ख़न्दक़ का ग़ज़वा
इसे अहज़ाब का ग़ज़वा भी कहते हैं। अहज़ाब “हिज़्ब” लफ़्ज़ की जमा है। हिज़्ब का मतलब है गिरोह, टोली, हिस्सा। इस जंग में रसूलुल्लाह से लड़ने के लिए कई गिरोह इकट्ठा हो गए थे, इसलिए इसे अहज़ाब का ग़ज़वा कहा गया। हिजरत का पाँचवाँ साल था। फ़ितना और फ़साद की जड़ बनू नज़ीर के यहूदी, जिन्हें मदीना मुनव्वरा से निकाला गया था, कई गिरोहों में बँट गए थे; उनमें से कुछ शाम (सीरिया) और कुछ ख़ैबर चले गए थे। लेकिन इस्लाम और नबी-ए-करीम से कीना और बदले की आग उनके दिलों पर छाई हुई थी। उनका सरदार हुयय इब्ने अख़तब अपनी क़ौम के बड़े लोगों में से बीस आदमियों को साथ लेकर मक्का गया। उन्होंने अबू सुफ़यान से मुलाक़ात की और हमारे प्यारे नबी के मुबारक वुजूद को मिटा देने के लिए समझौते की बात करने बैठे। उन्होंने कहा: “जब तक यह काम पूरा न हो जाए, हम एक पल के लिए भी तुमसे अलग हुए बिना तुम्हारे साथ रहेंगे!” अबू सुफ़यान ने कहा: “जो हमारे दुश्मन के दुश्मन हैं, वे हमारे यहाँ मक़बूल हैं। मगर हम तुम पर भरोसा कर सकें, इसके लिए तुम्हें हमारे बुतों की पूजा करनी होगी। इसके बाद ही हम मान सकेंगे कि तुम सच्चे दिल से साथ हो, और मुतमइन हो सकेंगे।” ग़द्दार यहूदी, जो अपने मक़सद को पाने के लिए अपना दीन तक बेचने को तैयार थे, बुतों के सामने ज़मीन पर गिर पड़े… किताब वाले काफ़िर थे, अब बेकिताब काफ़िर हो गए। उन्होंने हमारे प्यारे नबी को मिटा देने और दीन-ए-इस्लाम को ढा देने की क़सम खाई।
मुशरिकों ने फ़ौरन जंग की तैयारी शुरू कर दी। पड़ोसी मुशरिक क़बीलों के पास भी आदमी भेजे। यहूदी भी अलग-अलग क़बीलों को राज़ी करने के लिए हरकत में आ गए। कुछ क़बीलों से पैसे और खजूर का वादा करके उन्हें हथियारबंद किया। मुशरिकों ने मक्का के आस-पास से चार हज़ार आदमियों की एक बड़ी ताक़त खड़ी कर ली थी। अबू सुफ़यान ने दारुन नदवा में झंडा बाँधकर उस्मान इब्ने तल्हा को दिया। लश्कर में तीन सौ घोड़े, बहुत-से हथियार और पंद्रह सौ ऊँट थे।
चार हज़ार आदमियों का मुशरिक लश्कर जब मर्रुज़ ज़हरान पहुँचा, तो बनू सुलैम, बनू फ़ज़ारा, ग़तफ़ान वाले, बनू मुर्रा, बनू असद जैसे बहुत-से क़बीलों ने छह हज़ार आदमियों की मदद देकर मुशरिक लश्कर की तादाद दस हज़ार तक पहुँचा दी। उस ज़माने के लिहाज़ से यह बहुत बड़ी ताक़त थी।
ख़ुज़ाआ क़बीले की रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से पहले से दोस्ती थी; उसने फ़ौरन मदीना ख़बर भिजवाई। एक घुड़सवार ने दस दिन का रास्ता चार दिन में तय किया और नबी-ए-करीम को मुशरिकों के हाल की पूरी तफ़सील बताई।
हमारे प्यारे नबी अपने काम सहाबा-ए-किराम से मशवरा करके किया करते थे; आपने फ़ौरन सहाबा को जमा किया और उनके साथ मिलकर हालात पर ग़ौर किया। जंग कहाँ और कैसे लड़ी जाए, इस बारे में हर सहाबी ने अपनी राय पेश की। इस मजलिस में मौजूद हज़रत सलमान फ़ारसी ने बात करने की इजाज़त ली और कहा:
“या रसूलल्लाह! हमारे यहाँ जंग का एक तरीक़ा है: जब हमें दुश्मन के अचानक हमले का डर होता, तो हम अपने चारों तरफ़ ख़न्दक़ खोदकर बचाव करते थे।” यह तरीक़ा नबी-ए-करीम को भी और सहाबा-ए-किराम को भी पसंद आया, और इसी तरह दुश्मन से मुक़ाबला करने का फ़ैसला हुआ।1
नबी-ए-करीम ने फ़ौरन कुछ सहाबा को साथ लेकर देखा कि ख़न्दक़ कहाँ खोदनी चाहिए। मदीना की दक्षिणी तरफ़ बाग़ थे और वह घने पेड़ों से ढकी हुई थी। मुशरिकों का इस तरफ़ से मिलकर हमला करने का इमकान कम था।
“ऐ आइशा! तुम्हें ख़ुशख़बरी हो! हक़ तआला ने तुम्हें बरी कर दिया। उसने तुम्हारी पाकदामनी की गवाही दी” हदीस शरीफ़
फिर इस तरफ़ की हिफ़ाज़त थोड़े-से आदमी भी कर सकते थे। पूरब में बनू क़ुरैज़ा नाम का यहूदी क़बीला रहता था, जिसका मुसलमानों से समझौता था। इसलिए मुशरिक सिर्फ़ पश्चिम और उत्तर की खुली ज़मीन से ही हमला कर सकते थे। ख़न्दक़ खोदने की जगहें इन्हीं तरफ़ों में तय की गईं। सहाबा-ए-किराम में से हर एक के हिस्से में लगभग तीन मीटर ज़मीन आई। हर आदमी को अपने हिस्से की जगह दो आदमियों के क़द जितनी (लगभग 3.5 मीटर) गहरी खोदनी थी, और ख़न्दक़ इतनी चौड़ी होनी थी कि तेज़ दौड़ता घोड़ा भी उसे फलाँग न सके (7–8 मीटर)। वक़्त कम था। दुश्मन मक्का से निकलकर मदीना की तरफ़ बढ़ चुका था। ख़न्दक़ को जल्द से जल्द खोदना ज़रूरी था।
हमारे प्यारे नबी ख़ुद सबसे आगे थे; आपने अपने बहादुर सहाबा के साथ “बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम” कहकर पहली कुदाल चलाई। हर कोई अपनी पूरी कोशिश से जल्द से जल्द ख़न्दक़ खोदने में लगा था। यहाँ तक कि बच्चे भी इस काम में शरीक थे। रसूलुल्लाह के लिए ज़ुबाब की पहाड़ी पर एक तुर्की ख़ेमा लगाया गया।2 ख़न्दक़ से निकाली गई मिट्टी टोकरियों में भरकर इस पहाड़ी के आस-पास डाली जाती, और लौटते वक़्त दुश्मन पर फेंकने के लिए सलअ पहाड़ से पत्थर ढोकर लाए जाते। जिन्हें टोकरी न मिलती, वे अपने दामन में मिट्टी ढोते। हमारे प्यारे नबी भी थककर चूर होने तक काम करते रहे। यह देखकर सहाबा-ए-किराम का जोश और बढ़ जाता। वे कहते: “या रसूलल्लाह! हमारी जानें आप पर क़ुरबान! हमारा काम करना काफ़ी है। आप काम न करें, आराम फ़रमाएँ।” मगर आप जवाब में फ़रमाते: “मैं भी काम करके तुम्हारे कमाए हुए सवाब में शरीक होना चाहता हूँ।”
उन दिनों बहुत सर्दी थी। इसके अलावा उस साल सूखे की वजह से क़हत पड़ा हुआ था। खाने की चीज़ मिलना भी बहुत मुश्किल था। सारे जहानों के सरदार समेत तमाम सहाबा-ए-किराम सख़्त भूख में थे। ख़ुद को ताक़तवर महसूस करने के लिए वे भूख से अपने पेटों पर पत्थर बाँधते और मेदे को दबाकर खाने की हाजत को दबाने की कोशिश करते थे। सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजे गए हमारे प्यारे नबी अपनी भूख की फ़िक्र नहीं करते थे। आपके सहाबा इस सर्दी में भूखे रहकर काम कर रहे थे; उनकी तकलीफ़ों पर आपको बहुत दुख होता था, आपको उन पर तरस आता था, और आप यूँ दुआ फ़रमाते थे: “या अल्लाह! आख़िरत की ज़िंदगी के सिवा कोई (चाहने लायक़) ज़िंदगी नहीं। या रब! अन्सार और मुहाजिरों की मग़फ़िरत फ़रमा!” और वे अपनी जानों से भी ज़्यादा प्यारे हबीब-ए-अकरम को जवाब देते: “ज़िंदगी के आख़िरी दम तक अल्लाह तआला की राह में दीन-ए-इस्लाम को फैलाने के लिए हमने रसूलुल्लाह की पैरवी की है।” यह आपसी मुहब्बत भूख-प्यास जैसी कितनी ही मशक़्क़तों को जड़ से उखाड़ फेंकती थी।
बिजली चमकी
ख़न्दक़ खोदने का काम हर दिन सुबह-सवेरे शुरू होता और शाम तक चलता था। एक दिन खोदने के दौरान हज़रत अली इब्ने हकम के पाँव में चोट आई। उन्हें घोड़े पर बिठाकर नबी-ए-करीम की ख़िदमत में लाया गया। सारे जहानों के सरदार ने “बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम” कहकर उनके पाँव पर हाथ फेरा। नबी-ए-करीम के मोजिज़े से उसी पल उनके पाँव का ख़ून रुक गया और दर्द जाता रहा। ख़न्दक़ खोदने का काम जारी रहा। एक बार सहाबा एक बहुत सख़्त जगह पर आ पहुँचे। उसे खोदना मुमकिन न हो रहा था। उन्होंने रसूल-ए-अकरम के पास आकर हाल बताया। आप तशरीफ़ लाए और ख़न्दक़ में उतरे। एक बर्तन में पानी मँगवाया। उसमें से एक घूँट लेकर फिर बर्तन में डाल दिया। फिर वह पानी सख़्त जगह पर छिड़का। हथौड़ा लेकर उस जगह को एक ही चोट में रेत की तरह बिखेर दिया। अब वहाँ आसानी से खोदा जा सकता था। इस चोट के वक़्त हमारे प्यारे नबी के मुबारक पेट से कपड़ा हट गया, तो वहाँ मौजूद लोगों ने देखा कि आपने भूख की वजह से अपने मुबारक मेदे पर पत्थर बाँध रखा है। रसूलुल्लाह का यह हाल देखकर हज़रत जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह आपकी ख़िदमत में हाज़िर हुए और इजाज़त माँगी: “या रसूलल्लाह! मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान! अगर आप इजाज़त दें, तो मैं घर हो आऊँ।” इजाज़त मिलने के बाद का हाल हज़रत जाबिर ने यूँ बयान किया:
“इजाज़त मिली तो मैं घर आया और अपनी बीवी से पूछा: ‘मैंने रसूल अलैहिस्सलाम में भूख की ऐसी हालत देखी है कि बर्दाश्त नहीं होती। घर में कुछ खाने को है?’ उसने कहा: ‘इस बकरी के बच्चे और कुछ मुट्ठी जौ के सिवा कुछ नहीं है।’ मैंने फ़ौरन बकरी का बच्चा ज़बह किया, और मेरी बीवी ने हाथ की चक्की में जौ पीसकर आटा बनाया। फिर उसे गूँधा। गोश्त हाँडी में डालकर तंदूर में पकाना शुरू किया। जब मैं रसूलुल्लाह के पास लौटने लगा, तो मेरी बीवी ने मुझे सख़्ती से ताकीद की कि कहीं खाना थोड़ा होने की वजह से हमें शर्मिंदा न होना पड़े। इसके बाद मैं रसूलुल्लाह के पास पहुँचा और अर्ज़ किया: ‘या रसूलल्लाह! मेरे पास बहुत थोड़ा-सा खाना है। एक-दो आदमियों को साथ लेकर हमारे यहाँ खाने पर तशरीफ़ लाइए!’
फिर रसूलुल्लाह ने मुझसे फ़रमाया: ‘अपनी बीवी से कहो कि मेरे आने तक तंदूर से न गोश्त की हाँडी निकाले, न रोटी।’ फिर मुजाहिदों की तरफ़ मुड़कर फ़रमाया: ‘ऐ ख़न्दक़ वालो! जाबिर ने हमारे लिए दावत तैयार की है, हमें खाने पर बुला रहा है। उसका खाना बहुत भी है और अच्छा भी। उठो! हम जाबिर की दावत में चलेंगे!’ इस हुक्म पर सहाबा-ए-किराम इकट्ठा होकर नबी-ए-करीम के पीछे-पीछे चलने लगे। मैं फ़ौरन घर लौटा, अपनी बीवी को सारा हाल सुनाया और कहा: ‘अब हम क्या करें?’ उसने मुझसे कहा: ‘क्या रसूल अलैहिस्सलाम ने यह नहीं पूछा कि खाना कितना है?’ मैंने कहा: ‘पूछा था, और मैंने बता दिया था।’ मेरी बीवी ने पूछा: ‘सहाबा-ए-किराम को तुमने बुलाया है या रसूलुल्लाह ने?’ मैंने कहा: ‘रसूलुल्लाह ने बुलाया है।’ तो उसने यह कहकर मुझे तसल्ली दी: ‘रसूल अलैहिस्सलाम बेहतर जानते हैं।’
थोड़ी देर बाद नबी-ए-करीम का नूरानी चेहरा हमारे दरवाज़े पर नज़र आया। आपने सहाबा की भीड़ से फ़रमाया: ‘एक-दूसरे को धक्का दिए बिना अंदर आओ।’ मेरे सहाबी भाई दस-दस आदमियों की टोलियों में बैठ गए। मोहतरम नबी ने रोटी और गोश्त में बरकत के लिए दुआ फ़रमाई। फिर हाँडी को तंदूर से निकाले बिना करछी से उसमें से गोश्त निकालकर अपने हाथ की रोटियों पर रखा और सहाबा को खिलाया। जब तक सारे सहाबा का पेट न भर गया, आप इसी तरह करते रहे। मैं क़सम खाता हूँ कि खाने वाले एक हज़ार से ज़्यादा थे, फिर भी रोटी और गोश्त जैसे के तैसे मौजूद थे। हमने भी खाने के बाद बचा हुआ खाना अपने पड़ोसियों में बाँट दिया।”3
हज़रत सलमान फ़ारसी ख़न्दक़ बहुत अच्छी खोदते थे। वह अकेले दस आदमियों का काम करते थे। वह और उनके साथी अपने हिस्से की जगह खोद रहे थे कि एक बहुत सख़्त और बड़ी, सफ़ेद चट्टान सामने आ गई। उसे तोड़ने के लिए उन्होंने बहुत ज़ोर लगाया। लेकिन उनकी सारी मेहनत बेकार गई। ऊपर से उनके हथौड़े, कुदालें और बेलचे भी टूट गए। हज़रत सलमान हमारे प्यारे नबी की ख़िदमत में हाज़िर हुए और हाल अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! मेरे माँ-बाप और मेरी जान आप पर क़ुरबान! ख़न्दक़ खोदते हुए हम एक सख़्त चट्टान से टकरा गए। लोहे के हमारे सारे औज़ार टूट गए, फिर भी हम उसे उसकी जगह से हिला तक न सके।” हबीब-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) वहाँ तशरीफ़ लाए और हथौड़ा माँगा। वहाँ मौजूद सहाबा-ए-किराम बड़ी बेचैनी से नतीजे का इंतिज़ार कर रहे थे। नबियों के सुल्तान ख़न्दक़ में उतरे। आपने हथौड़ा उठाया, “बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम” कहकर चट्टान पर ऐसी ज़ोरदार चोट मारी कि इस टक्कर से मदीना को रौशन कर देने वाली एक बिजली चमकी और चट्टान का एक टुकड़ा टूटकर अलग हो गया।
रसूल-ए-अकरम ने “अल्लाहु अकबर!” कहकर तकबीर कही। यह सुनकर सहाबा ने भी तकबीर कही। फिर आपने दूसरी बार चट्टान पर हथौड़ा मारा। फिर हर तरफ़ को रौशन कर देने वाली बिजली!
“मैं भी काम करके तुम्हारे कमाए हुए सवाब में शरीक होना चाहता हूँ” हदीस शरीफ़
और चट्टान से टूटकर गिरते टुकड़े… हमारे प्यारे नबी ने फिर “अल्लाहु अकबर!” कहकर तकबीर कही। आपके पीछे सहाबा-ए-किराम ने भी तकबीर कही। तीसरी बार हथौड़ा पड़ा तो हर तरफ़ को रौशन कर देने वाली एक और बिजली चमकी और चट्टान टुकड़े-टुकड़े हो गई। सारे जहानों के सरदार ने फिर “अल्लाहु अकबर!” कहकर तकबीर कही। आपके इज़्ज़त वाले सहाबा ने भी आपकी पैरवी में फिर तकबीर कही।
हज़रत सलमान ने अपना हाथ बढ़ाया। हमारे प्यारे नबी ख़न्दक़ से ऊपर तशरीफ़ लाए। सलमान फ़ारसी ने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! मेरे माँ-बाप और मेरी जान आप पर क़ुरबान! मैंने अभी वह चीज़ देखी जो उम्र भर कभी नहीं देखी थी। इसकी हिकमत क्या है?” तो नबी-ए-करीम ने सहाबा की तरफ़ मुड़कर पूछा: “सलमान ने जो देखा, क्या तुमने भी देखा?” उन्होंने कहा: “जी हाँ, या रसूलल्लाह! जब आपने चट्टान पर हथौड़ा मारा, तो हमने एक ज़ोरदार बिजली चमकती देखी। आपने तकबीर कही तो हमने भी तकबीर कही।” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “पहली चोट की रौशनी में मुझे ईरान के बादशाह (किसरा) के (मदाइन वाले) महल दिखाई दिए। जिबराईल (अलैहिस्सलाम) ने आकर मुझे ख़बर दी: ‘आपकी उम्मत उन शहरों की मालिक होगी।’ दूसरी चोट में रूम के इलाक़े (शाम) के लाल महल दिखाई दिए। जिबराईल (अलैहिस्सलाम) ने आकर कहा: ‘आपकी उम्मत उस मुल्क की भी मालिक होगी।’ तीसरी चोट में सनआ (यमन) के महल दिखाई दिए। जिबराईल (अलैहिस्सलाम) ने मुझे ख़बर दी: ‘उस ज़मीन की भी मालिक आपकी उम्मत होगी।’”
फिर कायनात के सुल्तान ने जब ईरान के बादशाह (किसरा) के मदाइन वाले महल का हाल बयान फ़रमाया, तो वहीं के रहने वाले हज़रत सलमान ने कहा: “या रसूलल्लाह! मेरी जान आप पर क़ुरबान! उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसने आपको हक़ दीन और किताब के साथ भेजा है, वे महल बिल्कुल वैसे ही हैं जैसे आपने बयान फ़रमाए। मैं गवाही देता हूँ कि आप अल्लाह तआला के रसूल हैं।” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ऐ सलमान! शाम ज़रूर फ़तह होगा। हिरक़्ल अपने मुल्क के सबसे दूर-दराज़ कोने में भाग जाएगा। तुम शाम के हर हिस्से पर क़ाबिज़ हो जाओगे। कोई भी तुम्हारा मुक़ाबला न कर सकेगा। यमन ज़रूर फ़तह होगा। यह ‘मशरिक़ का मुल्क’ भी ज़रूर फ़तह होगा और ईरान का बादशाह (किसरा) मारा जाएगा। अल्लाह तआला ये फ़तहें मेरे बाद तुम्हें नसीब फ़रमाएगा।”4
हज़रत सलमान फ़ारसी ने बताया: “मैंने देखा कि रसूलुल्लाह की ये सारी ख़ुशख़बरियाँ पूरी हुईं।”
दुश्मन अब पहुँचने ही वाला था। ख़न्दक़ पूरी तेज़ी से खोदी जा रही थी और उसे जल्द से जल्द पूरा करने की कोशिश हो रही थी। मुजाहिद सिर्फ़ मजबूरी की हालत में नबी-ए-करीम से इजाज़त लेकर काम छोड़ते, और ज़रूरत पूरी होते ही दौड़कर फिर अपने काम पर लौट आते थे।
मुनाफ़िक़ बहुत ढीले-ढाले रवैये से काम ले रहे थे। जब जी चाहता काम पर आते, और जब जी चाहता बिना इजाज़त लिए छोड़कर चले जाते। इसके अलावा वे सहाबा के इस तरह काम करने का मज़ाक़ उड़ाते, यहाँ तक कि नबी-ए-करीम की दी हुई ख़ुशख़बरियों के बारे में भी कहते: “हम दुश्मन के डर से ख़न्दक़ों में पनाह ले रहे हैं, और वह हमसे यमन, रूम और फ़ारस के मुल्कों के महलों का वादा करते हैं। तुम्हारे इस हाल पर हमें हैरत है!…”
इस पर मुजाहिदों के बारे में नाज़िल हुई आयत-ए-करीमा में मफ़हूमन फ़रमाया गया: “सच्चे मोमिन तो बस वही लोग हैं जो अल्लाह तआला और उसके रसूल पर ईमान लाते हैं, और जब किसी (सबसे ताल्लुक़ रखने वाले, इज्तिमाई) मिले-जुले काम के लिए उनके (रसूलुल्लाह के) साथ होते हैं, तो उनसे इजाज़त लिए बिना छोड़कर नहीं जाते। तो (ऐ मेरे हबीब!) जो लोग तुमसे इजाज़त माँगते हैं, वही सचमुच अल्लाह तआला और उसके रसूल पर ईमान रखने वाले हैं। ये मोमिन जब अपने किसी काम के लिए तुमसे इजाज़त माँगें, तो तुम भी उनमें से जिसे चाहो इजाज़त दे दो और उनके लिए अल्लाह तआला से मग़फ़िरत माँगो। बेशक अल्लाह तआला ग़फ़ूरुर रहीम है, बहुत बख़्शने वाला, बहुत रहम करने वाला है।”5
मुनाफ़िक़ों के बारे में नाज़िल हुई आयात-ए-करीमा में भी मफ़हूमन फ़रमाया गया: “अल्लाह तआला के रसूल के बुलाने को आपस में एक-दूसरे को बुलाने जैसा न समझो! तुममें से जो लोग एक-दूसरे की आड़ लेकर चुपके से (खिसककर) भाग जाते हैं, उन्हें अल्लाह तआला ज़रूर जानता है। जो उसके हुक्म की मुख़ालफ़त करते हैं, वे इस बात से डरें कि दुनिया में किसी फ़ितने में और आख़िरत में दर्दनाक अज़ाब में पड़ जाएँ! ख़बरदार! आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, सब अल्लाह तआला ही का है। तुम जिस हाल पर हो, उसे भी वह जानता है (तुम्हारी तमाम ख़ूबियों और नीयतों को, तुम्हारे मोमिन या मुनाफ़िक़ होने को)। क़यामत के दिन, जब तुम उसकी तरफ़ लौटाए जाओगे, अल्लाह तआला तुम्हें तुम्हारे सारे कामों की ख़बर देगा। अल्लाह तआला हर चीज़ को जानता है।”6
ख़न्दक़ खोदने का काम शुरू हुए छह दिन हो चुके थे। हर एक ने अपना काम अच्छी तरह पूरा कर लिया था। लेकिन एक जगह ख़न्दक़ वक़्त काफ़ी न होने की वजह से चौड़ी और गहरी न खोदी जा सकी थी। नबी-ए-करीम ने इस जगह के बारे में अपनी फ़िक्र ज़ाहिर की और फ़रमाया: “मुशरिक इसके सिवा किसी और जगह से पार नहीं हो सकेंगे।” आपने वहाँ पहरेदार बिठा दिए।
अल्लाह तआला सबसे अच्छा कारसाज़ है
जब मुशरिक लश्कर मदीना के बहुत क़रीब आ पहुँचा, तो बनू नज़ीर के यहूदियों के सरदार हुयय ने क़ुरैश के लश्कर के सिपहसालार को बताया कि मदीना के क़ुरैज़ा यहूदियों का मुसलमानों से समझौता है, लेकिन वह उनके सरदार कअब इब्ने असद को धोखा देकर अपनी तरफ़ कर सकता है। सिपहसालार ने कहा: “ऐ हुयय! अभी कअब इब्ने असद के पास जाओ। वे मुसलमानों से किया हुआ समझौता तोड़कर हमारी मदद करें।” इस समझौते की एक शर्त यह थी: “अगर मदीना पर कोई दुश्मन लश्कर हमला करे, तो मुसलमानों के साथ मिलकर दुश्मन का मुक़ाबला करना।”
यहूदी हुयय मुशरिक लश्कर से अलग होकर रात को बनू क़ुरैज़ा के सरदार कअब के घर आया। दरवाज़ा खटखटाकर उसने अपना तआरुफ़ कराया और कहा: “ऐ कअब! मैं क़ुरैश का पूरा लश्कर और किनाना और बनू ग़तफ़ान जैसे कितने ही क़बीलों को – दस हज़ार आदमियों का लश्कर – लेकर आया हूँ। अब मुहम्मद और उनके सहाबा बच नहीं सकेंगे। जब तक हम उन्हें पूरी तरह ख़त्म न कर दें, हमने क़ुरैश के साथ यहाँ से न हटने की क़सम खाई है!…” कअब ने अपनी फ़िक्र ज़ाहिर की: “अगर मुहम्मद और उनके सहाबा क़त्ल न किए जा सके और क़ुरैश और ग़तफ़ान वाले अपने वतन लौट गए, तो हम यहाँ अकेले रह जाएँगे। मुझे डर है कि आख़िरकार वे हम सबको क़त्ल कर देंगे!…” हुयय ने कहा: “यह डर दूर करने के लिए तुम क़ुरैश और ग़तफ़ान वालों से सत्तर आदमी यरग़माल (बंधक) के तौर पर माँग लो। जब तक ये यरग़माल तुम्हारे पास रहेंगे, वे यहाँ से नहीं जा सकेंगे। और अगर वे हारकर चले भी गए, तो मैं तुम लोगों का साथ नहीं छोड़ूँगा। जो मुसीबत तुम पर आएगी, वह मुझ पर भी आएगी।” इस तरह उसने पहले कअब को, फिर बाक़ी यहूदियों को भी धोखा दिया। उसने उनसे मुसलमानों के साथ किया हुआ अहदनामा फड़वा दिया। यूँ समझौता टूट गया।
हुयय ने मुशरिक लश्कर में लौटकर सारा हाल सुनाया। उसने बताया कि बनू क़ुरैज़ा मुसलमानों पर पीछे से वार करेंगे।
“ऐ ख़न्दक़ वालो! जाबिर ने हमारे लिए दावत तैयार की है, हमें खाने पर बुला रहा है। उसका खाना बहुत भी है और अच्छा भी। उठो! हम जाबिर की दावत में चलेंगे!” हदीस शरीफ़
सातवें दिन मुशरिक दस हज़ार आदमियों के बड़े लश्कर के साथ मदीना की उत्तर और उत्तर-पश्चिम की तरफ़ आए और अपना पड़ाव डाल दिया। यह पड़ाव उस जगह के सामने वाली तरफ़ था जहाँ ख़न्दक़ खोदी गई थी। मुशरिकों का इरादा यह था कि इस बड़े लश्कर से मदीना को सिरे से आख़िर तक जला-ढा दें, नबी-ए-करीम और आपके सहाबा को मिटा दें और इस्लाम को ख़त्म कर दें। ज़ाहिर में यह बहुत बड़ा लश्कर था, जिसका मुक़ाबला करना मुश्किल था। मगर जब मुशरिकों ने ख़न्दक़ की वह रुकावट देखी जिसका उन्होंने ख़्वाब में भी तसव्वुर न किया था, तो वे हक्के-बक्के रह गए और उनके हौसले पस्त हो गए, क्योंकि ख़न्दक़ इतनी चौड़ी थी कि एक अच्छा घोड़ा भी तेज़ दौड़कर उसे फलाँग नहीं सकता था। उसमें गिरने वाला आदमी भी आसानी से बाहर नहीं निकल सकता था। ख़ास तौर पर ज़िरह पहने आदमी के लिए ऊपर चढ़कर निकलना बहुत मुश्किल था। मुशरिकों के आने की ख़बर मिलते ही हमारे प्यारे नबी ने अपने सहाबा को, जो छह दिन से लगातार काम करके थक चुके थे, फ़ौरन जमा किया और ख़न्दक़ की इस तरफ़ सलअ पहाड़ के दामन में अपना पड़ाव डाला। उनके पीछे सलअ पहाड़ और मदीना था, सामने ख़न्दक़, और उसके पार दुश्मन… इस बार भी इब्ने उम्मे मकतूम को मदीना में नबी-ए-करीम का नायब बनाकर छोड़ा गया। औरतों और बच्चों को क़िलों में ठहराया गया। तीन हज़ार आदमियों के इस्लामी लश्कर में छत्तीस घुड़सवार थे। झंडे हज़रत ज़ैद इब्ने हारिसा और हज़रत साद इब्ने उबादा उठाए हुए थे।7 रसूलुल्लाह का चमड़े का बना ख़ेमा सलअ पहाड़ के दामन में लगाया गया। सहाबा-ए-किराम, जो आगे चलकर भी बहुत-से कारनामे दिखाने वाले थे, दुश्मन की हर हरकत पर ग़ौर से नज़र रखने लगे। उसी वक़्त हज़रत उमर हमारे प्यारे नबी की ख़िदमत में आए। उन्होंने कहा: “या रसूलल्लाह! मैंने सुना है कि क़ुरैज़ा के यहूदियों ने हमारे बीच का समझौता तोड़ दिया है और हमारे ख़िलाफ़ जंग की तैयारी कर रहे हैं!” इस अनचाही ख़बर पर सारे जहानों के सरदार ने जवाब में फ़रमाया: “हस्बुनल्लाहु व निअमल वकील (अल्लाह तआला हमारे लिए काफ़ी है। वह कितना अच्छा कारसाज़ है!)” आपको बहुत दुख हुआ। अब इस्लामी लश्कर दो आगों के बीच घिर गया था। उत्तर और पश्चिम में मुशरिकों के लश्कर थे, और दक्षिण-पूरब में यहूदी। रसूलुल्लाह ने हज़रत ज़ुबैर इब्ने अव्वाम को बनू क़ुरैज़ा के क़िले की तरफ़ भेजा। हज़रत ज़ुबैर ने जाकर हाल मालूम किया। लौटकर उन्होंने जो देखा था, बयान किया: “या रसूलल्लाह! मैंने उन्हें अपने क़िलों की मरम्मत करते, जंग की मश्क़ और क़वायद करते देखा। इसके अलावा वे अपने जानवरों को भी इकट्ठा कर रहे थे।” इस पर हबीब-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने साद इब्ने मुआज़, साद इब्ने उबादा, ख़व्वात इब्ने जुबैर, अम्र इब्ने औफ़ और अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा को बनू क़ुरैज़ा के पास भेजा, ताकि उन्हें नसीहत करें और समझौते को फिर से ताज़ा करें।8 यह ज़िम्मेदारी पाने वाले पाँचों सहाबी क़ुरैज़ा के यहूदियों के क़िले पर गए और उन्हें नसीहत की। लेकिन नसीहत का कोई असर न हुआ। ऊपर से यहूदी उनकी तौहीन भी करने लगे। आख़िरी बात के तौर पर उन्होंने कहा: “हमारे भाइयों बनू नज़ीर को उनके वतन से निकालकर तुमने हमारे बाज़ू और पर तोड़ डाले हैं। और मुहम्मद होते कौन हैं! उनके और हमारे बीच न कोई क़ौल है, न कोई समझौता। हम सबने मिलकर तुम्हारे नबी पर टूट पड़ने और उन्हें क़त्ल करने की क़सम खाई है। हम अपने भाइयों की ज़रूर पीठ थामेंगे, उनकी मदद करेंगे!…” हज़रत साद इब्ने मुआज़ और उनके साथी रसूलुल्लाह की ख़िदमत में आए और इशारों-इशारों में, इस तरह कि हर कोई न समझ सके, हाल बयान किया। नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “अपनी ख़बर को छिपाकर रखो। सिर्फ़ जानने वाले पर ज़ाहिर करो, क्योंकि जंग तदबीर और चाल का नाम है।”9
सहाबा-ए-किराम ख़न्दक़ की इस तरफ़ नबी-ए-करीम का इंतिज़ार कर रहे थे और सोच रहे थे कि अब क्या क़दम उठाया जाएगा। थोड़ी देर बाद कायनात के सुल्तान अपने बहादुर सहाबा के पास तशरीफ़ लाए और “अल्लाहु अकबर! अल्लाहु अकबर!” कहकर तकबीर कही। यह सुनकर शान वाले सहाबा ने एक ज़बान होकर तकबीर कही, अल्लाह पाक के मुबारक नाम की बुलंदी का एलान किया और ख़न्दक़ के पार रेत की तरह उमड़ते काफ़िरों के दिलों में ख़ौफ़ डाल दिया। तकबीरें सुनकर मुशरिकों ने कहा: “मुहम्मद और उनके सहाबा को ज़रूर कोई ख़ुशख़बरी मिली है।”
नबी-ए-करीम ने अपने सहाबा से फ़रमाया: “ऐ मुसलमानों की जमाअत! अल्लाह तआला की फ़तह और मदद की ख़ुशख़बरी से ख़ुश हो जाओ!” इस तरह आपने उन्हें जीत की ख़ुशख़बरी दी। शान वाले सहाबा इससे पहले बहुत-से सरिय्यों (छोटे लश्करों) में रह चुके थे, बद्र और उहुद के ग़ज़वों में शरीक हुए थे। तादाद और ताक़त में उनसे कहीं ज़्यादा मुशरिकों को उन्होंने अल्लाह तआला की इजाज़त और रसूल-ए-अकरम की दुआ की बरकत से हर बार शिकस्त दी थी। जब उनके आगे तमाम मौजूदात के “सिर के ताज” हों, तो कोई काम ऐसा नहीं हो सकता था जो वे न कर सकें, कोई तकलीफ़ ऐसी नहीं हो सकती थी जिसे वे सह न सकें। सर्दी थी, क़हत सख़्त था, भूख हद से ज़्यादा थी… नबी-ए-करीम समेत बहुत-से लोगों ने अपने मुबारक पेटों पर पत्थर बाँध रखे थे। सामने दुश्मन रेत की तरह उमड़ रहा था! लेकिन शान वाले सहाबा के लिए न दुश्मन की कसरत की कोई अहमियत थी, न सही जाने वाली तकलीफ़ों की। अल्लाह तआला सबसे अच्छा कारसाज़ था… वे उसी से जुड़ गए थे, उसी पर भरोसा किए हुए थे, उसी की पनाह में आ गए थे। क़ुरैश के बड़े सिपहसालारों और क़ुरैश के साथ आए दूसरे क़बीलों के सरदारों ने आम हमले का फ़ैसला करने से पहले ख़न्दक़ के आस-पास कोई ऐसी जगह ढूँढनी शुरू की जहाँ से पार हो सकें। उन्होंने ख़न्दक़ के एक सिरे से दूसरे सिरे तक चक्कर लगाया। आख़िरकार वे उस तंग जगह पर रुके जो जल्दबाज़ी की वजह से अधूरी रह गई थी, और उन्होंने फ़ैसला किया कि यहीं से हमला करना मुनासिब होगा। मुशरिक सिपाही भी अपने सिपहसालारों के पीछे-पीछे चल रहे थे; वे कभी ख़न्दक़ को, कभी शान वाले सहाबा को देखकर हैरान हो रहे थे। वे कह रहे थे: “हम क़सम खाते हैं कि यह अरबों का अपनाया हुआ तरीक़ा नहीं है। यह ज़रूर उस फ़ारसी आदमी की सलाह है!” क़ुरैश के सिपहसालारों ने अपने सिपाहियों को ख़न्दक़ की तंग जगह दिखाकर पूछा: “यहाँ से कौन कूदकर उस पार जा सकता है?” तो उनमें से पाँच घुड़सवार अलग हुए। इन्हें आमने-सामने की लड़ाई के लिए ख़न्दक़ के दूसरी तरफ़ जाना था। सहाबा-ए-किराम और मुशरिक सिपाही बड़ी दिलचस्पी से इन पाँच घुड़सवारों की हरकतें देखने लगे। घुड़सवार रफ़्तार पकड़ने के लिए पीछे हटे। फिर अपने घोड़ों का रुख़ ख़न्दक़ की सबसे तंग जगह की तरफ़ करके उन्हें दौड़ा दिया। सरपट दौड़ते पाँच नस्ली घोड़े एक ही छलाँग में ख़न्दक़ के उस पार पहुँचने में कामयाब हो गए। बहुत-से घुड़सवारों ने उनके पीछे जाना चाहा, लेकिन कामयाब न हो सके और ख़न्दक़ की दूसरी तरफ़ ही रह गए। पार जाने वालों में अम्र इब्ने अब्दे वुद्द नाम का एक बहुत ताक़तवर पहलवान था, जिसकी पीठ कभी ज़मीन से नहीं लगी थी; हर कोई उससे डरता था, कोई उसके सामने आने की हिम्मत नहीं करता था। वह अकेला एक लश्कर के बराबर था। दस हज़ार के लश्कर में से उसी का यहाँ आगे आना भी यही दिखाता था। उसने सिर से पाँव तक ज़िरह पहन रखी थी। घोड़े पर उसका अंदाज़ बड़ा रोबदार था। इस आदमी की सूरत ही दिलों में डर बिठा देती थी; उसने मुजाहिदों को ललकारा: “अगर कोई मुझसे लड़ सकता है तो मैदान में आए!…” घमंड के इस पुतले को देखकर हज़रत अली हमारे प्यारे नबी की ख़िदमत में हाज़िर हुए और इजाज़त माँगी: “या रसूलल्लाह! मेरी जान आप पर क़ुरबान! उससे मैं लड़ूँगा।” उनके बदन पर ज़िरह तक न थी।
“ऐ सलमान! शाम ज़रूर फ़तह होगा। हिरक़्ल अपने मुल्क के सबसे दूर-दराज़ कोने में भाग जाएगा। तुम शाम के हर हिस्से पर क़ाबिज़ हो जाओगे। कोई भी तुम्हारा मुक़ाबला न कर सकेगा। यमन ज़रूर फ़तह होगा। यह ‘मशरिक़ का मुल्क’ भी ज़रूर फ़तह होगा और ईरान का बादशाह (किसरा) मारा जाएगा। अल्लाह तआला ये फ़तहें मेरे बाद तुम्हें नसीब फ़रमाएगा” हदीस शरीफ़
सहाबा-ए-किराम उन्हें रश्क भरी नज़रों से देख रहे थे। हमारे प्यारे नबी ने अपनी मुबारक ज़िरह उतारकर हज़रत अली को पहनाई। अपनी तलवार उनकी कमर में बाँधी। अपने मुबारक सिर से अमामा उतारकर ख़ुद अपने मुबारक हाथों से उनके सिर पर बाँधा। फिर गिड़गिड़ाकर यूँ दुआ फ़रमाई: “या अल्लाह! बद्र के ग़ज़वे में मेरे चचाज़ाद भाई उबैदा और उहुद के ग़ज़वे में मेरे चचा हमज़ा शहीद हुए। मेरे पास मेरा भाई और मेरा चचाज़ाद अली रह गया है। तू उसकी हिफ़ाज़त फ़रमा। उसे अपनी मदद अता फ़रमा। मुझे अकेला न छोड़!” सहाबा-ए-किराम ने कहा: “आमीन!” दुआओं और तकबीरों के बीच अल्लाह तआला के शेर पैदल आगे बढ़े और अम्र इब्ने अब्दे वुद्द के सामने जा खड़े हुए, जो घोड़े पर एक साये की तरह जमा बैठा था। आँखों के सिवा जिसका सारा बदन ज़िरहों से ढका हुआ था, उस अम्र ने इस बहादुर को न पहचाना और पूछा कि वह कौन है। उन्होंने यह कहकर अपना तआरुफ़ कराया: “मैं अली इब्ने अबी तालिब हूँ।” तो अम्र ने गोया उन पर तरस खाते हुए कहा: “ऐ भतीजे! तुम्हारा बाप मेरा दोस्त है। इसलिए मैं तुम्हारा ख़ून बहाना नहीं चाहता। क्या तुम्हारे चचाओं में से कोई नहीं जो मेरे सामने आए?” इस पर हज़रत अली ने उसे भड़काते हुए कहा: “ऐ अम्र! अल्लाह की क़सम, मैं तो तुम्हारा ख़ून बहाना चाहता हूँ। लेकिन क्या हम दोनों का बराबर की हालत में होना ज़रूरी नहीं? क्या बहादुरी की शान के लायक़ यही नहीं? जबकि मैं पैदल हूँ और तुम घोड़े पर!…”
यह सुनकर अम्र की बहादुरी की रग फड़क उठी: वह फ़ौरन घोड़े से उतरा, अपने घोड़े की टाँगें तलवार से काट डालीं और ग़ुस्से में हज़रत अली के सामने आ खड़ा हुआ। वह हमला करने ही वाला था कि अल्लाह तआला के शेर ने पूछा: “ऐ अम्र! मैंने सुना है कि तुमने क़सम खा रखी है कि जब क़ुरैश के किसी आदमी से तुम्हारा सामना होगा, तो उसकी दो ख़्वाहिशों में से एक ज़रूर पूरी करोगे। क्या यह सच है?” उसने जवाब दिया: “हाँ, सच है।” तो हज़रत अली ने उसे ईमान की दावत दी: “तो फिर मेरी पहली ख़्वाहिश यह है कि तुम अल्लाह तआला और उसके रसूल पर ईमान लाकर मुसलमान हो जाओ!” यह सुनकर अम्र को ग़ुस्सा आ गया और उसने कहा: “इसे छोड़ो! यह मुझे नहीं चाहिए!” हज़रत अली ने कहा: “मेरी दूसरी ख़्वाहिश यह है कि तुम लड़ाई छोड़कर मक्का लौट जाओ, क्योंकि अगर रसूल अलैहिस्सलाम दुश्मन पर ग़ालिब आ गए, तो अपनी इस हरकत से तुम आपकी मदद करने वाले ठहरोगे!…” अम्र ने कहा: “इसे भी छोड़ो! मैंने क़सम खाई है कि जब तक बदला न ले लूँ, ख़ुशबू नहीं लगाऊँगा। कोई और ख़्वाहिश हो तो वह बताओ!” तो हज़रत अली ने कहा: “ऐ अल्लाह तआला के दुश्मन! अब तुमसे लड़ने के सिवा कुछ बाक़ी नहीं रहा!”
अम्र इन बातों पर हँसा और बोला: “सचमुच हैरत की बात है! मेरे ख़याल में भी न था कि अरब की धरती पर कोई ऐसा जवाँमर्द है जो मेरे सामने आ सके! ऐ भतीजे! क़सम खाता हूँ, मैं तुम्हें क़त्ल नहीं करना चाहता, क्योंकि तुम्हारा बाप मेरा दोस्त था। मैं अपने सामने क़ुरैश के बड़े लोगों में से अबू बकर जैसा, उमर जैसा कोई आदमी चाहता था।” हज़रत अली ने कहा: “ऐसा हो तब भी, मैं तुम्हें क़त्ल करने के लिए ही यहाँ आया हूँ।” यह सुनते ही अम्र का ख़ून खौल उठा। उसका तलवार उठाना और गिराना एक ही पल में हुआ। अल्लाह तआला के शेर हज़रत अली (कर्रमल्लाहु वज्हहू) ऐसी ही किसी बात के इंतिज़ार में थे; वह बिजली की तरह एक तरफ़ उछले और वार को अपनी ढाल पर रोका। लेकिन अम्र ऐसी कितनी ही ढालें तोड़ चुका था। उसके वार के आगे मज़बूत से मज़बूत ढालें भी नहीं टिकती थीं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। हज़रत अली की ढाल टूट गई, और तलवार उनके सिर को छूकर उन्हें ज़ख़्मी कर गई। अब हमला करने की बारी हज़रत अली की थी।
उन्होंने अल्लाह तआला की पनाह लेकर “या अल्लाह!…” कहा और ज़ुल्फ़िक़ार अम्र की गर्दन पर दे मारी। उस वार के साथ ही इस्लामी लश्कर में ज़मीन-आसमान को गुँजा देने वाली “अल्लाहु अकबर!… अल्लाहु अकबर!…” की आवाज़ें, और काफ़िरों के लश्कर में चीख़-पुकार उठने लगी… जी हाँ, नबियों के सुल्तान, तमाम मौजूदात के सिर के ताज की दुआ क़बूल हो चुकी थी। देव जैसा अम्र ज़मीन पर ढेर पड़ा था, उसके धड़ से ख़ून परनाले की तरह बह रहा था, और उसका सिर लोहे के ख़ोद समेत उड़ गया था। जिस अम्र पर उन्हें सबसे ज़्यादा भरोसा था, उसे ज़मीन पर गिरा देखकर उसके साथी फ़ौरन हज़रत अली पर टूट पड़े। यह देखकर सहाबा-ए-किराम दौड़कर वहाँ पहुँचे। ज़ुबैर इब्ने अव्वाम ने नौफ़ल इब्ने अब्दुल्लाह को ज़ख़्मी करके उसके घोड़े समेत ख़न्दक़ में गिरा दिया।
हज़रत अली ने ख़न्दक़ में उतरकर नौफ़ल के दो टुकड़े कर दिए। बाक़ी लोग बड़ी मुश्किल से ख़न्दक़ पार करके पीछे भाग गए। मुशरिक लश्कर का सिपहसालार-ए-आला तो जंग की शुरुआत ही में बड़ी मायूसी में डूब गया था।
अब जंग की शक्ल साफ़ हो चुकी थी। ख़न्दक़ आमने-सामने की लड़ाई को रोके हुए थी। दोनों तरफ़ वाले तीर चलाकर एक-दूसरे का नुक़सान करने की कोशिश करते रहे। इससे नतीजे को लंबा खींचने के सिवा कुछ हासिल न था। जब मुशरिक समझ गए कि इस तरह वे ग़ालिब नहीं आ सकेंगे, तो उन्होंने फ़ैसला किया कि ख़न्दक़ की हर तरफ़ से हमला करना सबसे मुनासिब रास्ता होगा, और हमला शुरू कर दिया। दस हज़ार आदमियों का भारी-भरकम दुश्मन लश्कर ख़न्दक़ पार करने की कोशिश में था, और तीन हज़ार आदमियों का शानदार इस्लामी लश्कर तीरों और पत्थरों से उन्हें ख़न्दक़ पार न करने देने में लगा था। एक ज़बरदस्त मुक़ाबला शुरू हो गया था। यह मुक़ाबला शाम तक चलता रहा।
रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने रात को ख़न्दक़ की अलग-अलग जगहों पर पहरेदार बिठाए। आप ख़ुद तंग जगह पर पहरा देने लगे। आपने पाँच सौ आदमियों का एक गश्ती दस्ता मदीना भेजा और हुक्म दिया कि गलियों में बुलंद आवाज़ से तकबीर कहते रहें। इस तरह यहूदियों या क़ुरैश के मुशरिकों की तरफ़ से आने वाले किसी ख़तरे को वक़्त पर रोका जा सकता और औरतों और बच्चों की हिफ़ाज़त हो सकती।
क़ुरैज़ा के यहूदियों ने हुयय इब्ने अख़तब को मुशरिकों के पास भेजकर रात के छापों के लिए दो हज़ार आदमियों की ताक़त माँगी। वे रातों को बेसहारा रह गई औरतों और बच्चों पर हमला करना चाहते थे। लेकिन मुजाहिद सुबह तक गश्त करते और “अल्लाहु अकबर!” के नारे लगाते रहे; इससे उनके दिलों में बड़ा ख़ौफ़ बैठ गया। वे अपने क़िलों में दुबककर मौक़े का इंतिज़ार करने लगे। कभी-कभी वे छोटी-छोटी टोलियों में मदीना में घुसने की कोशिश करते रहे।
एक रात बनू क़ुरैज़ा के बड़े लोगों में से ग़ज़्ज़ाल अपने साथ दस आदमियों की एक टुकड़ी लेकर उस हवेली तक पहुँचने में कामयाब हो गया जिसमें नबी-ए-करीम की फूफी, हमारी माँ हज़रत सफ़िय्या थीं। अंदर औरतें और बच्चे थे। उनके पास अपने बचाव के लिए एक भी हथियार न था। यहूदियों ने पहले हवेली पर तीर बरसाने शुरू किए, फिर अंदर घुसने की कोशिश की। उनमें से एक अंदर के आँगन तक पहुँचने में कामयाब हो गया और अंदर घुसने के लिए आस-पास का जायज़ा लेने लगा। उसी वक़्त हमारे प्यारे नबी की बहादुर फूफी ने अपने साथ वालों को ताकीद की कि बिल्कुल आवाज़ न निकालें, फिर नीचे उतरकर दरवाज़े के पास आईं। उन्होंने एक कपड़े से अपना सिर कसकर लपेटा और मर्द का रूप बना लिया, फिर हाथ में एक डंडा लिया और कमर में एक छुरी खोंस ली। धीरे से दरवाज़ा खोलकर वह उस यहूदी के पीछे पहुँचीं और हाथ का डंडा पूरी ताक़त से उसके सिर पर दे मारा। एक पल भी गँवाए बिना उन्होंने ज़मीन पर गिरे यहूदी को मार डाला। फिर मारे गए यहूदी का सिर बाहर तीर चलाने में लगे यहूदियों की तरफ़ फेंक दिया। अपने साथी का कटा हुआ सिर पाँवों में पड़ा देखकर यहूदी बहुत डर गए और भागने लगे।
साथ-साथ वे बड़बड़ा रहे थे: “हमें तो ख़बर दी गई थी कि मुसलमानों ने अपने घरों में एक भी मर्द नहीं छोड़ा, सबको जंग पर भेज दिया है!…”10 सुबह जंग फिर उसी शिद्दत से जारी रही। तीर हवा में सनसनाते हुए उड़ रहे थे। सारे जहानों के सरदार (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने शान वाले सहाबा से फ़रमाया: “उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसके क़ब्ज़ा-ए-क़ुदरत में मेरी जान है, जिन तकलीफ़ों का हमें सामना है, वे तुमसे ज़रूर उठा ली जाएँगी और तुम कुशादगी में निकाले जाओगे।” इस तरह आपने उन्हें सब्र करने की नसीहत की और ख़ुशख़बरी दी कि जीत ईमान वालों की होगी। यह ख़ुशख़बरी पाकर बहादुर सहाबा भूख और क़हत जैसी तकलीफ़ों को भूल गए।
“ऐ मुसलमानों की जमाअत! अल्लाह तआला की फ़तह और मदद की ख़ुशख़बरी से ख़ुश हो जाओ!” हदीस शरीफ़
उन्होंने जी-जान से कोशिश की और एक भी मुशरिक को ख़न्दक़ पार न करने दिया।
सहाबा-ए-किराम के बड़े लोगों में से हज़रत साद इब्ने मुआज़ बड़ी बहादुरी से लड़ रहे थे। जंग के दौरान हिब्बान इब्ने क़ैस इब्ने अरक़ा नाम के एक मुशरिक का चलाया हुआ तीर उनके बाज़ू में लगा और वह ज़ख़्मी हो गए। तीर एक बड़ी रग पर लगा था और उनका बहुत ख़ून बह गया। ज़ख़्मी हज़रत साद ने देखा कि आस-पास के लोग ख़ून रोकने की कोशिश कर रहे हैं, तो वह समझ गए कि उनकी हालत संगीन है, और उन्होंने यूँ दुआ की: “या रब! अगर क़ुरैश जंग जारी रखने वाले हैं, तो मुझे उम्र अता फ़रमा, क्योंकि तेरे रसूल को सताने वाले, उन्हें झुठलाने वाले इन मुशरिकों से लड़ना मुझे जितना पसंद है, उतनी कोई और चीज़ पसंद नहीं। और अगर हमारे बीच की जंग ख़त्म हो रही है, तो मुझे शहादत के दर्जे तक पहुँचा दे। लेकिन बनू क़ुरैज़ा का अंजाम देखे बिना मेरी रूह क़ब्ज़ न करना।” उनकी दुआ क़बूल हुई और ख़ून रुक गया। मगर अब्दुल्लाह इब्ने उबई जैसे मुनाफ़िक़, जो सहाबा-ए-किराम के बीच लड़ते हुए दिखाई देते थे, बहुत सुस्ती से काम ले रहे थे और अगली सफ़ों के क़रीब नहीं आते थे। इसके अलावा वे मुजाहिदों के हौसले तोड़ने के लिए जो कुछ बन पड़ता करते, और फ़ितना फैलाने की कोशिश में कहते: “मुहम्मद तुमसे रूम के बादशाह (क़ैसर) और ईरान के बादशाह (किसरा) के ख़ज़ानों का वादा करते रहते हैं, जबकि इस वक़्त हम ख़न्दक़ के अंदर क़ैद होकर बैठे हैं। डर के मारे हम हाजत के लिए भी नहीं जा सकते। अल्लाह और उसका रसूल हमें धोखा देने के सिवा कुछ नहीं करते, दुनिया की कोई चीज़ भी देने का वादा नहीं करते!…” जब कोई मुश्किल आती, तो यह बहाना बनाकर कि दुश्मन उनके घरों पर हमला कर सकता है, वे अपने मोर्चे छोड़कर चले जाते। मुनाफ़िक़ों की ये हरकतें भी एक अलग मुसीबत और अलग तकलीफ़ बन गई थीं। मुशरिक लश्कर जल्द से जल्द नतीजे तक पहुँचने के लिए अपनी पूरी ताक़त झोंक रहा था, लेकिन इज़्ज़त वाले सहाबा के बहादुराना बचाव के आगे उसकी एक न चली। वे सबसे ज़्यादा तंग दर्रे पर हमला करते थे। हमारे प्यारे नबी इस जगह से नहीं हटे और अपने सहाबा को जंग के लिए जोश दिलाते रहे। सहाबा-ए-किराम नबी-ए-करीम के बिल्कुल पहलू में लड़ने की इज़्ज़त पाना चाहते थे; उन्होंने जंग के मैदान में ऐसे कारनामे दिखाए जो कभी देखे न गए थे। एक बार मुशरिकों ने ज़ोरदार तीरबारी शुरू कर दी। उनका पूरा निशाना वह ख़ेमा था जिसमें कायनात के सुल्तान थे।
हमारे प्यारे नबी का मुबारक जिस्म एक ज़िरह से ढका हुआ था। मुबारक सिर पर लोहे का ख़ोद था। आप ख़ेमे के आगे बिल्कुल सीधे खड़े थे और जंग के रुख़ के मुताबिक़ अपने सहाबा को हुक्म दे रहे थे। मुशरिक कभी-कभी सबसे कमज़ोर नज़र आने वाली जगह पर अचानक टूट पड़ते, और मुबारक सहाबा दौड़कर वहाँ पहुँचते और दीन के दुश्मनों को पीछे धकेल देने तक इश्क़ के साथ लड़ते रहते।
“अली की तलवार का एक वार तमाम इंसानों और जिन्नात की इबादतों से भी ज़्यादा क़ीमती है” हदीस शरीफ़
ख़न्दक़ का ग़ज़वा
यह बेमिसाल मुक़ाबला बहुत सख़्त था: बहादुर सहाबा को लड़ते हुए दाएँ-बाएँ देखने की भी फ़ुरसत न थी। उस दिन सुबह से शुरू हुआ यह मुक़ाबला देर रात तक चलता रहा। जब-जब नमाज़ का वक़्त आता, सहाबा-ए-किराम कहते: “या रसूलल्लाह! हम अपनी नमाज़ नहीं पढ़ सके”, और सारे जहानों के सरदार, कायनात के सुल्तान बड़े दुख के साथ फ़रमाते: “अल्लाह की क़सम, मैं भी नहीं पढ़ सका।” इशा के वक़्त के क़रीब उन्होंने मुशरिकों के उस झुंड को, जो उन्हें इबादत नहीं करने दे रहा था, एक बहुत ज़ोरदार हमले से पीछे धकेलकर तितर-बितर कर दिया। क़ुरैश और ग़तफ़ान वाले इस बिखराव से सँभल न सके और रात गुज़ारने के लिए अपने पड़ाव की तरफ़ हट गए। मुजाहिद हमारे प्यारे नबी के ख़ेमे की तरफ़ चल पड़े। फ़ख़्र-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजे गए थे और बद्दुआ करना आपकी मुबारक आदत न थी; फिर भी उस वक़्त नमाज़ की ख़ातिर आप बर्दाश्त न कर सके और मुशरिकों के लिए यूँ बद्दुआ फ़रमाई: “जिस तरह उन्होंने सूरज डूबने तक हमें उलझाए रखकर हमारी नमाज़ से रोका, उसी तरह अल्लाह तआला भी उनके घरों, उनके पेटों और उनकी क़ब्रों को आग से भर दे!” क़ज़ा हुई ज़ुहर, अस्र और मग़रिब की नमाज़ें पढ़ने के बाद आपने इशा की नमाज़ की इमामत फ़रमाई।
या रब, काफ़िरों को शिकस्त दे
इस्लाम को पूरी तरह मिटा देने के लिए किए गए इन मुक़ाबलों के बाद मुशरिक समझ गए कि मुसलमानों को दिन में हराया नहीं जा सकता। उनकी नज़र में एक ही तदबीर थी: उसी शिद्दत से रात के छापे मारे जाएँ। मुसलमानों को सिर्फ़ इसी तरह हराया जा सकता था। उन्होंने अपने इस फ़ैसले पर फ़ौरन अमल शुरू कर दिया और बनू क़ुरैज़ा के यहूदियों के साथ मिलकर रात के छापे मारने लगे। अपने सिपाहियों को टोलियों में बाँटकर मुशरिक बारी-बारी हमला करते थे। यह हालत कई दिन तक जारी रही। हमारे प्यारे नबी और बहादुर सहाबा-ए-किराम भूखे, जागते और थके-हारे होने के बावजूद बचाव करते रहे। उन्होंने दुश्मन के एक भी सिपाही को ख़न्दक़ पार करके इस तरफ़ न आने दिया। जी-जान से किया गया यह बचाव इससे पहले के तमाम ग़ज़वों से ज़्यादा ख़ौफ़नाक, ज़्यादा सख़्त, ज़्यादा तकलीफ़देह और ज़्यादा मशक़्क़त वाला था।
कई दिनों से लड़ रहे मुशरिकों में खाने की तंगी शुरू हो गई। ज़मीन पर मुट्ठी भर सूखी घास भी न मिलने की वजह से उनके घोड़े और ऊँट भी मरने लगे थे। इसलिए मुशरिकों के सिपहसालार ने ज़िरार इब्ने ख़त्ताब की सरदारी में एक टुकड़ी को रसद लाने के लिए क़ुरैज़ा के यहूदियों के पास भेजा। यहूदी काफ़िरों के लिए अपना सब कुछ क़ुरबान करने को तैयार थे; उन्होंने फ़ौरन बीस ऊँटों पर गेहूँ, जौ, खजूर और जानवरों के लिए भूसा लादकर उनके हवाले कर दिया। ज़िरार अपने सिपाहियों के साथ ख़ुशी-ख़ुशी लौट रहा था कि क़ुबा के क़रीब सहाबा की एक टोली से उनका सामना हो गया। बहादुर सहाबा ने फ़ौरन हमला कर दिया। एक ख़ूनी झड़प के बाद उन्होंने दुश्मन को भगा दिया, लदे हुए ऊँट नबी-ए-करीम के हवाले किए और आपकी बहुत-सी दुआएँ पाईं।11 लगभग एक महीने तक चलने वाले इस सख़्त मुक़ाबले में आपके बहादुर सहाबा बहुत मुश्किल हालात से गुज़र रहे थे। कायनात के सुल्तान (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) उन पर तरस खाते थे और उन पर उनके बापों से कई गुना ज़्यादा शफ़क़त फ़रमाते थे। अपने शान वाले सहाबा की इन कोशिशों के जवाब में, जो इंसानी ताक़त से बढ़कर थीं, आप अपनी मुबारक पेशानी ज़मीन पर रखकर उनके लिए अल्लाह तआला से यूँ गिड़गिड़ाकर दुआ फ़रमाते थे:
“ऐ मुसीबत में घिरे लोगों की फ़रियाद को पहुँचने वाले! ऐ ज़रूरतमंदों और बेबसों की दुआ क़बूल करने वाले, या अल्लाह! मेरा और मेरे सहाबा का हाल तू ज़रूर देख रहा है और जानता है। या रब! काफ़िरों को शिकस्त दे, उनमें फूट डाल दे, उनके मुक़ाबले में हमें मदद दे और जीत अता फ़रमा!…”
आख़िरी दिनों में हमारे प्यारे नबी यह दुआ बार-बार दोहराते थे। क़हत की तकलीफ़ों की वजह से मुशरिक जल्द से जल्द मुसलमानों को मिटा देने के लिए अपनी पूरी ताक़त लगा रहे थे। लड़ाई इसी तरह जारी थी कि एक शाम मुशरिक लश्कर में से एक आदमी, जिसके दिल में इस्लाम की मुहब्बत उतर आई थी, नबी-ए-करीम की ख़िदमत में हाज़िर हुआ। यह ग़तफ़ान क़बीले के नुऐम इब्ने मसऊद थे। उन्होंने हमारे प्यारे नबी से अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! मैं यह तस्दीक़ करने आया हूँ कि अल्लाह तआला एक है और आप सच्चे नबी हैं। अलहम्दुलिल्लाह, मुझे मुसलमान होने की इज़्ज़त मिल गई। अब तक मैं आप लोगों के ख़िलाफ़ लड़ता रहा। अब मैं काफ़िरों के ख़िलाफ़ लड़ूँगा। आप मुझे जो हुक्म देंगे, उसे करने के लिए तैयार हूँ! या रसूलल्लाह! मेरे मुसलमान होने की ख़बर मेरी क़ौम को भी नहीं है।” रसूल-ए-अकरम ने पूछा: “क्या तुम इन काफ़िरों के बीच जाकर, उनमें फूट डालकर उन्हें एक-दूसरे से अलग करने की कोशिश कर सकते हो?” उन्होंने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! अल्लाह तआला की मदद से मैं उन्हें एक-दूसरे से अलग कर सकता हूँ। लेकिन क्या मुझे जो चाहूँ कहने की इजाज़त है?” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “जंग चाल का नाम है, तुम जो चाहो कह सकते हो।”
हज़रत नुऐम इब्ने मसऊद पहले क़ुरैज़ा के यहूदियों के पास गए और कहा: “तुम जानते हो कि मुझे तुमसे कितनी मुहब्बत है। लेकिन जो बातें हम अभी करेंगे, वे हमारे बीच ही रहें, किसी को पता न चले!” यहूदियों ने क़सम खाकर कहा: “किसी को पता नहीं चलेगा।” इस पर हज़रत नुऐम ने कहा: “इस आदमी (नबी-ए-करीम) का मामला यक़ीनन एक मुसीबत है। उन्होंने बनू नज़ीर और बनू क़ैनुक़ा के साथ जो किया, वह तुम जानते हो। तुम सबने देखा कि उन्होंने उन्हें उनके वतन, उनके घर-बार से निकाल बाहर किया। अब क़ुरैश और ग़तफ़ान वाले आकर मुसलमानों से लड़ रहे हैं, और तुम उनकी मदद कर रहे हो। कई दिन लड़ने के बावजूद हम अब तक किसी नतीजे पर नहीं पहुँचे। अगर यही हाल रहा, तो लगता है घेराबंदी लंबी खिंचेगी। क़ुरैश और ग़तफ़ान वालों के माल, जायदाद, वतन और बच्चे तुम्हारी तरह यहाँ नहीं हैं। इस जंग में अगर उन्हें मौक़ा मिल गया और वे जीत गए, तो माल-ए-ग़नीमत समेटकर चले जाएँगे। और अगर हार गए, तो उठकर चले जाएँगे और तुम्हें मुसलमानों के साथ अकेला छोड़ देंगे। जबकि तुम्हारे पास मुसलमानों से निपटने की न ताक़त है, न क़ुव्वत। और जंग की मौजूदा हालत यह दिखा रही है कि मुसलमान जीत जाएँगे। अगर वैसा ही हुआ जैसा मेरा अंदाज़ा है, तो मुसलमान तुम्हें तलवार के घाट उतारे बिना नहीं छोड़ेंगे। इसलिए हमें जल्दी कोई तदबीर करनी चाहिए!…”12 यहूदी ये बातें बड़ी घबराहट और डर के साथ सुन रहे थे; वे इस बात पर बहुत ख़ुश हुए कि हज़रत नुऐम को उनकी इतनी फ़िक्र है, और उन्होंने कहा: “तुमने हमसे अपनी दोस्ती का पूरा हक़ अदा कर दिया। अब यह भी बताओ कि हमें कैसी तदबीर करनी चाहिए।” नुऐम इब्ने मसऊद इसी का इंतिज़ार कर रहे थे। उन्होंने कहा: “सही बात यह है कि जब तक क़ुरैश और ग़तफ़ान के बड़े लोगों में से कुछ को यरग़माल न बना लो, मुसलमानों से हरगिज़ जंग में न उतरो! जब तक यरग़माल तुम्हारे पास रहेंगे, वे जंग से भागकर नहीं जा सकेंगे!” इसे बहुत अच्छी तदबीर मानकर यहूदियों ने उनका शुक्रिया अदा किया और उनकी बड़ी इज़्ज़त और ख़ातिरदारी की। हज़रत नुऐम यहूदियों से अलग होकर सीधे क़ुरैश के पड़ाव पर पहुँचे और उनके सिपहसालारों से कहा: “तुम जानते हो कि मुझे मुहम्मद से कितनी दुश्मनी है और तुमसे कितनी मुहब्बत है। मुझे एक बात मालूम हुई है, और दोस्ती का तक़ाज़ा समझकर उसे तुम तक पहुँचाना मैंने अपना बड़ा फ़र्ज़ जाना। लेकिन तुम्हें वादा करके क़सम खानी होगी कि जो कुछ मैं कहूँगा, वह किसी को सुनने नहीं दोगे!” उन्होंने क़सम खाई और बड़े शौक़ से कहा: “बताओ, हम सुन रहे हैं।” हज़रत नुऐम ने कहा: “जान लो कि क़ुरैज़ा के यहूदी तुम्हारे साथ गठजोड़ करके पछता रहे हैं और उन्होंने मुहम्मद को ख़बर भेजी है: ‘हम क़ुरैश और ग़तफ़ान के बड़े लोगों में से कुछ को यरग़माल बनाकर उनकी गर्दनें मारने के लिए तुम्हारे हवाले कर दें। फिर तुम्हारे साथ मिलकर मुशरिकों की जड़ काट देने तक लड़ें! बस तुम हमारे भाइयों बनू नज़ीर को माफ़ करके उनकी ज़मीनें उन्हें लौटा दो!’ और मुहम्मद ने भी यहूदियों की ये माँगें मान ली हैं! अगर यहूदी तुमसे यरग़माल माँगें, तो ख़बरदार, हरगिज़ न मानना, वे उन सबको क़त्ल कर देंगे! ख़बरदार, मेरी ये बातें कोई न सुने!…” क़ुरैश के लोगों ने इस अहम ख़बर के लिए हज़रत नुऐम का बहुत शुक्रिया अदा किया और उन पर बड़ी मेहरबानी दिखाई।
“उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसके क़ब्ज़ा-ए-क़ुदरत में मेरी जान है, जिन तकलीफ़ों का हमें सामना है, वे तुमसे ज़रूर उठा ली जाएँगी और तुम कुशादगी में निकाले जाओगे” हदीस शरीफ़
नुऐम इब्ने मसऊद (रज़ियल्लाहु अन्हु) वहाँ से निकलकर ग़तफ़ान वालों के पास आए। जो कुछ क़ुरैश को बताया था, वही उन्हें भी बताया।
एक दिन बाद क़ुरैश के सिपहसालार ने बनू क़ुरैज़ा को ख़बर भेजी: “अब हमारे लिए यहाँ ठहरना बहुत मुश्किल हो गया है, क्योंकि सर्दी है और हमारे जानवर भूख से मरते जा रहे हैं। आज रात अच्छी तैयारी कर लो, ताकि कल सब मिलकर एक ज़ोरदार हमला करें।” यहूदियों ने कहा: “एक तो हम शनिवार के दिन जंग नहीं करते। दूसरे, तुम्हारे साथ जंग में शरीक हो सकें, इसके लिए तुम्हें अपने बड़े लोगों में से बहुत-से आदमी हमें यरग़माल के तौर पर देने होंगे। अगर घेराबंदी लंबी खिंच गई और तुम बेबस होकर अपने वतन लौट गए, तो तुम हमें मुहम्मद के हवाले कर दोगे। और अगर यरग़माल दे दोगे, तो हमें छोड़कर नहीं जाओगे!…” यह ख़बर जब क़ुरैश के सिपहसालार तक पहुँची, तो उसने कहा: “तो नुऐम इब्ने मसऊद की बात सच निकली!” क़ुरैश के लोगों ने यहूदियों को फिर ख़बर भेजी: “हम तुम्हें यरग़माल के तौर पर अपना एक आदमी भी नहीं देंगे। अगर कल आकर हमारे साथ मिलकर लड़ो, तो बहुत अच्छा, वरना हम अपने वतन लौट जाएँगे। और तुम मुहम्मद और उनके सहाबा के साथ अकेले रह जाओगे!…”
यह सुनकर क़ुरैज़ा के यहूदियों ने सोचा कि नुऐम की बात सच निकली, और जवाब दिया: “ऐसी हालत में हम भी तुम्हारे साथ मिलकर मुसलमानों से नहीं लड़ेंगे…” इस तरह दोनों तरफ़ के दिलों में डर बैठ गया।13 नबी-ए-करीम के पास जिबराईल अलैहिस्सलाम आए और ख़ुशख़बरी दी कि अल्लाह तआला मुशरिकों को आँधी से तबाह कर देगा। इस पर सारे जहानों के सरदार अपने मुबारक घुटनों के बल बैठ गए, अपने मुबारक हाथ फैलाए और यह कहकर अल्लाह तआला का शुक्र अदा किया: “या अल्लाह! तूने मुझ पर और मेरे सहाबा पर रहम किया, इसलिए मैं तेरा शुक्र अदा करता हूँ।” फिर आपने यह ख़ुशख़बरी अपने बहादुर सहाबा को सुनाई। वह रात शनिवार की रात थी। चारों तरफ़ ऐसा घुप अँधेरा छा गया था कि हाथ को हाथ सुझाई न देता था। फिर कड़ाके की ठंड पड़ी, और उसके पीछे बहुत तेज़ आँधी चलने लगी।
इस रात का हाल हज़रत हुज़ैफ़ा इब्ने यमान ने यूँ बयान किया: “वह ऐसी रात थी कि उससे ज़्यादा अँधेरी रात हमने पहले कभी नहीं देखी थी। इस घने अँधेरे में बादल की गरज जैसे शोर के साथ एक ख़ौफ़नाक आँधी भी चलने लगी थी। उसी वक़्त नबी-ए-करीम ने हमें ख़बर दी कि मुशरिक लश्कर घबराहट और डर में पड़कर आपस में झगड़ बैठा है। हम कड़ाके की ठंड, भूख और रात की दहशत से अपने पाँव पर खड़े नहीं हो पा रहे थे और अपनी जगह पर ऊपर कुछ ओढ़े बैठे इंतिज़ार कर रहे थे। रसूलुल्लाह नमाज़ के लिए खड़े हुए और रात का एक हिस्सा नमाज़ पढ़ते हुए गुज़ारा।
फिर हमारी तरफ़ मुड़कर आपने यूँ फ़रमाया: ‘तुममें से कोई है जो मुशरिक लश्कर के पास जाकर, उनका हाल देखकर मुझे ख़बर लाए? जो यह ख़बर लाएगा, मैं अल्लाह तआला से दुआ करूँगा कि जन्नत में वह मेरा साथी हो।’ वहाँ मौजूद लोग सख़्त भूख और ठंड से अपने पाँव पर खड़े न हो सके। फिर रसूलुल्लाह मेरे पास आए। मैं ठंड और भूख से दोनों घुटनों के बल सिकुड़कर बैठा हुआ था। रसूलुल्लाह ने मुझे छूकर पूछा: ‘तुम कौन हो?’ मैंने कहा: ‘मैं हुज़ैफ़ा हूँ, या रसूलल्लाह।’ रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: ‘जाओ, देखकर आओ कि यह क़ौम क्या कर रही है! मेरे पास लौट आने तक उन पर न तीर चलाना, न पत्थर फेंकना, न नेज़े से वार करना, न तलवार से। जब तक तुम मेरे पास लौटकर नहीं आ जाते, तुम्हें न ठंड से कोई नुक़सान पहुँचेगा, न गर्मी से, न तुम क़ैद किए जाओगे, न तुम्हें कोई अज़ियत दी जाएगी।’
मैंने अपनी तलवार और अपनी कमान ली और जाने के लिए तैयार हो गया। रसूलुल्लाह ने मेरे लिए यह दुआ फ़रमाई: ‘या अल्लाह, इसकी आगे से और पीछे से, दाएँ से और बाएँ से, ऊपर से और नीचे से हिफ़ाज़त फ़रमा।’
मैं मुशरिकों की तरफ़ चल पड़ा। ऐसा लगता था जैसे मैं हम्माम में चल रहा हूँ। अल्लाह की क़सम, मेरे अंदर न कोई डर था, न ठिठुरन, न कँपकँपी। आख़िरकार मैं मुशरिकों के पड़ाव पर पहुँच गया। उनके सिपहसालार और बड़े लोग एक ओट में आग जलाकर ताप रहे थे। अबू सुफ़यान कह रहा था: ‘यहाँ से कूच कर जाना चाहिए।’ फ़ौरन मेरे दिल में आया कि उसे वहीं मार डालूँ। मैंने अपने तरकश से एक तीर निकालकर कमान पर चढ़ाया। आग की रौशनी का फ़ायदा उठाकर उसे निशाना बनाना चाहा। ठीक तीर छोड़ने के वक़्त मुझे रसूलुल्लाह का यह फ़रमान याद आया: ‘मेरे पास लौट आने तक कोई हंगामा खड़ा न करना’, और मैं मारने से रुक गया। इसके बाद मैंने अपने अंदर बड़ी हिम्मत पाई। मैं मुशरिकों के बीच जाकर आग के पास बैठ गया। बेमिसाल शिद्दत की आँधी और अल्लाह तआला का दिखाई न देने वाला लश्कर (फ़रिश्ते) उनके साथ जो करना था, कर रहे थे। आँधी से उनके बर्तन-भाँडे उलट रहे थे, उनकी आगें और चिराग़ बुझ रहे थे, उनके ख़ेमे उनके सिरों पर गिर रहे थे। एक बार मुशरिक लश्कर का सिपहसालार अबू सुफ़यान उठा और बोला: ‘तुम्हारे बीच जासूस और मुख़बिर हो सकते हैं। होशियार रहो! हर आदमी देखे कि उसके पास कौन है! हर कोई अपने पास बैठे आदमी का हाथ पकड़ ले!’ अबू सुफ़यान को जैसे यह अंदेशा हो गया था कि उनके बीच कोई अजनबी घुस आया है। मैंने फ़ौरन अपने हाथ बढ़ाकर अपने दाएँ और बाएँ बैठे दोनों आदमियों के हाथ पकड़ लिए, और इससे पहले कि वे मुझसे पूछते, मैंने उनसे उनके नाम पूछ लिए। इस तरह मैंने ख़ुद को पहचाने जाने से बचा लिया। आख़िरकार अबू सुफ़यान ने अपने लश्कर से यूँ ख़िताब किया: ’ऐ क़ुरैश के लोगो! तुम ठहरने लायक़ जगह पर नहीं हो। घोड़े और ऊँट मरने लगे हैं। क़हत ने हर तरफ़ से घेर लिया है।
आँधी से हम पर जो गुज़र रही है, वह तुम देख रहे हो। फ़ौरन कूच कर जाओ! लो, मैं चला!’ यह कहकर वह अपने ऊँट पर सवार हो गया। मुशरिक लश्कर बदहाली की हालत में सिमटकर मक्का की तरफ़ चल पड़ा। उन पर रेत और कंकड़ बरस रहे थे।14 मुशरिक लश्कर के चले जाने पर मैं भी रसूलुल्लाह की तरफ़ चल पड़ा। आधे रास्ते पर पहुँचा तो मेरे सामने सफ़ेद अमामे वाले लगभग बीस घुड़सवार (फ़रिश्ते) आए। उन्होंने मुझसे कहा: ‘रसूलुल्लाह को ख़बर दे दो: अल्लाह तआला ने दुश्मन को तबाह कर दिया…’ जब मैं रसूलुल्लाह के पास लौटा, तो आप एक दरी पर नमाज़ पढ़ रहे थे। लेकिन लौटते ही जाने से पहले वाली मेरी ठिठुरन और कँपकँपी फिर शुरू हो गई। नमाज़ के बाद रसूलुल्लाह ने पूछा कि मैं क्या ख़बर लाया हूँ। मैंने आपको बताया कि मुशरिक किस बदहाली में पड़ गए हैं और चले गए हैं। रसूलुल्लाह इस ख़बर से बहुत ख़ुश हुए और मुस्कुराए। हम कई दिनों से सोए न थे। नबी-ए-करीम ने मुझे भी अपने पास ले लिया और अपने ऊपर ओढ़ी हुई दरी का एक किनारा मुझ पर डाल दिया। वह रात हमने इसी तरह सुबह कर दी। सहर के वक़्त रसूलुल्लाह ने मुझे जगाया। सुबह हुई तो मुशरिक लश्कर का नाम-ओ-निशान तक न रहा था।” मक्का के क़रीब पहुँचने तक उनके पीछे-पीछे तेज़ आँधी चलती रही, और उन्हें पीछे से लगातार तकबीरों की आवाज़ें सुनाई देती रहीं।
क़ुरैश के मुशरिक जब अपना पड़ाव छोड़कर भाग गए, तो उनके पीछे-पीछे आए दूसरे मुशरिक क़बीले भी मदीना के आस-पास से चले गए। वे एक ऐसी बहुत बड़ी हार के ग़म और रंज में डूब गए जिसे वे कभी भुला न सकेंगे। जब वे इस शिकस्त से दो-चार हो रहे थे, तब कायनात के सरदार (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) और आपके शान वाले सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) अल्लाह तआला के हुज़ूर शुक्र के सज्दे में गिर पड़े, उसकी हम्द की और उसका शुक्र अदा किया।
“या अल्लाह! तूने मुझ पर और मेरे सहाबा पर रहम किया, इसलिए मैं तेरा शुक्र अदा करता हूँ” हदीस शरीफ़
मुजाहिद “अल्लाहु अकबर!… अल्लाहु अकबर!…” की आवाज़ों के बीच नूरानी मदीना की राह पर चल पड़े। मदीना की गलियाँ एक पल में उन बच्चों से भर गईं जो कायनात के सुल्तान का और अपने मुबारक बापों, चचाओं, मामुओं और बड़े भाइयों का इस्तिक़बाल करने निकले थे। नबी-ए-करीम भी मुस्कुराकर उनका जवाब दे रहे थे… ख़न्दक़ के ग़ज़वे में छह मुसलमान शहीद हुए थे… इस ग़ज़वे के बारे में अल्लाह तआला आयात-ए-करीमा में मफ़हूमन फ़रमाता है: “अल्लाह तआला ने (ख़न्दक़ के ग़ज़वे वाले) उन काफ़िरों को उनके ग़ुस्से समेत लौटा दिया, इस हाल में कि वे किसी भलाई और जीत को न पा सके। इस तरह अल्लाह तआला (फ़रिश्तों और आँधी के ज़रिए) जंग में (कामयाबी के लिए) मोमिनों के लिए काफ़ी हो गया। अल्लाह तआला हर चीज़ पर क़ादिर है। वह अज़ीज़ है, हर चीज़ पर ग़ालिब है।”15
“ऐ ईमान वालो! अपने ऊपर अल्लाह तआला की नेमतों को याद करो। जब (ख़न्दक़ के ग़ज़वे में) तुम पर लश्करों ने चढ़ाई की थी, तो हमने उन पर एक आँधी और (फ़रिश्तों के) ऐसे लश्कर भेजे जिन्हें तुमने नहीं देखा…”16
इस जंग के बाद हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “अब बारी तुम्हारी है। इसके बाद क़ुरैश तुम पर चढ़ाई नहीं कर सकेंगे।”
बनू क़ुरैज़ा का ग़ज़वा
