मेरे प्यारे नबी

नबी-ए-करीम से तवस्सुल

नबी-ए-करीम से हर ज़माने में – आपके पैदा होने से पहले, पैदा होने के बाद, दुनिया की ज़िंदगी में और वफ़ात के बाद बरज़ख़ (क़ब्र) के आलम में – तवस्सुल1 किया गया है; क़यामत के दिन ज़िंदा होने के बाद अरसात के मैदान में और जन्नत में भी किया जाएगा। वसीला हर वह चीज़ है जिसे अल्लाह तआला ने अपने यहाँ क़ुर्ब और हाजतें पूरी होने का सबब बनाया है। रसूल-ए-अकरम से तवस्सुल, यानी रसूलुल्लाह को अल्लाह तआला के यहाँ वसीला बनाना, आपकी मदद और शफ़ाअत माँगना जाइज़ है। ये सलफ़-ए-सालिहीन (सहाबा, ताबिईन और तबा ताबिईन), उलेमा और दूसरे मुसलमानों के किए हुए कामों में से हैं। मुसलमानों में से किसी ने इसे बुरा नहीं समझा। आज तक बिगड़े हुए अक़ीदे वालों के सिवा कोई ऐसा नहीं मिला जो इन्हें न माने। इंसानों के बाप आदम अलैहिस्सलाम जब ज़मीन पर उतारे गए, तो उन्होंने नबी-ए-करीम को वसीला बनाया। हमारे प्यारे नबी ने एक हदीस शरीफ़ में इसे यूँ बयान फ़रमाया: “आदम (अलैहिस्सलाम) जब अपनी लग़्ज़िश की वजह से जन्नत से निकाले गए, तो उन्होंने कहा: ‘या रब! मुहम्मद के सदक़े मुझे माफ़ कर दे।’ अल्लाह तआला ने फ़रमाया: ‘ऐ आदम! तुमने मुहम्मद को कैसे जाना? मैंने तो अभी उन्हें पैदा भी नहीं किया?’ आदम (अलैहिस्सलाम) ने कहा: ‘या रब! जब तूने मुझे पैदा करके मुझमें रूह डाली, तो मैंने आँख खोलकर देखा कि अर्श के किनारे पर “ला इलाह इल्लल्लाह, मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” लिखा है। जिनका नाम तूने अपने नाम के साथ पसंद किया, वह वही हैं।’ अल्लाह तआला ने फ़रमाया: ‘तुमने सच कहा, ऐ आदम! अपनी मख़लूक़ात में मुझे सबसे ज़्यादा प्यारे वही हैं। चूँकि तुमने उनके सदक़े माफ़ी माँगी, इसलिए मैंने तुम्हें माफ़ कर दिया।’”2 एक रिवायत में अल्लाह तआला ने फ़रमाया: “वह तुम्हारी नस्ल से आने वाले एक नबी हैं। अगर मैं उन्हें पैदा न करता, तो न तुम्हें पैदा करता, न तुम्हारी औलाद को। चूँकि तुमने उन्हें शफ़ाअत करने वाला बनाया, इसलिए मैंने तुम्हें माफ़ कर दिया, बख़्श दिया।”3

इससे मुताल्लिक़ हज़ारों मिसालें हैं। उनमें से कुछ नीचे दी जा रही हैं। दोनों आँखों से अंधे एक शख़्स ने अपनी आँखें खुल जाने के लिए रसूलुल्लाह से दुआ की दरख़्वास्त की। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “अगर चाहो, तो दुआ करता हूँ। लेकिन अगर सब्र करके बर्दाश्त करो, तो तुम्हारे लिए बेहतर होगा।” उन्होंने कहा: “सब्र करने की ताक़त नहीं रही। आपसे गिड़गिड़ाकर दुआ की दरख़्वास्त करता हूँ।” इस पर नबी-ए-करीम ने उनसे फ़रमाया: “तो फिर वुज़ू करके यह दुआ पढ़ो!”

“अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका व अतवज्जहु इलैका बि नबिय्यिका मुहम्मदिन नबिय्यिर रहमा। या मुहम्मद! इन्नी अतवज्जहु बिका इला रब्बी फ़ी हाजती हाज़िही, लि तुक़ज़ा ली। अल्लाहुम्मा शफ़्फ़िअहु फ़िय्या।”

हदीस के आलिमों में से इमाम नसाई बताते हैं कि जब उस शख़्स ने यह दुआ पढ़ी, तो अल्लाह तआला ने क़बूल फ़रमाई और उनकी आँखें खुल गईं। रसूलुल्लाह को वसीला बनाने से मुताल्लिक़ हज़रत उस्मान इब्ने हुनैफ़ यह वाक़िआ बयान करते हैं: “उस्मान इब्ने अफ़्फ़ान जब ख़लीफ़ा थे, तो एक शख़्स ने, जो बड़ी मुसीबत में था, ख़लीफ़ा के सामने जाने से शर्माने की वजह से मुझसे अपना दुखड़ा रोया। मैंने उससे कहा: ‘फ़ौरन वुज़ू करो! मस्जिद-ए-सआदत जाओ! ऊपर बताई गई दुआ करो और अपनी हाजत बयान करो।’ उस बेचारे ने दुआ करने के बाद ख़लीफ़ा की जगह जाकर हाज़िरी दी, तो उसे ख़लीफ़ा के हुज़ूर पेश किया गया। ख़लीफ़ा ने उसे अपने मुसल्ले पर बिठाया, उसका दुखड़ा सुना और उसकी हाजत पूरी कर दी। वह बेचारा अपना काम अचानक बनते देखकर ख़ुशी-ख़ुशी मेरे पास आया और कहा: ‘अल्लाह तआला आपसे राज़ी हो! अगर आप ख़लीफ़ा से न कहते, तो मैं इस मुसीबत से न छूट पाता।’ वह समझा कि मैंने ख़लीफ़ा से बात की है।”

“(ऐ आदम!) वह तुम्हारी नस्ल से आने वाले एक नबी हैं। अगर मैं उन्हें पैदा न करता, तो न तुम्हें पैदा करता, न तुम्हारी औलाद को। चूँकि तुमने उन्हें शफ़ाअत करने वाला बनाया, इसलिए मैंने तुम्हें माफ़ कर दिया, बख़्श दिया” हदीस-ए-क़ुदसी

हज़रत उमर जब ख़लीफ़ा थे, तो एक बार क़हत पड़ा। सहाबा-ए-किराम में से बिलाल इब्ने हारिस ने रसूलुल्लाह के रौज़े पर जाकर अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! आपकी उम्मत भूख से मरने को है। बारिश बरसने के लिए आपसे वसीला बनने की गिड़गिड़ाकर दरख़्वास्त करता हूँ।” रसूलुल्लाह उसी रात उनके ख़्वाब में तशरीफ़ लाए और फ़रमाया: “ख़लीफ़ा के पास जाओ! मेरी तरफ़ से सलाम कहो! बारिश की दुआ के लिए निकलें!” हज़रत उमर बारिश की दुआ के लिए निकले, तो बारिश होने लगी। अल्लाह तआला अपने प्यारों की ख़ातिर दुआएँ क़बूल फ़रमाता है। अल्लाह तआला ने बताया है कि वह मुहम्मद अलैहिस्सलाम से बहुत मुहब्बत करता है। इसलिए अगर कोई शख़्स “अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका बि जाहि नबिय्यिकल मुस्तफ़ा” कहकर दुआ करे, तो उसकी दुआ रद्द नहीं होती। इसके साथ ही छोटे-मोटे दुनियावी कामों के लिए रसूलुल्लाह को वसीला बनाना अदब के मुताबिक़ नहीं है। बुरहानुद्दीन इब्राहीम मालिकी ने फ़रमाया: “एक बहुत भूखा फ़क़ीर हुजरा-ए-सआदत पर गया और कहा: ‘या रसूलल्लाह! मैं भूखा हूँ।’ थोड़ी देर बाद कोई आया और फ़क़ीर को अपने घर ले जाकर पेट भरकर खिलाया। जब फ़क़ीर ने बताया कि उसकी दुआ क़बूल हो गई, तो उस शख़्स ने कहा: ‘भाई! तुम अपने बाल-बच्चों से जुदा होकर, दूर-दराज़ के रास्तों में तकलीफ़ें उठाकर रसूलुल्लाह की ज़ियारत के लिए आए हो। एक लुक़्मा रोटी के लिए रसूलुल्लाह के हुज़ूर पेश होना क्या मुनासिब है? उस बुलंद बारगाह में तो जन्नत और हमेशा की नेमतें माँगनी चाहिए थीं! यहाँ जो चीज़ें माँगी जाती हैं, अल्लाह तआला उन्हें रद्द नहीं करता।’ रसूलुल्लाह की ज़ियारत का शरफ़ पाने वालों को चाहिए कि क़यामत के दिन आपकी शफ़ाअत के लिए दुआ करें।” एक दिन इमाम अबू बकर मुक़री, इमाम तबरानी और अबुश शैख़ के साथ मस्जिद-ए-सआदत में बैठे थे। कई दिन से कुछ न खाने की वजह से वे बहुत भूखे थे। आख़िर इमाम अबू बकर बर्दाश्त न कर सके और अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! मैं भूखा हूँ!” फिर एक कोने में जा बैठे। सैयदों में से एक बुज़ुर्ग अपने दो ख़ादिमों के साथ आए और कहा: “भाइयो! तुमने मेरे नाना रसूलुल्लाह से भूख की वजह से मदद माँगी है। उन्होंने मुझे हुक्म फ़रमाया है कि तुम्हें खाना खिलाऊँ।” जो कुछ वह लाए थे, सबने मिलकर खाया। बचा हुआ वह उनके लिए छोड़कर चले गए। इस्लामी आलिमों में से अबू अब्दुल्लाह इब्ने नोमान मर्राकुशी तिलिमसानी (683 / 1284 ईसवी) अपनी क़ीमती किताब “मिस्बाहुज़ ज़लाम” में उन सैकड़ों मुसलमानों और उनकी दुआओं का तफ़सील से ज़िक्र करते हैं जो रसूलुल्लाह को वसीला बनाकर अपनी मुरादों तक पहुँचे। रसूलुल्लाह को वसीला बनाकर अपनी मुरादों तक पहुँचने वालों में से एक मुहम्मद इब्ने मुनकदिर हैं। वह बयान करते हैं: “एक आदमी मेरे वालिद के पास अस्सी सोने के सिक्के छोड़कर जिहाद पर गया था। उसने कहा था: ‘इन्हें सँभालकर रखिए! किसी बहुत ज़रूरतमंद की मदद भी कर सकते हैं।’ मदीना में क़हत पड़ा। मेरे वालिद ने सारे सिक्के भूख से बेहाल लोगों में बाँट दिए। सिक्कों का मालिक आया और उन्हें माँगा। मेरे वालिद ने कहा: ‘एक रात बाद आना।’ वह हुजरा-ए-सआदत पर गए और सुबह तक रसूलुल्लाह से फ़रियाद करते रहे। आधी रात को एक आदमी आया और कहा: ‘हाथ बढ़ाओ!’ उसने सोने के सिक्कों की एक थैली दी और फिर ग़ायब हो गया। मेरे वालिद ने घर में सिक्के गिने और देखा कि वे अस्सी हैं, तो ख़ुश होकर फ़ौरन उनके मालिक को दे दिए।”

हज़रत अबू अब्दुल्लाह तिलिमसानी इस किताब में अपने साथ पेश आया एक वाक़िआ भी यूँ बयान करते हैं:

“637 (1239 ईसवी) में हम सदर के क़िले से चुने हुए लोगों के एक क़ाफ़िले के साथ निकले। हमारे साथ एक शख़्स था जो हमें रास्ता दिखाता था। कुछ दूर जाने के बाद हमारा पानी ख़त्म हो गया। हम पानी तलाश करने लगे। मैं भी इस दौरान हाजत के लिए चला गया। उसी वक़्त मुझ पर ज़बरदस्त नींद ग़ालिब आई। ‘चलते वक़्त मुझे जगा ही देंगे’ – यह सोचकर मैंने सिर ज़मीन पर रख दिया।

जागा, तो अपने आपको रेगिस्तान के बीच बिल्कुल अकेला पाया। मेरे साथी मुझे भूलकर चले गए थे। अकेलेपन से मुझ पर बड़ा डर छा गया। रेगिस्तान में दाएँ-बाएँ चलने लगा। न जानता था कि कहाँ हूँ, न यह कि कहाँ जाना है। हर तरफ़ हमवार रेत थी। थोड़ी देर में अँधेरा हो गया। जिस क़ाफ़िले के साथ हम सफ़र कर रहे थे, उसका निशान तक न था। मैं रात के अँधेरे में बिल्कुल अकेला था। मेरा डर और बढ़ गया। घबराकर और तेज़ चलने लगा। कुछ दूर जाने के बाद बहुत प्यासा, थका-माँदा और निढाल होकर ज़मीन पर गिर पड़ा। अब मैं ज़िंदगी से मायूस हो चुका था, मौत को क़रीब आते महसूस करने लगा था। बयान से बाहर तकलीफ़ में था, मेरा दर्द और ग़म आख़िरी हद को पहुँच चुका था। अचानक मेरे ज़ेहन में एक बात आई। रात के अँधेरे में अपनी सारी ताक़त जमा करके, सच्चे दिल से, इख़लास के साथ आख़िरी बार कराहते हुए पुकारा: ‘या रसूलल्लाह! मदद! मैं आपसे अल्लाह तआला की इजाज़त से मदद की दरख़्वास्त करता हूँ!’ मेरी बात ख़त्म होते ही मैंने सुना कि कोई मुझे पुकार रहा है। आवाज़ की तरफ़ देखा, तो रात के अँधेरे में चारों तरफ़ रौशनी बिखेरने वाले, बिल्कुल सफ़ेद कपड़े पहने एक ऐसे बुज़ुर्ग मुझे बुला रहे थे जिन्हें मैंने उस वक़्त तक कभी नहीं देखा था। उन्होंने मेरे क़रीब आकर मेरा हाथ पकड़ा। उसी लम्हे मेरी सारी थकान और प्यास जाती रही। मैं ऐसा हो गया जैसे नए सिरे से पैदा हुआ हूँ। मेरा दिल अचानक उनकी तरफ़ खिंच गया। हम इसी तरह हाथ थामे कुछ दूर चले। मैंने महसूस किया कि मैं अपनी ज़िंदगी के सबसे मीठे लम्हों में से एक गुज़ार रहा हूँ। रेत का एक टीला पार किया, तो जिस क़ाफ़िले के साथ सफ़र कर रहा था, उसकी रौशनियाँ दिखाई दीं और अपने साथियों की आवाज़ें सुनाई दीं। हम उनकी तरफ़ बढ़े। जिस जानवर पर मैं सवार था, वह क़ाफ़िले के सबसे पीछे चल रहा था। अचानक वह आकर मेरे सामने रुक गया। अपनी सवारी को सामने देखकर मैं ख़ुशी से चीख़ उठा। मेरे चीख़ते ही मेरे साथ आने वाले बुज़ुर्ग ने अपना हाथ मेरे हाथ से खींच लिया। फिर मेरा हाथ पकड़कर मुझे मेरी सवारी पर बिठाया। फिर फ़रमाया: ‘जो हमसे कुछ माँगे और मदद चाहे, हम उसे ख़ाली हाथ नहीं लौटाते।’ और वापस मुड़ गए। उस वक़्त मैं समझा कि वह रसूलुल्लाह थे। जब आप वापस जा रहे थे, तो आपके चारों तरफ़ बिखरी रौशनियाँ रात के अँधेरे में आसमान की तरफ़ उठती दिखाई दे रही थीं। जब आप मेरी नज़रों से ओझल हो गए, तो अचानक मेरे होश ठिकाने आए। मैं तड़प उठा: ‘यह कैसे हुआ कि मैंने रसूलुल्लाह के हाथ-पाँव नहीं चूमे!’ लेकिन वक़्त निकल चुका था, मौक़ा हाथ से जा चुका था।” अबुल ख़ैर अक़ता मदीना में पाँच दिन भूखे रहे। हुजरा-ए-सआदत के पास आकर रसूलुल्लाह को सलाम किया, बताया कि भूखे हैं और एक तरफ़ जाकर सो गए। ख़्वाब में देखा कि रसूलुल्लाह तशरीफ़ ला रहे हैं। आपके दाईं तरफ़ अबू बकर सिद्दीक़, बाईं तरफ़ उमरुल फ़ारूक़ और आगे अलियुल मुर्तज़ा थे।

हज़रत अली ने आकर कहा: “ऐ अबुल ख़ैर! उठो, क्यों लेटे हो? रसूलुल्लाह तशरीफ़ ला रहे हैं!” वह फ़ौरन उठ गए। रसूलुल्लाह ने आकर उन्हें एक बड़ी रोटी दी। अबुल ख़ैर कहते हैं: “बहुत भूखा होने की वजह से मैं फ़ौरन खाने लगा। आधी ख़त्म हुई, तो जाग गया। बची हुई आधी अपने हाथ में पाई।”

“जिसे किसी चीज़ से नुक़सान पहुँचे, वह बेऐब वुज़ू करके दो रकअत नमाज़ पढ़े! फिर यह कहे: ‘या रब! तुझसे माँगता हूँ। सारे जहानों के लिए रहमत तेरे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम को वसीला बनाकर तुझसे फ़रियाद करता हूँ। ऐ मुहम्मद! अपनी मुराद क़बूल होने के लिए अपने रब के हुज़ूर आपको वसीला बनाता हूँ। या रब! इन्हें मेरा शफ़ाअत करने वाला बना!’” हदीस शरीफ़

इसी तरह “मिस्बाहुज़ ज़लाम” किताब में बयान किया गया है: अहमद इब्ने मुहम्मद सूफ़ी कहते हैं: “हिजाज़ के रेगिस्तानों में मेरा सब कुछ ख़त्म हो गया। मैं मदीना आया। हुजरा-ए-सआदत के पास रसूलुल्लाह को सलाम किया। एक तरफ़ बैठकर सो गया। रसूलुल्लाह ज़ाहिर हुए और फ़रमाया: ‘आ गए, अहमद? अपनी हथेली खोलो!’ आपने मेरी हथेली सोने से भर दी। मैं जागा, तो मेरे हाथ सोने से भरे थे।” इमाम समहूदी भी “मदीना की तारीख़” नाम की अपनी किताब में अपने साथ पेश आया एक वाक़िआ यूँ बयान करते हैं: “मेरे दरवाज़े की चाबी गिरकर खो गई। मैं उसे ढूँढ न सका। हुजरा-ए-सआदत के सामने आकर अर्ज़ किया: ‘या रसूलल्लाह! मेरी चाबी खो गई है, मैं अपने घर में दाख़िल नहीं हो सकता!’ उसी वक़्त एक बच्चा आया। अपने हाथ में चाबी दिखाते हुए बोला: ‘यह मुझे मिली है। क्या यह आपकी है?’”

किलिस के मुस्तफ़ा इश्क़ी एफ़ेंदी “Mevârid-i Mecîdiyye” नाम की तारीख़ की किताब में कहते हैं: “मैं मक्का में बीस साल रहा। हिजरी 1247 (1831 ईसवी) में साठ सोने के सिक्के जमा करके बीवी-बच्चों के साथ मदीना आया। रास्ते में पैसे ख़त्म हो गए। एक जानने वाले के यहाँ मेहमान होकर मैं हुजरा-ए-सआदत पर आया। रसूलुल्लाह से मदद माँगी। तीन दिन बाद जिस घर में हम ठहरे थे, वहाँ एक साहब आए और बताया कि उन्होंने मेरे लिए एक घर किराए पर ले लिया है। मेरा सामान वहाँ पहुँचवाया। एक साल का किराया अदा किया। कुछ महीनों बाद मैं बीमार होकर एक महीना पड़ा रहा। घर में न खाने को कुछ रहा, न बेचने को। बीवी की मदद से छत पर चढ़कर, रसूलुल्लाह के रौज़े की तरफ़ मुँह करके, अपनी तंगी बयान करके मदद माँगनी चाही। हाथ उठाए, तो दुनिया की चीज़ माँगने से शर्म आई। कुछ न कह सका। अपने कमरे में उतर आया। अगले दिन एक शख़्स आया और कहा कि फ़लाँ एफ़ेंदी ने ये सोने के सिक्के तुम्हें तोहफ़े में भेजे हैं। मैंने थैली ले ली। हमारा गुज़ारा तो ठीक हो गया, लेकिन बीमारी से छुटकारा न मिला। किसी के सहारे हुजरा-ए-सआदत के सामने आकर रसूलुल्लाह से शिफ़ा माँगी। मस्जिद से निकलकर किसी से मदद लिए बग़ैर अपने घर की तरफ़ चल पड़ा। घर में दाख़िल होते वक़्त बीमारी का नाम-ओ-निशान न रहा था। नज़र न लगे, इसलिए कुछ दिन लाठी टेककर गली में निकलता रहा। लेकिन पैसे ख़त्म हो चुके थे। बाल-बच्चों को अँधेरे में छोड़कर मस्जिद-ए-नबवी में आया। इशा की नमाज़ के बाद अपनी तंगी रसूलुल्लाह से अर्ज़ की। रास्ते में एक अनजान शख़्स मेरे पास आया और मेरे हाथ में एक थैली थमा दी। उसमें उनचास सोने के सिक्के थे, जिनमें से हर एक नौ क़ुरुश का था। मोमबत्ती और ज़रूरी चीज़ें ख़रीदकर घर आया।”

“Şakâyık-i Nu’mâniyye” किताब के तर्जुमे की दूसरी जिल्द में लिखा है कि उस्मानी सल्तनत के पहले शैख़ुल इस्लाम और अपने ज़माने के मुजद्दिद, बड़े इस्लामी आलिम मौलाना शम्सुद्दीन मुहम्मद इब्ने हमज़ा फ़नारी की आँखों पर पर्दा आ गया और वह देखने से माज़ूर हो गए। एक रात रसूलुल्लाह ने ख़्वाब में उनसे फ़रमाया: “सूरह ताहा की तफ़सीर करो!” तो उन्होंने अर्ज़ किया: “आपकी बुलंद बारगाह में क़ुरआन-ए-करीम की तफ़सीर करने की मुझमें ताक़त नहीं, और मेरी आँखें भी नहीं देखतीं।” नबियों के तबीब रसूलुल्लाह ने अपने मुबारक ख़िरक़े से रुई का एक टुकड़ा निकाला, उसे अपने मुबारक लुआब से भिगोया और उनकी आँखों पर रख दिया। मुल्ला फ़नारी जागे, तो रुई को अपनी आँखों पर पाया, और जब उसे उठाया, तो देखने लगे। उन्होंने अल्लाह तआला की हम्द की और शुक्र अदा किया। रुई के धागों को सँभालकर रखा और वसीयत की कि उनकी वफ़ात हो, तो ये उनकी आँखों पर रखे जाएँ। 834 (1431 ईसवी) में बुरसा में उनकी वफ़ात हुई, तो उनकी वसीयत पूरी की गई।

अब्बासी ख़लीफ़ाओं में से अबू जाफ़र मंसूर मस्जिद-ए-नबवी के अंदर इमाम मालिक से बात कर रहे थे। इमाम मालिक ने कहा: “ऐ मंसूर! यह मस्जिद-ए-सआदत है! धीमी आवाज़ में बात करो! हक़ तआला ने सूरह हुजुरात में मफ़हूमन ‘अपनी आवाज़ें रसूलुल्लाह की आवाज़ से ऊँची न करो!’4 फ़रमाकर कुछ लोगों को डाँटा है, और ‘जो लोग रसूलुल्लाह के पास अपनी आवाज़ें धीमी रखते हैं…’5 वाली आयत-ए-करीमा से धीमी आवाज़ में बात करने वालों की तारीफ़ फ़रमाई है। रसूलुल्लाह की वफ़ात के बाद आपकी ताज़ीम करना ऐसा ही है जैसे आपकी ज़िंदगी में ताज़ीम करना।” मंसूर ने सिर झुकाकर पूछा: “ऐ अबू अब्दुल्लाह! क़िब्ले की तरफ़ मुँह करके खड़ा होना चाहिए या क़ब्र-ए-सआदत की तरफ़?” हज़रत इमाम मालिक ने फ़रमाया: “रसूलुल्लाह से अपना मुँह न फेरो! शफ़ाअत करने वाले वह बुलंद नबी (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) क़यामत के दिन तुम्हारी और तुम्हारे बाप आदम अलैहिस्सलाम की नजात का वसीला होंगे। तुम्हें क़ब्र-ए-सआदत की तरफ़ मुँह करके और रसूलुल्लाह की मुबारक रूह का दामन थामकर शफ़ाअत माँगनी चाहिए। सूरह निसा की 64वीं आयत-ए-करीमा में मफ़हूमन यूँ फ़रमाया गया है:

’जो लोग अपनी जानों पर ज़ुल्म करें (अपना नुक़सान करें), अगर वे तुम्हारे पास आकर अल्लाह तआला से माफ़ी माँगें और मेरा रसूल भी उनके लिए माफ़ी माँगे, तो वे अल्लाह तआला को तौबा क़बूल करने वाला और रहम करने वाला पाएँगे।’ यह आयत-ए-करीमा वादा करती है कि रसूलुल्लाह को वसीला बनाने वालों की तौबा क़बूल की जाएगी।” इस पर मंसूर अपनी जगह से उठे और हुजरा-ए-सआदत के सामने खड़े होकर यह कहते हुए गिड़गिड़ाने लगे: “या रब! इस आयत-ए-करीमा में तूने वादा किया है कि अपने रसूल को वसीला बनाने वालों की तौबा क़बूल करेगा। मैं भी तेरे बुलंद नबी की बुलंद बारगाह में आकर तुझसे माफ़ी माँगता हूँ। जिस तरह तूने अपने उन बंदों को माफ़ किया जिन्होंने उनकी ज़िंदगी में माफ़ी माँगी, उसी तरह मुझे भी माफ़ कर दे! या रब! नबिय्युर रहमा (रहमत के नबी), तेरे बुलंद नबी को वसीला बनाकर तुझसे फ़रियाद करता हूँ। ऐ नबियों में सबसे बुलंद मुहम्मद अलैहिस्सलाम! आपसे तवस्सुल करके मैंने अपने रब से फ़रियाद की। या रब! उस बुलंद नबी को मेरा शफ़ाअत करने वाला बना दे!” वह पीठ क़िब्ले की तरफ़ और चेहरा मुवाजहा-ए-सआदत की खिड़की की तरफ़ करके खड़े होकर दुआ करते रहे। मिम्बर-ए-नबवी उनकी बाईं तरफ़ रह गया था। इमाम मालिक ने ख़लीफ़ा मंसूर को जो नसीहत की, वह दिखाती है कि हुजरा-ए-सआदत के सामने दुआ करने वालों को बहुत चौकन्ना रहना चाहिए। फ़रमाया गया है कि जो लोग उस मक़ाम के लायक़ अदब और एहतिराम न दिखा सकें, उनका मदीना मुनव्वरा में ज़्यादा ठहरना ठीक नहीं। अनातोलिया के देहातियों में से एक शख़्स मदीना मुनव्वरा में बरसों रहा, वहाँ शादी की और हुजरा-ए-सआदत में एक ख़ास ख़िदमत पर लग गया। एक दिन उसे बुख़ार वाली बीमारी लग गई और उसका जी लस्सी पीने को चाहा। उसके दिल में यह ख़याल गुज़रा: “अगर मैं अपने गाँव में होता, तो दही से लस्सी बनवाकर पीता।” उसी रात रसूलुल्लाह शैख़ुल हरम एफ़ेंदी को ख़्वाब में दिखाई दिए और हुक्म फ़रमाया कि उस शख़्स का काम किसी और को दे दिया जाए। शैख़ुल हरम ने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! वह ख़िदमत आपकी उम्मत में से फ़लाँ शख़्स अंजाम दे रहा है।” तो आपने फ़रमाया: “उस शख़्स से कहो! अपने गाँव जाकर लस्सी पिए!…” अगले दिन जब यह हुक्म पहुँचाया गया, तो देहाती “सिर-आँखों पर!” कहकर अपने वतन चला गया।

“जो लोग अपनी जानों पर ज़ुल्म करें, अगर वे तुम्हारे पास आकर अल्लाह तआला से माफ़ी माँगें और मेरा रसूल भी उनके लिए माफ़ी माँगे, तो वे अल्लाह तआला को तौबा क़बूल करने वाला और रहम करने वाला पाएँगे” निसा: 64

जब दिल से गुज़रा हुआ एक ख़याल ही इतना नुक़सान पहुँचाता है, तो इससे समझना चाहिए कि – अल्लाह बचाए – मज़ाक़ में ही सही, कही गई कोई नामुनासिब बात या अदब के ख़िलाफ़ कोई हरकत कितना बड़ा नुक़सान पहुँचाएगी।

आपसे मुहब्बत करने वाले मोमिन के दिल का ईमान हैं आप,
उसे कोई ग़म नहीं होता, उसके दर्द का दरमाँ हैं आप,
वह आपकी शफ़ाअत का मुंतज़िर है, उसके दिल का फ़रमान हैं आप,
मदद की उम्मीद रखने वाला ज़रूर पाएगा, या रसूलल्लाह!

रसूलुल्लाह पर दुरूद शरीफ़ पढ़ने की अहमियत और फ़ज़ीलत

नबी-ए-करीम का नाम लिया जाए, सुना जाए या लिखा जाए, तो ताज़ीम और एहतिराम के इज़हार के तौर पर आप पर दुरूद शरीफ़ पढ़ना हमारे सबसे अहम फ़राइज़ में से है। क़ुरआन-ए-करीम में सूरह अहज़ाब की 56वीं आयत-ए-करीमा में मफ़हूमन यूँ फ़रमाया गया है:

“बेशक अल्लाह तआला और उसके फ़रिश्ते नबी पर दुरूद भेजते हैं (उनकी इज़्ज़त और शान बुलंद करने के लिए)। ऐ ईमान वालो! तुम भी उन पर दुरूद और सलाम भेजो और दिल से उनके आगे सर झुका दो।”

तफ़सीर के आलिमों ने बताया है कि इस आयत-ए-करीमा में ज़िक्र किए गए “सलात” (दुरूद) लफ़्ज़ के मायने अल्लाह तआला की तरफ़ से रहमत, फ़रिश्तों की तरफ़ से इस्तिग़फ़ार और मोमिनों की तरफ़ से दुआ के हैं। तमाम इस्लामी आलिमों ने एक राय से बताया है कि उम्र में एक बार दुरूद पढ़ना फ़र्ज़ है। आपका नाम जब भी लिया, सुना, पढ़ा या लिखा जाए, एक बार दुरूद पढ़ना वाजिब है, और नाम दोहराया जाए, तो मुस्तहब है।

अल्लाह तआला से कुछ माँगने वाले को चाहिए कि पहले अल्लाह तआला की हम्द-ओ-सना करे, फिर रसूलुल्लाह पर दुरूद पढ़े। ऐसी दुआ क़बूल होने के बहुत लायक़ है। दो दुरूदों के साथ (दुआ के शुरू और आख़िर में) की गई दुआ लौटाई नहीं जाती। हज़रत अबू तल्हा बयान करते हैं: “मैं रसूलुल्लाह की ख़िदमत में हाज़िर हुआ। आप में ऐसी ख़ुशी और इत्मीनान देखा जो पहले कभी नहीं देखा था। जब मैंने वजह पूछी, तो आपने फ़रमाया: ’मैं ख़ुश क्यों न होऊँ? अभी-अभी जिबराईल (अलैहिस्सलाम) ख़ुशख़बरी लाए। अल्लाह तआला फ़रमाता है: तुम्हारी उम्मत में से कोई तुम पर एक दुरूद पढ़े, तो अल्लाह तआला उसके बदले उस पर दस रहमतें भेजेगा।’”6

इस बारे में कुछ हदीसें ये हैं:

“उस शख़्स की नाक ख़ाक में रगड़ी जाए जिसके सामने मेरा नाम लिया जाए और वह मुझ पर दुरूद और सलाम न भेजे। उस शख़्स की भी नाक ख़ाक में रगड़ी जाए जिस पर रमज़ान का महीना आए और गुज़र जाए, मगर वह अपने गुनाह न बख़्शवा सके। उस शख़्स की भी नाक ख़ाक में रगड़ी जाए जो अपने माँ-बाप का बुढ़ापा पाए और उनकी रज़ा हासिल करके जन्नत में दाख़िल न हो सके।”

“जिसके सामने मेरा नाम लिया जाए और वह मुझ पर दुरूद और सलाम न भेजे, वह कंजूसों में सबसे बड़ा कंजूस है।” हज़रत अबू हुमैद साइदी बताते हैं: “सहाबा-ए-किराम में से कुछ ने रसूलुल्लाह से पूछा: ‘या रसूलल्लाह! हम आप पर दुरूद और सलाम कैसे भेजें?’ रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: ‘यूँ कहो: अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिंव व अज़वाजिही व ज़ुर्रिय्यतिही कमा सल्लैता अला इब्राहीमा व बारिक अला मुहम्मदिंव व अज़वाजिही व ज़ुर्रिय्यतिही कमा बारकता अला इब्राहीमा इन्नका हमीदुम मजीद।’”7

कुछ दुरूद ये हैं:

“अलैहिस्सलाम।”

“सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम।”

“अलैहिस्सलातु वस्सलामु वत्तहिय्या।”

“अल्लाहुम्मा सल्लि अला सय्यिदिना मुहम्मद।”

“अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिंव व अला आलिही व सह्बिही अजमईन।”

“अलैहि व अला जमीइ मिनस सलवाति अतम्मुहा व मिनत तहिय्याति ऐमनुहा।”

“अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिंव व अला आलि मुहम्मद, कमा सल्लैता अला इब्राहीमा व अला आलि इब्राहीम…”

एक शख़्स ने यूँ बयान किया: मेरे एक दोस्त ने मुझे जो ख़त भेजा, उसमें जहाँ-जहाँ रसूलुल्लाह का मुबारक नाम आया, वहाँ उसने “सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तस्लीमन कसीरन कसीरा” लिखा था। मैंने उससे मिलकर वजह पूछी, तो उसने कहा: “जवानी में मैंने हदीस की किताबें नक़ल कीं। रसूलुल्लाह का मुबारक नाम लिखते वक़्त दुरूद नहीं लिखता था। ख़्वाब में सारे जहानों के सरदार को देखा और आपके पास गया। आपने अपना मुबारक चेहरा मुझसे फेर लिया। मैं दूसरी तरफ़ गया, तो आपने फिर फेर लिया। सामने जाकर अर्ज़ किया: ‘या रसूलल्लाह! आप मुझसे अपना चेहरा क्यों फेरते हैं?’ आपने फ़रमाया: ‘क्योंकि तुमने अपनी किताब में मेरा नाम लिखते वक़्त मुझ पर दुरूद नहीं लिखा!’ उस वक़्त से मैं आपका मुबारक नाम हमेशा दुरूद के साथ लिखता हूँ।”

हदीस शरीफ़ में यूँ फ़रमाया गया है:

“जो मुझ पर एक बार दुरूद भेजे, अल्लाह तआला उस पर दस बार सलात (रहमत) भेजता है, उसके दस गुनाह बख़्शता है और उसके दर्जे दस गुना बुलंद करता है।”

“क़यामत के दिन मेरे सबसे क़रीब और मेरी शफ़ाअत का सबसे ज़्यादा हक़दार वह शख़्स होगा जो मुझ पर सबसे ज़्यादा दुरूद और सलाम भेजता है।” हक़ तआला ने हज़रत मूसा से फ़रमाया: “ऐ मूसा, क्या तुम चाहते हो कि मैं तुम्हारी ज़बान से तुम्हारी बात से भी, तुम्हारे दिल से तुम्हारे ख़याल से भी, तुम्हारे बदन से तुम्हारी रूह से भी और तुम्हारी आँख से उसकी रौशनी से भी ज़्यादा क़रीब होऊँ?” उन्होंने कहा: “हाँ, या रब!” तो अल्लाह तआला ने फ़रमाया: “तो फिर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर बहुत दुरूद भेजो।” फिर फ़रमाया: “ऐ मूसा, क्या तुम चाहते हो कि क़यामत के दिन प्यास की तकलीफ़ न उठाओ?” उन्होंने कहा: “हाँ, या रब!” तो अल्लाह तआला ने फ़रमाया: “तो फिर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर बहुत दुरूद भेजो।”8

नबी-ए-करीम ने फ़रमाया:

“क़यामत में हर मक़ाम पर तुममें से मेरे सबसे क़रीब वह होगा जो दुनिया में मुझ पर बहुत दुरूद पढ़ता है। जो जुमा के दिन और जुमा की रात मुझ पर सौ बार दुरूद पढ़े, अल्लाह तआला उसकी सौ हाजतें पूरी करता है। उनमें से सत्तर आख़िरत के और तीस दुनिया के काम हैं। फिर अल्लाह तआला एक फ़रिश्ते के ज़रिए ये दुरूद मेरी क़ब्र तक पहुँचवाता है। ये ऐसे होते हैं जैसे तुम्हारे पास कोई तोहफ़ा आता है। वह फ़रिश्ता मुझे दुरूद भेजने वाले का नाम, उसकी नस्ल और उसका क़बीला बताता है। उसे मेरे पास मौजूद एक सफ़ेद सहीफ़े में दर्ज करता है। मेरा वफ़ात के बाद जानना ऐसा ही है जैसे ज़िंदगी में जानना।”9

“जो मुझ पर एक बार दुरूद भेजे, अल्लाह तआला उस पर दस बार सलात (रहमत) भेजता है, उसके दस गुनाह बख़्शता है और उसके दर्जे दस गुना बुलंद करता है” हदीस शरीफ़

“जब जुमेरात का दिन आता है, तो अल्लाह तआला ऐसे फ़रिश्ते भेजता है जिनके पास चाँदी के रजिस्टर और सोने के क़लम होते हैं। वे जुमेरात के दिन और जुमा की रात नबी पर ज़्यादा दुरूद भेजने वालों के नाम लिखते हैं।” “जब दो मुसलमान आपस में मिलकर मुसाफ़हा करते हैं और नबी पर दुरूद भेजते हैं, तो जुदा होने से पहले ही उनके अगले और पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।” “तुममें से कोई मस्जिद में दाख़िल हो, तो नबी पर सलाम भेजे और कहे: ‘या रब! मुझे शैतान से बचा!’”10

एक रिवायत में है: “मस्जिद से निकलते वक़्त ‘अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका मिन फ़ज़्लिक’ पढ़े।”

जब दुआ के शुरू में अल्लाह तआला की सना (हम्द) और रसूलुल्लाह पर दुरूद न हो, तो दुआ पर्दे के पीछे रह जाती है। जिस दुआ के शुरू में हम्द और दुरूद हो, वह क़बूल होती है। जब तक रसूलुल्लाह पर और आपकी आल पर दुरूद न पढ़ा जाए, दुआ और आसमान के बीच पर्दा रहता है। दुरूद पढ़ा जाए तो यह पर्दा फट जाता है और दुआ आसमान की तरफ़ चढ़ जाती है। न पढ़ा जाए तो दुआ लौट आती है।

किसी मजलिस में अल्लाह तआला का ज़िक्र न हो और रसूलुल्लाह पर दुरूद न भेजा जाए, तो वहाँ बैठे लोगों के ऊपर एक कोड़ा होता है; अल्लाह तआला चाहे तो उन्हें अज़ाब दे और चाहे तो माफ़ कर दे।

“जिसके कान बजें, वह मुझे याद करे और मुझ पर दुरूद पढ़े।”

“जो किसी काम की नीयत करे, वह उस बारे में मशवरा करे। अल्लाह तआला उस काम में उसे रुश्द (सही राह) अता करता है। अगर कोई शख़्स कोई बात कहना चाहे और भूल जाए, तो मुझ पर दुरूद पढ़े, क्योंकि मुझ पर उसके दुरूद में उसकी बात का बदल मौजूद है। उम्मीद है कि वह बात उसे याद आ जाए।”11

“जिस अच्छे काम की शुरुआत अल्लाह के नाम और मुझ पर दुरूद से न की जाए, उस काम में कोई भलाई नहीं और उसकी सारी बरकत उठा ली जाती है।”12 इस्लाम के बुज़ुर्गों में से अबू हफ़्स काग़िदी ने इंतिक़ाल फ़रमाया, तो किसी ने उन्हें ख़्वाब में देखकर पूछा: “अल्लाह तआला ने आपके साथ क्या मामला किया?” उन्होंने कहा: “मुझ पर रहम फ़रमाया, मेरी मग़फ़िरत की और मुझे जन्नत में दाख़िल कर दिया।” उसने पूछा: “किस वजह से?” उन्होंने जवाब दिया: “मुझे फ़रिश्तों के बीच खड़ा किया गया। उन्होंने मेरे गुनाहों और रसूलुल्लाह पर भेजे हुए मेरे दुरूदों का हिसाब किया और मेरे दुरूद ज़्यादा पाए। तब अल्लाह तआला ने उनसे फ़रमाया: ‘ऐ मेरे फ़रिश्तो! तुम्हारा काम पूरा हो गया। अब और हिसाब मत माँगो। इसे मेरी जन्नत में ले जाओ!’”

सलफ़ में से एक बुज़ुर्ग बयान करते हैं: “मेरे एक साथी, जिनके साथ मैंने हदीस पढ़ी थी, इंतिक़ाल कर गए। मैंने उन्हें ख़्वाब में देखा कि उन्होंने हरे हुल्ले पहन रखे थे। मैंने वजह पूछी, तो उन्होंने कहा: ‘हर हदीस में रसूलुल्लाह का जो नाम देखता, उसके साथ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लिखा करता था। हक़ तआला ने उसका बदला यह दिया।’”

सलफ़ में से एक और बुज़ुर्ग बयान करते हैं: “मेरे एक पड़ोसी, जो कातिब थे, इंतिक़ाल कर गए। मैंने उन्हें ख़्वाब में देखा और पूछा: ‘अल्लाह तआला ने आपके साथ क्या मामला किया?’ उन्होंने कहा: ‘माफ़ कर दिया।’ मैंने पूछा: ‘किस वजह से?’ उन्होंने कहा: ‘इसलिए कि जब भी मैं रसूलुल्लाह का नाम लिखता, उसके साथ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अल्फ़ाज़ भी लिखता था।’” अबू सुलैमान दारानी बयान करते हैं: “हदीस लिखते वक़्त जब भी रसूलुल्लाह का मुबारक नाम लिखता, सल्लल्लाहु अलैहि तो लिखता, मगर वसल्लम का लफ़्ज़ नहीं लिखता था। मैंने ख़्वाब में आपको देखा। आपने मुझसे फ़रमाया: ‘ऐ अबू सुलैमान! हदीस में जब मेरा नाम लिखो, तो दुरूद के साथ वसल्लम भी लिखो। यह चार हर्फ़ हैं। हर हर्फ़ पर दस सवाब हैं। अगर नहीं लिखोगे, तो इसका मतलब यह है कि चालीस सवाब छोड़ रहे हो।’”

एक और शख़्स की भी यही आदत थी। रसूलुल्लाह ने ख़्वाब में उससे फ़रमाया: “तुम्हें क्या हुआ है कि मुझ पर दुरूद पूरा नहीं लिखते?”

अबू बकर सिद्दीक़ ने फ़रमाया: “जिसे भूल जाने का डर हो, वह रसूलुल्लाह पर ज़्यादा दुरूद पढ़े।”

सालिहीन के बुज़ुर्गों में से मुहम्मद इब्ने सईद इब्ने मुतर्रिफ़ बयान करते हैं: “मैं हर रात सोते वक़्त एक मुक़र्रर मिक़दार में दुरूद पढ़ा करता था। एक रात ख़्वाब में रसूलुल्लाह तशरीफ़ लाए। आप अंदर दाख़िल हुए। मेरा कमरा नूर से भर गया। फिर आप मेरी तरफ़ बढ़े और फ़रमाया: ‘लाओ, मुझ पर ज़्यादा दुरूद पढ़ने वाले इस मुँह को चूम लूँ।’ मुझे अपना मुँह आगे करते हुए शर्म आई, तो मैंने अपना गाल आगे कर दिया। आपने अपने मुबारक होंठों से उसे चूमा। मैं ख़ुशी से जाग उठा। देखा कि मेरा कमरा मुश्क की ख़ुशबू से भरा हुआ है। आठ दिन तक मेरे गाल से वह प्यारी ख़ुशबू नहीं गई।” सलफ़ के बुज़ुर्गों में से ख़ल्लाद इब्ने कसीर ने इंतिक़ाल फ़रमाया, तो उनके सिर के नीचे एक काग़ज़ मिला, जिस पर लिखा था: “यह ख़ल्लाद इब्ने कसीर के लिए जहन्नम से छुटकारे का परवाना है।” उनके क़रीबी लोगों से पूछा गया: “इनका अमल क्या था?” उन्होंने कहा: “हर जुमा के दिन दुरूद भेजा करते थे।” शैख़ ऐनी की किताब ज़ैनुल मजालिस में लिखा है: रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “क़यामत के दिन तीन गिरोहों के लोग अर्श के साये में होंगे, जहाँ उसके साये के सिवा कोई साया न होगा।” पूछा गया: “वे कौन हैं?” आपने फ़रमाया: “मेरी उम्मत को तकलीफ़ से निकालने वाले, मेरी सुन्नत को ज़िंदा करने वाले और मुझ पर ज़्यादा दुरूद भेजने वाले।”

शैख़ अबू मूसा ज़रीरी बयान करते हैं: “समुंदर में हम एक तूफ़ान में घिर गए। हर कोई मौत के डर से रो रहा था। उस हाल में मुझ पर नींद छा गई। ख़्वाब में मैंने रसूल-ए-अकरम को देखा। आपने मुझसे फ़रमाया: ‘जहाज़ वालों से कहो कि हज़ार बार अल्लाहुम्मा सल्लि अला सय्यिदिना मुहम्मदिंव व अला आलि सय्यिदिना मुहम्मदिन, सलातन तुन्जीना बिहा मिन जमीइल अहवालि वल आफ़ात, व तक़्ज़ी लना बिहा जमीअल हाजात, व तुतह्हिरुना बिहा मिन जमीइस सय्यिआत, व तरफ़उना बिहा इन्दका आलद दरजात, व तुबल्लिग़ुना बिहा अक़्सल ग़ायाति मिन जमीइल ख़ैराति फ़िल हयाति व बादल ममात पढ़ें।’ हमने अभी तीन सौ बार भी नहीं पढ़ा था कि तूफ़ान थम गया और हम बच गए।” हर अहम काम में, हर बला और आफ़त में और ज़लज़ले के वक़्त यह दुरूद पढ़ने की नसीहत की गई है।

दिन-रात मेरी ज़बान पर दुरूद और सलाम है, आपकी उस मुबारक रूह पर, ऐ फ़ख़्रुल अनाम!

मोतबर किताबों में दुरूद किस तरह पढ़ा जाए, इस बारे में चालीस से ज़्यादा हदीसें हैं।

उनमें से एक यह है:

“जिसके कान बजें, वह मुझे याद करे और मुझ पर दुरूद पढ़े” हदीस शरीफ़

अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिंव व अला आलि मुहम्मदिन, कमा सल्लैता अला इब्राहीमा व अला आलि इब्राहीमा, व बारिक अला मुहम्मदिंव व अला आलि मुहम्मदिन, कमा बारकता अला इब्राहीमा व अला आलि इब्राहीमा, इन्नका हमीदुम मजीद।

अल्लाहुम्मा सल्लि व सल्लिम व बारिक वरहम अला सय्यिदिना मुहम्मदिन हुवा सय्यिदुल अरबि वल अजम।

व इमामिल मक्कतिल मुकर्रमति वल मदीनतिल मुनव्वरति वल हरम। अल्लमल इंसाना मा लम यालम।

असलुहू नूरुन व नस्लुहू आदम।

बासुहू मुअख़्ख़रुन व ख़ल्क़ुहू मुक़द्दम।

इस्मुहुश शरीफ़ु मक्तूबुन अलल लौहिल महफ़ूज़ि बियाक़ूतिल क़लम।

व जिस्मुहुश शरीफ़ु मद्फ़ूनुन फ़िल मदीनतिल मुनव्वरति वल हरम।

या लैता अक्तहिलु तुराबल्लज़ी तहतल क़दम।

फ़तूबा सुम्मा तूबा लिमन दआ व तबिअहू व लिमन असलमा साहिबश शफ़ाअति लिल आलमीन।

क़ाइलन या रब्बि! सल्लिम उम्मती, उम्मती, वा उम्मता या ज़ल लुत्फ़ि वल करम।

फ़युनादिल मुनादी मिन क़िबलिर रहमान, क़बिल्तु शफ़ाअतका या नबिय्यल मुहतरम।

उदख़ुलुल जन्नता ला ख़ौफ़ुन अलैकुम व ला हुज़्नुन व ला अलम।

सुम्मा रज़ियल्लाहु तआला अन अबी बकरिन व उमरा व उस्माना व अलिय्यिन ज़िल करम।

व सल्लल्लाहु अला सय्यिदिना मुहम्मदिंव वल हम्दु लका या रब्बल आलमीन।

बिहुरमति सय्यिदिल मुरसलीन।

सुबह की हवा जब आपके मुबारक बालों को छूती,
फ़िज़ा मुश्क और अंबर की ख़ुशबू से भर जाती।
आपके मोती जैसे दाँतों की चमक से रात में
गिरी हुई सुई भी मिल जाती थी, ऐ ख़्वाजा!
आपके नूरानी सीने की रौशनी में अँधेरी रातों में राह पर जवान और बूढ़े चलते थे।
जब हक़ के उस महबूब ने इशारा किया
उँगली से चाँद की तरफ़ – चाँद दो टुकड़े हो गया।
पसीना आता तो हर क़तरा गुलाब बन जाता,
लोग आपके पसीने से गुलाब ख़ुशी-ख़ुशी चुनते।
जहान के उस शाह ने खजूर का पौधा लगाया,
लगाते ही उसी घड़ी उसने फल दे दिया।
आपके मोजिज़े महशर तक लगातार बयान करें,
कितने ही महशर गुज़र जाएँ, ये ख़त्म न होंगे।
अगर चाहते हो कि आग से नजात पाओ,
इश्क़ और दर्द के साथ दुरूद पढ़ो।
अस्सलातु वस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह!
अस्सलातु वस्सलामु अलैका या हबीबल्लाह!
अस्सलातु वस्सलामु अलैका या नूरा अर्शिल्लाह!