मेरे प्यारे नबी

नबी-ए-करीम की शफ़ाअत

रसूल-ए-अकरम क़यामत के दिन अपनी उम्मत की शफ़ाअत करेंगे और उन्हें तकलीफ़ और ग़म से नजात दिलाएँगे। एक हदीस शरीफ़ में आपने फ़रमाया: “मुझे इख़्तियार दिया गया कि या तो मेरी आधी उम्मत जन्नत में दाख़िल हो, या मुझे शफ़ाअत मिले। मैंने शफ़ाअत को पसंद किया, क्योंकि वह ज़्यादा आम है। इसे सिर्फ़ तक़्वा वालों के लिए न समझो; यह ख़ता में पड़ने वाले गुनहगारों के लिए भी है…”1

हज़रत अबू हुरैरा की रिवायत की हुई हदीस शरीफ़ में नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “मेरी शफ़ाअत उस शख़्स के लिए है जो इख़लास के साथ, इस तरह कि उसका दिल उसकी ज़बान की तस्दीक़ करे, ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ कहकर कलिमा-ए-शहादत पढ़े।”2

कुछ हदीसों में भी फ़रमाया गया:

“अपनी उम्मत में से मेरे अहले बैत से मुहब्बत करने वालों की मैं शफ़ाअत करूँगा।” “अपनी उम्मत में से बड़े गुनाह करने वालों की मैं शफ़ाअत करूँगा।” “मेरे सहाबा पर ज़बान दराज़ करने वालों के सिवा मैं हर एक की शफ़ाअत कर सकता हूँ।” “अपनी उम्मत में से अपनी जानों पर ज़ुल्म करने वालों और अपने नफ़्सों के धोखे में आने वालों की मैं शफ़ाअत करूँगा।” “क़यामत के दिन सबसे पहले मैं शफ़ाअत करूँगा।”3

“जो मेरी शफ़ाअत पर ईमान नहीं रखता, वह उसे नहीं पा सकेगा।”4

क़यामत के दिन सूर फूँके जाने की दहशत से रोंगटे खड़े हो जाते हैं, आँखें हैरान रह जाती हैं कि किधर देखें, और मोमिन और काफ़िर महशर के मैदान की तरफ़ हाँके जाते हैं। यह एक अज़ाब है जो क़यामत के दिन की सख़्ती को और बढ़ा देता है। उस वक़्त अर्श को आठ फ़रिश्ते उठाकर ले चलते हैं। उनमें से एक फ़रिश्ता एक क़दम में दुनिया के बीस हज़ार साल का रास्ता तय करता है। फ़रिश्ते और बादल अर्श-ए-आला के ठहरने तक ऐसी तस्बीहों से तस्बीह करते हैं जिन्हें अक़्लें नहीं समझ सकतीं। इस तरह अर्श-ए-आला उस सफ़ेद ज़मीन पर ठहरता है जिसे अल्लाह तआला ने उसके लिए पैदा किया है। उस वक़्त अल्लाह तआला के उस अज़ाब के डर से, जिसकी ताब कोई चीज़ नहीं ला सकती, सिर नीचे झुक जाते हैं। तमाम मख़लूक़ अपनी तकलीफ़ में क़ैद और हैरान रहकर शफ़क़त तलाश करती है। महशर में लोगों का हाल बहुत बुरा हो जाता है। उनकी मशक़्क़त और तकलीफ़ बढ़ जाती है। लोगों में से हर एक ने वह माल अपनी गर्दन में डाल रखा होता है जिसे दुनिया में कसकर बचाए रखा था। ऊँटों की ज़कात न देने वालों की गर्दन पर ऊँट लाद दिया जाता है। वह इस तरह चिल्लाता है और इतना भारी हो जाता है कि बड़े पहाड़ों जैसा हो जाता है। गायों और भेड़ों की ज़कात न देने वालों का भी यही हाल होता है। उनकी चीख़-पुकार गोया बादल की गरज जैसी होती है।5 खेती की ज़कात, यानी उश्र न देने वालों की गर्दन पर अनाज के गट्ठर लाद दिए जाते हैं। दुनिया में जिस क़िस्म के अनाज की ज़कात नहीं दी थी, उसी क़िस्म के गट्ठर लादे जाते हैं: गेहूँ हो तो गेहूँ, जौ हो तो जौ। उनके बोझ के नीचे वे “वा वैला, वा सबूरा!” कहकर चिल्लाते हैं। (“वैल” अज़ाब का लफ़्ज़ है; इंसान जब अज़ाब की ताब नहीं ला पाता, तो इस तरह चिल्लाता है। और “सबूर” हलाकत के वक़्त बोला जाता है।) सोने, चाँदी, (काग़ज़ी) नोटों और दूसरे तिजारती माल की ज़कात न देने वालों पर एक ख़ौफ़नाक साँप मुसल्लत कर दिया जाता है। जब वे चिल्लाकर पूछते हैं: “यह क्या है?” तो फ़रिश्ते जवाब देते हैं: “यह तुम्हारा वह माल है जिसकी ज़कात तुमने दुनिया में नहीं दी।” यही ख़ौफ़नाक हाल सूरह आले इमरान की एक सौ अस्सीवीं आयत-ए-करीमा में इस मफ़हूम के साथ बयान किया गया है: “जिन चीज़ों में उन्होंने दुनिया में कंजूसी की, क़यामत के दिन वे उनकी गर्दनों में लिपटेंगी।”

“जो मेरी शफ़ाअत पर ईमान नहीं रखता, वह उसे नहीं पा सकेगा” हदीस शरीफ़

एक और गिरोह की शर्मगाहों से पीप और पीला पानी बहता है। उनकी बदबू से आस-पास वाले बहुत परेशान होते हैं। ये ज़िना करने वाले और हराम काम करने वाले हैं। एक और गिरोह पेड़ों की शाख़ों पर लटका होता है। ये दुनिया में लिवातत करने वाले हैं।

एक और गिरोह की ज़बानें मुँह से बाहर निकलकर सीनों पर लटकी होती हैं; वे बहुत भद्दे हाल में होते हैं। लोग उन्हें देखना नहीं चाहते। ये झूठ बोलने वाले और बोहतान लगाने वाले हैं।

एक और गिरोह के पेट ऊँचे पहाड़ों जितने फूल गए होते हैं। ये वे लोग हैं जो दुनिया में ज़रूरत के बिना और (शरई) मुआमला किए बग़ैर सूद पर माल और पैसा लेते-देते थे। ऐसे हराम करने वालों के गुनाह सबसे रुसवाकुन तरीक़े से ज़ाहिर कर दिए जाते हैं। नबियों और आलिमों पर ख़ौफ़ तारी होता है। औलिया और शहीद अल्लाह तआला के उस अज़ाब से फ़रियाद करते हैं जिसकी ताब लाना मुश्किल है। वे इसी हाल में होते हैं कि सूरज की रौशनी से कहीं ज़्यादा तेज़ एक नूर उन्हें घेर लेता है। जो लोग पहले ही सूरज की गर्मी की ताब नहीं ला पा रहे थे, यह देखकर बिल्कुल हक्का-बक्का रह जाते हैं। हज़ार साल इसी हाल में रहते हैं। अल्लाह तआला की तरफ़ से उनसे कुछ नहीं कहा जाता। तब लोग पहले नबी आदम अलैहिस्सलाम के पास जाकर फ़रियाद करते हैं: “ऐ आदम अलैहिस्सलाम! आप अज़ीज़ और इज़्ज़त वाले नबी हैं। अल्लाह तआला ने आपको पैदा किया, फ़रिश्तों से आपको सज्दा करवाया और आपमें अपनी तरफ़ से रूह फूँकी। हिसाब शुरू होने के लिए हमारी शफ़ाअत कीजिए, ताकि अल्लाह तआला जो चाहे, उसके मुताबिक़ हमारा फ़ैसला हो, और जहाँ हुक्म दे, हर कोई वहाँ चला जाए। हर चीज़ का हाकिम और मालिक अल्लाह तआला अपनी मख़लूक़ के साथ जो चाहे करे।”

आदम अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं: “मैंने उस पेड़ का फल खाया जिससे अल्लाह तआला ने मना किया था। इसलिए इस वक़्त मुझे अल्लाह तआला से शर्म आती है। लेकिन तुम नूह के पास जाओ।” इस पर वे हज़ार साल आपस में मशवरा करते रहते हैं। फिर नूह अलैहिस्सलाम के पास जाकर फ़रियाद करते हैं: “हम ऐसे हाल में हैं जिसे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। शफ़ाअत कीजिए कि हमारा फ़ैसला जल्दी हो और हम इस महशर की सज़ा से छूट जाएँ।” नूह अलैहिस्सलाम उन्हें जवाब में फ़रमाते हैं: “मैंने अल्लाह तआला से दुआ की थी, और उस दुआ की वजह से ज़मीन पर जितने इंसान थे, सब डूब गए। इसलिए मुझे अल्लाह तआला से शर्म आती है। लेकिन तुम ख़लीलुल्लाह इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पास जाओ। अल्लाह तआला ने सूरह हज की आख़िरी आयत में मफ़हूमन फ़रमाया है: ’अपने बाप इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के दीन की पैरवी करो। अल्लाह तआला ने इससे पहले की किताबों में भी और क़ुरआन-ए-करीम में भी तुम्हारा नाम मुसलमान रखा है, ताकि नबी तुम पर गवाह हों और तुम लोगों पर गवाह बनो।’ शायद वह तुम्हारी शफ़ाअत करें।”

वे फिर पहले की तरह हज़ार साल आपस में बातें करते रहते हैं। फिर इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पास आते हैं और कहते हैं: “ऐ मुसलमानों के बाप! आप वह हस्ती हैं जिन्हें अल्लाह तआला ने अपना ख़लील बनाया। हमारी शफ़ाअत कीजिए! अल्लाह तआला मख़लूक़ात के बीच अपना फ़ैसला सुना दे।” इब्राहीम अलैहिस्सलाम उनसे फ़रमाते हैं: “मैंने दुनिया में तीन बार किनाया वाली बात कही। उन्हें कहकर दीन की राह में मुक़ाबला किया। अब इस मक़ाम पर अल्लाह तआला से शफ़ाअत की इजाज़त माँगने में मुझे शर्म आती है। तुम मूसा अलैहिस्सलाम के पास जाओ, क्योंकि अल्लाह तआला ने उनसे कलाम किया और उन्हें रूहानी क़ुर्ब अता किया। वह तुम्हारी शफ़ाअत करेंगे।” इस पर वे फिर हज़ार साल खड़े रहकर आपस में मशवरा करते हैं। लेकिन इस वक़्त उनका हाल बहुत सख़्त हो जाता है। महशर का मैदान बहुत तंग हो जाता है। फिर वे मूसा अलैहिस्सलाम के पास आकर कहते हैं: “ऐ इमरान के बेटे! आप वह नबी हैं जिनसे अल्लाह तआला ने कलाम किया और जिन पर तौरात उतारी। हिसाब शुरू होने के लिए हमारी शफ़ाअत कीजिए, क्योंकि यहाँ हमारा खड़ा रहना बहुत लंबा हो गया। भीड़ की वजह से पाँव एक-दूसरे पर चढ़ गए हैं।” मूसा अलैहिस्सलाम उनसे फ़रमाते हैं: “मैंने अल्लाह तआला से दुआ की थी कि फ़िरऔन की क़ौम को बरसों ऐसी चीज़ों से सज़ा दी जाए जो उन्हें नापसंद हों। फिर मैंने गुज़ारिश की कि वे बाद में आने वालों के लिए इबरत बनें। अब मुझे शफ़ाअत करने में शर्म आती है। लेकिन अल्लाह पाक रहमत और मग़फ़िरत वाला है। तुम ईसा अलैहिस्सलाम के पास जाओ, क्योंकि यक़ीन के लिहाज़ से वह रसूलों में सबसे सही, मारिफ़त और ज़ुह्द के लिहाज़ से सबसे अफ़ज़ल और हिकमत के लिहाज़ से सबसे बुलंद हैं। वह तुम्हारी शफ़ाअत करेंगे।” महशर की तकलीफ़ से छूटने के लिए वे फिर ईसा अलैहिस्सलाम के पास आते हैं और कहते हैं: “आप अल्लाह तआला की रूह और उसका कलिमा हैं। अल्लाह तआला ने आपके बारे में सूरह आले इमरान की पैंतालीसवीं आयत में मफ़हूमन फ़रमाया है: ’दुनिया और आख़िरत में वजीह, यानी बहुत क़ीमती (इज़्ज़त और रुतबे वाले)’। अपने रब के हुज़ूर हमारी शफ़ाअत कीजिए!”

ईसा अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं: “मेरी क़ौम ने मुझे और मेरी माँ को अल्लाह के सिवा माबूद बना लिया। ऐसी हालत में मैं कैसे शफ़ाअत करूँ? उन्होंने मेरी इबादत भी की; मुझे बेटा और अल्लाह तआला को बाप कहा। लेकिन क्या तुमने देखा है कि तुममें से किसी के पास एक थैली हो, उसमें उसका खाना न हो और उसका मुँह मुहरबंद न हो? उस मुहर को तोड़े बग़ैर क्या उस खाने तक पहुँचा जा सकता है? नबियों में सबसे अफ़ज़ल और आख़िरी नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पास जाओ, क्योंकि आपने अपनी दावत और शफ़ाअत अपनी उम्मत के लिए तैयार रखी थी। आपकी क़ौम ने आपको बहुत बार तकलीफ़ दी। आपकी मुबारक पेशानी ज़ख़्मी की। आपका मुबारक दाँत तोड़ा। आप पर दीवानगी का इल्ज़ाम लगाया। हालाँकि वह बुलंद नबी फ़ख़्र के लिहाज़ से उन सबमें सबसे अच्छे और शरफ़ के लिहाज़ से सबसे ऊँचे थे। उनकी नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त तकलीफ़ों और ज़ुल्मों के जवाब में आप उस आयत-ए-करीमा से जवाब देते थे जिसमें यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की अपने भाइयों से कही हुई बात है, जिसका मफ़हूम है: ‘आज मैं तुमसे तुम्हारे किए का हिसाब नहीं माँगूँगा (तुम्हारी ख़ताएँ तुम्हारे मुँह पर नहीं मारूँगा)। अर्हमुर्राहिमीन अल्लाह पाक तुम्हें माफ़ कर देगा।’”6 ईसा अलैहिस्सलाम जब नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की फ़ज़ीलतें बयान करते हैं, तो सब चाहते हैं कि जल्द से जल्द आप तक पहुँचें। वे फ़ौरन मुहम्मद अलैहिस्सलाम के मिम्बर के पास आकर कहते हैं: “आप हबीबुल्लाह हैं! और हबीब वसीलों में सबसे फ़ायदेमंद होता है। हमारी शफ़ाअत कीजिए! हम नबियों में सबसे पहले आदम अलैहिस्सलाम के पास गए। उन्होंने हमें नूह अलैहिस्सलाम के पास भेजा। हम नूह अलैहिस्सलाम के पास गए। उन्होंने हमें इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पास भेजा। हम इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पास गए; उन्होंने हमें मूसा अलैहिस्सलाम के पास भेजा। हम मूसा अलैहिस्सलाम के पास गए; उन्होंने हमें ईसा अलैहिस्सलाम के पास भेजा। हम ईसा अलैहिस्सलाम के पास गए; उन्होंने हमें आपके पास भेजा। या रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)! आपके बाद जाने की कोई जगह नहीं।”

“जिन चीज़ों में उन्होंने दुनिया में कंजूसी की, क़यामत के दिन वे उनकी गर्दनों में लिपटेंगी” आले इमरान: 180

रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) फ़रमाते हैं: “अगर अल्लाह तआला इजाज़त दे और राज़ी हो, तो शफ़ाअत करूँगा।”

आप सुरादिक़ातुल जलाल, यानी जलाल के पर्दे तक पहुँचते हैं। अल्लाह तआला से शफ़ाअत की इजाज़त माँगते हैं। आपको इजाज़त दी जाती है। पर्दे उठ जाते हैं। आप अर्श-ए-आला में दाख़िल होते हैं। सज्दे में गिर पड़ते हैं। हज़ार साल सज्दे में रहते हैं। इसके बाद अल्लाह पाक की ऐसी हम्द करते हैं कि आलम पैदा होने से अब तक किसी ने अल्लाह तआला की ऐसी तारीफ़ नहीं की। कुछ आरिफ़ों ने कहा है कि अल्लाह तआला ने जब आलमों को पैदा किया, तो इन्हीं हम्दों से अपनी तारीफ़ और सना फ़रमाई। अल्लाह तआला मफ़हूमन फ़रमाता है: “ऐ मुहम्मद, अपना सिर सज्दे से उठाओ! कहो, सुना जाएगा। (जो कहोगे, सुना जाएगा। जो माँगोगे, दिया जाएगा।) शफ़ाअत करो, क़बूल की जाएगी।” इस पर नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अर्ज़ करते हैं: “या रब! अपने बंदों में से अच्छों को बुरों से अलग कर दे, क्योंकि उनका इंतिज़ार बहुत लंबा हो गया। उनमें से हर एक अपने गुनाहों की वजह से अरसात के मैदान में ज़लील-ओ-रुसवा हुआ।”

अल्लाह पाक जन्नत को लाने का हुक्म देता है। जन्नत हर तरह की ज़ीनत से सजाकर अरसात के मैदान में लाई जाती है। उसकी ख़ुशबू पाँच सौ साल के रास्ते से महसूस होती है। इससे दिल ख़ुश होते हैं और रूहें ज़िंदा हो जाती हैं। (लेकिन काफ़िर, मुरतद, मुसलमानों का मज़ाक़ उड़ाने वाले, नौजवानों को धोखा देकर उनका ईमान चुराने वाले और) जिनके अमल ख़बीस और बुरे हैं, वे जन्नत की ख़ुशबू महसूस नहीं करते।

फ़रिश्ते जहन्नम को ज़ंजीरों से बाँधकर महशर के मैदान में लाते हैं। जहन्नम दहाड़ता और गरजता है, आग बरसाता है और ऐसा घना धुआँ छोड़ता है जो सारे आसमान को काला कर देता है। उसकी दहाड़, गड़गड़ाहट और गर्मी बर्दाश्त से बाहर होती है। हर एक के घुटनों का ज़ोर जाता रहता है और वे जहाँ होते हैं, वहीं घुटनों के बल गिर पड़ते हैं। यहाँ तक कि नबी और रसूल भी अपने आपको नहीं सँभाल पाते। हज़रत इब्राहीम, हज़रत मूसा और हज़रत ईसा अर्श-ए-आला से लिपट जाते हैं। इब्राहीम अलैहिस्सलाम उन इस्माईल अलैहिस्सलाम को भूल जाते हैं जिनकी वह क़ुरबानी करना चाहते थे। मूसा अलैहिस्सलाम अपने भाई हारून अलैहिस्सलाम को, और ईसा अलैहिस्सलाम अपनी वालिदा हज़रत मरयम को भूल जाते हैं। उनमें से हर एक कहते हैं: “या रब! आज मैं अपनी जान के सिवा कुछ नहीं माँगता।”

मुहम्मद अलैहिस्सलाम अर्ज़ करते हैं: “या रब! मेरी उम्मत को सलामती और नजात अता फ़रमा!” वहाँ कोई ऐसा नहीं होता जो इसकी ताब ला सके, क्योंकि अल्लाह तआला ने इसकी ख़बर देते हुए सूरह जासिया की अट्ठाईसवीं आयत में मफ़हूमन फ़रमाया है: “तुम हर उम्मत को अल्लाह पाक के ख़ौफ़ से घुटनों के बल गिरा हुआ देखोगे। उनमें से हर एक को दुनिया में किए हुए अमलों की किताब की तरफ़ बुलाया जाएगा।”

अल्लाह तआला सूरह मुल्क की आठवीं आयत में मफ़हूमन फ़रमाता है: “ग़ुस्से और जोश की शिद्दत से आग फट पड़ने को होगी।”

इस पर नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) आगे बढ़कर जहन्नम को रोक देते हैं। फ़रमाते हैं: “ज़लील और हक़ीर होकर पीछे लौट जा! यहाँ तक कि तेरे लोग गिरोह-दर-गिरोह तेरे पास आएँ।” जहन्नम भी कहता है: “ऐ मुहम्मद! मुझे रास्ता दीजिए, आप तो मुझ पर हराम हैं!” अर्श से आवाज़ आती है: “ऐ जहन्नम! मुहम्मद अलैहिस्सलाम की बात सुन और उनकी इताअत कर!” फिर रसूलुल्लाह जहन्नम को खींचकर ले जाते हैं और अर्श-ए-आला की बाईं तरफ़ एक जगह पर रख देते हैं। महशर वाले नबी-ए-करीम के इस रहमत भरे सुलूक और शफ़ाअत की एक-दूसरे को ख़ुशख़बरी देते हैं। उनका डर कुछ कम हो जाता है। सूरह अंबिया की एक सौ सातवीं आयत-ए-करीमा का मफ़हूम “हमने तुम्हें सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजा है” ज़ाहिर हो जाता है।7

मुख़्तसर यह कि रसूलुल्लाह पाँच जगह शफ़ाअत करेंगे।8

पहली – मक़ाम-ए-महमूद कहलाने वाली अपनी शफ़ाअत से आप तमाम इंसानों को महशर में इंतिज़ार के अज़ाब से छुटकारा दिलाएँगे।9

दूसरी – अपनी शफ़ाअत से बहुत से लोगों को बिना हिसाब जन्नत में दाख़िल करेंगे। तीसरी – बहुत गुनाहों वाले मोमिनों को जहन्नम से निकालेंगे। चौथी – जिनकी नेकियाँ और गुनाह बराबर हों और जो “आराफ़” नाम की जगह पर इंतिज़ार कर रहे हों, उनके जन्नत में जाने के लिए शफ़ाअत करेंगे। पाँचवीं – जन्नत वालों के दर्जे बुलंद होने के लिए शफ़ाअत करेंगे।

शफ़ाअत से जिन सत्तर हज़ार लोगों को आप हिसाब से छुटकारा दिलाएँगे, उनमें से हर एक की शफ़ाअत से और सत्तर-सत्तर हज़ार लोग बिना हिसाब जन्नत में दाख़िल होंगे।

शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
बहुत मोहताज हूँ, आपके दर पर आया,
शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
जो भी मेरी ख़ता है, मैंने जान ली,
शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
गुनहगार हूँ, मेरा मुँह काला है,
शायद आग में फेंक दिया जाऊँ,
आपसे ही कोई चारा हो,
शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
आपकी मुहब्बत हर चीज़ से बढ़कर है,
आपका इल्म हर एक से आला है,
आपकी तारीफ़ करने वाला मौला है,
शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
इंसान आपकी तारीफ़ कैसे करे?
आपसे ही एहसान हो,
हमारी मदद कीजिए, अल-अमान!
शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
आपके बिना मेरे लिए दुनिया क़ैदख़ाना है,
मेरा काम बिगड़ा, मेरा हाल बुरा,
आपसे ही कोई दवा हो,
शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
आपने इस जहान पर रौशनी बिखेरी,
आप पर दुरूद और सलाम हो,
मुर्दा और ज़िंदा मुसलमान के लिए
शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
बेशक मेरे गुनाह बहुत हैं,
मैं आजिज़ भी हूँ, नाक़िस भी,
लेकिन मेरा ईमान सही है,
शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
जहन्नम उबलकर छलक पड़े,
मालूम नहीं सिर पर क्या आए,
जिहाद करने वाले साथी के लिए
शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
मेरी आँखों से पर्दा उठ जाए,
आप हर दर्द की दवा हैं,
हर एक मोमिन के लिए
शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
आपकी शान में “लौलाक” कहा गया,
फिर “आतैनाक” कहा गया,
“अरसल्नाक” के शाह आप हैं,
शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
हमारे दीन को फैलाने वालों के लिए,
आपकी सुन्नत पर चलने वालों के लिए,
आपकी राह में सिर देने वालों के लिए
शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
आपकी उम्मत के हक़ीर के लिए,
शुक्र करने वाले, ज़िक्र करने वाले के लिए,
अमीर के लिए, फ़क़ीर के लिए
शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
Muhammed Hâdimî (रहमतुल्लाहि अलैहि)

“तुम हर उम्मत को अल्लाह पाक के ख़ौफ़ से घुटनों के बल गिरा हुआ देखोगे। उनमें से हर एक को दुनिया में किए हुए अमलों की किताब की तरफ़ बुलाया जाएगा” जासिया: 28