मेरे प्यारे नबी

नबी-ए-करीम के मोजिज़े

हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम के अल्लाह तआला के नबी होने को ज़ाहिर करने वाली गवाहियाँ इतनी ज़्यादा हैं कि गिनी नहीं जा सकतीं। अल्लाह तआला ने फ़रमाया: “अगर तुम न होते, तो मैं आलम को पैदा न करता!”1 तमाम मौजूदात जिस तरह अल्लाह तआला के वुजूद और उसकी वहदानियत को ज़ाहिर करती हैं, उसी तरह मुहम्मद अलैहिस्सलाम के नबी होने और आपकी बरतरी को भी ज़ाहिर करती हैं। आपकी उम्मत के औलिया में ज़ाहिर होने वाली करामतें सब आपके ही मोजिज़े हैं, क्योंकि करामतें उन्हीं लोगों में ज़ाहिर होती हैं जो आपकी पैरवी करते हैं, आपके नक़्श-ए-क़दम पर चलते हैं। यहाँ तक कि तमाम नबी आपकी उम्मत में से होना चाहते थे, बल्कि सही कहें तो सब आपके नूर से पैदा किए गए थे, इसलिए उनके मोजिज़े भी मुहम्मद अलैहिस्सलाम के मोजिज़ों में गिने जाते हैं। हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम के मोजिज़े ज़माने के लिहाज़ से तीन क़िस्मों में बाँटे गए हैं:

पहले वे हैं जो आपकी मुबारक रूह के पैदा होने से लेकर बेसत के उस ज़माने तक हुए, जब आपकी नुबुव्वत का एलान किया गया। दूसरे वे हैं जो बेसत से लेकर आपकी वफ़ात तक के ज़माने में हुए।

तीसरे वे हैं जो आपकी वफ़ात से क़यामत तक हुए हैं और होंगे। इनमें से पहली क़िस्म को इरहास कहा जाता है। इनमें से हर एक फिर दो क़िस्मों में बँटता है: एक वे मोजिज़े जो आँखों से देखे गए, और दूसरे वे जो देखे बिना अक़्ल से समझे गए। तमाम मोजिज़े इतने ज़्यादा हैं कि उनकी हद बाँधना और उन्हें गिनना मुमकिन नहीं हुआ। बताया गया है कि दूसरी क़िस्म के मोजिज़े तीन हज़ार के क़रीब हैं। इनमें से कुछ मशहूर मोजिज़े नीचे दिए जा रहे हैं। 1. मुहम्मद अलैहिस्सलाम के मोजिज़ों में सबसे बड़ा मोजिज़ा क़ुरआन-ए-करीम है। आज तक जितने शायर और अदीब आए, सब क़ुरआन-ए-करीम की नज़्म (इबारत) और उसके मानी के सामने आजिज़ और हैरान रह गए। वे एक आयत-ए-करीमा जैसी आयत भी न कह सके। इसका एजाज़ और इसकी बलाग़त इंसान के कलाम जैसी नहीं है। यानी अगर इसका एक लफ़्ज़ निकाल दिया जाए या इसमें एक लफ़्ज़ बढ़ा दिया जाए, तो इसके अल्फ़ाज़ और मानी की ख़ूबसूरती बिगड़ जाती है। इसके किसी लफ़्ज़ की जगह रखने के लिए दूसरा लफ़्ज़ ढूँढने वाले उसे न पा सके। इसकी नज़्म अरब शायरों के शेरों जैसी नहीं है। यह गुज़रे ज़माने में हो चुकी और आने वाले ज़माने में होने वाली कितनी ही छिपी बातों की ख़बर देता है। इसे सुनने वाले और पढ़ने वाले इसके मज़े से सेर नहीं होते। थक जाएँ तब भी उकताते नहीं। अनगिनत तजुर्बों से मालूम हुआ है कि इसका पढ़ना और सुनना परेशानियों को दूर कर देता है। ऐसे लोग भी देखे गए हैं कि इसे सुनकर उनके दिलों पर दहशत और ख़ौफ़ छा गया, यहाँ तक कि इसी वजह से वे मर गए। इस्लाम के कितने ही कट्टर दुश्मनों के दिल क़ुरआन-ए-करीम सुनकर नर्म हो गए और वे ईमान ले आए। इस्लाम के दुश्मनों में से और उन ज़िंदीक़ों में से, जो मुसलमानों के नाम रखते हैं और मुअत्तला, मलाहिदा और क़रामिता कहलाते हैं, कुछ लोगों ने क़ुरआन-ए-करीम को बदलने, बिगाड़ने और इस जैसा कलाम कहने की कोशिश की, मगर उनमें से कोई भी अपनी मुराद को न पहुँच सका। जबकि तौरात और इंजील को इंसान हमेशा बदलते रहे हैं और आज भी बदल रहे हैं। तमाम उलूम और तजुर्बों से भी न पाई जा सकने वाली अच्छी बातें, अच्छे अख़लाक़, इंसानों को बरतरी देने वाली ख़ूबियाँ, दुनिया और आख़िरत की सआदत तक पहुँचाने वाली नेकियाँ, मौजूदात की शुरुआत और अंजाम के बारे में इल्म, और इंसानों के लिए फ़ायदेमंद और नुक़सानदेह तमाम चीज़ें क़ुरआन-ए-करीम में खुले तौर पर या छिपे तौर पर बताई गई हैं। छिपी हुई बातों को इसके अहल (माहिर लोग) समझ सकते हैं। तमाम आसमानी किताबों – तौरात, ज़बूर और इंजील – में मौजूद सारे उलूम और असरार क़ुरआन-ए-करीम में बताए गए हैं। क़ुरआन-ए-करीम में मौजूद तमाम उलूम को सिर्फ़ अल्लाह तआला ही जानता है। इनमें से ज़्यादातर उसने अपने प्यारे नबी (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) को बताए हैं। अली और हुसैन (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुमा) ने ख़बर दी है कि वे इन उलूम में से बहुत कुछ जानते हैं। क़ुरआन-ए-करीम पढ़ना बहुत बड़ी नेमत है। अल्लाह तआला ने यह नेमत अपने हबीब की उम्मत को अता फ़रमाई है। फ़रिश्ते इस नेमत से महरूम हैं। इसी लिए जहाँ क़ुरआन-ए-करीम पढ़ा जाता है, वहाँ वे जमा होकर सुनते हैं। तमाम तफ़सीरें क़ुरआन-ए-करीम के उलूम में से बहुत थोड़ा ही बयान करती हैं। क़यामत के दिन जब मुहम्मद अलैहिस्सलाम मिम्बर पर तशरीफ़ ले जाकर क़ुरआन-ए-करीम पढ़ेंगे, तो सुनने वाले इसके तमाम उलूम को समझ लेंगे। 2. मुहम्मद अलैहिस्सलाम के मशहूर मोजिज़ों में सबसे बड़े मोजिज़ों में से एक चाँद को दो टुकड़े करना है। यह मोजिज़ा किसी और नबी को नसीब नहीं हुआ। मुहम्मद अलैहिस्सलाम जब बावन साल के थे, तो मक्का में क़ुरैश के काफ़िरों के सरग़ना आपके पास आए और कहने लगे: “अगर तुम नबी हो, तो चाँद को दो टुकड़े करके दिखाओ!” मुहम्मद अलैहिस्सलाम दिल से चाहते थे कि हर कोई, ख़ास तौर पर आपके जान-पहचान वाले और रिश्तेदार ईमान ले आएँ। आपने हाथ उठाकर दुआ फ़रमाई। अल्लाह तआला ने दुआ क़बूल की और चाँद को दो टुकड़े कर दिया। उसका आधा हिस्सा एक पहाड़ के ऊपर और दूसरा आधा दूसरे पहाड़ के ऊपर दिखाई दिया। काफ़िरों ने कहा: “मुहम्मद ने हम पर जादू कर दिया है।” और वे ईमान न लाए।

“मुहम्मद अलैहिस्सलाम के हज़ार मोजिज़े ज़ाहिर हुए, दोस्त-दुश्मन सबने यह बात कही। इतने मोजिज़ों में सबसे क़ीमती आपका अदब वाला होना और आपके अच्छे अख़लाक़ थे” रियाज़ुन नासिहीन

शेर:
चाँद को देखकर कुत्ता भौंकता है,
इसमें भला चाँद का क्या क़ुसूर है?
कुत्तों का काम तो हमेशा भौंकना है,
अहमक़ इससे क्या समझता है?
बैत:
मुँह का ज़ायक़ा बिगड़ना बीमारी की निशानी है:
सबसे मज़ेदार शरबत भी बीमार को कड़वा लगता है।

3. मुहम्मद अलैहिस्सलाम ने कुछ ग़ज़वों में, जब पानी ख़त्म हो गया, अपना मुबारक हाथ एक बर्तन के पानी में डाला; आपकी उँगलियों के बीच से पानी बहने लगा और वह बर्तन लगातार भरकर छलकता रहा। इस पानी से कभी अस्सी, कभी तीन सौ, कभी पंद्रह सौ लोगों ने, और तबूक के ग़ज़वे में सत्तर हज़ार लोगों ने, सबने अपने जानवरों समेत पिया और इसे काम में लाए। जब आपने अपना मुबारक हाथ पानी से निकाला, तो पानी का बहना रुक गया। 4. एक दिन आप अपने चचा अब्बास के घर तशरीफ़ ले गए और उन्हें और उनकी औलाद को अपने पास बिठाया। उन पर अपना एहराम डालकर आपने फ़रमाया: “या रब! जिस तरह मैंने अपने इस चचा और अपने अहले बैत को ढाँप लिया है, उसी तरह तू भी इन्हें जहन्नम की आग से बचा!” दीवारों से तीन बार “आमीन” की आवाज़ सुनाई दी।2 5. एक दिन आपसे मोजिज़ा माँगने वालों के जवाब में आपने दूर के एक पेड़ को बुलाया। पेड़ अपनी जड़ें घसीटता हुआ आया, सलाम किया और कहा: “अशहदु अन ला इलाह इल्लल्लाह व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू।” फिर वापस जाकर अपनी जगह पर खड़ा हो गया। 6. ख़ैबर के ग़ज़वे में जब आपके सामने ज़हर मिला हुआ भेड़ का कबाब रखा गया, तो आवाज़ सुनाई दी: “या रसूलल्लाह! मुझे न खाइए, मैं ज़हरीला हूँ।”

7. एक दिन आपने एक शख़्स से, जिसके हाथ में बुत था, फ़रमाया: “अगर तुम्हारा बुत मुझसे बात करे, तो क्या तुम ईमान ले आओगे?” उस आदमी ने कहा: “मैं पचास साल से इसकी इबादत कर रहा हूँ। इसने मुझसे कभी एक बात भी नहीं की। तुमसे कैसे बात करेगा?” जब मुहम्मद अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: “ऐ बुत! मैं कौन हूँ?”, तो आवाज़ सुनाई दी: “आप अल्लाह के नबी हैं।” बुत का मालिक उसी वक़्त ईमान ले आया।

8. मदीना में, मस्जिद-ए-नबवी में खजूर का एक तना गड़ा हुआ था। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ख़ुत्बा पढ़ते वक़्त इसी सुतून से टेक लगाते थे। इसे हन्नाना कहा जाता था। जब मिम्बर बन गया, तो आप हन्नाना के पास नहीं गए। सारी जमाअत ने उसके रोने की आवाज़ सुनी। हमारे नबी मिम्बर से उतरे और हन्नाना से लिपट गए। उसकी आवाज़ बंद हो गई। रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “अगर मैं इससे न लिपटता, तो यह मेरी जुदाई में क़यामत तक रोता रहता।”

ऐसे मोजिज़े बहुत देखे गए और इनकी ख़बर दी गई है। 9. बहुत बार देखा गया कि आपके हाथ में ली हुई कंकरियाँ और आपके पकड़े हुए खाने के टुकड़े शहद की मक्खी की भिनभिनाहट जैसी आवाज़ से अल्लाह तआला की तस्बीह करते थे।

10. एक दिन एक काफ़िर आकर कहने लगा: “मैं कैसे जानूँ कि तुम नबी हो?” रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “अगर मैं उस खजूर के पेड़ पर लगे गुच्छे को बुलाऊँ और वह आ जाए, तो क्या तुम ईमान ले आओगे?” काफ़िर ने कहा: “हाँ, ईमान ले आऊँगा।” रसूलुल्लाह ने खजूर के गुच्छे को बुलाया, और वह उछलता-कूदता हुआ आ गया। रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “अपनी जगह वापस जाओ!” गुच्छा पेड़ पर अपनी जगह चढ़कर फिर लटक गया। यह देखकर वह काफ़िर ईमान ले आया। 11. मक्का में कुछ भेड़ियों ने एक रेवड़ में से भेड़ें दबोच लीं और ले भागे। चरवाहे ने उन पर हमला करके भेड़ें भेड़ियों से छुड़ा लीं, तो भेड़ियों में से एक ने कहा: “अल्लाह तआला की भेजी हुई हमारी रोज़ी हमारे हाथ से छीनते हुए क्या तुम्हें अल्लाह तआला से डर नहीं लगा?” चरवाहे ने कहा: “बड़ी हैरानी की बात है! क्या भेड़िया भी बोलता है?” तो भेड़िये ने कहा: “क्या मैं तुम्हें इससे भी ज़्यादा हैरानी की बात बताऊँ? मदीना में अल्लाह तआला के नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) मोजिज़े दिखा रहे हैं।” चरवाहे ने आकर यह बात रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को सुनाई और मुसलमान हो गया।

12. हमारे नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) एक चरागाह से गुज़र रहे थे कि आपने तीन बार “या रसूलल्लाह!” की आवाज़ सुनी। आपने उस तरफ़ देखा तो एक बँधी हुई हिरनी दिखाई दी। उसके पास एक आदमी सो रहा था। आपने हिरनी से उसकी ख़्वाहिश पूछी, तो उसने कहा: “इस शिकारी ने मुझे पकड़ लिया है। सामने वाली पहाड़ी पर मेरे दो बच्चे हैं। मुझे छोड़ दीजिए! मैं जाकर उन्हें पेट भर दूध पिला आऊँ और फिर लौट आऊँ।” रसूल अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: “क्या तुम अपने वादे पर क़ायम रहकर लौट आओगी?” हिरनी ने कहा: “मैं अल्लाह के लिए वादा करती हूँ। अगर न लौटूँ, तो अल्लाह का अज़ाब मुझ पर हो!” रसूलुल्लाह ने हिरनी को छोड़ दिया। थोड़ी देर बाद वह लौट आई। वह आदमी जागा और बोला: “या रसूलल्लाह! क्या आपका कोई हुक्म है?” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “इस हिरनी को आज़ाद कर दो!” उस आदमी ने हिरनी की रस्सी खोलकर उसे छोड़ दिया। हिरनी ने कहा: “अशहदु अन ला इलाह इल्लल्लाह व अन्नका रसूलुल्लाह।” और चली गई।

13. एक दिन आपने एक देहाती को ईमान की दावत दी। उसने कहा: “अगर तुम मेरे एक मुसलमान पड़ोसी की इंतिक़ाल कर चुकी बेटी को ज़िंदा कर दो, तो मैं ईमान ले आऊँगा।” दोनों लड़की की क़ब्र पर गए, और रसूलुल्लाह ने उसका नाम लेकर उसे पुकारा। पहले क़ब्र के अंदर से आवाज़ सुनाई दी, फिर लड़की बाहर निकल आई। रसूलुल्लाह ने पूछा: “क्या तुम दुनिया में वापस आना चाहती हो?” लड़की ने कहा: “या रसूलल्लाह! मैं दुनिया में वापस आना नहीं चाहती। यहाँ मैं अपने बाप के घर से भी ज़्यादा आराम में हूँ। मुसलमान की आख़िरत उसकी दुनिया से बेहतर है।” यह देखकर वह देहाती उसी वक़्त ईमान ले आया। 14. जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) ने एक भेड़ पकाई। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने सहाबा के साथ उसे खाया। आपने फ़रमाया: “इसकी हड्डियाँ न तोड़ना!” फिर आपने हड्डियाँ इकट्ठी कीं, उन पर अपने मुबारक हाथ रखे और दुआ फ़रमाई। अल्लाह तआला ने भेड़ को ज़िंदा कर दिया। 15. रसूलुल्लाह के पास एक ऐसे बच्चे को लाया गया जो बड़ा हो जाने के बावजूद कभी नहीं बोला था। आपने पूछा: “मैं कौन हूँ?” बच्चे ने जवाब दिया: “आप रसूलुल्लाह हैं।” और वह मरते दम तक बोलता रहा।

“या रब! जिस तरह मैंने अपने इस चचा (अब्बास) और अपने अहले बैत को ढाँप लिया है, उसी तरह तू भी इन्हें जहन्नम की आग से बचा!” हदीस शरीफ़

16. एक आदमी ने साँप के अंडे पर पाँव रख दिया और उनकी दोनों आँखों की रौशनी चली गई। उन्हें रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पास लाया गया। आपने अपना मुबारक लुआब उनकी आँखों पर लगाया, तो उन्हें दिखाई देने लगा। यहाँ तक कि अस्सी साल की उम्र में भी वह सुई में धागा डाल लेते थे।

17. मुहम्मद इब्ने हातिब बयान करते हैं: “मैं छोटा था। मुझ पर खौलता पानी गिर गया और मेरा जिस्म जल गया। मेरे वालिद मुझे रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) के पास ले गए। आपने अपने मुबारक हाथों से अपना लुआब जले हुए हिस्सों पर लगाया और दुआ फ़रमाई। जले हुए हिस्से उसी वक़्त ठीक हो गए।”

18. एक औरत अपने गंजे बेटे को लेकर आई। रसूलुल्लाह ने उसके सिर पर अपने मुबारक हाथ फेरे। लड़के को शिफ़ा मिल गई और उसके बाल उगने लगे।

19. तिरमिज़ी और नसाई की “सुनन” किताबों में बयान किया गया है: एक आदमी, जिनकी दोनों आँखें अंधी थीं, आए और कहने लगे: “या रसूलल्लाह! दुआ कीजिए कि मेरी आँखें खुल जाएँ।” हमारे नबी ने उन पर रहम फ़रमाया और उनसे फ़रमाया कि वह बेऐब तरीक़े से वुज़ू करें और फिर यह दुआ पढ़ें: “या रब! मैं तुझसे गिड़गिड़ाकर दुआ करता हूँ। तेरे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम को बीच में रखकर तुझसे माँगता हूँ। ऐ मेरे बहुत प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद! मैं आपको वसीला बनाकर अपने रब से गिड़गिड़ाकर दुआ करता हूँ। मैं चाहता हूँ कि मेरा रब आपकी ख़ातिर मेरी दुआ क़बूल फ़रमाए। या रब! इस बुलंद नबी को मेरी शफ़ाअत करने वाला बना दे! इनके सदक़े मेरी दुआ क़बूल फ़रमा!” उन साहब ने वुज़ू करके दुआ की, तो उनकी आँखें खुल गईं। मुसलमान यह दुआ हमेशा पढ़ते आए हैं और अपनी मुरादों को पहुँचे हैं। 20. रसूलुल्लाह अबू तालिब के साथ एक रेगिस्तान में सफ़र कर रहे थे। अबू तालिब ने बताया कि उन्हें बहुत प्यास लगी है। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) सवारी से ज़मीन पर उतरे और फ़रमाया: “क्या आपको प्यास लगी है?” और अपने मुबारक पाँव की एड़ी ज़मीन पर मारी। ज़मीन से पानी फूट निकला। आपने फ़रमाया: “चचा जान, यह पानी पी लीजिए!” 21. हुदैबिया के सफ़र में मुसलमान एक ऐसे कुएँ के पास ठहरे जिसमें पानी कम था। लश्कर वालों ने प्यास की शिकायत की। रसूलुल्लाह ने एक डोल पानी मँगवाया। आपने उसी पानी से वुज़ू किया, उसमें अपना लुआब डाला और उसे कुएँ में डलवा दिया। फिर एक तीर लेकर कुएँ में डाल दिया। थोड़ी ही देर में उन्होंने देखा कि कुआँ मुँह तक पानी से भर गया है।

22. एक ग़ज़वे में लश्कर ने प्यास की शिकायत की। रसूल अलैहिस्सलाम ने दो सिपाहियों को पानी ढूँढने भेजा। उन्होंने एक औरत को देखा जो ऊँट पर पानी से भरी दो मश्कें लिए जा रही थी, और वे उसे ले आए। रसूल अलैहिस्सलाम ने औरत से थोड़ा पानी माँगा। उसे एक बर्तन में डलवाया। सारा लश्कर बारी-बारी आया और अपने बर्तन और मश्कें भर लीं। उन्होंने औरत को कुछ खजूरें दीं और उसकी मश्कें भी पानी से भर दीं।

रसूलुल्लाह ने उससे फ़रमाया: “हमने तुम्हारे पानी में से कुछ कम नहीं किया। हमें पानी अल्लाह तआला ने दिया है।”

23. मदीना में जब आप मिम्बर पर ख़ुत्बा पढ़ रहे थे, तो एक आदमी ने कहा: “या रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम)! सूखे से हमारे बच्चे, हमारे जानवर और हमारे खेत तबाह हो रहे हैं। हमारी मदद को पहुँचिए!” आपने हाथ उठाकर दुआ फ़रमाई। आसमान में बादल का एक टुकड़ा भी न था, मगर आपके अपने मुबारक हाथ चेहरे पर फेरने से पहले ही बादल जमा हो गए। फ़ौरन बारिश शुरू हो गई। वह कई दिन जारी रही। आप फिर मिम्बर पर ख़ुत्बा पढ़ रहे थे कि उसी आदमी ने कहा: “या रसूलल्लाह! हम बारिश से तबाह हो जाएँगे।” इस पर रसूल अलैहिस्सलाम मुस्कुराए और फ़रमाया: “या रब! अपनी रहमत अपने दूसरे बंदों को भी अता फ़रमा!” बादल छँट गए और सूरज निकल आया। 24. जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) बयान करते हैं: मुझ पर बहुत क़र्ज़ था। मैंने यह बात रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) को बताई। आप मेरे बाग़ में तशरीफ़ लाए और खजूरों के ढेर के चारों तरफ़ तीन बार घूमे। फिर फ़रमाया: “अपने क़र्ज़ख़्वाहों को बुलाओ, आ जाएँ!” उनमें से हर एक को उसका हक़ दे दिया गया, और ढेर में से कुछ भी कम न हुआ। 25. एक औरत ने तोहफ़े के तौर पर शहद भेजा। रसूल अलैहिस्सलाम ने शहद क़बूल किया और ख़ाली बर्तन वापस भेज दिया। अल्लाह तआला की क़ुदरत से बर्तन शहद से भरा हुआ वापस पहुँचा। औरत आकर कहने लगी: “या रसूलल्लाह! मेरा क्या गुनाह है? आपने मेरा तोहफ़ा क्यों क़बूल नहीं किया?” आपने फ़रमाया: “हमने तुम्हारा तोहफ़ा क़बूल कर लिया है। जो शहद तुमने देखा, वह अल्लाह तआला की तरफ़ से तुम्हारे तोहफ़े के बदले दी गई बरकत है।” औरत ख़ुश होकर शहद अपने घर ले गई। वह अपने बाल-बच्चों के साथ महीनों उसे खाती रही, और शहद ज़रा भी कम न हुआ। एक दिन भूल से उन्होंने शहद दूसरे बर्तन में डाल दिया। उसमें से खाते-खाते जल्द ही ख़त्म कर दिया। जब यह बात रसूलुल्लाह को बताई गई, तो आपने फ़रमाया: “अगर वह उसी बर्तन में रहता जो मैंने भेजा था, तो जब तक दुनिया क़ायम है, वे खाते रहते और वह ज़रा भी कम न होता।”

26. अबू हुरैरा बयान करते हैं: मैं रसूलुल्लाह के पास कुछ खजूरें लाया और अर्ज़ किया कि आप इनमें बरकत के लिए दुआ फ़रमाएँ। आपने इनमें बरकत की दुआ फ़रमाई और मुझसे फ़रमाया: “इन्हें लो और अपने थैले में रख लो। जब इनमें से लेना चाहो, तो हाथ डालकर अंदर से निकालना, उलटकर ज़मीन पर से न उठाना!” खजूरों वाला अपना थैला मैंने रात-दिन अपने पास से अलग नहीं किया और उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) के ज़माने तक उसमें से खाता रहा। अपने पास वालों को भी खिलाया और मुट्ठियाँ भर-भरकर सदक़ा भी दिया। जिस दिन उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) शहीद हुए, उस दिन मेरा थैला खो गया। 27. रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) सुलेमान अलैहिस्सलाम की तरह तमाम जानवरों की ज़बान समझते थे। बहुत बार देखा गया कि जानवर आपके पास आकर अपने मालिकों या दूसरों की शिकायत करते थे। रसूलुल्लाह यह बात सहाबा-ए-किराम को बताते थे। हुनैन के ग़ज़वे में आपने अपनी सवारी के “दुलदुल” नाम के सफ़ेद ख़च्चर से फ़रमाया: “बैठ जा!” दुलदुल फ़ौरन बैठ गया, तो आपने ज़मीन से एक मुट्ठी रेत उठाकर काफ़िरों पर फेंक दी।

28. एक दिन आपने अपनी ज़ौजा हफ़्सा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से फ़रमाया: “अबू बकर और तुम्हारे वालिद मेरी उम्मत का इंतिज़ाम अपने हाथ में लेंगे।” इस बात से आपने अबू बकर और हफ़्सा के वालिद उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) के ख़लीफ़ा होने की ख़ुशख़बरी दी।

“ऐ हफ़्सा! अबू बकर और तुम्हारे वालिद मेरी उम्मत का इंतिज़ाम अपने हाथ में लेंगे” हदीस शरीफ़

29. आपने अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) को मदीना में ज़कात के तौर पर आई खजूरों की हिफ़ाज़त पर मुक़र्रर किया था। अबू हुरैरा ने एक आदमी को खजूरें चुराते हुए पकड़ लिया और उससे कहा: “मैं तुम्हें रसूलुल्लाह के पास ले जाऊँगा।” लेकिन जब चोर यह कहकर गिड़गिड़ाने लगा: “मैं ग़रीब हूँ, मेरे बाल-बच्चे बहुत हैं”, तो अबू हुरैरा ने उसे छोड़ दिया। अगले दिन रसूलुल्लाह ने अबू हुरैरा को बुलाकर पूछा: “कल रात जिस आदमी को तुमने छोड़ा था, उसने क्या किया था?” अबू हुरैरा ने सारी बात बताई, तो आपने फ़रमाया: “उसने तुम्हें धोखा दिया है। वह फिर आएगा।” अगली रात वह सचमुच फिर आया और पकड़ा गया। उसने फिर गिड़गिड़ाकर कहा: “अल्लाह के वास्ते मुझे छोड़ दो।” और फिर छूट गया। तीसरी रात जब वह फिर आकर पकड़ा गया, तो उसका गिड़गिड़ाना काम न आया। तब उसने कहा: “अगर तुम मुझे छोड़ दो, तो मैं तुम्हें कुछ ऐसी बातें सिखाऊँगा जो तुम्हारे लिए बहुत फ़ायदेमंद होंगी।” अबू हुरैरा राज़ी हो गए। उसने कहा: “रात को सोने के लिए लेटते वक़्त अगर तुम आयतुल कुर्सी पढ़ो, तो अल्लाह तआला तुम्हारी हिफ़ाज़त करेगा और शैतान तुम्हारे पास नहीं आएगा।” और चला गया। अगले दिन रसूलुल्लाह ने अबू हुरैरा से फिर पूछा और जवाब पाकर फ़रमाया: “इस बार उसने सच कहा है। हालाँकि वह ख़ुद बहुत बड़ा झूठा है। क्या तुम जानते हो कि तीन रातों से तुम किससे बात कर रहे थे?” अबू हुरैरा ने कहा: “नहीं, मैं नहीं जानता।” तो आपने फ़रमाया: “वह शैतान था।”

30. आपने रूम के बादशाह की फ़ौजों से जंग के लिए मूता नाम की जगह पर लश्कर भेजा। सहाबा में से तीन अमीर (ज़ैद इब्ने हारिसा, जाफ़र इब्ने अबी तालिब और अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा) एक के बाद एक शहीद हुए, और आप उस वक़्त मदीना में मिम्बर पर थे, फिर भी अल्लाह तआला के दिखाने से यह सब देखते रहे और अपने पास वालों को ख़बर देते रहे। 31. मुआज़ इब्ने जबल (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) को हाकिम बनाकर यमन भेजते वक़्त आप उन्हें मदीना के बाहर तक रुख़सत करने गए, उन्हें बहुत सी नसीहतें कीं और फ़रमाया: “अब हम और तुम क़यामत तक नहीं मिलेंगे।” मुआज़ यमन में ही थे कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने मदीना में इंतिक़ाल फ़रमाया।

32. इंतिक़ाल से पहले आपने अपनी बेटी फ़ातिमा से फ़रमाया: “मेरे रिश्तेदारों में सबसे पहले तुम मुझसे आ मिलोगी।” छह महीने बाद फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का इंतिक़ाल हो गया। आपके रिश्तेदारों में से उनसे पहले किसी का इंतिक़ाल नहीं हुआ।

33. आपने क़ैस इब्ने शम्मास (रज़ियल्लाहु अन्हु) से फ़रमाया: “तुम अच्छी ज़िंदगी जियोगे और शहीद होकर मरोगे।” अबू बकर (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) की ख़िलाफ़त के ज़माने में क़ैस यमामा में मुसैलमतुल कज़्ज़ाब के साथ हुई जंग में शहीद हुए। आपने यह भी ख़बर दी कि हज़रत उमरुल फ़ारूक़, हज़रत उस्मान और हज़रत अली (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम अजमईन) शहीद होंगे। 34. आपने ख़ुशख़बरी दी कि ईरान के बादशाह किसरा और रूम के बादशाह क़ैसर के मुल्क मुसलमानों के हाथ में आ जाएँगे और उनके ख़ज़ाने अल्लाह की राह में बाँटे जाएँगे। 35. आपने ख़बर दी कि आपकी उम्मत के बहुत से लोग समुंदर के रास्ते ग़ज़वे के लिए जाएँगे और सहाबा में से उम्मे हराम नाम की ख़ातून उस ग़ज़वे में शामिल होंगी। हज़रत उस्मान की ख़िलाफ़त के ज़माने में मुसलमान जहाज़ों से क़ुबरुस (साइप्रस) के टापू पर गए और जंग की। यह ख़ातून भी उनके साथ थीं। वह वहीं शहीद हुईं।3

36. एक दिन रसूल अलैहिस्सलाम एक ऊँची जगह पर बैठे थे। आपने अपने पास वालों की तरफ़ मुड़कर फ़रमाया: “जो मैं देख रहा हूँ, क्या तुम भी देख रहे हो? मैं क़सम खाता हूँ कि मैं तुम्हारे घरों के बीच, गलियों में उठने वाले फ़ितनों को देख रहा हूँ।” उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) के शहीद किए जाने के दिनों में और बाद में यज़ीद के ज़माने में मदीना में बड़े फ़ितने उठे, और गलियों में बहुत से लोगों का ख़ून बहाया गया।

37. एक दिन आपने ख़बर दी कि आपकी बीवियों में से एक ख़लीफ़ा के ख़िलाफ़ उठ खड़ी होंगी। आइशा (रज़ियल्लाहु तआला अन्हा) इस बात पर हँस पड़ीं, तो आपने फ़रमाया: “ऐ हुमैरा4! मेरी इस बात को न भूलना! कहीं वह औरत तुम न हो!” फिर अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) की तरफ़ मुड़कर फ़रमाया: “अगर इनका मामला तुम्हारे हाथ में आए, तो इनके साथ नरमी का बरताव करना!” तीस साल बाद आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) से जंग की और उनकी क़ैदी बन गईं। अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उन्हें इज़्ज़त और एहतिराम के साथ बसरा से मदीना भेज दिया।

38. आपने हज़रत मुआविया से फ़रमाया: “अगर किसी दिन तुम मेरी उम्मत पर हाकिम बनो, तो नेकी करने वालों को इनाम देना और बुराई करने वालों को माफ़ कर देना!” हज़रत मुआविया हज़रत उमर और हज़रत उस्मान के ज़माने में बीस साल दमिश्क़ के हाकिम रहे, फिर बीस साल ख़लीफ़ा रहे। 39. एक दिन आपने फ़रमाया: “मुआविया कभी हार नहीं खाएँगे।” अली (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) ने सिफ़्फ़ीन की जंग में जब यह हदीस सुनी, तो कहा: “अगर मैंने यह पहले सुना होता, तो मुआविया (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) से जंग न करता।” 40. आपने अम्मार इब्ने यासिर (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) से फ़रमाया: “तुम्हें बाग़ी और आसी (नाफ़रमान) लोग क़त्ल करेंगे।” अम्मार अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) के साथ मिलकर मुआविया (रज़ियल्लाहु अन्हु) के ख़िलाफ़ जंग करते हुए शहीद हुए। 41. आपने अपनी बेटी फ़ातिमा के बेटे हसन (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुमा) के बारे में फ़रमाया: “मेरा यह बेटा बहुत बेहतरीन है। अल्लाह तआला इसे मुसलमानों की दो बड़ी फ़ौजों के बीच सुलह होने का सबब बनाएगा।” हसन जब एक बड़ी फ़ौज के साथ मुआविया (रज़ियल्लाहु अन्हु) के ख़िलाफ़ जंग करने वाले थे, तो फ़ितने को रोकने और मुसलमानों का ख़ून न बहने देने के लिए उन्होंने ख़िलाफ़त, जो उनका हक़ थी, मुआविया (रज़ियल्लाहु अन्हु) के सुपुर्द कर दी। 42. अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुमा) ने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) के हिजामा (पछने लगवाने) के वक़्त निकला हुआ ख़ून पी लिया। यह देखकर हमारे नबी ने फ़रमाया: “क्या तुम जानते हो कि लोगों की तरफ़ से तुम्हारे सिर पर क्या-क्या आएगा? तुम्हारी तरफ़ से भी लोगों पर बहुत कुछ आएगा। जहन्नम की आग तुम्हें नहीं जलाएगी।” जब अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर ने मक्का में अपनी ख़िलाफ़त का एलान किया, तो अब्दुल मलिक इब्ने मरवान ने दमिश्क़ से हज्जाज को एक बड़ी फ़ौज के साथ मक्का भेजा। उन्होंने अब्दुल्लाह को पकड़कर शहीद कर दिया। 43. आपने अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास की वालिदा की तरफ़ देखकर फ़रमाया: “तुम्हारे एक बेटा होगा। जब वह पैदा हो, तो उसे मेरे पास लाना!” जब बच्चे को लाया गया, तो आपने उसके कान में अज़ान और इक़ामत कही और अपने मुबारक मुँह का लुआब उसके मुँह में लगाया। उसका नाम अब्दुल्लाह रखकर उसे उसकी माँ की गोद में दिया और फ़रमाया: “ख़लीफ़ाओं के बाप को लो और ले जाओ!” बच्चे के वालिद हज़रत अब्बास ने यह सुना और आकर पूछा, तो आपने फ़रमाया: “हाँ, मैंने यही कहा है। यह बच्चा ख़लीफ़ाओं का बाप है। उनमें सफ़्फ़ाह, महदी और एक ऐसा शख़्स होगा जो ईसा अलैहिस्सलाम के साथ नमाज़ पढ़ेगा।” अब्बासी सल्तनत की गद्दी पर बहुत से ख़लीफ़ा आए। ये सब अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास की नस्ल से थे।

“ऐ मुआविया! अगर किसी दिन तुम मेरी उम्मत पर हाकिम बनो, तो नेकी करने वालों को इनाम देना और बुराई करने वालों को माफ़ कर देना!” हदीस शरीफ़

44. एक दिन आपने फ़रमाया: “मेरी उम्मत में राफ़िज़ी कहलाने वाले बहुत से लोग पैदा होंगे। ये दीन-ए-इस्लाम से निकल जाएँगे।”

45. आपने अपने सहाबा में से बहुत से लोगों के लिए भलाई की दुआएँ कीं; वे सब क़बूल हुईं और उन्होंने उनका फ़ायदा देखा। अली (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) बयान करते हैं: रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) ने मुझे यमन में क़ाज़ी (हाकिम) बनाकर भेजना चाहा। मैंने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम)! मुझे क़ाज़ी का काम करना नहीं आता।” आपने अपना मुबारक हाथ मेरे सीने पर रखकर फ़रमाया: “या रब! इसके दिल को सही बातें बता दे। इसे हमेशा सच बोलना नसीब फ़रमा!” इसके बाद मेरे पास शिकायत लेकर आने वालों में से जो हक़ पर होता, उसे मैं फ़ौरन समझ लेता और हक़ के मुताबिक़ फ़ैसला करता।

46. रसूलुल्लाह ने जिन दस लोगों को जन्नत में जाने की ख़ुशख़बरी दी, उन्हें अशरा-ए-मुबश्शरा कहा जाता है। उहुद के ग़ज़वे में आपने उनमें से एक, साद इब्ने अबी वक़्क़ास (रज़ियल्लाहु अन्हु) के लिए फ़रमाया: “या रब! इसके तीरों को उनके निशानों तक पहुँचा और इसकी दुआएँ क़बूल फ़रमा!” इसके बाद साद की हर दुआ क़बूल हुई और उनका चलाया हुआ हर तीर दुश्मन को लगा।

47. आपने अपने चचा के बेटे अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास की पेशानी पर अपना मुबारक हाथ रखकर फ़रमाया: “या रब! इसे दीन में गहरा आलिम बना, हिकमत वाला बना! इसे क़ुरआन-ए-करीम के उलूम अता फ़रमा!” इसके बाद अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास तमाम उलूम में, ख़ास तौर पर तफ़सीर, हदीस और फ़िक़्ह के इल्म में अपने ज़माने के यकता (बेजोड़) हो गए। सहाबा और ताबिईन हर चीज़ उन्हीं से सीखते थे। वह “तर्जुमानुल क़ुरआन”, “बहरुल इल्म” और “रईसुल मुफ़स्सिरीन” के नामों से मशहूर हुए, और इस्लामी मुल्क उनके शागिर्दों से भर गए।5

48. आपने अपने ख़िदमतगारों में से अनस इब्ने मालिक के लिए यह दुआ फ़रमाई: “या रब! इसके माल और औलाद को ज़्यादा कर, इसकी उम्र लंबी कर और इसके गुनाह माफ़ फ़रमा!” वक़्त गुज़रने के साथ उनका माल-मता बढ़ता गया। उनके पेड़ और अंगूर के बाग़ हर साल फल देते थे। उनके बहुत ज़्यादा बच्चे हुए। वह एक सौ दस साल ज़िंदा रहे। उम्र के आख़िर में जब उन्होंने कहा: “या रब! तेरे हबीब ने मेरे लिए जो दुआएँ की थीं, उनमें से तीन तूने क़बूल फ़रमाईं, अता फ़रमाईं! चौथी, यानी मेरे गुनाहों की माफ़ी, न जाने कैसी होगी?”, तो उन्होंने यह आवाज़ सुनी: “चौथी भी मैंने क़बूल कर ली। अपना दिल ख़ुश रखो!”

“या रब! इसे (अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास को) दीन में गहरा आलिम बना, हिकमत वाला बना! इसे क़ुरआन-ए-करीम के उलूम अता फ़रमा!” हदीस शरीफ़

49. आपने मालिक इब्ने रबीआ (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) के लिए यह कहकर दुआ फ़रमाई: “तुम्हारी औलाद में बरकत हो!” मालिक के अस्सी बेटे हुए।

50. नाबिग़ा नाम के मशहूर शायर ने जब अपने कुछ शेर पढ़े, तो हमारे नबी ने अरबों में मशहूर यह दुआ दी: “अल्लाह तआला तुम्हारे दाँत न गिराए!” नाबिग़ा सौ साल की उम्र को पहुँच गए थे, और उनके दाँत सफ़ेद और चमकदार, मोतियों की लड़ी की तरह थे। 51. आपने उरवा इब्ने जअद (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) के लिए फ़रमाया: “या रब! इसकी तिजारत में बरकत दे!” उरवा बयान करते हैं: “इसके बाद मैंने जितनी तिजारत की, सबमें नफ़ा हुआ। मुझे एक बार भी नुक़सान नहीं हुआ।” 52. एक दिन आपकी बेटी फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु तआला अन्हा) आपके पास आईं। भूख से उनका रंग पीला पड़ गया था। आपने अपना हाथ उनके सीने पर रखकर फ़रमाया: “ऐ भूखों का पेट भरने वाले मेरे रब! मुहम्मद की बेटी फ़ातिमा को भूखा न रख!” फ़ातिमा के चेहरे पर उसी वक़्त ख़ून दौड़ गया और उनमें जान आ गई। इसके बाद मरते दम तक उन्हें कभी भूख महसूस नहीं हुई।

53. आपने अशरा-ए-मुबश्शरा में से अब्दुर रहमान इब्ने औफ़ के लिए बरकत की दुआ फ़रमाई। उनका माल इतना बढ़ा कि उसके चर्चे ज़बान-ज़बान पर होने लगे।

54. आपने फ़रमाया: “हर नबी की दुआ क़बूल होती है। हर नबी ने दुनिया में अपनी उम्मत के लिए दुआ की। लेकिन मैं यह दुआ करता हूँ कि क़यामत के दिन मुझे अपनी उम्मत की शफ़ाअत की इजाज़त दी जाए। इंशाअल्लाह मेरी दुआ क़बूल होगी। मैं उन सबकी शफ़ाअत करूँगा जो मुशरिक नहीं हैं।”

55. आप मक्का के आसपास की कुछ बस्तियों में तशरीफ़ ले गए और उनके ईमान लाने के लिए बहुत कोशिश की। उन्होंने क़बूल नहीं किया। तब आपने उनके लिए बद्दुआ फ़रमाई कि वे यूसुफ़ नबी (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) के ज़माने में मिस्र में पड़े क़हत जैसी तकलीफ़ उठाएँ। उस साल वहाँ ऐसा सख़्त क़हत पड़ा कि लोगों ने मुर्दार तक खाया। 56. आपके चचा अबू लहब का बेटा उतैबा रसूलुल्लाह (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) का दामाद होने के बावजूद रसूलुल्लाह पर ईमान नहीं लाया और उसने सरवर-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को बहुत दुख पहुँचाया। उसने आपकी मुबारक बेटी उम्मे कुलसूम ख़ातून को तलाक़ दे दी और भद्दी बातें कहीं। हमारे नबी इससे बहुत दुखी हुए और फ़रमाया: “या रब! इस पर अपने कुत्तों में से एक कुत्ता मुसल्लत कर दे!” उतैबा तिजारत के लिए शाम (सीरिया) जा रहा था। एक रात वह अपने साथियों के बीच सो रहा था कि एक शेर आया; उसने उसके साथियों को सूँघा और छोड़ दिया। जब उतैबा की बारी आई, तो शेर ने उसे दबोचकर चीर-फाड़ डाला। 57. एक आदमी बाएँ हाथ से खाना खा रहा था। हमारे नबी ने फ़रमाया: “दाहिने हाथ से खाओ!” उसने झूठ बोलते हुए कहा: “मेरा दाहिना हाथ हिलता नहीं।” हमारे नबी ने फ़रमाया: “तो अब तुम्हारा दाहिना हाथ हिले ही नहीं!”6 वह आदमी मरते दम तक अपना दाहिना हाथ मुँह तक न ले जा सका।

58. आपने ईरान के बादशाह ख़ुसरो परवेज़ को ईमान लाने के लिए ख़त भेजा। कमीने ख़ुसरो ने ख़त फाड़ डाला और उसे लाने वाले क़ासिद को शहीद कर दिया। रसूल अलैहिस्सलाम ने जब यह सुना, तो बहुत दुखी हुए और फ़रमाया: “या रब! जिस तरह इसने मेरा ख़त टुकड़े-टुकड़े किया, उसी तरह तू भी इसकी सल्तनत के टुकड़े-टुकड़े कर दे!” रसूलुल्लाह की ज़िंदगी ही में ख़ुसरो को उसके अपने बेटे शीरवैह ने ख़ंजर घोंपकर मार डाला। फिर उमर (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) की ख़िलाफ़त के ज़माने में मुसलमानों ने पूरा ईरान फ़तह कर लिया, और ख़ुसरो की न नस्ल बाक़ी रही, न सल्तनत।

59. रसूल अलैहिस्सलाम बाज़ार में अम्र बिल मारूफ़ व नह्य अनिल मुनकर कर रहे थे, नसीहत फ़रमा रहे थे, तो मरवान का बाप हकम इब्ने आस नाम का एक कमीना शख़्स रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) के पीछे-पीछे चलता, आँखें खोलता-मींचता और मुँह बिगाड़ता, और इस तरह आपका मज़ाक़ उड़ाता था। रसूल अलैहिस्सलाम ने पीछे मुड़कर जब उसकी यह भद्दी हरकत देखी, तो फ़रमाया: “जैसी शक्ल तूने बनाई है, वैसा ही रह जा!” मरते दम तक उसका चेहरा और आँखें फड़कती रहीं। 60. अल्लाह तआला अपने हबीब को बलाओं से बचाता था। अबू जहल रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का सबसे बड़ा दुश्मन था। उसने आपके मुबारक सिर पर मारने के लिए एक बड़ा पत्थर उठाया, तो उसे रसूलुल्लाह के दोनों कंधों पर एक-एक साँप दिखाई दिया। पत्थर उसके हाथ से गिर पड़ा और वह भाग गया।

61. हमारे नबी काबा मुअज़्ज़मा के पास नमाज़ पढ़ रहे थे कि कमीने अबू जहल ने फिर “यही ठीक वक़्त है” कहकर छुरी लेकर आप पर झपटना चाहा, लेकिन अचानक पीछे मुड़कर भाग खड़ा हुआ। बाद में उसके साथियों ने उससे पूछा: “तुम डर क्यों गए?” तो उसने कहा: “मैंने मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) और अपने बीच आग से भरी एक ख़न्दक़ देखी। वहाँ बहुत से लोग मेरा इंतिज़ार कर रहे थे। अगर मैं एक क़दम भी आगे बढ़ाता, तो वे मुझे पकड़कर आग में फेंक देते।” मुसलमानों ने यह सुनकर रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) से पूछा, तो आपने फ़रमाया: “अल्लाह तआला के फ़रिश्ते उसे पकड़कर टुकड़े-टुकड़े कर देते।”

62. हिजरत के चौथे साल बनू नज़ीर क़बीले के पास रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) यहूदियों के क़िले की दीवारों के नीचे अपने सहाबा से बात कर रहे थे कि एक यहूदी ने ऊपर से आप पर चक्की का एक बड़ा पाट गिराना चाहा। जब उसने पत्थर की तरफ़ हाथ बढ़ाए, तो उसके दोनों हाथ लुंज हो गए। 63. हिजरत के नौवें साल दूर-दूर से लोग जूक़-दर-जूक़ आकर ईमान ला रहे थे। आमिर और अरबद नाम के दो काफ़िर आने वालों में शामिल हो गए। आमिर रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) से कह रहा था कि वे ईमान लाने आए हैं, और उसी वक़्त अरबद ने आपके पीछे जाकर अपनी तलवार म्यान से निकालनी चाही। लेकिन उसका हाथ काम न कर सका। आमिर ने सामने से “खड़े क्यों हो?” जैसा इशारा किया, तो रसूल अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: “अल्लाह तआला ने मुझे तुम दोनों के नुक़सान से बचा लिया।” जब वे वहाँ से चले गए, तो आमिर ने अरबद से पूछा: “तुम अपनी बात पर क़ायम क्यों न रहे?” उसने कहा: “मैं क्या करता? कितनी ही बार मैंने तलवार खींचनी चाही, हर बार तुम्हें अपने और उनके बीच देखा।” कुछ दिन बाद, जब आसमान साफ़ था, अचानक बादल छा गए। अरबद पर बिजली गिरी और वह अपने ऊँट समेत मर गया।

64. एक दिन रसूल अलैहिस्सलाम ने वुज़ू करके अपने चमड़े के मोज़ों में से एक पहना और जब दूसरे की तरफ़ हाथ बढ़ाया, तो एक परिंदा मोज़ा झपटकर ले उड़ा और उसे हवा में झटका। उसमें से एक साँप गिरा। फिर परिंदे ने मोज़ा ज़मीन पर छोड़ दिया। उस दिन से जूता पहनने से पहले उसे झाड़ लेना सुन्नत हो गया। 65. रसूल अलैहिस्सलाम ने ग़ज़वों में और रेगिस्तानों में अपनी हिफ़ाज़त के लिए सहाबा में से पहरेदार मुक़र्रर कर रखे थे। जब सूरह माइदा की सड़सठवीं आयत उतरी, जिसका मफ़हूम है: “अल्लाह तुम्हें लोगों के नुक़सान से बचाता है”, तो आपने पहरेदारों को हटा दिया। आप दुश्मनों के बीच अकेले घूमते, अकेले सोते और ज़रा भी नहीं डरते थे।

“ऐ शान वाले नबी! अल्लाह तुम्हें लोगों के नुक़सान से बचाता है” माइदा: 67

66. हज़रत अनस बयान करते हैं: रसूलुल्लाह का एक रूमाल था जिससे आप अपना मुबारक चेहरा पोंछते थे। आप इससे चेहरा पोंछते, और जब वह मैला हो जाता, तो उसे आग में डाल देते। मैल जल जाता, मगर रूमाल न जलता और बिल्कुल साफ़-सुथरा हो जाता। 67. एक कुएँ से डोल में पानी निकाला गया, आपने उस डोल से पिया, और बचा हुआ पानी फिर कुएँ में डाल दिया गया। उसके बाद उस कुएँ से हमेशा मुश्क की ख़ुशबू आती रही। 68. उत्बा इब्ने फ़रक़द (रज़ियल्लाहु अन्हु) के जिस्म पर पित्ती (अर्टिकेरिया) नाम की बीमारी निकल आई। रसूल अलैहिस्सलाम ने उनके कपड़े उतरवाए, अपने मुबारक हाथों पर लुआब लगाया और अपने हाथ उनके जिस्म पर फेरे। बीमार को शिफ़ा मिल गई। उनके जिस्म से मुश्क जैसी ख़ुशबू आती थी, और यह हालत लंबे अरसे तक रही। 69. रसूल अलैहिस्सलाम नमाज़ पढ़ रहे थे कि शैतान आकर आपकी नमाज़ बिगाड़ना चाहता था। हमारे नबी ने उसे अपने मुबारक हाथों से पकड़ लिया। जब उससे यह वादा ले लिया कि वह फिर नहीं आएगा और नमाज़ नहीं बिगाड़ेगा, तभी उसे छोड़ा।

70. मदीना के मुनाफ़िक़ों का सरग़ना अब्दुल्लाह इब्ने उबई इब्ने सलूल ने मरने से पहले रसूलुल्लाह को बुलवाया। उसने गिड़गिड़ाकर कहा: “आपके बदन पर जो क़मीज़ है, उसे मेरा कफ़न बना दीजिए।” हमारे नबी की आदत थी कि जो आपसे माँगा जाता, वह दे देते थे, इसलिए आपने उसे अपनी क़मीज़ अता फ़रमा दी। यहाँ तक कि उसकी जनाज़े की नमाज़ भी पढ़ाई। मदीना में मौजूद एक हज़ार मुनाफ़िक़ रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) के इस एहसान पर हैरान रह गए और सबके सब ईमान ले आए। 71. क़ुरैश के काफ़िरों में से वलीद इब्ने मुग़ीरा, आस इब्ने वाइल, हारिस इब्ने क़ैस, असवद इब्ने यग़ूस और असवद इब्ने मुत्तलिब रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) पर ज़ुल्म ढाने और आपको सताने में सबसे आगे थे। जिबराईल अलैहिस्सलाम तशरीफ़ लाए और सूरह हिज्र की पंचानवेवीं आयत लाए, जिसका मफ़हूम है: “तुम्हारा मज़ाक़ उड़ाने वालों को हम उनकी सज़ा देंगे…”, और उन्होंने वलीद के पाँव की तरफ़, दूसरे की एड़ी की तरफ़, तीसरे की नाक की तरफ़, चौथे के सिर की तरफ़ और पाँचवें की आँखों की तरफ़ इशारा किया। वलीद के पाँव में एक तीर चुभ गया। वह बहुत घमंडी था, इसलिए झुककर तीर निकाल फेंकना उसे अपनी तौहीन लगा। तीर की लोहे की नोक एड़ी की नस में घुस गई और वह साइटिका (इर्क़ुन्निसा) की बीमारी में मुब्तला हो गया। आस की एड़ी में काँटा चुभा और एड़ी मश्क की तरह सूज गई। हारिस की नाक से लगातार ख़ून आने लगा। असवद एक पेड़ के नीचे मज़े से बैठा था कि उसने अपना सिर पेड़ से दे मारा। दूसरा असवद अंधा हो गया। इस तरह वे सब के सब हलाक हो गए।

72. मदीना में बनू नज्जार क़बीले की एक बहुत ख़ूबसूरत औरत थी। एक जिन्न उस पर आशिक़ हो गया था और हमेशा उसके पास आता था। रसूल अलैहिस्सलाम के मदीना तशरीफ़ लाने के बाद एक दिन वह जिन्न औरत के घर के सामने की दीवार पर बैठा था कि औरत ने उसे पहचान लिया और कहा: “तुमने मेरे पास आना क्यों छोड़ दिया?” जिन्न ने कहा: “अल्लाह तआला के नबी (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) ने ज़िना और तमाम हराम कामों से मना फ़रमा दिया है।”

73. बीर-ए-मऊना नाम की जंग में काफ़िरों ने अपना वादा तोड़कर सत्तर सहाबा में से एक-दो के सिवा सबको शहीद कर दिया। उनमें आमिर इब्ने फ़ुहैरा (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) भी थे, जिन्हें अबू बकर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने ग़ुलामी से आज़ाद किया था और जो सबसे पहले ईमान लाने वालों में से थे। जब आमिर इब्ने फ़ुहैरा को नेज़ा मारा गया, तो फ़रिश्ते काफ़िरों की आँखों के सामने उन्हें आसमान पर उठा ले गए। जब यह बात रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) को बताई गई, तो आपने फ़रमाया: “उन्हें जन्नत के फ़रिश्तों ने दफ़न किया, और उनकी रूह जन्नत में उठा ली गई।”

74. साद इब्ने मुआज़ (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) ख़न्दक़ के ग़ज़वे में ज़ख़्मी हुए और कुछ अरसे बाद उनका इंतिक़ाल हो गया। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) ने ख़बर दी कि उनकी जनाज़े की नमाज़ में सत्तर हज़ार फ़रिश्ते शामिल थे। जब उनकी क़ब्र खोदी जा रही थी, तो चारों तरफ़ मुश्क की ख़ुशबू फैल गई। 75. रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) की बीवियों में से उम्मे सलमा (रज़ियल्लाहु तआला अन्हा) के आज़ाद किए हुए सफ़ीना नाम के सहाबी रसूलुल्लाह की ख़िदमत से कभी अलग नहीं होते थे। रूमियों के ख़िलाफ़ एक ग़ज़वे में वह लश्कर से बिछड़ गए और काफ़िरों के क़ैदी बन गए। जब वह भागकर वापस आ रहे थे, तो उनके सामने एक ख़ौफ़नाक शेर आ गया। सफ़ीना ने कहा: “मैं रसूलुल्लाह का ख़िदमतगार हूँ।” और अपने साथ गुज़रे हालात शेर को सुनाए। शेर ने अपना मुँह-आँखें उनसे रगड़ीं और उनके साथ-साथ चलने लगा। दुश्मन से कोई नुक़सान न पहुँचे, इसलिए उनसे अलग नहीं हुआ। जब इस्लामी लश्कर दिखाई दिया, तो मुड़कर चला गया। 76. जहजाह ग़िफ़ारी नाम का एक शख़्स ख़लीफ़ा उस्मान (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) के ख़िलाफ़ बग़ावत पर उतर आया। उसने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) की वह लाठी, जो आप हमेशा हाथ में रखते थे, अपने घुटने पर रखकर तोड़ डाली। एक साल बाद उसके घुटने में शीर-पंजा (एंथ्रेक्स) नाम की बीमारी निकली, जो उसकी मौत का सबब बनी।

77. मुआविया (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) ने शाम से हज के लिए आकर रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) के मदीना वाले मुबारक मिम्बर को बरकत के लिए शाम ले जाना चाहा। जब मिम्बर को उसकी जगह से हिलाया गया, तो सूरज को ग्रहण लग गया। चारों तरफ़ अँधेरा छा गया और सितारे दिखाई देने लगे। मुआविया ने अपना यह इरादा छोड़ दिया। 78. उहुद के ग़ज़वे में अबू क़तादा की एक आँख निकलकर गाल पर आ गिरी। उन्हें रसूलुल्लाह के पास लाया गया। आपने अपने मुबारक हाथ से आँख को उसकी जगह पर रखा और फ़रमाया: “या रब! इसकी आँख को ख़ूबसूरत बना दे!” यह आँख दूसरी आँख से ज़्यादा ख़ूबसूरत हो गई और उससे बेहतर देखती थी। एक दिन अबू क़तादा के पोतों में से एक ख़लीफ़ा उमर इब्ने अब्दुल अज़ीज़ के पास आया। ख़लीफ़ा ने पूछा: “तुम कौन हो?” उसने एक बैत पढ़कर बताया कि वह उस बुज़ुर्ग का पोता है जिनकी आँख रसूलुल्लाह ने अपने मुबारक हाथ से उसकी जगह पर रखी थी। ख़लीफ़ा ने ये बैत सुने, तो उसकी बड़ी इज़्ज़त की और उसे ख़ूब इनाम दिया। 79. इयास इब्ने सलमा बयान करते हैं: ख़ैबर के ग़ज़वे में रसूलुल्लाह ने मुझे भेजकर अली को बुलवाया (रज़ियल्लाहु अन्हुमा)। अली की आँखें दुख रही थीं। मैं उन्हें हाथ पकड़कर बड़ी मुश्किल से लाया। रसूलुल्लाह ने अपनी मुबारक उँगलियों पर लुआब लगाकर अली की आँखों पर मला। उन्हें झंडा देकर ख़ैबर के दरवाज़े पर लड़ने भेजा। अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने वह दरवाज़ा, जो बहुत अरसे से खोला न जा सका था, उखाड़ फेंका और सहाबा-ए-किराम क़िले में दाख़िल हो गए। 80. एक दिन रसूलुल्लाह अपनी बेटी हज़रत फ़ातिमा के घर तशरीफ़ ले गए और उनका हाल पूछा। हज़रत फ़ातिमा ने जवाब दिया: “अब्बा जान! तीन दिन से मैंने और मेरे बच्चों ने कुछ खाया-पिया नहीं है। हम भूख पर सब्र कर रहे हैं। मेरी हालत कोई अहम नहीं। लेकिन हसन और हुसैन की हालत मुझे बहुत दुख दे रही है।” इस पर सरवर-ए-आलम ने फ़रमाया: “ऐ फ़ातिमा! मेरी जान, मेरी बेटी! तुम तीन दिन से भूखी हो। और मैं चार दिन से भूखा हूँ।” आप अपने मुबारक नवासों हज़रत हसन और हज़रत हुसैन के भूखे होने पर बहुत दुखी हुए… 81. हज़रत अली मेहनत-मज़दूरी करके अपने मुबारक बच्चों के लिए कुछ ख़रीदने और उनका पेट भरने के लिए निकले। मदीना से बाहर निकले तो उन्होंने एक कुएँ पर एक देहाती को देखा जो अपने ऊँटों को पानी पिलाने की कोशिश कर रहा था। हज़रत अली उसके पास गए और फ़रमाया: “ऐ अरब भाई! क्या तुम्हें अपने ऊँटों को मज़दूरी पर पानी पिलवाने के लिए किसी आदमी की ज़रूरत है?” देहाती ने कहा: “हाँ। मैं भी ऐसे ही किसी आदमी को ढूँढ रहा था। चाहो तो आओ, मेरे ऊँटों को पानी पिलाओ! तुम जो भी डोल खींचोगे, हर डोल के बदले तीन खजूरें दूँगा।” हज़रत अली राज़ी हो गए और पानी खींचने लगे। वह नौ डोल निकाल चुके थे कि अचानक डोल की रस्सी टूट गई और डोल कुएँ के अंदर रह गया। यह देखकर देहाती ग़ुस्से से उछलकर खड़ा हो गया और अपनी बदक़िस्मती से उसने हज़रत अली के चेहरे पर हाथ से मार दिया। फिर आठ डोल पानी के बदले चौबीस खजूरें दे दीं। हज़रत अली को इससे बहुत दुख हुआ। उन्होंने अपने हाथ कुएँ में बढ़ाए, अंदर पड़ा डोल निकालकर कुएँ के किनारे रख दिया और वहाँ से चले गए। देहाती हैरत से सन्न रह गया! उनका हाथ इतने गहरे कुएँ की तह तक कैसे पहुँच गया?! कहीं यह बुज़ुर्ग उस दीन के मानने वाले तो नहीं, जिसके आने की ख़बर दी गई थी? इन्हीं ख़यालों में हैरान देहाती ने कहा: “इनका नबी सच्चा नबी है। मैं ईमान ले आया!” अभी-अभी की हुई अपनी गुस्ताख़ी और अपने बड़े जुर्म पर वह पछताए। “ऐसे शख़्स पर उठने वाले हाथ काट दिए जाने चाहिए, उनकी हड्डियाँ तोड़ दी जानी चाहिए!” – यह कहकर उन्होंने एक हाथ में तलवार ली और उसे दूसरे हाथ की कलाई पर ज़ोर से दे मारा… जो वह चाहते थे, हो गया। उन्हें बहुत सख़्त दर्द हुआ, लेकिन अब उनका दिल मुतमइन था। कटा हुआ हाथ दूसरे हाथ में लेकर वह सीधे मस्जिद-ए-नबवी आए। उन्होंने सहाबा-ए-किराम से पूछा कि उनके नबी कहाँ हैं। उन्होंने बताया कि आप अपनी बेटी के यहाँ तशरीफ़ ले गए हैं। हज़रत फ़ातिमा का घर मालूम करके वह वहाँ गए। उस वक़्त नबी-ए-करीम अपने नवासों हज़रत हसन और हज़रत हुसैन को अपने मुबारक घुटनों पर बिठाकर लाई हुई खजूरें खिला रहे थे। देहाती जितना सोचते कि उनकी ग़लती कितनी बड़ी है, उतना ही पागल-से होने लगते, और उनकी आँखों से चश्मे की तरह आँसू बह रहे थे। इसी हाल में वह हज़रत फ़ातिमा के घर आए और दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से सारे जहानों के सरदार सूरज की तरह नूर बिखेरते हुए बाहर तशरीफ़ लाए। देहाती ने हमारे नबी को देखते ही गिड़गिड़ाकर कहा: “मैं ईमान ले आया, आप अल्लाह के रसूल हैं! मैं अपने किए पर शर्मिंदा हूँ, मुझे माफ़ कर दीजिए, या रसूलल्लाह!” जब हमारे प्यारे नबी ने पूछा: “तुमने अपना हाथ क्यों काट डाला?”, तो उन्होंने कहा: “जिस हाथ ने आप पर ईमान लाने वाले उस मुबारक चेहरे पर मारा, उसे उठाए फिरने से मुझे शर्म आई!… या रसूलल्लाह, मेरी जान आप पर क़ुरबान!” रहमत के समुंदर हमारे प्यारे नबी ने देहाती के हाथ से कटा हुआ हाथ लिया और “बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम” कहकर उसे ख़ून बहती कलाई से जोड़ दिया। अल्लाह तआला की इजाज़त से और नबी-ए-करीम के मोजिज़े के तौर पर हाथ पहले जैसा हो गया। अल्लाह तआला हर चीज़ पर क़ादिर है, उसकी क़ुदरत हर चीज़ पर है।

“या रब! ये मेरे चचा और मेरे वालिद के भाई हैं। और ये मेरे अहले बैत हैं। जिस तरह मैंने इन्हें अपनी इस चादर से ढाँप लिया है, उसी तरह तू भी इन्हें ढाँपकर जहन्नम की आग से बचा!” हदीस शरीफ़