दीन से फिर जाने की तहरीकें
नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की तेईस साल की नुबुव्वत के ज़माने में पूरा जज़ीरा-ए-अरब मुसलमान हो गया, और दूसरी जगहों से भी बहुत से लोग गिरोह-दर-गिरोह आकर मुसलमान हुए। उन्होंने अल्लाह तआला पर ईमान लाकर अपनी हर बात और हर काम में उसके भेजे हुए नबी की पैरवी की। रसूलुल्लाह की वफ़ात के वक़्त ज़मीन पर एक लाख चौबीस हज़ार से ज़्यादा (एक रिवायत में तक़रीबन डेढ़ लाख) सहाबी मौजूद थे। हज्जतुल विदा के बाद अरबों में कुछ लोग नुबुव्वत का दावा लेकर उठ खड़े हुए। उनमें पहला बनू अनस क़बीले का असवद अनसी था। उसका असली नाम अबहला इब्ने कअब था। उसने तरह-तरह की चालबाज़ियों से यमन के बहुत से लोगों को धोखा दिया। नजरान वाले भी उसके पीछे लग गए। उसने सनआ पर क़ब्ज़ा करके फ़ितने का दायरा और बढ़ा दिया। रसूलुल्लाह ने बीमार होने के बावजूद असवद अनसी जैसे झूठों की तबाहकारियों पर ख़ास तवज्जोह दी। इस झूठे के मारे जाने की ख़बर नबी-ए-करीम को वह्य के ज़रिए दी गई। रसूलुल्लाह ने अगले दिन सहाबा को यह ख़ुशख़बरी दी: “कल रात झूठा असवद अनसी हमारे भाइयों में से एक के हाथों मारा गया।”
नबी-ए-करीम की वफ़ात के बाद मुनाफ़िक़ों, यहूदियों और ईसाइयों के भड़काने से गिरोहों की शक्ल में इर्तिदाद (दीन से फिर जाने) की तहरीकें शुरू हो गईं। ये तहरीकें बहुत बड़े पैमाने पर फैल गईं। रसूलुल्लाह की वफ़ात पर सहाबा-ए-किराम (अलैहिमुर्रिज़वान) ने एक राय होकर अबू बकर सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) को ख़लीफ़ा चुना। ज़ाहिर में मुसलमान दिखने के बावजूद जिनके दिल अभी इस्लाम से मानूस नहीं हुए थे, ऐसे बद्दू अरबों के एक हिस्से ने नबी-ए-करीम की वफ़ात को मौक़ा जानकर फ़र्ज़ इबादतों से, ख़ास तौर पर ज़कात देने से, इनकार कर दिया। सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम अजमईन) में से जो उनके पास ज़िम्मेदारी लेकर गए थे, उन्हें शहीद कर दिया और मुसलमान होते हुए दीन-ए-इस्लाम को छोड़कर मुरतद हो गए। यमन और दूसरी जगहों के अफ़सर लौटने और बुरी ख़बरें लाने लगे। इर्तिदाद का ख़तरा अचानक बहुत बढ़ गया। हर तरफ़ दहशत छा गई। मुरतदों की तादाद के मुक़ाबले में मुसलमान बहुत थोड़े थे। अबू बकर सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने मुरतदों से जंग करने का ख़तरा मोल लिया। जो दुश्मन मदीना पर हमले की तैयारी कर रहा था, उस पर रात को सख़्त धावा बोला, सुबह तक लड़े और उन सबको तितर-बितर कर दिया। फिर दूर के मुरतदों से जंग के लिए जाने को अपने ऊँट पर सवार हुए।
हज़रत आइशा ने फ़रमाया: “अरबों के मुरतद होने के उन दिनों में जब मेरे वालिद तलवार सौंतकर अपने ऊँट पर सवार हुए, तो हज़रत अली उनके पास पहुँचे, ऊँट की नकेल पकड़ ली और कहा: ‘ऐ रसूल के ख़लीफ़ा! कहाँ जा रहे हैं? मैं आपसे वही कहता हूँ जो रसूलुल्लाह ने उहुद की जंग में आपसे फ़रमाया था: “अपनी तलवार म्यान में रखो! अपनी मौत से हमें न जलाओ!” अल्लाह की क़सम, अगर आपको कुछ हो गया, तो आपके बाद मुसलमानों का निज़ाम दुरुस्त न रहेगा।’” तमाम सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम अजमईन) ने हज़रत अली की बात की ताईद की। हज़रत ख़लीफ़ा मदीना मुनव्वरा लौट आए। मुरतदों की तरफ़ दस्ते भेजे। ख़लीफ़ा ने पहले मदीना के क़रीब के चार क़बीलों पर चढ़ाई करके उन्हें इताअत पर मजबूर किया। फिर ग्यारह क़बीलों की तरफ़ दस्ते भेजे। इनमें से इकरिमा की कमान में जो लश्कर था, वह यमामा में मुसैलमा के चालीस हज़ार के लश्कर का मुक़ाबला न कर सका।
“ऐ मेरे प्यारे नबी! इनसे कह दो: ‘अगर तुम अल्लाह से मुहब्बत करते हो और चाहते हो कि अल्लाह भी तुमसे मुहब्बत करे, तो मेरी पैरवी करो! अल्लाह मेरी पैरवी करने वालों से मुहब्बत करता है’” आले इमरान: 31
ख़लीफ़ा ने ख़ालिद इब्ने वलीद को मदद के लिए भेजा। ख़ालिद तुलैहा इब्ने ख़ुवैलिद, सजाह बिन्ते हारिस और मालिक इब्ने नुवैरा को शिकस्त देकर मदीना लौटे। उन्होंने यमामा में भी बड़ी फ़तह हासिल की। बीस हज़ार मुरतदों को मार डाला। तक़रीबन दो हज़ार मुसलमान शहीद हुए। अम्र इब्ने आस ने भी ख़ुज़ाआ क़बीले को ईमान पर लौटा दिया। अला इब्ने हज़रमी ने बहरैन में सख़्त जंगें लड़कर मुरतदों को बिखेर दिया। हुज़ैफ़ा, अरफ़जा और इकरिमा ने ओमान और बहरैन में मिलकर मुरतदों को शिकस्त दी। दस हज़ार मुरतदों को मार डाला। ख़लीफ़ा ने ख़ालिद इब्ने वलीद को इराक़ की तरफ़ भेजा। उन्होंने हीरा से एक लाख सोने के सिक्के जिज़्या के तौर पर लिए। हुरमुज़ की कमान वाली ईरानी फ़ौज को शिकस्त दी। बसरा में तीस हज़ार के लश्कर को तहस-नहस कर दिया। मदद को आने वाली दुश्मन फ़ौज में से सत्तर हज़ार काफ़िर मारे गए। फिर तरह-तरह की जंगों से बड़े-बड़े शहर फ़तह किए। ख़लीफ़ा ने मदीना में लश्कर जमा करके अबू उबैदा को शाम की तरफ़ और अम्र इब्ने आस को फ़िलिस्तीन भेजा। फिर यज़ीद इब्ने अबी सुफ़यान को शाम में मदद के लिए भेजा। फिर और लश्कर जमा करके हज़रत मुआविया को उनके भाई यज़ीद की मदद के लिए भेजा। ख़ालिद इब्ने वलीद को भी इराक़ से शाम भेजा। ख़ालिद लश्कर का एक हिस्सा मुसन्ना के पास छोड़कर बहुत सी जंगों और फ़तहों के साथ सीरिया पहुँचे। इस्लामी लश्करों ने मिलकर अजनादैन में रूम की बड़ी फ़ौज को शिकस्त दी। फिर यरमूक में छियालीस हज़ार इस्लामी सिपाहियों ने हिरक़्ल के दो लाख चालीस हज़ार सिपाहियों से लंबी और बहुत सख़्त जंगें लड़कर फ़तह पाई। रूम के एक लाख से ज़्यादा सिपाही मारे गए। तीन हज़ार मुसलमान शहीद हुए। इस जंग में मुसलमान औरतें भी लड़ीं। सिपहसालार-ए-आज़म ख़ालिद इब्ने वलीद और दस्ते के सरदार इकरिमा के हैरत-अंगेज़ कारनामे देखने में आए। ये सारी फ़तहें ख़लीफ़ा की हिम्मत, सूझ-बूझ, अच्छे इंतिज़ाम और बरकत से हासिल हुईं। नबी-ए-करीम की वफ़ात के साथ जो बग़ावत और इर्तिदाद की तहरीकें पूरे जज़ीरा-ए-अरब को आग की तरह घेर चुकी थीं, वे हज़रत अबू बकर के बुलंद हौसले, अटल इरादे और लश्कर में किए गए दुरुस्त इंतिज़ामों से एक साल जैसे थोड़े अरसे में दबा दी गईं। हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उसामा के लश्कर को सीरिया भेजने और फ़सादों को रोकने में बड़ी ख़िदमात अंजाम दीं। अब्दुल्लाह इब्ने सुहैल ने अपनी तक़रीरों से बहुत से लोगों को मुरतद होने से रोका। अबू दुजाना ने भी फ़सादों को दबाने में बहुत बड़ी ख़िदमत अंजाम दी। नोमान इब्ने मुक़र्रिन और ख़ालिद इब्ने सईद मुरतदों से होने वाली जंगों में शरीक हुए और बड़ी कामयाबियाँ हासिल कीं। इस तरह इर्तिदाद के फ़ितने को बढ़ने का मौक़ा न देकर एक बड़ी आफ़त को रोक दिया गया और इस्लामी इत्तिहाद को हिलाने के लिए भड़काई गई फ़ितने की एक बड़ी आग बुझा दी गई।
लेकिन कुछ लोग, जो समझ गए थे कि वे खुलकर अपने मक़सद तक नहीं पहुँच सकेंगे और जो मुरतद होने पर तुले हुए थे, बाद के ज़मानों की फ़ितना-अंगेज़ तहरीकों में भी शामिल हुए। वे मुसलमानों के दरमियान दीनी और सियासी फूट का सबब बने।
इस्लामी तारीख़ में इन वाक़िआत के बाद दीन को ठुकराने और दीन से फिर जाने के मायनों में “इर्तिदाद” (दीन से फिर जाना) और “मुरतद” (दीन से फिर जाने वाला) के अल्फ़ाज़ इस्तेमाल होने लगे। मुरतदों के ख़िलाफ़ जद्दोजहद में हज़रत अबू बकर का बड़ा हिस्सा रहा। अगर उन जैसे सूझ-बूझ वाले शख़्स न होते, तो ख़तरा पूरे अरब में फैल जाता। इसीलिए हज़रत आइशा ने फ़रमाया है: “जब रसूलुल्लाह की रूह क़ब्ज़ हुई, तो अरब मुरतद हो गए। निफ़ाक़ (दोग़लापन) उभर आया। मेरे वालिद पर जो बोझ आ पड़ा, अगर वह पहाड़ों पर पड़ता, तो उन्हें ज़रूर चूर-चूर कर देता!”1
हज़रत अबू हुरैरा ने भी कहा है: “अगर अबू बकर न होते, तो मुहम्मद अलैहिस्सलाम की वफ़ात के बाद मुहम्मद की उम्मत हलाक हो जाती!”2 और यह भी कहा: “उस अल्लाह की क़सम, जिसके सिवा कोई माबूद नहीं, अगर अबू बकर ख़िलाफ़त अपने ज़िम्मे न लेते, तो अल्लाह तआला की इबादत करने वाला कोई न रहता!” अपनी यह बात उन्होंने तीन बार दोहराई।
अबू रजा उतारिदी बयान करते हैं: “मैं मदीना में दाख़िल हुआ, तो देखा कि लोग जमा हैं और एक आदमी यह कहते हुए दूसरे आदमी का सिर चूम रहा है: ‘मैं आप पर क़ुरबान जाऊँ! अल्लाह की क़सम, अगर आप न होते, तो हम ज़रूर हलाक हो जाते!’ मैंने पूछा: ‘यह चूमने वाला और जिसे चूमा जा रहा है, कौन हैं?’ लोगों ने कहा: ‘मुरतदों से जिहाद करने की वजह से अबू बकर का सिर उमर चूम रहे हैं!’”3
हज़रत आइशा उन दिनों का हाल यूँ बयान फ़रमाती हैं: रसूलुल्लाह की वफ़ात पर अरब क़बीलों में से बहुत से मुरतद हो गए। मुसलमान ऐसे हैरान रह गए जैसे अँधेरी रात में बारिश में घिर गए हों। यहाँ तक कि उस वक़्त मक्का वालों में से ज़्यादातर इस्लाम से फिर जाने को तैयार हो गए। हज़रत सुहैल इब्ने अम्र काबा के दरवाज़े पर खड़े होकर मक्का वालों से मुख़ातिब हुए। उनके सामने असरदार तक़रीर करके उनके शक दूर किए और उन्हें दीन से फिरने से रोका। उन्होंने उनसे यह कहा: “ऐ मक्का वालो! तुम मुसलमान होने वालों में सबसे आख़िरी हुए। ख़बरदार, मुरतद होने वालों, इस्लाम से फिरने वालों में सबसे पहले न बनना! अल्लाह की क़सम, अल्लाह तआला, जैसा कि रसूल अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया, इस काम को ज़रूर पूरा करेगा! मैंने रसूलुल्लाह को ठीक इसी जगह, जहाँ मैं खड़ा हूँ, अकेले खड़े होकर यह फ़रमाते सुना है: ‘मेरे साथ ला इलाह इल्लल्लाह कहो, ताकि तुम्हें देखकर अरब दीन में दाख़िल हों और ग़ैर-अरब तुम्हें जिज़्या अदा करें! अल्लाह की क़सम, किसरा और क़ैसर के ख़ज़ाने अल्लाह की राह में ख़र्च किए जाएँगे!’
तुमने देख लिया कि मज़ाक़ उड़ाने वाले ज़कात और सदक़ा वसूल करने वाले बन गए। अल्लाह की क़सम, बाक़ी भी पूरा होगा! अल्लाह की क़सम, मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि जब तक सूरज निकलता और डूबता रहेगा, यह दीन क़ायम रहेगा! तुम्हारे दरमियान मौजूद वे लोग तुम्हें धोखा न दें! जो बात मैं जानता हूँ, वह वे भी जानते हैं। लेकिन बनू हाशिम से जलन ने उनके दिलों पर मुहर लगा दी है। ऐ लोगो! क़ुरैश में ख़ुश्की और समुंदर में सबसे ज़्यादा सवारियाँ और कश्तियाँ रखने वाला मैं हूँ। अपने अमीर की इताअत करो और अपनी ज़कातें उन्हें अदा करो। अगर इस्लाम का काम आख़िर तक न चला, तो मैं तुम्हारी ज़कातें तुम्हें वापस करने का ज़ामिन हूँ!” यह कहकर वह रो पड़े। इस पर लोग ठंडे पड़ गए।4
सुहैल इब्ने अम्र ने जब अपनी असरदार तक़रीर से मक्का वालों को मुरतद होने से बाज़ रखा, तो मक्का के हाकिम अत्ताब इब्ने असीद लोगों के सामने आ सके।
“अगर अबू बकर न होते, तो मुहम्मद अलैहिस्सलाम की वफ़ात के बाद मुहम्मद की उम्मत हलाक हो जाती!” अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु)
हुजरा-ए-सआदत / मस्जिद-ए-नबवी
हमारे प्यारे नबी (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) और आपके सहाबा में से मुसलमानों की दो आँखों की पुतलियाँ,
हज़रत अबू बकर और हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) की मुबारक क़ब्रों का
सामने से, यानी क़िब्ले की तरफ़ से नज़ारा।
सुहैल इब्ने अम्र बद्र के ग़ज़वे में क़ैदियों में था। हज़रत उमर चाहते थे कि उसे क़त्ल कर दिया जाए। उस वक़्त नबी-ए-करीम ने हज़रत उमर से फ़रमाया था: “तुम उसे क्यों क़त्ल करना चाहते हो? छोड़ दो, शायद अल्लाह उसे ऐसे मक़ाम पर पहुँचा दे जिसे तुम भी पसंद करोगे। उससे यह उम्मीद भी है कि वह लोगों से ख़िताब करेगा!” चुनाँचे यह बात समझ में आई कि हदीस शरीफ़ में जिस बात की ख़ुशख़बरी दी गई थी, वह सुहैल इब्ने अम्र (रज़ियल्लाहु अन्हु) की यही तक़रीर थी, जो उन्होंने दिल को भाने वाले मक़ाम पर की।5 हज़रत उमर ने भी जब सुहैल की तक़रीर सुनी, तो उन्हें नबी-ए-करीम की वह बात याद आ गई जो आपने हज़रत सुहैल के बारे में फ़रमाई थी, और नबी-ए-करीम की ग़ैर-मौजूदगी में भी वह यह कहने से अपने आपको न रोक सके: “मैं गवाही देता हूँ कि आप यक़ीनन रसूलुल्लाह हैं!”6
आपका इश्क़ हर दर्द की दवा है, या रसूलल्लाह,
आपके दरबार में हर हाजत रवा है, या रसूलल्लाह।
जिन आँखों ने आपका नूर देखा, वे न चाँद देखें न तारे,
आपके नूर से रात और दिन रौशन हैं, या रसूलल्लाह।
आपके पसीने से गुलाब खिलते हैं, बातों से शहद और शकर,
आपसे बीमार दिलों को शिफ़ा है, या रसूलल्लाह।
आप बादशाहों के हबीब हैं, दर्द और आहों के तबीब,
आपकी शफ़ाअत गुनाहगार के लिए सफ़ा है, या रसूलल्लाह।
चाँद-सूरज, सातों सितारे, सब आपकी तारीफ़ करते हैं,
आपकी बात के सिवा हर बात ख़ता है, या रसूलल्लाह।
इब्लीस आपसे हसद करता है, अहमक़ है, फ़रेब रचता है,
आपसे मुहब्बत की ख़ातिर इदरीस बुलंद है, या रसूलल्लाह।
आपकी नौबत हमेशा बजती है, पाँचों वक़्त आपकी सुन्नत क़ायम है,
आपके दर पर जो भी आए, उसके लिए सदा है, या रसूलल्लाह।
काँटेदार झाड़ियों ने रेशम पहना, बयाबान ख़ुशबूदार हुए,
आपकी जुदाई का दर्द भी वफ़ा है, या रसूलल्लाह।
कनआन के यूसुफ़ थोड़ी सी चीज़ पर छुपकर बेचे गए,
आपका दीदार मेरे लिए हज़ार जानों का मोल है, या रसूलल्लाह।
ज़मीन पर आपका मुबारक रौज़ा नूर से भरा, पला-बढ़ा,
और आपकी रूह आसमानों में अयाँ है, या रसूलल्लाह।
आपका ख़िलअत दाऊद के बदन पर, आपकी नेमत ख़लील के दस्तरख़्वान पर,
मूसा के हाथ में आपकी इबरत असा है, या रसूलल्लाह।
आपका मक़ाम काबा और ज़मज़म, हमेशा क़ायम और मज़बूत,
ख़िज़्र हर दम आपकी उम्मत का साक़ी है, या रसूलल्लाह।
शय्याद हमज़ा उस शाह से चाहता है कि आहों से छुटकारा पाए,
आपकी तारीफ़ करना अल्लाह की अता है, या रसूलल्लाह।
Şeyyâd Hamza
“मैं गवाही देता हूँ कि आप यक़ीनन रसूलुल्लाह हैं!” हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु)
जन्नतुल बक़ी
मदीना मुनव्वरा का जन्नतुल बक़ी हज़ारों सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के मज़ारों वाला क़ब्रिस्तान था।
यहाँ के वे सारे ख़ूबसूरत मज़ार और क़ब्रें गिरा दी गईं, और अफ़सोस, इस जगह को एक खेत बना दिया गया।
धीरे-धीरे!
इज़राईल जब तेरे सिर पर आएगा,
टूटेंगे पाँव और बाज़ू – धीरे-धीरे।
मेरा मौला नसीब करे दीन और ईमान,
बहेगा आँखों से सैलाब – धीरे-धीरे।
ऊँचा उड़ने वाला दिल एक दिन थक जाएगा,
नाप-तौल का तराज़ू एक दिन क़ायम होगा,
हर एक का किया हुआ एक दिन पूछा जाएगा,
क्या फिरेगी, या रब, ज़बान – धीरे-धीरे?
हमेशा नफ़्स के पीछे चला, तौबा न की,
जो मिला वह खाया, शुक्र अदा न किया,
आख़िर इस काली मिट्टी में आ पहुँचा,
खिंच जाएगा दुनिया से हाथ – धीरे-धीरे।
तेरी क़ब्र पर पत्थर गाड़ देंगे,
एक मुट्ठी मिट्टी पर तू सिर रख देगा,
बाप बेटे को न देखेगा, न भाई भाई को,
चल देगा वह राह जो न लौटे – धीरे-धीरे।
काफ़ूर मिला गुनगुना पानी लाएँगे,
उस नाज़ों पले बदन से सारे कपड़े उतारेंगे,
तेरे मरने की ख़बर पड़ोसी सुनेंगे,
लौट जाएँगे दोस्त-अहबाब – धीरे-धीरे।
