सलमान फ़ारसी का मुसलमान होना
दिन-ब-दिन इस्लाम का नूर फैलने लगा, और रसूलुल्लाह का मुबारक नाम जब भी सुना जाता, दिलों में जगह बनाने लगा। जो इल्म वाले लोग आपकी आमद का बेताबी से इंतिज़ार कर रहे थे, वे तलाश और बेक़रारी के साथ मदीना की तरफ़ दौड़कर ईमान लाने का शरफ़ पा रहे थे। इन्हीं में से एक हज़रत सलमान फ़ारसी थे। उन्होंने अपने मुसलमान होने का हाल यूँ बयान किया है: – मैं फ़ारस (ईरान) के शहर इस्फ़हान के जय गाँव का हूँ। मेरा बाप गाँव का सबसे अमीर आदमी था, हमारी ज़मीनें और माल बहुत थे। मैं घर का इकलौता बच्चा और अपने बाप का अकेला लाडला था। इसलिए वह मुझे लड़की की तरह पालता था। मुझे घर से बाहर निकलने की इजाज़त नहीं देता था। वह मजूसी (आतिशपरस्त) था, इसलिए उसने मुझे मजूसियत अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ पूरी तरह सिखा दी। घर में हमेशा एक आग जलती रहती थी, और हम उसे पूजते और उसे सज्दा करते थे।
मेरे बाप के पास माल और जायदाद बहुत थी, इसलिए एक बार वह मुझे बाहर ले गया और कहा: “मेरे बेटे! मेरे मरने के बाद इन मालों के मालिक तुम होगे, इसलिए जाओ, अपने मालों और ज़मीनों को पहचान लो।” मैंने भी “अच्छा” कहा और अपने बाग़ों का चक्कर लगाया।
एक दिन खेतों को देखने जाते हुए मेरा गुज़र एक गिरजे से हुआ। मैंने ईसाइयों की आवाज़ें सुनीं, उनके पास गया तो देखा कि वे अंदर इबादत कर रहे हैं। मैंने पहले कभी ऐसी चीज़ नहीं देखी थी, इसलिए हैरान रह गया, क्योंकि हमारी इबादत आग जलाकर उसे सज्दा करने के सिवा कुछ न थी, और वे एक ऐसे अल्लाह की इबादत कर रहे थे जो दिखाई नहीं देता। मैंने अपने आप से कहा: “अल्लाह की क़सम, इनका दीन हक़ है और हमारा बातिल।” शाम तक मैं उन्हें शौक़ से देखता रहा। मैं अभी अपने खेतों तक पहुँचा भी न था कि अंधेरा छाने लगा। मैंने उनसे पूछा: “इस दीन की असल कहाँ है?” तो उन्होंने कहा: “दमिश्क़ में।” फिर मैंने पूछा: “अगर मैं दमिश्क़ जाऊँ तो क्या मुझे भी क़बूल कर लेंगे?” तो उन्होंने जवाब दिया: “हाँ, क़बूल कर लेंगे।” मैंने पूछा: “क्या तुममें कोई ऐसे लोग हैं जो जल्द दमिश्क़ जाने वाले हों?” तो उन्होंने बताया कि कुछ अरसे बाद एक क़ाफ़िला जाने वाला है। जिन लोगों से मैंने बात की, वे थोड़े-से थे और दमिश्क़ से इस्फ़हान आए थे। मैं उनमें लगा रहा तो घर लौटने में देर हो गई। मुझे न लौटते देखकर मेरे बाप ने मुझे ढूँढना शुरू कर दिया था और आदमी भेजे थे।
उन्होंने ढूँढा, मगर न पा सके। वे घबराए हुए थे कि मैं घर लौट आया। मेरे बाप ने कहा: “अब तक कहाँ थे? कोई जगह न बची जहाँ हमने तुम्हें न ढूँढा हो।” मैंने कहा: “अब्बा जान! मैं आज खेतों का चक्कर लगाने निकला था। लेकिन रास्ते में एक ईसाई गिरजे से गुज़र हुआ। मैं अंदर गया। देखा कि वे एक ऐसे अल्लाह पर ईमान रखते हैं जिसे उन्होंने नहीं देखा और जो हर चीज़ पर हाकिम और क़ादिर है। उनकी इबादत पर मैं हैरान रह गया। शाम तक उन्हें देखता रहा। मैं समझ गया कि उनका दीन हक़ है।” यह सुनकर मेरे बाप ने कहा: “ऐ मेरे बेटे! तुम ग़लत सोच रहे हो, तुम्हारे बाप-दादा का दीन उनके दीन से ज़्यादा सही है। उनका दीन बिगड़ा हुआ है। ख़बरदार, धोखा न खाना और उस पर यक़ीन न करना!” मैंने कहा: “नहीं, उनका दीन हमारे दीन से बेहतर है; उनका दीन हक़ है, हमारा बातिल।” मेरा बाप इस पर बहुत ग़ुस्सा हुआ और मेरे हाथ-पाँव बाँधकर मुझे घर में क़ैद कर दिया।
इसी हालत में मैं हमेशा दमिश्क़ जाने वाले क़ाफ़िले की ख़बर का इंतिज़ार करता रहता। आख़िरकार मुझे पता चला कि ईसाई राहिबों ने क़ाफ़िला तैयार कर लिया है।
मैं अपनी रस्सियाँ खोलकर भाग निकला और उस गिरजे में गया जहाँ क़ाफ़िला था। मैंने बताया कि मैं इन इलाक़ों में नहीं रह सकता, और क़ाफ़िले में शामिल होकर दमिश्क़ की राह ली। दमिश्क़ में मैंने ईसाई दीन के सबसे बड़े आलिम के बारे में पूछा। मुझे एक आदमी का पता बताया गया, मैंने उसके पास जाकर अपना हाल बताया। यह कहकर कि मैं उसके पास रहना और उसकी ख़िदमत करना चाहता हूँ, मैंने गुज़ारिश की कि वह मुझे ईसाइयत सिखाए और अल्लाह तआला की पहचान कराए। वह राज़ी हो गया। अब मैं उसकी ख़िदमत करने और गिरजे के काम करने लगा। वह भी मुझे ईसाइयत सिखाता था।
“मुझसे जो सुनो, अपने दीनी भाइयों को भी बताओ! एक-दूसरे तक पहुँचाओ!” हदीस शरीफ़
लेकिन बाद में मैं समझ गया कि वह बुरा आदमी है, क्योंकि ईसाई जो सदक़ा, सोना-चाँदी ग़रीबों को देने के लिए लाते, वह उसे छुपा लेता और ज़रूरतमंदों को न देता। उसने पूरे सात मटके सोना और चाँदी जमा कर रखी थी। मेरे सिवा यह कोई नहीं जानता था। कुछ अरसे बाद वह मर गया।
ईसाई उसे दफ़न करने के लिए जमा हुए। मैंने उनसे कहा: “तुम इसकी इतनी इज़्ज़त क्यों कर रहे हो, यह इस इज़्ज़त के लायक़ आदमी नहीं!” उन्होंने कहा: “तुम यह किस बिना पर कह रहे हो?” और मेरी बात का यक़ीन न किया। तब मैंने उसके जमा किए हुए सोने की जगह दिखा दी। उन्होंने सात मटके सोना और चाँदी खोदकर निकाले, फिर यह कहकर कि “यह आदमी कफ़न-दफ़न के लायक़ नहीं”, उसे एक जगह फेंक दिया और उस पर पत्थर डालकर ढक दिया। उसकी जगह एक दूसरे शख़्स आ गए।1
यह शख़्स सचमुच इल्म वाले, ज़ाहिद इंसान थे, दुनिया को बिल्कुल अहमियत नहीं देते थे। वह आख़िरत के तलबगार थे और हमेशा आख़िरत के लिए मेहनत करते, दिन-रात इबादत में लगे रहते थे। मुझे उनसे बहुत मुहब्बत हो गई और मैं लंबे अरसे तक उनके पास रहा। उनकी ख़िदमत बड़े शौक़ से करता था। हम मिलकर इबादत करते थे।
एक दिन मैंने उनसे पूछा: “ऐ मेरे आक़ा! मैं बहुत अरसे से आपके पास हूँ और आपसे बहुत मुहब्बत करने लगा हूँ, क्योंकि आप अल्लाह तआला के हुक्मों की फ़रमाँबरदारी करते हैं और जिन चीज़ों से उसने मना किया है, उनसे बचते हैं। जब आपका इंतिक़ाल हो जाएगा, तो मैं क्या करूँ, आप मुझे क्या नसीहत करते हैं?” उन्होंने जवाब दिया: “मेरे बेटे, दमिश्क़ में लोगों की इस्लाह करने वाला कोई शख़्स नहीं रहा। जिसके पास भी जाओगे, वह तुम्हें बिगाड़ देगा। लेकिन मूसिल में एक बुज़ुर्ग हैं, मैं तुम्हें नसीहत करता हूँ कि उन्हें ढूँढ लो।”
उनके इंतिक़ाल के बाद मैं मूसिल चला गया, उनके बताए हुए बुज़ुर्ग को ढूँढ लिया और अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने मुझे अपनी ख़िदमत में ले लिया। वह भी उन दूसरे बुज़ुर्ग की तरह बहुत क़ीमती, दुनिया से दिल न लगाने वाले और हमेशा इबादत करने वाले इंसान थे। उनकी भी मैंने लंबे अरसे तक ख़िदमत की। लेकिन एक दिन वह बीमार पड़ गए। इंतिक़ाल से पहले मैंने उनसे भी वही सवाल किए। उन्होंने मुझे नुसैबीन के एक बुज़ुर्ग के पास जाने की नसीहत की। उनके इंतिक़ाल पर मैं फ़ौरन नुसैबीन चला गया। उनके बताए हुए शख़्स को ढूँढकर बताया कि मैं उनके पास रहना चाहता हूँ। वह राज़ी हो गए, और मैं कुछ अरसा उनकी ख़िदमत में रहा। जब वह बीमार हुए, तो मैंने उनसे गुज़ारिश की कि मुझे किसी और के पास भेज दें। इस बार उन्होंने मुझे रूम के शहर अमूरिया में एक और बुज़ुर्ग का पता बताया। उनके इंतिक़ाल के बाद मैंने अमूरिया की राह ली। उनके बताए हुए इन बुज़ुर्ग को भी ढूँढकर उनकी ख़िदमत में दाख़िल हो गया और लंबे अरसे तक रहा।
फिर उनका भी इंतिक़ाल क़रीब आ गया। मैंने उनसे गुज़ारिश की कि मुझे किसी के सुपुर्द कर दें, तो उन्होंने कहा: “अल्लाह की क़सम, अब मैं ऐसे किसी शख़्स को नहीं जानता। लेकिन आख़िरी ज़माने के नबी के आने का वक़्त क़रीब आ गया है।” और उनकी निशानियाँ गिनाईं: “वह अरबों में से ज़ाहिर होंगे, अपने वतन से हिजरत करके पथरीली ज़मीनों के बीच एक ऐसे शहर में बसेंगे जहाँ खजूरें बहुत हैं।
वह हदिया क़बूल करते हैं, सदक़ा क़बूल नहीं करते। उनके दोनों कंधों के बीच मुहर-ए-नुबुव्वत है।” जब इन बुज़ुर्ग का भी इंतिक़ाल हो गया, तो उनकी बात पर अमल करते हुए मैंने अरब के इलाक़े में जाने का फ़ैसला किया। अमूरिया में काम करके मैं कुछ बैलों और थोड़ी-सी भेड़ों का मालिक बन गया था। बनू कल्ब क़बीले का एक क़ाफ़िला अरब के इलाक़े की तरफ़ जाने वाला था। मैंने उनसे कहा: “ये बैल और भेड़ें तुम्हारी हो जाएँ, मुझे अरब के इलाक़े में ले चलो!” तो उन्होंने मेरी पेशकश क़बूल कर ली और मुझे अपने साथ ले लिया। लेकिन वादिल क़ुरा नाम की जगह पहुँचकर उन्होंने मुझसे ग़द्दारी की और यह कहकर कि यह ग़ुलाम है, मुझे एक यहूदी के हाथ बेच दिया। उस यहूदी की जगह पर मैंने खजूरों के बाग़ देखे। मैंने सोचा: “आख़िरी ज़माने के नबी जहाँ हिजरत करेंगे, शायद वह जगह यही है।” लेकिन किसी तरह मेरा दिल वहाँ न लगा। कुछ अरसा मैंने इस यहूदी की ख़िदमत की। फिर उसने मुझे अपने चचाज़ाद भाई के हाथ बेच दिया। वह मुझे ख़रीदकर मदीना ले आया। मदीना पहुँचते ही मुझे यह जगह ऐसी अपनी-सी लगी जैसे मैंने इसे पहले देखा हो। अब मेरे दिन मदीना में गुज़र रहे थे; मुझे ख़रीदने वाले यहूदी के अंगूर के बाग़ और बाग़ीचे में काम करता और उसकी ख़िदमत करता था। साथ ही अपने असल मक़सद को पाने के लिए बेसब्री से इंतिज़ार कर रहा था।
एक दिन मैं खजूर के एक पेड़ पर चढ़कर काम कर रहा था। मेरा मालिक पेड़ के नीचे किसी से बात कर रहा था। एक दम उन्होंने आपस में यह बात की: “औस और ख़ज़रज क़बीले हलाक हों! मक्का से एक शख़्स क़ुबा आया है। कहता है कि वह नबी है। ये क़बीले भी उसे क़बूल करके उसके दीन में दाख़िल हो रहे हैं…” ये बातें सुनकर मैं जैसे बेहोश-सा हो गया। फ़ौरन नीचे उतरा और उस शख़्स से कहा: “क्या कह रहे हो?” मेरे मालिक ने मुझसे कहा: “तुम्हें इससे क्या, क्यों पूछ रहे हो, अपना काम करो!” और मुझे एक थप्पड़ मारा। उस दिन शाम हुई तो मैं कुछ खजूरें लेकर फ़ौरन क़ुबा पहुँचा। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पास जाकर मैंने कहा: “आप नेक इंसान हैं, आपके साथ ग़रीब लोग भी हैं। ये खजूरें मैं सदक़े के तौर पर लाया हूँ।”
रसूलुल्लाह ने अपने पास मौजूद सहाबा से फ़रमाया: “आओ, खजूरें खाओ।” उन्होंने खाईं। लेकिन आपने ख़ुद बिल्कुल न खाईं। मैंने अपने आप से कहा: “यह रही निशानियों में से एक। आप सदक़ा क़बूल नहीं करते।” रसूलुल्लाह के मदीना तशरीफ़ ले आने के बाद मैं कुछ और खजूरें लेकर रसूलुल्लाह के पास आया। मैंने कहा: “यह हदिया है।” इस बार आपने अपने पास मौजूद सहाबा के साथ मिलकर खाया। मैंने कहा: “यह रही दूसरी निशानी भी।” मैं जो खजूरें ले गया था, वे पच्चीस के क़रीब थीं, लेकिन खाई गई खजूरों की गुठलियाँ हज़ार के क़रीब थीं। रसूलुल्लाह के मोजिज़े से खजूरें बढ़ गई थीं। मैंने अपने आप से कहा: “एक निशानी और देख ली।” मैं फिर रसूलुल्लाह के पास गया। आप एक जनाज़ा दफ़न कर रहे थे। मुहर-ए-नुबुव्वत देखना चाहता था, इसलिए मैं बहुत क़रीब चला गया। आपने मेरी मुराद समझकर अपना कुर्ता उठा दिया। मुबारक पीठ खुली तो मैंने मुहर-ए-नुबुव्वत देखी; फ़ौरन उसे चूमा और रो पड़ा। उसी पल कलिमा-ए-शहादत पढ़कर मुसलमान हो गया।
फिर मैंने रसूलुल्लाह को अपनी आपबीती एक-एक करके सुनाई। आपको यह पसंद आई। आपने मुझे हुक्म फ़रमाया कि यह सहाबा-ए-किराम को भी सुनाऊँ। सहाबा-ए-किराम जमा हुए, और मैंने भी अपनी आपबीती छोटी से छोटी तफ़सील के साथ सुना दी…2
सलमान फ़ारसी जब ईमान लाए, तो अरबी ज़बान न जानने की वजह से उन्होंने एक तर्जुमान माँगा था। जो यहूदी तर्जुमान आया, वह हमारे प्यारे नबी के बारे में उनकी तारीफ़ को उलटा करके बता रहा था। उसी वक़्त जिबराईल अलैहिस्सलाम आए और हज़रत सलमान की बातें रसूलुल्लाह को सही-सही बता दीं। यहूदी हालात समझ गया तो कलिमा-ए-शहादत पढ़कर मुसलमान हो गया।
सलमान फ़ारसी मुसलमान होने के बाद कुछ अरसा और ग़ुलाम रहे। हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “ऐ सलमान! अपने आपको ग़ुलामी से छुड़ाओ!” तो वह अपने मालिक के पास गए और आज़ाद होने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की। मजबूरन राज़ी होकर यहूदी ने इस शर्त पर मंज़ूरी दी कि वह तीन सौ खजूर के पौधे लगाकर उन्हें फल देने के क़ाबिल बनाएँ और एक हज़ार छह सौ दिरहम सोना (एक रिवायत में चार हज़ार दिरहम के क़रीब चाँदी) दें।
उन्होंने यह बात रसूलुल्लाह को बताई। हमारे नबी ने अपने सहाबा से फ़रमाया: “अपने भाई की मदद करो।” उन्होंने उनके लिए तीन सौ खजूर के पौधे जमा किए। रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “इनके गड्ढे तैयार करो, और पूरे हो जाएँ तो मुझे ख़बर देना।” उन्होंने गड्ढे तैयार करके ख़बर दी, तो नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) उस जगह तशरीफ़ लाए और अपने मुबारक हाथों से पौधे लगाए। उनमें से एक पौधा हज़रत उमर ने लगाया था। हज़रत उमर के लगाए हुए पौधे के सिवा सबने अल्लाह तआला के हुक्म से उसी साल खजूरें दीं। रसूलुल्लाह ने उस एक पौधे को भी उखाड़कर अपने मुबारक हाथ से दोबारा लगाया, और लगाते ही उसने खजूरें दीं।
“आख़िरी ज़माने के नबी के आने का वक़्त क़रीब आ गया है। वह अरबों में से ज़ाहिर होंगे, अपने वतन से हिजरत करके पथरीली ज़मीनों के बीच एक ऐसे शहर में बसेंगे जहाँ खजूरें बहुत हैं। वह हदिया क़बूल करते हैं, सदक़ा क़बूल नहीं करते। उनके दोनों कंधों के बीच मुहर-ए-नुबुव्वत है” अमूरिया के राहिब
हज़रत सलमान फ़ारसी ने यूँ बयान किया: “एक दिन एक शख़्स मुझे ढूँढ रहा था और पूछ रहा था: ‘ग़रीब मुकातब (वह ग़ुलाम जिसने आज़ादी पाने के लिए अपने मालिक से एक तय रक़म पर मुआहदा किया हो) सलमान फ़ारसी कहाँ है?’ उसने मुझे ढूँढ लिया और अपने हाथ में मौजूद अंडे के बराबर सोना मुझे दे दिया। मैं उसे लेकर हमारे नबी के पास गया और सारा हाल अर्ज़ किया।
रसूलुल्लाह ने सोना मुझे वापस देकर फ़रमाया: ‘यह सोना लो और अपना क़र्ज़ अदा करो!’ मैंने अर्ज़ किया: ‘या रसूलल्लाह! यह सोना उस वज़न का नहीं जो यहूदी ने माँगा है।’ तो रसूलुल्लाह ने वह सोना लिया और अपनी मुबारक ज़बान पर फेरा। फिर फ़रमाया: ‘इसे ले लो! अल्लाह तआला इससे तुम्हारा क़र्ज़ अदा कर देगा।’ अल्लाह की क़सम, मैंने वह सोना तौला, वह ठीक उतना ही था जितना माँगा गया था। मैंने वह भी ले जाकर दे दिया। इस तरह मैं ग़ुलामी से छूट गया।”3
उस दिन के बाद सलमान फ़ारसी असहाब-ए-सुफ़्फ़ा में शामिल हो गए।
फ़रिश्ते सुनने आते थे
नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) क़ुरआन-ए-करीम इतने ख़ूबसूरत, इतने मीठे और असरदार अंदाज़ में पढ़ते थे कि आपको सुनने वाले वे लोग भी, जो मुसलमान न थे, हैरान रह जाते थे। आपको सुनकर मुसलमान होने वालों की तादाद बहुत थी।
हज़रत बरा इब्ने आज़िब ने बयान किया: “एक बार इशा की नमाज़ के बाद मैंने रसूलुल्लाह को सूरह तीन पढ़ते हुए सुना। आप इतना ख़ूबसूरत पढ़ रहे थे कि मैंने कभी किसी ऐसे शख़्स को नहीं सुना था जिसकी आवाज़ और क़िराअत आपसे ज़्यादा कामिल हो।”
सहाबा-ए-किराम में ऐसे बहुत-से लोग थे जिनकी आवाज़ बहुत ख़ूबसूरत थी, जो क़ुरआन-ए-करीम पढ़ते हुए ख़ुद रोते और दूसरों को रुलाते थे। उनमें से एक उसैद इब्ने हुज़ैर थे। एक रात वह अपना घोड़ा अपने पास बाँधकर सूरह बक़रह पढ़ने लगे। वह पढ़ ही रहे थे कि घोड़ा अचानक बिदक गया। हज़रत उसैद चुप हो गए, घोड़ा ठहर गया। उन्होंने फिर पढ़ना शुरू किया, घोड़ा फिर बिदका। चुप हुए तो घोड़ा ठहर गया। दोबारा पढ़ना शुरू किया तो वह फिर बिदका। उसैद इब्ने हुज़ैर के बेटे यह्या घोड़े के क़रीब एक जगह लेटे हुए थे। इस डर से कि घोड़ा बच्चे को कोई नुक़सान न पहुँचा दे, उन्होंने पढ़ना छोड़ दिया।
आसमान की तरफ़ देखा तो सफ़ेद बादल के साये जैसी एक धुंध के अंदर क़ंदीलों की तरह चमकती हुई चीज़ें दिखाई दीं। जब उन्होंने पढ़ना रोका, तो देखा कि वे चमकती चीज़ें आसमान की तरफ़ उठती हुई चली गईं।
सुबह हुई तो वह हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अपना हाल बयान किया।
नबी-ए-करीम ने पूछा: “जानते हो, वे क्या थे?” तो हज़रत उसैद ने जवाब दिया: “मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान हों, या रसूलल्लाह! मैं नहीं जानता।”
नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “वे फ़रिश्ते थे। तुम्हारी आवाज़ के क़रीब आ गए थे। अगर तुम पढ़ते रहते, तो वे सुबह तक तुम्हें सुनते रहते, और लोग भी उन्हें देखते और उनका नज़ारा करते। वे लोगों की निगाहों से छुपते नहीं।”
क़ुरआन-ए-करीम को बड़े सोज़ से पढ़ने वालों में से एक हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ भी थे। नमाज़ में जब वह पढ़ना शुरू करते, तो अपने आपको रोक न पाते और उनकी मुबारक आँखों से आँसू बह निकलते। देखने वाले उनकी इस हालत पर फ़िदा हो जाते। एक दिन मुशरिकों ने जमा होकर कहा: “यह आदमी नबी की लाई हुई बातें सोज़ से पढ़कर रोता है। हमें डर है कि हमारे बच्चे और हमारी औरतें इसकी इस हालत पर फ़िदा होकर मुसलमान हो जाएँगे।”
अब्दुल्लाह इब्ने सलाम का मुसलमान होना
हमारे प्यारे नबी का मुबारक चेहरा देखकर आप पर आशिक़ होने वालों में से, आपकी मुबारक बातें और आपकी क़ुरआन-ए-करीम की तिलावत सुनकर हैरान होकर मुसलमान होने वालों में से एक हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने सलाम भी हैं।
अब्दुल्लाह इब्ने सलाम तौरात और इंजील को अच्छी तरह जानते थे; ईमान लाने से पहले वह एक यहूदी आलिम थे। वह अपने मुसलमान होने का हाल ख़ुद यूँ बयान करते हैं: “मैंने तौरात और उसकी तशरीहात अपने बाप से पढ़कर सीखी थीं। एक दिन मेरे बाप ने मुझे आख़िरी ज़माने में आने वाले नबी की सिफ़ात, निशानियाँ और वे काम बताए जो वह करेंगे और कहा: ‘अगर वह हारून की औलाद में से आए, तो मैं उनकी पैरवी करूँगा; वरना नहीं करूँगा!’ और रसूलुल्लाह के मदीना आने से पहले उसकी मौत हो गई।
जब मैंने सुना कि रसूलुल्लाह ने मक्का में अपनी नुबुव्वत का एलान फ़रमाया है, तो मैं आपकी सिफ़ात, आपका नाम और आपके आने का वक़्त जानता था। इसलिए मैं आपकी राह देखता रहा। जब तक मैंने किसी से यह न सुन लिया कि रसूलुल्लाह मदीना के क़रीब क़ुबा नाम की जगह में बनू अम्र इब्ने औफ़ के घर मेहमान हुए हैं, तब तक मैं अपना यह हाल यहूदियों से छुपाकर चुप रहा।
एक दिन मैं अपने बाग़ में खजूर के पेड़ से ताज़ा खजूरें तोड़ रहा था कि बनू नज़ीर में से किसी ने चिल्लाकर कहा: ‘आज अरबों का आदमी आ गया!’ मुझ पर कँपकँपी तारी हो गई। मैंने फ़ौरन ‘अल्लाहु अकबर’ कहकर तकबीर कही। उस वक़्त मेरी फूफी ख़ालिदा बिन्ते हारिस पेड़ के नीचे बैठी थीं। वह बहुत बूढ़ी ख़ातून थीं। मेरी तकबीर सुनकर उन्होंने मुझ पर बिगड़कर कहा: ‘अल्लाह तुम्हारा हाथ ख़ाली रखे और तुम्हें तुम्हारी उम्मीद तक न पहुँचाए! अल्लाह की क़सम, अगर तुम मूसा इब्ने इमरान4 के आने की ख़बर सुनते, तब भी इससे ज़्यादा ख़ुश न होते!’ मैंने उनसे कहा: ‘ऐ फूफी! अल्लाह की क़सम, वह मूसा इब्ने इमरान के भाई हैं और उन्हीं की तरह एक नबी हैं। उन्हीं के रास्ते पर हैं, और जिस तौहीद के साथ वह भेजे गए थे, उसी तौहीद के साथ भेजे गए हैं।’
इस पर उन्होंने मुझसे कहा: ‘ऐ मेरे भाई के बेटे! कहीं वह वही नबी तो नहीं जिनके बारे में हमें बताया गया था कि क़यामत के क़रीब भेजे जाएँगे?’ मैंने कहा: ‘हाँ।’ उन्होंने कहा: ‘तो फिर तुम ठीक कहते हो।’5
रसूलुल्लाह जब मदीना हिजरत करके आए, तो मैं आपको देखने के लिए फ़ौरन लोगों में जा मिला। आपका मुबारक जमाल, आपका नूरानी चेहरा देखते ही मैंने कहा: ‘यह चेहरा किसी झूठे का चेहरा नहीं हो सकता!’ रसूलुल्लाह जमा हुए लोगों को इस्लाम के बारे में बता रहे थे, नसीहतें फ़रमा रहे थे। वहाँ मैंने रसूलुल्लाह से जो पहली हदीस शरीफ़ सुनी, वह यह थी: ‘आपस में सलाम को आम करो, भूखों को खाना खिलाओ, सिला-ए-रहमी करो (क़रीबी रिश्तेदारों से मिलते-जुलते रहो), और जब लोग सो रहे हों तब नमाज़ पढ़ो। इस तरह तुम सलामती के साथ जन्नत में दाख़िल हो जाओगे।’
फ़ख़्र-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने नुबुव्वत के नूर से मुझे पहचानकर फ़रमाया: ‘क्या तुम मदीना के आलिम इब्ने सलाम नहीं हो?’ मैंने कहा: ‘हाँ।’ तो हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: ‘क़रीब आओ।’ और यह सवाल किया: ‘ऐ अब्दुल्लाह! अल्लाह तआला के वास्ते बताओ! क्या तुमने तौरात में मेरी सिफ़ात पढ़कर नहीं जानीं?’ मैंने कहा: ‘क्या आप बता सकते हैं कि अल्लाह तआला की सिफ़ात क्या हैं?’
इस सवाल पर रसूलुल्लाह ने कुछ देर इंतिज़ार किया, और जिबराईल अलैहिस्सलाम सूरह इख़लास लेकर उतरे। रसूलुल्लाह ने यह सूरह पढ़ी, तो सुनते ही मैंने फ़ौरन हमारे नबी से अर्ज़ किया: ‘हाँ, या रसूलल्लाह! आप सच फ़रमाते हैं, मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह तआला के सिवा कोई माबूद नहीं। आप उसके बंदे और रसूल हैं।’ यह कहकर मैंने कलिमा-ए-शहादत पढ़ा और मुसलमान हो गया। फिर मैंने अर्ज़ किया: ‘या रसूलल्लाह! यहूदी एक ज़ालिम क़ौम हैं जो इंसान को हैरान कर देने की हद तक झूठ बोलते, बेबुनियाद इल्ज़ाम लगाते और बोहतान बाँधते हैं। अगर आपके उनसे मेरे मिज़ाज और मेरे हर हाल के बारे में पूछने से पहले ही उन्हें मेरे मुसलमान होने की ख़बर लग गई, तो वे यक़ीनन आपके सामने मुझ पर ऐसे बोहतान बाँधेंगे जो अक़्ल में भी न आएँ। आप पहले उनसे मेरे बारे में पूछिए!’ यह कहकर मैं घर के एक कोने में छुप गया। मेरे पीछे-पीछे यहूदियों के बड़े लोगों का एक गिरोह अंदर आया। रसूलुल्लाह ने यहूदियों से पूछा: ‘तुम्हारे बीच अब्दुल्लाह इब्ने सलाम कैसे आदमी हैं?’ यहूदियों ने कहा: ‘वह हमारे सबसे बुलंद आलिम और हमारे सबसे बड़े आलिम के बेटे हैं! इब्ने सलाम हम में सबसे बेहतर और हमारे सबसे बेहतर आदमी के बेटे हैं!’ इस पर रसूलुल्लाह ने यहूदियों से पूछा: ‘अगर वह मुसलमान हो गए हों, तो तुम इस पर क्या कहोगे?’
“अल्लाह तआला ने मुझे बताया कि वह चार लोगों से मुहब्बत करता है। उसने मुझे इन चारों से मुहब्बत करने का हुक्म दिया। वे हैं: अली, अबू ज़र, मिक़दाद और सलमान” हदीस शरीफ़
यहूदियों ने जवाब दिया: ‘अल्लाह उसे ऐसी बात से बचाए!’
उसी वक़्त मैं अपने छिपने की जगह से निकला और आपकी तस्दीक़ करते हुए कहा: ‘ऐ यहूदियों के गिरोह! अल्लाह तआला से डरो! जो तुम्हारे पास आया है, उसे क़बूल करो। मैं अल्लाह तआला की क़सम खाकर कहता हूँ, तुम ख़ुद भी जानते हो कि अपने हाथों में मौजूद तौरात में जिनका नाम और जिनकी सिफ़ात लिखी हुई तुमने देखी हैं, अल्लाह तआला के वह रसूल यही हैं। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह तआला के सिवा कोई इलाह नहीं। और यह भी गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अलैहिस्सलाम उसके बंदे और उसके रसूल हैं।’ इस पर यहूदी कहने लगे: ‘यह हममें सबसे बुरा है और हमारे सबसे बुरे आदमी का बेटा है!’ और तरह-तरह के ऐब और झूठे इल्ज़ाम लगाकर मेरी बुराई करने लगे। मैंने कहा: ‘मुझे इसी बात का तो डर था। या रसूलल्लाह! क्या मैंने आपको ख़बर नहीं दी थी कि ये ज़ालिम, झूठे, बुराई से न रुकने वाले और बोहतान लगाने वाले लोग हैं? देखिए, सब कुछ सामने आ गया!’ रसूलुल्लाह ने यहूदियों से फ़रमाया: ‘तुम्हारी पहली गवाही हमारे लिए काफ़ी है, दूसरी की कोई ज़रूरत नहीं।’ इसके बाद मैं फ़ौरन अपने घर लौट आया।
मैंने अपने घर वालों और रिश्तेदारों को इस्लाम की दावत दी। मेरी फूफी समेत सब मुसलमान हो गए।
मेरे ईमान लाने से यहूदी बहुत ग़ुस्से में आ गए। इसलिए वे मुझ पर दबाव डालने लगे। यहाँ तक कि कुछ यहूदी आलिमों ने यह कहकर कि ‘अरबों में से नबी नहीं आता, तुम्हारा यह आदमी तो बस एक बादशाह है’, मुझे इस्लाम से फेरने की कोशिश की, मगर वे कामयाब न हो सके।”
उनके साथ सालबा इब्ने सअया, उसैद इब्ने सअया, असद इब्ने उबैद और कुछ और यहूदी भी सच्चे दिल से मुसलमान हो गए। लेकिन कुछ यहूदी आलिमों ने कहा: “मुहम्मद पर सिर्फ़ हमारे बुरे लोग ईमान लाए हैं। अगर वे हमारे अच्छे लोगों में से होते, तो अपने बाप-दादा का दीन न छोड़ते।” इस पर अल्लाह तआला ने उन्हें जवाब देते हुए आयत-ए-करीमा नाज़िल की और मफ़हूमन फ़रमाया: “वे (अहले किताब) सब एक जैसे नहीं हैं। अहले किताब में एक जमाअत ऐसी भी है जो इबादत और इताअत में लगी रहती है; वे रात के वक़्तों में सज्दे में गिरकर अल्लाह तआला की आयतें पढ़ते हैं।”6
दिन-ब-दिन बदतर हुआ है मेरा हाल, बेहद, या रसूलल्लाह!
अब सुधर जाएँ मेरे आमाल, हो इनायत, या रसूलल्लाह!
भटक गया यह कमीना नफ़्स, लगा दिया शैतान के पीछे मुझे,
इतने गुनाहों के साथ कैसे माँगूँ पनाह, या रसूलल्लाह?
भला कैसे मुमकिन है नफ़्स और शैतान की ख़्वाहिश से छुटकारा,
अगर आपसे न पहुँचे मुझ तक हिदायत, या रसूलल्लाह?
आपका फ़ैज़ और एहसान जब किसी गुनहगार तक पहुँचे एक पल को,
दोनों जहान में उसकी राह है सलामत, या रसूलल्लाह!
हुक्म और मनाही की ताज़ीम की, हराम को हलाल न कहा मैंने,
हर गुनाह का अंजाम बनी नदामत, या रसूलल्लाह!
ऐ इंसानों और जिन्नों के रसूल, ऐ इंसानों में सबसे बुलंद,
मेरे इख़लास के सदक़े अता हो शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
“आपस में सलाम को फैलाओ, भूखों को खाना खिलाओ, सिला-ए-रहमी (क़रीबी रिश्तेदारों से मेल-जोल) करो और जब लोग सो रहे हों, तब नमाज़ पढ़ो। इस तरह तुम सलामती के साथ जन्नत में दाख़िल हो जाओगे” हदीस शरीफ़
मदीना मुनव्वरा का एक पुराना नज़ारा (1890)
हिजरत के पहले साल में पेश आने वाले कुछ वाक़िआत
हिजरत के पहले साल में अन्सार में से असअद इब्ने ज़ुरारा, बरा इब्ने मारूर, कुलसूम इब्ने हिद्म और मुहाजिरों में से उस्मान इब्ने मज़ऊन का इंतिक़ाल हुआ। इसके अलावा मदीना की आब-ओ-हवा का असर बर्दाश्त न कर सकने की वजह से हज़रत अबू बकर और बिलाल हब्शी (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) को मलेरिया का बुख़ार हो गया। इस पर रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने यह दुआ फ़रमाई: “या रब! जिस तरह तूने मक्का को हमें प्यारा बनाया, उसी तरह मदीना को भी हमें प्यारा बना दे और यहाँ हमें बरकत और रोज़ी की कुशादगी अता फ़रमा।” अल्लाह पाक ने आपकी दुआ क़बूल फ़रमाई और मुहाजिरों के दिलों में मदीना की मुहब्बत डाल दी।
पहला लिखित मुआहदा
नबी-ए-करीम की हिजरत से पहले मदीना के ख़ज़रज क़बीले के सरदार अब्दुल्लाह इब्ने उबई को मदीना का बादशाह चुना जाने वाला था। अक़बा की बैअतों और फिर हिजरत के वाक़िए के बाद जब औस और ख़ज़रज क़बीलों के ज़्यादातर लोग मुसलमान हो गए, तो अब्दुल्लाह इब्ने उबई बादशाह न बन सका। इसी वजह से अब्दुल्लाह इब्ने उबई सबसे पहले नबी-ए-करीम और मुहाजिर सहाबा-ए-किराम के ख़िलाफ़, फिर मदीना के सहाबा के ख़िलाफ़ दिल में कीना पालने लगा, मगर अपनी दुश्मनी खुलकर ज़ाहिर नहीं कर पाता था। उसने अपने जैसे कुछ लोगों को साथ लेकर मुनाफ़िक़ों (दोग़लों) का एक गिरोह बना लिया। ये लोग मुसलमानों के सामने कहते थे कि हमने दीन-ए-इस्लाम क़बूल कर लिया है, मगर उनकी पीठ पीछे उनका मज़ाक़ उड़ाते थे। वे छिप-छिपकर निफ़ाक़ (दोग़लेपन) के बीज बोने और फ़ितना (फ़साद) खड़ा करने लगे। इसमें वे इतने आगे बढ़ गए कि फ़ख़्र-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की मुबारक बातों को उलटा बयान करने और बदलने की कोशिश तक करने लगे।
इस बीच मक्का के मुशरिक भी चुप नहीं बैठे थे; जो कुछ वे रसूलुल्लाह के ख़िलाफ़ मक्का में न कर सके थे, उसे मदीना में करने की कोशिश कर रहे थे। जिस तरह वे मदीना के मुशरिकों को धमकी भरे ख़त भेजते थे, उसी तरह मदीना के यहूदी क़बीलों को भी धमकियों से भरे ख़त और पैग़ाम भेजते रहते थे। उनकी इन धमकियों की वजह से यहूदी रसूलुल्लाह के क़रीब आने लगे।
इसी दौरान यहूदी रसूलुल्लाह की ख़िदमत में हाज़िर हुए और कहने लगे: “हम आपसे सुलह करने आए हैं। आइए, एक मुआहदा कर लें, ताकि हम एक-दूसरे को नुक़सान न पहुँचाएँ।” हमारे नबी ने उनके साथ पचपन धाराओं वाला एक मुआहदा किया। उसमें तय की गई कुछ बातें ये हैं:
1. यह मुआहदा एक दस्तावेज़ है, जो रसूलुल्लाह मुहम्मद अलैहिस्सलाम की तरफ़ से मक्का और मदीना के मुसलमानों, उनके पैरोकारों, बाद में उनसे आ मिलने वालों और उनके साथ मिलकर लड़ने वालों के दरमियान लिखा गया है।
2. बेशक ये लोग दूसरे इंसानों से अलग एक जमाअत हैं।
3. हर क़बीला अपने क़ैदियों को छुड़ाने का फ़िदया (मुसलमानों के दरमियान इंसाफ़ के मुताबिक़) मिलकर अदा करेगा।
4. मुसलमान अपने दरमियान गड़बड़ फैलाने वालों के ख़िलाफ़ खड़े होंगे, चाहे वे उनकी अपनी औलाद ही क्यों न हों।
5. यहूदियों में से जो मुसलमानों के ताबे होंगे, उन पर कोई ज़ुल्म नहीं होगा, बल्कि उनकी मदद भी की जाएगी।
6. यहूदी मुसलमानों के साथ मिलकर एक गिरोह होंगे; हर कोई अपने दीन के तक़ाज़े पूरे करेगा।
7. यहूदियों में से कोई भी मुहम्मद अलैहिस्सलाम की इजाज़त के बग़ैर किसी जंगी मुहिम पर नहीं निकल सकेगा।
8. कोई भी उस शख़्स के साथ बुराई नहीं करेगा जिससे उसका मुआहदा है; जिस पर ज़ुल्म हो, उसकी हर हाल में मदद की जाएगी।
9. इस मुआहदे को करने वालों के लिए मदीना की वादी एक ऐसा हरम (मुक़द्दस और महफ़ूज़) इलाक़ा है जिसे छुआ नहीं जा सकता।
10. मक्का के मुशरिकों और उनकी मदद करने वालों को किसी सूरत में पनाह नहीं दी जाएगी।
11. मदीना पर हमला करने वालों के ख़िलाफ़ मुसलमान और यहूदी एक-दूसरे की मदद करेंगे।
इस मुआहदे के मुताबिक़ यहूदी (ज़ाहिरी तौर पर) मुसलमानों से दोस्ती रखेंगे, उनसे कीना नहीं रखेंगे और दुश्मनी नहीं करेंगे।7
ऐ मेरे हबीब! ग़मगीन न हो
अपनी दुश्मनी को दिलों में छिपाए हुए यहूदी ऊपर बयान किए गए मुआहदे पर दस्तख़त करने के बाद गिरोह-गिरोह बनकर नबी-ए-करीम के पास आने लगे। उन्होंने ऐसे सवाल पूछे जो उनके ख़याल में बहुत मुश्किल थे। मिलने वाले जवाबों से वे समझ गए कि आप सच्चे नबी हैं। लेकिन अपनी ज़िद और हसद की वजह से ईमान न लाए। इस पर हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “अगर यहूदी आलिमों में से दस आदमी मुझ पर ईमान ले आते, तो सारे यहूदी ईमान ले आते।” रसूलुल्लाह के इस ग़म पर अल्लाह तआला ने इस आयत-ए-करीमा से आपको तसल्ली दी: “ (ऐ मेरे हबीब!) ऐ शान वाले रसूल! जो लोग दिल से ईमान न लाने के बावजूद अपने मुँह से कहते हैं कि हम ईमान लाए (यानी मुनाफ़िक़) और यहूदियों में से जो कुफ़्र में दौड़-धूप करते हैं, (उनका हाल) तुम्हें ग़मगीन न करे। ये लगातार झूठ सुनने वाले हैं और एक दूसरी क़ौम (ख़ैबर के यहूदियों) के लिए, जो तुम्हारे पास नहीं आई, (बनू क़ुरैज़ा में से) जासूसी करने वाले हैं। ये सुनी हुई बातों और हक़ीक़तों को उनकी जगह से बदल देते हैं, उन्हें हक़ से दूर ले जाने वाले ढंग से बयान करते हैं। और कहते हैं: ’अगर तुम्हें यह (फ़तवा) दिया जाए तो इसे क़बूल कर लो, और अगर न दिया जाए तो बचो।’ अल्लाह तआला जिसके फ़ितने में पड़ने का इरादा करे, तो तुम अल्लाह तआला के इरादे को किसी तरह भी नहीं रोक सकते। ये वे लोग हैं जिनके दिलों को अल्लाह तआला ने पाक करना नहीं चाहा। इनके लिए दुनिया में रुसवाई और बदहाली है और आख़िरत में बहुत बड़ा अज़ाब है।”8
इस मुआहदे की वजह से कुछ सहाबा ने अपने पड़ोसी यहूदियों से दोस्ती कर ली थी। अल्लाह तआला ने उन्हें भी इससे मना करते हुए फ़रमाया: “ऐ ईमान वालो! अपने दीनी भाइयों के सिवा दूसरों (काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों) को राज़दार दोस्त न बनाओ। वे तुम्हें नुक़सान पहुँचाने और फ़साद फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ते और चाहते हैं कि तुम मुसीबत में पड़ो। तुमसे उनका कीना और उनकी दुश्मनी उनके मुँह से बाहर उबल पड़ी है। और जो दुश्मनी वे अपने दिलों में छिपाए हुए हैं, वह इससे भी बड़ी है। अगर तुम सोच-समझ से काम लो, तो हमने उनकी दुश्मनी के बारे में आयतें साफ़-साफ़ बयान कर दी हैं (जिन बातों पर तुम्हें ध्यान देना चाहिए, उन्हें बिल्कुल खोलकर दिखा दिया है)।”9
मक्का के मुशरिक मदीना के मुशरिकों, मुनाफ़िक़ों, यहूदियों और मदीना के आस-पास के क़बीलों को लगातार भड़काते और धमकाते रहे। वे जल्द से जल्द इस्लाम के नूर को बुझाने की कोशिश कर रहे थे और हमारे प्यारे नबी के मुबारक वुजूद को मिटा देने के रास्ते तलाश कर रहे थे।
“अगर यहूदी आलिमों में से दस आदमी मुझ पर ईमान ले आते, तो सारे यहूदी ईमान ले आते” हदीस शरीफ़
मुनाफ़िक़ों और मुशरिकों की इन हरकतों के मुक़ाबले में रसूलुल्लाह हमेशा सुलह का रास्ता अपनाते थे। सहाबा-ए-किराम में से कुछ का यक़ीन था कि अब दुश्मन के ख़िलाफ़ उठ खड़ा होना ज़रूरी है, और वे यूँ दुआ करते थे: “या रब! हमारे लिए तेरी राह में इन मुशरिकों से मुक़ाबला करने से ज़्यादा क़ीमती कोई चीज़ नहीं। ये क़ुरैश के मुशरिक वही हैं जिन्होंने तेरे हबीब की नुबुव्वत को झुठलाया और आपको मक्का से निकलने पर मजबूर किया। या अल्लाह! यक़ीनन तू हमें उनसे जंग करने की इजाज़त देगा!…” रसूलुल्लाह इस मामले में अल्लाह तआला के हुक्म का इंतिज़ार कर रहे थे और जो हुक्म होता, उसी के मुताबिक़ अमल करते थे। आख़िर वह वक़्त आ गया। जिबराईल अलैहिस्सलाम जो वह्य लाए, उसमें फ़रमाया गया: “जो तुमसे जंग करते हैं, तुम भी अल्लाह तआला की राह में उनसे लड़ो। मगर हद से न बढ़ो, ज़्यादती न करो। बेशक अल्लाह तआला ज़्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता। उन्हें (काफ़िरों को) जहाँ पाओ, क़त्ल करो। जिस तरह उन्होंने तुम्हें (मक्का से) निकाला, तुम भी उन्हें निकालो। उनका शिर्क का फ़ितना क़त्ल से भी बुरा है। जब तक वे मस्जिद-ए-हराम में तुमसे न लड़ें, तुम भी वहाँ उनसे जंग न करो। लेकिन अगर वे तुम्हें वहाँ क़त्ल करें, तो तुम भी उन्हें वहाँ क़त्ल करो। काफ़िरों की सज़ा यही है। अगर वे अल्लाह तआला के इनकार और जंग से बाज़ आ जाएँ, (तो तुम भी छोड़ दो। क्योंकि) बेशक अल्लाह तआला बहुत बख़्शने वाला, बहुत रहम करने वाला है।”10
बाद में नाज़िल होने वाली एक आयत-ए-करीमा में फ़रमाया गया: “जब तक शिर्क के फ़ितने का नाम-ओ-निशान न रहे और दीन सिर्फ़ अल्लाह तआला का न हो जाए (सिर्फ़ अल्लाह तआला ही की इबादत न की जाने लगे), उन मुशरिकों से जंग करो। अगर वे (शिर्क से) बाज़ आ जाएँ, (तो उन पर कोई ज़्यादती नहीं।) दुश्मनी (सज़ा) तो सिर्फ़ ज़ालिमों पर है।”11
मा मदह्तु मुहम्मदन बि मक़ालाती,
लाकिन मदह्तु मक़ालाती बि मुहम्मदिन।
(मैं मुहम्मद अलैहिस्सलाम की तारीफ़ नहीं कर सकता,
आपके ज़िक्र से अपनी तहरीरों को क़ीमती बनाता हूँ।)
इमाम रब्बानी (रहमतुल्लाहि अलैहि)
