मेरे प्यारे नबी

ख़ुशख़बरियाँ

हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम के आने की ख़बर आदम अलैहिस्सलाम से लेकर हर नबी को और उनकी उम्मतों को दी गई थी; और जब आपकी पैदाइश क़रीब आई, तो होने वाले बहुत-से वाक़िआत की पहले से ख़ुशख़बरी दी गई।

असली तौरात1 में – वह किताब जो मूसा2 अलैहिस्सलाम पर उतरी और बाद में उसमें तहरीफ़ कर दी गई – यूँ लिखा है:

“वह ऐसी मुबारक हस्ती हैं कि उनकी हिम्मत बुलंद है, उनकी मदद बहुत ज़्यादा है। वह ग़रीबों के प्यारे, अमीरों के तबीब हैं। वह ख़ूबसूरतों में सबसे ख़ूबसूरत, पाकीज़ा लोगों में सबसे पाकीज़ा हैं। बात करते वक़्त नर्म, बाँटते वक़्त इंसाफ़ करने वाले और हर मामले में सच्चे हैं। काफ़िरों के लिए सख़्त और कड़े हैं। बड़ों का एहतिराम करते और छोटों पर शफ़क़त और रहम करते हैं। थोड़ी चीज़ पर भी शुक्र करते हैं। क़ैदियों पर तरस खाते हैं। हमेशा मुस्कुराते चेहरे वाले हैं। उनकी हँसी मुस्कुराहट की शक्ल में होती है, वह क़हक़हा नहीं लगाते। वह उम्मी हैं; कुछ भी पढ़े और लिखे बग़ैर उन्हें हर चीज़ बता दी गई है। वह अल्लाह तआला के रसूल हैं। वह बुरे मिज़ाज वाले या सख़्त दिल नहीं हैं। बाज़ारों और मंडियों में ऊँची आवाज़ से नहीं चिल्लाते। उनकी उम्मत अच्छे अख़लाक़ वाली है। वे ऊँची जगहों पर अल्लाह तआला का नाम याद करते हैं। उनके मुअज़्ज़िन मीनारों पर लोगों को नमाज़ के लिए बुलाते हैं। वे वुज़ू करके नमाज़ पढ़ते हैं। नमाज़ में सफ़ें सीधी करते हैं, एक सीध में खड़े होते हैं। रातों को उनकी तस्बीह की आवाज़ शहद की मक्खियों की भिनभिनाहट की तरह सुनाई देती है। वह मक्का में पैदा होंगे। मदीना से दमिश्क़ तक हर जगह उनकी हुकूमत में होगी। उनका नाम मुहम्मद है, और मैंने उनका नाम मुतवक्किल रखा है। जब तक वह बिगड़े हुए दीनों को मिटाकर सच्चे, हक़ दीन को फैला और जमा न दें, मैं उन्हें दुनिया से नहीं उठाऊँगा। वह लोगों को हक़ की तरफ़ बुलाएँगे; उनकी बरकत से न देखने वाली आँखें खुलकर देखने लगेंगी, न सुनने वाले कान सुनने लगेंगे। दिलों से ग़फ़लत दूर हो जाएगी…”3

असली ज़बूर4 में – वह किताब जो दाऊद5 अलैहिस्सलाम पर उतरी और बाद में उसमें तहरीफ़ कर दी गई – यूँ लिखा है:

“वह ऐसे शख़्स हैं जिनका हाथ खुला है, यानी सख़ी हैं। वह कभी ग़ुस्सा नहीं करते। बहुत नर्म-मिज़ाज हैं। ख़ूबसूरत चेहरे वाले, मीठी बात वाले और नूरानी चेहरे वाले हैं। इंसानों के तबीब हैं। बहुत रोते हैं, कम हँसते हैं। कम सोते हैं, बहुत ग़ौर-ओ-फ़िक्र करते हैं। उनकी बनावट दिलकश और ख़ूबसूरत है। उनकी बातें दिलों को मोह लेती हैं, रूहों को अपनी तरफ़ खींचती हैं… ऐ मेरे हबीब! हिम्मत की तलवार सौंतकर पूरी ताक़त से बहादुरी के मैदान में काफ़िरों से बदला लो।

अच्छी ज़बान से मेरी हम्द और सना हर जगह फैलाओ। तमाम काफ़िरों के सिर तुम्हारे करामत वाले हाथों के आगे झुक जाएँगे…”

असली इंजील6 में – वह किताब जो ईसा7 अलैहिस्सलाम पर उतरी और बाद में उसमें तहरीफ़ कर दी गई – यूँ बताया गया है:

“या रब! मुझे मुहम्मद अलैहिस्सलाम की उम्मत में से बना दे!” मूसा अलैहिस्सलाम

“वह ज़्यादा नहीं खाते; कंजूस नहीं हैं। चालबाज़ी नहीं करते, किसी की बुराई नहीं करते, कभी जल्दबाज़ी नहीं करते। अपने लिए बदला नहीं लेते। सुस्त नहीं हैं। किसी की ग़ीबत नहीं करते…”

एक काहिन ने ईसा अलैहिस्सलाम से पूछा कि आने वाले नबी का नाम क्या है और उनके आने की निशानियाँ क्या हैं, तो ईसा अलैहिस्सलाम ने कहा:

“रसूल का नाम इतना ख़ूबसूरत है कि सुनने वाला हैरान रह जाए। अल्लाह तआला ने जब उनकी रूह पैदा की, तो उन्हें यह नाम दिया, उन्हें अपनी आसमानी शान-ओ-शौकत के अंदर रखा और फ़रमाया: ‘इंतिज़ार करो, ऐ अहमद! तुम्हारी ख़ातिर मैंने जन्नत, दुनिया और बहुत-सी मख़लूक़ात को पैदा किया। ये सब मैं तुम्हें तोहफ़े में देता हूँ। जो तुम्हारी क़द्र करेगा, वह मुझसे क़द्र पाएगा। जो तुम पर लानत करे (तुम्हें गाली दे), उस पर मेरी तरफ़ से लानत होगी। मैं तुम्हें दुनिया में नजात देने वाला अपना रसूल बनाकर भेजूँगा। तुम्हारी बात ख़ालिस हक़ होगी। ज़मीन और आसमान मिट सकते हैं, मगर तुम्हारा रास्ता हमेशा बाक़ी रहेगा।’ उनका मुक़द्दस नाम अहमद है।” इस पर ईसा अलैहिस्सलाम के इर्द-गिर्द जमा लोगों ने आवाज़ें बुलंद करके पुकारा: “ऐ अहमद! दुनिया को नजात देने के लिए जल्दी आइए!”

आज की इंजीलों में भी मुहम्मद अलैहिस्सलाम की ख़ुशख़बरी दी गई है; ईसाई आपको “पैराक्लीत” कहते हैं, जिसका तर्जुमा “तसल्ली देने वाला” किया गया है, और आप ही अकेले सच्चे तसल्ली देने वाले हैं। ईसा अलैहिस्सलाम ने आपकी उम्मत में शामिल होने के लिए बहुत दुआ की। क़यामत के क़रीब अल्लाह तआला ईसा अलैहिस्सलाम को फिर से ज़मीन पर उतारेगा। उस वक़्त ईसा अलैहिस्सलाम मुहम्मद अलैहिस्सलाम के दीन पर अमल करेंगे: मुहम्मद अलैहिस्सलाम ने जिसे हलाल कहा, उसे हलाल कहेंगे और जिसे हराम कहा, उसे हराम कहेंगे। पैराक्लीत का मतलब अहमद है, और अहमद मुहम्मद अलैहिस्सलाम के नामों में से एक है।

इंजील में यह भी लिखा है:

“रब की तरफ़ से निकलकर आने वाले वह मुनहमन्ना, रब की तरफ़ से निकलकर आने वाले वह रूहुल क़ुदुस अगर आ चुके होते, तो वह मेरे बारे में गवाही देते। तुम भी गवाही दोगे, क्योंकि तुम शुरू से मेरे साथ हो। मैंने ये बातें तुमसे इसलिए कहीं कि तुम शक में न पड़ो और ठोकर न खाओ।” यहाँ आया हुआ मुनहमन्ना लफ़्ज़ सुरयानी ज़बान में मुहम्मद के मायने में है।8

जाहिलिय्यत (जहालत) का दौर

फ़ख़्र-ए-कायनात (कायनात की शान) की पैदाइश से पहले सारा आलम रूहानी लिहाज़ से एक भयानक ज़ुल्मत, अँधेरे में डूबा हुआ था। लोग हद से ज़्यादा सरकश हो गए थे; अल्लाह तआला के भेजे हुए दीन भुला दिए गए थे; इलाही हुक्मों की जगह लोगों के दिमाग़ों से निकले ख़यालात और सोच ने ले ली थी। तमाम मख़लूक़ात इंसानों की वहशत और ज़ुल्म से बुरी तरह तंग आ चुकी थीं।

ज़मीन पर बसने वाली तमाम क़ौमों में अल्लाह तआला को भुला दिया गया था; चैन, सआदत और ख़ुशी का सरचश्मा तौहीद (अल्लाह की वहदानियत) का अक़ीदा मिट चुका था। कुफ़्र के तूफ़ान ने दिलों से ईमान को उखाड़ फेंका था, और दिलों में अल्लाह तआला पर ईमान की जगह बुतपरस्ती का ख़याल बैठ गया था।

मूसा अलैहिस्सलाम का लाया हुआ दीन भुला दिया गया था, तौरात बिगाड़ दी गई थी। बनी इस्राईल आपस में लड़-झगड़ रहे थे। ईसा अलैहिस्सलाम की लाई हुई ईसाइयत (नसरानियत) भी पूरी तरह बिगड़ चुकी थी, असली दीन से उसका कोई ताल्लुक़ बाक़ी न रहा था। तस्लीस, यानी तीन ख़ुदाओं का अक़ीदा मान लिया गया था। इंजील की असल खो गई थी, पादरियों ने उसे अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ बदल डाला था। दोनों किताबें अल्लाह का कलाम होने से निकल गई थीं। मिस्र में बिगड़ी हुई तौरात का हुक्म चलता था, और रूम में बदली हुई ईसाइयत, यानी ईसाई मज़हब का। ईरान में आग को पूजा जाता था; आतिशपरस्तों की आग पूरे हज़ार साल से बुझने नहीं दी गई थी। चीन में कन्फ़्यूशियस मत और हिन्दुस्तान में बौद्ध मत जैसे गढ़े हुए दीन छाए हुए थे।

अरब के लोग तो और भी ज़्यादा भटक और गुमराह हो चुके थे। अल्लाह तआला की नज़र में बहुत क़द्र वाले काबा मुअज़्ज़मा में उन्होंने तीन सौ साठ (360) बुत रख दिए थे, हालाँकि काबा मुअज़्ज़मा उस “बैतुल मामूर” का उसी नाप का एक नमूना था, जिसकी अर्श में फ़रिश्ते ज़ियारत करते हैं। जिसने भी काबा की बेहुरमती की, अल्लाह पाक ने उसे बहुत जल्द हलाक कर दिया।

जुरहुम क़बीला भी ज़िना और बदकारी में हद से आगे बढ़ गया था। इस क़बीले की बहुत बेअदबी और बहुत घटिया हरकतें देखकर उनके बादशाह ने उन्हें यूँ नसीहत की: “ऐ जुरहुम वालो! अल्लाह तआला के हरम शरीफ़ और हरम के अमन का ख़याल करके होश में आओ! तुमसे पहले गुज़री हूद, सालेह और शुऐब (अलैहिमुस्सलाम) की उम्मतों में से हर एक पर जो हालात आए और वे किस तरह हलाक हुए, यह तुम जानते हो। एक-दूसरे को भलाई का हुक्म दो, बुराइयों से रोको। अपनी आरज़ी ताक़त पर भरोसा करके धोखा न खाओ। मक्का में हक़ से मुँह मोड़ने और ज़ुल्म से बचो, क्योंकि ज़ुल्म इंसानों की हलाकत का सबब बनता है। मैं अल्लाह तआला की क़सम खाकर कहता हूँ कि ऐसा कभी नहीं हुआ कि लोग इस इलाक़े में रहें, ज़ुल्म करें, हक़ से मुँह मोड़ें और अल्लाह तआला उनकी नस्ल न काटे, उनकी जड़ें न उखाड़े और उनकी जगह किसी दूसरी क़ौम को न ले आए। जो मक्का वाले सरकशी पर अड़े रहें और हक़ से मुँह मोड़ें, वे यहाँ हमेशा नहीं रह सकते। तुमसे पहले इस इलाक़े में रहने वाली, तुमसे लंबी उम्र वाली, तुमसे ज़्यादा ताक़तवर, तुमसे ज़्यादा तादाद वाली और मालदार तस्म, जदीस और अमालिक़ा क़ौमों पर जो गुज़री, वह तुम जानते हो। हरम शरीफ़ को हल्का समझना और हक़ से मुँह मोड़कर ज़ुल्म में डूब जाना उनके इस मुबारक जगह से निकाल फेंके जाने का सबब बना। तुमने देखा और सुना होगा कि अल्लाह तआला ने उनमें से कुछ पर छोटी-छोटी चींटियाँ मुसल्लत करके, कुछ को क़हत से और कुछ को तलवार से निकाल बाहर किया!”

लेकिन उन्होंने नहीं सुना। आख़िरकार अल्लाह तआला ने उन्हें भी उनकी इसी सरकशी की वजह से तबाह-ओ-बर्बाद कर दिया… ऐसे ही एक ज़माने में, ज़मीन के मरकज़ मुबारक मक्का में कुफ़्र सैलाब की तरह बह रहा था, बैतुल्लाह के अंदर लात, उज़्ज़ा, मनात जैसे सैकड़ों बुत भरे जा रहे थे। ज़ुल्म अपनी आख़िरी हद को पहुँच रहा था, बेहयाई को फ़ख़्र की बात माना जाता था। अरब दीनी, रूहानी, समाजी और सियासी लिहाज़ से एक फैले हुए अँधेरे, पूरी जहालत, बेलगामी, सरकशी और गुमराही में था। जाहिलिय्यत (जहालत) का दौर कहलाने वाले इस ज़माने में लोग आम तौर पर ख़ानाबदोशी की ज़िंदगी गुज़ारते थे और क़बीलों में बँटे हुए थे। जाहिलिय्यत का दौर ज़ुल्मत से भरा हुआ दौर था। अरब क़बीले हमेशा आपस में झगड़ते रहते थे और छापामारी और लूटमार को अपनी रोज़ी का ज़रिया समझते थे। जिन क़बीलों में ज़ुल्म और लूटमार आम हो चुकी थी, उन्हीं से बने अरब में न कोई सियासी निज़ाम था, न कोई समाजी ढाँचा। इसके अलावा शराब, जुआ, ज़िना, चोरी, ज़ुल्म, झूठ और बेहयाई के नाम पर जो कुछ था, सब बेहिसाब फैल चुका था। ताक़तवर लोग ज़ुल्म को कमज़ोरों के ख़िलाफ़ सबसे बेरहम और रोंगटे खड़े कर देने वाले हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते थे। औरत को एक मामूली माल की तरह ख़रीदा और बेचा जाता था। कुछ लोग बेटियों के पैदा होने को मुसीबत और मुँह की कालिख समझते थे। यह ख़ौफ़नाक सोच इस हद तक पहुँच चुकी थी कि वे छोटी-छोटी बच्चियों को रेत में खोदे हुए गड्ढों में ज़िंदा लिटा देते, और उनके “अब्बा! अब्बा!…” कहते हुए गले से लिपटने और दर्द से चीख़ने पर ज़रा भी कान न धरते, उन पर मिट्टी डालकर उन्हें मरने के लिए छोड़ देते थे। इन हरकतों पर उनका ज़मीर ज़रा भी न कचोटता था, बल्कि वे इसे बहादुरी समझते थे। ग़रज़ उस ज़माने के लोगों में शफ़क़त, रहम, भलाई और इंसाफ़ जैसी अच्छी ख़ूबियाँ जैसे मिट चुकी थीं।

“मैं तुम्हें ख़ुशख़बरी देता हूँ कि मेरे बाद अहमद नाम के एक रसूल आएँगे” ईसा अलैहिस्सलाम

लेकिन इस दौर में अरबों के बीच ग़ौर करने लायक़ एक बात थी: अदब, बलाग़त और फ़साहत की बड़ी क़द्र होने लगी थी और ये अपनी चोटी पर पहुँच गई थीं। वे शायर और शायरी को बहुत अहमियत देते थे और इसे बड़े फ़ख़्र की बात समझते थे। एक ज़बरदस्त शायर अपने लिए भी और अपने क़बीले के लिए भी इज़्ज़त का सबब बनता था। मुक़र्रर वक़्तों पर मेले लगते थे, शायरी और ख़िताबत के मुक़ाबले होते थे। मुक़ाबले में अव्वल आने वालों की नज़्में या ख़ुत्बे काबा की दीवार पर लटकाए जाते थे। जाहिलिय्यत के दौर में काबा की दीवार पर लटकाई गई सबसे मशहूर सात नज़्मों को “अल-मुअल्लक़ातुस सबआ”, यानी “सात लटकाई हुई नज़्में” कहा जाता था।

उस वक़्त अरब में लोग अक़ीदे के लिहाज़ से भी बिखरे हुए थे। कुछ का कोई अक़ीदा ही न था और वे दुनिया की ज़िंदगी के सिवा कुछ नहीं मानते थे। कुछ अल्लाह तआला और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते थे, मगर यह नहीं मानते थे कि इंसानों में से कोई नबी आएगा। कुछ अल्लाह तआला पर तो ईमान रखते थे, मगर आख़िरत को नहीं मानते थे। एक और बड़ा हिस्सा अल्लाह तआला के साथ शिर्क करके बुतों की पूजा करता था। मुशरिकों में से हर एक के घर में एक बुत होता था।

आलम में इस क़दर अँधेरा हो गया था और चारों तरफ़ ज़ुल्मत इस तरह छा गई थी कि लोगों ने हर चीज़ के पैदा करने वाले अल्लाह तआला पर ईमान लाना और उसकी इबादत करना छोड़ दिया था। अपनी हैरानी में वे कायनात में होने वाले वाक़िआत की और अल्लाह पाक की पैदा की हुई चीज़ों की, ख़ास तौर पर अपने हाथों से तराशे हुए पत्थर और लकड़ी के बुतों की “इलाह” समझकर पूजा करते थे।

इन सबके अलावा कुछ सही ईमान वाले मोमिन भी थे, जो हज़रत इब्राहीम के बताए हुए दीन पर क़ायम थे और “हनीफ़” कहलाते थे। वे अल्लाह तआला पर ईमान रखते और बुतों से दूर रहते थे। नबी-ए-करीम के वालिद अब्दुल्लाह, दादा अब्दुल मुत्तलिब, वालिदा और कुछ दूसरे लोग इब्राहीम अलैहिस्सलाम के दीन पर थे।

हनीफ़ मोमिनों के सिवा बाक़ी तमाम गिरोह बातिल रास्ते पर थे और बड़ी ज़ुल्मत और अँधेरे में डूबे हुए थे।

ज़ुल्मात और आब-ए-हयात

अबू मुजाहिद अनवर इब्ने नाज़िफ़ रहमतुल्लाहि अलैहि ने फ़रमाया: “आब-ए-हयात ज़ुल्मात में होता है।” आब-ए-हयात ज़िंदगी का वह पानी है जिसे पीने वाला नहीं मरता, और ज़ुल्मात का मतलब है अँधेरा। माना जाता है कि यह पानी उन जंगलों में होता है जहाँ कभी कुल्हाड़ी नहीं पड़ी – जंगली जानवरों के बीच, घुप अँधेरे में, जंगलों की गहराइयों में।

इस पानी तक पहुँचना नामुमकिन की हद तक मुश्किल है। रिवायत की जाती है कि जो शख़्स इन सख़्त रुकावटों को पार करके उस पानी तक पहुँच जाए, वह नहीं मरेगा। अहले सुन्नत का अक़ीदा भी गोया क़ाफ़ पहाड़ के पीछे, कभी कुल्हाड़ी न पड़ने वाले जंगलों के सबसे दूर कोने में मौजूद आब-ए-हयात की तरह है। जो हमेशगी की तरफ़ बहने वाले इस पानी से एक बूँद भी पी ले, वह हमेशा की नेमतें पा लेता है। एक मिसरे में कहा गया है: “आब-ए-हयात अँधेरी जगहों में होता है!”

हज़रत हुसैन हिल्मी इब्ने सईद क़ुद्दिसा सिर्रुहू ने भी फ़रमाया: “जो उसमें से एक बूँद पी ले, उसके लिए फिर मौत नहीं, जन्नत में उसके लिए हमेशा की ज़िंदगी है। आब-ए-हयात उन जगहों में होता है जहाँ बुरे, बिगड़े हुए लोग, बिदअतें और कुफ़्र हों।”

कायनात के सुल्तान तशरीफ़ ला रहे हैं

आलम ग़मगीन था, मौजूदात ग़मगीन थीं, दिल ग़मगीन थे और चेहरे मुस्कुराना भूल चुके थे। अल्लाह तआला ने जिन इंसानों को दूसरी मख़लूक़ात से बुलंद बनाकर पैदा किया, उन्हें एक ऐसे बहादुर रहबर की ज़रूरत थी जो उनके जहन्नम से नजात पाने का सबब बने, और उस रहबर की पैदाइश में बहुत थोड़ा वक़्त बाक़ी रह गया था। आलम उस नूर के मालिक के इस्तिक़बाल की तैयारी कर रहा था जो आदम अलैहिस्सलाम से आज तक पाक पेशानियों से पाक पेशानियों में मुंतक़िल होता आया था। इंसानों और जिन्नों को हमेशा की सआदत का रास्ता दिखाने वाले बेमिसाल इंसान तशरीफ़ ला रहे थे! शफ़क़त और रहमत के सरचश्मे, अपने रब के अख़लाक़ से आरास्ता बुलंद इंसान तशरीफ़ ला रहे थे!

मक़ाम-ए-महमूद के मालिक, शफ़ाअत करने वालों के सिर के ताज तशरीफ़ ला रहे थे! कायनात के उस्ताद, मौजूदात के जौहर, इंसानों के सरदार तशरीफ़ ला रहे थे! महशर के दिन मदद को पहुँचने वाले, नबियों के सुल्तान तशरीफ़ ला रहे थे! अल्लाह तआला के हबीब, उसके प्यारे, जिनकी ख़ातिर हम पैदा किए गए, सारे जहानों के लिए रहमत हमारे प्यारे नबी तशरीफ़ ला रहे थे! नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तशरीफ़ ला रहे थे…

कहा उन्होंने: तुम्हारे बेटे जैसा बेटा कभी
जहान के बनने से अब तक आया नहीं कोई भी।
तुम्हारे बेटे को जो ऐसी बुलंद क़द्र मिली,
किसी माँ को न दी थी उस जलील ने कभी।
बड़ी सआदत पाई तुमने, ऐ आमिना, सच है,
तुमसे पैदा होंगे वह जो ख़ुश-अख़लाक़ हैं।
यह आने वाले इल्म-ए-लदुन्नी के सुल्तान हैं,
यह आने वाले तौहीद और इरफ़ान की खान हैं।
एक नाम महमूद है, एक नाम अहमद है,
उनका वुजूद सारे जहान के लिए रहमत है।
इन्हीं के इश्क़ में घूमता है यह फ़लक,
इनके चेहरे के मुश्ताक़ हैं इंसान और मलक।

“क़यामत के दिन मैं पहले आने वालों और बाद में आने वालों का सरदार हूँ। मैं हक़ीक़त बता रहा हूँ, फ़ख़्र नहीं कर रहा” हदीस शरीफ़

मक्का मुकर्रमा का इलाक़ा

आया एक सफ़ेद परिंदा पर अपने फैलाए,
मेरी पीठ पर उसने ज़ोर से पर फिराए।
उसी घड़ी पैदा हुए वह दीन के सुल्तान,
नूर में डूब गए सारे ज़मीन-ओ-आसमान।
जो चाहे कि आग से उसको मिले नजात,
इश्क़ और शौक़ से भेजे दुरूद की सौग़ात!
अस्सलातु वस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह!
अस्सलातु वस्सलामु अलैका या हबीबल्लाह!
अस्सलातु वस्सलामु अलैका या सय्यिदल अव्वलीना वल आख़िरीन।