दावतनामे
बादशाहों को भेजे गए ख़त
नबी-ए-मुहतरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) हुदैबिया से लौटने के बाद चाहते थे कि इस्लाम सारी दुनिया में फैले और इंसान जहन्नम के अज़ाब से बचकर हक़ीक़ी ख़ुशनसीबी तक पहुँचें, क्योंकि आप सारे जहान के लिए रहमत बनाकर भेजे गए थे। इसलिए आपने आस-पास के बादशाहों के पास सफ़ीर भेजकर उन्हें इस्लाम की दावत देने का इरादा फ़रमाया। हिजरत के छठे साल ज़िलहिज्जा महीने के आख़िर में, सातवें साल मुहर्रम महीने के शुरू में आपने अम्र इब्ने उमय्या (रज़ियल्लाहु अन्हु) को हब्शा के बादशाह के पास, दिहया कल्बी (रज़ियल्लाहु अन्हु) को रूम के बादशाह के पास और हातिब इब्ने अबी बल्तआ (रज़ियल्लाहु अन्हु) को मिस्र के बादशाह के पास भेजा। इसी काम के लिए अब्दुल्लाह इब्ने हुज़ाफ़ा (रज़ियल्लाहु अन्हु) को ईरान के बादशाह के पास, शुजा इब्ने वह्ब (रज़ियल्लाहु अन्हु) को ग़स्सान, सलीत इब्ने अम्र (रज़ियल्लाहु अन्हु) को यमामा और अला हज़रमी को बहरैन के अमीर मुंज़िर इब्ने सावी के पास भेजा।1 ये सफ़ीर सहाबा-ए-किराम में सबसे चुने हुए लोग थे; सूरत में भी और बातचीत में भी सबसे अच्छे थे। हर बादशाह के लिए इस्लाम की दावत के अलग-अलग ख़त लिखे गए। हमारे प्यारे नबी ने ख़तों के नीचे अपनी चाँदी की अँगूठी की मुहर लगाई, जिसके नगीने पर नीचे से ऊपर की तरफ़ तीन सतरों में “मुहम्मद, रसूल, अल्लाह” लिखा था। नबी-ए-करीम के एक मोजिज़े से ऐसा हुआ कि बादशाहों के पास भेजे जाने वाले सफ़ीर सुबह सोकर उठे, तो उनमें से हर एक उस मुल्क की ज़बान सीख चुके थे जहाँ उन्हें जाना था।2
नज्जाशी असहमा के नाम ख़त
हज़रत अम्र इब्ने उमय्या हब्शा जा रहे थे; उन्हें नज्जाशी असहमा से यह दरख़्वास्त भी करनी थी कि जो सहाबा-ए-किराम पहले वहाँ हिजरत कर चुके थे, उन्हें मदीना भेज दिया जाए। रसूलुल्लाह ने नज्जाशी के पास दो ख़त भेजे थे। अम्र इब्ने उमय्या थोड़े ही दिनों में हब्शा पहुँचे और बादशाह नज्जाशी असहमा के दरबार में हाज़िर हुए। पहले उन्होंने पहला ख़त पेश किया। नज्जाशी अपने तख़्त से नीचे उतर आए और ख़त को बड़ी इज़्ज़त और मुहब्बत से हाथ में लिया। उसे चूमा, अपने चेहरे और आँखों से लगाया, फिर खोलकर पढ़वाया: “बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम! अल्लाह तआला के रसूल मुहम्मद अलैहिस्सलाम की तरफ़ से हब्शा के बादशाह नज्जाशी असहमा के नाम!… हिदायत की पैरवी करने वाले पर सलाम हो!…
“ऐ बादशाह! मैं तुम्हें उस अल्लाह तआला पर, जिसका न कोई हमसर है न शरीक, ईमान लाने, उसकी इबादत करने, मेरी पैरवी करने और अल्लाह तआला ने मुझ पर जो कुछ उतारा है उस पर यक़ीन करने की दावत देता हूँ, क्योंकि मैं अल्लाह तआला का वह रसूल हूँ जिसे इन बातों को पहुँचाने का हुक्म दिया गया है” हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का
बादशाहों को भेजा गया एक ख़त
ख़त के नीचे बाईं तरफ़ की मुहर में तीन सतरों में नीचे से ऊपर की तरफ़ “मुहम्मद, रसूल, अल्लाह” के अल्फ़ाज़ लिखे हुए हैं। चाँदी की एक अँगूठी के नगीने पर खोदी गई यह मुहर भेजे गए हर दावतनामे के नीचे लगाई जाती थी। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने यह अँगूठी शाही मुहर के तौर पर आख़िरत तशरीफ़ ले जाने तक इस्तेमाल फ़रमाई। फिर यह हज़रत अबू बकर, उनके बाद हज़रत उमर और तीसरे नंबर पर हज़रत उस्मान की ख़िलाफ़त के ज़माने की मुहर रही। हज़रत उस्मान इसे सिर्फ़ छह महीने इस्तेमाल कर सके। एक दिन अँगूठी ख़लीफ़ा की उँगली से फिसलकर अरीस के कुएँ में गिर गई। उसे बहुत ढूँढा गया, मगर वह किसी तरह न मिली।
ऐ बादशाह! मैं तुम्हारी सलामती चाहता हूँ और तुम पर की गई नेमतों के लिए अल्लाह तआला की हम्द करता हूँ। उसके सिवा कोई माबूद नहीं। वह मलिक है (सारी कायनात में तसर्रुफ़ करने वाला सिर्फ़ वही है)। वह क़ुद्दूस है (हर तरह के ऐब और कमी से पाक है)। वह सलाम है (अपने बंदों को तमाम ख़तरों से सलामत रखने वाला है)। वह मोमिन है (अमन देने वाला है)। वह मुहैमिन है (हर चीज़ की निगरानी और हिफ़ाज़त करने वाला है)।
मैं गवाही देता हूँ कि ईसा (अलैहिस्सलाम) अल्लाह तआला की वह रूह और कलिमा हैं जिसे उसने बहुत पाक, इफ़्फ़त वाली और दुनिया की हर तरह की ज़िंदगी से पूरी तरह अलग रहने वाली मरयम में डाला। इस तरह वह ईसा से हामिला हुईं। अल्लाह तआला ने जिस तरह आदम को अपनी क़ुदरत से पैदा किया, उसी तरह ईसा को भी पैदा किया।
ऐ बादशाह! मैं तुम्हें उस अल्लाह तआला पर, जिसका न कोई हमसर है न शरीक, ईमान लाने, उसकी इबादत करने, मेरी पैरवी करने और अल्लाह तआला ने मुझ पर जो कुछ उतारा है उस पर यक़ीन करने की दावत देता हूँ, क्योंकि मैं अल्लाह तआला का वह रसूल हूँ जिसे इन बातों को पहुँचाने का हुक्म दिया गया है। अब मैंने तुम्हें ज़रूरी पैग़ाम पहुँचा दिया है और दुनिया व आख़िरत की ख़ुशनसीबी दिलाने वाली नसीहत कर दी है। मेरी नसीहत क़बूल करो! हिदायत पाने वालों, सीधे रास्ते पर आने वालों पर सलाम हो।”
बादशाह असहमा ने रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का ख़त बड़े अदब और आजिज़ी से सुना और फ़ौरन कलिमा-ए-शहादत पढ़कर मुसलमान हो गए:
“अशहदु अल्ला इलाह इल्लल्लाह व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू।” फिर कहा: “मैं क़सम खाता हूँ कि वह वही नबी हैं जिनके आने का अहले किताब यहूदी और ईसाई इंतिज़ार कर रहे थे और जिनके आने की ख़ुशख़बरी पहले नबियों ने दी थी। अगर मेरे लिए उनके पास जाना मुमकिन होता, तो मैं ज़रूर जाता और उनकी ख़िदमत का शरफ़ हासिल करता!” उन्होंने ख़त को इज़्ज़त के साथ एक ख़ूबसूरत संदूक़ में रखा और कहा: “जब तक ये ख़त यहाँ रहेंगे, हब्शा से ख़ैर और बरकत नहीं जाएगी।”3 नज्जाशी असहमा ने दूसरे ख़त में बताए गए हुक्म इज़्ज़त के साथ पढ़े और नबवी हुक्म के मुताबिक़ हमारे प्यारे नबी की मुबारक ज़ौजा, हमारी माँ उम्मे हबीबा का निकाह रसूल-ए-अकरम से पढ़ाया। इसके बाद उन्होंने उम्मे हबीबा और वहाँ मौजूद सहाबा-ए-किराम की लगभग दो महीने मेहमाननवाज़ी की, फिर उन्हें जहाज़ों में सवार करके बहुत-से तोहफ़ों के साथ मदीना रवाना कर दिया। उनके साथ भेजे गए ख़त में उन्होंने बताया कि वह ईमान ला चुके हैं।
रूम के बादशाह हिरक़्ल के नाम ख़त
हज़रत दिहया कल्बी को रूम के बादशाह को इस्लाम की दावत देने का काम सौंपा गया था। उन्हें ख़त बुसरा में ग़स्सान के हाकिम हारिस को देना था और वह उसे रूम के बादशाह हिरक़्ल के पास भेजता। नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का दावतनामा बड़ी इज़्ज़त से लेकर हज़रत दिहया तेज़ी से बुसरा पहुँचे। हारिस से मिलकर सारा हाल बताया। हारिस ने अदी इब्ने हातिम को, जो अभी मुसलमान नहीं हुआ था, दिहया के साथ कर दिया और दोनों को हिरक़्ल के पास भेजा, जो उस वक़्त बैतुल मुक़द्दस (यरूशलम) में था। दोनों साथ-साथ बैतुल मुक़द्दस पहुँचे और बादशाह से मुलाक़ात की राहें ढूँढने लगे। बादशाह के आदमियों ने उनसे कहा: “जब तुम क़ैसर के दरबार में जाओगे, तो सिर झुकाकर चलोगे और क़रीब पहुँचकर ज़मीन पर गिरकर सज्दा करोगे। जब तक वह सज्दे से उठने की इजाज़त न दे, हरगिज़ ज़मीन से सिर न उठाओगे।” ये बातें हज़रत दिहया को भारी लगीं और उन्होंने उनसे फ़रमाया: “हम मुसलमान अल्लाह तआला के सिवा किसी को सज्दा नहीं करते। फिर इंसान का इंसान को सज्दा करना उसकी फ़ितरत के ख़िलाफ़ है।” इस पर क़ैसर के आदमियों ने कहा: “तब तो क़ैसर तुम्हारा लाया हुआ ख़त कभी क़बूल नहीं करेगा और तुम्हें अपने दरबार से निकाल देगा।” हज़रत दिहया ने फ़रमाया: “हमारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम सज्दा तो दूर, इसकी भी इजाज़त नहीं देते कि कोई आपके सामने ज़रा-सा झुके। जो आपसे मिलना चाहे, चाहे वह ग़ुलाम ही क्यों न हो, आप उस पर तवज्जुह फ़रमाते हैं। उसे अपने पास आने देते हैं, उसका दुख सुनते हैं, उसकी तकलीफ़ दूर करते हैं, उसका दिल रखते हैं। इसीलिए आपकी पैरवी करने वाले सब आज़ाद और इज़्ज़त वाले हैं।”
“मैं क़सम खाता हूँ कि वह वही नबी हैं जिनके आने का अहले किताब यहूदी और ईसाई इंतिज़ार कर रहे थे और जिनके आने की ख़ुशख़बरी पहले नबियों ने दी थी” नज्जाशी असहमा (रहमतुल्लाहि अलैहि)
ये बातें सुनने वालों में से एक ने कहा: “अगर तुम क़ैसर को सज्दा नहीं करोगे, तो अपने ज़िम्मे लिया हुआ काम पूरा करने के लिए मैं तुम्हें दूसरा रास्ता बताता हूँ। महल के सामने क़ैसर के आराम करने की एक जगह है। वह हर दिन दोपहर के बाद इस आँगन में आता है और वहाँ टहलता है। वहाँ एक मिम्बर है। उस पर कोई तहरीर हो, तो वह पहले उसे उठाकर पढ़ता है, फिर आराम करता है। तुम अभी जाओ, ख़त उस मिम्बर पर रख दो और बाहर इंतिज़ार करो। ख़त देखकर वह तुम्हें बुलवाएगा। उस वक़्त तुम अपना काम पूरा कर लेना।”
इस पर हज़रत दिहया ने ख़त बताई हुई जगह पर रख दिया। हिरक़्ल ने ख़त उठाया और अरबी जानने वाला एक तर्जुमान मँगवाया। तर्जुमान ने रसूलुल्लाह का ख़त पढ़ना शुरू किया। ख़त में सबसे ऊपर लिखा था: “बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम! अल्लाह तआला के रसूल मुहम्मद (अलैहिस्सलाम) की तरफ़ से रूमियों के बड़े हिरक़्ल के नाम।” हिरक़्ल का भतीजा यन्नाक़ ख़त की इस शुरुआत पर बहुत ग़ुस्सा हुआ और उसने तर्जुमान के सीने पर ज़ोर का घूँसा मारा। घूँसे की चोट से तर्जुमान ज़मीन पर गिर पड़ा और मुबारक ख़त उसके हाथ से छूट गया। हिरक़्ल ने यन्नाक़ से पूछा: “तुमने ऐसा क्यों किया?” तो उसने कहा: “क्या आप ख़त नहीं देख रहे? उसने ख़त आपके नाम से पहले अपने नाम से शुरू किया है, और आपको बादशाह कहे बग़ैर ‘रूमियों के बड़े हिरक़्ल के नाम’ लिखा है। उसने ‘रूमियों के बादशाह के नाम’ क्यों नहीं लिखा और पहले आपके नाम से शुरू क्यों नहीं किया? उसका ख़त आज नहीं पढ़ा जाएगा।”
इस पर हिरक़्ल ने कहा: “अल्लाह की क़सम, या तो तुम बहुत बेअक़्ल हो या निरे पागल। मुझे मालूम न था कि तुम ऐसे हो। मैंने अभी यह भी नहीं देखा कि ख़त में क्या लिखा है, और तुम उसे फाड़कर फेंक देना चाहते हो? मुझे अपनी जान की क़सम, अगर वह, जैसा कि ख़ुद कहते हैं, अल्लाह के रसूल हैं, तो उन्हें हक़ है कि अपने ख़त में मेरे नाम से पहले अपना नाम लिखें और मुझे रूमियों का बड़ा कहकर याद करें। मैं तो बस उनका मालिक हूँ, उनका बादशाह नहीं।” यह कहकर उसने यन्नाक़ को अपने दरबार से निकाल दिया। फिर उसने ईसाइयों के सबसे बड़े आलिम, उनके सरदार और अपने सलाहकार उस्क़ुफ़ नाम के आदमी को बुलवाया। ख़त उसे पढ़वाया। ख़त में आगे यूँ फ़रमाया गया था: “अल्लाह तआला की हिदायत की पैरवी करने वालों, सीधे रास्ते पर आने वालों पर सलाम हो!” इसके बाद: “(ऐ रूमियों के बड़े!) मैं तुम्हें इस्लाम की दावत देता हूँ। इस्लाम क़बूल करो, सलामत रहोगे। मुसलमान हो जाओ, अल्लाह तआला तुम्हें दोगुना अज्र देगा। अगर मुँह मोड़ोगे, तो तमाम ईसाइयों का वबाल तुम्हारी गर्दन पर होगा। (ऐ मेरे रसूल!) कहो: ’ऐ अहले किताब (यहूदियो और ईसाइयो)! आओ उस बात की तरफ़ जो हमारे और तुम्हारे दरमियान एक जैसी है: हम अल्लाह तआला के सिवा किसी चीज़ की इबादत न करें, उसके साथ किसी चीज़ को शरीक न ठहराएँ, और अल्लाह तआला को छोड़कर हममें से कोई किसी को पैदा करने वाला रब न माने। फिर अगर वे इस बात से मुँह मोड़ें, तो कह दो: गवाह रहो, हम सच्चे मुसलमान हैं।’”4
रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का ख़त पढ़ा जा रहा था और हिरक़्ल की पेशानी से पसीने की बूँदें टपक रही थीं। ख़त ख़त्म हुआ तो उसने कहा: “सुलेमान अलैहिस्सलाम के बाद मैंने ‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम’ से शुरू होने वाला कोई ख़त नहीं देखा था।” हिरक़्ल ने इस मामले में उस्क़ुफ़ की राय पूछी तो उस्क़ुफ़ ने कहा:
“अल्लाह की क़सम, यह वही नबी हैं जिनके हमारे पास आने की ख़ुशख़बरी मूसा और ईसा (अलैहिमस्सलाम) ने दी थी। हम तो इन्हीं के आने का इंतिज़ार कर रहे थे।”
हिरक़्ल ने पूछा: “इस मामले में तुम मुझे क्या करने का मशवरा देते हो, क्या मुनासिब समझते हो?” उस्क़ुफ़ ने जवाब दिया: “मैं यही मुनासिब समझता हूँ कि तुम उनकी पैरवी करो।” हिरक़्ल ने कहा: “तुम जो कहते हो, उसे मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ। लेकिन उनकी पैरवी करके मुसलमान हो जाने की मुझमें ताक़त नहीं, क्योंकि तब मेरी बादशाहत भी जाएगी और लोग मुझे क़त्ल भी कर देंगे।” इसके बाद उसने हज़रत दिहया और अदी इब्ने हातिम को बुलवाया। अदी ने कहा: “ऐ बादशाह! भेड़-बकरियों और ऊँटों वाले अरबों में से ये साहब, जो मेरे साथ हैं, अपने मुल्क में होने वाले एक अजीब वाक़िए का ज़िक्र करते हैं।” हिरक़्ल ने पूछा: “तुम्हारे मुल्क में क्या वाक़िआ हुआ है?” तो हज़रत दिहया ने कहा: “हमारे दरमियान एक बुज़ुर्ग ज़ाहिर हुए हैं। उन्होंने एलान किया है कि वह नबी हैं। लोगों का एक हिस्सा उनकी पैरवी कर रहा है और एक हिस्सा उनका मुक़ाबला कर रहा है। हम ईमान लाने वालों और ईमान न लाने वालों के बीच लड़ाइयाँ हो रही हैं।”
इसके बाद हिरक़्ल ने नबी-ए-करीम के बारे में तहक़ीक़ शुरू की। उसने दमिश्क़ के हाकिम को हुक्म दिया कि रसूल-ए-अकरम के ख़ानदान का कोई आदमी ढूँढकर लाया जाए। इसी दौरान उसने रोम में रहने वाले अपने एक दोस्त आलिम को, जो इब्रानी ज़बान जानता था, ख़त लिखकर यह मामला पूछा। रोम के उस दोस्त की तरफ़ से ख़त आया कि जिनका उसने ज़िक्र किया है, वह आख़िरी ज़माने के नबी हैं। उधर दमिश्क़ के हाकिम की मुलाक़ात तिजारत के लिए जाने वाले क़ुरैश के एक क़ाफ़िले से हुई। उनमें क़ुरैश का सरदार अबू सुफ़यान भी था, जो अभी मुसलमान नहीं हुआ था। अबू सुफ़यान बयान करता है: “हम ग़ज़्ज़ा में थे कि हिरक़्ल का दमिश्क़ वाला हाकिम इस तरह आया जैसे हम पर हमला करने आया हो और पूछा: ‘क्या तुम हिजाज़ के उन साहब की क़ौम में से हो?’ हमने कहा: ‘हाँ।’ उसने कहा: ‘चलो, तुम हमारे साथ बादशाह के पास चलोगे!’” वह अबू सुफ़यान और उसके साथियों को दमिश्क़ ले गया। दमिश्क़ के हाकिम ने अबू सुफ़यान और उसके साथियों को हिरक़्ल के सामने पेश किया। उस वक़्त हिरक़्ल बैतुल मुक़द्दस में था। वह अपने वज़ीर के साथ सिर पर ताज पहने बैठा था। हिरक़्ल ने अबू सुफ़यान और उसके साथ के लगभग तीस मक्का वालों को वहीं अपने सामने बुलाया।
उसने तर्जुमान बुलवाया और उनसे पूछा: “जो साहब अपने आपको नबी कहते हैं, तुममें से नसब में उनके सबसे क़रीब कौन है?” अबू सुफ़यान ने जवाब दिया: “नसब में उनके सबसे क़रीब मैं हूँ।” हिरक़्ल ने कहा कि अबू सुफ़यान को अपने पास लाया जाए और बाक़ी लोग अबू सुफ़यान के पीछे खड़े हों। हिरक़्ल ने पूछा: “तुम्हारी रिश्तेदारी क्या है?” तो उसने कहा: “वह मेरे चचा के बेटे हैं।” (दरअसल अबू सुफ़यान के दादा उमय्या हैं, और रसूलुल्लाह के दादा अब्दुल मुत्तलिब। दोनों के दादा आपस में चचाज़ाद भाई हैं। इसी लिहाज़ से उसने “मेरे चचा के बेटे” कहा। दोनों का नसब दादाओं के दादा अब्दे मनाफ़ पर जाकर मिल जाता है।) अबू सुफ़यान ने शुरू में झूठ बोला भी, मगर बादशाह की धमकी से डर गया और ज़्यादा झूठ न बोल सका।
“अल्लाह की क़सम, यह वही नबी हैं जिनके हमारे पास आने की ख़ुशख़बरी मूसा और ईसा (अलैहिमस्सलाम) ने दी थी। हम तो इन्हीं के आने का इंतिज़ार कर रहे थे” बैतुल मुक़द्दस का उस्क़ुफ़
फिर उनके बीच यह बातचीत हुई। हिरक़्ल: – जो साहब अपने आपको नबी कहते हैं, तुम्हारे बीच उनका नसब कैसा है? – वह अपने ज़माने में सबसे अच्छे नसब वाले हैं। नसब के लिहाज़ से वह हममें सबसे चुने हुए हैं। – क्या तुममें उनसे पहले किसी ने नबी होने का दावा किया था? – नहीं किया। – क्या उनके बाप-दादा में कोई बादशाह गुज़रा है? – नहीं। – उनकी पैरवी क़ौम के बड़े लोग करते हैं या ग़रीब और कमज़ोर? – उनकी पैरवी करने वाले ग़रीब, कमज़ोर, जवान और औरतें हैं। क़ौम के बूढ़ों और बड़े लोगों में से उनकी पैरवी करने वाले बहुत कम हैं। – उनकी पैरवी करने वाले बढ़ रहे हैं या घट रहे हैं? – बढ़ रहे हैं। – क्या कोई ऐसा है जो उनके दीन में दाख़िल होने के बाद उसे नापसंद करके या नाराज़ होकर फिर गया हो? – नहीं है। – नबी होने की बात कहने से पहले क्या कभी उन्हें झूठ बोलते देखा गया? – नहीं। – क्या उस नबी ने कभी अपना अहद तोड़ा या अपनी बात से फिरे? – नहीं, ऐसा नहीं हुआ। लेकिन अब हमने उनसे एक मुद्दत तक न लड़ने का समझौता किया है। इस मुद्दत में वह क्या करेंगे, हम नहीं जानते। – वह तुम्हें किस बात का हुक्म देते हैं? – वह हुक्म देते हैं कि सिर्फ़ एक अल्लाह की इबादत करें और उसके साथ किसी चीज़ को शरीक न ठहराएँ। हमारे बाप-दादा जिन चीज़ों (बुतों) को पूजते थे, उन्हें पूजने से हमें मना करते हैं। नमाज़ पढ़ने, सच बोलने, ग़रीबों की मदद करने, हराम से बचने, अहद पूरा करने, अमानत में ख़यानत न करने और रिश्तेदारों से मिलते-जुलते रहने का हुक्म देते हैं। ये बातें बैतुल मुक़द्दस में हुईं, और रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का मुबारक ख़त वहीं पढ़ा गया। हिरक़्ल ने ख़त को चूमकर आँखों से लगाया और सिर पर रखा, तो रूमियों के बीच शोर और भी बढ़ गया।
बादशाह ने अबू सुफ़यान और उसके साथ के क़ुरैशियों को बाहर निकालने का हुक्म दिया। अबू सुफ़यान ने, जो अभी मुसलमान नहीं हुआ था, वहीं क़सम खाकर कहा था कि उसे यक़ीन है कि हमारे प्यारे नबी का काम कामयाबी से पूरा होगा। हज़रत दिहया हिरक़्ल के सामने खड़े हुए और अपने मुबारक ख़ूबसूरत चेहरे और मीठी आवाज़ से कहा: “ऐ क़ैसर! मुझे तुम्हारे पास बुसरा से एक शख़्स (हारिस) ने भेजा है, जो तुमसे बेहतर है। अल्लाह तआला की क़सम, जिस हस्ती (रसूलुल्लाह) ने मुझे उसके पास भेजा है, वह उससे भी और तुमसे भी बेहतर हैं। तुम्हें चाहिए कि मेरी बातें आजिज़ी से सुनो और दी गई नसीहतें क़बूल करो! आजिज़ी करोगे, तभी नसीहतों को समझोगे। नसीहतें क़बूल न करोगे, तो इंसाफ़ वाले न बन सकोगे!”
हिरक़्ल ने कहा: “आगे कहो।” तो हज़रत दिहया ने कहा: “तो फिर मैं तुम्हें उस अल्लाह तआला पर ईमान लाने की दावत देता हूँ जिसके लिए ईसा अलैहिस्सलाम नमाज़ पढ़ा करते थे। मैं तुम्हें इस उम्मी (जिसने पढ़ना-लिखना नहीं सीखा) नबी पर ईमान लाने की दावत देता हूँ, जिनके आने की ख़ुशख़बरी पहले मूसा अलैहिस्सलाम ने, फिर ईसा अलैहिस्सलाम ने दी थी। अगर तुम इस बारे में कुछ जानते हो और दुनिया व आख़िरत की ख़ुशनसीबी हासिल करना चाहते हो, तो इन बातों को अपनी आँखों के सामने रखो। वरना आख़िरत की ख़ुशनसीबी हाथ से खो बैठोगे और कुफ़्र और शिर्क में पड़े रह जाओगे। यह भी अच्छी तरह जान लो कि तुम्हारा रब अल्लाह तआला ज़ालिमों को हलाक करने वाला और नेमतों को बदल देने वाला है।”
हिरक़्ल ने कहा: “मेरे हाथ कोई तहरीर आए, तो मैं उसे पढ़े बग़ैर नहीं छोड़ता, और मेरे पास कोई आलिम आए, तो जो बातें मैं नहीं जानता, उनसे पूछकर सीखे बग़ैर उसे नहीं जाने देता। इससे मुझे भलाई और नेकी के सिवा कुछ नहीं मिलता। तुम मुझे इतनी मोहलत दो कि मैं सोच-समझकर हक़ीक़त तक पहुँच जाऊँ।” बाद में हिरक़्ल ने हज़रत दिहया को अपने पास बुलाकर अकेले में बात की। अपने दिल की बात यूँ खोली: “मैं जानता हूँ कि जिन्होंने तुम्हें भेजा है, वह वही आख़िरी ज़माने के नबी हैं जिनके आने की ख़ुशख़बरी किताबों में दी गई है और जिनका इंतिज़ार किया जा रहा था। लेकिन अगर मैं उनकी पैरवी करूँ, तो डरता हूँ कि रूमी मुझे क़त्ल कर देंगे। मैं तुम्हें सफ़ातिर के पास भेजता हूँ – वह उनका सबसे बड़ा आलिम है और वे उसे मुझसे भी ज़्यादा मानते हैं। तमाम ईसाई उसकी पैरवी करते हैं। अगर वह ईमान ले आए, तो सारे रूमी ईमान ले आएँगे। तब मैं भी अपने दिल की बात और अपना अक़ीदा खुलकर ज़ाहिर कर दूँगा।”
इसके बाद हिरक़्ल ने एक ख़त लिखकर हज़रत दिहया को दिया और उन्हें सफ़ातिर के पास भेजा।
राहिब सफ़ातिर
रसूलुल्लाह ने सफ़ातिर को भी ख़त भेजा था। सफ़ातिर ने ख़त पढ़े और नबी-ए-करीम की सिफ़ात सुनीं, तो कहा कि इसमें ज़रा भी शक नहीं कि आप वही आख़िरी ज़माने के नबी हैं जिनके आने की ख़बर हज़रत मूसा और हज़रत ईसा ने दी थी, और वह ईमान ले आए। फिर अपने घर गए, दरवाज़ा बंद कर लिया और हर इतवार को होने वाले अपने वाज़ के लिए तीन हफ़्ते तक बाहर न निकले। ईसाई चिल्लाने लगे: “सफ़ातिर को क्या हो गया है कि उस अरब से मिलने के बाद से बाहर ही नहीं निकलते? हम उन्हें देखना चाहते हैं!”
सफ़ातिर ने अपना काला राहिबों वाला लिबास उतारा। सफ़ेद लिबास पहना, हाथ में अपना असा लिया और गिरजा आए। शहर के लोगों को जमा करके खड़े हुए और कहा: “ऐ ईसाइयो! जान लो कि हमारे पास अहमद (अलैहिस्सलाम) की तरफ़ से ख़त आया है। वह हमें सच्चे दीन की दावत देते हैं। मैं साफ़ तौर पर जानता हूँ और यक़ीन रखता हूँ कि वह अल्लाह तआला के सच्चे रसूल हैं।” ईसाइयों ने यह सुना तो सफ़ातिर पर टूट पड़े और मार-मारकर उन्हें शहीद कर दिया। हज़रत दिहया ने आकर हिरक़्ल को सारा हाल बताया।
हिरक़्ल ने कहा: “क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था? ईसाइयों के नज़दीक सफ़ातिर मुझसे भी ज़्यादा प्यारा और इज़्ज़त वाला है। अगर वे ऐसी बात मुझसे सुनते, तो मुझे भी उसी की तरह क़त्ल कर देते।” ज़ुहरी की जो रिवायत बुख़ारी की “सहीह” में ज़िक्र की गई है, उसमें यूँ है: “हिरक़्ल ने हिम्स के अपने महल में रूमियों के बड़े लोगों को बुलवाया और दरवाज़े बंद करने का हुक्म दिया। फिर एक ऊँची जगह पर चढ़कर कहा: ‘ऐ रूम के लोगो! क्या तुम ख़ुशनसीबी और चैन पाना, अपनी हुकूमत का मज़बूती से क़ायम रहना और हज़रत ईसा की कही हुई बात की पैरवी करना चाहते हो?’ रूमियों ने पूछा: ‘ऐ हमारे बादशाह! इन्हें हासिल करने के लिए हम क्या करें?’ हिरक़्ल ने कहा: ‘ऐ रूम के लोगो! मैंने तुम्हें एक भलाई के काम के लिए जमा किया है। मेरे पास हज़रत मुहम्मद का ख़त आया है। वह मुझे इस्लाम के दीन की दावत देते हैं। अल्लाह की क़सम, यह वही नबी हैं जिनके आने का हम इंतिज़ार करते रहे, जिनका ज़िक्र हमने अपनी किताबों में लिखा पाया और जिनकी निशानियाँ हम जानते हैं। आओ, उनकी पैरवी करके दुनिया और आख़िरत में सलामती पाएँ।’ इस पर सब बुरी बातें कहते और बड़बड़ाते हुए बाहर भागने के लिए दरवाज़ों की तरफ़ दौड़े। लेकिन दरवाज़े बंद होने की वजह से निकल न सके। हिरक़्ल ने रूमियों की यह हरकत देखी और समझ गया कि वे इस्लाम से किस तरह दूर भाग रहे हैं; वह अपनी जान के लिए डर गया और कहा: ‘ऐ रूम के लोगो! मेरी कही हुई बातें यह परखने के लिए थीं कि तुम अपने दीन से कितने जुड़े हुए हो। अपने दीन से तुम्हारी वाबस्तगी और मुझे ख़ुश करने वाला तुम्हारा रवैया मैंने अपनी आँखों से देख लिया।’ इस पर रूमियों ने हिरक़्ल को सज्दा किया और महल के दरवाज़े खुलने पर निकलकर चले गए।”5 हिरक़्ल ने हज़रत दिहया को बुलवाया और जो कुछ हुआ था, बताया। उन्हें एक से बढ़कर एक क़ीमती तोहफ़े दिए। इसके अलावा उसने नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को एक ख़त लिखा। अपना ख़त और तैयार करवाए हुए तोहफ़े हज़रत दिहया के हाथ हमारे प्यारे नबी के पास भेजे।
“इसमें ज़रा भी शक नहीं कि वह वही आख़िरी ज़माने के नबी हैं जिनके आने की ख़बर हज़रत मूसा और हज़रत ईसा ने दी थी” राहिब सफ़ातिर
हिरक़्ल मुसलमान होना चाहता था, लेकिन अपना ओहदा छिन जाने और मौत के डर से ईमान न लाया। नबी-ए-करीम को लिखे गए उसके ख़त में यूँ कहा गया था: “अल्लाह के रसूल मुहम्मद के नाम, जिनकी ख़ुशख़बरी हज़रत ईसा ने दी थी, रूम के बादशाह क़ैसर की तरफ़ से! आपके सफ़ीर आपका ख़त लेकर मेरे पास आए। मैं गवाही देता हूँ कि आप अल्लाह के सच्चे रसूल हैं, क्योंकि हमने आपको इंजील में लिखा हुआ पाया, और हज़रत ईसा ने हमें आपकी ख़ुशख़बरी दी थी। मैंने रूमियों को आप पर ईमान लाने की दावत दी, मगर वे इसके क़रीब भी न आए। अगर वे मेरी बात मानते, तो यह यक़ीनन उनके लिए बेहतर होता। मेरी बड़ी आरज़ू है कि आपके पास रहूँ, आपकी ख़िदमत करूँ और आपके पाँव धोऊँ।” हज़रत दिहया हिरक़्ल के पास से रवाना होकर हिस्मा पहुँचे। रास्ते में, जुज़ाम की वादियों में से शनार की वादी में हुनैद इब्ने ऊस, उसके बेटे और उसके आदमियों ने हज़रत दिहया को लूट लिया। पुराने कपड़ों के सिवा उनके पास जो कुछ था, सब ले गए। इस इलाक़े में ज़ुबैब इब्ने रिफ़ाआ इब्ने ज़ैद और उनकी क़ौम इस्लाम क़बूल कर चुके थे। दिहया ने उनके पास आकर सारा हाल बताया, तो उन्होंने हुनैद इब्ने ऊस और उसके क़बीले पर चढ़ाई की और सारा सामान वापस ले आए।
बाद में रसूलुल्लाह ने हुनैद इब्ने ऊस और उसके आदमियों पर ज़ैद इब्ने हारिसा को भेजा। उस इलाक़े में रहने वाले सब ईमान ले आए। मदीना पहुँचकर हज़रत दिहया अपने घर भी न गए, सीधे हबीब-ए-अकरम के दरवाज़े पर पहुँचे। दरवाज़ा खटखटाया। हमारे नबी ने पूछा: “कौन है?” दिहया ने कहा: “दिहयतुल कल्बी।” सारे जहानों के सरदार ने फ़रमाया: “अंदर आ जाओ।” हज़रत दिहया अंदर आए और जो कुछ हुआ था, सब तफ़सील से बयान कर दिया। नबी-ए-करीम को हिरक़्ल का ख़त पढ़कर सुनाया। रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “वह अभी कुछ मुद्दत और (तख़्त पर) रहेगा। जब तक मेरा ख़त उनके पास रहेगा, उनकी बादशाहत क़ायम रहेगी।”
हिरक़्ल ने अपने ख़त में लिखा तो था कि वह हमारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर ईमान ले आया है, मगर रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “वह झूठ बोलता है। वह अपने दीन से नहीं फिरा।” हिरक़्ल ने हमारे प्यारे नबी का ख़त रेशमी अतलस में लपेटकर सोने के एक गोल संदूक़चे में महफ़ूज़ रखा। हिरक़्ल के ख़ानदान ने इस ख़त को सँभालकर रखा और इसे सबसे छिपाए रखा। वे कहते थे और यक़ीन रखते थे कि जब तक यह ख़त उनके हाथ में रहेगा, उनकी बादशाहत क़ायम रहेगी। सचमुच ऐसा ही हुआ।6
मिस्र के बादशाह मुक़ौक़िस के नाम ख़त
रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हातिब इब्ने अबी बल्तआ को मिस्र के बादशाह के पास भेजने से पहले पूछा: “ऐ मेरे सहाबा! तुममें से कौन अल्लाह तआला से इसका बदला पाने की उम्मीद पर यह ख़त मिस्र के बादशाह के पास ले जाएगा?” तो हज़रत हातिब अपनी जगह से उछलकर खड़े हो गए और कहा: “या रसूलल्लाह! मैं ले जाऊँगा!” हमारे नबी ने फ़रमाया: “ऐ हातिब! अल्लाह तआला तुम्हारे इस काम को तुम्हारे हक़ में मुबारक करे!” हज़रत हातिब इब्ने अबी बल्तआ ने ख़त हमारे प्यारे नबी से लिया। रुख़सत होकर अपने घर गए। अपनी सवारी तैयार की। घर वालों से भी रुख़सत होकर सफ़र पर निकल पड़े। हज़रत हातिब को मालूम हुआ कि मिस्र का बादशाह मुक़ौक़िस इस्कंदरिया में है, और वह उसके महल तक जा पहुँचे। दरबान ने अंदर ले जाने से पहले ही उनका मक़सद जान लिया; उसने हज़रत हातिब की बहुत इज़्ज़त की और उन्हें ज़रा भी इंतिज़ार न कराया। मुक़ौक़िस उस वक़्त समुंदर में एक जहाज़ पर अपने आदमियों से बात कर रहा था। हज़रत हातिब एक नाव में सवार होकर उस जगह पहुँचे जहाँ मुक़ौक़िस था। उसे हमारे नबी का ख़त दिया। हातिब से ख़त लेकर मुक़ौक़िस ने पढ़ना शुरू किया:
“बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम!
अल्लाह तआला के बंदे और रसूल मुहम्मद की तरफ़ से क़िब्तियों (मिस्र के पुराने बाशिंदों) के बड़े मुक़ौक़िस के नाम! हिदायत की पैरवी करने वालों पर सलाम हो। मैं तुम्हें इस्लाम की दावत देता हूँ, ताकि तुम सलामती पाओ। मुसलमान हो जाओ, सलामत रहोगे और अल्लाह तआला के दोगुने अज्र के हक़दार बनोगे। अगर मुँह मोड़ोगे, तो तमाम क़िब्तियों का गुनाह तुम्हारी गर्दन पर होगा! ’(ऐ मेरे रसूल!) कहो: ऐ अहले किताब (यहूदियो और ईसाइयो)! आओ उस बात की तरफ़ जो हमारे और तुम्हारे दरमियान एक जैसी है: हम अल्लाह तआला के सिवा किसी चीज़ की इबादत न करें, उसके साथ किसी चीज़ को शरीक न ठहराएँ, और अल्लाह तआला को छोड़कर हममें से कोई किसी को पैदा करने वाला रब न माने। फिर अगर वे इस बात से मुँह मोड़ें, तो कह दो: गवाह रहो, हम सच्चे मुसलमान हैं!’”7
कायनात के सुल्तान का ख़त पढ़ा गया तो मुक़ौक़िस ने हज़रत हातिब से कहा: “ख़ैर हो!” मिस्र के बादशाह ने अपने सिपहसालारों और सल्तनत के बड़े लोगों को जमा किया और हातिब से बात शुरू की। उसने कहा: “मैं कुछ बातें पूछूँगा, जिन्हें मैं समझना चाहता हूँ, और इस बारे में तुमसे बात करूँगा।” हज़रत हातिब ने कहा: “शौक़ से, बात करें!” तो मुक़ौक़िस ने कहा: – जिन्होंने तुम्हें भेजा है, उनके बारे में मुझे बताओ। क्या वह नबी हैं? उनके बारे में कुछ बताओ! – हाँ, वह नबी हैं। – अगर वह सचमुच नबी हैं, तो उन्होंने अपनी उस क़ौम के ख़िलाफ़ बद्दुआ क्यों न की जिसने उन्हें उनके अपने वतन से निकालकर दूसरी जगह पनाह लेने पर मजबूर किया? – तुम ईसा इब्ने मरयम अलैहिस्सलाम के नबी होने पर ईमान रखते हो, है न? जब उनकी क़ौम ने उन्हें पकड़कर क़त्ल करना चाहा, तब भी उन्होंने उनके लिए बद्दुआ न की, और अल्लाह पाक ने उन्हें दुनिया के आसमान पर उठा लिया, उन्हें इनाम दिया। क्या उन्हें अपनी क़ौम की हलाकत के लिए अल्लाह तआला से बद्दुआ नहीं करनी चाहिए थी? मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया।
“ऐ हातिब! अल्लाह तआला तुम्हारे इस काम को तुम्हारे हक़ में मुबारक करे!” हदीस शरीफ़
– तुमने बहुत अच्छा जवाब दिया। सचमुच तुम एक हिकमत वाली हस्ती के पास से आए हुए दाना हो। आज की रात हमारे यहाँ ठहरो, कल मैं तुम्हें अपना जवाब दूँगा।
हज़रत हातिब ने हज़रत मूसा के ज़माने के फ़िरऔन की तरफ़ इशारा करते हुए मुक़ौक़िस से कहा: – तुमसे पहले यहाँ एक बादशाह था। उसने अपनी क़ौम से “सबसे बड़ा इलाह मैं हूँ!” कहकर रब होने का दावा किया था। अल्लाह तआला ने उसे दुनिया और आख़िरत के अज़ाब से सज़ा दी और उससे बदला लिया। तुम इससे इबरत हासिल करो, ऐसा न हो कि ख़ुद दूसरों के लिए इबरत बन जाओ! – हमारा एक दीन है। हम अपने इस दीन को, जब तक इससे बेहतर न मिले, नहीं छोड़ेंगे। – जिस दीन से तुम जुड़े हो और जिसके बारे में कहते हो कि इससे बेहतर न मिले तो नहीं छोड़ोगे, उससे बेहतर दीन बेशक इस्लाम है। हम तुम्हें अल्लाह तआला के इस आख़िरी दीन, इस्लाम की दावत देते हैं। अल्लाह तआला ने अपने दीन को इन नबी के ज़रिए मुकम्मल कर दिया और उन्हें इंसानों के लिए काफ़ी बना दिया, और यह बात यक़ीनी है। इन नबी ने सिर्फ़ तुम्हें नहीं, तमाम इंसानों को इस्लाम के दीन की दावत दी। उस वक़्त इंसानों में उनकी सबसे ज़्यादा मुख़ालफ़त करने वाले और उनसे सबसे सख़्ती से पेश आने वाले क़ुरैश थे, सबसे ज़्यादा दुश्मनी करने वाले यहूदी थे और उनके सबसे क़रीब ईसाई थे। अल्लाह तआला की क़सम, मूसा अलैहिस्सलाम का ईसा अलैहिस्सलाम की ख़ुशख़बरी देना बिल्कुल वैसा ही है जैसा ईसा अलैहिस्सलाम का मुहम्मद अलैहिस्सलाम की ख़ुशख़बरी देना। लिहाज़ा हमारा तुम्हें क़ुरआन-ए-करीम की दावत देना ऐसा ही है जैसा तुम्हारा यहूदियों को इंजील की दावत देना। बेशक तुम्हें मालूम है कि हर नबी ऐसी क़ौम की तरफ़ भेजा गया जो उन्हें समझ सके और पहचान सके, और उस क़ौम पर उस नबी की इताअत वाजिब हुई। तो तुम भी उन लोगों में से हो जिन्होंने इन नबी का ज़माना पाया है। हम तुम्हें इस नए दीन की दावत देते हैं।
हज़रत हातिब की इन बातों पर मुक़ौक़िस ने कहा: – मैंने इस नबी के हाल पर ग़ौर किया। उनके हुक्मों और मनाहियों में मुझे कोई ऐसी बात नहीं मिली जो अक़्ल के ख़िलाफ़ हो। जहाँ तक मैं समझा हूँ, वह न जादूगर हैं, न काहिन, न झूठे।
मैंने उनमें नुबुव्वत की निशानियों में से कुछ बातें पाईं। छिपी हुई बातों को ज़ाहिर कर देना इन निशानियों में से एक है। इन हस्ती से कुछ राज़ों की ख़बरें सामने आई हैं। फिर उसने कहा: “ज़रा कुछ और सोच लूँ!” और मोहलत माँगी।
रात को मुक़ौक़िस ने हज़रत हातिब को जगाया और बताया कि वह नबी-ए-करीम के बारे में और भी बहुत-से सवाल पूछना चाहता है।
फिर उनके बीच यह बातचीत हुई:
– अगर तुम मेरे सवालों का सही जवाब दो, तो मैं उनके बारे में तीन बातें पूछना चाहता हूँ।
– जो चाहो, पूछो! मैं तुमसे हमेशा सच ही कहूँगा।
– मुहम्मद लोगों को किस चीज़ की दावत देते हैं?
– सिर्फ़ एक अल्लाह तआला की इबादत करने की दावत देते हैं। दिन-रात में पाँच वक़्त की नमाज़ पढ़ने, रमज़ान के रोज़े रखने और दिए हुए क़ौल पर क़ायम रहने का हुक्म देते हैं। मुर्दार का गोश्त खाने से मना करते हैं।
“(ऐ मेरे रसूल!) कहो: ‘ऐ अहले किताब (यहूदियो और ईसाइयो)! आओ उस बात की तरफ़ जो हमारे और तुम्हारे दरमियान एक जैसी है: हम अल्लाह तआला के सिवा किसी चीज़ की इबादत न करें, उसके साथ किसी चीज़ को शरीक न ठहराएँ, और अल्लाह तआला को छोड़कर हममें से कोई किसी को पैदा करने वाला रब न माने। फिर अगर वे इस बात से मुँह मोड़ें, तो कह दो: गवाह रहो, हम सच्चे मुसलमान हैं!’” आले इमरान: 64
इसके बाद मुक़ौक़िस ने पूछा:
– उनकी शक्ल और शमाइल (ज़ाहिरी सूरत) मुझे बताओ! हातिब ने मुख़्तसर तौर पर बयान किया। बहुत-सी बातें नहीं गिनाईं। फिर मुक़ौक़िस ने कहा:
– कुछ बातें और रह गईं जो तुमने नहीं बताईं: उनकी आँखों में हल्की-सी सुर्ख़ी है, उनकी पीठ पर नुबुव्वत की मुहर है। वह गधे पर सवार होते हैं, सूफ़ (ऊनी कपड़ा) पहनते हैं, खजूर और थोड़े गोश्त वाले खाने पर गुज़ारा करते हैं। उनके चचा या चचाज़ाद भाई उनकी हिफ़ाज़त करते हैं। हज़रत हातिब ने कहा: – ये भी उनकी सिफ़ात हैं।
मुक़ौक़िस ने हज़रत हातिब से हमारे नबी के बारे में फिर पूछा: – क्या वह सुरमा लगाते हैं? – हाँ! आईना देखते हैं, बालों में कंघी करते हैं, सफ़र में भी और घर में भी आईना, सुरमेदानी, कंघी और मिस्वाक अपने पास से जुदा नहीं करते! – मैं जानता था कि अभी एक नबी आने बाक़ी हैं, और समझता था कि वह शाम (सीरिया) से निकलेंगे, क्योंकि पहले के नबी हमेशा वहीं से निकले थे। हालाँकि मैंने किताबों में यह भी देखा था कि आख़िरी नबी अरब में, सख़्ती, तंगी और मुफ़लिसी की सरज़मीन में ज़ाहिर होंगे। जिन नबी की सिफ़ात हमने किताबों में लिखी पाईं, उनके ज़ाहिर होने का वक़्त भी बेशक यही ज़माना है। हमने किताब में उनकी सिफ़त यूँ लिखी पाई थी: “दो बहनों को एक निकाह में जमा नहीं करते, तोहफ़ा क़बूल करते हैं, सदक़ा क़बूल नहीं करते। ग़रीबों और मिस्कीनों के साथ उठते-बैठते हैं।” उनकी पैरवी के मामले में क़िब्ती मेरी बात नहीं मानेंगे। मैं अपनी बादशाहत से भी अलग नहीं हो सकता। इस मामले में मैं बहुत कंजूस हूँ। वह नबी मुल्कों पर हुकूमत करेंगे, उनके बाद उनके सहाबा हमारी इस सरज़मीन तक आकर डेरा डालेंगे। आख़िरकार वे यहाँ वालों पर ग़ालिब आएँगे। मैं क़िब्तियों से इसका एक लफ़्ज़ भी नहीं कहूँगा, और न चाहता हूँ कि किसी को मेरी इस बातचीत की ख़बर हो!
इस बातचीत के बाद मुक़ौक़िस ने अरबी लिखने वाले अपने मुंशी को बुलवाया और हमारे नबी के ख़त का यह जवाब लिखवाया: “अब्दुल्लाह के बेटे मुहम्मद के नाम, क़िब्तियों के बड़े मुक़ौक़िस की तरफ़ से! आप पर सलाम हो। आपका भेजा हुआ ख़त मैंने पढ़ा। उसमें आपने जो ज़िक्र किया और जो दावत दी, उसे मैं समझ गया। मैं भी जानता था कि एक नबी आने वाले हैं। मगर मैं समझता था कि वह शाम से निकलेंगे। मैंने आपके सफ़ीर की इज़्ज़त और ख़ातिरदारी की। मैं आपके पास दो कनीज़ें, जिनकी क़िब्तियों में बड़ी क़द्र है, और पहनने के कपड़े भेज रहा हूँ। साथ ही आपकी सवारी के लिए एक मादा ख़च्चर भी तोहफ़े में भेजी है।” मुक़ौक़िस ने इसके सिवा कुछ न किया, मुसलमान भी न हुआ। उसने हज़रत हातिब को मिस्र में पाँच दिन मेहमान रखा। उनकी बहुत इज़्ज़त की, ख़ूब ख़ातिरदारी की। फिर कहा: “फ़ौरन अपने मुल्क, अपने आक़ा के पास लौट जाओ! मैंने उनके लिए दो कनीज़ें, दो सवारी के जानवर, एक हज़ार मिस्क़ाल (एक मिस्क़ाल 4.8 ग्राम) सोना, मिस्र के बने हुए बीस जोड़े बारीक कपड़े और दूसरे तोहफ़े भेजने का हुक्म दिया है। तुम्हें भी सौ दीनार और पाँच जोड़े कपड़े देने को कहा है। अब मेरे पास से चले जाओ! ख़बरदार, क़िब्ती तुम्हारे मुँह से एक लफ़्ज़ भी न सुनें!” इसके अलावा मुक़ौक़िस ने नबी-ए-करीम को बिल्लौर का एक प्याला, ख़ुशबूदार शहद, एक अमामा, मिस्र का ख़ास कतान का कपड़ा, अगर (ऊद की लकड़ी, Aquilaria) और मुश्क जैसी ख़ुशबुएँ, एक छड़ी, एक डिब्बे में सुरमेदानी, गुलाब का तेल, कंघी, क़ैंची, मिस्वाक, आईना, सुई और धागा भी तोहफ़े में भेजा।
मुक़ौक़िस ने इस्लाम के सफ़ीर हज़रत हातिब इब्ने अबी बल्तआ के साथ हिफ़ाज़त के लिए सिपाही साथ करके उन्हें रवाना किया। जब उन्होंने अरब की सरज़मीन पर क़दम रखा, तो उन्हें मदीना जाने वाला एक क़ाफ़िला मिला। हातिब ने मुक़ौक़िस के सिपाहियों को वापस भेज दिया और उस क़ाफ़िले में शामिल हो गए।
हातिब इब्ने अबी बल्तआ तोहफ़ों के साथ मदीना आकर रसूलुल्लाह की ख़िदमत में हाज़िर हुए। हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने मुक़ौक़िस के तोहफ़े क़बूल फ़रमाए। हातिब ने मुक़ौक़िस का ख़त पेश किया और उसकी बातें बयान कीं, तो नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “कितना बुरा आदमी है! अपनी बादशाहत की क़ुरबानी न दे सका। हालाँकि जो बादशाहत उसके ईमान लाने में रुकावट बनी, वह उसके पास रहने वाली नहीं!”8
मुक़ौक़िस ने हमारे नबी को तोहफ़े में जो दो कनीज़ें भेजी थीं, वे मारिया और उनकी बहन सीरीन थीं। हातिब इब्ने अबी बल्तआ ने रास्ते में उन्हें मुसलमान होने की दावत दी, तो वे क़बूल करके मुसलमान हो गई थीं। नबी-ए-करीम हमारी माँ हज़रत मारिया के मुसलमान होने पर बहुत ख़ुश हुए और उन्हें अपने निकाह का शरफ़ बख़्शा। उनसे आपके इब्राहीम नाम के एक बेटे पैदा हुए। सीरीन को आपने अपने सहाबा में से शायर-ए-नबी हस्सान इब्ने साबित को दे दिया।
सवारी के दोनों जानवर सबसे उम्दा नस्ल के थे और उनका सुरमई रंग सफ़ेदी से बहुत मिलता-जुलता था; उनमें से ख़च्चर का नाम दुलदुल और गधे का नाम उफ़ैर या याफ़ूर रखा गया। उस दिन तक अरब में सफ़ेद रंग का ख़च्चर नहीं देखा गया था। मुसलमानों ने जो पहला सफ़ेद ख़च्चर देखा, वह दुलदुल था। नबी-ए-करीम तोहफ़े में आए बिल्लौर के प्याले से पानी पिया करते थे। मुक़ौक़िस ने हमारे नबी के ख़त की बड़ी इज़्ज़त की और उसे हाथीदाँत के बने एक संदूक़चे में रख दिया।
संदूक़चे पर मुहर लगाई और अपनी एक कनीज़ के हवाले कर दिया। (यह ख़त हिजरी 1267 (ईसवी 1850) में मिस्र के अख़मीम इलाक़े में एक पुरानी ईसाई ख़ानक़ाह में क़िब्ती किताबों के बीच मिला। उस्मानी बादशाह, 96वें ख़लीफ़ा सुल्तान अब्दुल मजीद ख़ान ने इसे ख़रीद लिया, और इसे इस्तांबुल के तोपक़ापी महल में मुक़द्दस अमानतों के हिस्से में रखा गया।)
ईरान के किसरा ख़ुसरो परवेज़ के नाम ख़त
ईरान के बादशाह के पास अब्दुल्लाह इब्ने हुज़ाफ़ा भेजे गए थे। हज़रत अब्दुल्लाह ने घमंडी ईरानी किसरा (शाह) को सारे जहानों के सरदार का क़ीमती ख़त पेश किया, तो उसने पढ़ने के लिए उसे अपने मुंशी को दे दिया।
“बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम!
अल्लाह तआला के रसूल मुहम्मद (अलैहिस्सलाम) की तरफ़ से फ़ारस वालों के बड़े किसरा के नाम…”
मुंशी अभी यहीं तक पढ़ पाया था कि घमंडी शाह का ख़ून सिर पर चढ़ गया, वह ग़ुस्से से भड़क उठा और उसने ख़त छीनकर फाड़ डाला। उसे इस बात पर सख़्त ग़ुस्सा आया था कि नबी-ए-करीम ने ख़त अपने मुबारक नाम से शुरू किया था। जब उसने इस्लाम के सफ़ीर हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने हुज़ाफ़ा को भी अपने दरबार से निकालना चाहा, तो हज़रत अब्दुल्लाह ने किसरा और उसके पास जमा आतिशपरस्तों से यूँ कहा:
“ऐ अजम के लोगो! तुम नबियों पर ईमान नहीं लाते, किताबों को नहीं मानते। जिस ज़मीन पर रहते हो, उस पर अपने गिने-चुने दिन गुज़ार रहे हो, ख़्वाब जैसी ज़िंदगी जी रहे हो!…
“या अल्लाह! उसने (किसरा ने) जिस तरह मेरा ख़त फाड़ डाला, तू भी उसे और उसकी सल्तनत को उसी तरह टुकड़े-टुकड़े कर दे!…” हदीस शरीफ़
ऐ किसरा! तुमसे पहले बहुत-से बादशाह इस तख़्त पर बैठे और हुकूमत करते रहे। अल्लाह तआला के हुक्मों पर अमल करने वाले अपनी आख़िरत कमाकर, और अमल न करने वाले इलाही अज़ाब में गिरफ़्तार होकर इस दुनिया से कूच कर गए!…
ऐ किसरा! जो ख़त मैं लाकर पेश कर रहा हूँ, वह दरअसल तुम्हारे लिए बड़ी दौलत था। तुमने इसे हक़ीर समझा। अल्लाह तआला की क़सम, जिस दीन को तुमने हक़ीर समझा है, जब वह यहाँ आएगा, तो तुम भागने की जगह ढूँढोगे!…”
फिर वह किसरा का महल छोड़कर अपनी सवारी पर बैठे और तेज़ी से वहाँ से दूर हो गए। मदीना पहुँचकर उन्होंने कायनात के सुल्तान को हाल बताया, तो आपने फ़रमाया: “या अल्लाह! उसने जिस तरह मेरा ख़त फाड़ डाला, तू भी उसे और उसकी सल्तनत को उसी तरह टुकड़े-टुकड़े कर दे!…”
अल्लाह तआला ने अपने रसूल की दुआ क़बूल फ़रमाई: एक रात किसरा को उसके अपने बेटे ने ख़ंजर घोंपकर टुकड़े-टुकड़े कर दिया, और हज़रत उमर के ज़माने में ईरान की सारी ज़मीन फ़तह होकर मुसलमानों के हाथ में आ गई।9
ग़स्सान के बादशाह हारिस इब्ने अबी शिम्र के नाम ख़त
हज़रत शुजा इब्ने वह्ब ग़स्सान के बादशाह के पास भेजे गए थे। शुजा (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने पहले बादशाह के दरबान से बात की। उसे इस्लाम की दावत दी, तो उन्होंने क़बूल कर ली और रसूलुल्लाह की ख़िदमत में अपना अदब और सलाम अर्ज़ किया। उन्होंने हज़रत शुजा को ज़रा भी इंतिज़ार कराए बग़ैर बादशाह से मिलवा दिया। हारिस इब्ने अबी शिम्र ने ख़त पढ़ा तो ग़ुस्से में आकर उसे ज़मीन पर फेंक दिया। हज़रत शुजा फ़ौरन मदीना मुनव्वरा लौट आए और अल्लाह तआला के महबूब को सारा हाल बताया। हमारे प्यारे नबी को अपने ख़त के ज़मीन पर फेंके जाने का बहुत दुख हुआ और आपने फ़रमाया: “उसकी बादशाहत मिट जाए!” थोड़े ही दिनों बाद हारिस इब्ने अबी शिम्र मर गया और उसकी सल्तनत बिखर गई।10
यमामा के बादशाह हौज़ा इब्ने अली के नाम ख़त
सलीत इब्ने अम्र यमामा के बादशाह के पास भेजे गए थे। हौज़ा ईसाई था। नबी-ए-करीम ने अपने ख़त में यूँ फ़रमाया था: “बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम! अल्लाह तआला के रसूल मुहम्मद (अलैहिस्सलाम) की तरफ़ से हौज़ा इब्ने अली के नाम! हिदायत पाने वालों, सीधे रास्ते पर आने वालों पर सलाम हो! (ऐ हौज़ा!) जान लो कि इस्लाम उन दूर से दूर जगहों तक फैलेगा जहाँ तक ऊँट और घोड़े जा सकते हैं, और तमाम दीनों पर ग़ालिब आएगा। तुम भी इस्लाम क़बूल करो, सलामत रहोगे। अगर मुसलमान हो जाओ, तो तुम्हारी हुकूमत के नीचे की ज़मीनों का इंतिज़ाम फिर तुम्हारे ही हाथ में रहने दूँगा…”
यमामा के बादशाह हौज़ा ने इस मुबारक दावत को क़बूल करने से इंकार कर दिया। तख़्त की मुहब्बत और ओहदे के लालच ने उसकी आँखों पर पर्दा डाल दिया था। इसलिए वह कायनात के सुल्तान की दुआ पाने जैसी बड़ी दौलत से महरूम रह गया। इस्लाम के सफ़ीर हज़रत सलीत इब्ने अम्र ने उस पर तरस खाकर कहा:
“ऐ यमामा के बादशाह हौज़ा! तुम इस क़ौम के बड़े हो! जिन क़ैसरों को तुम बड़ा समझते हो, वे मरकर मिट्टी हो चुके।
असली बड़े तो वे लोग हैं जो अल्लाह तआला के हुक्मों पर अमल करके और उसकी मनाहियों से बचकर जन्नत के हक़दार बनते हैं। अगर कोई क़ौम ईमान लाकर इज़्ज़त पा चुकी हो, तो अपने बिगड़े हुए अक़ीदे के ज़रिए उसे सीधे रास्ते से भटकाने से बचो!… सच तो यह है कि मैं तुम्हें नसीहत करता हूँ कि अल्लाह तआला के हुक्मों पर अमल करो और उसकी मनाहियों से बचो। अगर अल्लाह तआला पर ईमान लाकर उसके हुक्मों पर अमल करोगे, तो जन्नत में दाख़िल होगे। अगर शैतान की पैरवी करोगे, तो जहन्नम में रहोगे।
अगर तुम मेरी ये नसीहतें क़बूल करो, तो जिन चीज़ों से डरते हो उनसे महफ़ूज़ रहोगे और जिनकी उम्मीद रखते हो उन्हें पा लोगे। और अगर मेरी नसीहतें ठुकराओगे, तो अब तुम्हारे लिए मेरे करने को कुछ बाक़ी नहीं रहा। आगे तुम ख़ुद सोच लो!…”
हौज़ा ने इस्लाम के सफ़ीर की ये अच्छी नसीहतें भी न सुनीं। सलीत इब्ने अम्र समझ गए कि अब यमामा में ठहरना बेकार है, और तेज़ी से मदीना लौट आए। हमारे प्यारे नबी को नतीजा बताया। रसूल-ए-अकरम को उसके इस्लाम में दाख़िल होने की ख़ुशनसीबी से महरूम रह जाने का दुख हुआ। थोड़े ही दिनों बाद हौज़ा के मरने की ख़बर आई। तख़्त की मुहब्बत और ओहदे का लालच उसकी क़ब्र में जाकर ख़त्म हुआ, जो जहन्नम का गढ़ा है।11
बहरैन के अमीर मुंज़िर इब्ने सावी के नाम ख़त
अला इब्ने हज़रमी भी बहरैन के अमीर के पास ख़त लेकर गए। अमीर ने मुबारक ख़त मुहब्बत से पढ़ा, उसका मज़मून समझा और ईमान की दौलत से मुशर्रफ़ हुए।
उन्होंने (नज्जाशी असहमा को छोड़कर) दूसरों की तरह यह नहीं कहा: “दूसरे मुझसे यह कहेंगे, वह कहेंगे; मैं अपने तख़्त से हाथ धो बैठूँगा।”
“अशहदु अल्ला इलाह इल्लल्लाह व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू!” कहकर उन्होंने ख़ुद को भी और अपनी रिआया में से अपनी पैरवी करने वालों को भी जहन्नम की आग से बचा लिया। ख़त के ज़रिए मुसलमान होने की दावत मिलने पर एक और ओहदे वाले ने ईमान लाने की समझदारी दिखाई। उनकी रिआया में से कुछ लोग उनकी पैरवी करके मुसलमान हो गए, और कुछ ईमान न लाए। मुंज़िर ने अपना हाल लिखकर अला इब्ने हज़रमी (रज़ियल्लाहु अन्हु) के ज़रिए हमारे प्यारे नबी की ख़िदमत में पेश किया। नबी-ए-करीम का जवाबी ख़त यह था: “तुम्हारी इताअत करने वालों को इस्लाम सिखाया जाए। जो सरकशी करें और ज़िद पर अड़े रहें, उन पर जिज़्या लगाया जाए। मजूसियों (आतिशपरस्तों) का ज़बह किया हुआ न खाया जाए और उनसे बेटियों के रिश्ते न लिए-दिए जाएँ।”
इस तरह इस्लाम के सात सफ़ीरों ने अपना फ़र्ज़ अदा किया और उस ज़माने की बड़ी सल्तनतों तक इस्लाम का पैग़ाम पहुँचा दिया। उन्होंने उन्हें हक़ीक़ी ख़ुशनसीबी की ख़बर दी और क़यामत के दिन “हमने तो सुना ही नहीं था” कहने की गुंजाइश न छोड़ी। ख़ुलासा यह कि ओहदे वालों में से दो ईमान लाए: एक नज्जाशी, दूसरे मुंज़िर। बाक़ी कुफ़्र पर क़ायम रहे। हब्शा के बादशाह असहमा (रहमतुल्लाहि अलैहि) को मुसलमान होने, कुछ सहाबा-ए-किराम को देखने, नबी-ए-करीम की मुबारक दुआ पाने और रसूलुल्लाह और उम्मे हबीबा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का निकाह पढ़ाने का शरफ़ हासिल हुआ।
“इलाही! उम्मे रूमान ने तेरी राह में और तेरे रसूल की ख़ातिर जो तकलीफ़ें उठाईं, वे तुझसे छिपी नहीं” हदीस शरीफ़
रूम के बादशाह हिरक़्ल और मिस्र के सुल्तान मुक़ौक़िस मुसलमान न हुए, लेकिन उन्होंने आए हुए ख़तों की बहुत इज़्ज़त की, नर्म जवाब दिए, सफ़ीरों के साथ अच्छा सुलूक किया और रसूलुल्लाह को तोहफ़े भेजे।
ग़स्सान और ईरान के बादशाहों ने सफ़ीरों के साथ अच्छा सुलूक न किया और अपनी दुश्मनी खुलकर ज़ाहिर कर दी। यमामा के बादशाह ने अलबत्ता इस्लाम के सफ़ीर के साथ नर्मी का बर्ताव किया।
हिजरत के छठे साल होने वाले दूसरे वाक़िआत
ख़ौला बिन्ते सअलबा इब्ने क़ैस इब्ने मालिक ख़ज़रजी और उनके शौहर औस इब्ने सामित इब्ने अहज़मी अन्सारी के बीच ज़िहार का मामला पेश आया, और सूरह मुजादला नाज़िल हुई। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने घुड़दौड़ और ऊँटों की दौड़ की इजाज़त दी। आपका ऊँट, जिससे उस वक़्त तक कोई आगे नहीं निकल सका था, एक बद्दू के ऊँट से पीछे रह गया, तो सहाबा को दुख हुआ, और आपने फ़रमाया: “हर कमाल का एक ज़वाल है, यानी हर चढ़ाई की एक उतराई है।”
हमारी माँ आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) की वालिदा उम्मे रूमान (रज़ियल्लाहु अन्हा) का इंतिक़ाल हुआ। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उनके जनाज़े की नमाज़ पढ़ाई और दफ़न में शरीक हुए। उन्हें क़ब्र में ख़ुद रसूलुल्लाह ने उतारा। नबी-ए-करीम ने उन्हें जन्नत की ख़ुशख़बरी दी और फ़रमाया: “जिसे जन्नत की हूरों में से किसी हूर को देखना पसंद हो, वह उम्मे रूमान को देख ले।” फिर उनके लिए मग़फ़िरत की दुआ करने के बाद फ़रमाया: “इलाही! उम्मे रूमान ने तेरी राह में और तेरे रसूल की ख़ातिर जो तकलीफ़ें उठाईं, वे तुझसे छिपी नहीं।”
