मेरे प्यारे नबी

बारिश की दुआ

हिजरत के छठे साल सख़्त क़हत पड़ा; आसमान से एक बूँद भी न गिरी। इस वजह से ज़मीन पर घास न उगी, इंसान और जानवर भूख की तकलीफ़ में पड़ गए। मुबारक रमज़ान के महीने में एक जुमा के दिन लोगों ने हमारे प्यारे नबी से अपनी ख़्वाहिश ज़ाहिर की: “या रसूलल्लाह! काश आप दुआ फ़रमाएँ और अल्लाह तआला हमें बारिश अता फ़रमाए!…” नबी-ए-करीम अपने सहाबा के साथ मैदान में निकले और अज़ान और इक़ामत के बग़ैर दो रकअत नमाज़ पढ़ी। नबी-ए-करीम ने अपनी मुबारक चादर (रिदा) उलटी करके ओढ़ी और तकबीर कही। फिर अपने मुबारक हाथ इतने ऊँचे उठाए कि आस्तीनों के बीच से मुबारक बग़लें दिखाई देने लगीं, और यूँ दुआ फ़रमाने लगे: “या अल्लाह! हमें बारिश अता फ़रमा!…” सहाबा-ए-किराम कह रहे थे: “आमीन! आमीन!” उस वक़्त आसमान बिल्कुल साफ़ था, एक भी बादल न था। रसूल-ए-अकरम दुआ फ़रमा रहे थे कि हवा चलने लगी और आसमान पर बादल छा गए। फिर हल्की-हल्की फुहार पड़ने लगी। इस पर सारे जहानों के सरदार ने यूँ दुआ फ़रमाई: “या अल्लाह! इस बारिश को मूसलाधार बरसा और इसे हमारे हक़ में भलाई वाला बना दे!” उसी पल मूसलाधार बारिश होने लगी। नबी-ए-करीम और सहाबा-ए-किराम के कपड़ों में कोई जगह सूखी न रही। घर पहुँचते-पहुँचते पानी ने हर तरफ़ को तालाब बना दिया था। हर कोई पानी में धँसता हुआ चल रहा था। बारिश थमी नहीं। उस दिन भी, अगले दिन भी, उसके बाद भी… अगले जुमा की नमाज़ के वक़्त सहाबा-ए-किराम ने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! बारिश के पानी से हमारे घर गिरने लगे हैं, हमारे जानवर डूबने लगे हैं। काश आप अल्लाह तआला से दुआ फ़रमाएँ कि बारिश रुक जाए!…” हमारे प्यारे नबी मुस्कुराए, अपने मुबारक हाथ उठाए और यूँ दुआ फ़रमाई:

“या रब! इस बारिश को खेतों, पेड़ उगने की जगहों और वादियों की तरफ़ भेज दे!” उसी पल एक हफ़्ते से बरसती बारिश रुक गई, और जिन जगहों के लिए दुआ की गई थी, वहाँ बारिश होने लगी।

जहान नूर में डूब गए
मुहम्मद पैदा हुए जिस रात,
मोमिन, मुनाफ़िक़ जुदा हुए
मुहम्मद पैदा हुए जिस रात।
आसमाँ से ज़मीं पर नूर बरसा,
सात और चालीस वली आ मिले,
राहिब की ज़बान बंद हुई
मुहम्मद पैदा हुए जिस रात।

“आज हमारे घुड़सवारों में सबसे बेहतर अबू क़तादा हैं और हमारे पैदलों में सबसे बेहतर सलमा इब्ने अकवा” हदीस शरीफ़