ग़ज़वे और सरिय्ये
जब मुसलमान मक्का में थे, तो मुशरिक उन पर बहुत ज़ुल्म करते थे। किसी को मारते-पीटते, किसी का सिर फोड़ देते और किसी को ऐसी-ऐसी तकलीफ़ें देते जो कभी सुनी न गई थीं। उस वक़्त जंग की इजाज़त नहीं थी, क्योंकि मुशरिक बहुत ज़्यादा थे और जंग करना मुसलमानों के लिए नुक़सानदेह होता। मदीना आने के बाद सहाबा-ए-किराम की तादाद बढ़ गई। अन्सार की मदद से ताक़त पैदा हो गई। इस्लाम को शान-ओ-शौकत मिली और जिहाद शरीअत में जायज़ हो गया। काफ़िरों से जंग करने की इजाज़त दे दी गई।
सफ़र, ग़ज़वा और सरिय्या
फ़ख़्र-ए-कायनात (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने मदीना के अमन-ओ-अमान की हिफ़ाज़त और दुश्मनों के हालात पर नज़र रखने के लिए सरिय्ये (हमलावर दस्ते, टुकड़ियाँ), यानी छोटे-छोटे लश्कर तरतीब दिए। रसूलुल्लाह जिन सरिय्यों में ख़ुद शरीक न होकर उन्हें काफ़िरों की तरफ़ भेजते थे, उनमें शामिल होने वालों की तादाद पाँच से चार सौ तक होती थी। जिन जंगों में नबी-ए-करीम ख़ुद शरीक हुए और जिनकी क़ियादत आपने ख़ुद फ़रमाई, उन्हें ग़ज़वा (ग़ज़्वा) कहा जाता है। लश्कर के जंग के लिए निकलने को सफ़र, और जंग की हालत को जंगी तैयारी (लामबंदी) कहा जाता है।
हमारे प्यारे नबी ने दुश्मन के अचानक हमलों को रोकने के लिए मदीना में पहरा देने का तरीक़ा मुक़र्रर किया, गश्त करने वाले दस्ते निकाले और इस तरह हिफ़ाज़त के ज़रूरी इंतिज़ाम किए।
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सत्ताईस ग़ज़वे किए। ये हैं: अबवा (वद्दान), बुवात, पहला बद्र (सफ़वान), ज़ुल उशैरा, बद्र (बद्र-ए-कुबरा), क़रक़रतुल कुद्र, बनू क़ैनुक़ा, सवीक़, ग़तफ़ान (अनमार, ज़ी अम्र), बहरान (बनू सुलैम, नजरान), उहुद, हमराउल असद, बनू नज़ीर, छोटा बद्र (बद्र-ए-सुग़रा), ज़ातुर रिक़ा, दूमतुल जंदल, मुरैसी (बनू मुस्तलिक़), ख़न्दक़ (अहज़ाब), बनू क़ुरैज़ा, बनू लिह्यान, ग़ाबा (ज़ी क़रद), ख़ैबर, वादिल क़ुरा, मक्का की फ़तह, हुनैन, ताइफ़ और तबूक।
इन ग़ज़वों में से सिर्फ़ नौ में टकराव हुआ। ये ग़ज़वे हैं: बद्र (बद्र-ए-कुबरा), उहुद, मुरैसी (बनू मुस्तलिक़), ख़न्दक़ (अहज़ाब), बनू क़ुरैज़ा, ख़ैबर, वादिल क़ुरा, हुनैन और ताइफ़। मक्का जंग के बग़ैर फ़तह हुआ और उसके तमाम लोग मुसलमान हो गए।
बाक़ी ग़ज़वों में कोई टकराव नहीं हुआ: कुछ में मुआहदा हुआ, कुछ में दुश्मन ने हथियार डाल दिए; काफ़िरों का एक हिस्सा इस्लामी लश्कर का सामना करने की हिम्मत न कर सका, और ज़्यादातर काफ़िर इस्लामी लश्कर के आने की ख़बर सुनते ही पहाड़ों में भागकर ग़ायब हो गए।
इसी कहावत से हर सल्तनत पाती है कामयाबी और फ़लाह:
“जंग के लिए तैयार रह, अगर चाहता है सुलह और सलाह।”
Abdülhak Molla
“जो तुमसे जंग करते हैं, तुम भी अल्लाह तआला की राह में उनसे लड़ो। मगर हद से न बढ़ो, ज़्यादती न करो” बक़रह: 190
रसूलुल्लाह के भेजे हुए सरिय्ये
पहले सरिय्ये – हज़रत हमज़ा का दस्ता
मुशरिकों को तिजारती और माली तौर पर कमज़ोर करना और उन्हें राह पर लाना ज़रूरी था। इसके लिए शाम (सीरिया) के तिजारती रास्तों को काटना ज़रूरी था। इसी दौरान ख़बर मिली कि मुशरिकों का एक क़ाफ़िला मदीना के क़रीब से गुज़र रहा है। हिजरत के पहले साल के सातवें महीने, रमज़ान की शुरुआत में हमारे प्यारे नबी ने फ़ौरन सफ़र की तैयारी का हुक्म दिया और तीस घुड़सवारों पर हज़रत हमज़ा को सिपहसालार मुक़र्रर किया। उन्हें अल्लाह तआला से डरने और अपने मातहतों के साथ अच्छा बर्ताव करने की नसीहत फ़रमाने के बाद फ़रमाया: “अल्लाह तआला की राह में, अल्लाह तआला का नाम लेकर ग़ज़वे के लिए निकलो! अल्लाह तआला को न मानने वालों से लड़ो…” हज़रत हमज़ा को एक सफ़ेद झंडा देकर रुख़सत फ़रमाया।
हज़रत हमज़ा अपने घुड़सवारों के साथ मुशरिकों के उस क़ाफ़िले की तरफ़ रवाना हुए, जिसकी हिफ़ाज़त तीन सौ घुड़सवार कर रहे थे। दमिश्क़ से मक्का जाने वाला यह क़ाफ़िला जब सीफ़ुल बहर नाम की जगह पर पहुँचा, तो मुजाहिदों से उसका सामना हो गया। शान वाले सहाबा फ़ौरन जंग की सफ़ें बाँधकर मुक़ाबले के लिए तैयार हो गए। उसी वक़्त उस इलाक़े में मौजूद मजदी इब्ने अम्र अल-जुहनी वहाँ आ पहुँचा और बीच में पड़ गया। मजदी इब्ने अम्र अल-जुहनी दोनों फ़रीक़ों का हलीफ़ था। उसने देखा कि मुसलमान तादाद में बहुत कम और मुशरिक बहुत ज़्यादा हैं, तो सोचा कि मुसलमान हार सकते हैं। मुसलमानों की हुकूमत के हमेशा क़ायम रहने की उम्मीद में उसने बीच-बचाव किया और दोनों फ़रीक़ों को लड़ाई से रोक दिया। फिर हज़रत हमज़ा और उनके साथी मदीना लौट आए। जब मजदी का यह काम नबी-ए-करीम के सामने बयान किया गया, तो आपने अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए फ़रमाया: “उसने एक मुबारक, अच्छा और सही काम किया है।”1
उबैदा इब्ने हारिस का दस्ता
इसके बाद सरिय्यों का सिलसिला नहीं रुका। हज़रत उबैदा इब्ने हारिस की कमान में साठ या अस्सी के क़रीब मुजाहिद देकर उन्हें राबिग़ भेजा गया। दोनों लश्कर आमने-सामने आते ही दोनों तरफ़ से तीर चलने लगे। इस्लामी लश्कर में से सबसे पहला तीर साद इब्ने अबी वक़्क़ास ने चलाया। अबू सुफ़यान की कमान में दो सौ मुशरिकों ने यह समझा कि इस्लामी लश्कर का बड़ा हिस्सा घात में छिपा है; वे मुसलमानों से डर गए और भाग निकलने ही में अपनी ख़ैर समझी।2
आओ, अल्लाह की राह में जंग करें, पाएँ शान, शान…
क़ुरआन में फ़तह का वादा फ़रमाता है हज़रत-ए-यज़दाँ।
“अल्लाह तआला की राह में, अल्लाह तआला का नाम लेकर ग़ज़वे के लिए निकलो! अल्लाह तआला को न मानने वालों से लड़ो” हदीस शरीफ़
रसूलुल्लाह के ग़ज़वे
पहले ग़ज़वे – वद्दान का ग़ज़वा
इसे अबवा का ग़ज़वा भी कहा जाता है। यह रसूलुल्लाह का पहला ग़ज़वा है। यह हिजरत के बारहवें महीने में हुआ। मदीना में हज़रत साद इब्ने उबादा को नायब बनाकर छोड़ा गया। क़ुरैश और बनू ज़मरा क़बीले की तरफ़ साठ आदमियों के साथ कूच किया गया। झंडा हज़रत हमज़ा उठाए हुए थे। मक्का वालों से सामना नहीं हुआ। मुसलमान वद्दान नाम की जगह पर पहुँचे। बनू ज़मरा क़बीले के साथ एक लिखित मुआहदा हुआ। इसके मुताबिक़:
1- बनू ज़मरा हरगिज़ दुश्मन की मदद नहीं करेंगे,
2- बनू ज़मरा की जान और माल की हिफ़ाज़त मुसलमानों की ज़मानत में होगी,
3- इसके बदले में जब नबी-ए-करीम बनू ज़मरा को किसी जंग के लिए बुलाएँगे, तो वे फ़ौरन मदद के लिए दौड़े आएँगे।
बुवात का ग़ज़वा
यह रसूलुल्लाह का दूसरा ग़ज़वा है। हिजरत का दूसरा साल और रबीउल अव्वल का महीना था। मदीना में हज़रत साइब इब्ने उस्मान इब्ने मज़ऊन को नायब बनाकर छोड़ा गया। जब ख़बर मिली कि अबू सुफ़यान की सरकर्दगी में मुशरिकों का सौ आदमियों का एक क़ाफ़िला ढाई हज़ार ऊँटों के साथ दमिश्क़ जा रहा है, तो दो सौ आदमियों के साथ क़ुरैश के क़ाफ़िले की तरफ़ कूच किया गया। बुवात पहाड़ तक चप्पा-चप्पा छान मारने के बावजूद मुशरिक पकड़े न जा सके।
ज़ुल उशैरा का ग़ज़वा
यह ग़ज़वा हिजरत के सोलहवें महीने की शुरुआत में हुआ। ख़बर मिली कि अबू सुफ़यान की कमान में मक्का के मुशरिकों का एक बड़ा तिजारती क़ाफ़िला दमिश्क़ जा रहा है। रसूलुल्लाह ने अबू सलमा इब्ने अब्दुल असद को अपनी जगह नायब बनाया। झंडा हज़रत हमज़ा (रज़ियल्लाहु अन्हु) को दिया। मुजाहिदों के पास तीस ऊँट थे, जिन पर वे बारी-बारी सवार होते थे। डेढ़ सौ या दो सौ के क़रीब मुजाहिद उशैरा नाम की जगह पर पहुँचे और कुछ दिन इंतिज़ार किया। क़ाफ़िले को पकड़ना मुमकिन न हुआ। बनू मुदलिज से सुलह करके वे मदीना लौट आए।
पहले बद्र का ग़ज़वा
इसे सफ़वान का ग़ज़वा भी कहा जाता है। बुवात के ग़ज़वे से लौटे हुए कुछ ही दिन हुए थे कि ख़बर मिली कि क़ुरैश में से कुर्ज़ इब्ने जाबिर फ़िहरी नाम के एक आदमी ने अपने आदमियों के साथ जम्मा पहाड़ पर धावा बोलकर वहाँ चरने वाले गाय-बैल और ऊँट हाँक लिए हैं।
नबी-ए-करीम अपनी जगह ज़ैद इब्ने हारिसा को नायब बनाकर सहाबा की एक जमाअत के साथ वाक़िए की जगह की तरफ़ रवाना हुए। इस बार झंडा हज़रत अली को दिया।
जब मुजाहिद वाक़िए की जगह पहुँचे, तो कुर्ज़ और उसके साथी जानवरों को छोड़कर अपने निशान मिटा चुके थे। बद्र की सफ़वान वादी तक हर पत्थर के नीचे तक देख लिया गया, मगर वे न मिल सके।
अब्दुल्लाह इब्ने जह्श का दस्ता (बत्न-ए-नख़्ला का सरिय्या)
एक दिन नबी-ए-करीम ने क़ुरैश के मुशरिकों पर नज़र रखने के लिए नख़्ला की तरफ़ एक सरिय्या भेजने का इरादा फ़रमाया। भेजे जाने वाले लश्कर पर हज़रत अबू उबैदा इब्ने जर्राह को सिपहसालार बनाना चाहा। अबू उबैदा इब्ने जर्राह को जब यह हुक्म मिला, तो वह नबी-ए-करीम से दूर रहने के ग़म में रोने लगे।
“हज के रास्ते में मरने वालों को और अल्लाह की राह में ग़ज़वा करने वालों को ख़ुशख़बरी हो!” हदीस शरीफ़
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उनकी जगह हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने जह्श को अमीर मुक़र्रर फ़रमाया।3
अब्दुल्लाह इब्ने जह्श उन बुज़ुर्गों में से थे जो पूरे जोश और वलवले के साथ इस्लाम पर अमल करते थे। जब वह मुसलमान हुए, तो काफ़िरों ने उन्हें ऐसी-ऐसी तकलीफ़ें दीं जो किसी के ख़याल में भी न आएँ, फिर भी वह ईमान की ताक़त से उनके सामने डटे रहे और उनके ज़ुल्म-ओ-सितम को सब्र और हौसले से बर्दाश्त किया। इसी वजह से नबी-ए-करीम ने उनके बारे में अपने सहाबा से फ़रमाया था: “यह तुममें भूख और प्यास को सबसे ज़्यादा सहने वाले और सबसे ज़्यादा बर्दाश्त करने वाले हैं।” अब्दुल्लाह इब्ने जह्श रसूलुल्लाह से शहीदों के लिए दी गई ख़ुशख़बरियाँ सुनकर हमेशा शहादत के लिए तड़पते रहते थे। जंगों में सबसे आगे रहकर बहादुरी से लड़ते थे।
हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने जह्श बयान करते हैं: “उस दिन रसूल अलैहिस्सलाम ने इशा की नमाज़ पढ़ने के बाद मुझे अपने पास बुलाया और फ़रमाया: ‘सुबह-सवेरे मेरे पास आ जाना। अपने हथियार भी साथ रखना। मैं तुम्हें एक तरफ़ भेजूँगा।’
सुबह हुई तो मैं मस्जिद गया। मेरी तलवार, कमान, तीर और थैला मेरे जिस्म पर थे और ढाल मेरे पास थी। रसूल अलैहिस्सलाम फ़ज्र की नमाज़ पढ़ाने के बाद अपने घर तशरीफ़ ले गए। मैं पहले आ गया था, इसलिए दरवाज़े के सामने इंतिज़ार कर रहा था। आपने मुहाजिरों में से कुछ आदमी तलाश किए, जिन्हें मेरे साथ जाना था। ‘मैंने तुम्हें इन लोगों पर सिपहसालार मुक़र्रर किया है’ फ़रमाकर मुझे एक ख़त दिया और फ़रमाया: ‘जाओ! दो रात का सफ़र तय करने के बाद ख़त खोलना। उसमें जो हुक्म दिया गया हो, उसी के मुताबिक़ अमल करना।’ मैंने पूछा: ‘या रसूलल्लाह! किस तरफ़ जाऊँ?’ फ़रमाया: ‘नज्दिया का रास्ता पकड़ो। रकिया की तरफ़, कुएँ की तरफ़ जाओ!’”
अब्दुल्लाह इब्ने जह्श को जब नख़्ला की मुहिम पर मुक़र्रर किया गया, तो उन्हें पहली बार अमीरुल मोमिनीन का लक़ब दिया गया। इस्लाम में इस नाम से पुकारे जाने वाले पहले अमीर वही थे। आठ या बारह आदमियों के एक दस्ते के साथ दो दिन बाद जब वे मलल नाम की जगह पर पहुँचे, तो उन्होंने ख़त खोला; उसमें लिखा था:
“बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम। जब तुम इस ख़त को पढ़ लो, तो अल्लाह तआला के नाम और उसकी बरकत के साथ चलते रहना, यहाँ तक कि मक्का और ताइफ़ के दरमियान नख़्ला की वादी में उतर जाओ। अपने साथियों में से किसी को अपने साथ चलने पर मजबूर न करना! नख़्ला की वादी में क़ुरैश के लोगों और क़ुरैश के क़ाफ़िले पर नज़र रखना, उनका पीछा करना और उनकी निगरानी करना। उनकी ख़बरें हमें पहुँचाना।”
अमीरुल मोमिनीन हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने जह्श ने ख़त पढ़ने के बाद कहा: “हम अल्लाह तआला के बंदे हैं और हम सबको उसी की तरफ़ लौटना है। मैंने सुना और इताअत की। मैं अल्लाह तआला और उसके प्यारे रसूल का हुक्म पूरा करूँगा।” यह कहकर उन्होंने ख़त को चूमा और सिर पर रखा। फिर अपने साथियों की तरफ़ मुड़कर कहा: “तुममें से जो शहीद होने के लिए तड़प रहा हो, वह मेरे साथ चले। जो न आना चाहे, वह लौट सकता है। मैं तुममें से किसी पर ज़बरदस्ती नहीं करता। अगर तुम न आओ, तो मैं अकेला जाकर रसूल अलैहिस्सलाम का हुक्म पूरा करूँगा।” उनके साथियों ने एक ज़बान होकर जवाब दिया: “हमने नबी-ए-करीम के हुक्म सुन लिए हैं। हम अल्लाह तआला की, रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की और आपकी इताअत करने वाले हैं। जहाँ चाहें, अल्लाह तआला की बरकत के साथ चलिए।”
यह छोटा-सा लश्कर, जिसमें हज़रत साद इब्ने अबी वक़्क़ास भी थे, हिजाज़ की तरफ़ चला और नख़्ला पहुँच गया। एक जगह छिपकर वे वहाँ से आने-जाने वाले क़ुरैश के लोगों पर नज़र रखने लगे। इसी दौरान क़ुरैश का एक क़ाफ़िला गुज़रा। उसके ऊँट सामान से लदे हुए थे। मुजाहिदों ने क़ाफ़िले के क़रीब जाकर क़ाफ़िले वालों को इस्लाम की दावत दी; जब उन्होंने क़बूल न किया, तो लड़ाई शुरू हो गई। मुजाहिदों ने उनमें से एक को क़त्ल कर दिया और दो को क़ैदी बना लिया; एक घोड़े पर सवार था, इसलिए उस तक न पहुँच सके। काफ़िरों का सारा माल मुजाहिदों के हाथ आया। अब्दुल्लाह इब्ने जह्श ने इस ग़नीमत (जंग में मिले माल) का पाँचवाँ हिस्सा रसूलुल्लाह के लिए अलग कर दिया। यह मुसलमानों की पहली ग़नीमत थी।4
नबी-ए-करीम ने क़ैदियों को इस्लाम के बारे में बताया और उन्हें ईमान लाने की दावत दी। हकम इब्ने कैसान मुसलमान हो गए। उस्मान इब्ने कैसान इस्लाम को ठुकराकर मक्का चला गया।
मस्जिद-ए-क़िबलतैन
हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को मदीना मुनव्वरा की तरफ़ हिजरत किए हुए सत्रह महीने गुज़र चुके थे। अब तक आप हमेशा मुक़द्दस यरूशलम में बैतुल मुक़द्दस की तरफ़ रुख़ करके नमाज़ पढ़ते थे। उन्हीं दिनों यहूदियों की यह बात कि “कितनी अजीब बात है! इनका दीन हमसे अलग है, मगर इनका क़िब्ला हमारे जैसा है!” रसूलुल्लाह तक पहुँची। इन बातों से आपके मुबारक दिल को तकलीफ़ पहुँची।
एक दिन जब जिबराईल अलैहिस्सलाम आए, तो आपने उनसे फ़रमाया: “ऐ जिबराईल! मेरी ख़्वाहिश है कि अल्लाह तआला मेरा रुख़ यहूदियों के क़िब्ले से काबा की तरफ़ फेर दे।”
जिबराईल अलैहिस्सलाम ने जवाब दिया: “मैं तो बस एक बंदा हूँ। यह बात आप अल्लाह तआला से माँगिए!”
इसके बाद सूरह बक़रह की 144वीं आयत-ए-करीमा नाज़िल हुई। उसमें फ़रमाया गया: “(ऐ मेरे हबीब! वह्य के आने के इंतिज़ार में) हम तुम्हारे चेहरे का बार-बार आसमान की तरफ़ उठना यक़ीनन देख रहे हैं। इसलिए हम तुम्हें ज़रूर उस क़िब्ले की तरफ़ फेर देंगे जिससे तुम राज़ी हो। तो अब अपना चेहरा मस्जिद-ए-हराम की तरफ़ (काबा की तरफ़) फेर लो। (ऐ मोमिनो!) तुम भी जहाँ कहीं हो, नमाज़ों में अपने चेहरे उसी तरफ़ फेरो। बेशक जिन्हें किताब दी गई है, वे ख़ूब जानते हैं कि क़िब्ले की यह तब्दीली उनके रब की तरफ़ से हक़ है। और अल्लाह तआला उनके कामों से ग़ाफ़िल नहीं है।”
शाबान के महीने के बीच में, मंगल के दिन जब यह आयत-ए-करीमा नाज़िल हुई, तो रसूलुल्लाह बनू सलिमा की मस्जिद में अपने सहाबा को ज़ुहर या अस्र की नमाज़ पढ़ा रहे थे। नमाज़ की तीसरी रकअत में काबा की तरफ़ मुड़ने का हुक्म हुआ। वह्य मिलते ही आपने अपना रुख़ काबा मुअज़्ज़मा की तरफ़ फेर लिया। सहाबा-ए-किराम भी हबीब-ए-अकरम की पैरवी में उसी तरफ़ मुड़ गए। तब से इस मस्जिद का नाम मस्जिद-ए-क़िबलतैन, यानी “दो क़िब्लों वाली मस्जिद” पड़ गया।
रसूलुल्लाह क़ुबा भी तशरीफ़ ले गए और वहाँ सबसे पहले बनाई गई मस्जिद के मेहराब को अपने मुबारक हाथों से दोबारा बनाया और मस्जिद की दीवारें नई कीं।5
“ऐ जिबराईल! मेरी ख़्वाहिश है कि अल्लाह तआला मेरा रुख़ यहूदियों के क़िब्ले से काबा की तरफ़ फेर दे” हदीस शरीफ़
मस्जिद-ए-क़िबलतैन
मुसलमानों का पहला क़िब्ला उत्तर-पश्चिम की तरफ़ मौजूद मस्जिद-ए-अक़्सा था। यह यहूदियों का भी क़िब्ला था। यहूदी यह कहकर कि मुसलमान हमारे क़िब्ले की तरफ़ मुड़ते हैं, सहाबा-ए-किराम का मज़ाक़ उड़ाते थे। हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अल्लाह पाक से दुआ करके चाहा कि हमारा क़िब्ला काबा मुअज़्ज़मा हो। रसूलुल्लाह इस मस्जिद में ज़ुहर की नमाज़ (एक दूसरी रिवायत में अस्र की नमाज़) पढ़ा रहे थे कि “काबा की तरफ़ मुड़ जाओ” के मफ़हूम वाली आयत-ए-करीमा नाज़िल हुई, तो आप दक्खिन-पूरब की तरफ़ मौजूद काबा मुअज़्ज़मा की तरफ़ मुड़ गए। इसलिए इस मस्जिद को मस्जिद-ए-क़िबलतैन – “दो क़िब्लों वाली मस्जिद” कहा जाता है।
