बनू क़ुरैज़ा का ग़ज़वा
रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ख़न्दक़ के ग़ज़वे से मदीना मुनव्वरा लौटे तो हमारी माँ हज़रत आइशा के घर तशरीफ़ लाए। अपने हथियार और ज़िरह उतारी। मुबारक जिस्म धूल से अटा हुआ था। आपने ग़ुस्ल फ़रमाया। उसी पल हज़रत दिहया की सूरत में, ज़िरह पहने और हथियार लगाए एक घुड़सवार आया। यह जिबराईल अलैहिस्सलाम थे। नबी-ए-करीम उनके पास पहुँचे तो उन्होंने यह कहकर हुक्म पहुँचाया: “ऐ अल्लाह तआला के रसूल! अल्लाह पाक आपको हुक्म देता है कि आप फ़ौरन बनू क़ुरैज़ा पर चढ़ाई करें!” कायनात के सुल्तान ने हज़रत बिलाल को बुलवाया और सहाबा-ए-किराम में एलान करने के लिए यह हुक्म दिया: “ऐ मेरे सहाबा! उठो, अपने घोड़ों और ऊँटों पर सवार हो जाओ! जो इताअत करने वाले हैं, वे अस्र की नमाज़ बनू क़ुरैज़ा की बस्ती में पढ़ें!”
हबीब-ए-अकरम ने फ़ौरन अपनी ज़िरह पहनी और तलवार बाँधी। अपने मुबारक सिर पर लोहे का ख़ोद रखा, ढाल पीठ पर डाली और नेज़ा हाथ में लिया। फिर अपने घोड़े पर सवार हुए। आप सहाबा के बीच तशरीफ़ लाए, हज़रत अली को इस्लाम का झंडा दिया और उन्हें हिरावल दस्ते के तौर पर मदीना के ठीक दक्षिण-पूरब के मैदान में मौजूद क़ुरैज़ा के यहूदियों के क़िले की तरफ़ भेजा। अब्दुल्लाह इब्ने उम्मे मकतूम को मदीना में नायब छोड़ा।1
शान वाले सहाबा हमारे प्यारे नबी को अपने बीच लेकर “अल्लाहु अकबर! अल्लाहु अकबर!” की तकबीरों के बीच मदीना से रवाना हुए। रास्ते में बनू ग़न्म से उनकी मुलाक़ात हुई। वे हथियार लगाए रसूलुल्लाह का इंतिज़ार कर रहे थे। नबी-ए-करीम ने उनसे पूछा: “क्या तुम्हें कोई मिला?” उन्होंने कहा: “या रसूलल्लाह! हमें दिहया कल्बी मिले। वह ज़ीन कसे एक सफ़ेद ख़च्चर पर सवार थे। उस ख़च्चर पर अतलस का एक मख़मली कपड़ा पड़ा था।” हमारे प्यारे नबी ने उनसे फ़रमाया:
“यह जिबराईल हैं। उन्हें बनू क़ुरैज़ा की तरफ़ भेजा गया है, ताकि उनके क़िलों को हिला दें और उनके दिलों में ख़ौफ़ डाल दें…” क़ुरैज़ा के यहूदियों के क़िले तक पहुँचते-पहुँचते इस्लामी लश्कर की तादाद तीन हज़ार हो गई थी। हज़रत अली ने इस्लाम का झंडा क़ुरैज़ा के यहूदियों के क़िले के सामने गाड़ दिया। यह देखकर यहूदी नबी-ए-करीम के ख़िलाफ़ बुरी बातें बकने लगे। हज़रत अली ने जाकर नबी-ए-करीम को सारा हाल बताया। रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तीन हज़ार सिपाहियों के साथ वहाँ तशरीफ़ ले गए, तो आपने अपनी रहमत से उन्हें इस्लाम की दावत दी। यहूदियों ने यह अच्छी पेशकश क़बूल न की। हमारे प्यारे नबी की यह पेशकश भी उन्होंने ठुकरा दी: “तो फिर अल्लाह तआला और उसके रसूल के हुक्म के आगे सिर झुकाकर क़िले से उतर आओ और हथियार डाल दो।”
इस पर सारे जहानों के सरदार ने तीरंदाज़ों के उस्ताद हज़रत साद इब्ने अबी वक़्क़ास से फ़रमाया: “ऐ साद! आगे बढ़ो और उन पर तीर बरसाओ!” हज़रत साद और दूसरे तीरंदाज़ तकबीर की आवाज़ों के बीच अपने तरकशों के तीर यहूदी क़िले पर चलाने लगे। यहूदियों ने भी तीरों और पत्थरों से जवाब दिया, और इस तरह लड़ाई शुरू हो गई। इस यहूदी टोले ने मुसलमानों की कमज़ोरी के वक़्त पीछे से वार किया था और हसद की वजह से मुहम्मद अलैहिस्सलाम की नुबुव्वत को नहीं माना था; अब उसमें इतनी हिम्मत न थी कि क़िले का दरवाज़ा खोलकर मैदान में निकल आए।
“ऐ मेरे सहाबा! उठो, अपने घोड़ों और ऊँटों पर सवार हो जाओ! जो इताअत करने वाले हैं, वे अस्र की नमाज़ बनू क़ुरैज़ा की बस्ती में पढ़ें!” हदीस शरीफ़
जंग घेराबंदी की शक्ल में जारी रही। इस्लामी लश्कर में मौजूद मुनाफ़िक़ भी चुपके से क़िले में ख़बर भेजकर कहते थे: “हरगिज़ हथियार मत डालना! अगर वे तुमसे मदीना छोड़कर जाने को कहें, तब भी न मानना! अगर तुम लड़ाई जारी रखोगे, तो हम अपनी पूरी ताक़त से तुम्हारी मदद करेंगे, तुमसे अपनी कोई चीज़ नहीं बचाएँगे। और अगर उन्होंने तुम्हें मदीना से निकाल दिया, तो हम भी तुम्हारे साथ निकल जाएँगे!…” यह ख़बर पाकर यहूदी मुनाफ़िक़ों से मदद की आस लगा बैठे और नए अज़्म और नई उम्मीद के साथ बचाव जारी रखा। घेराबंदी लंबी हो गई; लगभग एक महीना होने को आया, मगर मुनाफ़िक़ों की तरफ़ से कोई मदद न आई। उनके दिलों में डर बैठ गया, और उन्होंने समझौते की ख़्वाहिश ज़ाहिर की।
समझौता करने के लिए नब्बाश इब्ने क़ैस नाम का एक यहूदी रसूलुल्लाह की ख़िदमत में आया और बोला: “ऐ मुहम्मद! जो रहम आपने बनू नज़ीर पर दिखाया था, वही हम पर भी दिखाइए। हमारा माल और हमारे हथियार आपके हों! बस हमारा ख़ून न बहाइए। हमें अपने बच्चों और औरतों के साथ अपनी ज़मीन से निकल जाने की इजाज़त दीजिए। हथियारों के सिवा हर घराने के लिए एक ऊँट का बोझ ले जाने की भी इजाज़त दीजिए!…” सारे जहानों के सरदार ने जवाब दिया: “नहीं! यह पेशकश मैं क़बूल नहीं कर सकता!” इस बार नब्बाश ने कहा: “माल ले जाने से हम बाज़ आए। हमारा ख़ून न बहाइए! औरतों और बच्चों को ले जाने की इजाज़त दीजिए!” हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “नहीं! बिना किसी क़ैद और शर्त के मेरे फ़ैसले के आगे सिर झुकाने, इताअत करके हथियार डालने के सिवा तुम्हारे पास कोई चारा नहीं!” यहूदी नब्बाश बदहाली में क़िले को लौटा और सारी बातचीत सुनाई। इस बार बनू क़ुरैज़ा गहरी मायूसी और ग़म में डूब गए।2 उनके सरदारों में से कअब इब्ने असद ने इंसाफ़ से काम लिया और अपनी क़ौम के सामने यह इक़रार और यह पेशकश रखी: “ऐ मेरी क़ौम! जैसा कि तुम देख रहे हो, हम पर बड़ी मुसीबत आ पड़ी है। ऐसी हालत में तुम्हारे लिए मेरी तीन सलाहें हैं। इनमें से जो चाहो चुन लो और उसी के मुताबिक़ अमल करो! पहली यह कि इस हस्ती की पैरवी करें और उनकी नुबुव्वत को मान लें! अल्लाह की क़सम, हम सब जानते हैं कि यह अल्लाह के भेजे हुए वही नबी हैं जिनकी सिफ़तें हमने अपनी किताबों में देखी हैं। अगर हम उन पर ईमान ले आएँ, तो हमारी जानें, हमारे बच्चे, हमारी औरतें और हमारे माल बच जाएँगे। हम उनकी पैरवी सिर्फ़ इसलिए नहीं करते कि हमें अरबों से हसद है और वह बनी इस्राईल में से नहीं हैं। हालाँकि यह तो अल्लाह ही के जानने का मामला है। आओ, उनकी पैरवी कर लें!…” यहूदी सब एक साथ मुख़ालफ़त पर उतर आए और बोले: “नहीं! हम यह क़बूल नहीं करेंगे और अपने सिवा किसी की पैरवी नहीं करेंगे!”
इस बार कअब ने अपनी दूसरी पेशकश रखी: “आओ, हम सब अपने बच्चों और अपनी बीवियों को मार डालें, और जब पीछे कोई फ़िक्र करने वाला न रहे, तो मुसलमानों पर चढ़ाई कर दें और मरते दम तक लड़ें!…” यहूदियों ने इसे भी ठुकरा दिया।
अपनी तीसरी पेशकश में कअब ने कहा: “आज की रात शनिवार की रात है। मुसलमान जानते हैं कि इस रात हम नहीं लड़ेंगे, इसलिए वे बेफ़िक्र और ग़ाफ़िल हो सकते हैं। आओ, अपनी तलवारें म्यान से खींचकर सब मिलकर दरवाज़े से निकल पड़ें। ऐसे अचानक हमले से शायद हम ग़ालिब आ जाएँ!…”
यहूदियों ने यह कहकर इस पेशकश को भी ठुकरा दिया: “शनिवार के दिन काम करने की मनाही हम नहीं तोड़ सकते!” उनमें से सिर्फ़ उसैद और सअलबा नाम के दो भाई और उनका चचाज़ाद भाई असद पहली पेशकश क़बूल करके मुसलमान होने की इज़्ज़त से सरफ़राज़ हुए। वे क़िले से निकलकर सहाबा-ए-किराम में आ मिले।3 यहूदी आपस में देर तक बहस करते रहे। आख़िरकार उन्होंने हथियार डालने का झंडा उठा दिया और नबी-ए-करीम से दरख़्वास्त की कि उनके बारे में फ़ैसला करने के लिए आप किसी आदमी को पंच मुक़र्रर कर दें। रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “मेरे सहाबा में से जिसे चाहो, पंच चुन लो।” उन्होंने कहा: “साद इब्ने मुआज़ जो फ़ैसला करेंगे, उस पर हम राज़ी हैं।” नबी-ए-करीम ने इसे क़बूल फ़रमाया और हज़रत साद इब्ने मुआज़ को लाने का हुक्म दिया।
साद इब्ने मुआज़ ख़न्दक़ के ग़ज़वे में बुरी तरह ज़ख़्मी हुए थे। रसूलुल्लाह मस्जिद-ए-नबवी में एक ख़ेमे के अंदर उनका इलाज करवा रहे थे। पंच चुने जाने पर लोग हज़रत साद को डोली में उठाकर क़ुरैज़ा के क़िले पर ले गए। रास्ते में हज़रत साद अपने आप से कह रहे थे: “अल्लाह की क़सम, अल्लाह तआला की राह में मैं किसी मलामत करने वाले की मलामत पर कान नहीं धरूँगा!” रसूलुल्लाह के सामने उन्हें डोली से उतारा गया। नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ऐ साद! ये लोग तुम्हारे फ़ैसले के मुताबिक़ हथियार डालने पर राज़ी हुए हैं। चलो, इनके बारे में अपना फ़ैसला मुझे बताओ।” मगर साद इब्ने मुआज़ ने कहा: “या रसूलल्लाह! मेरी जान आप पर क़ुरबान! बेशक फ़ैसला करने के ज़्यादा हक़दार अल्लाह तआला और उसके रसूल हैं।” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “इनके बारे में फ़ैसला करने का हुक्म अल्लाह तआला ने तुम्हें दिया है।” हज़रत साद ने यहूदियों से पक्का वादा लिया कि वे उनके फ़ैसले पर राज़ी रहेंगे। दोनों तरफ़ के लोग बड़ी बेचैनी से आने वाले फ़ैसले का इंतिज़ार करने लगे। इसके बाद हज़रत साद ने अपनी बुलंदी दिखाने वाला, रोंगटे खड़े कर देने वाला, अपनी शान के लायक़ यह अज़ीम फ़ैसला सुनाया:
“मेरा फ़ैसला यह है कि तमाम आक़िल और बालिग़ मर्दों की गर्दनें मार दी जाएँ! उनकी औरतें और बच्चे क़ैदी बनाए जाएँ, और उनका माल मुसलमानों में बाँट दिया जाए!…”
यह दो-टूक फ़ैसला सुनकर यहूदी सन्न रह गए, क्योंकि ख़ुद उनकी किताब में ऐसी सरकशी करने वालों की सज़ा बिल्कुल यही थी। उसमें लिखा था: “जब तुम किसी शहर से जंग करने जाओ, तो उन्हें सुलह की दावत दो। अगर वे इसे क़बूल करके अपने दरवाज़े खोल दें, तो उसमें रहने वाले सब तुम्हें ख़िराज दें और तुम्हारी ख़िदमत करें। और अगर वे जंग करने का फ़ैसला करें, तो उनका घेराव करो। जब अल्लाह तआला के एहसान से तुम उन पर ग़ालिब आ जाओ, तो उनके सारे मर्दों को तलवार के घाट उतार दो। उनकी औरतों, बच्चों और मालों को ग़नीमत के तौर पर ले लो!…”
साद इब्ने मुआज़ का फ़ैसला इलाही फ़ैसले के मुताबिक़ था, इसलिए सारे जहानों के सरदार, हमारे प्यारे नबी ने उन्हें मुबारकबाद दी और यह फ़रमाकर अपनी पसंदीदगी ज़ाहिर की: “तुमने इनके बारे में वही फ़ैसला किया जो सात आसमानों के ऊपर लौह-ए-महफ़ूज़ में अल्लाह तआला का फ़ैसला है!”
यहूदी अपनी किताब में बताए गए इस फ़ैसले पर कोई एतिराज़ न कर सके। तमाम आक़िल और बालिग़ मर्दों के हाथ उनकी गर्दनों से बाँधकर उन्हें मदीना ले जाया गया। अगले दिन रसूलुल्लाह के हुक्म से हज़रत अली और हज़रत ज़ुबैर ने फ़ैसले पर अमल किया। बच्चे, औरतें और माल सहाबा-ए-किराम में बाँट दिए गए।4 इस क़ौम ने मुसलमानों के सबसे तंग वक़्त में पीठ पीछे वार किया था, तमाम समझौते तोड़े थे और यह नबी-ए-करीम को आपके बचपन ही से मिटाने की कोशिश करती आई थी। इस तरह यह मक्कार, ग़द्दार और फ़सादी क़ौम मदीना और उसके आस-पास से साफ़ हो गई। क़ैदियों में से एक औरत को मुसलमान होने की ख़ुशनसीबी हासिल हुई। रैहाना नाम की यह ख़ातून नबी-ए-करीम के हिस्से में आई थीं। रसूलुल्लाह ने उन्हें इख़्तियार दिया कि चाहें तो अपने दीन पर रहें, चाहें तो मुसलमान हो जाएँ। रैहाना ने कहा कि वह अपने दीन पर रहना चाहती हैं। उन्हें उम्मे मुंज़िर के घर भेज दिया गया। बाद में सअलबा इब्ने सअया की नसीहत और कोशिश से उनका दिल इस्लाम की तरफ़ माइल हो गया। इस पर नबी-ए-करीम ने रैहाना से फ़रमाया: “क्या तुम अल्लाह तआला और उसके रसूल का रास्ता अपनाना चाहती हो? मैं इसे मुनासिब समझता हूँ।” रैहाना ने कहा: “जी हाँ।” हमारे प्यारे नबी उनके इस क़दम से बेहद ख़ुश हुए। आपने चाहा कि वह भी ख़ुश हों और जन्नत में उनका दर्जा बहुत बुलंद हो; इसलिए आपने रहम फ़रमाकर उन्हें आज़ाद किया और अपनी ज़ौजियत में क़बूल फ़रमाया। आपने उनका महर अदा करके उनसे निकाह किया। उनकी शादी भी उम्मे मुंज़िर के घर में हुई। इस तरह रैहाना (रज़ियल्लाहु अन्हा) को तमाम मुसलमानों की माँ होने का शरफ़ हासिल हुआ।5
“नहीं! बिना किसी क़ैद और शर्त के मेरे फ़ैसले के आगे सिर झुकाने, इताअत करके हथियार डालने के सिवा तुम्हारे पास कोई चारा नहीं!” हदीस शरीफ़
साद इब्ने मुआज़ की शहादत
बनू क़ुरैज़ा के यहूदियों के बारे में फ़ैसला सुनाने के बाद साद इब्ने मुआज़ को फिर उनके ख़ेमे में ले जाया गया। उनका ज़ख़्म बिगड़ गया और हालत गंभीर हो गई। नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) उनके पास तशरीफ़ लाए, उन्हें गले से लगाया और यूँ दुआ फ़रमाई: “या अल्लाह! साद ने तेरी रज़ा के लिए तेरी राह में जिहाद किया। तेरे रसूल की तस्दीक़ भी की। उसे आसानी अता फ़रमा…” हमारे प्यारे नबी के ये मुबारक अल्फ़ाज़ सुनकर हज़रत साद इब्ने मुआज़ ने आँखें खोलीं और सरगोशी में कहा: “या रसूलल्लाह! आपको मेरा सलाम और मेरा अदब। मैं गवाही देता हूँ कि आप अल्लाह तआला के नबी हैं।” इसके बाद साद इब्ने मुआज़ के अज़ीज़ उन्हें उनके ख़ेमे से बनू अब्दुल अशहल के घर ले गए। उस रात उनकी हालत बहुत बिगड़ गई। जिबराईल अलैहिस्सलाम नबी-ए-करीम के पास आए और कहा: “या रसूलल्लाह! आज रात आपकी उम्मत में से वह कौन है जिसका इंतिक़ाल हुआ है और जिसके इंतिक़ाल की ख़ुशख़बरी फ़रिश्तों में दी जा रही है?” इस पर कायनात के सुल्तान ने फ़ौरन साद इब्ने मुआज़ का हाल पूछा। बताया गया कि उन्हें उनके घर ले जाया गया है। नबी-ए-करीम कुछ सहाबा-ए-किराम को साथ लेकर साद इब्ने मुआज़ के पास चल पड़े। रास्ते में आप बहुत तेज़ चल रहे थे, इसलिए सहाबा-ए-किराम ने कहा: “या रसूलल्लाह! हम थक गए!” नबी-ए-करीम ने अपने तेज़ चलने की वजह बताते हुए फ़रमाया: “जिस तरह फ़रिश्ते हंज़ला के जनाज़े पर हमसे पहले पहुँच गए थे, उसी तरह साद के जनाज़े पर भी हमसे पहले पहुँचेंगे। हम उनसे पहले नहीं पहुँच सकेंगे।”
नबी-ए-करीम साद इब्ने मुआज़ के पास पहुँचे तो देखा कि उनका इंतिक़ाल हो चुका है। आप उनके सिरहाने खड़े हुए और साद इब्ने मुआज़ को उनकी कुन्नियत से पुकारकर फ़रमाया: “ऐ अबू अम्र! तुम सरदारों में सबसे अच्छे थे। अल्लाह तआला तुम्हें सआदत, बरकत और सबसे बेहतर बदला अता फ़रमाए! तुमने अल्लाह तआला से किया हुआ अपना वादा पूरा कर दिया। अल्लाह तआला भी तुम्हें वह देगा जिसका उसने तुमसे वादा किया है!” उसी वक़्त साद इब्ने मुआज़ की वालिदा ने रोते हुए यह शेर पढ़ा:6
कैसे सहे यह सदमा, हाय, उसकी माँ बेचारी!
सब्र चाहिए, पर रोती हूँ, मुझ पर जो गुज़री भारी!
असलम इब्ने हारिस ने यूँ बयान किया है: “रसूलुल्लाह साद इब्ने मुआज़ के घर तशरीफ़ लाए। हम दरवाज़े पर इंतिज़ार कर रहे थे। रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अंदर तशरीफ़ ले गए; आप बहुत लंबे-लंबे क़दम रखते हुए चल रहे थे। हम भी आपके पीछे चले। रसूलुल्लाह ने रुकने का इशारा किया तो हम रुक गए और लौट आए। अंदर साद के जनाज़े के सिवा कोई न था। रसूलुल्लाह कुछ देर अंदर ठहरकर बाहर तशरीफ़ लाए। मुझे यह जानने का शौक़ हुआ, तो मैंने पूछा: ‘या रसूलल्लाह! आपके लंबे-लंबे क़दम रखकर चलने की हिकमत क्या है?’ इस पर आपने फ़रमाया: ’मैं कभी इतनी भरी हुई मजलिस में नहीं रहा। (फ़रिश्ते भरे हुए थे।) फ़रिश्तों में से एक ने मुझे अपने पर पर बिठा लिया, तभी मैं बैठ सका।’ फिर आपने साद इब्ने मुआज़ को उनकी कुन्नियत से पुकारकर फ़रमाया: ‘तुम्हें आफ़ियत हो, ऐ अबू अम्र! तुम्हें आफ़ियत हो, ऐ अबू अम्र! तुम्हें आफ़ियत हो, ऐ अबू अम्र!’”
उनके इंतिक़ाल से रसूलुल्लाह और सहाबा-ए-किराम को बहुत दुख हुआ; वे आँसू बहाकर रोए। उनके जनाज़े पर तमाम सहाबा-ए-किराम जमा हुए। हमारे प्यारे नबी ने जनाज़े की नमाज़ की इमामत फ़रमाई और उनका जनाज़ा उठाने में शरीक हुए। साद इब्ने मुआज़ का जनाज़ा उठाकर ले जाते हुए सहाबा-ए-किराम ने कहा: “या रसूलल्लाह! हमने इतनी आसानी से उठने वाला जनाज़ा कभी नहीं देखा!” इस पर नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “फ़रिश्ते उतरे हैं, वही उसे उठाए हुए हैं।” जनाज़ा जा रहा था तो मुनाफ़िक़ों ने भी साद की तौहीन के लिए कहा: “कितना हल्का है!” इस पर हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “साद के जनाज़े पर सत्तर हज़ार फ़रिश्ते उतरे हैं। इससे पहले वे इतनी बड़ी तादाद में ज़मीन पर कभी नहीं उतरे थे।”
अबू सईद ख़ुदरी ने अपने दादा का यह क़ौल नक़्ल किया है: “साद इब्ने मुआज़ की क़ब्र खोदने वालों में से एक मैं भी था। जब हमने उनकी क़ब्र खोदनी शुरू की, तो क़ब्र से चारों तरफ़ मुश्क की ख़ुशबू फैल गई!” शुरहबील इब्ने हसना ने कहा है: “साद इब्ने मुआज़ को दफ़न किया जा रहा था, तो एक आदमी ने उनकी क़ब्र से मुट्ठी भर मिट्टी उठा ली थी। बाद में जब वह उसे अपने घर ले गया, तो वह मिट्टी मुश्क बन गई। जब उनका जनाज़ा क़ब्र में उतारा जा रहा था, तो नबी-ए-करीम क़ब्र के पास बैठे थे; आपकी मुबारक आँखें भर आईं और आप अपनी मुबारक दाढ़ी हाथ में थामे बहुत ग़मगीन हुए। आपने फ़रमाया: ‘साद इब्ने मुआज़ की मौत पर अर्श हिल गया।’” एक बार नबी-ए-करीम को एक बहुत क़ीमती लिबास तोहफ़े में दिया गया था। सहाबा-ए-किराम ने कहा कि यह कितना ख़ूबसूरत है, तो आपने फ़रमाया: “जन्नत में साद इब्ने मुआज़ के रूमाल इससे भी ज़्यादा ख़ूबसूरत हैं।”
अबू सुफ़यान की बदले की तलाश
ख़न्दक़ के ग़ज़वे से लौटने के बाद एक दिन अबू सुफ़यान अपने क़बीले के बीच बैठा हुआ था कि उसने उनसे कहा: “क्या कोई भी ऐसा नहीं जो मुहम्मद से हमारा बदला ले!” एक बद्दू यह बात सुनकर अबू सुफ़यान के पास आया। उसने कहा: “अगर तुम मेरी ज़रूरत पूरी कर दो, तो यह काम मैं करूँगा। रास्ता भी अच्छी तरह जानता हूँ। मेरे पास तेज़ ख़ंजर भी है। मैं किसी से नहीं डरता।” अबू सुफ़यान ने उसकी ज़रूरतें पूरी कीं, उसकी ख़्वाहिशें पूरी कर दीं। एक ऊँट लेकर उसके हवाले किया और उससे कहा कि इस बात को राज़ रखे। बद्दू रात को मक्का से निकला और थोड़े ही वक़्त में मदीना पहुँच गया। उसे पता चला कि नबी अलैहिस्सलाम बनू अब्दुल अशहल क़बीले में हैं। अपना ऊँट एक जगह बाँधकर वह पैदल वहाँ पहुँचा। नबी अलैहिस्सलाम उस क़बीले की मस्जिद में नसीहत फ़रमा रहे थे। बद्दू को दूर से देखकर आपने फ़रमाया: “यह आने वाला आदमी दिल में बुरा इरादा लिए हुए है। लेकिन अल्लाह तआला का लुत्फ़ और एहसान मेरे और उसके बीच पर्दा बन जाएगा।”
बद्दू रसूलुल्लाह की तरफ़ बढ़ा। उसी वक़्त उसैद इब्ने हुज़ैर ने उसे पकड़कर पीछे खींच लिया। “रसूलुल्लाह से दूर रह, ऐ मलऊन!” कहकर उन्होंने उसके कमरबंद की तरफ़ हाथ बढ़ाया और कमर में खुँसा हुआ ख़ंजर देख लिया। वह समझ गए कि यह बुरी नीयत से आया है। बद्दू उसैद के पाँवों पर गिर पड़ा और चिल्लाया: “मेरा ख़ून न बहाना!” उसैद उसे रसूलुल्लाह के पास ले आए। नबी अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: “ऐ बद्दू, सच-सच बताओ, तुम कौन हो? तुम्हें सच्ची बात के सिवा कोई चीज़ फ़ायदा नहीं देगी। अगर झूठ बोलोगे, तो जान लो कि अल्लाह तआला तुम्हारा इरादा मुझे बता चुका है।” बद्दू ने अमान माँगी और सारा हाल बता दिया। रसूलुल्लाह अलैहिस्सलाम के हुक्म से उसे क़ैद कर दिया गया।
अगले दिन आपने उस बद्दू को बुलवाया और फ़रमाया: “मैंने तुम्हें अमान दी, जहाँ चाहो चले जाओ। लेकिन तुम्हें इससे भी बेहतर एक चीज़ की पेशकश करता हूँ।” बद्दू ने पूछा: “वह क्या है?” नबी अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: “मैं चाहता हूँ कि तुम अल्लाह के एक होने की और मेरे रसूल होने की गवाही दो।” बद्दू ने फ़ौरन कलिमा-ए-शहादत पढ़ा और कहा: “या रसूलल्लाह! मैं कभी किसी से नहीं डरता था। आपको देखा तो मेरे होश उड़ गए। मेरे दिल में जो था, आप उससे वाक़िफ़ हो गए। यह बात मेरे और अबू सुफ़यान के सिवा कोई नहीं जानता था। मैं समझ गया कि आप अल्लाह के रसूल हैं और उसकी हिफ़ाज़त में हैं; अबू सुफ़यान का इरादा शैतानी इरादा है।”
“या अल्लाह! साद ने तेरी रज़ा के लिए तेरी राह में जिहाद किया। तेरे रसूल की तस्दीक़ भी की। उसे आसानी अता फ़रमा” हदीस शरीफ़
जब अबू सुफ़यान की तरफ़ से ऐसी बुराई सामने आई, तो ख़्वाजा-ए-कायनात (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अम्र इब्ने उमय्या और ज़मरा इब्ने असलम को हुक्म दिया कि मक्का जाएँ और अगर मौक़ा मिले, तो अबू सुफ़यान को क़त्ल कर दें। ये दोनों सहाबी हरम पहुँचकर तवाफ़ कर रहे थे कि एक लौंडी ने उन्हें पहचान लिया। वह चिल्लाई: “ऐ मक्का वालो, ग़ाफ़िल न रहो! ये अम्र इब्ने उमय्या और ज़मरा इब्ने असलम हैं!” लोगों ने उन्हें पहचान लिया तो दोनों सहाबी एक-दूसरे से अलग हो गए। अम्र मक्का के पहाड़ों में से एक की गुफा में जाकर छिप गए, और इब्ने असलम मदीना चले गए। कुछ दिन बाद अम्र भी गुफा से निकले। अबू सुफ़यान के दो जासूस उनके सामने आ गए। उनमें से एक को उन्होंने तीर मारकर हलाक कर दिया, दूसरा भाग गया। फिर अम्र सही-सलामत मदीना पहुँच गए। अबू सुफ़यान को जब ये बातें मालूम हुईं, तो वह बहुत डर गया।
हिजरत के पाँचवें साल के कुछ अहम वाक़िआत
रसूल-ए-अकरम ने ज़िलक़ादा के महीने में ज़ैनब बिन्ते जह्श से निकाह फ़रमाया।7 इसी साल पर्दे की आयात-ए-करीमा नाज़िल हुईं और मुसलमान औरतों को पर्दा करने का हुक्म दिया गया।8 मदीना मुनव्वरा के क़रीब रहने वाला मुज़ैना क़बीला अपना वफ़्द भेजकर मुसलमान हुआ और उसे मुहाजिरों में शुमार किया गया।9 इसी साल ज़लज़ला आया और चाँद गहन हुआ। इसके अलावा हज भी इसी साल फ़र्ज़ हुआ। ख़न्दक़ के ग़ज़वे के बाद आस-पास के क़बीलों में से कुछ ने इस्लामी रियासत की ताक़त को मान लिया। अब वे सोचने लगे कि मुसलमानों से दोस्ती रखना, बल्कि मुसलमान हो जाना ही सबसे सही रास्ता होगा। उनमें से कुछ नबी-ए-करीम की ख़िदमत में हाज़िर होकर मुसलमान होने की इज़्ज़त से सरफ़राज़ हुए।
सारे जहानों के सरदार (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दीन-ए-इस्लाम को फैलाने के लिए अपने सहाबा के दस्ते बनाकर आस-पास के क़बीलों को इस्लाम की दावत देने भेजा। कुछ क़बीलों के पास आप ख़ुद तशरीफ़ ले गए। दूमतुल जंदल वालों जैसे क़बीलों ने उन्हें की गई नसीहतें क़बूल कीं और मुसलमान हो गए। ग़तफ़ान वाले और बनू लिह्यान जैसे क़बीले इस्लामी लश्कर से सामना होने के डर से भाग गए। इस तरह आस-पास के क़बीलों पर धाक बिठा दी गई।
बनू लिह्यान का ग़ज़वा
मुशरिकों ने रजीअ के वाक़िए में आसिम इब्ने साबित, ख़ुबैब इब्ने अदी और उनके साथियों (रज़ियल्लाहु अन्हुम अजमईन) को शहीद कर दिया था। नबी-ए-करीम को इसका बहुत दुख और सदमा पहुँचा था। आप बनू लिह्यान से उनकी इस हरकत का हिसाब लेने के लिए मुनासिब वक़्त का इंतिज़ार कर रहे थे, क्योंकि उन्होंने ग़द्दारी की थी। हालात बने तो मुसलमान दो सौ आदमियों की ताक़त के साथ बनू लिह्यान की तरफ़ रवाना हुए। मदीना में नबी-ए-करीम ने अपनी जगह अब्दुल्लाह इब्ने उम्मे मकतूम को नायब छोड़ा। दुश्मन को धोखे में डालने के लिए वे ऐसे चले जैसे शाम जा रहे हों, और फिर रजीअ के उस पानी पर आ पहुँचे जहाँ वे मोमिन शहीद हुए थे। वहाँ उन्होंने आसिम और उनके साथियों के लिए अल्लाह पाक से मग़फ़िरत माँगी। इस्लामी लश्कर के आने की ख़बर सुनकर बनू लिह्यान के लोग पहाड़ों में भाग गए।
नबी-ए-करीम और आपके सहाबा वहाँ एक दिन ठहरे। आस-पास सिपाही भेजे गए, लेकिन बहुत ढूँढने के बावजूद दुश्मन का पता न चल सका। फिर भी यह डर उनके लिए काफ़ी था। इसके बाद सहाबा-ए-किराम उस्फ़ान पहुँचे। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हज़रत अबू बकर (रज़ियल्लाहु अन्हु) से फ़रमाया: “दस आदमियों की ताक़त के साथ ग़नीम नाम की जगह तक आस-पास का इलाक़ा छानकर लौट आओ।” काफ़िरों ने इस्लामी लश्कर की आवाज़ सुनी तो उनके दिलों में डर बैठ गया। वे पहाड़ों में ग़ायब हो गए। मुसलमानों को कोई न मिला। लेकिन यह सफ़र आस-पास के मुशरिकों के लिए मुसलमानों के ग़लबे की एक सनद जैसा था। फिर वे मदीना लौट आए। यह सफ़र चौदह दिन चला।
ग़ाबा का ग़ज़वा
इसे ज़ू क़रद का ग़ज़वा भी कहते हैं। रसूलुल्लाह की बीस दूध देने वाली ऊँटनियाँ थीं। उन्हें अबू ज़र (रज़ियल्लाहु अन्हु) के बेटे जंगल में चराते थे। फ़ज़ारा क़बीले का उयैना इब्ने हिस्न नाम का एक आदमी बुध की रात चालीस घुड़सवारों के साथ आया। उन्होंने इब्ने अबी ज़र को शहीद कर दिया और ऊँटनियों को भी हाँक ले गए।
यह ख़बर रसूलुल्लाह तक पहुँची तो आपने अब्दुल्लाह इब्ने उम्मे मकतूम को मदीना में नायब छोड़ा और ख़ुद पाँच सौ घुड़सवारों के साथ रवाना हुए। आपने मिक़दाद इब्ने असवद (रज़ियल्लाहु अन्हु) को झंडा देकर कुछ सहाबा के साथ हिरावल दस्ते के तौर पर आगे भेजा। काफ़िरों के पीछे सलमा इब्ने अकवा (रज़ियल्लाहु अन्हु) को भी भेजा। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ज़ू क़रद नाम की जगह पर पड़ाव डाला।
हिरावल दस्ते ने दुश्मन के पिछले हिस्से को जा लिया। हज़रत अबू क़तादा ने काफ़िर मसअदा फ़ज़ारी को क़त्ल किया। हज़रत उक्काशा ने इब्बान इब्ने अम्र नाम के एक काफ़िर को क़त्ल किया। मुसलमानों में से एक आदमी शहीद हुआ। हज़रत सलमा इब्ने अकवा काफ़िरों के पीछे लग गए। वह बहुत अच्छे तीरंदाज़ थे। उन्होंने मलऊनों में से बहुतों को क़त्ल किया और बहुतों को ज़ख़्मी किया। उन्हें अपना बहुत-सा सामान छोड़ने पर मजबूर कर दिया। दस ऊँटनियाँ काफ़िरों के हाथ से छुड़ा लीं। हज़रत अबू क़तादा पड़ाव पर आए तो रसूलुल्लाह ने उनके लिए यूँ दुआ फ़रमाई: “या अल्लाह! अबू क़तादा को सेहत दे और उसे उम्र के आख़िर तक तंदुरुस्त और ताक़तवर रख!” रसूलुल्लाह ने मसअदा फ़ज़ारी का घोड़ा और हथियार हज़रत अबू क़तादा को दे दिए। अबू क़तादा के बाद हज़रत सलमा इब्ने अकवा भी आ गए। उनके साथ मुशरिकों से छूटे हुए दो घोड़े भी थे। नबी-ए-करीम ने उनका इस्तिक़बाल किया, मुबारकबाद दी और फ़रमाया: “आज हमारे घुड़सवारों में सबसे बेहतर अबू क़तादा हैं और हमारे पैदलों में सबसे बेहतर सलमा इब्ने अकवा।”
जिन मुशरिकों ने बड़ी ढिठाई से नबी के माल पर हाथ डाला था, उनके लिए भी और दूसरे क़बीलों के लिए भी यह सफ़र कभी न भूलने वाला सबक़ बन गया। मुसलमान ज़ू क़रद में एक रात और एक दिन ठहरे। फिर मदीना लौट आए। यह सफ़र पाँच दिन चला।
“जन्नत में साद इब्ने मुआज़ के रूमाल इससे भी ज़्यादा ख़ूबसूरत हैं” हदीस शरीफ़
आपका आना रहमत है, लज़्ज़त है, सफ़ा है, या रसूलल्लाह,
आपका ज़ुहूर आशिक़ों के दर्द की दवा है, या रसूलल्लाह।
आप तब भी नबी थे जब आदम पानी और मिट्टी के बीच थे,
नबियों के इमाम आप ही हों, यही रवा है, या रसूलल्लाह।
कामिलों की जमाअत का कमाल आपके नूर से हुआ है,
आपका वुजूद अल्लाह की क़ुदरत का कामिल मज़हर है, या रसूलल्लाह।
आपके वसीले से उस ज़ात तक और तरह-तरह की लज़्ज़तों तक पहुँचे,
आपका काम ज़रूरतमंदों पर अता ही अता है, या रसूलल्लाह।
हुदाई की शफ़ाअत कीजिए, ज़ाहिर में भी, बातिन में भी,
वह आपके दर से जुड़ा हुआ एक गदा है, या रसूलल्लाह!
Aziz Mahmûd Hüdâyî
