविया की अँगूठी पर “रब्बिग़फ़िर ली” (ऐ मेरे रब, मुझे माफ़ फ़रमा) और हज़रत इब्ने अबी लैला की अँगूठी पर “अद दुनिया ग़रूरुन” (दुनिया धोखा देने वाली, झूठी है) लिखा हुआ था।

हज़रत इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा की अँगूठी पर “क़ुलिल ख़ैरा व इल्ला फ़स्कुत” (या तो भली बात कहो, या चुप रहो!) लिखा हुआ था।

हज़रत इमाम अबू यूसुफ़ की अँगूठी पर “मन अमिला बिरअयिही नदिमा” (जो अपनी राय से काम करता है, वह पछताता है) और हज़रत इमाम मुहम्मद शैबानी की अँगूठी पर “मन सबरा ज़फ़िरा” (जो सब्र करता है, वह कामयाबी पाता है) लिखा हुआ था।

हज़रत इमाम शाफ़ई की अँगूठी पर “अल बरकतु फ़िल क़नाअति” (बरकत क़नाअत में है) लिखा हुआ था। ये बुज़ुर्ग अपनी अँगूठियों को मुहर के तौर पर इस्तेमाल करते थे।

नबी-ए-करीम के नक़्श-ए-क़दम शरीफ़

नक़्श-ए-क़दम शरीफ़ हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम के मुबारक क़दमों के निशान हैं। नबी-ए-करीम का एक मोजिज़ा यह भी था कि जब आप किसी नर्म चीज़ पर, मसलन रेत पर क़दम रखते, तो पाँव के निशान नहीं पड़ते थे, लेकिन पत्थर या किसी सख़्त चीज़ पर क़दम रखते तो निशान उभर आते थे। आपके मुबारक क़दम जिन पत्थरों और संगमरमरों पर पड़े और निशान छोड़ गए, उनमें से कुछ यादगार के तौर पर सदियों तक महफ़ूज़ रखे गए, हाथों-हाथ अमानत के तौर पर सौंपे गए और उनसे बरकत हासिल की गई।

ख़ास तौर पर मुसलमान हुक्मरानों और बादशाहों ने इन क़ीमती यादगारों को अहम जगहों पर ख़ास हिफ़ाज़त में रखा, ख़ुद उनकी ज़ियारत की और दूसरों को भी ज़ियारत कराई। महफ़ूज़ रखे गए नक़्श-ए-क़दम शरीफ़ में सबसे मशहूर ये हैं: 1. हिन्दुस्तान में फ़ीरोज़ शाह तुग़लक़ के बेटे फ़तह ख़ान के मक़बरे में मौजूद नक़्श-ए-क़दम शरीफ़। 2. क़ाहिरा में क़ायतबाय के मक़बरे में मौजूद दो मुबारक क़दमों के निशान। 3. क़ाहिरा में आसारुन नबी मस्जिद में मौजूद दो मुबारक क़दमों के निशान। 4. इस्तांबुल में ख़ालिद इब्ने ज़ैद अबू अय्यूब अल-अन्सारी (अय्यूब सुल्तान) के मक़बरे में दाएँ मुबारक पाँव का निशान। यह नबवी नक़्श-ए-क़दम महमूद ख़ान अव्वल के हुक्म से 1734 में महल से मक़बरे में लाया गया।

5. अब्दुल हमीद ख़ान अव्वल के मक़बरे में, नई मस्जिद (येनी जामी) की तरफ़ वाली दीवार में अलमारी के अंदर महफ़ूज़ दो क़दमों के निशान।

6. लालेली में सुल्तान मुस्तफ़ा ख़ान सालिस के मक़बरे में दीवार में ख़ास तौर पर बनाई गई अलमारी के अंदर महफ़ूज़, पत्थर पर बने दो मुबारक क़दमों के निशान। 7. इस्तांबुल में तोपकापी महल के मुक़द्दस अमानतों के हिस्से में मौजूद क़दमों के निशान। तोपकापी महल के ख़िरक़ा-ए-सआदत वाले हिस्से में छह नक़्श-ए-क़दम शरीफ़ हैं, जिनमें चार पत्थर के और दो ईंट जैसे हैं। इनमें से एक वह मुबारक निशान है जो नबी-ए-करीम के मेराज पर तशरीफ़ ले जाते वक़्त आपके क़दम रखने से एक चट्टान पर उभर आया था; यह ख़िरक़ा-ए-सआदत के कमरे में एक अलमारी के अंदर महफ़ूज़ है। रसूलुल्लाह ने मेराज पर तशरीफ़ ले जाते वक़्त जिस मुबारक चट्टान पर क़दम रखा था, उस पर क़ुब्बतुस सख़रा के नाम से मशहूर इमारत बनाई गई है। नक़्श-ए-क़दम शरीफ़ अपनी मौजूदा जगहों पर मुंतक़िल किए जाने से पहले सदियों तक अलग-अलग जगहों पर महफ़ूज़ रहे। आख़िर में उन्हें आज की जगहों पर रखा गया। जो नक़्श-ए-क़दम शरीफ़ असली हैं, उनकी बरकत हासिल करने के लिए ज़ियारत की जाती है।

क़दम शरीफ़ और सुल्तान अहमद ख़ान अव्वल

उस्मानी बादशाह सुल्तान अहमद अव्वल तेरह साल की उम्र में तख़्त पर बैठे और अट्ठाईस साल की उम्र में उनका इंतिक़ाल हुआ। वह इस्लाम और रसूलुल्लाह से दिल से जुड़े हुए थे और बख़्ती और अहमदी तख़ल्लुस से शेर भी कहते थे। उन्होंने नक़्श-ए-क़दम शरीफ़ की शक्ल का, जवाहरात जड़ा हुआ एक तुर्रा (कलग़ी) बनवाया था, और उसके बीच में नीले मीने पर सोने से अपने ये मिसरे लिखवाए थे:

क्या ही ख़ूब हो, ताज की तरह सिर पर हमेशा उठाए फिरूँ,
रसूलों के शाह, उन हज़रत के पाक क़दम का निशान।
नुबुव्वत के गुलशन का गुल है उस क़दम का मालिक;
ऐ अहमद, रुक मत, उस गुल के क़दम पर मल दे अपना चेहरा।
Sultan I. Ahmed (Bahtî)

सुल्तान अहमद अव्वल जुमा और ईद के दिनों में, और दूसरे मुबारक दिनों में भी यह तुर्रा अपने सिर पर लगाते थे। ऐनताब के मेहमद मुनीब एफ़ेंदी ने सुल्तान अब्दुल हमीद अव्वल के मक़बरे में मौजूद नक़्श-ए-क़दम शरीफ़ के मिलने और मक़बरे में रखे जाने का हाल बयान करते हुए Âsâr-ul-Hikem fî Nakş-il Kadem नाम की एक किताब लिखी। सुल्तान अहमद ख़ान ने यह क़िता अपने हाथ से लिखकर अपने शैख़ अज़ीज़ महमूद हुदाई एफ़ेंदी के पास भेजा। इसके अलावा सुल्तान अहमद ने यह शेर एक तख़्ती पर लिखवाकर सल्तनत के तख़्त के सामने लटकवाया। शेर वाली यह तख़्ती आज भी सुल्तान अहमद मस्जिद में लटकी हुई है।

नबी-ए-करीम की नालैन शरीफ़

नबी-ए-करीम के ज़माने में पहनी जाने वाली नालैन आज की नालैन से अलग थीं। उनका तला चमड़े का होता था, वे ऊपर से खुली होती थीं और तस्मों वाले जूते की शक्ल की होती थीं। रसूलुल्लाह और सहाबा-ए-किराम गली में पहनी जाने वाली नालैन के साथ ही नमाज़ पढ़ते थे। उनकी नालैन साफ़ होती थीं, और मस्जिद-ए-नबवी के फ़र्श पर रेत बिछी हुई थी। गंदी नालैन के साथ उसमें दाख़िल नहीं होते थे।

हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “यहूदियों की मुशाबहत से बचने के लिए अपनी नमाज़ें नालैन के साथ पढ़ो।”

लोग यह यक़ीन रखते हुए कि नालैन-ए-सआदत की तस्वीर भी बरकत का सबब बनती है, उसे घरों और काम की जगहों पर लटकाते थे। ख़िरक़ा-ए-सआदत वाले हिस्से में नालैन-ए-सआदत के साथ उनके धातु और लकड़ी से बने नमूने भी महफ़ूज़ हैं।

नबी-ए-करीम के साथ रहने वाली सात चीज़ें

हमारे प्यारे नबी कंघी, आईना, मिस्वाक, गुलाब का तेल, सुरमा और क़ैंची अपने पास रखकर सफ़र पर निकलते थे, और सफ़र में भी, घर में भी इन्हें अपने से जुदा नहीं करते थे। हज़रत आइशा ने फ़रमाया: “ग़ज़वों के लिए मैं रसूल अलैहिस्सलाम का गुलाब का तेल, कंघी, आईना, दो क़ैंचियाँ, सुरमेदानी और मिस्वाक तैयार करती थी।” हमारी माँ हज़रत आइशा ने यह भी फ़रमाया: “सफ़र में भी और घर में भी रसूल अलैहिस्सलाम सात चीज़ें अपने साथ रखते थे:

1. गुलाब के तेल की शीशी, 2. कंघी, 3. आईना, 4. सुरमेदानी, 5. मिस्वाक, 6. दो क़ैंचियाँ, 7. बालों में माँग निकालने की हड्डी।”73

नबी-ए-करीम का असा और छड़ियाँ

नबी-ए-करीम जुमा के दिन ख़ुत्बा देते वक़्त असा या कमान पर, और सफ़र में कमान पर टेक लगाते थे। हमारे प्यारे नबी फ़रमाते थे कि असा पर टेक लगाना नबियों के अख़लाक़ में से है; आप ख़ुद असा पर टेक लगाते और इसकी नसीहत भी फ़रमाते थे। मुआविया इब्ने अबी सुफ़यान (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) की ख़िलाफ़त के ज़माने में नबी-ए-करीम का असा साद अल-क़रज़ के पास था। हज़रत मुआविया इब्ने अबी सुफ़यान हिजरत के पचासवें साल हज के लिए आए थे। उन्होंने चाहा कि हमारे प्यारे नबी की मस्जिद का मिम्बर उखड़वाकर दमिश्क़ ले जाएँ। साद अल-क़रज़ के पास मौजूद असा भी उन्होंने मँगवाना चाहा। हज़रत जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह और हज़रत अबू हुरैरा उनके पास गए और कहा: “ऐ अमीरुल मोमिनीन! रसूल अलैहिस्सलाम के मिम्बर को उसकी जगह से उखाड़कर ले जाना भी और रसूलुल्लाह के असा को दमिश्क़ ले जाना भी ठीक नहीं होगा!” इस पर हज़रत मुआविया ने यह इरादा छोड़ दिया और माफ़ी माँगी।

हमारे नबी हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उनैस को मस्जिद से अपने घर ले गए और उन्हें एक असा देकर फ़रमाया: “ऐ अब्दुल्लाह इब्ने उनैस! यह असा अपने पास संभालकर रखना!” अब्दुल्लाह इब्ने उनैस (रज़ियल्लाहु अन्हु) जब यह असा लेकर लोगों के बीच गए, तो उनसे पूछा गया: “यह कैसा असा है?” उन्होंने कहा: “यह मुझे रसूल अलैहिस्सलाम ने दिया है और अपने पास संभालकर रखने का हुक्म दिया है।” लोगों ने हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उनैस से कहा: “काश तुम रसूल अलैहिस्सलाम के पास वापस जाकर पूछ लेते कि आपने यह तुम्हें क्यों दिया है!”

नबी-ए-करीम की नालैन शरीफ़ की शक्ल

नालैन शरीफ़

रसूलुल्लाह की नालैन आसमानों तक बुलंद होती है,
सारी मख़लूक़ात उसी के साये में रहती है।
तूर पर जब मूसा से कहा गया: “अपनी नालैन उतारो”,
अर्श के ऊपर उनसे कहा जाता है: “तुम मत उतारो।”
यह सबसे बुज़ुर्ग रसूल की नालैन की शक्ल है,
सितारे भी चाहते हैं कि वह ख़ाक बनें जिस पर उनका क़दम पड़ा।
सातों आसमानों के रहने वाले उसकी आरज़ू में हैं,
सुल्तानों के ताज भी उस पर रश्क करते हैं।
मुस्तफ़ा की नालैन जैसी कोई चीज़ नहीं मिलती,
आँख को नूर, दिल को सुकून – सब उसी से आता है।
नालैन की तस्वीर को बेहद अज़ीज़ रखो,
सारे सर चाहते हैं कि उसके लिए पाँव बन जाएँ।
जब हर तरफ़ बलाएँ और मुसीबतें घेर लेती हैं,
नालैन शरीफ़ मेरे लिए अमान का क़िला बन जाती है।
इस मज़बूत क़िले में मैं अमन-ओ-अमान में हूँ,
उसकी प्यारी शक्ल की पनाह लूँ, तो वह मेरी हिफ़ाज़त करती है।
दिल नालैन शरीफ़ की शक्ल की ख़िदमत करके,
दोनों जहान में उसके साये में जीने की आरज़ू रखता है।
इब्ने मसऊद नालैन की ख़िदमत करके ख़ुशनसीब हुए,
और मेरी ख़ुशनसीबी उसकी तस्वीर के ज़रिए है।
यूसुफ़ नबहानी

इसके बाद अब्दुल्लाह इब्ने उनैस हमारे नबी के पास वापस गए और अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! यह असा आपने मुझे क्यों दिया?” हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “यह क़यामत के दिन हमारे बीच एक निशानी है! उस वक़्त जन्नत में असा पर टेक लगाने वाले लोग बहुत कम होंगे! तुम जन्नत में इस पर टेक लगाओगे!” अब्दुल्लाह इब्ने उनैस ने उसे अपनी तलवार के साथ रखा और कभी अपने से जुदा न किया। जब वह मौत के बिस्तर पर पड़े, तो घर वालों को वसीयत की कि इसे उनके कफ़न के अंदर रखकर उनके साथ दफ़न करें। असा उनके बदन और कफ़न के बीच रख दिया गया और उनकी वसीयत पूरी की गई। नबी-ए-करीम के पास एक गज़ (68 सेंटीमीटर) या उससे कुछ लंबी एक मिहजन थी। मिहजन सिरे से मुड़ी हुई छड़ी को कहते हैं। हमारे नबी हजर-ए-असवद को दूर से उसी से इशारा करके इस्तिलाम (सलाम) करते थे। हमारे नबी ऊँट पर सवार होते तो उसे अपने आगे लटका लेते थे। नबी-ए-करीम की उरजून नाम की (खजूर की सूखी टहनी से बनी) एक मिख़सरा भी थी। पेड़ की टहनी से बनी छड़ी को मिख़सरा कहते हैं। हमारे नबी बक़ीउल ग़रक़द जाते वक़्त उसे अपने साथ रखते, उस पर टेक लगाते, और बैठते वक़्त उसे हाथ में घुमाते रहते थे। ऐसा भी होता था कि हमारे नबी यही मिख़सरा हाथ में लिए हुए ख़ुत्बा देते थे। हमारे नबी की पहाड़ी पेड़ों से काटकर बनाई गई ममशूक़ नाम की एक क़ज़ीब (पतली छड़ी) भी थी। हज़रत उस्मान जब नबी-ए-करीम की क़ज़ीब हाथ में लिए मिम्बर पर ख़ुत्बा दे रहे थे, तो जहजाह इब्ने सईद या जहजाह इब्ने क़ैस आया और हज़रत उस्मान के हाथ से क़ज़ीब छीनकर अपने घुटने पर टिकाकर मोड़ दी और तोड़ डाली। लोग जहजाह पर चिल्लाए। यह बात इलाही ग़ैरत को नागवार गुज़री, और अल्लाह तआला ने जहजाह के हाथ या घुटने में अकिला (खुजली) की बीमारी डाल दी। हज़रत उस्मान की शहादत के बाद एक साल भी न गुज़रा था कि जहजाह खुजाते-खुजाते मर गया।

“मुस्तफ़ा की नालैन जैसी कोई चीज़ नहीं मिलती, आँख को नूर, दिल को सुकून – सब उसी से आता है” यूसुफ़ नबहानी (रहमतुल्लाहि अलैहि)

नबी-ए-करीम की तलवारें

नबी-ए-करीम की नौ तलवारें थीं।

मासूर नाम से मशहूर तलवार आपको अपने वालिद से विरासत में मिली थी; हमारे नबी के मदीना हिजरत फ़रमाते वक़्त यह आपके पास थी।74 अज़्ब: यह तलवार नबी-ए-करीम को हज़रत साद इब्ने उबादा ने तोहफ़े में दी थी, और बद्र के ग़ज़वे के लिए जाते वक़्त आप इसे अपने साथ ले गए थे।

ज़ुल्फ़िक़ार: यह क़ुरैश के मुशरिकों में से मुनब्बिह इब्ने हज्जाज या आस इब्ने मुनब्बिह की तलवार थी, जो बद्र के ग़ज़वे में माल-ए-ग़नीमत के तौर पर मिली थी। नबी-ए-करीम ने ज़ुल्फ़िक़ार हज़रत अली को तोहफ़े में दे दी। उसके दस्ते का सिरा, बंधन के छल्ले और ज़ंजीरें चाँदी की थीं।75

हमारे नबी की वफ़ात के बाद जब हज़रत अब्बास ने हज़रत अबू बकर से रुजू करके ज़ुल्फ़िक़ार हज़रत अली से माँगनी चाही, तो हज़रत अबू बकर ने फ़रमाया: “मैंने यह तलवार हमेशा उन्हीं के हाथ में देखी है। इसे उनसे छीन लेना मुझे अच्छा नहीं लगता!” चुनाँचे हज़रत अब्बास ने भी उसे हज़रत अली के पास ही रहने दिया।

नबी-ए-करीम के नेज़े

नबी-ए-करीम को बनू क़ैनुक़ा के यहूदियों से तीन नेज़े माल-ए-ग़नीमत में मिले थे। हमारे नबी के नेज़ों में से एक का नाम मुसवी और दूसरे का मुसना था। हमारे नबी का बैज़ा नाम का एक बड़ा हरबा (छोटा नेज़ा) और अनज़ा नाम का, नेज़े से छोटा एक हरबा भी था। हब्शा के नज्जाशी हज़रत असहमा ने हमारे प्यारे नबी को नबआ नाम के तीन अनज़े (नेज़े) और एक हरबा भेजा था। हमारे नबी ने उनमें से एक अपने लिए रख लिया, दूसरा हज़रत अली को और तीसरा हज़रत उमर को दे दिया।

ईदुल फ़ित्र और ईदुल अज़हा में हज़रत बिलाल हब्शी (रज़ियल्लाहु अन्हु) हमारे नबी का नेज़ा ईदगाह तक आपके आगे-आगे उठाकर ले जाते और वहाँ नबी-ए-करीम के सामने गाड़ देते थे। हमारे प्यारे नबी ईद की नमाज़ उसी की तरफ़ रुख़ करके पढ़ाते थे। नबी-ए-करीम की वफ़ात के बाद हज़रत बिलाल हब्शी ईदों में यह नेज़ा हज़रत अबू बकर के आगे उठाकर ले जाते और ईदगाह में उनके सामने गाड़ देते थे। हज़रत अबू बकर के बाद हज़रत उमर के, और उनके बाद हज़रत उस्मान के ज़माने में यह ख़िदमत मुअज़्ज़िन हज़रत साद अल-क़रज़ ने उसी तरह अंजाम दी। मदीना के हाकिमों के ज़माने में भी ऐसा ही होता रहा।

नबी-ए-करीम की कमानें

हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की छह कमानें थीं। उनमें से रौहा, बैज़ा और सफ़रा नाम की तीन कमानें बनू क़ैनुक़ा के यहूदियों से माल-ए-ग़नीमत में मिली थीं। सफ़रा कमान नब्अ के पेड़ की लकड़ी से बनी थी।76 कतूम नाम की कमान भी नब्अ की लकड़ी से बनी थी, और वह उहुद के ग़ज़वे में टूट गई थी। टूटी हुई कमान हज़रत क़तादा इब्ने नोमान ने यादगार के तौर पर ले ली थी। इसके अलावा नबी-ए-करीम की सदद और ज़ौरा नाम की कमानें भी थीं।77

“अली के सिवा कोई जवान नहीं, और ज़ुल्फ़िक़ार के सिवा कोई तलवार नहीं!” हदीस शरीफ़

नबी-ए-करीम की ढालें

हमारे नबी की तीन ढालें थीं। ज़लूक़ नाम की ढाल पर मेंढे के सिर की तस्वीर बनी हुई थी। यह ढाल हमारे नबी को तोहफ़े में दी गई थी। लेकिन तस्वीर वाली होने की वजह से हमारे नबी को यह पसंद नहीं आई। सुबह हुई तो अल्लाह ने वह तस्वीर ढाल से मिटा दी थी, ग़ायब कर दी थी।78

नबी-ए-करीम की ज़िरहें

रसूलुल्लाह की सात ज़िरहें थीं। ये ज़िरहें इस तरह हैं:

ज़ातुल फ़ुज़ूल: यह ज़िरह हज़रत साद इब्ने उबादा ने बद्र के ग़ज़वे के लिए निकलते वक़्त हमारे नबी को तोहफ़े में दी थी।79

सादिया और फ़िज़्ज़ा: ये दोनों ज़िरहें भी हमारे नबी को बनू क़ैनुक़ा के यहूदियों से माल-ए-ग़नीमत में मिली थीं। सादिया नाम की ज़िरह दाऊद अलैहिस्सलाम की वह तारीख़ी ज़िरह थी जो उन्होंने जालूत से मुक़ाबले के लिए पहनी थी। उहुद के ग़ज़वे में हमारे नबी ने फ़ुज़ूल और फ़िज़्ज़ा को ऊपर-नीचे पहना था।80 हमारे नबी की वफ़ात के वक़्त ज़ातुल फ़ुज़ूल नाम की ज़िरह घर वालों की ज़रूरत के लिए ली गई तीस साअ जौ के बदले बनू ज़फ़र के अबुश शह्म नाम के एक यहूदी के पास रहन रखी हुई थी।81

आपकी दूसरी ज़िरहें ज़ातुल विशाह, ज़ातुल हवाशी, बतरा और ख़िरनिक़ थीं।82

हुनैन के ग़ज़वे में हमारे नबी ने ज़ातुल फ़ुज़ूल और सादिया पहनी थीं।83

नबी-ए-करीम के ख़ोद

रसूलुल्लाह के ख़ोदों (लोहे के टोपों) में पहला मुवश्शह था। यह ख़ोद बनू क़ैनुक़ा के यहूदियों से माल-ए-ग़नीमत में मिला था। ज़ुस सुबूग़, या ज़ुस सुसुब, या मशबूग़ नाम का ख़ोद वह था जो हमारे नबी ने उहुद के ग़ज़वे में सिर पर पहना था। मुशरिकों की तलवारों के वार और फेंके गए पत्थरों से वह टूट गया, और उसके दो छल्ले हमारे प्यारे नबी के मुबारक गालों में धँस गए।

मक्का फ़तह करने के लिए दाख़िल होते वक़्त भी हमारे नबी ख़ोद पहने हुए थे।

लश्कर सवार हुआ, उठाकर झंडे और अलम,
बजने लगे मेहतर-बाजे84, नक़्क़ारे और दफ़ बाहम।

नबी-ए-करीम के झंडे और परचम

नबी-ए-करीम ग़ज़वों में दो तरह के झंडे (परचम) इस्तेमाल फ़रमाते थे। आपका राया काला था, और लिवा उससे छोटा और सफ़ेद था। मुहम्मद इब्ने क़ासिम के आज़ाद किए हुए ग़ुलाम यूनुस इब्ने उबैद बयान करते हैं: “मुहम्मद इब्ने क़ासिम ने मुझे रसूलुल्लाह (अलैहिस्सलाम) के झंडे के बारे में पूछने के लिए बरा इब्ने आज़िब के पास भेजा। बरा इब्ने आज़िब ने कहा: ‘वह काला, चौकोर और नमिरा (काली-सफ़ेद धारियों वाले ऊनी कपड़े) का था।’” यह झंडा हज़रत आइशा की एक चादर थी, जो ऊन से बुनी हुई और ऊँट के कजावे जैसे नक़्शों से सजी थी; इसका रंग काला था। इसे उक़ाब कहा जाता था। हमारे प्यारे नबी का झंडा हज़रत अली के पास रहता था। ख़ैबर के ग़ज़वे में हमारे नबी ने फ़रमाया: “यह झंडा मैं एक ऐसे मर्द को दूँगा जो अल्लाह और उसके रसूल से मुहब्बत करता है, और अल्लाह और उसका रसूल भी उससे मुहब्बत करते हैं!” और हज़रत अली को बुलाकर अपना झंडा उन्हें दे दिया।85 अल्लाह तआला ने ख़ैबर की फ़तह हज़रत अली को नसीब फ़रमाई।

रसूलुल्लाह के लिवाउल हम्द नाम के परचम पर “ला इलाह इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” लिखा हुआ था। ख़र्रार के सरिय्ये में हमारे नबी ने हज़रत साद इब्ने अबी वक़्क़ास के लिए एक सफ़ेद परचम बाँधा। हज़रत अली को यमन भेजते वक़्त आपने एक नेज़े के सिरे पर एक अमामा बाँधकर फ़रमाया: “लिवा ऐसा होता है!” लिवा सिर्फ़ लश्कर का सिपहसालार ही थामता और उठाता था। हमारे नबी का सफ़ेद परचम अबवा (वद्दान) के ग़ज़वे में हज़रत हमज़ा ने, बुवात के ग़ज़वे में साद इब्ने अबी वक़्क़ास ने, कुर्ज़ इब्ने जाबिर अल-फ़िहरी का पीछा करते वक़्त हज़रत अली ने, और ज़ुल उशैरा के ग़ज़वे में हज़रत हमज़ा ने उठाया।

बद्र के ग़ज़वे के लिए निकलते वक़्त हमारे नबी ने अपना सफ़ेद परचम (लिवा) मुसअब इब्ने उमैर को दिया, और हज़रत अली हमारे नबी के आगे-आगे आपका काला परचम (राया), यानी उक़ाब उठाए चल रहे थे।86 हमारे नबी का सफ़ेद परचम (लिवा) बनू क़ैनुक़ा के ग़ज़वे में हज़रत हमज़ा ने, क़रक़रतुल कुद्र, उहुद और बद्रुल मौइद के ग़ज़वों में हज़रत अली ने, और ख़न्दक़ के ग़ज़वे में ज़ैद इब्ने हारिसा ने उठाया। हमारे नबी ने मक्का भी अपने सफ़ेद परचम के साथ फ़तह फ़रमाया। तबूक के ग़ज़वे में नबी-ए-करीम ने अपना बड़ा परचम हज़रत अबू बकर को और छोटा परचम ज़ुबैर इब्ने अव्वाम को उठाने के लिए दिया।

नबी-ए-करीम के घोड़े

हमारे प्यारे नबी का पहला घोड़ा वह था जिसे आपने मदीना में बनू फ़ज़ारा के एक बद्दू से दस ऊक़िया87 चाँदी में ख़रीदा था; सहरा के लोग उसे ज़रिस कहते थे और हमारे नबी ने उसका नाम सकब रखा था। उहुद के ग़ज़वे में नबी-ए-करीम उसी पर सवार हुए थे।88 सकब के होंठ पर सफ़ेदी थी। उसके तीन पाँवों पर सफ़ेदी थी, सिर्फ़ दाएँ पाँवों में से एक सफ़ेद नहीं था। सकब बहुत तेज़ था, यानी चलते वक़्त पानी की तरह बहता था। मुर्तजिज़ नाम का घोड़ा हमारे नबी ने बनू मुर्रा के एक बद्दू से ख़रीदा था। मुर्तजिज़ ख़ूबसूरत और सुडौल था और ऐसे हिनहिनाता था मानो शेर पढ़ रहा हो।89 लिज़ाज़ नाम का घोड़ा हमारे नबी को इस्कंदरिया के बादशाह मुक़ौक़िस ने तोहफ़े में दिया था। लिज़ाज़ बहुत तेज़ दौड़ता था।90

ज़रिब नाम का घोड़ा हमारे नबी को फ़रवा इब्ने उमैर अल-जुज़ामी ने तोहफ़े में दिया था। ज़रिब बहुत ताक़तवर और सख़्त-जान घोड़ा था।

लहीफ़ (या लुहैफ़)। यह घोड़ा हमारे नबी को रबीआ इब्ने अबी बरा अल-कल्बी ने तोहफ़े में दिया था। लहीफ़ की दुम इतनी लंबी थी कि ज़मीन को झाड़ती थी। यासूब हमारे नबी के घोड़ों में सबसे अच्छा था।

“यह झंडा मैं एक ऐसे मर्द को दूँगा जो अल्लाह और उसके रसूल से मुहब्बत करता है, और अल्लाह और उसका रसूल भी उससे मुहब्बत करते हैं!” हदीस शरीफ़

मुराविह दौड़ का घोड़ा था; इसे उबैद इब्ने यासिर ने तबूक में हमारे नबी को तोहफ़े में दिया था। मुराविह हवा की तरह तेज़ दौड़ता था।

मिरवाह नाम का घोड़ा हिजरत के दसवें साल मदीना आने वाले बनू रहा के वफ़्द ने हमारे नबी को तोहफ़े में दिया था। जब मिरवाह पर सवार होकर उसे हमारे नबी के सामने चलाकर दिखाया गया, तो यह हमारे नबी को बहुत पसंद आया था। वर्द – यह घोड़ा हमारे नबी को तमीम दारी ने तोहफ़े में दिया था। वर्द का रंग कुम्मैत (सुर्ख़ी माइल) था। हमारे नबी ने उसे हज़रत उमर को तोहफ़े में दे दिया। हज़रत उमर ने वर्द पर सवार होकर अल्लाह तआला की राह में जिहाद किया और उसे एक ग़ज़वे से दूसरे ग़ज़वे तक दौड़ाया। हमारे नबी अपने घोड़ों में से तीन को दौड़ में उतारते थे। ज़रिब के सवार हज़रत सह्ल इब्ने साद थे, और लिज़ाज़ के सवार हज़रत अबू उसैद अस-साइदी। लिज़ाज़ सबसे आगे, ज़रिब उसके पीछे और सकब ज़रिब के पीछे रहता था।

नबी-ए-करीम का गधा और ख़च्चर

रसूलुल्लाह का गधा भी था और ख़च्चर भी। इस्कंदरिया के बादशाह मुक़ौक़िस ने हमारे नबी को एक भूरा ख़च्चर और एक भूरा गधा तोहफ़े में दिया था। ख़च्चर को दुलदुल और गधे को याफ़ूर या उफ़ैर कहा जाता था।91 इस्लाम में सबसे पहले दिखाई देने वाला सफ़ेद ख़च्चर दुलदुल था। हमारे नबी ख़ैबर के ग़ज़वे में इसी भूरे ख़च्चर पर, और हुनैन के ग़ज़वे में दूसरे भूरे ख़च्चर पर सवार थे। हमारे नबी ने अपने ख़च्चर को एड़ लगाकर हवाज़िन क़बीले की तरफ़ बढ़ना चाहा; हज़रत अब्बास ने ख़च्चर की लगाम और हज़रत अबू सुफ़यान इब्ने हारिस ने रकाब पकड़कर उसकी रफ़्तार कम करने और हमारे नबी को दुश्मनों के बीच घुस जाने से रोकने की कोशिश की। रिवायत है कि ख़ैबर के ग़ज़वे में याफ़ूर पर पालान कसकर और उसके सिर में खजूर के रेशे की रस्सी की लगाम डालकर हमारे नबी उस पर भी सवार हुए थे। हमारे नबी जब हज्जतुल विदा से लौटे तो याफ़ूर मर चुका था, और दुलदुल हमारे नबी की वफ़ात के बाद हज़रत अली के पास रहा। उस पर हज़रत अली अपनी शहादत तक, फिर हज़रत हसन, फिर हज़रत हुसैन और उसके बाद हज़रत मुहम्मद इब्ने हनफ़िया सवार हुए। दुलदुल हज़रत मुआविया के ज़माने तक ज़िंदा रहा।

नबी-ए-करीम के ऊँट

क़सवा: नबी-ए-करीम की यह ऊँटनी, जिसे जदआ और अज़बा के नामों से भी पुकारा जाता था, बनू क़ुशैर इब्ने कअब इब्ने रबीआ इब्ने आमिर के, या हुरैश इब्ने कअब के जानवरों में से थी; हज़रत अबू बकर ने इसे चार सौ दिरहम में ख़रीदा और उसी क़ीमत पर हमारे प्यारे नबी के हवाले कर दिया। हमारे नबी ने क़सवा पर सवार होकर मदीना हिजरत फ़रमाई। हुदैबिया के उमरे के लिए इसी पर सवार होकर तशरीफ़ ले गए। मक्का भी इसी पर सवार होकर फ़तह फ़रमाया। नबी-ए-करीम क़सवा को दौड़ में उतारते थे, और कोई ऊँट उससे आगे नहीं निकल पाता था। लेकिन एक बद्दू दो साल के एक ऊँट के साथ दौड़ में उतरा और उससे आगे निकल गया। हज्जतुल विदा में नबी-ए-करीम ने अरफ़ात का ख़ुत्बा क़सवा पर बैठकर दिया। हज़रत अबू बकर की ख़िलाफ़त के ज़माने में क़सवा को जन्नतुल बक़ी के क़ब्रिस्तान में छोड़ दिया गया। वहाँ वह अपनी मर्ज़ी से चरती रही, यहाँ तक कि मर गई।92

“या अल्लाह! जिस तरह तूने मेरी सूरत ख़ूबसूरत बनाई है, उसी तरह मेरे अख़लाक़ को भी ख़ूबसूरत बना दे” हदीस शरीफ़

अबू जहल से ग़नीमत में मिला ऊँट: बद्र के ग़ज़वे में अबू जहल का मशहूर ऊँट माल-ए-ग़नीमत के तौर पर हमारे प्यारे नबी के हिस्से में आया। हुदैबिया के उमरे तक नबी-ए-करीम इस ऊँट पर सवार होकर ग़ज़वों के लिए भी निकलते थे। आपने उमरे के लिए उस पर क़ुरबानी का निशान लगाया। मुशरिकों ने सौ ऊँट देकर उसे लेना चाहा। हमारे नबी ने फ़रमाया: “अगर हमने इसे क़ुरबानी के लिए अलग करके मुक़र्रर न कर दिया होता, तो तुम्हारी ख़्वाहिश पूरी कर देता।” दूध देने वाली ऊँटनियाँ: हमारे नबी की हन्ना, समरा, उरैस, सादिया, बग़ूम, यसीरा और दब्बा नाम की सात दूध देने वाली ऊँटनियाँ थीं, जो ज़ुल जद्र और जम्मा की चरागाहों में चरती थीं; हर रात उनका दो मश्क भर दूध लाया जाता, और हमारे नबी के घर वाले उसी पर गुज़ारा करते थे।93 लेकिन हमारे नबी की वफ़ात के वक़्त इनमें से कोई बाक़ी नहीं रही थी।

नबी-ए-करीम की वक़्फ़ की हुई जायदादें

इस्लाम में पहला वक़्फ़ वे सात बाग़ और बग़ीचे थे जिनके बारे में उहुद में शहीद होने वाले मुख़ैरिक़ ने वसीयत की थी कि उन्हें हमारे नबी के हवाले कर दिया जाए, और हमारे नबी ने उन्हें क़बूल करके वक़्फ़ फ़रमा दिया; उनके नाम ये थे: 1. मीसब, 2. साफ़िया, 3. दलाल, 4. हुसना, 5. बुरक़ा, 6. आवाफ़, 7. मशरबा।94 मुख़ैरिक़ मुसलमान होने से पहले यहूदी आलिमों और मालदारों में से थे। उन्होंने उहुद के ग़ज़वे के मौक़े पर अपनी क़ौम के लोगों को अपने सामने जमा करके अपनी राय यूँ ज़ाहिर की: “तुम ख़ुद भी अच्छी तरह जानते हो कि मुहम्मद आख़िरी ज़माने के नबी हैं। तौरात में उनकी सिफ़तें साफ़-साफ़ लिखी हुई हैं। अब हमें चाहिए कि उनकी पैरवी करें और उनके मुश्किल दिनों में उनके साथ रहें।” यहूदियों ने कहा: “तुम सही कहते हो, लेकिन आज शनिवार है। आज कोई काम नहीं किया जा सकता!” जब उन्होंने देखा कि इसरार का कोई फ़ायदा नहीं, तो तलवार कमर में बाँधी और अपने मुसलमान होने का एलान कर दिया। अपने क़रीबियों को वसीयत की: “अगर मैं मारा जाऊँ, तो मेरा सारा माल मुहम्मद का है। वह जैसे चाहें, इसे इस्तेमाल करने में आज़ाद हैं।” वह जाकर इस्लामी लश्कर में शामिल हो गए और शहादत का जाम पी लिया, रज़ियल्लाहु अन्हु।

आख़िरकार जंग ख़त्म हुई, ज़ख़्मों पर पट्टियाँ बाँधी गईं। मुख़ैरिक़ के क़रीबी वसीयत पर क़ायम रहे और उनकी जायदाद हबीबुल्लाह के हवाले कर दी। नबी-ए-करीम ने ठंडे पानी और भरपूर फलों वाली इन ज़मीनों को वक़्फ़ कर दिया और फ़क़ीरों और मिस्कीनों के फ़ायदे के लिए खोल दिया। इस तरह इस्लामी तहज़ीब में वक़्फ़ की पहली रिवायत शुरू हुई। नबी-ए-करीम ने उनकी तारीफ़ यूँ फ़रमाई: “मुख़ैरिक़ यहूदी नस्ल के एक नेक इंसान हैं।”

हमारे नबी के मदीना के वक़्फ़ आम तौर पर मुख़ैरिक़ के माल में से थे।

इब्ने हुमैद कहते हैं: “ख़लीफ़ा उमर इब्ने अब्दुल अज़ीज़ ने चाहा कि मुख़ैरिक़ के वक़्फ़ किए हुए खजूर के बाग़ों से खजूरें लाई जाएँ। वे एक थाली में लाई गईं। उमर इब्ने अब्दुल अज़ीज़ ने बताया: ‘अबू बकर इब्ने हज़्म ने मुझे लिखा है कि यह खजूर रसूल अलैहिस्सलाम के ज़माने से चले आ रहे खजूर के एक पेड़ की है और रसूल अलैहिस्सलाम उसमें से खाते थे।’ तो मैंने अर्ज़ किया: ‘ऐ अमीरुल मोमिनीन! इसे हमारे बीच बाँट दीजिए!’ उन्होंने बाँट दीं। हम में से हर एक के हिस्से में नौ-नौ खजूरें आईं।”

उमर इब्ने अब्दुल अज़ीज़ ने कहा: “जब मैं मदीना के हाकिम की हैसियत से उस बाग़ में गया था, तो मैंने उस खजूर के पेड़ की खजूर खाई थी, और उस जैसी उम्दा और मीठी खजूर मैंने कभी नहीं देखी!”

अम्र इब्ने मुहाजिर कहते हैं: “रसूल अलैहिस्सलाम का सामान उमर इब्ने अब्दुल अज़ीज़ के पास एक कमरे में रखा था, और वह हर दिन उसे देखते थे। उनके पास आकर जमा होने वाले क़ुरैश के लोगों को भी वह इस कमरे में ले जाते, फिर इस सामान की तरफ़ मुड़कर कहते: ‘यह उस ज़ात की मीरास है जिसके ज़रिए अल्लाह ने तुम्हें इज़्ज़त बख़्शी!’” वे चीज़ें ये हैं: 1. खजूर के पत्तों से बुना हुआ एक तख़्त,

2. चमड़े के ग़िलाफ़ वाला, अंदर खजूर का रेशा भरा हुआ एक तकिया, 3. एक बड़ी-सी थाली, 4. पानी का एक प्याला,

5. एक लिबास, 6. एक हाथ की चक्की,

7. तीरों का एक तरकश, 8. एक मख़मली लिहाफ़।

(यह लिहाफ़ रसूलुल्लाह के मुबारक जिस्म से रची-बसी ख़ुशबुओं की वजह से मुश्क से भी ज़्यादा ख़ुशबूदार था। उमर इब्ने अब्दुल अज़ीज़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) बीमार होते तो उस लिहाफ़ के धोवन से नहाते और शिफ़ा पाते थे।)

जब इश्क़ का समुंदर लहराया,
वह बेमिसाल मोती (दुर्र-ए-यतीम) ज़ाहिर हुआ,
उसकी शान में पाक ख़ालिक़ ने फ़रमाया:
“लौलाका लमा ख़लक़्तुल अफ़लाक।”
जब उस सूरज की रौशनी फूटी,
उसने सारी कायनात को भर दिया;
जो कोई आपके नक़्श-ए-क़दम पर चले,
हर काम में भलाई पाता है।
मुल्क के मुल्क आपके हुक्म में आ चुके थे, फिर भी
आप तीन कुर्तों के भी मालिक न थे।
आपके घर में ज़्यादा माल न होता था,
वफ़ात के वक़्त आपकी ज़िरह रहन में थी।
जो कुछ आप अक्सर देखा करते थे, उसके आगे
यह दुनिया भला क्या क़ीमत रखती है?
आपके एहसान हर एक पर बेशुमार थे,
“नहीं है” कहना आप जानते ही न थे।
कभी-कभी आप इतना ज़्यादा अता करते,
कि आपके दुश्मन भी सिर झुका देते थे।
हर यतीम के लिए आप मेहरबान बाप थे,
आपकी शफ़क़त कम-ज़र्फ़ों पर भी बहुत थी।
आपके हर काम में बड़ी हिकमत थी,
आपने किसी पर कभी एहसान नहीं जताया।
आप हमेशा बीमार की इयादत करते थे,
दुखियारे को शिफ़ा बख़्शते थे।

“या रसूलल्लाह! आपकी तारीफ़ की ताक़त मुझमें नहीं; हम सब आपके ही सदक़े पैदा किए गए। ग़रज़, ऐ वफ़ा के मुल्क के शाह, आप पर मेरी जान भी क़ुरबान, सब कुछ क़ुरबान!” Hüseyin Hilmi bin Sa’îd (रहमतुल्लाहि अलैहि)

तहज्जुद कभी नहीं छोड़ते थे,
अल्लाह के ख़ौफ़ से सो नहीं पाते थे।
नबी हर किसी को हर वक़्त
अपने बराबर समझते थे।
अल्लाह का बंदा होने पर फ़ख़्र करते थे,
आपकी आदतें इलाही अख़लाक़ से सजी थीं।
जो कोई इस राह की आरज़ू करे,
वह अच्छी सिफ़तों से आरास्ता होता है।
एक मदरसा था जिसमें आप हमेशा हाज़िर रहे,
वहाँ आपका उस्ताद ख़ुद अल्लाह था।
आपका हाल बताने के लिए रहमान ने
क़ुरआन में बड़े ख़ूबसूरत अंदाज़ से बयान फ़रमाया।
महशर तक नबियों के शाह पर
बेहिसाब दुरूद हो!
आपकी आल और आपके सहाबा पर भी
आजिज़ी के साथ दुरूद और सलाम हो!

सोने का परनाला / काबा

मस्जिद-ए-नबवी का बाहरी नज़ारा / मदीना मुनव्वरा

हिल्या-ए-सआदत अपने सहाबा को नसीहत के बाद फ़ख़्र-ए-आलम ने फ़रमाया: मेरे बाद अगर कोई मेरा पाक हिल्या देखे, तो वह ऐसा है जैसे उसने मेरा चेहरा देखा। देखकर उसके दिल में मुहब्बत पैदा हो, यानी वह मेरे हुस्न का आशिक़ हो जाए, मुझे देखने की आरज़ू करे, उसका दिल मेरी मुहब्बत से भर जाए, तो जहन्नम उस पर हराम हो जाएगी, मेरा रब उसे जन्नत अता फ़रमाएगा। हक़ तआला उसे नंगा नहीं उठाएगा, वह हक़ की मग़फ़िरत से जा मिलेगा। कहा गया है: रसूल का हिल्या अगर किसी का हाथ मुहब्बत से लिखे, तो हक़ तआला उसे ख़ौफ़ से अमान में रखेगा, चाहे ज़मीन का चेहरा बलाओं से भर जाए। दुनिया में उसका बदन बीमारी न देखेगा, उसका सारा जिस्म दर्द न जानेगा। अगर उस आदमी ने गुनाह भी किए हों, जहन्नम उसके जिस्म पर हराम हो जाएगी। आख़िरत में अज़ाब से छुटकारा पाएगा, दुनिया में उसका हर काम आसान होगा। जलील रब उसे उठाएगा उन लोगों के साथ जिन्होंने दुनिया में रसूल को देखा। नबी का हिल्या बयान करना मुश्किल है, फिर भी जितनी ताक़त है, उतना हम शुरू करते हैं। ज़ुल जलाल की पनाह लेकर आजिज़ी के साथ बयान करते हैं। इस बात पर सारी उम्मतें एक राय हैं: फ़ख़्र-ए-आलम सुर्ख़ी माइल सफ़ेद रंग के थे। आपका मुबारक चेहरा ख़ालिस सफ़ेद था, गुलाब की तरह सुर्ख़ी लिए हुए था। चेहरे पर पसीना मोती की तरह था, जो उस क़ीमती जौहर को और भी ख़ूबसूरत बनाता था।

पसीना आता तो वह ख़ुशी का सरचश्मा,
मानो नूर का समुंदर लहराने लगता।
आपकी आँखें हमेशा सुरमगीं दिखाई देती थीं,
आपकी प्यारी आँखें दिलों को खींच लेती थीं।
आँख की सफ़ेदी बेहद सफ़ेद थी,
आपके रब ने आयत से उसकी तारीफ़ फ़रमाई।
आपकी आँख की पुतली छोटी न थी,
आपके लिए नज़दीक और दूर बराबर थे।
आँखें बड़ी, ख़ूबसूरत और नाज़ुक थीं,
मुबारक चेहरा हमेशा नूर बिखेरता था।
मुस्तफ़ा की देखने की ताक़त
रात को भी दिन की तरह क़वी थी।
किसी तरफ़ देखना चाहते तो
आपका पाक जिस्म भी उसी तरफ़ मुड़ जाता था।
आपका जिस्म सिर के साथ-साथ मुड़ता था,
इस आदत को आपने कभी न छोड़ा।
रसूल-ए-अकरम जिस्म वाले थे, फिर भी
आपको मुजस्सम रूह कहूँ तो यही सजता है।
ख़ूबसूरत और प्यारे थे रसूल,
हक़ को बहुत महबूब थे रसूल।
मालिक और अबू हाला ने बयान किया:
आप नए चाँद की तरह खुली भौंहों वाले थे।
दोनों भौंहों के बीच का हिस्सा हमेशा
चाँदी की तरह साफ़ चमकता नज़र आता था।
मुबारक चेहरा कुछ गोलाई लिए हुए था,
जिल्द साफ़ थी और चमकती थी।
आपकी काली भौंहों की मेहराब
सारे जहान का क़िब्ला थी।
बग़ल से देखने पर मुबारक नाक
बीच से कुछ उभरी हुई दिखाई देती थी।
बहुत ख़ूबसूरत, सुतवाँ और नाज़ुक थी,
देखने वाला उसका पूरा बयान नहीं कर सकता।
दाँतों के बीच हल्का-सा फ़ासला था,
मोतियों की लड़ी की तरह चमकते थे।
जब आगे के दाँत ज़ाहिर होते,
हर तरफ़ एक नूर छा जाता था।

दोनों जहान के सरवर जब मुस्कुराते,
वह जानदार और बेजान, हर चीज़ के नबी,
तो आगे के दाँत ज़ाहिर होते, बहुत पाक,
ओलों के दानों की तरह बहुत नाज़ुक।
इब्ने अब्बास कहते हैं: ख़ुदा के हबीब
हँसने से झिझकते, शर्माते थे।
अपनी हया की वजह से आप, दीन के सहारे,
कहते हैं, कभी क़हक़हा लगाकर न हँसे।
नाज़ुक और हयादार थे रसूल,
नज़र भरकर देखने से हमेशा हिचकिचाते थे।
आपका चेहरा पूरे चाँद जैसा था,
आपकी ज़ात बुलंद मौला का आईना थी।
वह ख़ूबसूरत चेहरा हमेशा नूरानी था,
उसकी चमक की वजह से उसे देखा न जा सकता था।
उस प्यारे नबी ने दिल जीत लिए,
एक लाख सहाबी आपके आशिक़ हुए।
जिन्होंने आपको ख़्वाब में बस एक बार देखा,
उन्होंने कहा: दुनिया में ऐसी लज़्ज़त नहीं।
जान लें, आपके ख़ूबसूरत गाल भी
ज़्यादा गोश्त वाले न थे, कहते हैं।
जनाब-ए-ख़ालिक़ ने मुहब्बत से
आपका चेहरा सफ़ेद और पेशानी खुली बनाई।
आपकी गर्दन का नूर हर लम्हा
बालों के बीच चमकता रहता था।
मुबारक दाढ़ी के बारे में अच्छी तरह जान लो,
उसके सिर्फ़ सत्रह बाल ही सफ़ेद हुए थे।
वह न घुँघराली थी, न लंबी,
आपके हर अंग की तरह मुनासिब थी।
सारे जहानों के रसूल की पाक गर्दन
बेहद सफ़ेद और बेहद साफ़ थी।
सहाबा में से बहुत-से अदब वालों ने
कहा: आपका पेट और सीना बराबर थे।

अगर आपका मुबारक सीना खुल जाता,
तो इल्म का ख़ज़ाना फ़ैज़95 बिखेरता।
जब इश्क़ ने वहाँ अपना ठिकाना बनाया,
तो वह शरफ़ वाला सीना भला कुछ और हो सकता है?
आपका मुबारक सीना चौड़ा था,
उस पर इल्म-ए-लदुन्नी उतरा था।
सफ़ेद और साफ़ था वह बड़ा सीना,
देखने वाले उसे पूरा चाँद समझते थे।
अज़ली ज़ात के इश्क़ की आग ने
उस हसीन को शोलों में डाल रखा था।
इसे यक़ीनन बूढ़ा और जवान हर कोई जानता है:
फ़ख़्र-ए-आलम के कंधों की हड्डियाँ चपटी थीं।
आपकी पीठ का बीच भी गोश्त भरा था,
आप करम वाले, दौलत वाले थे।
आपके चाँदी जैसे बदन में नज़ाकत थी,
उसमें नुबुव्वत की बड़ी-सी मुहर थी।
नुबुव्वत की मुहर आपकी पीठ पर थी,
यक़ीनन दाईं तरफ़ के क़रीब थी।
बयान करने वालों ने हमें बताया:
शरफ़ वाली मुहर एक बड़ा तिल थी।
उसका रंग पीलेपन के क़रीब स्याह था,
वह कबूतर के अंडे के बराबर थी।
मानो उसके चारों तरफ़ लकीरें घेरे हुए हों –
एक-दूसरे से जुड़े हुए छोटे-छोटे बाल।
उस ऊँचे नसब वाली ज़ात का बयान करने वालों ने
कहा: नबी बड़ी हड्डियों वाले थे।
हर हड्डी बड़ी और मर्दाना थी,
आपकी सूरत और सीरत शाहाना थी।

आपके मुबारक अंगों में से हर एक
मुनासिब और मज़बूत बनाया गया था।
नबी का हर अंग ऐसा ख़ूबसूरत था,
जैसे क़ुरआन की आयतें।
उस सुल्तान की हथेलियाँ
और आपके पाँवों के तलवे
चौड़े, पाक, नाज़ुक और दिलकश थे,
ताज़ा गुलाब की तरह नाज़ुक और महबूब थे।
बहुत मुनासिब थे, कहते हैं नज़र वाले,
वे करामत वाले मुबारक हाथ।
नबी जब किसी को सलाम करते,
हमेशा मुस्कुराते थे।
बीच में एक-दो दिन गुज़र जाते,
यहाँ तक कि एक महीने से भी ज़्यादा हो जाता,
तब भी उस शख़्स को लोगों के बीच
उसकी ख़ुशबू से पहचान लिया जाता था।
आपका बेबाल बदन बिल्लौर जैसा था,
उस पहलू की तारीफ़ मैं कैसे करूँ!
अपने महबूब के दीदार के लिए वह शरीफ़
अपने पूरे नाज़ुक जिस्म के साथ आँख बन गए थे।
आपका नाज़ुक बदन कामिल था,
ख़ालिक़ ने उसमें अपनी हिकमत दिखाई थी।
आपके सीने और पेट पर बिल्कुल
एक बाल भी न था – मानो चाँदी की तख़्ती।
सिर्फ़ सीने के बीच से नीचे की तरफ़
बालों की एक लकीर बराबर से जमी थी।
इस मुबारक बदन पर यह स्याह लकीर
चाँद के गिर्द हाले की तरह ख़ूबसूरत थी।
उम्र भर आपके मुबारक अंग
जवानी के दिनों की तरह ही रहे।
नबी की उम्र जितनी बढ़ती गई,
आप कली की तरह ताज़ा होते गए।
और कायनात के सुल्तान के बारे में
यह गुमान न करना कि आप बहुत मोटे थे।
आप न दुबले थे, न ज़्यादा गोश्त वाले,
दरमियाने जिस्म के और बहुत ताक़तवर थे।

दिल वालों ने आपके बारे में कहा:
आपके अंग एक-दूसरे से न ज़्यादा थे, न कम।
उस्ताद ने आपके बदन के महल की
बुनियाद अद्ल और बराबरी पर रखी।
आपका पाक बदन मुतवाज़िन और मुनासिब था,
आपका सारा बदन नूर में डूबा हुआ था।
दरमियाने क़द के थे वह सिदरा-मकान ज़ात,
आप ही से दुनिया ने निज़ाम पाया।
जिन्होंने आपके क़द-ओ-क़ामत का मोजिज़ा देखा,
सबने आपकी तारीफ़ करते हुए कहा:
ऐसा गुलाब-चेहरा हसीन हमने नहीं देखा,
क़द भी ख़ूबसूरत, अख़लाक़ भी, चेहरा भी ख़ूबसूरत।
नबी दरमियाने क़द के थे, फिर भी
अगर किसी लंबे आदमी के साथ चलते,
वह आदमी चाहे कितना ही लंबा होता,
नबी फिर भी ऊँचे दिखाई देते थे।
लंबे क़द वाले से वह जौहर
एक हथेली के बराबर ऊँचे होते थे।
जब किसी राह पर इज़्ज़त से चलते,
तो बहुत तेज़ क़दम उठाते थे।
आपकी शरफ़ वाली सिफ़तों में से हम यह भी कहते हैं:
चलते वक़्त आप आगे की तरफ़ झुकते थे।
यानी जैसे कोई ढलान से उतर रहा हो,
हमेशा आगे की तरफ़ थोड़ा झुकते थे।
शान वाले, शरफ़ वाले थे वह जलील ज़ात,
आप पर ख़लील की रूह फ़ख़्र करती थी।
अल्लाह जिस ज़ात को चाहे,
उसका हर अंग यक़ीनन सबसे आला होता है।
राह चलते अगर कोई
अचानक रसूलुल्लाह को देख लेता,
तो उसके दिल पर हैबत छा जाती
रसूलुल्लाह की बुलंदी की वजह से।
और अगर कोई नबी के साथ हमेशा
बातचीत करता, आपकी बातें सुनता,
तो आपकी बातों की मिठास की वजह से
आपका ग़ुलाम बन जाता, अगर रसूल क़बूल फ़रमाते।

अज़ली ख़ालिक़ ने आपको आरास्ता किया
ख़ूबसूरत, बेमिसाल अख़लाक़ से।
या रसूलल्लाह! आपकी तारीफ़ की ताक़त मुझमें नहीं,
हम सब आपके ही सदक़े पैदा किए गए।
ग़रज़, ऐ वफ़ा के मुल्क के शाह,
आप पर मेरी जान भी क़ुरबान, सब कुछ क़ुरबान!
Hüseyin Hilmi Işık
(क़द्दसल्लाहु तआला सिर्रहुल अज़ीज़)

मक्का मुकर्रमा का एक पुराना नज़ारा

अहले सुन्नत का क़सीदा
अहले सुन्नत का अक़ीदा – सबसे पहले तुझे इसी की ज़रूरत है,
तिहत्तर फ़िरक़े हैं, मगर बाक़ी सब जहन्नमी हैं।
मुसलमान सब सुन्नी हैं; सबके सरदार नोमान हैं।
जन्नत की ख़ुशख़बरी मिली उन्हें, जो ईमान में इनकी पैरवी करें।
अपना अक़ीदा मज़बूत कर; फिर इस्लाम से जुड़ जा!
इस्लाम के पाँच अरकान अदा कर; हराम से फ़ौरन बच!
कोई गुनाह कर बैठे तो तौबा कर, वक़्त न गँवा!
जो इस्लाम पर न चले, एक दिन ज़रूर पछताएगा।
बेदीन के धोखे में न आ, तू भी बर्बाद होगा, ख़बरदार!
मीठी बातों पर यक़ीन करेगा, तो बाद में तेरा हाल बुरा होगा!
दोग़ले बढ़ गए हैं: बाहर से फ़रिश्ता, अंदर से साँप,
जाल में फँसाने के लिए दोस्त बनते हैं, वह भी दिल से।
हर कोई ख़ुद को हक़ पर समझता है: “बुरा वह है,” कहता है, “जो मेरे साथ नहीं।”
इस्लाम तराज़ू है, वही हक़ वाले को अलग करके दिखाता है!
जान ले: जो इस्लाम पर नहीं चलता, वह सीधे रास्ते से भटका हुआ इंसान है;
इस बात पर ज़रूर यक़ीन करेगा वह, जो तारीख़ को अच्छी तरह समझता है।
जिसका कोई अंग दुखे, वह तबीब के पास क्यों दौड़ता है?
क्योंकि मरना कोई पसंद नहीं करता; हर चीज़ से ज़्यादा मीठी है जान।
हमेशा जीने की आरज़ू मुझमें नहीं – क्या कोई ऐसा कहने वाला है?
मरना मिट जाना नहीं; क़ब्र की ज़िंदगी पर ईमान रख!
जन्नत हमेशा की है, जहन्नम भी; इसकी ख़बर क़ुरआन ने दी है,
हमेशा के अज़ाब से बचना चाहिए, चाहे बस एक शक ही क्यों न हो।
इस पर यक़ीन न करने वाले भी हैं; चमगादड़ रौशनी से भागता है।
कौआ कूड़े में मज़ा पाता है; गुलाब को ढूँढने वाला तो बुलबुल है।
इस्लाम से मुहब्बत कर ही नहीं सकता, जो नफ़्स और मौज-मस्ती का दीवाना है।
क्या ये दोनों एक हो सकते हैं? अच्छा बुरे से अलग है!
मुसलमान हक़ को पहचानते हैं, हर मख़लूक़ पर एहसान करते हैं,
ईमान से ख़ाली लोग साँप की तरह हैं; जान जलाने में लज़्ज़त पाते हैं।
अमान, या रब, अल-अमान! कितना कठिन है आख़िरी ज़माना,
दीन का इल्म भुला दिया गया; नमाज़ पढ़ने वाले बहुत कम रह गए।