मेरे प्यारे नबी

कायनात के सुल्तान नबी-ए-करीम

मुहम्मद अलैहिस्सलाम अल्लाह तआला के हबीब (प्यारे) हैं; आप पैदा किए गए तमाम इंसानों और दूसरी मख़लूक़ात में हर लिहाज़ से सबसे बुलंद, सबसे ख़ूबसूरत और सबसे इज़्ज़त वाले हैं। आप वह आख़िरी और सबसे बुलंद नबी हैं जिनकी अल्लाह तआला ने तारीफ़ फ़रमाई और जिन्हें तमाम इंसानों और जिन्नों के लिए नबी चुनकर भेजा।

आपको सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजा गया है, और हर चीज़ आपकी ही ख़ातिर पैदा की गई है। आपका मुबारक नाम मुहम्मद है, जिसका मतलब है “बार-बार तारीफ़ किया गया, बहुत ज़्यादा सराहा गया”। आपके अहमद, महमूद, मुस्तफ़ा जैसे और भी मुबारक नाम हैं। आपके वालिद का नाम अब्दुल्लाह था। आप हिजरत से 53 (शम्सी हिसाब से 51) साल पहले, रबीउल अव्वल महीने की बारह तारीख़ को पीर की रात, सुबह होने से कुछ पहले मक्का मुकर्रमा में पैदा हुए। तारीख़ के आलिम लिखते हैं कि यह दिन 20 अप्रैल 571 ईसवी था।

आपकी पैदाइश से कुछ महीने पहले आपके वालिद अब्दुल्लाह का और छह साल की उम्र में आपकी वालिदा आमिना का इंतिक़ाल हो गया। इसी वजह से नबी-ए-करीम को “दुर्र-ए-यतीम” (कायनात की सीप में मौजूद अकेला, बड़ा और सबसे क़ीमती मोती) का लक़ब भी दिया गया है। आठ साल की उम्र तक आप अपने दादा अब्दुल मुत्तलिब के पास, और उनके इंतिक़ाल के बाद अपने चचा अबू तालिब के पास रहे। पच्चीस साल की उम्र में आपने हमारी माँ हज़रत ख़दीजतुल कुबरा से निकाह फ़रमाया। उनसे पैदा होने वाले आपके पहले बेटे का नाम क़ासिम था। अरबों में आदमी को उसके पहले बेटे के नाम से, कुन्नियत के साथ पुकारने का रिवाज था। इसी वजह से हमारे नबी को “अबुल क़ासिम”, यानी “क़ासिम के वालिद” कहा गया।

चालीस साल की उम्र में अल्लाह तआला ने आपको बताया कि आप तमाम इंसानों और जिन्नों के नबी हैं। तीन साल बाद आपने सबको ईमान की दावत देनी शुरू की। बावन साल की उम्र में मेराज हुई।1 622 ईसवी में, 53 (शम्सी हिसाब से 51) साल की उम्र में आपने मक्का से मदीना हिजरत फ़रमाई। आपने सत्ताईस बार जंग की: इनमें से नौ में एक आम सिपाही की तरह हमला किया और बाक़ी जंगों में आप लश्कर के सिपहसालार रहे। हिजरी सन् 11 (632 ईसवी) में, रबीउल अव्वल महीने की बारह तारीख़ को पीर के दिन दोपहर से पहले, 63 (शम्सी हिसाब से 61) साल की उम्र में मदीना मुनव्वरा में आपने इंतिक़ाल फ़रमाया।

अल्लाह तआला ने अपने तमाम नबियों को उनके नाम से पुकारा, लेकिन आपको “मेरे हबीब” (मेरे प्यारे) कहकर इज़्ज़त बख़्शी। अल्लाह पाक ने एक आयत-ए-करीमा में मफ़हूमन2: “हमने तुम्हें सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजा है”3 और एक हदीस-ए-क़ुदसी में: “अगर तुम न होते, अगर तुम न होते, तो मैं मख़लूक़ात को पैदा न करता!”4 फ़रमाया। जैसा कि हज़रत सैयद अब्दुल हकीम अरवासी ने फ़रमाया है: “हर नबी अपने ज़माने में, अपनी जगह पर, अपनी पूरी क़ौम से हर लिहाज़ से बुलंद है। हमारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम तो दुनिया के पैदा होने के दिन से क़यामत क़ायम होने तक, हर ज़माने में, हर मुल्क में, आ चुकी और आने वाली तमाम मौजूदात में हर लिहाज़ से सबसे ज़्यादा फ़ज़ीलत वाले और सबसे बुलंद हैं। कोई भी किसी भी लिहाज़ से आपसे ऊपर नहीं है। अल्लाह पाक ने आपको ऐसा ही पैदा किया है।”

आपके मुबारक नूर की पैदाइश

अल्लाह तआला ने हर चीज़ से पहले, यानी कोई भी चीज़ पैदा करने से पहले, हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम का मुबारक नूर पैदा किया। हमारे तफ़सीर और हदीस के आलिमों में से अक्सर ने बताया है: “अल्लाह पाक ने अपने नूर से एक लतीफ़ और अज़ीम जौहर पैदा किया। इस जौहर से उसने पूरी कायनात को तरतीब से वुजूद बख़्शा। इस जौहर को ‘नूर-ए-मुहम्मदी’ कहते हैं। तमाम रूहों और जिस्मों की शुरुआत और उनका असल सरचश्मा यही जौहर है।”

“अगर तुम न होते, अगर तुम न होते, तो मैं मख़लूक़ात को पैदा न करता!” हदीस-ए-क़ुदसी

एक दिन सहाबा-ए-किराम में से जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह ने पूछा: “या रसूलल्लाह! अल्लाह तआला ने हर चीज़ से पहले क्या पैदा किया?” रसूलुल्लाह ने जवाब में फ़रमाया: “हर चीज़ से पहले उसने अपने नूर से तुम्हारे नबी का नूर, यानी मेरा नूर पैदा किया। उस वक़्त लौह, क़लम, जन्नत, जहन्नम, फ़रिश्ता, समावात (आसमान), अर्ज़ (ज़मीन), सूरज, चाँद, इंसान और जिन्न – कुछ भी नहीं था।”

आदम अलैहिस्सलाम का दिल और मुबारक जिस्म पैदा किया गया तो नूर-ए-मुहम्मदी उनकी दोनों भौंहों के बीच रखा गया। जब उनमें रूह फूँकी गई, तो आदम अलैहिस्सलाम ने महसूस किया कि उनकी पेशानी पर ज़ोहरा सितारे की तरह चमकता हुआ एक नूर है।

आदम अलैहिस्सलाम पैदा किए गए तो उन्होंने इल्हाम से समझा कि अल्लाह पाक ने उन्हें अबू मुहम्मद, यानी मुहम्मद के वालिद कहकर पुकारा है। उन्होंने पूछा: “ऐ मेरे रब! तूने मुझे अबू मुहम्मद की कुन्नियत क्यों दी?” तो अल्लाह तआला ने फ़रमाया: “ऐ आदम! अपना सिर उठाओ!” आदम अलैहिस्सलाम ने सिर उठाकर देखा तो अर्श-ए-आला5 पर नूर से लिखा हुआ हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का नाम – अहमद – देखा। तब उन्होंने पूछा: “ऐ मेरे रब! ये कौन हैं?” अल्लाह तआला ने फ़रमाया: “ये तुम्हारी नस्ल में से एक नबी हैं। आसमानों में इनका नाम अहमद है और ज़मीन पर मुहम्मद। अगर ये न होते, तो मैं तुम्हें पैदा न करता। ज़मीनों और आसमानों को भी पैदा न करता।”6

आपका नूर पाक पेशानियों से पाक पेशानियों तक

आदम अलैहिस्सलाम पैदा किए गए तो उनकी पेशानी पर हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम का मुबारक नूर रखा गया। वह नूर उनकी पेशानी पर चमकने लगा। “तफ़सीर-ए-मज़हरी” में बताया गया है कि यह नूर आदम अलैहिस्सलाम से शुरू होकर पाक वालिदों और पाक वालिदाओं से होता हुआ नबी-ए-करीम तक पहुँचा। अल्लाह तआला ने आयत-ए-करीमा7 में मफ़हूमन इसे यूँ बयान फ़रमाया है:

“तुम, यानी तुम्हारा नूर, हमेशा सज्दा करने वालों से सज्दा करने वालों में मुंतक़िल होता हुआ तुम तक आ पहुँचा है।”8

एक हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया है: “अल्लाह तआला ने इंसानों को पैदा किया। मुझे इंसानों के सबसे अच्छे हिस्से से वुजूद बख़्शा। फिर इन हिस्सों में से सबसे अच्छे को (अरब में) चुना। मुझे इन्हीं में से वुजूद बख़्शा। फिर घरों और ख़ानदानों में से सबसे अच्छे को चुनकर मुझे उन्हीं में से दुनिया में भेजा। तो मेरी रूह और मेरा जिस्म मख़लूक़ात में सबसे अच्छे हैं। मेरा सिलसिला-ए-नसब, मेरे बाप-दादा इंसानों में सबसे अच्छे हैं।”

एक और हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया है: “अल्लाह तआला ने हर चीज़ को अदम से वुजूद बख़्शा। हर चीज़ में से इंसानों से मुहब्बत की, उन्हें क़द्र वाला बनाया; और इंसानों में से जिन्हें चुना, उन्हें अरब में बसाया। अरब के चुने हुए लोगों में से मुझे चुना। मुझे हर ज़माने के चुने हुए, सबसे अच्छे इंसानों में रखा। तो अरब में जो लोग मुझसे जुड़े हैं, उनसे मुहब्बत करने वाले मेरी ख़ातिर मुहब्बत करते हैं। और उनसे दुश्मनी करने वाले मुझसे दुश्मनी करते हैं।”

हक़ तआला ने जब आदम को पैदा किया,
आदम से इस जहान को आरास्ता किया।
फ़रिश्तों से आदम को सज्दा कराया,
लुत्फ़ के मालिक ने उन पर बड़ा करम फ़रमाया।
उनकी पेशानी में रखा मुस्तफ़ा का नूर,
फ़रमाया: “जानो, यह है मेरे हबीब का नूर।”
वह नूर उनकी पेशानी में ठहर गया,
मुद्दतों तक उन्हीं के साथ रह गया।
फिर, जानो, हव्वा की पेशानी में आ ठहरा,
वहाँ भी कितने महीने, कितने बरस रहा।
शीस पैदा हुए – यह नूर उन तक आया,
उनकी पेशानी में नूर ने जलवा दिखाया।
इब्राहीम और इस्माईल तक भी पहुँचा,
बाक़ी सुनाऊँ तो क़िस्सा हो जाए लंबा।
यूँ ज़ंजीर की कड़ियों की तरह जुड़ता हुआ,
मुस्तफ़ा तक पहुँचने तक चलता रहा।
जब आए वह सारे जहानों की रहमत बनकर,
नूर उन तक पहुँचा और ठहर गया वहीं पर।
अगर चाहो कि आग से नजात पाओ,
इश्क़ और दर्द के साथ दुरूद पढ़ते जाओ!

“तुम, यानी तुम्हारा नूर, हमेशा सज्दा करने वालों से सज्दा करने वालों में मुंतक़िल होता हुआ तुम तक आ पहुँचा है” शुअरा: 219

सबसे पहले पैदा किए गए इंसान आदम अलैहिस्सलाम मुहम्मद अलैहिस्सलाम का ज़र्रा उठाए हुए थे, इसलिए उनकी पेशानी पर आपका नूर चमकता था। यह ज़र्रा हज़रत हव्वा में, फिर उनसे शीस अलैहिस्सलाम में मुंतक़िल हुआ, और इसी तरह पाक मर्दों से पाक औरतों में और पाक औरतों से पाक मर्दों में मुंतक़िल होता रहा। मुहम्मद अलैहिस्सलाम का नूर भी ज़र्रे के साथ-साथ पाक पेशानियों से पाक पेशानियों में मुंतक़िल होता रहा। फ़रिश्ते जब भी आदम अलैहिस्सलाम के चेहरे की तरफ़ देखते, उनकी पेशानी पर मुहम्मद अलैहिस्सलाम का नूर देखते और उनके लिए इस्तिग़फ़ार करते थे।

आदम अलैहिस्सलाम ने इंतिक़ाल से पहले अपने बेटे शीस अलैहिस्सलाम से कहा: “मेरे बेटे! तुम्हारी पेशानी पर चमकने वाला यह नूर आख़िरी नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम का नूर है। इसे मोमिन, पाकदामन, पाकीज़ा औरतों के सुपुर्द करना और अपने बेटे को भी यही वसीयत करना!”

मुहम्मद अलैहिस्सलाम तक तमाम वालिदों ने अपने बेटों को यही वसीयत की। उन सबने इस वसीयत को पूरा किया और सबसे शरीफ़ और सबसे बा-अदब लड़कियों से निकाह किया। नूर औरतों और मर्दों की पाक पेशानियों से गुज़रता हुआ अपने असली मालिक तक पहुँचा। रसूलुल्लाह के बाप-दादाओं में से किसी के दो बेटे होते, या कोई क़बीला दो शाख़ों में बँटता, तो हमारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम का नूर हमेशा सबसे इज़्ज़त वाली और सबसे बेहतर शाख़ में होता। हर सदी में आपके बाप-दादाओं में से जो बुज़ुर्ग होते, वह अपने चेहरे के नूर से पहचाने जाते। आपका नूर उठाने वाली एक चुनी हुई नस्ल थी; हर सदी में इस नस्ल के जो बुज़ुर्ग होते, उनका चेहरा बहुत ख़ूबसूरत और बहुत नूरानी होता। इस नूर की वजह से वह अपने भाइयों में अलग पहचाने जाते, और जिस क़बीले में वह होते, वह क़बीला दूसरे क़बीलों से ज़्यादा बुलंद और ज़्यादा इज़्ज़त वाला होता।9

चुनांचे नबी-ए-करीम ने एक हदीस शरीफ़ में फ़रमाया: “मेरे बाप-दादाओं में से किसी ने भी ज़िना नहीं किया। अल्लाह तआला मुझे पाक, नेक बापों और पाक माँओं से दुनिया में लाया। अगर मेरे बाप-दादाओं में से किसी के दो बेटे होते, तो मैं उनमें से सबसे बेहतर, सबसे अच्छे में होता।” आदम अलैहिस्सलाम से नस्ल-दर-नस्ल मुंतक़िल होता आया यह नूर तारूख़ तक, फिर उनके बेटे इब्राहीम अलैहिस्सलाम तक, फिर उनके बेटे इस्माईल अलैहिस्सलाम तक पहुँचा। उनकी पेशानी पर भी सूरज की तरह चमकने वाला यह नूर उनकी औलाद में से अदनान तक, फिर मअद्द तक और फिर निज़ार तक मुंतक़िल हुआ। निज़ार पैदा हुए तो उनके वालिद मअद्द बेटे की पेशानी पर नूर देखकर बहुत ख़ुश हुए और एक बड़ी दावत की। उन्होंने कहा: “ऐसे बेटे के लिए यह दावत तो थोड़ी-सी चीज़ है”, इसलिए उनके बेटे का नाम निज़ार, यानी “थोड़ी-सी चीज़” पड़ गया। इसके बाद यह नूर कड़ी-दर-कड़ी मुंतक़िल होता हुआ अपने असली मालिक, ख़ातमुल अंबिया (आख़िरी नबी) हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम तक पहुँचा।

नबी-ए-करीम ने एक हदीस शरीफ़ में फ़रमाया: “मैं अब्दुल्लाह, अब्दुल मुत्तलिब, हाशिम (अम्र), अब्दे मनाफ़ (मुग़ीरा), क़ुसई (ज़ैद), किलाब, मुर्रा, कअब, लुअई, ग़ालिब, फ़िहर, मालिक, नज़्र, किनाना, ख़ुज़ैमा, मुदरिका (आमिर), इल्यास, मुज़र, निज़ार, मअद्द और अदनान का बेटा मुहम्मद हूँ। जिस जमाअत से मेरा ताल्लुक़ है, वह जब भी दो हिस्सों में बँटी, अल्लाह तआला ने मुझे यक़ीनन उसके सबसे बेहतर हिस्से में रखा…”10

एक और हदीस शरीफ़ में आपने फ़रमाया: “अल्लाह तआला ने इब्राहीम की औलाद में से इस्माईल को चुना। इस्माईल की औलाद में से बनू किनाना को चुना। बनू किनाना में से क़ुरैश को चुना। क़ुरैश में से बनू हाशिम को चुना। बनू हाशिम में से बनू अब्दुल मुत्तलिब को चुना। और बनू अब्दुल मुत्तलिब में से मुझे चुना।”11

नबी-ए-करीम का अदनान तक का शरफ़ वाला नसब यह है:

मुहम्मद अलैहिस्सलाम अब्दुल्लाह अब्दुल मुत्तलिब (शैबा) हाशिम (अम्र) अब्दे मनाफ़ (मुग़ीरा) क़ुसई (ज़ैद) किलाब मुर्रा कअब लुअई ग़ालिब फ़िहर मालिक नज़्र किनाना ख़ुज़ैमा मुदरिका (आमिर) इल्यास मुज़र निज़ार मअद्द अदनान

आपके दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब

नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) क़ुरैश क़बीले की बनू हाशिम शाख़ से हैं। आपके वालिद अब्दुल्लाह थे। अब्दुल्लाह के वालिद शैबा थे। हमारे नबी के दादा शैबा मदीना में पैदा हुए। जब उनके वालिद हाशिम का इंतिक़ाल हुआ, तब शैबा अभी बच्चे थे। एक दिन वह मदीना में अपने मामुओं के घर के सामने दोस्तों के साथ तीरंदाज़ी की मश्क़ कर रहे थे। उन्हें देखने वाले बड़े-बूढ़ों ने शैबा की पेशानी पर चमकते नूर से अंदाज़ा लगाया कि यह किसी इज़्ज़त वाले शख़्स के बेटे हैं, और वे हैरान रह गए।

जब तीर चलाने की बारी शैबा की आई, तो उन्होंने कमान खींचकर तीर निशाने की तरफ़ छोड़ा। तीर ठीक निशाने पर लगा तो उन्होंने जोश में पुकारा: “मैं हाशिम का बेटा हूँ। मेरा तीर तो निशाने पर लगेगा ही!” उनकी इन बातों से लोग समझ गए कि वह मक्का के हाशिम के बेटे हैं। उस वक़्त हाशिम का इंतिक़ाल हो चुका था।

बनू अब्दे मनाफ़ में से एक शख़्स मक्का लौटा तो उसने हाशिम के भाई मुत्तलिब से कहा: “मदीना में रहने वाला तुम्हारा भतीजा शैबा बहुत अक़्लमंद लड़का है। उसकी पेशानी पर एक ऐसा नूर चमकता है जो सबको हैरान कर देता है। ऐसे क़ीमती बच्चे को अपने से दूर रखना क्या ठीक है?” इस पर मुत्तलिब फ़ौरन मदीना गए और अपने भतीजे शैबा को लेकर मक्का आ गए। मक्का की गलियों में “यह बच्चा कौन है?” पूछने वालों को वह जवाब देते: “यह मेरा ग़ुलाम है।” इसके बाद शैबा का नाम अब्दुल मुत्तलिब, यानी “मुत्तलिब का ग़ुलाम” पड़ गया।12

“मेरे बेटे! तुम्हारी पेशानी पर चमकने वाला यह नूर आख़िरी नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम का नूर है। इसे मोमिन, पाकदामन, पाकीज़ा औरतों के सुपुर्द करना और अपने बेटे को भी यही वसीयत करना!” आदम अलैहिस्सलाम

अब्दुल मुत्तलिब अपने चचा मुत्तलिब के इंतिक़ाल तक उन्हीं के पास रहे। अब्दुल मुत्तलिब के मुबारक जिस्म से मुश्क की ख़ुशबू आती थी। उनकी पेशानी पर अल्लाह तआला के हबीब मुहम्मद अलैहिस्सलाम का नूर चमकता था और चारों तरफ़ भलाइयाँ और बरकतें बिखेरता था। जब भी मक्का में बारिश न होती और क़हत पड़ जाता, तो मक्का वाले अब्दुल मुत्तलिब का हाथ पकड़कर उन्हें सबीर पहाड़ पर ले जाते और दुआ के लिए उनकी मिन्नतें करते। वह किसी का दिल न तोड़ते और अल्लाह तआला से बारिश अता करने की दुआ करते। अल्लाह पाक भी अब्दुल मुत्तलिब की पेशानी पर चमकने वाले हमारे प्यारे नबी के नूर की बरकत से उनकी दुआ क़बूल करता और ख़ूब बारिश बरसाता। इस तरह अब्दुल मुत्तलिब की क़द्र और इज़्ज़त दिन-ब-दिन बढ़ती गई। मक्का वालों ने उन्हें अपना सरदार चुन लिया। उनके ख़िलाफ़ कोई खड़ा न होता, और जो उनके हुक्म के तहत आता, वह चैन और सुकून पाता। उस दौर के बादशाह भी अब्दुल मुत्तलिब की फ़ज़ीलत और बड़ाई को मानते थे। सिर्फ़ ईरान का बादशाह (किसरा) उनसे जलता था और खुलेआम भी और छुपकर भी उनसे दुश्मनी रखता था। अब्दुल मुत्तलिब हनीफ़, यानी मुसलमान थे।13 वह तौहीद के रास्ते पर थे, अल्लाह के वुजूद और उसकी वहदानियत पर ईमान रखते थे, उसके सिवा उनके दिल में कोई ख़याल न था, और वह अपने हनीफ़ दादा इब्राहीम अलैहिस्सलाम के दीन पर थे। इसी वजह से उन्होंने कभी बुतपरस्ती नहीं की, बल्कि बुतों के पास तक नहीं गए।

वह काबा के इर्द-गिर्द अल्लाह तआला से दुआ करते और उसकी इबादत करते थे।

ज़मज़म

एक दिन ख़्वाब में एक शख़्स ने उनसे कहा: “ऐ अब्दुल मुत्तलिब! उठो, तय्यिबा को खोदो!” और ग़ायब हो गए। अगले दिन वह फिर आए और कहा: “उठो, बर्रा को खोदो!” तीसरे दिन उसी शख़्स ने हुक्म दिया: “उठो, मदनूना को खोदो!” ख़्वाबों का सिलसिला रुक नहीं रहा था। चौथे दिन फिर उसी शख़्स ने जब कहा: “ऐ अब्दुल मुत्तलिब! उठो, ज़मज़म का कुआँ खोदो!”, तो अब्दुल मुत्तलिब ने पूछा: “ज़मज़म क्या है? कुआँ कहाँ है?” उन बुज़ुर्ग ने फ़रमाया: “ज़मज़म एक ऐसा पानी है जो कभी कम नहीं होता और जिसकी तह तक पहुँचा नहीं जा सकता। यह दुनिया के चारों कोनों से आने वाले तमाम हाजियों के लिए काफ़ी होता है। यह उस जगह से निकला है जहाँ जिबराईल अलैहिस्सलाम ने अपना पर मारा था। यह वह पानी है जिसे अल्लाह तआला ने इस्माईल अलैहिस्सलाम के लिए पैदा किया। यह प्यासों की प्यास बुझाता है, भूखों का पेट भरता है और बीमारों के लिए शिफ़ा है। मैं तुम्हें इसकी जगह बताता हूँ। लोग जब क़ुरबानी करते हैं, तो बचा हुआ हिस्सा एक जगह डाल देते हैं। जब तुम वहाँ होगे, तो लाल चोंच वाला एक कौआ आएगा।

वह अपनी चोंच से ज़मीन कुरेदेगा। कौए के कुरेदे हुए हिस्से में तुम चींटियों का एक बिल भी देखोगे। बस वही ज़मज़म की जगह है।”14

सुबह अब्दुल मुत्तलिब अपने बेटे हारिस को साथ लेकर काबा गए और बड़े जोश से इंतिज़ार करने लगे। कुछ देर बाद, जैसा ख़्वाब में बताया गया था, लाल चोंच वाला कौआ आकर वहाँ एक गड्ढे में बैठ गया और चोंच से ज़मीन पर ठोंगे मारने लगा। उसके नीचे से चींटियों का बिल निकला। अब्दुल मुत्तलिब और उनके बेटे हारिस ने फ़ौरन वहाँ खोदना शुरू कर दिया। कुछ देर खोदने के बाद कुएँ का मुँह दिखाई दिया। यह देखकर अब्दुल मुत्तलिब “अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर!” की तकबीरें बुलंद करने लगे।

क़ुरैश के लोग शुरू से कुआँ खोदे जाने को ग़ौर से देख रहे थे। वे उनकी तरफ़ मुड़े और बोले: “ऐ अब्दुल मुत्तलिब! यह हमारे बाप इस्माईल का कुआँ है। इसमें हमारा भी हक़ है। तुम्हें हमें इस काम में शरीक करना चाहिए!” अब्दुल मुत्तलिब ने फ़ौरन इनकार किया और जवाब दिया: “हरगिज़ नहीं! यह ज़िम्मेदारी सिर्फ़ मुझे अता की गई है।” इस पर क़ुरैश ने कहा: “तुम अकेले हो। तुम्हारे इकलौते बेटे के सिवा तुम्हारा कोई भी नहीं। तुम इस तरह हमारा मुक़ाबला नहीं कर सकते!”

ज़मज़म का कुआँ

ज़मज़म का कुआँ

मस्जिद-ए-हराम के अंदर, हजर-ए-असवद वाले कोने के सामने था। उसकी पत्थर की मुंडेर थी। उसका फ़र्श संगमरमर का बना था और दीवारों की तरफ़ ढलवाँ था। अब्दुल हमीद ख़ान अव्वल ने कुएँ को ऐसा बनवाया था कि पानी न रिसे। तारीख़ की क़ीमती यादगार यह ख़ूबसूरत फ़न का शाहकार 1963 में गिरा दिया गया। कुएँ का मुँह और उसके आसपास कई मीटर की जगह ज़मीन से कई मीटर नीचे कर दी गई। बाद में उसके ऊपर पूरी तरह ढककर संगमरमर बिछा दिया गया। अब यह कुआँ दिखाई नहीं देता।

उस वक़्त उनका दिल दुखा, क्योंकि लोग उन्हें अकेलेपन का ताना दे रहे थे। उन्होंने आसमान की तरफ़ हाथ उठाकर गिड़गिड़ाते हुए दुआ की: “या रब! मुझे दस बेटे अता फ़रमा। अगर तू मेरी यह दुआ क़बूल फ़रमाए, तो मैं उनमें से एक को काबा के पास क़ुरबान करूँगा।”15

अब्दुल मुत्तलिब ने सोचा कि खोदने का यह काम ख़तरनाक रुख़ ले चुका है और आख़िर में सख़्त झड़पें भी हो सकती हैं। इसलिए उन्होंने खोदना छोड़कर सुलह का रास्ता अपनाया।

उन्होंने चाहा कि मामले का फ़ैसला कोई पंच करे। आख़िरकार तय हुआ कि दमिश्क़ में रहने वाला एक काहिन इसका कोई हल निकालेगा। क़ुरैश के बड़े लोगों के एक गिरोह के साथ सफ़र शुरू हुआ। रास्ते में प्यास और गर्मी से बेहाल क़ाफ़िला चलने के क़ाबिल न रहा। अब वे पानी की एक बूँद के लिए तरसने लगे थे। उनकी बस यही एक ख़्वाहिश थी, मगर झुलसा देने वाले रेगिस्तान के बीच पानी मिलना नामुमकिन था।

जब सब उम्मीद हार चुके थे, उसी घड़ी अब्दुल मुत्तलिब ने उन्हें पुकारा: “आओ, आओ! इकट्ठे हो जाओ! मुझे इतना पानी मिल गया है जो तुम्हारे लिए भी और तुम्हारे जानवरों के लिए भी काफ़ी है!” पेशानी पर मुहम्मद अलैहिस्सलाम का मुबारक नूर रखने वाले अब्दुल मुत्तलिब जब पानी ढूँढ रहे थे, तो उनके ऊँट का पाँव एक बड़े पत्थर में अटक गया था, और पत्थर अपनी जगह से हिला तो उसके नीचे से पानी फूट निकला था। सब दौड़ते हुए आए।

उन्होंने जी भरकर पानी पिया और जैसे नई ज़िंदगी पा ली।

अब्दुल मुत्तलिब की इस बड़ाई के आगे शर्मिंदा होकर क़ुरैश ने कहा: “ऐ अब्दुल मुत्तलिब! अब हमारे पास तुमसे कहने को कोई बात नहीं रही। ज़मज़म का कुआँ खोदने के सबसे ज़्यादा लायक़ तुम ही हो। इस बारे में अब हम तुमसे कभी झगड़ा नहीं करेंगे। अब पंच के पास जाने की भी ज़रूरत नहीं रही, हम वापस लौटते हैं।” फिर उन्होंने मक्का का रास्ता लिया। अपनी पेशानी पर चमकने वाले नूर के सदक़े अब्दुल मुत्तलिब को ज़मज़म का कुआँ खोदकर उसका पानी निकालने का शरफ़ हासिल हुआ।16

“ज़मज़म पेट भरने वाला और बीमार को शिफ़ा देने वाला है” हदीस शरीफ़

क़ुरबान होने वाला बेटा

ज़मज़म का कुआँ खोदने के बाद अब्दुल मुत्तलिब की शान और शोहरत और भी बढ़ गई। साल गुज़रते गए। अल्लाह पाक ने उनके दिल की गहराइयों से निकली दुआ क़बूल फ़रमाई और अब्दुल मुत्तलिब को हारिस के अलावा दस बेटे और छह बेटियाँ अता फ़रमाईं। उनके बेटों के नाम क़ुसम, अबू लहब, अब्दुल काबा, हज्ल, ज़ुबैर, अबू तालिब, अब्दुल्लाह, ग़ैदाक़, ज़िरार और मुक़व्विम थे (हमज़ा और अब्बास अभी पैदा नहीं हुए थे)। बेटियाँ सफ़िय्या, आतिका, उम्मे हकीम बैज़ा, बर्रा, उमैमा और अरवा थीं। अब्दुल मुत्तलिब अपने बच्चों में सबसे ज़्यादा अब्दुल्लाह से मुहब्बत करते थे, क्योंकि उनकी अपनी पेशानी का नूर अब्दुल्लाह की पेशानी पर चमकने लगा था।

एक दिन अब्दुल मुत्तलिब से ख़्वाब में कहा गया: “ऐ अब्दुल मुत्तलिब! अपनी मन्नत पूरी करो!”

सुबह अब्दुल मुत्तलिब ने एक मेंढा क़ुरबान किया। रात को ख़्वाब में उन्हें हुक्म दिया गया: “इससे बड़ी चीज़ क़ुरबान करो!” सुबह उन्होंने एक बैल क़ुरबान किया। ख़्वाब में फिर उन्हें इससे भी बड़ी चीज़ क़ुरबान करने का हुक्म मिला तो उन्होंने पूछा: “इससे बड़ी चीज़ क्या है?” तब उनसे कहा गया: “तुमने मन्नत मानी थी कि अगर तुम्हें दस बेटे अता हुए, तो अपने बेटों में से एक को क़ुरबान करोगे। अपनी मन्नत पूरी करो!”

अगले दिन अब्दुल मुत्तलिब ने अपने बच्चों को जमा किया और बरसों पहले की हुई अपनी दुआ के बारे में बताया। फिर अपने बेटों को बताया कि उन्हें उनमें से एक को क़ुरबान करना है। अपनी औलाद की तरफ़ से उन्हें कोई मुख़ालफ़त नहीं मिली। उलटे उन्होंने रज़ामंदी ज़ाहिर करते हुए कहा: “ऐ हमारे अब्बा! अपनी मन्नत पूरी कीजिए! आप जो चाहें, करने में आज़ाद हैं!” अब्दुल मुत्तलिब ने क़ुरबान होने वाले बेटे को तय करने के लिए क़ुरआ डाला। क़ुरआ उनके सबसे प्यारे बेटे, अपनी पेशानी पर अल्लाह तआला के हबीब मुहम्मद अलैहिस्सलाम का नूर रखने वाले अब्दुल्लाह के नाम निकला। अब्दुल मुत्तलिब एक पल को लड़खड़ा गए, आँखें आँसुओं से भर आईं। उन्हें अल्लाह तआला से किया हुआ वादा पूरा करना ही था। एक हाथ में छुरी और दूसरे हाथ में अपने जिगर के टुकड़े अब्दुल्लाह को लेकर वह अपने रब से किया वादा पूरा करने के लिए काबा पहुँचे। वालिद ने आँसू भरी आँखों से अब्दुल्लाह को क़ुरबान करने की सारी तैयारियाँ पूरी कर लीं। उस वक़्त क़ुरैश के बड़े लोग हैरत भरी निगाहों से यह वाक़िआ देख रहे थे।

उनमें से अब्दुल्लाह के मामूँ ने कहा: “ऐ अब्दुल मुत्तलिब! रुक जाओ! हम तुम्हारे इस बेटे को ज़बह करने पर हरगिज़ राज़ी नहीं। अगर तुमने ऐसा किया, तो क़ुरैश में यह रिवाज बन जाएगा। हर कोई अपने बेटे की क़ुरबानी की मन्नत मानकर उसे ज़बह करने लगेगा। ऐसे काम की शुरुआत करने वाले मत बनो! अपने रब को किसी और तरीक़े से राज़ी करो!” फिर उसने सलाह दी: “किसी काहिन से पूछ लो, ताकि वह तुम्हें रास्ता बताए।”

इस बात पर अब्दुल मुत्तलिब ख़ैबर में रहने वाले क़ुतबा (या सजाक) नाम के एक काहिन के पास गए और सारा हाल बताया। काहिन ने पूछा: “तुम्हारे यहाँ एक इंसान की दियत (ख़ून-बहा) कितनी है?” “दस ऊँट” – यह जवाब मिला तो उसने कहा: “दस ऊँटों और अपने बेटे के बीच क़ुरआ डालो। अगर क़ुरआ बेटे के नाम निकले, तो दस ऊँट और बढ़ाओ और जब तक क़ुरआ ऊँटों के नाम न निकले, इसी तरह बढ़ाते हुए क़ुरआ डालते रहो।”

अब्दुल मुत्तलिब फ़ौरन मक्का लौटे और जैसा काहिन ने कहा था, वैसा ही किया। हर बार दस ऊँट बढ़ाकर उन्होंने कई बार क़ुरआ डाला। हर बार क़ुरआ अब्दुल्लाह के नाम निकला। लेकिन जब ऊँटों की गिनती सौ तक पहुँची, तो क़ुरआ ऊँटों के नाम निकला। एहतियात के तौर पर उन्होंने दो बार और क़ुरआ डाला। दोनों बार क़ुरआ ऊँटों के नाम ही निकला। अब्दुल मुत्तलिब ने “अल्लाहु अकबर! अल्लाहु अकबर!” की तकबीरें कहते हुए ऊँटों की क़ुरबानी की। उनका गोश्त न उन्होंने ख़ुद लिया, न उनके बेटों में से किसी ने। सारा गोश्त ग़रीबों में बाँट दिया।17

आदम अलैहिस्सलाम से लेकर अब तक के क़ुरबानी के वाक़िआत में एक वाक़िआ इस्माईल अलैहिस्सलाम के क़ुरबान किए जाने का भी है। नबी-ए-करीम का नसब इस्माईल अलैहिस्सलाम तक पहुँचता है, इसलिए आपने फ़रमाया: “मैं दो क़ुरबानियों का बेटा हूँ।”18

आपके वालिद हज़रत अब्दुल्लाह

दोनों जहान के सरदार हमारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम का नूर अपनी पेशानी पर रखने वाले अब्दुल्लाह जब पैदा हुए, तो अहले किताब ने एक-दूसरे को ख़बर दी: “आख़िरी ज़माने के नबी के वालिद मक्का में पैदा हो गए।” बनी इस्राईल के पास ऊन से बुना हुआ एक जुब्बा था; यह यह्या अलैहिस्सलाम का था और शहादत के वक़्त वह इसी को पहने हुए थे; उनका मुबारक ख़ून इस जुब्बे पर लग गया था। उनकी किताबों में लिखा था: “जब यह ख़ून ताज़ा होकर टपकने लगेगा, तब आख़िरी ज़माने के नबी के वालिद दुनिया में आएँगे।” चुनांचे अहले किताब ने यह निशानी देखकर समझ लिया कि अब्दुल्लाह पैदा हो गए हैं। उन्होंने हसद में आकर कई बार उन्हें क़त्ल करने की कोशिश की, लेकिन अल्लाह तआला ने उनकी पेशानी के नूर की बरकत से अब्दुल्लाह की हिफ़ाज़त की।

अब्दुल्लाह जब बुलूग़ की उम्र को पहुँचे, तो अपने अच्छे अख़लाक़ और अपनी ख़ूबसूरती, दोनों की वजह से लोगों में एक नुमायाँ शख़्सियत बन गए। ख़ास तौर पर जब वह अठारह साल के हुए, तो उनकी ख़ूबसूरती के चर्चे ज़बान-ज़बान पर होने लगे। उनकी पेशानी का नूर सूरज की तरह चमकता था, और देखने वाली लड़कियों का दिल न चाहते हुए भी उनकी तरफ़ खिंच जाता था। उनकी ख़ूबसूरती और शोहरत मिस्र तक फैल गई थी।

दूर-नज़दीक से हर कोई अपनी बेटी उन्हें देने के लिए होड़ करने लगा। बहुत-से बादशाहों ने अब्दुल मुत्तलिब के पास आकर पेशकश की कि वह उनकी बेटियों को अपने बेटे के लिए क़बूल कर लें। उन्होंने यह भी कहा कि इसके लिए वे हर क़ुरबानी देने को तैयार हैं। इसी तरह क़रीब दो सौ लड़कियाँ भी मक्का तक आकर अब्दुल्लाह से निकाह की पेशकश कर चुकी थीं। मगर अब्दुल मुत्तलिब हर एक को मुनासिब अल्फ़ाज़ में इनकार कर देते थे।

दरअसल अब्दुल मुत्तलिब अपने बेटे के लिए एक ऐसी लड़की की तलाश में थे जो इब्राहीम अलैहिस्सलाम के ज़माने से चले आ रहे उनके बाप-दादा के दीन पर क़ायम हो, सबसे बा-अदब, सबसे शरीफ़ और सबसे ख़ूबसूरत हो, यानी हनीफ़, मुसलमान हो।

बनी इस्राईल समझ गए थे कि उनकी किताबों में बताए गए आख़िरी ज़माने के नबी उनकी अपनी क़ौम में से नहीं होंगे, इसलिए उन्होंने जलन की वजह से अब्दुल्लाह को क़त्ल करने की क़सम खाई। इस काम के लिए उन्होंने सत्तर हथियारबंद आदमी मक्का भेजे। वे मौक़े की ताक में रहने लगे। आख़िर एक दिन जब अब्दुल्लाह आबादी से बाहर निकले, तो एक ऐसे वक़्त में, जब वे समझ रहे थे कि उन्हें कोई नहीं देख रहा, हमलावरों ने तलवारें खींचकर अब्दुल्लाह पर हमला कर दिया। उस दिन इलाही हिकमत19 के तहत अब्दुल्लाह के रिश्तेदारों में से वह्ब इब्ने अब्दे मनाफ़ भी अपने कुछ साथियों के साथ शिकार पर निकले हुए थे। उन्होंने ठीक उसी वक़्त बनी इस्राईल को अब्दुल्लाह पर टूट पड़ते देखा। रिश्तेदारी की ग़ैरत से उन्होंने अब्दुल्लाह को बचाने के लिए मदद करने का फ़ैसला किया। मगर सामने वाले बहुत ज़्यादा थे। इस झड़प में उनकी हार साफ़ नज़र आ रही थी। आख़िरकार उन्होंने नसीहत का रास्ता अपनाना मुनासिब समझा। जब वे उनकी तरफ़ बढ़े, तो उन्होंने देखा कि ऐसे बहुत-से लोग, जिनकी मिसाल इस दुनिया में नहीं मिलती, स्याह घोड़ों पर सवार, हाथों में तलवारें लिए ग़ैब से बिजली की तरह आ पहुँचे, तकबीरों की आवाज़ के साथ बनी इस्राईल पर टूट पड़े और उन सबको तलवार के घाट उतारकर ग़ायब हो गए। वह्ब यह हाल देखकर हैरान रह गए और समझ गए कि अब्दुल्लाह की किस तरह हिफ़ाज़त की गई और अल्लाह तआला के यहाँ उनकी कितनी क़द्र है।

घर आकर उन्होंने सारा हाल अपनी बीवी को सुनाया। दोनों ने माना कि उनकी बेटी के लायक़ जवान अब्दुल्लाह ही हैं, और आमिना का निकाह उनसे करने का फ़ैसला किया।

“मैं दो क़ुरबानियों का बेटा हूँ” हदीस शरीफ़

अब्दुल मुत्तलिब ने भी बनू ज़ुहरा क़बीले के सरदार वह्ब की बेटी आमिना की ख़ूबसूरती, पाकदामनी, हया और दीनदारी के बारे में सुन रखा था। नसब के लिहाज़ से भी वे रिश्तेदार थे; उनके ख़ानदान कुछ पुश्तें ऊपर जाकर मिल जाते थे। वह अपने बेटे अब्दुल्लाह के लिए इस लड़की का रिश्ता माँगने वह्ब के घर गए। जब अब्दुल मुत्तलिब ने वह्ब से उनकी बेटी अपने बेटे अब्दुल्लाह के लिए माँगी, तो वह्ब ने कहा: “ऐ चचाज़ाद भाई! यह पेशकश तो हमें आपसे पहले ही मिल चुकी है।” फिर उन्होंने पहले देखा हुआ वाक़िआ सुनाया और साथ ही यह भी बताया: “आमिना की माँ ने एक ख़्वाब देखा है। उसके बयान के मुताबिक़ हमारे घर में एक नूर दाख़िल हुआ और उसकी रौशनी ने ज़मीन और आसमानों को भर दिया। मैंने भी आज रात ख़्वाब में हमारे दादा इब्राहीम अलैहिस्सलाम को देखा। उन्होंने मुझसे कहा: ‘अब्दुल मुत्तलिब के बेटे अब्दुल्लाह और तुम्हारी बेटी आमिना का निकाह मैंने पढ़ा दिया है। तुम भी इसे क़बूल करो!’ आज सुबह से मैं इसी ख़्वाब के असर में हूँ। मैं सोच रहा था कि आख़िर वे कब आएँगे।” ये बातें सुनकर अब्दुल मुत्तलिब की ज़बान से “अल्लाहु अकबर! अल्लाहु अकबर!” के कलिमे निकल पड़े।

आख़िरकार उन्होंने अपने अठारह साल के बेटे अब्दुल्लाह का निकाह वह्ब की चौदह साल की बेटी आमिना से कर दिया। आमिना और अब्दुल्लाह के निकाह के बारे में दूसरी रिवायतें भी हैं।20

आपके मुबारक नूर का आपकी वालिदा में मुंतक़िल होना

सरवर-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का मुबारक नूर जब आपकी वालिदा में मुंतक़िल हुआ, तो भेड़ियों और परिंदों ने एक-दूसरे को यह ख़ुशख़बरी दी:

“कायनात के सरदार के दुनिया में तशरीफ़ लाने का वक़्त क़रीब आ गया; वह ज़मीन के अमीन21, ज़माने के सूरज हैं।” उस रात काबा के तमाम बुत औंधे मुँह गिर पड़े। शैतान बेबस हो गए और अपना काम न कर सके। फ़रिश्तों ने इब्लीस का तख़्त तोड़कर समुंदर में फेंक दिया और इब्लीस को चालीस दिन तक सज़ा देकर तकलीफ़ पहुँचाई। फिर वह भागकर अबू क़ुबैस पहाड़ पर चढ़ गया और ज़ोर से चीख़ा। इब्लीस की यह चीख़ सुनकर उसकी तमाम फ़ौजें उसके इर्द-गिर्द जमा हो गईं। उसने उनसे कहा: “तुम्हारी हालत पर अफ़सोस! मुहम्मद अलैहिस्सलाम की पैदाइश क़रीब आ गई। इसके बाद लात और उज़्ज़ा की पूजा नहीं होगी। तौहीद का नूर सारे आलम में फैल जाएगा।” उस रात तमाम जादूगर और काहिन अपने कामों में बेबस हो गए। काहिनों का ग़ैब की ख़बरें बताना ख़त्म हो गया। उनके जादू बेअसर हो गए। उस रात ज़मीन वालों ने आसमान से एक आवाज़ सुनी: “आख़िरी ज़माने के नबी के हज़ारों भलाइयों और नेमतों के साथ आने का वक़्त क़रीब आ गया।”

उस ज़माने में मक्का मुकर्रमा में क़हत पड़ा हुआ था। बरसों से बारिश नहीं हुई थी। पेड़ों पर एक भी हरा पत्ता न था, फ़सल का नाम-ओ-निशान न रहा था। लोग तंगी में पड़ गए थे और समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें। हमारे प्यारे नबी का मुबारक नूर हज़रत अब्दुल्लाह से हज़रत आमिना में मुंतक़िल होने के बाद इतनी बारिश हुई, इतनी फ़सल हुई कि उस साल का नाम ही “ख़ुशहाली का साल” रख दिया गया। हज़रत आमिना ने आपके हमल के पूरे नौ महीनों में कोई दर्द या तकलीफ़ नहीं उठाई।

हमारी माँ हज़रत आमिना के हमल को दो महीने हुए थे कि उनके शौहर अब्दुल्लाह तिजारत के लिए दमिश्क़ गए। वापसी पर वह बीमार हो गए। मदीना के क़रीब दारुन नाबिग़ा में अपने मामुओं, बनू नज्जार के पास, अठारह या पच्चीस साल की उम्र में उन्होंने इंतिक़ाल फ़रमाया।22 यह ख़बर मक्का में पहुँची तो पूरा शहर ग़म में डूब गया।23

“नबी-ए-करीम के वालिद अब्दुल्लाह जब बेटे की पैदाइश से पहले इंतिक़ाल कर गए, तो फ़रिश्तों ने कहा: ‘ऐ हमारे रब! तेरा रसूल यतीम रह गया’” अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा)

सहाबा-ए-किराम में से अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) ने यूँ बयान किया: “नबी-ए-करीम के वालिद अब्दुल्लाह जब बेटे की पैदाइश से पहले इंतिक़ाल कर गए, तो फ़रिश्तों ने कहा: ‘ऐ हमारे रब! तेरा रसूल यतीम रह गया।’ अल्लाह तआला ने फ़रमाया: ‘उनका निगहबान और मददगार मैं हूँ।’”

बीबी आमिना अपने शौहर के इंतिक़ाल पर बहुत ग़मगीन हुईं। अपनी एक नज़्म में उन्होंने उनकी वफ़ात का ग़म यूँ बयान किया:

अचानक ऐसी घड़ी में अजल उन्हें ले गई,
जबकि वह बड़े सख़ी थे, बड़े रहमदिल भी।

हाथी का वाक़िआ

हाथी का वाक़िआ

रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की पैदाइश में तक़रीबन दो महीने बाक़ी थे। उसी दौरान हाथी का वाक़िआ पेश आया। लोग हर तरफ़ से जूक़-दर-जूक़ आकर काबा की ज़ियारत करते थे। हब्शा (एबीसीनिया) की बादशाहत की तरफ़ से यमन का हाकिम अबरहा इसे रोकना चाहता था। उसने रूम (बाइज़ेंटाइन सल्तनत) के बादशाह की मदद से सनआ में “क़ुलैस” नाम का एक बड़ा गिरजा बनवाया। वह चाहता था कि लोग इस गिरजे की ज़ियारत करें। लेकिन अरब पुराने ज़माने से काबा की ज़ियारत करते आए थे, इसलिए उन्होंने अबरहा के बनवाए हुए गिरजे को ज़रा भी अहमियत नहीं दी, बल्कि उसे हिक़ारत की नज़र से देखा। यहाँ तक कि उनमें से एक शख़्स ने गिरजे को गंदा कर दिया।

इस बात पर भड़ककर अबरहा ने काबा को ढाने का फ़ैसला किया। इस मक़सद से उसने एक बड़ा लश्कर तैयार किया और मक्का की तरफ़ कूच किया। अबरहा का लश्कर मक्का के क़रीब पहुँचा तो सिपाहियों ने क़ुरैश के माल लूटने शुरू कर दिए। उन्होंने अब्दुल मुत्तलिब के दो सौ ऊँट भी क़ब्ज़े में ले लिए। अब्दुल मुत्तलिब अबरहा के पास गए और अपने ऊँट वापस माँगे। अबरहा ने कहा: “मैं तुम लोगों के मुक़द्दस काबा को ढाने आया हूँ। तुम उसे बचाना नहीं चाहते और अपने ऊँट माँग रहे हो?”

अब्दुल मुत्तलिब ने कहा: “मैं ऊँटों का मालिक हूँ। काबा का भी यक़ीनन एक मालिक है। वही उसकी हिफ़ाज़त करेगा।” अबरहा ने कहा: “मुझसे उसे बचाने वाला कोई नहीं!” और ऊँट अब्दुल मुत्तलिब को लौटाकर उन्हें रुख़सत कर दिया। फिर उसने अपने लश्कर को काबा की तरफ़ बढ़ने का हुक्म दिया। अबरहा के लश्कर में “महमूदा” नाम का एक हाथी था; उसे लश्कर के आगे-आगे चलाया जाता था, क्योंकि उनका यक़ीन था कि इस तरह जीत हासिल होगी। अबरहा के रहनुमाओं में से नुक़ैल इब्ने लबीब ने उस बड़े हाथी के कान में झुककर कहा: “ऐ महमूदा, जिस घर को ढाने तू जा रहा है, वह अल्लाह तआला का घर है। फ़ौरन बैठ जा! ख़बरदार, आगे मत बढ़ना! वरना हलाक हो जाएगा!” अबरहा ने हाथी का रुख़ काबा की तरफ़ किया तो वह ज़मीन पर बैठ गया और आगे न बढ़ा। लेकिन जब उसे यमन की तरफ़ मोड़ा जाता, तो वह दौड़ता हुआ चल पड़ता।

इस तरह अबरहा का लश्कर मक्का के क़रीब पहुँचकर भी हमला न कर सका, और अल्लाह तआला ने उस पर अबाबील, यानी पहाड़ी अबाबील कहलाने वाले परिंदों का एक झुंड भेजा। इन परिंदों में से हर एक चने या मसूर के दाने के बराबर तीन-तीन कंकड़ उठाए हुए था: एक चोंच में और दो पंजों में। उन्होंने ये कंकड़ अबरहा के लश्कर पर गिराए। कंकड़ सिपाहियों के सिर से घुसकर सीधे नीचे तक चीरते हुए निकल जाते थे। जिस सिपाही को कंकड़ लगता, वह उसी वक़्त मर जाता। जैसा कि आयत-ए-करीमा में भी बताया गया है, लश्कर खाई हुई खेती के पत्तों जैसा हो गया। यह देखकर अबरहा घबरा गया और भागना चाहा, मगर भाग न सका। कंकड़ों का असल निशाना वही था, और उसे भी कंकड़ लग चुका था। वह जितना भागता, उसका गोश्त टुकड़े-टुकड़े होकर गिरता जाता, और आख़िर वह मर गया। यह वाक़िआ क़ुरआन-ए-करीम की सूरह फ़ील में मफ़हूमन यूँ बयान किया गया है: “(ऐ मेरे रसूल!) क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारे रब ने (काबा को ढाना चाहने वाले) हाथी वालों (हाथियों से लैस अबरहा के लश्कर) के साथ कैसा सुलूक किया? क्या उसने उनकी (काबा मुअज़्ज़मा को ढाने की शक्ल में की गई) चालों को बेकार नहीं कर दिया? उसने उन पर झुंड के झुंड परिंदे भेजे। वे परिंदे उन पर मिट्टी से बने और आग में पकाए हुए कंकड़ फेंकते थे। आख़िरकार अल्लाह तआला ने उन्हें कीड़ों के खाए हुए खेती के पत्तों की तरह तबाह कर दिया। (उन्हें कीड़ों के कुतरे और चूर-चूर किए हुए खेती के पत्तों जैसा बना दिया।)”24

“मैं ऊँटों का मालिक हूँ। काबा का भी यक़ीनन एक मालिक है। वही उसकी हिफ़ाज़त करेगा” शैबतुल हम्द

अरब और उसके आसपास के तहज़ीबी मरकज़