मेरे प्यारे नबी

हुदैबिया का वाक़िआ

नीयत उमरा, अंजाम हुदैबिया

हिजरत के छठे साल का ज़िलक़ादा का महीना था। एक रात मोहतरम नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ख़्वाब में देखा कि आप सहाबा-ए-किराम के साथ मक्का मुकर्रमा जाकर काबा मुअज़्ज़मा का तवाफ़ कर रहे हैं, उनमें से कुछ ने अपने बाल छोटे करवाए हैं और कुछ ने मुँडवाए हैं। रसूलुल्लाह ने यह ख़्वाब अपने सहाबा को सुनाया, तो वे बेहद जोश में आ गए। हिजरत के बाद पहली बार वे मक्का जाने वाले थे – अपना वह प्यारा वतन, जहाँ वे पैदा हुए और पले-बढ़े, जो खट्टी-मीठी यादों से भरा था। पाँचों वक़्त की नमाज़ में जिसकी तरफ़ वे रुख़ करते थे और जिसकी याद में तड़पते थे, उस मुक़द्दस काबा की ज़ियारत करेंगे, उसका तवाफ़ करेंगे। यह कैसी प्यारी ख़ुशख़बरी थी!… हमारे प्यारे नबी की ख़ुशख़बरी “तुम ज़रूर मस्जिद-ए-हराम में दाख़िल होगे!” मिलते ही सहाबा-ए-किराम फ़ौरन तैयारियों में लग गए। तैयारियाँ पूरी होने के बाद हबीब-ए-अकरम ने अब्दुल्लाह इब्ने उम्मे मकतूम को मदीना में नायब छोड़ा। ज़िलक़ादा के महीने के पहले पीर को आप क़सवा नाम की अपनी ऊँटनी पर सवार हुए। सफ़र के लिए तैयार अपने चौदह सौ सहाबा के साथ आपने मदीना में रह जाने वालों को अलविदा कहा। उमरे की नीयत करके वे मुक़द्दस शहर मक्का की तरफ़ चल पड़े। उन्होंने अपने साथ मुसाफ़िर का हथियार यानी अपनी तलवारें और क़ुरबानी के लिए सत्तर ऊँट लिए थे। क़ाफ़िले में दो सौ घुड़सवार थे, और चार सहाबी ख़वातीन थीं। इन ख़वातीन में से एक हमारे प्यारे नबी की मुबारक और पाकीज़ा ज़ौजा, हमारी माँ हज़रत उम्मे सलमा थीं। ज़ुल हुलैफ़ा नाम के मीक़ात पर पहुँचकर उन्होंने एहराम बाँधा और ज़ुहर की नमाज़ पढ़ी। फिर क़ुरबानी के ऊँटों के कानों पर निशान लगाए और उनकी गर्दनों में रस्सी बाँधी। नाजिया इब्ने जुंदुब असलमी को मददगार देकर ऊँटों की देखभाल की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। अब्बाद इब्ने बिश्र को बीस घुड़सवारों के एक दस्ते का सरदार बनाकर आगे टोह लेने भेजा गया। बिश्र इब्ने सुफ़यान को ख़बर लाने के लिए मक्का भेजा गया।1 एहराम का लिबास पहने, सफ़ेदी में लिपटे हमारे प्यारे नबी और बहादुर सहाबा अल्लाह तआला की हम्द करने, उसकी शान की बुलंदी की तस्दीक़ करने और उससे गिड़गिड़ाकर दुआ करने लगे:

“लब्बैक, अल्लाहुम्म लब्बैक! लब्बैक, ला शरीक लक लब्बैक! इन्नल हम्द वन्निअमत लक वल मुल्क, ला शरीक लक!”

(हाज़िर हूँ, या अल्लाह, हाज़िर हूँ! तेरी पुकार का मैंने अपनी ज़बान से और अपने पूरे वुजूद से बार-बार जवाब दिया, तेरे हुक्म के आगे सिर झुकाया। तेरा कोई शरीक नहीं, अपने पूरे वुजूद के साथ मैं तेरी तरफ़ मुतवज्जेह हुआ। हम्द और नेमत तेरे ही लिए ख़ास हैं। बादशाही भी तेरी ही है। तेरा कोई शरीक नहीं।) इस मुबारक तल्बिया से ज़मीन-आसमान गूँज रहे थे, ज़ुल हुलैफ़ा पर एक नूरानी फ़िज़ा छा गई थी। हर कोई जोश में था, और जल्द से जल्द मक्का पहुँचने के लिए वे ज़ुल हुलैफ़ा से रवाना हो गए।

रास्ते में हज़रत उमर और हज़रत साद इब्ने उबादा हबीब-ए-अकरम के पास आए और अपनी फ़िक्र ज़ाहिर की: “या रसूलल्लाह! क्या हम उन लोगों के पास बिना हथियार जाएँगे जो आपसे जंग की हालत में हैं? हमें डर है कि क़ुरैश आप पर हमला करके आपके मुबारक वुजूद को कोई नुक़सान न पहुँचा दें!…” दोनों जहान के सरदार ने उनसे फ़रमाया: “मैंने उमरे की नीयत की है। इस हालत में मैं हथियार साथ रखना नहीं चाहता।”

सफ़र सुकून से गुज़र रहा था। रास्ते के अलग-अलग क़बीलों के यहाँ पड़ाव होता, और नबी-ए-करीम उन्हें इस्लाम की दावत देते। कुछ क़बूल करने से झिझकते, कुछ तोहफ़े भेजते। इस तरह वे आधा रास्ता तय कर चुके थे और उस्फ़ान के पीछे ग़दीरुल अश्तात नाम की जगह पर पहुँच गए थे। यहाँ हज़रत बिश्र इब्ने सुफ़यान, जिन्हें पहले मक्का वालों की तरफ़ ख़बर के लिए भेजा गया था, क़ुरैश से मिलकर लौट आए थे। उन्होंने नबी-ए-करीम को अपना देखा हुआ हाल यूँ सुनाया: “या रसूलल्लाह! क़ुरैश को आपके आने की ख़बर मिल गई है। डर के मारे उन्होंने आस-पास के क़बीलों की दावतें करके उनसे मदद माँगी है। दो सौ आदमियों का एक घुड़सवार दस्ता टोह लेने के लिए आपकी तरफ़ रवाना कर दिया है। आस-पास के क़बीले यह दरख़्वास्त क़बूल करके बलदह नाम की जगह पर इकट्ठा हो गए हैं। उन्होंने बहुत बड़ी फ़ौज जमा कर ली है और क़सम खाई है कि आपको मक्का में दाख़िल नहीं होने देंगे।”

इस ख़बर से सारे जहानों के सरदार को बहुत रंज हुआ और आपने फ़रमाया: “क़ुरैश हलाक हो गए। जंग तो उन्हें पहले ही खा चुकी है… क्या क़ुरैश के मुशरिक समझते हैं कि उनमें कोई ताक़त है? अल्लाह की क़सम, अल्लाह तआला ने जिस दीन को फैलाने के लिए मुझे भेजा है, जब तक वह ग़ालिब और बुलंद न हो जाए, जब तक मेरा सिर मेरे धड़ से अलग न हो जाए, मैं उनसे लड़ने से हरगिज़ पीछे नहीं हटूँगा!” फिर आपने अपने बहादुर सहाबा की तरफ़ मुड़कर इस बारे में उनकी राय और ख़याल पूछा। सहाबा ने अपने पूरे वुजूद के साथ ख़ुद को रसूलुल्लाह के लिए वक़्फ़ कर रखा था; उन्होंने कहा: “अल्लाह तआला और उसके रसूल बेहतर जानते हैं। या रसूलल्लाह! हमारी जानें आप पर क़ुरबान! हम बैतुल्लाह के तवाफ़ की नीयत से निकले हैं। न किसी को क़त्ल करने आए हैं, न लड़ने। लेकिन अगर वे हमें काबा की ज़ियारत से रोकना चाहें, तो हम उनसे ज़रूर लड़ेंगे और अपनी मंज़िल तक पहुँचेंगे!…” सहाबा-ए-किराम का यह पक्का इरादा हमारे प्यारे नबी को पसंद आया। आपने फ़रमाया: “तो फिर अल्लाह तआला के मुबारक नाम के साथ आगे बढ़ो!…” सहाबा नबी-ए-करीम को घेरे में लिए “लब्बैक, अल्लाहुम्म लब्बैक!…” कहकर तल्बिया और “अल्लाहु अकबर! अल्लाहु अकबर!…” कहकर तकबीर पुकारते हुए मक्का की तरफ़ बढ़ने लगे।

एक दिन ज़ुहर के वक़्त बिलाल हब्शी ने अपनी आवाज़ की पूरी ख़ूबसूरती के साथ मुहम्मदी अज़ान देकर नमाज़ का वक़्त हो जाने का एलान किया। उसी वक़्त क़ुरैश का दो सौ आदमियों का घुड़सवार दस्ता वहाँ आ पहुँचा और मक्का और सहाबा के बीच आकर हमले के लिए तैयार खड़ा हो गया। इसके बावजूद सारे जहानों के सरदार अपने बुलंद सहाबा के साथ सफ़ बाँधकर नमाज़ के लिए खड़े हो गए। हमारे प्यारे नबी के पीछे लगभग चौदह सौ सहाबा का सफ़ बाँधकर बे-हरकत क़ियाम में खड़े होना और रुकूअ में झुकना देखने लायक़ मंज़र था। सबका एक साथ सज्दे में जाना तो ऐसा लगता था जैसे कोई रोबदार पहाड़ झुककर फिर सीधा हो गया हो।

“अल्लाह तआला की क़सम, क़ुरैश मुझसे जो कुछ भी माँगेंगे, बैत-ए-शरीफ़ की ताज़ीम की शर्त पर मैं क़बूल करूँगा!” हदीस शरीफ़

हुदैबिया का सफ़र

अल्लाह तआला के हुज़ूर अपनी इज़्ज़त वाली पेशानियाँ ज़मीन पर रखकर उन्होंने जो आजिज़ी दिखाई, उसने क़ुरैश के कुछ घुड़सवारों के दिलों में इस्लाम की मुहब्बत डाल दी। सहाबा-ए-किराम सलाम फेरकर नमाज़ से फ़ारिग़ हुए तो क़ुरैश के घुड़सवार दस्ते का सरदार पछताने लगा: “अगर हम मुसलमानों की इस हालत से फ़ायदा उठाकर हमला कर देते, तो उनमें से ज़्यादातर को मार डालते!… जब वे नमाज़ में थे, तो हमने हमला क्यों नहीं किया?” फिर उसने अपने साथियों को बताया कि इस बार वे मौक़ा हाथ से नहीं जाने देंगे: “फ़िक्र मत करो। वे बहरहाल एक और नमाज़ के लिए खड़े होंगे, जो उन्हें अपनी जानों और अपने बच्चों से भी ज़्यादा प्यारी है!…” उनकी ये बातें अल्लाह तआला ने जिबराईल अलैहिस्सलाम के ज़रिए वह्य भेजकर नबी-ए-करीम को बता दीं। नाज़िल होने वाली आयत-ए-करीमा में मफ़हूमन फ़रमाया गया: “(ऐ मेरे हबीब!) जब तुम उनके बीच हो और (दुश्मन के सामने) उन्हें (अपने सहाबा को) नमाज़ पढ़ाओ, तो (उन्हें दो हिस्सों में बाँट दो,) एक हिस्सा तुम्हारे साथ (नमाज़ में, और दूसरा दुश्मन के सामने) खड़ा रहे। वे अपने हथियार अपने पास रखें। जो तुम्हारे साथ नमाज़ में एक रकअत पढ़ लें, वे (नमाज़ तोड़ने वाले कामों से बचते हुए) दुश्मन के सामने चले जाएँ। इसके बाद दूसरा हिस्सा, जिसने अभी नमाज़ नहीं पढ़ी, आकर दूसरी रकअत तुम्हारे साथ पढ़े, और वे भी अपनी ज़िरहें, बचाव का सामान और अपने हथियार अपने पास रखें। (तशह्हुद तुम्हारे साथ पढ़ें। जब तुम सलाम फेरो, तो वे सलाम फेरे बिना दुश्मन के सामने चले जाएँ; पहले एक रकअत पढ़ चुके लोग वापस आकर अकेले एक रकअत और पढ़ें और सलाम फेरें। दूसरी रकअत इमाम के साथ पढ़ने वाले भी फिर आकर एक रकअत और पढ़ें, नमाज़ पूरी करें और सलाम फेरें।) काफ़िर चाहते हैं कि तुम अपने हथियारों और अपने सामान से ग़ाफ़िल हो जाओ, तो वे तुम पर अचानक धावा बोल दें… अगर तुम्हें बारिश से कोई तकलीफ़ हो या तुम बीमार हो, तो अपने हथियार रख देने में तुम पर कोई गुनाह नहीं। लेकिन फिर भी एहतियात की सारी तदबीरें अपनाओ। बेशक अल्लाह तआला ने काफ़िरों के लिए ज़लील और रुस्वा करने वाला अज़ाब तैयार कर रखा है।”2 अस्र के वक़्त हज़रत बिलाल ने अज़ान दी, तो क़ुरैश के घुड़सवार फिर मक्का और सहाबा-ए-किराम के बीच हमले के लिए तैयार खड़े हो गए। नबी-ए-करीम ने अपने सहाबा को उसी तरह नमाज़ पढ़ाई जैसे आयत-ए-करीमा में बताया गया था। मुसलमानों के इस एहतियात भरे तरीक़े से नमाज़ पढ़ने पर मुशरिक हैरान रह गए। अल्लाह तआला ने उनके दिलों में डर डाल दिया। उन्हें कोई भी हरकत करने की हिम्मत न हुई। वे मक्का ख़बर पहुँचाने के लिए वहाँ से चले गए। नबी-ए-करीम और आपके सहाबा भी वहाँ से मक्का की तरफ़ रवाना हुए। मुक़द्दस मक्का की सरहद पर पहुँचे तो रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ऊँटनी क़सवा किसी ज़ाहिरी वजह के बग़ैर अचानक बैठ गई। उसे उठाने की बहुत कोशिश की गई, लेकिन वह न उठी। इस पर कायनात के सुल्तान ने फ़रमाया: “इस तरह बैठ जाना इसकी आदत नहीं है। लेकिन जिस अल्लाह तआला ने एक ज़माने में (अबरहा के) हाथी को मक्का में दाख़िल होने से रोक लिया था, उसी ने अब क़सवा को भी रोक लिया है। उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसके क़ब्ज़ा-ए-क़ुदरत में मेरी जान है: अल्लाह तआला ने हरम के अंदर जिन कामों को हराम ठहराया है, उनसे जुड़ी (जैसे लड़ाई और ख़ून बहाने को छोड़ देना) जो भी बात क़ुरैश मुझसे माँगेंगे, उनकी वह माँग मैं ज़रूर पूरी करूँगा!”

इसके बाद क़सवा को उठाने की कोशिश की गई। ऊँटनी उछलकर खड़ी हो गई। वह हरम की हदों के अंदर दाख़िल न हुई और ठीक सरहद पर मौजूद हुदैबिया नाम की जगह पर रुक गई। नबी-ए-करीम और सहाबा-ए-किराम ने कम पानी वाली इस जगह पर पड़ाव डाला।

“क्या क़ुरैश के मुशरिक समझते हैं कि उनमें कोई ताक़त है? अल्लाह की क़सम, अल्लाह तआला ने जिस दीन को फैलाने के लिए मुझे भेजा है, जब तक वह ग़ालिब और बुलंद न हो जाए, जब तक मेरा सिर मेरे धड़ से अलग न हो जाए, मैं उनसे लड़ने से हरगिज़ पीछे नहीं हटूँगा!” हदीस शरीफ़

रसूल-ए-अकरम ने अपना ख़ेमा मुबारक मक्का की सरहद से बाहर लगवाया। आप अपने सहाबा के साथ वहाँ इंतिज़ार करने लगे। नमाज़ का वक़्त आता तो वे अपनी नमाज़ें मक्का मुकर्रमा की हद के अंदर पढ़ते थे। कुओं में पीने और काम में लाने के लिए पानी न रहा था। पानी सिर्फ़ नबी-ए-करीम के लोटे में था। मुश्किल में पड़े सहाबा ने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! हमारी जानें आप पर क़ुरबान! हमारे पास सिर्फ़ आपके लोटे में पानी है। हम तो तबाह हो गए।”

सारे जहानों के सरदार ने फ़रमाया: “जब तक मैं तुम्हारे बीच हूँ, तुम तबाह नहीं होगे।” फिर आपने “बिस्मिल्लाह” कहकर अपना मुबारक हाथ लोटे पर रखा। फिर हाथ उठाकर फ़रमाया: “लो!…” तो आपकी मुबारक उँगलियों के बीच से चश्मे की तरह पानी बहने लगा। सहाबा-ए-किराम ने जी भरकर पानी पिया, वुज़ू किया, अपनी सारी मश्कें भर लीं और अपने घोड़ों और ऊँटों को पानी पिलाया। अपने सहाबा को मुस्कुराकर देखते हुए रहमत के समुंदर, हमारे प्यारे नबी ने अल्लाह तआला की हम्द की। उस दिन वहाँ मौजूद हज़रत जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह ने फ़रमाया: “हम चौदह सौ आदमी थे। अगर हम एक लाख भी होते, तब भी वह पानी हम सबके लिए काफ़ी होता।”

बैअत-ए-रिज़वान

रसूल-ए-अकरम हुदैबिया में थे कि ख़ुज़ाआ क़बीले के सरदार बुदैल, जो पहले से मुसलमानों के दोस्त थे, आपकी ख़िदमत में आए और ख़बर दी कि आस-पास के क़बीले क़ुरैश से आ मिले हैं, क़ुरैश का लश्कर हुदैबिया के पास डेरा डाले हुए है और उन्होंने क़सम खाई है कि जब तक उनका लश्कर बिखर न जाए, लड़ते रहेंगे। इस पर नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “हम यहाँ किसी से लड़ने नहीं आए। हम सिर्फ़ उमरा करने, काबा मुअज़्ज़मा का तवाफ़ और ज़ियारत करने आए हैं। फिर भी जो कोई हमें बैतुल्लाह की ज़ियारत से रोकने की कोशिश करेगा, हम उससे लड़ेंगे। बेशक जंगों ने क़ुरैश को बहुत घिस डाला है, कमज़ोर कर दिया है और उन्हें बहुत नुक़सान पहुँचाया है। अगर वे चाहें, तो मैं उनके लिए जंगबंदी की एक मुद्दत मुक़र्रर कर दूँ। इस मुद्दत में वे मेरी तरफ़ से अमन में रहें। वे मेरे और दूसरे क़बीलों के बीच न आएँ; मुझे उनके साथ अकेला छोड़ दें। अगर मैं उन क़बीलों पर ग़ालिब आ गया और अल्लाह पाक ने उन्हें हिदायत (सीधा रास्ता) अता फ़रमाई और वे मुसलमान हो गए, तो क़ुरैश के मुशरिक भी, अगर चाहें, उनकी तरह मुसलमान हो सकते हैं। और अगर, जैसा कि उनका ख़याल है, मैं दूसरे गिरोहों पर ग़ालिब न आ सका, तो उस वक़्त वे ख़ुद भी आराम पा लेंगे और ताक़त जमा कर लेंगे। और अगर क़ुरैश के मुशरिक इन बातों को क़बूल न करें और मुझसे लड़ने पर उतर आएँ, तो उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसके क़ब्ज़ा-ए-क़ुदरत में मेरी जान है, जिस दीन को फैलाने की मैं कोशिश कर रहा हूँ, उसकी राह में मेरा सिर धड़ से अलग होने तक मैं उनसे लड़ूँगा। उस वक़्त अल्लाह तआला भी मेरी मदद के अपने वादे को बेशक पूरा फ़रमाएगा!”

ख़ुज़ाआ क़बीले के सरदार बुदैल नबी-ए-करीम की बातें क़ुरैश के पड़ाव तक पहुँचाने के लिए रवाना हुए। बुदैल से रसूलुल्लाह की बातें सुनने के बाद मुशरिकों ने बातचीत के लिए अपने बड़े लोगों में से उरवा इब्ने मसऊद को नबी-ए-करीम के पास भेजा। जब उरवा ने बताया कि क़ुरैश ने किसी को भी मक्का में दाख़िल न होने देने का पक्का फ़ैसला कर लिया है, तो हबीब-ए-अकरम ने फ़रमाया: “ऐ उरवा! अल्लाह के लिए बताओ! क्या इन क़ुरबानी के ऊँटों की क़ुरबानी से, इस काबा मुअज़्ज़मा की ज़ियारत और तवाफ़ से रोका जा सकता है?” फिर आपने ख़ुज़ाआ के सरदार से कही हुई बातें उरवा को भी सुनाईं।

उरवा एक तरफ़ नबी-ए-करीम की बात सुन रहा था, तो दूसरी तरफ़ सहाबा-ए-किराम के तौर-तरीक़ों और हरकतों पर, एक-दूसरे के साथ और सारे जहानों के सरदार के साथ उनके बर्ताव पर, उनके अदब और एहतिराम पर ग़ौर कर रहा था। हमारे प्यारे नबी की पेशकश सुनने के बाद वह उठा और क़ुरैश को यह सब बताने चल पड़ा। उनके पास पहुँचकर उसने कहा: “ऐ क़ुरैश के लोगो! तुम जानते हो कि मैं रूम के बादशाह (क़ैसर), नज्जाशी और ईरान के बादशाह (किसरा) जैसे बहुत-से बादशाहों के दरबार में सफ़ीर बनकर गया हूँ। मैं क़सम खाकर कहता हूँ कि मुसलमान मुहम्मद का जितना अदब और एहतिराम करते हैं, उतना किसी बादशाह का होते मैंने आज तक नहीं देखा। उनके सहाबा में से कोई भी उनकी इजाज़त के बिना बात नहीं करता। उनके सिर से एक बाल भी गिर जाए, तो उसे लपक लेते हैं और बरकत के लिए अपने सीने से लगाकर रखते हैं। उनके पास बात करते हैं, तो अपनी आवाज़ इतनी धीमी कर लेते हैं कि सुनाई न दे। उनके अदब की वजह से वे उनके चेहरे की तरफ़ नज़र नहीं उठा पाते और अपनी निगाहें नीची रखते हैं। वह अपने सहाबा को कोई इशारा कर दें या कोई हुक्म दें, तो चाहे जान की बाज़ी लगानी पड़े, वे उसे पूरा करने की कोशिश करते हैं।

ऐ क़ुरैश के लोगो! तुम कितना ही अपनी तलवारों पर हाथ डालो, सारी तदबीरें आज़मा लो, वे अपने नबी का एक बाल भी तुम्हारे हवाले नहीं करेंगे। बल्कि उन्हें कोई नुक़सान पहुँचने देना तो दूर, किसी को उन्हें हाथ तक लगाने न देंगे। हालात यह हैं। अब आगे की बात अच्छी तरह सोच लो! ऐसे हालात में मुहम्मद हमें एक अच्छी जंगबंदी की पेशकश कर रहे हैं, इससे फ़ायदा उठाओ!”

क़ुरैश के मुशरिकों ने ये बातें क़बूल न कीं, उरवा से बदसुलूकी की और उसका दिल दुखाया। क़ुरैश के पड़ाव से कोई ख़बर न आई, तो रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपनी पेशकश दोहराने के लिए ख़िराश इब्ने उमय्या को सफ़ीर बनाकर भेजा। मुशरिकों ने इस्लाम के सफ़ीर से बहुत बदसुलूकी की। उनका ऊँट ज़बह करके खा गए और उन्हें क़त्ल करने के लिए उन पर टूट पड़े। जब ख़िराश इब्ने उमय्या उनके हाथों से बड़ी मुश्किल से बचकर नबी-ए-करीम की ख़िदमत में आए और सारा हाल सुनाया, तो अपने सफ़ीर की इस तौहीन पर आपको बहुत दुख हुआ। उसी वक़्त मुशरिकों के पड़ाव से अहाबीश क़बीले का सरदार हुलैस दिखाई दिया। वह नबी-ए-करीम की तरफ़ आ रहा था। मुशरिकों ने उसे सफ़ीर बनाकर भेजा था। हुलैस को आते देखकर हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “यह आने वाला उस क़ौम में से है जो क़ुरबानी का एहतिराम करती है, अल्लाह तआला के हुक्मों को पूरा करने और इबादत करने का ध्यान रखती है। (ऐ मेरे सहाबा!) क़ुरबानी के ऊँटों को उसकी तरफ़ हाँक दो, ताकि वह देख ले!” सहाबा-ए-किराम ने क़ुरबानी के ऊँट उसकी तरफ़ छोड़ दिए और “लब्बैक, अल्लाहुम्म लब्बैक!” कहकर तल्बिया पुकारा। हुलैस गर्दनों में रस्सी बँधे, कानों पर निशान लगे क़ुरबानी के जानवरों को देर तक देखता रहा। उसकी आँखें भर आईं, आँसू बहने लगे, और रूह की गहराइयों से निकलती ग़मगीन आवाज़ में वह यह कहे बिना न रह सका: “मुसलमानों की काबा के तवाफ़ और ज़ियारत के सिवा कोई नीयत नहीं। उन्हें इससे रोकना कितनी बुरी बात है! काबा के रब की क़सम, क़ुरैश अपनी इस ग़लत हरकत की वजह से हलाक हो जाएँगे!” ये बातें सुनकर सारे जहानों के सरदार ने फ़रमाया: “हाँ, ऐसा ही है, ऐ बनू किनाना से ताल्लुक़ रखने वाले भाई!” हुलैस शर्म के मारे न रसूलुल्लाह की ख़िदमत में आ सका, न आपके मुबारक चेहरे की तरफ़ देख सका। वह क़ुरैश के पड़ाव पर लौट गया। जो कुछ देखा था, बताया और अपनी राय साफ़-साफ़ कह दी: “तुम्हारा उन्हें काबा की ज़ियारत से रोकना मैं सही नहीं समझता।” क़ुरैश के मुशरिक बहुत भड़क उठे और हुलैस पर जहालत का इल्ज़ाम लगाया।

“ऐ उरवा! अल्लाह के लिए बताओ! क्या इन क़ुरबानी के ऊँटों की क़ुरबानी से, इस काबा मुअज़्ज़मा की ज़ियारत और तवाफ़ से रोका जा सकता है?” हदीस शरीफ़

इस बार मुशरिकों ने अपनी बेरहमी के लिए बदनाम मिकरज़ इब्ने हफ़्स को सफ़ीर बनाकर भेजा। वह भी अपना जवाब लेकर लौट गया। मिकरज़ की सिफ़ारत के बाद मुशरिकों पर यह डर छा गया कि कहीं मुसलमान अचानक हमला न कर दें।

नबी-ए-करीम काम को अधूरा नहीं छोड़ना चाहते थे और अपने किसी ऐसे सहाबी को भेजना चाहते थे जिसकी क़ुरैश में इज़्ज़त हो। आख़िरकार हज़रत उस्मान को भेजने का फ़ैसला हुआ। हमारे प्यारे नबी ने उस्मान इब्ने अफ़्फ़ान से फ़रमाया: “उनसे कहो: ‘हम यहाँ किसी से लड़ने नहीं आए। हम सिर्फ़ काबा मुअज़्ज़मा का तवाफ़ और ज़ियारत करने आए हैं। अपने साथ लाए हुए क़ुरबानी के ऊँट ज़बह करके लौट जाएँगे।’ और उन्हें इस्लाम की दावत दो!” इसके अलावा आपने उन्हें ताकीद की कि मक्का में मौजूद मुसलमानों को यह ख़ुशख़बरी भी पहुँचा दें कि मक्का बहुत जल्द फ़तह होगा।3

हज़रत उस्मान मुशरिकों के पास गए और नबी-ए-करीम की बातें ज्यों की त्यों पहुँचा दीं। मुशरिकों ने हज़रत उस्मान की लाई हुई पेशकश को भी ठुकरा दिया और कहा कि अगर वह चाहें, तो सिर्फ़ वह ख़ुद बैतुल्लाह का तवाफ़ कर सकते हैं। मगर हज़रत उस्मान ने फ़रमाया: “जब तक रसूल अलैहिस्सलाम बैतुल्लाह का तवाफ़ न करें, मैं भी नहीं करूँगा!” इस पर बहुत ग़ुस्सा होकर मुशरिकों ने उन्हें रोक लिया। यह ख़बर सहाबा तक इस शक्ल में पहुँची: “उस्मान शहीद कर दिए गए।” उन्होंने नबी-ए-करीम को यह हाल बताया, तो आपको बहुत दुख हुआ और आपने फ़रमाया: “अगर यह ख़बर सही है, तो इस क़ौम से लड़े बिना हम यहाँ से नहीं हटेंगे।” फिर आपने वहाँ मौजूद समुरा नाम के पेड़ के नीचे बैठकर फ़रमाया: “अल्लाह तआला ने मुझे हुक्म दिया है कि तुमसे बैअत लूँ”, और अपने सहाबा को बैअत की दावत दी। बहादुर सहाबा ने अपने हाथ नबी-ए-करीम के मुबारक हाथ पर रखकर यह अहद किया: “हमने इस बात पर बैअत की है कि जब तक अल्लाह तआला आपको जीत अता न फ़रमाए, आपके आगे लड़ते-लड़ते फ़तह हासिल करेंगे या इस राह में शहीद हो जाएँगे!” नबी-ए-करीम ने अपना एक हाथ दूसरे हाथ पर रखकर हज़रत उस्मान की तरफ़ से, जो वहाँ मौजूद न थे, ख़ुद अपने हाथ पर बैअत की। रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपने सहाबा की इस बैअत से बहुत ख़ुश हुए और फ़रमाया: “पेड़ के नीचे सच्चे दिल से बैअत करने वालों में से कोई भी जहन्नम में नहीं जाएगा।” इस बैअत को बैअत-ए-रिज़वान कहा गया।4 सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) अब तलवारें खींचे अपनी जगह पर टिक नहीं पा रहे थे; वे रसूल अलैहिस्सलाम के एक इशारे के मुंतज़िर थे। उसी वक़्त इस्लामी पड़ाव की निगरानी करने वाले क़ुरैश के जासूसों ने देखा कि मुजाहिदों ने हमारे प्यारे नबी के हाथ पर इस राह में शहादत का जाम पीने तक लड़ने की बैअत कर ली है और तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने फ़ौरन क़ुरैश के पड़ाव पर जाकर सारा माजरा सुनाया। नबी-ए-करीम हर अंदेशे के पेश-ए-नज़र रातों को अपने सहाबा की हिफ़ाज़त के लिए पहरेदार छोड़ते थे। हज़रत उस्मान जिन दिनों रोके गए थे, उन्हीं में से एक रात मिकरज़ की सरदारी में पचास आदमियों के एक मुशरिक टोले ने इस्लामी सिपाहियों को सोते में दबोचने के लिए हमला किया। उस रात मुहम्मद इब्ने मस्लमा और उनके साथी पहरे पर थे। उन्होंने आने वाले काफ़िरों को एक छोटी-सी झड़प के बाद कसकर पकड़ लिया। सिर्फ़ मिकरज़ भाग सका। क़ैदियों को रसूलुल्लाह की ख़िदमत में लाया गया। उनमें से कुछ को क़ैद कर दिया गया और कुछ को माफ़ कर दिया गया। मुशरिकों ने अगली रात भी छापा मारना चाहा, लेकिन फिर पकड़े गए। नबी-ए-करीम ने उन्हें भी माफ़ करके छोड़ दिया।

हुदैबिया का सुलहनामा

काफ़िरों ने समझ लिया कि इस्लामी लश्कर दिन-रात जंग के लिए तैयार खड़ा है और किसी भी पल हमला कर सकता है; इससे उनके लश्कर के दिलों में डर बैठ गया। समझौते के सिवा कोई रास्ता न देखकर उन्होंने जल्दी-जल्दी सफ़ीरों का एक वफ़्द चुना। सुहैल इब्ने अम्र की सरदारी में चुने गए इस वफ़्द से कहा गया: “इस शर्त पर समझौता करो कि वे इस साल मक्का में दाख़िल न हों।”

हमारे प्यारे नबी ने क़ुरैश के सफ़ीरों से मुलाक़ात फ़रमाई। सफ़ीरों की पहली माँग यह थी कि उनके क़ैद किए गए आदमी छोड़ दिए जाएँ। सारे जहानों के सरदार ने फ़रमाया: “जब तक तुम मक्का में रोके हुए मेरे सहाबा को नहीं छोड़ोगे, मैं तुम्हारे इन आदमियों को रिहा नहीं करूँगा!” सुहैल ने कहा: “सच तो यह है कि आपने हमारे साथ बहुत इंसाफ़ और बराबरी का बर्ताव किया है”, और मक्का में रोके गए हज़रत उस्मान को और उन लगभग दस सहाबा को रिहा करवा दिया जिन्हें क़ुरैश ने पहले से क़ैद कर रखा था। इसके बाद छापे के दौरान पकड़कर क़ैद किए गए मुशरिक रिहा कर दिए गए।

लंबी बातचीत के बाद समझौता तय पा गया। अब उसे लिखने की बारी आई। हज़रत अली को कातिब चुना गया। सुलहनामा लिखने के लिए काग़ज़ और क़लम-दवात तैयार की गई। सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजे गए हबीबुल्लाह ने हज़रत अली से फ़रमाया: “लिखो:

‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम!’” सुहैल ने फ़ौरन इस पर एतिराज़ किया: “क़सम खाता हूँ, मैं नहीं जानता कि ‘रहमान’ लफ़्ज़ का क्या मतलब है। ऐसे मत लिखिए; ‘बिस्मिकल्लाहुम्म’ लिखिए! वरना मैं सुलह के लिए राज़ी नहीं होऊँगा!” नबी-ए-करीम सुलह होने में बहुत बड़ी हिकमतें देख रहे थे, इसलिए आपने फ़रमाया: “‘बिस्मिकल्लाहुम्म’ भी अच्छा है”, और हज़रत अली को ऐसा ही लिखने का हुक्म दिया। लिखे जाने के बाद जब नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ये वे शर्तें हैं जिन पर अल्लाह के रसूल मुहम्मद ने सुहैल इब्ने अम्र से समझौता और सुलह की, और जिन पर दोनों फ़रीक़ों के अमल करने के लिए दस्तख़त किए”, तो सुहैल ने हज़रत अली का हाथ पकड़ लिया। उसने नबी-ए-करीम की तरफ़ मुड़कर कहा: “हम क़सम खाते हैं, अगर हम आपको अल्लाह का रसूल मानते, तो आपकी मुख़ालफ़त न करते, आपको काबा की ज़ियारत से न रोकते। इसलिए ‘अल्लाह के रसूल’ की जगह ‘अब्दुल्लाह का बेटा मुहम्मद’ लिखिए!”

नबी-ए-करीम ने इसे भी क़बूल करते हुए फ़रमाया: “अल्लाह की क़सम, तुम मुझे झुठलाओ तब भी, मैं बेशक अल्लाह तआला का रसूल हूँ। अपना और अपने वालिद का नाम लिखवा देने से मेरी नुबुव्वत ख़त्म नहीं हो जाती। ऐ अली! उसे मिटा दो और ‘मुहम्मद इब्ने अब्दुल्लाह’ लिख दो।”

सहाबा-ए-किराम में से किसी का भी दिल ‘अल्लाह के रसूल’ के अल्फ़ाज़ मिटाए जाने पर राज़ी न हुआ। एक पल के लिए सब कुछ भूलकर उन्होंने कहा: “ऐ अली! ‘मुहम्मद रसूलुल्लाह’ लिखो, वरना हमारे और इन मुशरिकों के बीच का मामला अब सिर्फ़ तलवार ही तय करेगी!…” नबी-ए-करीम अपने सहाबा के इस जोश से ख़ुश हुए, लेकिन अपने मुबारक हाथों से उन्हें चुप रहने का इशारा फ़रमाया। जब आपने हज़रत अली को उसे मिटाने का हुक्म दिया, तो उन्होंने यह कहकर माज़रत की: “या रसूलल्लाह! मेरी जान आप पर क़ुरबान! आपकी इस मुबारक सिफ़त को मिटाने के लिए मेरा हाथ नहीं उठता!…” हमारे प्यारे नबी ने उनसे वह जगह दिखाने को कहा। उन्होंने दिखाई, तो आपने लिखा हुआ उनके हाथ से लेकर ये अल्फ़ाज़ अपनी मुबारक उँगली से मिटा दिए और ‘अब्दुल्लाह का बेटा’ लिखवाया। फिर शर्तें लिखी जाने लगीं: 1) समझौता दस साल तक लागू रहेगा; इस मुद्दत में दोनों फ़रीक़ एक-दूसरे से जंग नहीं करेंगे।

“पेड़ के नीचे सच्चे दिल से बैअत करने वालों में से कोई भी जहन्नम में नहीं जाएगा” हदीस शरीफ़

  1. मुसलमान इस साल काबा की ज़ियारत नहीं करेंगे, लेकिन एक साल बाद ज़ियारत कर सकेंगे। 3) काबा की ज़ियारत के लिए आने वाले मुसलमान तीन दिन ठहरेंगे और अपने पास मुसाफ़िर के हथियार के सिवा कोई हथियार नहीं रखेंगे। 4) जब मुसलमान काबा का तवाफ़ करेंगे, तो मक्का के मुशरिक काबा से बाहर चले जाएँगे और मुसलमानों को आज़ादी से तवाफ़ करने का मौक़ा देंगे।

  1. क़ुरैश में से कोई मुसलमान होकर अपने वली की इजाज़त के बिना मदीना चला जाए, तो उसे लौटा दिया जाएगा; और मुसलमानों में से कोई क़ुरैश की तरफ़ जाकर मक्का चला जाए, तो उसे लौटाया नहीं जाएगा। इस शर्त के बारे में हज़रत उमर ने पूछा: “या रसूलल्लाह! क्या आप यह शर्त भी क़बूल करेंगे?” हमारे प्यारे नबी ने मुस्कुराकर फ़रमाया: “हाँ। हममें से जो उनकी तरफ़ जाएँगे, अल्लाह तआला उन्हें हमसे दूर ही रखे!”

  2. सहाबा में से कोई हज या उमरे की नीयत से मक्का आए, तो उसकी जान और उसका माल महफ़ूज़ रहेंगे।

  3. मुशरिकों में से कोई शाम, मिस्र या किसी और जगह जाते हुए मदीना से गुज़रे, तो उसकी जान और माल भी महफ़ूज़ रहेंगे।

  4. दूसरे अरब क़बीले जिस फ़रीक़ की हिमायत में चाहें आ सकेंगे; मुसलमानों से मिलें या मुशरिकों से, इसमें वे आज़ाद होंगे।5

अब समझौते पर दस्तख़त की बारी आ गई थी। उसी वक़्त एक शख़्स अपने पाँवों की ज़ंजीरें घसीटते हुए इस्लामी लश्कर की तरफ़ आते दिखाई दिए। वह क़रीब आते गए, क़रीब आते गए, और चिल्लाए: “मुझे बचाओ!…” यह आवाज़ सुनते ही क़ुरैश के वफ़्द का सरदार फ़ौरन अपनी जगह से उछल पड़ा। हाथ में ली हुई काँटेदार टहनी से वह उनके सिर और चेहरे पर मारने लगा। उन्होंने अपनी सारी ताक़त जमा करके ख़ुद को रसूलुल्लाह के मुबारक घुटनों के पास गिरा दिया और फ़रियाद की: “या रसूलल्लाह, मुझे बचा लीजिए!” यह एक मुसलमान थे, जिन्हें मक्का में मुसलमान होने की इज़्ज़त पाने की वजह से उनके बाप ने ज़ंजीरों में जकड़ रखा था। हर दिन उन्हें सख़्त अज़ियतें दी जातीं और बुतों को पूजने पर मजबूर किया जाता था। मुशरिकों के हुदैबिया जाने का फ़ायदा उठाकर उन्होंने अपनी ज़ंजीरें तोड़ीं, किसी को दिखाई दिए बिना मक्का से निकले और मुसलमानों के बीच आ पहुँचे थे। हिदायत पाने वाले ये मुबारक इंसान मुशरिक वफ़्द के सरदार सुहैल के बेटे हज़रत अबू जंदल थे। सुहैल ने अपने बेटे अबू जंदल की तरफ़ इशारा करके नबी-ए-करीम से कहा: “अभी-अभी लिखे गए हमारे समझौते के मुताबिक़ जिस पहले आदमी को तुम्हें मेरे हवाले करना है, वह यही है!”

नबी-ए-करीम और सहाबा पर इसका बहुत गहरा असर हुआ। हर कोई बेचैनी से इंतिज़ार कर रहा था कि रसूलुल्लाह क्या जवाब देते हैं। एक तरफ़ सुलहनामा, दूसरी तरफ़ अज़ियतें झेलता हुआ एक सहाबी… सारे जहानों के सरदार ने सुहैल से फ़रमाया: “हमने अभी इस सुलहनामे पर दस्तख़त नहीं किए हैं!” सुहैल अड़ गया: “ऐ मुहम्मद! समझौते की शर्तें हम मेरे बेटे के यहाँ आने से पहले ही लिख चुके थे। अगर तुम मेरा बेटा नहीं लौटाओगे, तो मैं कभी सुलहनामे पर दस्तख़त नहीं करूँगा!” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “मेरी ख़ातिर इसे समझौते से अलग रखो”, लेकिन मुशरिकों ने यह न माना। सुहैल इब्ने अम्र अपने बेटे को घसीटता हुआ ले जा रहा था, और अबू जंदल चीख़-चीख़कर फ़रियाद कर रहे थे: “या रसूलल्लाह! ऐ मेरे मुसलमान भाइयो!… मैं मुसलमान होने की इज़्ज़त पाकर आपकी पनाह में आया हूँ, फिर भी आप मुझे मुशरिकों के हवाले कर रहे हैं? मुझ पर हर दिन नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त अज़ियतें ढाई जाएँ, क्या आप इसे रवा समझते हैं? या रसूलल्लाह! क्या आप मुझे इसलिए लौटा रहे हैं कि वे मुझे मेरे दीन से फेर दें?!…”

दिल को चीर देने वाली इस फ़रियाद को सहना बहुत मुश्किल था। ज़ख़्मी दिलों वाले सहाबा रोने लगे। रहमत के समुंदर, हमारे प्यारे नबी की मुबारक आँखें भी भर आई थीं। आप सुहैल के पास गए और गुज़ारिश की: “ऐसा न करो! इसे मुझे बख़्श दो!” लेकिन सुहैल ने जवाब दिया: “नामुमकिन, मैं नहीं बख़्शूँगा!” इस पर हमारे प्यारे नबी ने अबू जंदल को यह कहकर तसल्ली दी: “ऐ अबू जंदल! थोड़ा और सब्र करो! जो कुछ तुम्हारे साथ किया जा रहा है, उसे सह लो! इन सबका अज्र अल्लाह तआला से माँगो। अल्लाह तआला तुम्हें और तुम जैसे कमज़ोर और बेसहारा मुसलमानों को ज़रूर कुशादगी और निकलने का कोई रास्ता अता फ़रमाएगा”, और फ़रमाया: “अपनी दी हुई ज़बान पर क़ायम न रहना हमें ज़ेब नहीं देता।” अबू जंदल ने “जी अच्छा, या रसूलल्लाह” कहकर बता दिया कि वह सब्र करेंगे।

दिल दुखा देने वाले इस वाक़िए को वफ़्द में शामिल मुशरिक भी बर्दाश्त न कर सके और बोले: “ऐ मुहम्मद! तुम्हारी ख़ातिर हम अबू जंदल को अपनी हिमायत में लेते हैं। हम सुहैल को उसे अज़ियत देने नहीं देंगे!”

इसके बाद रसूलुल्लाह और सहाबा-ए-किराम को कुछ इत्मीनान हुआ। (सुहैल इब्ने अम्र मक्का की फ़तह के बाद मुसलमान होकर सहाबा-ए-किराम में शामिल हुए।) सुलहनामा दो नक़्लों में लिखा गया और दोनों फ़रीक़ों ने उस पर दस्तख़त किए। मुशरिक अपने पड़ाव को लौट गए।6 मुसलमानों के ख़िलाफ़ नज़र आने वाली इन शर्तों पर क़ुरैश का वफ़्द बहुत ख़ुश था। लेकिन हक़ीक़त इसके उलट थी: यह सुलहनामा मोमिनों के लिए बड़ी जीत था, और ये शर्तें मुसलमानों के हक़ में थीं। सबसे पहले तो मुशरिकों ने मान लिया कि मुसलमान एक रियासत हैं। मक्का का कोई मुशरिक तिजारत या किसी और काम से शाम या मिस्र जाते हुए मदीना से गुज़रता, तो उसकी जान और माल महफ़ूज़ रहते। इस तरह मुशरिक मुसलमानों की ज़िंदगी को क़रीब से देखते, इस्लाम के इंसाफ़ और सहाबा के आपसी अच्छे बर्ताव पर हैरान रह जाते और इस्लाम से मुहब्बत करने लगते। आख़िरकार वे मुसलमान होकर सहाबा की सफ़ों में आ मिलते। दस साल चलने वाले इस समझौते से मुसलमान बढ़ते और मज़बूत होते जाते। इस्लाम हर तरफ़ फैल जाता। लेकिन “क़ुरैश में से कोई मुसलमान होकर मदीना में पनाह लेना चाहे, तो उसे लौटा दिया जाएगा” वाली शर्त से नबी-ए-करीम को बहुत दुख हुआ था, और आपने फ़रमाया था: “अल्लाह तआला उनके लिए ज़रूर कोई कुशादगी, कोई निकलने का रास्ता पैदा फ़रमाएगा।” अब मुशरिकों के साथ कोई काम बाक़ी न रहा था। रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सहाबा-ए-किराम से फ़रमाया: “उठो! अपनी क़ुरबानियाँ ज़बह करो। सिर मुँडवाने के बाद एहराम खोल दो।” नबी-ए-करीम ने सबसे पहले अपनी क़ुरबानी ज़बह की। फिर आपके हज्जाम हज़रत ख़िराश इब्ने उमय्या ने आपका सिर मूँडा। सहाबा-ए-किराम ने वे मुबारक बाल ज़मीन पर गिरने से पहले ही हवा में लपक लिए और बरकत के लिए सँभालकर रख लिए। सहाबा ने भी अपनी क़ुरबानियाँ ज़बह कीं; उनमें से कुछ ने अपने सिर मुँडवाए और कुछ ने बाल छोटे करवाए।7

“ऐ अबू जंदल! थोड़ा और सब्र करो! जो कुछ तुम्हारे साथ किया जा रहा है, उसे सह लो! इन सबका अज्र अल्लाह तआला से माँगो। अल्लाह तआला तुम्हें और तुम जैसे कमज़ोर और बेसहारा मुसलमानों को ज़रूर कुशादगी और निकलने का कोई रास्ता अता फ़रमाएगा” हदीस शरीफ़

हुदैबिया में वे लगभग बीस दिन ठहरे। नबी-ए-करीम अपने साथियों के साथ मदीना लौटने के लिए रवाना हुए। रास्ते में अल्लाह तआला ने नबी-ए-करीम पर सूरह फ़तह वह्य करके नाज़िल फ़रमाई और ख़ुशख़बरी दी कि वह अपनी नेमत और अपनी मदद को पूरा फ़रमाएगा। कायनात के सुल्तान (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जिन दिनों फ़तहमंद होकर नूरानी मदीना तशरीफ़ लाए, उन्हीं दिनों क़ुरैश के सक़ीफ़ क़बीले के अबू बसीर मुसलमान होने की इज़्ज़त से सरफ़राज़ हुए। यह समझकर कि वह मुशरिकों के बीच नहीं रह सकेंगे, अबू बसीर पैदल मदीना आए। लेकिन हुदैबिया के समझौते के तक़ाज़े के मुताबिक़ वह मदीना से चले गए और लाल सागर के किनारे ईस नाम की जगह पर जा बसे।8

यह जगह उस तिजारती रास्ते पर थी जिससे क़ुरैश के मुशरिक शाम जाते थे। इसके बाद क़ुरैश में से मुसलमान होने वाले मक्का छोड़कर मदीना के बजाय ईस में अबू बसीर के पास जाने लगे। इनमें सबसे पहले हज़रत अबू जंदल थे। फिर यह सिलसिला चल निकला। वे पचास, सौ, दो सौ, तीन सौ आदमी हो गए। शाम जाते हुए क़ुरैश के क़ाफ़िले को इसी जगह से गुज़रना पड़ता था। हज़रत अबू बसीर और उनके साथ के मुसलमान यहाँ से गुज़रने वाले मुशरिकों को पकड़ लेते और उनसे मुसलमान होने को कहते। जो मुसलमान न होते, उनसे लड़कर उन्हें मुश्किल में डाल देते। जब मक्का के मुशरिकों ने देखा कि शाम के तिजारती रास्ते कट गए हैं, तो उन्होंने मदीना एक वफ़्द भेजा। उन्होंने गिड़गिड़ाकर दरख़्वास्त की कि हुदैबिया के सुलहनामे की यह शर्त ख़त्म कर दी जाए: “क़ुरैश में से कोई मुसलमान होकर अपने वली की इजाज़त के बिना मदीना चला जाए, तो उसे लौटा दिया जाएगा!…” नबी-ए-करीम ने रहम फ़रमाकर उनकी यह दरख़्वास्त क़बूल कर ली। इस तरह क़ुरैश के लिए शाम का तिजारती रास्ता फिर खुल गया, और मुसलमान अपने सब्र के बदले में मदीना, नबी-ए-करीम के पास आ गए।

ऐ हसीनों के हसीन!

ऐ हसीनों के हसीन, आपके इश्क़ ने मुझे जला डाला!
मेरी आँख कुछ नहीं देखती, हर पल अक़्ल आपके ख़याल में है!
आप (क़ाब-ए-क़ौसैन) के शाह, और मैं एक सरकश ग़ुलाम,
आपका मेहमान बनने की बात यह हैरान कैसे ज़बान पर लाए?
रहम से एक नज़र डाली, तो मुर्दा दिल ज़िंदा कर दिए,
आपकी बेहद रहमत की पनाह लेकर मैंने आपका दर खटखटाया!
आप भलाई का सरचश्मा, इलाजों का समुंदर हैं!
एक क़तरा लुत्फ़ मुझ पर कीजिए, ऐसे दर्द में हूँ जिसकी दवा नहीं!
हर कोई मक्का आता है – काबा, सफ़ा और मरवा की तरफ़,
और मैंने आपकी ख़ातिर पहाड़ और टीले पार किए!
कल रात एक ख़्वाब में मेरा सिर आसमानों से जा लगा,
मैंने समझा, आपके दर के ख़ादिमों ने मेरी गर्दन पर पाँव रखा!
ऐ हज़रत जामी, मेरे महबूब के बुलबुल!
आपके अशआर में से मैंने यह शेर चुन लिया:
“ज़बान लटकाए, ख़ारिश के मारे कुत्तों की तरह,
एक क़तरे की आस में आपके एहसान के समुंदर पर आया हूँ।”
मौलाना ख़ालिद बग़दादी (क़ुद्दिसा सिर्रुहू)

“हमने बेशक तुम्हें एक खुली फ़तह अता की है” फ़तह: 1

रसूलुल्लाह के दावतनामे

सूरज न चमकता आलम पर,
अगर वह जान न आती;
नूर न मिलता आलम को,
अगर मौलिद की घड़ी न आती।
बिल्लौर से और सुरूर से
गुल-सा चेहरा न गुँधता,
दिलों में झलकते नूर से
अगर वह जिस्म न बनता।
Eyyübî