ख़ैबर की फ़तह
नूर वाले मदीना में ऐसे यहूदी थे जो ज़ाहिर में मुसलमान और हक़ीक़त में मुनाफ़िक़ (दोग़ले) थे। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के मदीना हिजरत फ़रमाने से पहले मदीना वालों ने अब्दुल्लाह इब्ने उबई इब्ने सलूल को अपना सरदार बना लिया था। उसे जवाहरात से सजा हुआ एक ताज भी दिया था। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मदीना तशरीफ़ लाए तो मदीना वाले पूरी तरह प्यारे नबी-ए-करीम की इज़्ज़त और क़द्र करने लगे और आपकी पैरवी करने लगे। इब्ने सलूल एक कोने में बेक़द्र होकर रह गया। लोगों ने इब्ने सलूल की तरफ़ ध्यान देना छोड़ दिया। इस पर इब्ने सलूल रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को क़त्ल करने या आपको कोई तकलीफ़ पहुँचाने के लिए हरकत में आ गया। एक दिन यहूदी उसके पास जमा हुए। इस बारे में कुछ मंसूबे बनाए और लबीद इब्ने आसम से मदद माँगी। लबीद ने कहा: “फ़लाँ मोहल्ले में हैरा नाम की एक बूढ़ी औरत है। वह जादू करने में बहुत माहिर है। उसे ढूँढो।” उन्होंने उस मलऊन औरत को ढूँढकर उसे एक हज़ार दिरहम सोना और कपड़े के दस थान दिए। उससे कहा: “अगर तुम मुहम्मद को हलाक कर दो, तो हम तुम्हें और भी बहुत कुछ देंगे।” बूढ़ी औरत ने कबूतर के एक बच्चे में सुइयाँ चुभोईं, धागों में गाँठें लगाकर उन्हें कबूतर के बच्चे पर लपेट दिया। उसे मदीना के बाहर एक वीरान कुएँ में डालकर कुएँ का मुँह बंद कर दिया। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बीमार हो गए। आपके अंग बेहरकत हो गए। तरह-तरह की दवाएँ दी गईं, मगर कोई फ़ायदा न हुआ। यह हालत नौ दिन तक रही।
फिर जिबराईल अलैहिस्सलाम आए और हाल की ख़बर दी। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को वहाँ ले जाया गया। आपने कुएँ का मुँह खोलकर कबूतर निकाला। लेकिन धागों की गाँठें खोलना मुमकिन न हुआ। जिबराईल अलैहिस्सलाम मुअव्विज़तैन (सूरह फ़लक़ और सूरह नास) लेकर आए और कहा: “ऐ मुहम्मद अलैहिस्सलाम! इन सूरतों को उन गाँठों पर पढ़िए।” रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) वे सूरतें पढ़ने लगे। हर आयत पढ़ने पर एक गाँठ खुलती और एक सुई निकलती जाती। आपने सूरतें (दोनों सूरतों की 11 आयतें) पूरी पढ़ लीं, तो सारी गाँठें खुल गईं। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बीमारी से पूरी तरह छुटकारा पाकर तंदुरुस्त हो गए। फिर आपने उन मलऊन लोगों को बुलवाकर डाँटा। मदीना वालों ने उन्हें ऐसी सख़्त सज़ाएँ दीं कि वे हलाक हो गए। लबीद यहूदी को भी पकड़कर रसूलुल्लाह की ख़िदमत में लाया गया। नबी-ए-करीम ने उससे फ़रमाया: “तुमने यह क्यों करवाया?” तो उसने जवाब दिया: “सोने की मुहब्बत में।” सहाबा-ए-किराम में से कुछ ने कहा: “या रसूलल्लाह! अगर आप इजाज़त दें, तो इस यहूदी की गर्दन उड़ा दें!” तो हमारे प्यारे नबी ने, जिन्होंने अपनी ज़ात के लिए कभी किसी को सज़ा नहीं दी, फ़रमाया: “आख़िर में जो इलाही अज़ाब वह देखेगा, वह इससे कहीं ज़्यादा सख़्त है।” और उसे क़त्ल करने की इजाज़त न दी।1 मदीना से निकाले जाने के बाद यहूदी अरब के उत्तरी इलाक़ों में चले गए थे। उनमें से एक हिस्सा ख़ैबर में बस गया। एक हिस्सा उत्तर में शाम की तरफ़ चला गया। रसूलुल्लाह के क़त्ल की साज़िश करने की वजह से उन्हें उनके वतन से निकाला गया था। लेकिन मुसलमानों के ख़िलाफ़ उनके दिलों में कीना, लालच और बदले की आग कभी न बुझी। बल्कि दिन-ब-दिन भड़कती गई: वे चाहते थे कि जल्द से जल्द कायनात के सुल्तान, अल्लाह तआला के हबीब की ज़िंदगी ख़त्म कर दें और इस्लाम के दीन को मिटा दें।
उनके कुछ बड़े लोगों ने कहा: “चलो, ग़तफ़ान वालों के पास जाकर मदद माँगें और मुसलमानों के ख़िलाफ़ उनके साथ मिलकर लड़ें!” कुछ ने कहा: “फ़दक, तैमा और वादिल क़ुरा के यहूदियों को भी मदद के लिए बुलाएँ, और इससे पहले कि मुसलमान हम पर हमला करें, हम उनके शहर पर धावा बोल दें और अपना सारा बदला चुका लें!…” ख़ैबर के यहूदियों ने यह बात मान ली और आस-पास के यहूदी क़बीलों और ग़तफ़ान वालों को मदद के लिए बुलाया। अकेले ग़तफ़ान वालों में से ही बहुत-से चुने हुए जंगजू आ गए, और ख़ैबर में तैयारियाँ शुरू हो गईं। वे ये तैयारियाँ कर ही रहे थे कि सारे जहानों के सरदार (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को यहूदियों के हालात की ख़बर हो गई। आपने फ़ौरन हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा को तीन सहाबियों के साथ भेजा, ताकि ख़ैबर में जो कुछ हो रहा है, मालूम करें। अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा और उनके तीन साथी तेज़ी से ख़ैबर पहुँचे। ख़ैबर एक मालदार शहर था, जिसमें आठ मज़बूत क़िले, कुछ और छोटे-मोटे क़िले, उपजाऊ ज़मीनें और अंगूर के बहुत-से बाग़ और बाग़ीचे थे। हज़रत अब्दुल्लाह ने अपने साथियों में से एक को शिक़्क़ क़िले, दूसरे को कतीबा क़िले और तीसरे को नतात क़िले में भेजा। ख़ुद एक और क़िले में दाख़िल हुए। तीन दिन तक उन्होंने यहूदियों के हालात और जंग की तैयारियों को क़रीब से देखा-परखा। तीन दिन बाद मुलाक़ात की जगह पर इकट्ठे होकर वे तेज़ी से मदीना लौटे और यहूदियों की तैयारियाँ नबी-ए-करीम को एक-एक करके बयान कीं।
हमारे प्यारे नबी ने अपने सहाबा को जल्दी तैयारी करने का हुक्म दिया। यहूदियों को मदीना मुनव्वरा पर हमला करने से रोकने के लिए आपने ख़ैबर पर चढ़ाई करने का फ़ैसला फ़रमाया। यह फ़ैसला सुनकर मदीना में रहने वाले यहूदी घबरा गए। मुसलमानों का हौसला तोड़ने के लिए वे कहते फिरते थे: “हम क़सम खाते हैं, अगर तुमने ख़ैबर के क़िले और वहाँ जमा बहादुर जंगजू देखे होते, तो वहाँ कभी क़दम न रखते!… पहाड़ों की चोटियों पर ऊँचे बुर्जों वाले क़िलों की हिफ़ाज़त ज़िरह पहने बहादुर कर रहे हैं। आस-पास से हज़ारों सिपाही उनकी मदद को आ चुके हैं!… क्या तुम ख़ैबर फ़तह कर सकोगे?!…” इसके जवाब में बहादुर सहाबा कहते: “अल्लाह तआला ने अपने हबीब से ख़ैबर की फ़तह का वादा फ़रमाया है।” और बता देते कि वे यहूदियों से कभी नहीं डरेंगे। सहाबा का यह पक्का इरादा यहूदियों को और भी परेशान करता, उन्हें फ़िक्र में डाल देता। मुनाफ़िक़ों के सरदार अब्दुल्लाह इब्ने उबई ने ख़ैबर फ़ौरन ख़बर भेजी: “मुहम्मद थोड़ी-सी ताक़त लेकर तुम पर चढ़ा आ रहा है। डरने की कोई बात नहीं, लेकिन होशियार रहो और अपने माल अपने क़िलों में भर लो। क़िलों से निकलकर उनका मुक़ाबला करो!” सहाबा-ए-किराम ने अपनी तैयारियाँ पूरी कीं, घर वालों से आपस के हक़ माफ़ करवाकर रुख़सत हुए और नबी-ए-करीम के गिर्द जमा हो गए। वे दो सौ घुड़सवार और एक हज़ार चार सौ पैदल थे। वे अल्लाह तआला के दीन को फैलाने, जिहाद करने और शहादत का दर्जा पाने के लिए अपने प्यारे नबी के हुक्म पर तैयार खड़े थे। इसी दौरान कुछ औरतों ने जंग में सहाबा-ए-किराम का खाना तैयार करने, ज़ख़्मियों और बीमारों की देखभाल करने, ज़ख़्मों पर पट्टी बाँधने, दवा तैयार करने और दूसरे जो काम वे कर सकती थीं, उन्हें अंजाम देने के लिए नबी-ए-करीम से यह ख़िदमत माँगी। रसूलुल्लाह ने उन पर मेहरबानी फ़रमाई और उन्हें इस सवाब से महरूम न किया। इस तरह मुजाहिदों के साथ, हमारे प्यारे नबी की मुबारक बीवी हज़रत उम्मे सलमा की सरबराही में, बीस मुजाहिद ख़वातीन भी शामिल हो गईं।2
रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने मदीना में अपनी जगह नायब के तौर पर ग़िफ़ार क़बीले के हज़रत सिबा को छोड़ा और ख़ैबर की तरफ़ कूच का हुक्म दिया। (नुमैला इब्ने अब्दुल्लाह के छोड़े जाने की भी रिवायत है।) सफ़र तकबीरों से शुरू हुआ। जो सहाबा अपने उज़्र की वजह से जंग में शरीक न हो सके और जिन्हें कम उम्र होने के कारण इजाज़त न मिली, वे नबी-ए-करीम को और अपने बहादुर बापों, दादाओं, चचाओं, मामुओं और बड़े भाइयों को रश्क से देखते और उन्हें तकबीरों और दुआओं के साथ रुख़सत करते थे।
“ख़ैबर का क़िला अली इब्ने अबी तालिब के हाथों फ़तह होगा” हदीस शरीफ़
हिजरत के सातवें साल का मुहर्रम का महीना था। नबी-ए-करीम का मुक़द्दस झंडा हज़रत अली उठाए हुए थे, और दाएँ बाज़ू की कमान हज़रत उमर के हाथ में थी।3 बाएँ बाज़ू पर आपने एक और सहाबी को मुक़र्रर फ़रमाया। सफ़र बड़ी ख़ुशी के साथ गुज़र रहा था। शायर अपने शेरों में अल्लाह तआला की दी हुई नेमतों पर उसकी हम्द करते, हमारे प्यारे नबी पर दुरूद पढ़ते और शान वाले सहाबा की तारीफ़ करते थे। सहाबा भी, जैसे ईद मनाने जा रहे हों, सब मिलकर “अल्लाहु अकबर! अल्लाहु अकबर! ला इलाह इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर!” कहकर हर तरफ़ गूँज पैदा कर देते थे।
हर पड़ाव पर कायनात के सुल्तान यह दुआ फ़रमाते थे: “या अल्लाह! आने वाले कल की फ़िक्र से, गुज़रे हुए पर ग़म से, कमज़ोरी और सुस्ती से, कंजूसी, बुज़दिली और कमर तोड़ देने वाले क़र्ज़ से, ज़ालिम और नाइंसाफ़ लोगों के ग़लबे से तेरी पनाह माँगता हूँ!”
ख़ैबर के क़रीब पहुँचकर हमारे प्यारे नबी ने अपने सहाबा को रोक दिया। हाथ उठाकर यूँ मुनाजात शुरू फ़रमाई: “ऐ आसमानों और उनके साये तले की हर चीज़ के रब, या अल्लाह! ऐ ज़मीनों और उन पर की हर चीज़ के रब, या अल्लाह! ऐ शैतानों और उनके गुमराह किए हुओं के रब, या अल्लाह! ऐ हवाओं और उनकी उड़ाई हुई चीज़ों के रब, या अल्लाह! हम तुझसे इस बस्ती की ख़ैर और भलाई, इस बस्ती में रहने वाले लोगों की ख़ैर और भलाई और इस बस्ती में मौजूद हर चीज़ की ख़ैर और भलाई माँगते हैं। इस बस्ती के शर से, लोगों के शर से और इसमें मौजूद हर चीज़ के शर से तेरी पनाह माँगते हैं!”
सहाबा के होंठों से “आमीन, आमीन” की आवाज़ें उठने लगीं। इसके बाद आपने अपने सहाबा से फ़रमाया: “‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम’ कहकर आगे बढ़ो।”
सहाबा-ए-किराम रसूल-ए-अकरम के गिर्द इकट्ठे होकर फिर रवाना हुए। वे ख़ैबर के सबसे मज़बूत क़िलों में से एक, नतात क़िले के पास पहुँचे।
वहाँ उन्होंने पड़ाव डाला। शाम का वक़्त था। रसूलुल्लाह की मुबारक आदत थी कि सुबह होने से पहले हमला नहीं करते थे और पहले इस्लाम की दावत देते थे। अगर दुश्मन यह पेशकश क़बूल न करते, तो जंग शुरू होती। इसलिए सहाबा-ए-किराम ने सुबह का इंतिज़ार किया। यहूदियों में से किसी को इस्लामी लश्कर के आने का पता न चला था। कायनात के सरदार ने फ़ज्र की नमाज़ पढ़ाने के बाद तैयारियाँ पूरी कीं और मुजाहिदों को आगे बढ़ाया। दो सौ घुड़सवार और एक हज़ार चार सौ पैदल मुजाहिद क़तार-दर-क़तार नतात क़िले के सामने पहुँचे। इसी वक़्त कुछ यहूदी अंगूर के बाग़ों, बाग़ीचों और खेतों में काम करने के लिए क़िले से निकले थे; वे अचानक इस्लामी सिपाहियों के सामने आ गए और हैरान रह गए।
वे यह कहते हुए उल्टे पाँव भागने लगे: “क़सम खाते हैं, ये तो मुहम्मद और उसका मुनज़्ज़म लश्कर है!…” उनकी यह हालत देखकर हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “अल्लाहु अकबर! अल्लाहु अकबर! ख़ैबर बर्बाद हो गया।” और आपने यह मुबारक बात तीन बार दोहराई। नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने यहूदियों को बता दिया कि या तो वे मुसलमान हो जाएँ, या हथियार डालकर ख़िराज और जिज़्या दें, वरना जंग होगी और ख़ून बहेगा। यहूदियों ने अपने बड़ों में से सल्लाम इब्ने मिशकम के पास जाकर हाल बताया। सल्लाम ने उन्हें जंग पर उभारते हुए कहा: “मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि मुहम्मद पर चढ़ाई करो, तुमने न माना। कम से कम अब उससे लड़ने में ढीले न पड़ना। मुसलमानों से लड़ते-लड़ते मर जाना ज़िंदगी में बेसहारा रह जाने से बेहतर है!…” यहूदियों ने जल्दी-जल्दी अपने बच्चों और औरतों को कतीबा क़िले में, रसद को नाइम में और अपने सिपाहियों को नतात क़िले में जमा कर दिया।
इस्लामी लश्कर की मुसलमान होने की पेशकश का जवाब यहूदियों ने तीर बरसाकर दिया। मुजाहिदों ने तीरों को अपनी ढालों पर रोका। हमारे प्यारे नबी के हुक्म से कमानें खींची गईं, और “अल्लाहु अकबर!…” की सदाओं के बीच क़िले के बुर्जों पर मौजूद यहूदियों पर तीर छोड़े गए। अब जंग शुरू हो चुकी थी। एक तरफ़ कायनात के सुल्तान और आपके बहादुर सहाबा इस्लाम को फैलाने और यहूदियों के मुसलमान होकर जहन्नम से बचने का ज़रिया बनने के लिए लड़ रहे थे। दूसरी तरफ़ वे यहूदी थे जो नसीहत नहीं समझते थे, हर मौक़े पर मुसलमानों पर पीठ पीछे से वार करना चाहते थे और हक़ीक़त को न देखने पर अड़े हुए थे। जब उन्होंने देखा कि ख़ातमुल अंबिया (आख़िरी नबी) उनकी अपनी क़ौम में से नहीं आए, तो हसद के मारे उन्होंने आपको क़बूल न किया; नबी-ए-करीम को बचपन से ही मिटा देने के लिए अपनी अक़्ल में आने वाली हर चाल चली, मगर अल्लाह तआला की हिफ़ाज़त की वजह से कुछ न कर सके।
एक हज़ार छह सौ शान वाले मुजाहिदों पर दस हज़ार से ज़्यादा यहूदी सिपाही तीर बरसा रहे थे। सहाबा-ए-किराम एक के बाद एक आने वाले इन तीरों से अपनी ढालों के ज़रिए बचते और मौक़ा मिलते ही ज़मीन पर गिरे तीर उठाकर यहूदियों पर वापस चलाते थे। लेकिन कुछ सहाबा ज़ख़्मी हो गए।
इसी बीच हज़रत हुबाब इब्ने मुंज़िर बड़े अदब के साथ हबीबुल्लाह की ख़िदमत में हाज़िर हुए और पूछा: “या रसूलल्लाह! मेरी जान आप पर क़ुरबान! अगर हम अपना पड़ाव किसी और जगह डालें, तो कैसा रहे?” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “इंशाअल्लाहु तआला, शाम होने पर बदल देंगे!” मुजाहिद तीर की मार के दायरे में आ चुके थे। क़िले से यहूदियों के चलाए तीर इस्लामी पड़ाव के पिछले हिस्सों तक पहुँच रहे थे।4 उस दिन शाम तक जंग तीरों से होती रही। लगभग पचास सहाबा तीरों से ज़ख़्मी हुए। शाम होने पर नए पड़ाव की जगह ढूँढने का काम हज़रत मुहम्मद इब्ने मस्लमा को सौंपा गया। उन्होंने बताया कि रजीअ नाम की जगह मुनासिब है, तो इस्लामी पड़ाव वहाँ मुंतक़िल कर दिया गया।
“हम नबी विरासत नहीं छोड़ते। जो कुछ हम छोड़ जाते हैं, वह ग़रीबों के लिए सदक़ा होता है” हदीस शरीफ़
ख़ैबर का ग़ज़वा
ज़ख़्मियों का इलाज भी शुरू हो गया।5 अगले दिन बहादुर सहाबा नतात के सामने आकर शाम तक लड़ते रहे। तीसरे, चौथे और पाँचवें दिन भी घेराबंदी जारी रही। यहूदी बराबर बचाव ही करते रहे। उन दिनों हमारे प्यारे नबी को सख़्त सिरदर्द हो गया, इसलिए आप दो दिन मुजाहिदों के बीच तशरीफ़ न ला सके। पहले दिन आपने झंडा हज़रत अबू बकर को और दूसरे दिन हज़रत उमर को दिया। दोनों ने सहाबा-ए-किराम के आगे रहकर यहूदियों से बहुत सख़्त जंग की, लेकिन क़िला फ़तह करना मुमकिन न हुआ। इसी बीच यहूदियों की हिम्मत बढ़ गई और वे क़िले के दरवाज़े खोलकर हमले पर उतर आए। अब आमने-सामने, सीना-ब-सीना लड़ाई शुरू हो गई थी। जंग बहुत भड़क उठी थी। नबी-ए-करीम जब-जब अपने सहाबा से फ़रमाते: “अल्लाहु अकबर! अल्लाहु अकबर!… कहकर तकबीर कहो!”, तब-तब वे तकबीरों की सदाओं के बीच इश्क़ और जोश के साथ दुश्मन पर तलवार चलाते। एक मौक़े पर मुहम्मद इब्ने मस्लमा के भाई महमूद शहीद हो गए। सख़्त लड़ाइयाँ शाम तक जारी रहीं।
अगले दिन ख़ैबर के सबसे मशहूर सिपहसालारों में से मरहब ज़िरहों में लिपटा हुआ क़िले से बाहर निकला। वह बहुत ताक़तवर, देव जैसा आदमी था। अब तक उसके सामने कोई ऐसा पहलवान नहीं आया था जो उसे हरा सके। वह मुजाहिदों की तरफ़ मुड़कर डींग मारने लगा: “मैं वह मरहब हूँ जो अपनी हिम्मत और बहादुरी के लिए मशहूर है!” वह यूँ डींगें मार ही रहा था कि सहाबा के बीच से एक मुजाहिद आगे बढ़े। उन्होंने मरहब के सामने नारा लगाया: “मैं भी वह आमिर हूँ जो ख़ौफ़नाक और सख़्त जंगों के बीच कूद पड़ने से नहीं डरता!” और फ़ौरन उसके सामने डट गए। देव जैसे मरहब ने अपनी वह तलवार, जिस पर लिखा था: “जिसे लगे, उसे हलाक कर दे!…”, पूरी ताक़त से हज़रत आमिर पर चलाई। बहादुर आमिर ने उसी पल अपनी ढाल उठा ली। चौड़ी तलवार ढाल से टकराई तो एक ज़ोरदार आवाज़ से सारा मैदान गूँज उठा, और तलवार ढाल में धँस गई।
हज़रत आमिर ने पैदा करने वाले की पनाह ली और “या अल्लाह!” कहकर अपनी तलवार मरहब की ज़िरह से ढकी टाँगों पर चलाई। तलवार फ़ौलादी ज़िरह से टकराते ही उछलकर वापस आई और अचानक ख़ुद सहाबी की टाँग पर लग गई। तलवार के ज़ोर से पलटने की वजह से हज़रत आमिर की टाँग की बड़ी रग कट गई। सहाबा-ए-किराम दौड़कर आए, आमिर को उठाया और इलाज के लिए पड़ाव पर ले गए। लेकिन आमिर (रज़ियल्लाहु अन्हु) वहीं शहीद होकर जन्नत के सबसे ऊँचे दर्जों की तरफ़ परवाज़ कर गए।6
जंग पूरी शिद्दत से जारी थी। शाम के क़रीब हमारे प्यारे नबी ने उन मुशरिक ग़तफ़ान वालों को, जो यहूदियों की मदद के लिए चार हज़ार सिपाहियों के साथ आए थे और जंग में शामिल हो गए थे, यह पेशकश की कि वे अलग होकर अपने वतन लौट जाएँ। आपने यह वादा भी फ़रमाया कि अगर वे ऐसा करें, तो उन्हें ख़ैबर की एक साल की खजूर की पैदावार दे दी जाएगी। लेकिन ग़तफ़ान वालों ने यह पेशकश ठुकरा दी। इस पर सारे जहानों के सरदार (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने सहाबा को हुक्म दिया कि वे ग़तफ़ान वालों के क़िले के इर्द-गिर्द रात गुज़ारें। ग़तफ़ान वाले रात में मुजाहिदों के हमले से बहुत डरे और किसी तरह सो न सके। उस रात न जाने कहाँ से एक आवाज़ आ रही थी, जो बता रही थी कि ग़तफ़ान के इलाक़े पर धावा बोल दिया गया है और उनके बाल-बच्चे और माल क़ब्ज़े में ले लिए गए हैं। यह आवाज़ तीन बार दोहराई गई, और सारे ग़तफ़ान वालों ने इसे बड़े ख़ौफ़ के साथ सुना। उनके सिपहसालार उयैना ने भी यही आवाज़ तीन बार सुनी, और पौ फटने के क़रीब अपने सिपाहियों को लेकर जल्दी से ख़ैबर से निकल गया और अपने वतन की राह ली। सुबह यहूदी ग़तफ़ान वालों के बिना किसी वजह के ख़ैबर छोड़ जाने पर हैरान रह गए और मायूस हो गए। उन्हें मदद के लिए बुलाने पर भी वे बहुत पछताए।
“जिस दिन हमने ख़ैबर का क़िला लिया, रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने पालतू गधे का गोश्त खाने और मुतआ के निकाह से औरत लेने को मना फ़रमा दिया” हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु)
हज़रत अली की बहादुरी
उस दिन भी ख़ैबर के सामने सख़्त लड़ाइयाँ हुईं, लेकिन क़िला फ़तह न हो सका। शाम को कायनात के सुल्तान ने यह ख़ुशख़बरी दी: “कल मैं झंडा ऐसे बहादुर को दूँगा जो अल्लाह तआला और उसके रसूल से मुहब्बत करता है, और अल्लाह तआला और उसका रसूल भी उससे मुहब्बत करते हैं। अल्लाह तआला उसके हाथ से फ़तह अता करेगा!”
उस रात सहाबा-ए-किराम ने बड़ी बेचैनी से सुबह का इंतिज़ार किया। हर एक उम्मीद कर रहे थे कि झंडा उन्हें मिले, और इसके लिए अल्लाह तआला से दुआएँ कर रहे थे। हज़रत बिलाल हब्शी ने फ़ज्र की अज़ान अपनी दर्द भरी और ख़ूबसूरत आवाज़ में दी। अज़ान होते वक़्त हर एक के दिल में एक अलग ही जोश, एक अलग ही लज़्ज़त पैदा होती थी; उस इलाही लज़्ज़त से जी नहीं भरता था। हमारे प्यारे नबी अपने सहाबा को फ़ज्र की नमाज़ पढ़ाने के बाद खड़े हुए। आपने मुबारक इस्लामी झंडा लाने का हुक्म दिया। मुक़द्दस झंडा लाया जा रहा था, तो सहाबा-ए-किराम खड़े इंतिज़ार कर रहे थे और रसूल-ए-अकरम के मुबारक होंठों से निकलने वाले अल्फ़ाज़ सुनने के लिए हमातन गोश थे।
आख़िरकार सारे जहानों के सरदार ने फ़रमाया: “उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसने मुहम्मद की ज़ात को नुबुव्वत से मुशर्रफ़ फ़रमाया, मैं यह झंडा ऐसे बहादुर को दूँगा जो भागना जानता ही नहीं।” फिर अपनी मुबारक निगाहें सहाबा पर फेरकर पूछा: “अली कहाँ हैं?” सहाबा ने कहा: “या रसूलल्लाह! उनकी आँखें दुख रही हैं।” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “उन्हें मेरे पास बुलाओ।” उन दिनों हज़रत अली की आँखें दुख रही थीं और वह उन्हें खोल नहीं पाते थे। लोग उनके पास गए, हाल बताया और उनकी मुबारक बाँह थामकर रसूलुल्लाह की ख़िदमत में ले आए। कायनात के सुल्तान ने हज़रत अली की शिफ़ा के लिए अल्लाह तआला से दुआ फ़रमाई और अपनी मुबारक उँगलियाँ मुँह में तर करके उनकी आँखों पर फेरीं। उसी पल हज़रत अली की आँखों में कोई दर्द बाक़ी न रहा। फिर आपने उनके लिए यह दुआ भी फ़रमाई: “या रब! इससे गर्मी और सर्दी की तकलीफ़ दूर कर दे!” फिर आपने अपने मुबारक हाथों से हज़रत अली को ज़िरह पहनाई, उनकी कमर में अपनी तलवार बाँधी, उनके हाथ में सफ़ेद इस्लामी झंडा दिया और फ़रमाया: “जब तक अल्लाह तआला तुम्हें फ़तह नसीब न करे, लड़ते रहो। ख़बरदार, पीठ न फेरना!” हज़रत अली ने कहा: “या रसूलल्लाह! मेरी जान आप पर क़ुरबान! जब तक वे इस्लाम के दीन में दाख़िल न हों, मैं उनसे लड़ता रहूँगा।” हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “अल्लाह की क़सम, अगर तुम्हारी वजह से अल्लाह तआला उनमें से एक आदमी को भी हिदायत दे दे, तो यह तुम्हारे लिए इससे बेहतर है कि तुम बहुत-से सुर्ख़ ऊँटों के मालिक बनो और उन्हें अल्लाह तआला की राह में सदक़ा कर दो।”7
हज़रत अली हाथ में झंडा लिए यहूदियों के क़िले की तरफ़ बढ़े, तो शान वाले सहाबा भी उनके पीछे-पीछे चले। क़िले के बिल्कुल क़रीब पहुँचकर उन्होंने झंडा एक पत्थर के पास गाड़ा ही था कि नतात क़िले का दरवाज़ा खुल गया।
यहूदियों के हमलावर दस्ते बाहर निकले। ये ख़ैबर के सबसे चुने हुए बहादुर थे। हर एक दोहरी ज़िरह पहने और लोहे के हिफ़ाज़ती लिबास में लिपटा हुआ था। उनमें से एक हज़रत अली की तरफ़ बढ़ा और लड़ने के लिए उनके सामने आ खड़ा हुआ। यह मरहब का भाई हारिस था, जिसकी बहादुरी की कोई मिसाल न थी। वह तेज़ी से झपटा… दो फ़ौलादों की झनकार से मैदान भरा हुआ था कि ज़ुल्फ़िक़ार बिजली की तरह गिरी और हारिस का सिर धड़ से अलग कर दिया। उसी पल “अल्लाहु अकबर! अल्लाहु अकबर!” की सदाएँ आसमान तक बुलंद हो गईं। अपने भाई के मारे जाने की ख़बर सुनकर मरहब अपने मातहत सिपाहियों के साथ सरपट मैदान में आया और हज़रत अली के सामने डट गया। उसके जिस्म पर भी दोहरी ज़िरह थी। दो तलवारें लटकाए, अपने भारी-भरकम जिस्म के साथ वह किसी देव जैसा लगता था। पूरे ग़ुस्से के साथ वह अपनी तारीफ़ करने लगा: “मैं वह मरहब हूँ जो जंगों के सबसे सख़्त मौक़ों पर मैदान में कूदकर बहादुरी से लड़ता है! मैं दहाड़ते शेरों को भी अपने नेज़े या तलवार से छलनी कर देता हूँ!…”
हज़रत अली (कर्रमल्लाहु वज्हहू व रज़ियल्लाहु अन्हु) ने यूँ जवाब दिया: “मैं वह हूँ जिसका नाम मेरी माँ ने हैदर (शेर) रखा। मैं हैबत वाले शेर की तरह हूँ! मैं वह बहादुर हूँ जो तुम्हें एक ही वार में ज़मीन पर गिरा देगा!…”
मरहब ने हज़रत अली से “हैदर” का लफ़्ज़ सुना तो उसके दिल में डर बैठ गया, क्योंकि रात को ख़्वाब में एक शेर ने उसे चीर-फाड़ डाला था। कहीं ख़्वाब में देखा हुआ शेर यही तो नहीं था? इतने में देव जैसे मरहब ने हमला किया, और हज़रत अली ने उसे अपनी ढाल पर रोका। फिर अल्लाह तआला की पनाह लेकर “या अल्लाह!…” कहते हुए ज़ुल्फ़िक़ार काफ़िर के सिर पर इतने ज़ोर से मारी कि भारी-भरकम मरहब की वह मोटी फ़ौलादी ढाल भी, जो उसने ज़ुल्फ़िक़ार के सामने कर रखी थी, और फ़ौलाद का बना ख़ोद भी दो टुकड़े हो गए, और उसका सिर चोटी से गुद्दी तक चिरकर दो हिस्से हो गया। उसकी गर्दन से ख़ून फ़व्वारे की तरह फूट पड़ा, और उसका देव जैसा जिस्म ज़मीन पर ढेर हो गया। ज़ुल्फ़िक़ार की ख़ौफ़नाक आवाज़ ख़ैबर के हर कोने में सुनी गई। नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ख़ुश हो जाओ! अब ख़ैबर की फ़तह आसान हो गई।” सहाबा-ए-किराम हज़रत अली की इस बहादुरी पर हैरान रह गए और “अल्लाहु अकबर! अल्लाहु अकबर!…” के नारों से आसमान गुँजा दिया।
जंग पूरी शिद्दत से जारी थी। सहाबा-ए-किराम लड़ते-लड़ते क़िले के दरवाज़े के पास पहुँचे ही थे कि एक यहूदी ने अपनी तलवार हज़रत अली की ढाल पर मारी। ढाल ज़मीन पर गिर पड़ी, लेकिन झुककर उठाने का वक़्त न था। यहूदी ने मौक़ा हाथ से न जाने दिया और ढाल झपटकर पीछे भाग गया। अल्लाह तआला के शेर इस पर बहुत रंजीदा हुए; उन्होंने ज़ुल्फ़िक़ार से अपने आस-पास के दुश्मनों को तितर-बितर किया और फिर क़िले के दरवाज़े को ढाल बनाने की नीयत की। “बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम” कहकर वह लोहे के बड़े दरवाज़े के कड़ों से लटक गए। उसके कुंडे दीवार से हिलाकर उखाड़ लिए… हज़रत अली दरवाज़ा उखाड़ रहे थे तो क़िला अपनी जगह से हिल उठा। जिस दरवाज़े को आठ-दस पहलवान अपनी जगह से हिला भी न सकते, उसे एक हाथ से ढाल बनाकर वह लड़ने लगे। यह नाक़ाबिल-ए-यक़ीन वाक़िआ हमारे प्यारे नबी का एक मोजिज़ा और हज़रत अली की एक करामत था।8
उनके सामने एक के बाद एक यहूदियों के सबसे बहादुर छह पहलवान और आए। अल्लाह तआला की इजाज़त से उन्हें भी पछाड़कर हज़रत अली अपने बहादुर साथियों के साथ क़िले में दाख़िल हुए। अब लड़ाई क़िले के अंदर हो रही थी। थोड़ी ही देर में उनके मुक़ाबले को कोई न बचा। उन्होंने इस्लामी झंडा क़िले पर गाड़ दिया। इस तरह यहूदियों का सबसे मज़बूत क़िला नतात फ़तह हुआ। हमारे प्यारे नबी ने हज़रत अली की आँखों को चूमा और फ़रमाया: “तुमने जो बहादुरी दिखाई, उसकी वजह से अल्लाह तआला और उसका रसूल तुमसे राज़ी हो गए।” यह मुबारक कलाम सुनकर अली ख़ुशी से रो पड़े। नबी-ए-करीम ने पूछा: “क्यों रो रहे हो?” तो उन्होंने कहा: “या रसूलल्लाह! मेरी जान आप पर क़ुरबान! ख़ुशी से रो रहा हूँ, क्योंकि अल्लाह तआला और उसका रसूल मुझसे राज़ी हो गए।” इस पर हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “सिर्फ़ मैं ही नहीं, जिबराईल, मीकाईल और तमाम फ़रिश्ते तुमसे राज़ी हो गए।” इसी दौरान दौस क़बीले के चार सौ मुसलमान नबी-ए-करीम की मदद को आ पहुँचे।9 इसके बाद बाक़ी क़िलों को फ़तह करने के लिए सख़्त लड़ाइयाँ जारी रहीं। ख़ैबर के बाक़ी सात मज़बूत क़िले भी एक-एक करके गिर गए, तो बेबस यहूदियों ने वफ़्द भेजकर सुलह की दरख़्वास्त की। हमारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने यह पेशकश क़बूल फ़रमाई, और इन शर्तों पर समझौता हुआ: 1. इस जंग में मुसलमानों से लड़ने वाले यहूदियों का ख़ून नहीं बहाया जाएगा। 2. ख़ैबर छोड़कर जाने वाले यहूदी अपने साथ सिर्फ़ अपने बच्चे और एक ऊँट के बोझ भर ज़रूरी घरेलू सामान ले जा सकेंगे। 3. बाक़ी तमाम मनक़ूला और ग़ैर-मनक़ूला माल; ज़िरह, तलवार, ढाल, कमान, तीर जैसे तमाम हथियार, बदन पर के कपड़ों के सिवा तमाम पहनावे; कपड़े के थान, सोना और ख़ज़ाने, घोड़े, ऊँट, भेड़ जैसे तमाम जानवर… जो कुछ है, सब मुसलमानों का होगा। 4. जो चीज़ मुसलमानों के लिए छोड़नी है, वह किसी भी सूरत में छिपाई नहीं जाएगी। छिपाने वाले अल्लाह तआला और उसके रसूल की अमान और हिमायत से बाहर हो जाएँगे…
“मैं वह हूँ जिसका नाम मेरी माँ ने हैदर (शेर) रखा। मैं हैबत वाले शेर की तरह हूँ!” हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु)
किनाना इब्ने रबीअ ने इन शर्तों को न माना और अपने ख़ज़ाने चमड़े की थैलियों में भरकर ज़मीन में गाड़ दिए; उसे सज़ा दी गई। हाथ आए माल-ए-ग़नीमत की कोई गिनती न थी। ख़ैबर की वे उपजाऊ ज़मीनें और खजूर के बाग़ पूरे के पूरे इस्लामी लश्कर के हाथ आ गए।10 इसी दौरान ग़तफ़ान वाले, जो अपने वतन लौट गए थे, यहूदियों की मदद के लिए फिर ख़ैबर लौट आए थे। जब उन्होंने देखा कि नबी-ए-करीम ने ख़ैबर फ़तह कर लिया है और यहूदियों को हथियार डालने पर मजबूर कर दिया है, तो कहने लगे: “ऐ मुहम्मद! तुमने वादा किया था कि अगर हम ख़ैबर छोड़ दें, तो हमें ख़ैबर की एक साल की खजूरें दोगे। हम अपनी बात पर क़ायम रहे। लाओ, वे हमें दे दो!” नबी-ए-करीम ने उनसे फ़रमाया: “फ़लाँ पहाड़ तुम्हारा हुआ।” ग़तफ़ान वालों ने यह कहकर धमकी देने की कोशिश की: “तो फिर हम तुम लोगों से लड़ेंगे।” रसूल-ए-अकरम ने फ़रमाया: “हमारी लड़ाई की जगह जनफ़ा हो।” जनफ़ा ग़तफ़ान वालों के एक इलाक़े का नाम था। ग़तफ़ान वालों ने यह सुना तो डर के मारे पीछे हट गए।
हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) और आपके बहादुर सहाबा ख़ैबर की फ़तह के दौरान बहुत थक गए थे। एक तरफ़ ज़ख़्मियों का इलाज हो रहा था, दूसरी तरफ़ वे आराम कर रहे थे।
यहूदियों के बड़े लोगों में से सल्लाम इब्ने मिशकम की बीवी ज़ैनब ने नबी-ए-करीम को ज़हर देकर मार डालना चाहा। इसके लिए उसने एक भेड़ ज़बह करके पकाई और गोश्त में बहुत-सा ज़हर मिला दिया। फिर रसूलुल्लाह की ख़िदमत में आकर कहा कि वह तोहफ़ा लाई है। रसूल-ए-अकरम ने उसे क़बूल फ़रमाया और अपने सहाबा को बुलाया, और सब मिलकर खाने बैठे। सारे जहानों के सरदार ने भेड़ के कबाब में से एक टुकड़ा तोड़ा और “बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम” कहकर अपने मुबारक मुँह में रखा। कुछ बार चबाने के बाद फ़ौरन मुबारक मुँह से निकाल दिया और फ़रमाया: “ऐ मेरे सहाबा! इस खाने से हाथ खींच लो! इस दस्ती के गोश्त ने मुझे बताया है कि इसमें ज़हर मिलाया गया है।” सहाबा ने फ़ौरन खाने से हाथ खींच लिए। लेकिन हज़रत बिश्र इब्ने बरा गोश्त का एक लुक़मा खा चुके थे; उनका जिस्म फ़ौरन नीला पड़ गया, और वह शहीद हो गए। हमारे प्यारे नबी के पास जिबराईल अलैहिस्सलाम आए और कहा कि मुबारक लुआब में मिले ज़हर के असर से बचने के लिए आप मुबारक कंधों के बीच हिजामा (पछने लगवाकर ख़ून निकलवाना) करवाएँ। ऐसा ही किया गया। फिर ज़हरीला कबाब ज़मीन में दबा दिया गया। यह काम करने वाली ज़ैनब को पकड़कर ख़िदमत में लाया गया।
नबी-ए-करीम ने उससे फ़रमाया: “क्या इस भेड़ के कबाब में तुमने ज़हर मिलाया था?” उसने अपना जुर्म मानते हुए कहा: “हाँ! मैंने ज़हर मिलाया था!” नबी-ए-करीम ने पूछा: “तुमने ऐसा क्यों करना चाहा?” तो उसने कहा: “तुमने मेरे शौहर, मेरे बाप और मेरे चचा को क़त्ल किया। मैंने अपने दिल में कहा: ‘अगर वह सचमुच नबी है, तो अल्लाह उसे बता देगा। अगर नहीं, तो यह ज़हर उस पर असर करेगा और वह मर जाएगा। इस तरह हम उससे छुटकारा पा लेंगे।’” सहाबा-ए-किराम इस वाक़िए से बहुत रंजीदा हुए। उन्होंने पूछा: “या रसूलल्लाह! हमारी जानें आप पर क़ुरबान! क्या हम इसे क़त्ल कर दें?” तो सारे जहानों के सरदार ने, जो अपनी ज़ात के साथ होने वाली हर बेअदबी को माफ़ कर देते थे, उसे भी माफ़ कर दिया। यह बड़ी रहमत देखकर ज़ैनब ने कलिमा-ए-शहादत पढ़ा और मुसलमान हो गईं।11 ख़ैबर में हाथ आए माल-ए-ग़नीमत और क़ैदियों में हुयय इब्ने अख़तब की बेटी सफ़िय्या भी थीं। सिपहसालार-ए-आला के हक़ के तौर पर वह नबी-ए-करीम के हिस्से में आईं। सारे जहानों के सरदार ने अपनी इस क़ैदी को आज़ाद कर दिया। वह इससे बहुत मुतास्सिर हुईं और दिल व जान से कलिमा-ए-शहादत पढ़कर मुसलमान हो गईं। इस पर हमारे प्यारे नबी बहुत ख़ुश हुए और हमारी माँ हज़रत सफ़िय्या को अपने निकाह का शरफ़ बख़्शा। इस तरह हज़रत सफ़िय्या उम्मुल मोमिनीन (मोमिनों की माँ) बन गईं। सहबा नाम की जगह पर उनकी शादी हुई, और ख़रबूज़े और खजूर से वलीमा, यानी शादी की दावत दी गई।12
सफ़िय्या की मुबारक आँखों में एक नीला निशान दिखाई देता था।
हमारे प्यारे नबी ने पूछा: “यह निशान कैसा है?” तो उन्होंने कहा: “एक रात मैंने ख़्वाब में देखा था कि चाँद आसमान से उतरकर मेरी गोद में आ गया है। मैंने अपने शौहर किनाना को बताया, तो उसने यह कहकर मेरी आँख पर थप्पड़ मारा: ‘तू हम पर चढ़ आने वाले उस अरब बादशाह की बीवी बनने पर नज़र गड़ाए बैठी है!’ और जैसा कि आप देख रहे हैं, यह नीली पड़ गई।” ख़ैबर फ़तह होने के बाद यहूदियों ने नबी-ए-करीम के सामने यह पेशकश रखी: “ऐ मुहम्मद! हम ख़ैबर से चले जाएँगे। लेकिन हम खेती-बाड़ी, खेतों, अंगूर के बाग़ों और बाग़ीचों की देखभाल अच्छी तरह जानते हैं। अगर तुम चाहो, तो ये उपजाऊ ज़मीनें हमें किराए पर दे दो। हम इन जायदादों पर काम करें और जो पैदावार हो, उसका आधा तुम्हें दें!” हमारे प्यारे नबी और सहाबा के पास खेती के कामों में लगने का वक़्त न था। वे इस्लाम के दीन को फैलाने की कोशिश में लगे थे, अल्लाह की राह में जिहाद (जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह) के लिए दिन-रात एक करके लगातार मेहनत कर रहे थे।13 नबी-ए-करीम इस पेशकश पर राज़ी हो गए और फ़रमाया: “इस शर्त पर कि जब हम चाहेंगे, तुम्हें निकाल देंगे।” यहूदियों ने यह क़बूल कर लिया और ख़ैबर की ज़मीनों पर काम करने लगे।14 नबी-ए-करीम अपने सहाबा के साथ फ़तह पाकर मदीना लौटे। उन्हीं दिनों हब्शा हिजरत करने वाले मुहाजिरों में से बचे हुए आख़िरी सहाबा, जिनमें उम्मे हबीबा (रज़ियल्लाहु अन्हा) भी थीं, जाफ़र इब्ने अबी तालिब की सरबराही में नज्जाशी के दिए हुए दो जहाज़ों में सवार होकर जार की बंदरगाह पर उतरे। वहाँ से ऊँटों पर सवार होकर मदीना आए। बारह साल पहले हब्शा हिजरत करने वाले अपने सहाबा को जाफ़र इब्ने अबी तालिब की सरबराही में लौटते देखकर नबी-ए-करीम बहुत ख़ुश हुए। आपने हज़रत जाफ़र की पेशानी चूमी, उन्हें सीने से लगाया और फ़रमाया:
“ऐ मेरे सहाबा! इस खाने से हाथ खींच लो! इस दस्ती के गोश्त ने मुझे बताया है कि इसमें ज़हर मिलाया गया है” हदीस शरीफ़
“मैं नहीं जानता कि ख़ैबर की फ़तह पर ख़ुश होऊँ या जाफ़र के आने पर। तुम्हारी हिजरत दो बार हुई है: तुमने हब्शा के मुल्क की तरफ़ भी हिजरत की और मेरे वतन की तरफ़ भी।” उन्होंने नज्जाशी असहमा के भेजे हुए तोहफ़े और ख़त रसूलुल्लाह की ख़िदमत में पेश किए। हमारी माँ उम्मे हबीबा के साथ शादी भी इसी साल हुई। उम्मे हबीबा उस वक़्त छत्तीस साल की थीं। ख़ैबर में हासिल हुआ माल-ए-ग़नीमत हुदैबिया के समझौते में शरीक तमाम सहाबा-ए-किराम, ख़ैबर के ग़ज़वे में शरीक होने वालों, हब्शा से हिजरत करके लौटने वाले सहाबा और फ़तह में शामिल होने वाले दौस क़बीले में बाँटा गया।15
ख़ैबर की फ़तह के साथ अरब के तमाम यहूदी नबी-ए-करीम के हुक्म के तहत आ गए। अब उनके पास मुशरिकों की मदद करने की कोई गुंजाइश न रही। आस-पास के क़बीले और सल्तनतें भी समझ गईं कि जिन मुसलमानों ने ख़ैबर का वह क़िला जीत लिया, जिसका हथियारों और फ़ौज के लिहाज़ से फ़तह होना नामुमकिन लगता था, वे कितनी बड़ी ताक़त के मालिक हैं, और वे इस इस्लामी सल्तनत से डरने लगीं। मक्का के मुशरिक ख़ैबर की फ़तह से बड़े ग़म और मायूसी में डूब गए। इस फ़तह के बाद छोटे-बड़े बहुत-से क़बीले मुसलमान होने के लिए मदीना मुनव्वरा आए और सहाबा-ए-किराम में शामिल होने के शरफ़ से नवाज़े गए, यहाँ तक कि ग़तफ़ान वाले भी… जो कुछ क़बीले राह पर न आए, उन्हें लश्कर भेजकर फ़रमाँबरदार बनाया गया।
