दूसरा हिस्सा क़ब्र की ज़िंदगी
नबी-ए-करीम का अपनी क़ब्र में ज़िंदा होना
नबी अपनी क़ब्रों में एक ऐसी ज़िंदगी के साथ ज़िंदा हैं जिसे हम नहीं जानते। औलिया और शहीद भी ज़िंदा हैं। उनका ज़िंदा होना सिर्फ़ कहने की बात नहीं है। वे पूरी तरह ज़िंदा हैं। सूरह आले इमरान की 169वीं आयत-ए-करीमा में मफ़हूमन फ़रमाया गया: “अल्लाह तआला की राह में मारे जाने वालों को मुर्दा न समझो! वे अपने रब के पास ज़िंदा हैं। उन्हें रिज़्क़ दिया जाता है।”
यह आयत-ए-करीमा बताती है कि शहीद ज़िंदा हैं। नबी तो यक़ीनन शहीदों से आगे और बुलंद हैं। इस्लामी आलिमों के मुताबिक़ हर नबी ने शहीद होकर वफ़ात पाई है। रसूलुल्लाह ने अपनी आख़िरी बीमारी में फ़रमाया: “ख़ैबर में जो खाना मैंने खाया था, उसकी तकलीफ़ मैं हमेशा महसूस करता रहा।”1 यह हदीस शरीफ़ बताती है कि रसूलुल्लाह ने शहीद होकर वफ़ात पाई। इसलिए यहाँ से भी समझ में आता है कि नबी-ए-करीम तमाम शहीदों की तरह अपनी क़ब्र में ज़िंदा हैं।
“बुख़ारी” और “मुस्लिम” में बयान की गई हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “मेराज की रात मुझे मूसा (अलैहिस्सलाम) की क़ब्र के पास से गुज़ारा गया। वह अपनी क़ब्र में खड़े होकर नमाज़ पढ़ रहे थे।”2
एक और हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “अल्लाह तआला ने मिट्टी पर नबियों के जिस्मों को गलाना हराम कर दिया है।”3 आलिम एक राय होकर बताते हैं कि यह सही है। “बुख़ारी” और “मुस्लिम” में लिखा है: “अल्लाह तआला ने मेराज की रात तमाम नबियों को हमारे नबी के पास भेजा। आप उनके इमाम बने और उन्होंने दो रकअत नमाज़ पढ़ी।”
नमाज़ रुकूअ और सज्दा करने से होती है। यह ख़बर दिखाती है कि उन्होंने ज़िंदा होकर, जिस्म के साथ, बदन के साथ नमाज़ पढ़ी। मूसा अलैहिस्सलाम का अपनी क़ब्र में नमाज़ पढ़ना भी यही दिखाता है। “मिश्कात” किताब की आख़िरी जिल्द में, मेराज के बाब की पहली फ़स्ल के आख़िर में, मुस्लिम के हवाले से अबू हुरैरा की बयान की हुई हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “अल्लाह तआला ने मुझे दिखाया। मूसा (अलैहिस्सलाम) खड़े होकर नमाज़ पढ़ रहे थे, दुबले-पतले थे। उनके बाल न बिखरे हुए थे, न लटके हुए। वह शनूआ क़बीले के एक जवान की तरह थे। ईसा (अलैहिस्सलाम) उरवा इब्ने मसऊद सक़फ़ी से मिलते-जुलते थे।”4 शनूआ यमन के दो क़बीलों का नाम है। ये हदीसें दिखाती हैं कि नबी अपने रब के पास ज़िंदा हैं। उनके जिस्म (बदन) उनकी रूहों की तरह लतीफ़ हो गए हैं। वे कसीफ़ और सख़्त नहीं हैं। वे माद्दी दुनिया और रूहों की दुनिया दोनों में दिखाई दे सकते हैं। इसीलिए नबी अपनी रूहों और अपने जिस्मों के साथ दिखाई दे सकते हैं। हदीस शरीफ़ में बताया गया है कि मूसा और ईसा (अलैहिमस्सलाम) नमाज़ पढ़ रहे थे। नमाज़ पढ़ना तरह-तरह की हरकतें करना है। ये हरकतें बदन से होती हैं, रूह से नहीं। नबी-ए-करीम का मूसा अलैहिस्सलाम के बारे में यह फ़रमाना: “मैंने उन्हें दरमियाना क़द, कम गोश्त वाला, दुबला और सिमटे हुए बालों वाला देखा” – यह दिखाता है कि आपने उनकी रूह को नहीं, बदन को देखा।
“अल्लाह तआला की राह में मारे जाने वालों को मुर्दा न समझो! वे अपने रब के पास ज़िंदा हैं। उन्हें रिज़्क़ दिया जाता है” आले इमरान: 169
इमाम बैहक़ी ने फ़रमाया: “नबियों को क़ब्र में रखे जाने के बाद उनकी रूहें उनके जिस्मों में लौटा दी जाती हैं। हम उन्हें देख नहीं सकते। वे फ़रिश्तों की तरह नज़र नहीं आते। सिर्फ़ वे चुने हुए लोग उन्हें देख सकते हैं जिन्हें अल्लाह तआला ने करामत के तौर पर यह अता किया हो।” इमाम सुयूती ने भी यही बताया है। बहुत से लोगों ने बहुत बार सुना है कि क़ब्र-ए-सआदत से सलामों का जवाब दिया गया। दूसरी क़ब्रों से भी सलामों का जवाब दिए जाने की बात बहुत सुनी गई है।
हदीस शरीफ़ में भी फ़रमाया गया: “जब मुझे सलाम किया जाता है, तो अल्लाह तआला मेरी रूह लौटा देता है और मैं उसका जवाब देता हूँ।”5
हज़रत इमाम सुयूती ने फ़रमाया: “रसूलुल्लाह इलाही जमाल के दीदार में डूबे हुए हैं। आप बदन के एहसासात को भूले हुए हैं। जब कोई मुसलमान सलाम करता है, तो आपकी मुबारक रूह उस हाल से अलग होकर बदन के एहसासात ले लेती है। दुनिया में भी ऐसे लोग कम नहीं हैं। जब इंसान दुनिया या आख़िरत के किसी काम के बारे में बहुत गहराई से सोच रहा हो, तो पास में की जाने वाली बात नहीं सुनता। इलाही जमाल में डूबा हुआ शख़्स भला कोई आवाज़ सुन सकता है?”
हज़रत क़ाज़ी इयाज़ ने “शिफ़ा” किताब में सुलैमान इब्ने सुहैम की यह रिवायत बयान की है: “एक रात मैंने ख़्वाब में फ़ख़्र-ए-कायनात को देखा और अर्ज़ किया: ‘या रसूलल्लाह! जो लोग आकर आपको सलाम करते हैं, क्या आप उनके सलाम को जानते हैं?’ आपने फ़रमाया: ‘हाँ, जानता हूँ और उनका सलाम लेकर जवाब देता हूँ।’” जो हदीसें बताती हैं कि नबी अपनी क़ब्रों में ज़िंदा हैं, वे इतनी ज़्यादा हैं कि एक-दूसरे को मज़बूत करती हैं। मसलन फ़रमाया गया है: “मेरी क़ब्र के पास मुझ पर जो दुरूद पढ़ा जाता है, उसे मैं सुनता हूँ। दूर की जगहों में जो पढ़ा जाता है, वह मुझे पहुँचाया जाता है।” इस हदीस शरीफ़ को अबू बकर इब्ने अबी शैबा ने बयान किया है। यह और इस जैसी हदीसें हदीस के छह बड़े इमामों की किताबों में मौजूद हैं। इब्ने अबिद दुनिया ने हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास से जो हदीस शरीफ़ बयान की है, उसमें फ़रमाया गया: “अगर कोई शख़्स अपने किसी जानने वाले की क़ब्र के पास जाकर सलाम करे, तो मय्यत उसे पहचानती है और जवाब देती है। अगर किसी अनजान मय्यत को सलाम करे, तो मय्यत ख़ुश होती है और जवाब देती है।”
अगर पूछा जाए कि रसूलुल्लाह दुनिया के हर कोने में एक ही वक़्त में दुरूद और सलाम भेजने वालों में से हर एक को अलग-अलग कैसे जवाब देते हैं, तो जवाब दिया जाता है कि यह ऐसा है जैसे दोपहर के वक़्त सूरज एक लम्हे में हज़ारों शहरों पर रौशनी डालता है। हज़रत इब्राहीम इब्ने बश्शार ने फ़रमाया: “हज करने के बाद मैं क़ब्र-ए-सआदत की ज़ियारत के लिए मदीना गया। हुजरा-ए-सआदत के सामने सलाम किया और ‘व अलैकस्सलाम’ का जवाब सुना।”
एक हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “मैं वफ़ात के बाद भी उसी तरह समझता हूँ जैसे ज़िंदगी में समझता था।” एक और हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “नबी अपनी क़ब्रों में ज़िंदा हैं और नमाज़ पढ़ते हैं।”6
बहुत मोतबर किताबों में लिखा है कि औलिया के बड़ों में से हज़रत सैयद अहमद रिफ़ाई और बहुत से वलियों ने रसूलुल्लाह को किए गए सलाम का जवाब सुना और अहमद रिफ़ाई को रसूलुल्लाह का मुबारक हाथ चूमने का शरफ़ मिला। इमाम सुयूती अपनी किताब में फ़रमाते हैं: “ऊँचे दर्जे के वली नबियों को ऐसे देखते हैं जैसे उनकी वफ़ात न हुई हो। नबी-ए-करीम का मूसा अलैहिस्सलाम को उनकी क़ब्र में ज़िंदा देखना एक मोजिज़ा था। औलिया का भी इसी तरह देखना करामत है। करामत पर यक़ीन न करना जहालत से पैदा होता है।”
इब्ने हिब्बान, इब्ने माजा और अबू दाऊद की बयान की हुई हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “जुमा के दिनों में मुझ पर कसरत से दुरूद पढ़ो! ये मुझे पहुँचाए जाते हैं।” जब पूछा गया: “क्या वफ़ात के बाद भी पहुँचाए जाएँगे?” तो फ़रमाया: “मिट्टी नबियों के जिस्म को नहीं गलाती। जब कोई मोमिन मुझ पर दुरूद पढ़ता है, तो एक फ़रिश्ता मुझे ख़बर देते हुए कहता है: ‘आपकी उम्मत में से फ़लाँ के बेटे फ़लाँ ने आपको सलाम कहा और दुआ की।’”
रसूलुल्लाह जिस तरह अपनी ज़िंदगी में अपने सहाबा के लिए अल्लाह तआला की एक रहमत और बड़ी नेमत थे, उसी तरह अपनी वफ़ात के बाद भी अपनी पूरी उम्मत के लिए बड़ी नेमत हैं। आप भलाइयों का सबब हैं। बक्र इब्ने अब्दुल्लाह मुज़नी की रिवायत की हुई हदीस शरीफ़ में रसूल-ए-अकरम ने फ़रमाया: “मेरी ज़िंदगी तुम्हारे लिए भलाई है। तुम मुझसे बात करते हो, मैं भी तुमसे बात करता हूँ। मरने के बाद मेरी वफ़ात भी तुम्हारे लिए भलाई होगी। तुम्हारे आमाल मुझे दिखाए जाएँगे। जब तुम्हारे अच्छे काम देखूँगा, तो अल्लाह तआला की हम्द करूँगा। जब तुम्हारे बुरे काम देखूँगा, तो तुम्हारे लिए माफ़ी और मग़फ़िरत माँगूँगा।”7
हज़रत क़ुसम इब्ने अब्बास को रसूलुल्लाह के दफ़न की ख़िदमत का शरफ़ हासिल हुआ। क़ब्र का काम ख़त्म हुआ, तो सबसे आख़िर में वही निकले। उन्होंने कहा: “रसूलुल्लाह का मुबारक चेहरा सबसे आख़िर में देखने वाला मैं हूँ। क़ब्र में आपके मुबारक होंठ हिल रहे थे। मैंने झुककर कान लगाया, तो आप फ़रमा रहे थे: ‘या रब! मेरी उम्मत!… या रब! मेरी उम्मत!…’”8
नबी-ए-करीम को देखना
क्या रसूलुल्लाह को नींद में और जागते हुए देखा जा सकता है? अगर देखा जा सकता है, तो दिखाई देने वाले ख़ुद आप होते हैं या आपके जैसा कोई? हमारे आलिमों ने इसके अलग-अलग जवाब दिए हैं। सबने एक राय से बताया कि आप क़ब्र में ज़िंदा हैं; फिर ज़्यादातर ने यह बयान फ़रमाया कि ख़ुद आप ही दिखाई देते हैं। ऐसा होना हदीस शरीफ़ से भी समझ में आता है। एक हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “जिसने मुझे ख़्वाब में देखा, वह ऐसा है जैसे उसने मुझे जागते में देखा।”9 इसीलिए हज़रत इमाम नववी ने कहा: “आपको ख़्वाब में देखना पूरी तरह ख़ुद आपको देखना है।” हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “जिसने मुझे ख़्वाब में देखा, उसने सही देखा, क्योंकि शैतान मेरी सूरत में नहीं आ सकता।”10
“जिसने मुझे ख़्वाब में देखा, वह ऐसा है जैसे उसने मुझे जागते में देखा” हदीस शरीफ़
हज़रत इब्राहीम लक़ानी फ़रमाते हैं: “हदीस के आलिमों ने एक राय से बताया है कि रसूलुल्लाह जिस तरह ख़्वाब में दिखाई देते हैं, उसी तरह जागते में भी दिखाई दे सकते हैं।” दोनों हालतों की बहुत सी मिसालें दी जा सकती हैं। उनमें से कुछ बयान करते हैं:
हज़रत मुईनुद्दीन चिश्ती जिस शहर में जाते, वहाँ के क़ब्रिस्तानों की ज़ियारत करते और कुछ अरसा वहाँ ठहरते। जहाँ पहुँचते, वहाँ जब लोग उन्हें पहचानने लगते, तो वहाँ न ठहरते, किसी को बताए बग़ैर चुपके से निकल जाते। इन्हीं सफ़रों में एक बार वह मक्का भी गए। मक्का मुकर्रमा जाकर काबा मुअज़्ज़मा की ज़ियारत की। कुछ अरसा मक्का में ठहरकर वहाँ से मदीना मुनव्वरा गए। एक दिन जब वह नबी-ए-करीम की क़ब्र शरीफ़ की ज़ियारत कर रहे थे, तो मुबारक रौज़े से एक आवाज़ सुनाई दी: “मुईनुद्दीन को बुलाओ!” इस हुक्म पर रौज़े के ख़ादिम ने पुकारा: “मुईनुद्दीन!” कई जगहों से आवाज़ आई: “जी, हाज़िर!” फिर लोगों ने कहा: “कौन से मुईनुद्दीन को ढूँढ रहे हो? यहाँ मुईनुद्दीन नाम के बहुत से लोग हैं।” इस पर रौज़े का ख़ादिम लौटकर रौज़ा-ए-मुतह्हरा के दरवाज़े पर खड़ा हो गया। उसने दो बार एक आवाज़ को पुकारते सुना: “मुईनुद्दीन चिश्ती को बुलाओ!” यह हुक्म सुनकर रौज़े के ख़ादिम ने लोगों की तरफ़ मुँह करके पुकारा: “मुईनुद्दीन चिश्ती को बुलाया जा रहा है!”
हज़रत मुईनुद्दीन चिश्ती ने यह बात सुनी, तो उन पर बिल्कुल और ही हालत तारी हो गई। रोते, आँसू बहाते और दुरूद पढ़ते हुए हमारे प्यारे नबी के रौज़े के क़रीब आए और अदब से खड़े हो गए। उसी वक़्त उन्होंने एक आवाज़ सुनी: “ऐ क़ुतुबुल मशाइख़! अंदर आ जाओ!”
नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “तुम मेरे दीन की ख़िदमत करने वाले हो। तुम्हें हिन्दुस्तान जाना है। हिन्दुस्तान जाओ। वहाँ अजमेर नाम का एक शहर है। वहाँ मेरी औलाद (मेरे नवासों) में से सैयद हुसैन नाम के एक शख़्स हैं। वह वहाँ जिहाद और ग़ज़वे की नीयत से गए थे। वह अब शहीद हो गए हैं। अजमेर काफ़िरों के हाथ में जाने वाला है। तुम्हारे वहाँ जाने के सबब और उसकी बरकत से इस्लाम फैलेगा और काफ़िर ज़लील होकर कमज़ोर और बेअसर रह जाएँगे।” फिर आपने उन्हें एक अनार दिया और फ़रमाया: “इस अनार को ग़ौर से देखो, देखकर समझ लोगे कि तुम्हें कहाँ जाना है।” हज़रत मुईनुद्दीन चिश्ती ने नबी-ए-करीम का दिया हुआ अनार लिया, हुक्म के मुताबिक़ उसे देखा और पूरब से पच्छिम तक सब कुछ देख लिया। हज़रत अहमद रिफ़ाई हज के लिए गए थे। वापसी पर मदीना मुनव्वरा में रसूल-ए-अकरम के मुबारक रौज़े की ज़ियारत करते हुए उन्होंने इस मफ़हूम के शेर कहे:
हम दूर थे, आपकी ख़ाक चूमने को, ऐ मेरे सरदार,
ख़ुद न आ पाता था, अपनी रूह को वकील बनाकर भेजता था।
अब आपकी ज़ियारत की नेमत नसीब हुई है,
अपना मुबारक हाथ बढ़ाइए, मेरे होंठ चूमें, ऐ हबीब!
शेर ख़त्म होते ही हमारे प्यारे नबी की क़ब्र शरीफ़ से आपका मुबारक हाथ ज़ाहिर हुआ। सैयद अहमद रिफ़ाई ने बेहद ताज़ीम और एहतिराम के साथ नबी-ए-करीम का मुबारक हाथ चूमा। वहाँ मौजूद हर शख़्स ने हैरत से यह वाक़िआ देखा। नबी-ए-करीम का मुबारक हाथ चूमने के बाद वह रौज़ा-ए-मुतह्हरा के दरवाज़ों की चौखट पर लेट गए और रोते हुए वहाँ मौजूद तमाम लोगों से मिन्नत करने लगे: “मेरे ऊपर से क़दम रखकर गुज़रो!” आलिम दूसरे दरवाज़ों से निकलने पर मजबूर हुए। यह करामत बहुत मशहूर हुई और ज़बान-दर-ज़बान हमारे ज़माने तक पहुँची है। हज़रत इब्ने आबिदीन की दीन की पैरवी मशहूर है, और उनकी करामतें और मनाक़िब बहुत हैं।
वह पाँचों वक़्त की नमाज़ में अत्तहिय्यात पढ़ते हुए रसूलुल्लाह को अपनी आँखों से देखते थे। जब न देख पाते, तो वह नमाज़ फिर से पढ़ते। इस्लामी आलिमों में सबसे बड़ों में से, दूसरे हज़ार साल के मुजद्दिद इमाम रब्बानी अहमद फ़ारूक़ी सरहिंदी ने फ़रमाया: “रमज़ान शरीफ़ के आख़िरी दिनों में एक बेहद ख़ूबसूरत हाल ज़ाहिर हुआ। मैं अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था। आँखें बंद कर रखी थीं। मैंने महसूस किया कि कोई और आकर मेरे बिस्तर पर बैठ गया है। क्या देखता हूँ कि वह अगलों और पिछलों के सैयद और सरदार हैं। मैं फ़ौरन सँभलकर बैठ गया। हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: ‘मैं तुम्हारे लिए इजाज़त लिखने आया हूँ। मैंने किसी के लिए ऐसी इजाज़त नहीं लिखी।’ मैंने देखा कि उस इजाज़तनामे के मतन में इस दुनिया से मुताल्लिक़ बड़े-बड़े लुत्फ़ और उसकी पुश्त पर आख़िरत से मुताल्लिक़ बहुत सी इनायतें लिखी हुई थीं।”
हज़रत अब्दुल क़ादिर जीलानी “ग़ुनिया” किताब में हज़रत इब्राहीम तैमी से नक़ल करके बयान करते हैं: ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने मुझसे कहा: “अगर तुम ख़्वाब में रसूलुल्लाह को देखना चाहते हो, तो मग़रिब की नमाज़ पढ़ने के बाद इशा तक किसी से बात किए बग़ैर खड़े होकर मग़रिब के बाद की अव्वाबीन की नमाज़ पढ़ो। हर दो रकअत पर सलाम फेरो।
हर रकअत में एक बार ‘अल-हम्द’, यानी सूरह फ़ातिहा, और सात बार सूरह इख़लास पढ़ो। इशा की नमाज़ भी जमाअत से पढ़ने के बाद घर आकर वित्र पढ़ो। सोने के लिए लेटने से पहले भी दो रकअत नमाज़ पढ़कर हर रकअत में ‘अल-हम्द’ और सात बार सूरह इख़लास पढ़ो। नमाज़ के बाद सज्दे में गिरकर सात बार अल्लाह तआला से इस्तिग़फ़ार करो और सात बार यह कहो: ‘सुब्हानल्लाहि वल हम्दु लिल्लाहि व ला इलाह इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर व ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलिय्यिल अज़ीम।’ फिर सज्दे से सिर उठाकर बैठ जाओ और हाथ उठाकर कहो: ‘या हय्यु, या क़य्यूम, या ज़ल जलालि वल इकराम, या इलाहल अव्वलीना वल आख़िरीन, व या रहमानद दुनिया वल आख़िरति व रहीमहुमा, या रब्बि, या रब्बि, या रब्बि, या अल्लाह, या अल्लाह, या अल्लाह।’
फिर खड़े होकर यही दुआ पढ़ो। फिर सज्दे में गिरकर यही दुआ पढ़ो। फिर सज्दे से सिर उठाकर क़िब्ले की तरफ़ रुख़ करके जिस तरह चाहो लेटकर सो जाओ। जब तक नींद ग़ालिब न आ जाए, नबी-ए-करीम पर दुरूद शरीफ़ पढ़ते रहो।”
मैंने कहा: “आपने यह दुआ जिससे सीखी है, मैं चाहता हूँ कि मुझे उसके बारे में बता दीजिए।” हज़रत ख़िज़्र ने कहा: “क्या तुम्हें मुझ पर यक़ीन नहीं?” मैंने कहा: “उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसने मुहम्मद अलैहिस्सलाम को सच्चा नबी बनाकर भेजा, मुझे आप पर यक़ीन है।”
ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: “मैं उस मजलिस में मौजूद था जिसमें रसूलुल्लाह ने यह दुआ सिखाई और इसकी वसीयत फ़रमाई। मैंने यह दुआ उस शख़्स से सीखी जिसे आपने सिखाई थी।” मैंने भी वैसा ही किया जैसा ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने बताया था। अपने बिस्तर पर नबी-ए-करीम पर दुरूद शरीफ़ पढ़ने लगा। नबी-ए-करीम को देखने की ख़ुशी में मेरी नींद उड़ गई और मैं सुबह तक सो न सका।
“हदीस के आलिमों ने एक राय से बताया है कि रसूलुल्लाह जिस तरह ख़्वाब में दिखाई देते हैं, उसी तरह जागते में भी दिखाई दे सकते हैं” इब्राहीम लक़ानी (रहमतुल्लाहि अलैहि)
फ़ज्र की नमाज़ पढ़कर सूरज ऊँचा होने तक बैठा रहा। ज़ुहा, यानी चाश्त की नमाज़ पढ़ी। अपने आपसे कहा: “अगर शाम तक ज़िंदा रहा, तो वैसा ही करूँगा जैसा कल रात किया था।” उसी लम्हे मुझे नींद आ गई। ख़्वाब में फ़रिश्ते आए और मुझे जन्नत में ले गए। वहाँ मैंने याक़ूत, ज़मुर्रद और मोती से बने महल और क़स्र, शहद, दूध और जन्नत के मशरूबात की नहरें देखीं। जो फ़रिश्ते मुझे जन्नत में लाए थे, उनसे मैंने पूछा: “यह महल किसके लिए है?” फ़रिश्तों ने कहा: “उनके लिए जो वह अमल करें जो तुमने किया है।” जब तक मुझे जन्नत के खानों में से खिला न दिया और जन्नत के पानियों में से पिला न दिया, मुझे जन्नत से न निकाला। फिर मुझे जन्नत से निकालकर उस जगह ले आए जहाँ मैं था।
फिर रसूलुल्लाह अपने साथ सत्तर नबियों और फ़रिश्तों की ऐसी सत्तर सफ़ों के साथ, जिनकी हर दो सफ़ों के दरमियान पूरब और पच्छिम जितना फ़ासला था, मेरे पास तशरीफ़ लाए, मुझे सलाम किया और मेरा हाथ पकड़ा। उस वक़्त मैंने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने बताया कि उन्होंने यह हदीस आपसे सुनी है।” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ख़िज़्र ने सच कहा, उन्होंने जो कुछ बयान किया वह हक़ है। ख़िज़्र ज़मीन वालों में सबसे बड़े आलिम हैं। वह अब्दालों के सरदार हैं। वह ज़मीन पर अल्लाह के लश्करों में से हैं।”
मैंने फिर अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! यह अमल करने वाले के लिए जो कुछ मैंने देखा, उसके सिवा भी कोई बदला है?” आपने फ़रमाया: “जो तुमने देखा, जो तुम्हें अता हुआ, उससे बढ़कर और क्या बदला हो सकता है? तुमने जन्नत में अपनी जगह और अपना मक़ाम देख लिया। जन्नत के फलों में से खाया, उसके मशरूबात में से पिया। मेरे साथ फ़रिश्तों और नबियों को देखा। हूरों को देखा।”
मैंने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! जो शख़्स मेरा किया हुआ अमल करे मगर ख़्वाब में वह न देखे जो मैंने देखा, क्या उसे भी वह दिया जाएगा जो मुझे अता हुआ?” आपने फ़रमाया: “उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसने मुझे सच्चा नबी बनाकर भेजा, उस शख़्स के किए हुए बड़े गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं। उस शख़्स पर अल्लाह तआला का ग़ज़ब उठ जाता है। उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसने मुझे सच्चा नबी बनाकर भेजा, यह अमल करने वाला अगर ख़्वाब में वह न भी देखे जो तुमने देखा, तो जो तुम्हें दिया गया, वह उसे भी दिया जाता है। आसमान से एक आवाज़ पुकारती है: ‘अल्लाह तआला ने यह अमल करने वाले को और पूरब से पच्छिम तक की उम्मत-ए-मुहम्मद को बख़्श दिया।’”
मैंने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! जिस तरह मैंने आपका जमाल और जन्नत देखी, क्या उस शख़्स का भी इनमें हिस्सा है?” आपने फ़रमाया: “हाँ, सब कुछ दिया जाता है।”
जब मैंने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! मर्दों और औरतों, तमाम मोमिनों को यह दुआ सिखाना और इसके सवाब बताना क्या मुनासिब होगा?” तो आपने फ़रमाया: “उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसने मुझे सच्चा नबी बनाकर भेजा, यह अमल वही करता है जिसे अल्लाह तआला ने ख़ुशनसीब पैदा किया हो।” जो शख़्स ख़्वाब में हमारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम को आपकी असली सूरत में देखे, उसने यक़ीनन आपको ही देखा, क्योंकि शैतान आपकी सूरत में नहीं आ सकता; लेकिन शैतान किसी और सूरत में आकर दिखाई दे सकता है। जो रसूलुल्लाह को नहीं पहचानता, उसके लिए इसमें फ़र्क़ करना आसान नहीं होता। कुछ आलिमों ने फ़रमाया है: “नबी-ए-करीम को किसी और सूरत में देखना भी आपको ही देखना है। लेकिन यह उस शख़्स के दीन में कमी की निशानी है। जो कोई नबी-ए-करीम को ख़्वाब में आपकी असली सूरत में देखे और मोमिन होकर मरे, वह जन्नत में जाएगा।”
अबू हुरैरा ने नबी-ए-करीम की यह हदीस शरीफ़ बयान की: “अगर कोई शख़्स जुमा की रात दो रकअत नमाज़ पढ़े, हर रकअत में एक-एक बार फ़ातिहा और आयतुल कुर्सी और पंद्रह बार सूरह इख़लास पढ़े, और नमाज़ के बाद हज़ार बार कहे: ‘अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिनिन नबिय्यिल उम्मिय्यि’, तो अगला जुमा आने से पहले मुझे ख़्वाब में देखेगा। उस शख़्स के पिछले और अगले तमाम गुनाह बख़्श दिए जाएँगे। जन्नत उनके लिए है जो मुझे देखते हैं।”
नबी-ए-करीम की क़ब्र शरीफ़ की ज़ियारत
फ़ख़्र-ए-कायनात ने फ़रमाया: “जिसने मेरी वफ़ात के बाद मेरी ज़ियारत की, वह ऐसा है जैसे उसने मेरी ज़िंदगी में मेरी ज़ियारत की।” “Mir’ât-i Medîne” किताब में बयान की गई एक हदीस शरीफ़ में आपने फ़रमाया: “जिसने मेरी क़ब्र की ज़ियारत की, उसके लिए मेरी शफ़ाअत वाजिब हो गई।” इस हदीस शरीफ़ को इब्ने ख़ुज़ैमा, बज़्ज़ार, दारक़ुतनी और तबरानी ने रिवायत किया है। हज़रत बज़्ज़ार की बयान की हुई एक और हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “जिसने मेरी क़ब्र की ज़ियारत की, उसके लिए मेरी शफ़ाअत हलाल हो गई।” “मुस्लिम शरीफ़” में और अबू बकर इब्ने मक्कारी की “मुअजम” किताब में बयान की गई हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “अगर कोई शख़्स मेरी ज़ियारत के लिए आए और उसकी कोई और नीयत न हो, तो क़यामत के दिन वह इसका हक़दार होगा कि मैं उसकी शफ़ाअत करूँ।” यह हदीस शरीफ़ ख़बर देती है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) उन लोगों की शफ़ाअत फ़रमाएँगे जो आपकी ज़ियारत के लिए मदीना मुनव्वरा आते हैं।
ख़बरदार, अदब छोड़ने से! यह ख़ुदा के महबूब की गली है,
यह इलाही नज़र की जगह है, यह मुस्तफ़ा का मक़ाम है!
आसमान का नया चाँद बाबुस सलाम का चाक-सीना आशिक़ है,
इसकी क़िंदील जौज़ा सितारा है, यह नूर और रौशनी के निकलने की जगह है।
यह बुलंद अल्लाह के हबीब की आरामगाह है, फ़ज़ीलत में
यह बुलंद अल्लाह के अर्श से भी बढ़कर है।
इस ख़ाक की रौशनी से अदम का अँधेरा मिट गया,
सारी मौजूदात ने इसे आँखों का सुरमा बनाकर अंधेपन से शिफ़ा पाई।
अदब का ख़याल रखने की शर्त के साथ, ऐ नाबी, इस दरगाह में दाख़िल हो,
यह पाक फ़रिश्तों के तवाफ़ की जगह, नबियों के बोसा देने की जगह है!
Nâbî
दारक़ुतनी की रिवायत की हुई एक और हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “जिसने हज किया और मेरी ज़ियारत न की, उसने मुझे दुख पहुँचाया।” रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का अपनी ज़ियारत चाहना इसलिए है कि आपकी उम्मत इस रास्ते से भी सवाब कमाए। इसीलिए हमारे फ़िक़्ह के आलिम हज का फ़र्ज़ अदा करने के बाद मदीना मुनव्वरा आकर मस्जिद शरीफ़ में नमाज़ पढ़ते थे। फिर रौज़ा-ए-मुतह्हरा, मिम्बर-ए-मुनीर और अर्श-ए-आला से भी अफ़ज़ल क़ब्र शरीफ़ की ज़ियारत करते थे। फिर उन जगहों की ज़ियारत करते थे जहाँ रसूलुल्लाह बैठे, चले और टेक लगाई; उस सुतून की, जिससे वह्य आते वक़्त आप टेक लगाते थे; और उन सहाबा-ए-किराम और ताबिईन के गुज़रने की जगहों की, जिन्होंने मस्जिद की तामीर और मरम्मत में काम किया और अपना माल और पैसा देने का शरफ़ पाया, और उन्हें देखकर बरकत हासिल करते थे। उनके बाद आने वाले आलिम और नेक लोग भी हज के बाद मदीना आते और हमारे फ़िक़्ह के आलिमों की तरह करते थे। जिस तरह कल था, आज भी हाजी इसी पर क़ायम रहकर मदीना मुनव्वरा में ज़ियारतें करते हैं।
“अगर कोई शख़्स मेरी ज़ियारत के लिए आए और उसकी कोई और नीयत न हो, तो क़यामत के दिन वह इसका हक़दार होगा कि मैं उसकी शफ़ाअत करूँ” हदीस शरीफ़
इस्लामी आलिमों के सूरज हज़रत अबू हनीफ़ा ने फ़रमाया: “क़ब्र-ए-सआदत की ज़ियारत, जो मुस्तहब कामों में सबसे बुलंद है, वाजिब के दर्जे के क़रीब एक इबादत है।” रसूलुल्लाह की क़ब्र शरीफ़ की ज़ियारत के लिए जाने वाले को चाहिए कि बहुत दुरूद शरीफ़ पढ़े। हदीस शरीफ़ में बताया गया है कि पढ़े जाने वाले ये दुरूद और सलाम नबी-ए-करीम तक पहुँचते हैं। हमारे प्यारे नबी की ज़ियारत के आदाब यूँ बताए गए:
जब मदीना मुनव्वरा शहर दूर से दिखाई दे, तो दुरूद और सलाम पढ़ा जाता है। फिर यह कहा जाता है: “अल्लाहुम्मा हाज़ा हरमु नबिय्यिका, फ़जअल्हु विक़ायतन ली मिनन नारि व अमानन मिनल अज़ाबि व सूइल हिसाब।” मुमकिन हो तो शहर या मस्जिद में दाख़िल होने से पहले ग़ुस्ल कर लिया जाता है। ख़ुशबू लगाई जाती है। नए, साफ़ कपड़े पहने जाते हैं, क्योंकि ये चीज़ें ताज़ीम और एहतिराम ज़ाहिर करती हैं। मदीना मुनव्वरा में आजिज़ी, वक़ार और सुकून की हालत में दाख़िल हुआ जाता है। “बिस्मिल्लाहि व अला मिल्लति रसूलिल्लाह” कहने के बाद सूरह बनी इस्राईल (इसरा) की 80वीं आयत-ए-करीमा पढ़नी चाहिए। उसके फ़ौरन बाद “अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिंव व अला आलि मुहम्मद। वग़्फ़िर ली ज़ुनूबी वफ़्तह ली अबवाबा रहमतिका व फ़ज़्लिक” कहकर मस्जिद-ए-नबवी में दाख़िल हुआ जाता है। फिर रसूलुल्लाह के मिम्बर के पास इस तरह खड़े होकर कि मिम्बर का सुतून दाएँ कंधे के सामने आए, दो रकअत तहिय्यतुल मस्जिद नमाज़ पढ़नी चाहिए। हमारे प्यारे नबी यहाँ नमाज़ पढ़ा करते थे। यह जगह नबी-ए-करीम की क़ब्र और मिम्बर के दरमियान है। हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया है: “मेरी क़ब्र और मेरे मिम्बर के दरमियान की जगह जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ है। मेरा मिम्बर मेरे हौज़ पर है।”11 फिर इस बात पर अल्लाह तआला के लिए सज्दा करना चाहिए कि उसने रसूलुल्लाह की मुबारक क़ब्र की ज़ियारत नसीब फ़रमाई।
दुआ के बाद उठकर नबी-ए-करीम की क़ब्र शरीफ़, यानी हुजरा-ए-सआदत, के पास आना चाहिए और क़िब्ले की तरफ़ पीठ करके रसूलुल्लाह के मुबारक चेहरे के सामने तक़रीबन दो मीटर दूर अदब से खड़ा होना चाहिए। इससे ज़्यादा क़रीब नहीं जाना चाहिए। ख़ुशू और ख़ुज़ू की हालत में रहना चाहिए, और जिस तरह अल्लाह तआला ने क़ुरआन-ए-करीम में हुक्म दिया है, रसूलुल्लाह के सामने ऐसे अदब से रहना चाहिए जैसे आप ज़िंदा हों और आदमी आपकी बुलंद बारगाह में हाज़िर हो। सुकून और वक़ार को नहीं छोड़ना चाहिए। हाथ क़ब्र शरीफ़ की दीवारों पर रखे बग़ैर दूर अदब से खड़े रहना एहतिराम के ज़्यादा मुताबिक़ है। नमाज़ की तरह खड़ा होना चाहिए। रसूलुल्लाह की मुबारक, लतीफ़ सूरत को तसव्वुर में लाना चाहिए और सोचना चाहिए कि आप उसे जानते हैं, उसकी बात, उसका सलाम और उसकी दुआएँ सुनते हैं, जवाब देते हैं और “आमीन” कहते हैं। चुनाँचे रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “जो मेरी क़ब्र के पास मुझ पर दुरूद पढ़े, मैं उसे सुनता हूँ।” इसी तरह हदीस शरीफ़ में बताया गया कि रसूलुल्लाह की क़ब्र शरीफ़ पर एक फ़रिश्ता मुक़र्रर किया गया है, जो आपकी उम्मत में से सलाम भेजने वालों का सलाम आप तक पहुँचाता है। फिर यह कहना चाहिए: “अस्सलामु अलैका या सय्यिदी या रसूलल्लाह! अस्सलामु अलैका या नबिय्यल्लाह! अस्सलामु अलैका या सफ़िय्यल्लाह! अस्सलामु अलैका या हबीबल्लाह! अस्सलामु अलैका या नबिय्यर रहमति! अस्सलामु अलैका या शफ़ीअल उम्मति! अस्सलामु अलैका या सय्यिदल मुर्सलीन! अस्सलामु अलैका या ख़ातमन नबिय्यीन!”
“अल्लाह तआला आपको सबसे बुलंद अज्र और बदला अता फ़रमाए। मैं गवाही देता हूँ कि आपने नुबुव्वत का फ़र्ज़ अदा किया। अमानत पहुँचा दी। अपनी उम्मत को नसीहत फ़रमाई। जब तक आपके पास यक़ीन (मौत) न आ गया, अल्लाह तआला की राह में जिहाद किया। अल्लाह तआला क़यामत के दिन तक आप पर दुरूद और सलाम भेजे। या रसूलल्लाह! हम आपके पास बहुत दूर की जगहों से आए हैं। आपकी क़ब्र शरीफ़ की ज़ियारत करने, आपका हक़ अदा करने, आपके कामों को उनकी जगह पर देखने, आपकी ज़ियारत से बरकत पाने और यह दरख़्वास्त करने आए हैं कि आप अल्लाह तआला के यहाँ हमारे शफ़ाअत करने वाले बनें, क्योंकि हमारी ख़ताओं ने हमारी कमरें झुका दीं और हमारे गुनाह हमारे कंधों पर भारी हो गए। या रसूलल्लाह! आप शफ़ाअत करने वाले भी हैं और वह भी जिनकी शफ़ाअत क़बूल होती है। मक़ाम-ए-महमूद का आपसे वादा किया गया है। अल्लाह तआला भी क़ुरआन-ए-करीम में (सूरह निसा की 64वीं आयत-ए-करीमा में मफ़हूमन) फ़रमाता है: ’हमने हर नबी को सिर्फ़ इसलिए भेजा कि अल्लाह तआला के हुक्म से (जिस क़ौम की तरफ़ वह भेजे गए, उसकी तरफ़ से) उनकी इताअत की जाए। अगर वे अपनी जानों पर ज़ुल्म (अपना नुक़सान) करने के बाद तुम्हारे पास आकर अल्लाह तआला से माफ़ी माँगते और मेरा रसूल भी उनके लिए इस्तिग़फ़ार करता, तो वे अल्लाह तआला को ज़रूर तौबा क़बूल करने वाला और रहम करने वाला पाते।’ हम आपकी बारगाह में हाज़िर हुए हैं। मगर हमने अपनी जानों पर ज़ुल्म किया। अपने गुनाहों की माफ़ी चाहते हैं। या रसूलल्लाह! अल्लाह तआला के यहाँ हमारी शफ़ाअत फ़रमाइए। या रसूलल्लाह! अल्लाह तआला से दुआ कीजिए कि हमारी रूह आपकी सुन्नत पर क़ब्ज़ करे, कल क़यामत के दिन हमें आपके साथ महशर में आने वालों में शामिल करे और आपके हौज़ पर आकर उससे पीना नसीब फ़रमाए। या रसूलल्लाह! हम आपकी शफ़ाअत चाहते हैं।” इस तरह दुआ करनी चाहिए। फिर सूरह हश्र की 10वीं आयत-ए-करीमा पढ़नी चाहिए, जिसका मफ़हूम है: “… ऐ हमारे रब! हमें और हमारे उन भाइयों को बख़्श दे जो ईमान के साथ हमसे पहले गुज़र चुके हैं! ईमान वालों के लिए हमारे दिलों में कोई कीना न रख! ऐ हमारे रब! बेशक तू बहुत शफ़क़त और रहम वाला है!”
फिर सलाम भेजने वालों का सलाम पहुँचाते हुए यह कहना चाहिए: “अस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह! फ़लाँ शख़्स चाहता है कि आप अल्लाह तआला के यहाँ उसके शफ़ाअत करने वाले बनें। उसकी और तमाम मुसलमानों की शफ़ाअत फ़रमाइए।” और जितना चाहे दुरूद पढ़ना चाहिए।
फिर आधा मीटर दाईं तरफ़ हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ के मुबारक सिर के सामने आकर यूँ दुआ करनी चाहिए: “अस्सलामु अलैका या ख़लीफ़ता रसूलिल्लाह! अस्सलामु अलैका या रफ़ीक़हू फ़िल ग़ार! अस्सलामु अलैका या अमीनहू अलल असरार! अल्लाह तआला आपको, इस उम्मत के इमाम के तौर पर, सबसे बुलंद अज्र और बदला अता फ़रमाए। आप सबसे अच्छे तरीक़े से रसूलुल्लाह के ख़लीफ़ा बने। सबसे बेहतर तरीक़े से रसूलुल्लाह की बुलंद सुन्नत की पैरवी की। मुरतदों (दीन से फिर जाने वालों) और सीधे रास्ते से हट जाने वालों से जंग की। हमेशा हक़ बात कही। वफ़ात तक हक़ की राह पर चलने वालों के मददगार रहे। आप पर अल्लाह तआला का सलाम, उसकी रहमत और बरकत हो! या अल्लाह! अपनी रहमत से हमारी रूह उनकी मुहब्बत पर क़ब्ज़ फ़रमा। उनकी जो ज़ियारत हमने की, उसे बेकार न कर!”
“मेरी क़ब्र और मेरे मिम्बर के दरमियान की जगह जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ है। मेरा मिम्बर मेरे हौज़ पर है” हदीस शरीफ़
फिर दोबारा आधा मीटर दाईं तरफ़ हज़रत उमर की क़ब्र के सामने आकर कहना चाहिए: “अस्सलामु अलैका या अमीरल मोमिनीन! अस्सलामु अलैका या मुज़हिरल इस्लाम! अस्सलामु अलैका या मुकस्सिरल असनाम! अल्लाह तआला आपको सबसे बुलंद बदला और अज्र अता फ़रमाए। आपने ज़िंदगी में भी और वफ़ात पर भी इस्लाम और मुसलमानों की मदद की। यतीमों की किफ़ालत की। रिश्तेदारों के साथ भलाई की। मुसलमानों के लिए ऐसे रहनुमा बने जिनसे वे राज़ी थे, जो ख़ुद भी हिदायत पर थे और लोगों को सीधे रास्ते पर ले जाते थे। उनके कामों को सँवारा और समेटा। उनके फ़क़ीरों को मालदार बनाया, उनके ज़ख़्मों पर मरहम रखा। आप पर अल्लाह तआला का सलाम, उसकी रहमत और बरकत हो!”
फिर हज़रत अबू बकर और हज़रत उमर से मुख़ातिब होकर कहना चाहिए: “अस्सलामु अलैकुमा या ज़जीअय रसूलिल्लाहि व रफ़ीक़ैहि व वज़ीरैहि व मुशीरैहि वल मुआविनैनि लहू अलल क़ियामि फ़िद दीनि वल क़ाइमैनि बादहू बि मसालिहिल मुस्लिमीन! अल्लाह तआला आप दोनों को सबसे अच्छा बदला अता फ़रमाए। हम रसूलुल्लाह के हुज़ूर आप दोनों को वसीला बनाते हैं, ताकि आप अल्लाह तआला से दुआ करें कि रसूलुल्लाह हमारी शफ़ाअत फ़रमाएँ, अल्लाह हमारी कोशिश क़बूल करे, हमें दीन-ए-इस्लाम पर मौत दे और फिर दीन-ए-इस्लाम पर ही ज़िंदा करे, और क़यामत के दिन हमें रसूलुल्लाह के क़रीबी लोगों में उठाए।”
फिर अपने लिए, अपने माँ-बाप के लिए, दुआ की दरख़्वास्त करने वालों के लिए और तमाम मुसलमानों के लिए दुआ करनी चाहिए। इसके बाद रसूलुल्लाह के मुबारक चेहरे के सामने खड़े होकर यह दुआ करे: “या अल्लाह! तू (मफ़हूमन) फ़रमाता है: ’हमने हर नबी को सिर्फ़ इसलिए भेजा कि अल्लाह तआला के हुक्म से (जिस क़ौम की तरफ़ वह भेजे गए, उसकी तरफ़ से) उनकी इताअत की जाए। अगर वे अपनी जानों पर ज़ुल्म (अपना नुक़सान) करने के बाद तुम्हारे पास आकर अल्लाह तआला से माफ़ी माँगते और मेरा रसूल भी उनके लिए इस्तिग़फ़ार करता, तो वे अल्लाह तआला को ज़रूर तौबा क़बूल करने वाला और रहम करने वाला पाते।’12 या रब! तेरे बुलंद कलाम की पैरवी करते हुए, तेरे हुक्म की इताअत करते हुए हम चाहते हैं कि तेरे प्यारे नबी तेरे हुज़ूर हमारी शफ़ाअत करें।” इस दुआ के बाद पहले पढ़ी हुई दुआ, यानी सूरह हश्र की 10वीं आयत-ए-करीमा (मफ़हूमन) पढ़े:
“… ऐ हमारे रब! हमें और हमारे उन भाइयों को बख़्श दे जो ईमान के साथ हमसे पहले गुज़र चुके हैं! ईमान वालों के लिए हमारे दिलों में कोई कीना न रख! ऐ हमारे रब! बेशक तू बहुत शफ़क़त और रहम वाला है!” फिर “रब्बनग़्फ़िर लना व लि आबाइना व लि उम्महातिना व लि इख़्वानिनल लज़ीना सबक़ूना बिल ईमान”, “रब्बना आतिना…” और “सुब्हाना रब्बिका…” आयात-ए-करीमा पढ़कर हुजरा-ए-सआदत की ज़ियारत पूरी करे। फिर रसूलुल्लाह की क़ब्र और मिम्बर के दरमियान वाले रौज़ा-ए-मुतह्हरा में आए। यह एक चौकोर जगह है। यहाँ जितनी चाहे नमाज़ पढ़े, दुआ करे, तस्बीहें पढ़े और अल्लाह तआला की हम्द-ओ-सना करे। फिर मिम्बर के पास आए। इस नीयत से कि रसूलुल्लाह की बरकत उस तक पहुँचे, अपना हाथ उस जगह रखे जहाँ नबी-ए-करीम ख़ुत्बा पढ़ते वक़्त अपना मुबारक हाथ रखते थे। यहाँ दो रकअत नमाज़ पढ़े। अल्लाह तआला से जो चाहे, माँगे। अल्लाह तआला के ग़ज़ब से उसकी रहमत की पनाह माँगे। फिर उस सुतून के पास आए जो पहले हन्नाना सुतून की जगह पर लगाया गया है। हन्नाना वह सुतून है कि जब रसूलुल्लाह उसे छोड़कर ख़ुत्बे के लिए मिम्बर पर तशरीफ़ ले गए, तो वह रोने लगा, और जब आपने उतरकर उसे गले लगाया, तो चुप हो गया। फिर उस सुतून के पास आए जिससे हज़रत अबू लुबाबा ने अपने आपको बाँधकर तौबा की थी। यहाँ दो रकअत नमाज़ पढ़े और अल्लाह तआला से तौबा और इस्तिग़फ़ार करे। जो दुआएँ चाहे, करे।
यहाँ ठहरने के दौरान रातें क़ुरआन-ए-करीम पढ़ने, अल्लाह तआला का ज़िक्र करने, मिम्बर और क़ब्र के पास छुपकर और खुलकर दुआ करने और राबिता करने में गुज़ारनी चाहिए। रसूलुल्लाह की ज़ियारत के बाद बक़ी क़ब्रिस्तान जाकर उसकी भी ज़ियारत करना मुस्तहब है। फिर दूसरी क़ब्रों की, ख़ास तौर पर सय्यिदुश शुहदा (शहीदों के सरदार) हज़रत हमज़ा की क़ब्र की ज़ियारत करनी चाहिए। इसी तरह बक़ी में हज़रत अब्बास की, और वहाँ दफ़न हसन इब्ने अली, ज़ैनुल आबिदीन, उनके बेटे मुहम्मद बाक़िर और उनके बेटे जाफ़र सादिक़ की, अमीरुल मोमिनीन हज़रत उस्मान की, रसूलुल्लाह के बेटे इब्राहीम की, रसूलुल्लाह की वहाँ दफ़न पाक बीवियों की, आपकी फूफी सफ़िय्या की और सहाबा और ताबिईन में से और बहुत से बुज़ुर्गों (रज़ियल्लाहु अन्हुम अजमईन) की ज़ियारत करनी चाहिए। बक़ी की मस्जिद-ए-फ़ातिमा में नमाज़ पढ़नी चाहिए। जुमेरात के दिन उहुद के शहीदों की ज़ियारत करना मुस्तहब है। वहाँ यह कहना चाहिए: “सलामुन अलैकुम बिमा सबरतुम, फ़निअमा उक़्बद दार। सलामुन अलैकुम या अहला दारिल क़ौमिल मोमिनीन, व इन्ना इंशाअल्लाहु अन क़रीबिन बिकुम लाहिक़ून।” फिर आयतुल कुर्सी और सूरह इख़लास पढ़नी चाहिए। हुजरा-ए-सआदत की ज़ियारत करने वालों को बहुत चौकन्ना रहना चाहिए। उनके दिल में दुनिया के ख़याल नहीं होने चाहिए। मुहम्मद अलैहिस्सलाम के मुबारक नूर और आपके दर्जे की बुलंदी के बारे में सोचना चाहिए। दुनिया के कामों, बड़े लोगों से मिलकर फ़ायदा उठाने और कारोबार के ख़यालों के साथ की गई दुआओं को अल्लाह तआला क़बूल नहीं करता, और ऐसे लोग अपनी मुरादों तक नहीं पहुँचते। हुजरा-ए-सआदत की ज़ियारत करना इज़्ज़त वाली इबादत है। जो इस पर यक़ीन न रखें, उनके इस्लाम से निकल जाने का डर है, क्योंकि वे अल्लाह तआला, उसके रसूल और तमाम मुसलमानों के ख़िलाफ़ गए होते हैं। मालिकी आलिमों में से कुछ ने अगरचे रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ज़ियारत को वाजिब कहा है, लेकिन एक राय से बताया गया है कि यह मुस्तहब है।
“ऐ हमारे रब! हमें और हमारे उन भाइयों को बख़्श दे जो ईमान के साथ हमसे पहले गुज़र चुके हैं! ईमान वालों के लिए हमारे दिलों में कोई कीना न रख! ऐ हमारे रब! बेशक तू बहुत शफ़क़त और रहम वाला है!” हश्र: 10
अस्सुब्हु बदा
अस्सुब्हु बदा मिन तलअतिही।
वल्लैलु दजा मिन वफ़रतिही।
फ़ाक़र रुसुला फ़ज़्लन व उला।
अहदस सुबुला लि दलालतिही।
सुबह ने अपनी रौशनी आपके चेहरे से ली।
और रात ने अपना अँधेरा आपकी काली ज़ुल्फ़ों से लिया।
आप अपनी फ़ज़ीलत और बुलंदी से तमाम रसूलों से बढ़कर हुए।
हिदायत पाने वालों ने अपनी राह आपकी रहनुमाई से पाई।
कन्ज़ुल करमि मौलन निअमि।
हादिल उममि लि शरीअतिही।
अज़कन नसबि आलल हसबि।
कुल्लुल अरबि फ़ी ख़िदमतिही।
आप सख़ावत का ख़ज़ाना थे, उसी ख़ज़ाने से अता करने वाले थे।
आपने क़ौमों को अपने दीन और अपनी हिदायत तक पहुँचाया।
आपकी नस्ल बहुत पाक, आपका शरफ़ बहुत बुलंद है।
सारे अरब आपकी ख़िदमत में हैं।
सअतिश शजरु नतक़ल हजरु।
शुक़्क़ल क़मरु बि इशारतिही।
जिबरीलु अता लैलता असरा।
वर रब्बु दआ लि हज़रतिही।
पेड़ आपके हुज़ूर दौड़कर आए, पत्थर बोल उठे।
आपके (मोजिज़े वाले) इशारे से चाँद दो टुकड़े हुआ।
इसरा की रात जिबराईल (अलैहिस्सलाम) आपके पास आए।
और आपके रब ने आपको अपने हुज़ूर बुलाया।
नालश शरफ़ा वल्लाहु अफ़ा।
अम्मा सलफ़ा मिन उम्मतिही।
फ़ मुहम्मदुना हुवा सय्यिदुना।
फ़ल इज़्ज़ु लना बि इजाबतिही।
आप बड़े-बड़े मर्तबों पर फ़ाइज़ हुए।
अल्लाह (जल्ल जलालुहू) ने भी आपकी उम्मत को माफ़ कर दिया।
हमारे मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम), वही हमारे सरदार हैं।
आपको क़बूल करने की वजह से इज़्ज़त हमारी है।
अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा (रज़ियल्लाहु अन्हु)
