बद्र का ग़ज़वा
इस ग़ज़वे को दूसरा बद्र, बद्र-ए-क़िताल और बद्र-ए-कुबरा भी कहा जाता है। सरिय्यों में सहाबा-ए-किराम की कामयाबी काफ़िरों को डराने लगी थी। अब उनके क़ाफ़िले गिरोहों की शक्ल में और साथ में सिपाहियों को लेकर सफ़र पर निकलते थे। हिजरत के दूसरे साल मक्का के मुशरिकों ने हर घराने से सरमाया इकट्ठा करके एक हज़ार ऊँटों का एक क़ाफ़िला दमिश्क़ भेजा। उसकी सरकर्दगी मक्का के बड़े लोगों में से अबू सुफ़यान के हाथ में थी, जो अभी मुसलमान नहीं हुआ था।1 क़ाफ़िले की हिफ़ाज़त के लिए चालीस के क़रीब मुहाफ़िज़ भी मुक़र्रर किए गए थे… माल बिक जाने के बाद वे सारी रक़म से हथियार ख़रीदने वाले थे, और ये हथियार मुसलमानों से जंग में इस्तेमाल होने थे।
जब रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को ख़बर मिली कि मुशरिकों ने तिजारत के लिए एक बड़ा क़ाफ़िला दमिश्क़ भेजा है, तो आपने उनके हालात मालूम करने के लिए मुहाजिरों में से कुछ लोगों को ज़िम्मेदारी सौंपी। ज़ुल उशैरा नाम की जगह पहुँचकर उन्हें मालूम हुआ कि क़ाफ़िला गुज़र चुका है, और वे मदीना लौट आए। अगर कुफ़्र वालों के हथियार और माल उनके हाथ से निकल जाते, तो वे इस्लाम वालों को नुक़सान न पहुँचा पाते और उनकी मुज़ाहमत टूट जाती। इसलिए रसूलुल्लाह ने हालात का जायज़ा लिया और फ़ौरन जंग की तैयारियाँ शुरू कर दीं।
आपने अपनी जगह नमाज़ पढ़ाने के लिए अब्दुल्लाह इब्ने उम्मे मकतूम को छोड़ा।2 हज़रत तल्हा इब्ने उबैदुल्लाह और सईद इब्ने ज़ैद को क़ाफ़िले की वापसी की ख़बर लेने के लिए जासूसी दस्ते के तौर पर भेजा।3 हज़रत उस्मान की बीवी सख़्त बीमार थीं, इसलिए आपने हज़रत उस्मान को मदीना में रहने का हुक्म फ़रमाया। फिर चार और लोगों को ज़िम्मेदारियाँ दीं। इस तरह ज़िम्मेदारी पाने वाले आठ आदमी हो गए।
यह मौक़ा हाथ से जाने देने वाला न था। नबी-ए-करीम ने फ़ौरन तैयारी की और मुहाजिरों और अन्सार में से तीन सौ पाँच सहाबा को साथ लेकर रमज़ान शरीफ़ की बारह तारीख़ को बद्र की तरफ़ कूच फ़रमाया। ज़िम्मेदारी पाने वालों को मिलाकर उनकी तादाद 313 तक पहुँचती थी।4 इनमें से चौंसठ मुहाजिर थे।
बद्र एक ऐसी जगह थी जहाँ मक्का, मदीना और शाम (सीरिया) जाने वाले रास्ते आपस में मिलते थे।
इस सफ़र पर निकलने के लिए नए-नए जवान हुए लड़के, यहाँ तक कि औरतें भी नबी-ए-करीम से मिन्नतें कर रही थीं। जब उम्मे वरक़ा ने रसूलुल्लाह की ख़िदमत में हाज़िर होकर कहा: “मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह! अगर आप इजाज़त दें, तो मैं आपके साथ चलना चाहती हूँ। ज़ख़्मियों के ज़ख़्मों पर पट्टी बाँधूँगी, बीमारों की ख़िदमत करूँगी। शायद अल्लाह तआला मुझे भी शहादत नसीब कर दे!”, तो हबीब-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “तुम अपने घर में बैठो और क़ुरआन-ए-करीम पढ़ो। बेशक अल्लाह तआला तुम्हें शहादत नसीब करेगा।”
“तुम (उम्मे वरक़ा) अपने घर में बैठो और क़ुरआन-ए-करीम पढ़ो। बेशक अल्लाह तआला तुम्हें शहादत नसीब करेगा” हदीस शरीफ़
बद्र के ग़ज़वे का रास्ता
साद इब्ने अबी वक़्क़ास ने बयान किया: “जब रसूलुल्लाह हमारे साथ ग़ज़वे में जाने के ख़्वाहिशमंद बच्चों को वापस लौटाना चाहते थे, तो मैंने देखा कि मेरा भाई उमैर एक तरफ़ छिपने और नज़रों से ओझल रहने की कोशिश कर रहा है। उस वक़्त उसकी उम्र सोलह साल थी। मैंने कहा: ‘तुम्हें क्या हुआ है कि इस तरह छिप रहे हो?’ उसने कहा: ‘मुझे डर है कि रसूलुल्लाह मुझे भी छोटा समझकर लौटा देंगे! हालाँकि मैं ग़ज़वे में शरीक होना चाहता हूँ, ताकि अल्लाह तआला मुझे शहादत नसीब करे।’ इसी दौरान जब रसूलुल्लाह को उसके बारे में बताया गया, तो आपने मेरे भाई से फ़रमाया: ‘तुम वापस चले जाओ।’ इस पर मेरा भाई उमैर रोने लगा। रहमत के समुंदर हबीब-ए-अकरम उसके आँसू बर्दाश्त न कर सके और इजाज़त दे दी। मेरे भाई की तलवार उसकी कमर पर मैंने ही बाँधी थी, क्योंकि वह ख़ुद उसे बाँध नहीं पाता था।”5 सारे जहानों के सरदार हमारे प्यारे नबी का झंडा मुसअब इब्ने उमैर, साद इब्ने मुआज़ और हज़रत अली उठाए हुए थे।6 सहाबा-ए-किराम के पास सिर्फ़ तीन घोड़े और सत्तर ऊँट थे। घोड़ों में से एक मिक़दाद का, एक ज़ुबैर का और एक मरसद इब्ने अबी मरसद का था। दो या तीन आदमी बारी-बारी एक ऊँट पर सवार होते थे। रसूलुल्लाह हज़रत अली, अबू लुबाबा और मरसद इब्ने अबी मरसद के साथ बारी-बारी सवार होते थे। लेकिन वे सब इस बात के लिए मिन्नतें करते थे कि रसूल अलैहिस्सलाम पैदल न चलें और हमेशा ऊँट पर ही रहें: “हमारी जानें आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह! आप ऊँट से न उतरें। आपकी बुलंद ज़ात की जगह हम पैदल चल लेंगे।” लेकिन कायनात के सुल्तान ने ख़ुद को उनसे अलग न समझा और फ़रमाया: “न तुम पैदल चलने में मुझसे ज़्यादा ताक़तवर हो और न मैं अज्र और सवाब के मामले में तुमसे ज़्यादा बेनियाज़ और बेपरवाह हूँ।” रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) और आपके बुलंद सहाबा रेगिस्तान में झुलसा देने वाली गर्मी में चल रहे थे। इसके अलावा वे रोज़े से थे। सहाबा-ए-किराम इस्लाम को फैलाने के लिए बहुत-सी तकलीफ़ें सहते हुए इश्क़ और शौक़ के साथ नबी-ए-करीम के पीछे चल रहे थे, क्योंकि इस राह के आख़िर में अल्लाह तआला और उसके रसूल की रज़ा थी, वह शहादत और जन्नत थी जिसकी उन्हें बेहद तमन्ना थी… हमारे प्यारे नबी ने अपने सहाबा के हाल को देखकर दुआ फ़रमाई: “या अल्लाह! ये पैदल हैं, तू इन्हें सवारी अता फ़रमा! या अल्लाह! ये नंगे बदन हैं, तू इन्हें कपड़े पहना! या अल्लाह! ये भूखे हैं, इनका पेट भर दे। ये फ़क़ीर हैं, अपने फ़ज़्ल-ओ-करम से इन्हें ग़नी कर दे!”
जब नबी-ए-करीम और आपका मुबारक लश्कर इस सख़्त गर्मी में बद्र की तरफ़ बढ़ रहा था, तो दमिश्क़ से आने वाला मुशरिकों का क़ाफ़िला भी बद्र के क़रीब पहुँच चुका था। नबी-ए-करीम ने क़ाफ़िले की ख़बर लाने के लिए जो दो सहाबा भेजे थे, उन्हें मालूम हुआ कि क़ाफ़िला एक-दो दिन में बद्र पहुँच सकता है, और वे तेज़ी से वापस लौट आए। क़ाफ़िले वाले जब उस गाँव में पहुँचे जहाँ से इन दोनों ने ख़बर ली थी, तो उन्होंने गाँव वालों से पूछा: “क्या तुम्हें मुसलमानों के जासूसों की कुछ ख़बर है?” उन्होंने कहा: “हम नहीं जानते। लेकिन दो आदमी आए थे, यहाँ थोड़ी देर बैठे, फिर उठकर चले गए।”
अबू सुफ़यान ने बताई गई जगह पर जाकर जाँच की, ज़मीन पर पड़ी ऊँटों की मेंगनियों को मसला और उनमें चारे की गुठलियाँ देखीं, तो कहा: “यह मदीना का चारा है। मेरा ख़याल है कि वे दोनों आदमी मुहम्मद (अलैहिस्सलाम) के जासूस हैं।” यह अंदाज़ा करके कि मुसलमान बहुत क़रीब हैं, अबू सुफ़यान बहुत डर गया। क़ाफ़िले के अंजाम की फ़िक्र में उसने तय किया कि दिन-रात चलकर, वक़्त गँवाए बग़ैर, लाल सागर के किनारे-किनारे तेज़ी से मक्का पहुँच जाए। इसके अलावा उसने हालात की ख़बर देने के लिए ज़मज़म इब्ने अम्र ग़िफ़ारी नाम के एक आदमी को क़ासिद बनाकर मक्का भेजा।7
“या अल्लाह! ये (मेरे सहाबा) पैदल हैं, तू इन्हें सवारी अता फ़रमा! या अल्लाह! ये नंगे बदन हैं, तू इन्हें कपड़े पहना! या अल्लाह! ये भूखे हैं, इनका पेट भर दे। ये फ़क़ीर हैं, अपने फ़ज़्ल-ओ-करम से इन्हें ग़नी कर दे!” हदीस शरीफ़
यह आदमी जब मक्का पहुँचा, तो उसने अपनी क़मीज़ आगे और पीछे से फाड़ डाली। अपने ऊँट का पालान उलटा कर दिया। एक अजीब हालत में वह चीख़-चीख़कर फ़रियाद करने लगा: “मदद करो! मदद!… ऐ क़ुरैश के लोगो! जल्दी पहुँचो!… तुम्हारे क़ाफ़िले पर, अबू सुफ़यान के पास मौजूद तुम्हारे माल पर मुहम्मद और उनके साथियों ने हमला कर दिया है। अगर वक़्त पर पहुँच सको, तो अपना क़ाफ़िला बचा सकते हो!…”
यह सुनते ही मक्का वाले फ़ौरन इकट्ठा हुए और तैयारियाँ कर लीं। उन्होंने सात सौ ऊँट सवार, सौ घुड़सवार और डेढ़ सौ पैदल सिपाही जमा किए। जब अबू लहब से कहा गया: “चलो, तुम भी शामिल हो जाओ!”, तो उसने डर के मारे अपनी बीमारी का बहाना बनाया और अपनी जगह आस इब्ने हिशाम को भेज दिया। उमय्या इब्ने ख़लफ़ नाम का मुशरिक जंग की तैयारी में बहुत ढील बरत रहा था, क्योंकि उसने सुना था कि नबी-ए-करीम ने फ़रमाया है: “मेरे सहाबा उमय्या को क़त्ल करेंगे।” वह जानता था कि आप कभी सच्चाई से नहीं हटते, इसलिए वह डर रहा था। इसी वजह से अबू जहल के इसरार के जवाब में उसने अपने बूढ़े और बहुत मोटे होने का बहाना पेश किया। लेकिन जब अबू जहल ने उस पर बुज़दिली का इल्ज़ाम लगाया, तो उसे जाना ही पड़ा।
मुशरिकों का लश्कर एक हज़ार के क़रीब आदमियों पर मुश्तमिल था। सबने लोहे की ज़िरहें पहन रखी थीं। उनके साथ सुरीली आवाज़ वाली औरतें थीं। वे बाजे-गाजे और शराब साथ लेना भी नहीं भूले थे। उनका ख़याल था कि इतने ताक़तवर लश्कर से वे तीन सौ आदमियों पर तो क्या, एक हज़ार आदमियों के लश्कर पर भी पल भर में ग़ालिब आ जाएँगे। कुछ लोग ऐसे भी थे जो रवाना होने से पहले ही हिसाब लगा रहे थे कि किन-किन को क़त्ल करेंगे और कितना माल-ए-ग़नीमत हाथ आएगा। लेकिन उन सबकी सबसे बड़ी आरज़ू इस्लाम को मिटा देना थी। मुशरिकों का यह सरकश रेवड़ औरतों के बजाए हुए दफ़ और उनके गाए हुए गीतों के साथ रवाना हुआ।
इसी दौरान अबू सुफ़यान बद्र से काफ़ी दूर निकल चुका था और मक्का की तरफ़ बहुत-सा रास्ता तय कर चुका था। जब उसे यक़ीन हो गया कि ख़तरा टल गया है, तो उसने क़ैस इब्ने इमरउल क़ैस नाम के अपने आदमी को क़ुरैश के पास भेजा और कहलवाया: “ऐ क़ुरैश के लोगो! तुम अपने क़ाफ़िले, अपने आदमियों और अपने माल की हिफ़ाज़त के लिए मक्का से निकले थे। हम ख़तरे से बच निकले हैं। अब वापस लौट जाओ!…” इसके अलावा उसने यह नसीहत भी की: “मुसलमानों से लड़ने के लिए मदीना जाने से बचना!”
जब क़ैस यह ख़बर लेकर मुशरिकों के लश्कर में पहुँचा, तो अबू जहल ने कहा: “मैं क़सम खाता हूँ कि हम बद्र पहुँचकर तीन दिन और तीन रात जश्न मनाएँगे, ऊँट ज़बह करेंगे और शराब पिएँगे। आस-पास के क़बीले हमें देखकर हमारे हाल पर रश्क करेंगे और देख लेंगे कि हम किसी से नहीं डरते। इसके बाद हमारे रोब की वजह से कोई हम पर हमला करने की हिम्मत नहीं करेगा। ऐ क़ुरैश के नाक़ाबिल-ए-शिकस्त लश्कर! आगे बढ़ो!…” क़ैस ने जब देखा कि अबू जहल किसी की बात सुनने की हालत में नहीं है, तो वह लौट गया और अबू सुफ़यान को हालात से आगाह किया। अबू सुफ़यान दूर की सोचने वाला और होशियार आदमी था; वह यह कहे बग़ैर न रह सका: “हाय अफ़सोस! क़ुरैश तबाह हो गए!… यह अम्र इब्ने हिशाम (अबू जहल) की चाल है। उसने यह काम ज़रूर लोगों का सरदार बनने के शौक़ में किया है। हालाँकि ऐसी सरकशी हमेशा एक बड़ी कमी और नहूसत होती है। अगर मुसलमानों से उनका सामना हो गया, तो क़ुरैश की ख़ैर नहीं!…”
अबू सुफ़यान क़ाफ़िले को तेज़ी से मक्का पहुँचाकर लश्कर से जा मिला। इसी दौरान सरवर-ए-कायनात (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपने सहाबा के साथ बद्र के क़रीब पहुँच रहे थे। एक मौक़े पर आपने इस्लामी लश्कर के बीच मदीना के मुशरिकों में से ख़ुबैब इब्ने यसाफ़ और क़ैस इब्ने मुहर्रिस को देखा। ख़ुबैब के सिर पर लोहे का ख़ोद होने के बावजूद आपने उसे पहचान लिया और हज़रत साद इब्ने मुआज़ से फ़रमाया: “क्या यह ख़ुबैब नहीं है?” उन्होंने कहा: “जी हाँ, या रसूलल्लाह!” ख़ुबैब जंग के फ़न को जानने वाला एक बहादुर पहलवान था। वह क़ैस के साथ रसूलुल्लाह की ख़िदमत में आया। हमारे नबी ने उनसे पूछा: “तुम हमारे साथ क्यों आ रहे हो?” उन्होंने कहा: “आप हमारी बहन के बेटे और हमारे पड़ोसी हैं। हम भी अपनी क़ौम के साथ माल-ए-ग़नीमत इकट्ठा करने के लिए आ रहे हैं!” जब हमारे नबी ने ख़ुबैब से पूछा: “क्या तुम अल्लाह तआला और उसके रसूल पर ईमान लाए हो?”, तो उसने कहा: “नहीं।” रसूल अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: “तो फिर वापस लौट जाओ! जो हमारे दीन पर नहीं, वह हमारे साथ नहीं हो सकता!” ख़ुबैब ने कहा: “मेरी जवाँमर्दी, मेरी बहादुरी और यह बात कि मैं दुश्मन के सीने में ज़ख़्म डाल देने वाला पहलवान हूँ, सब जानते हैं। माल-ए-ग़नीमत के लिए मैं आपके साथ रहकर आपके दुश्मन से लड़ूँगा।” नबी-ए-करीम ने उसकी मदद क़बूल नहीं फ़रमाई।
कुछ दूर जाने के बाद ख़ुबैब ने अपनी दरख़्वास्त दोहराई, लेकिन हमारे नबी ने बता दिया कि मुसलमान हुए बग़ैर उसकी ख़्वाहिश क़बूल नहीं की जा सकती। जब वे रौहा नाम की जगह पर पहुँचे, तो ख़ुबैब रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ख़िदमत में हाज़िर हुए और कहा: “या रसूलल्लाह! मैंने यक़ीन कर लिया कि अल्लाह तआला सारे जहानों का रब है और आप उसके नबी हैं; मैं ईमान ले आया।” इस पर सरवर-ए-कायनात बहुत ख़ुश हुए। क़ैस भी मदीना लौटने के बाद ईमान की दौलत से मुशर्रफ़ हुए (रज़ियल्लाहु अन्हु)।
इस्लामी लश्कर जब सफ़रा की वादी में पहुँचा, तो ख़बर मिली कि मक्का वाले एक लश्कर तैयार करके अपने क़ाफ़िले को बचाने के लिए बद्र की तरफ़ बढ़ रहे हैं। नबी-ए-करीम ने अपने सहाबा को जमा किया और इस सूरत-ए-हाल के बारे में उनसे मशवरा किया। दरअसल मदीना के मुसलमानों ने अक़बा में रसूलुल्लाह से बैअत करते वक़्त यह वादा किया था: “या रसूलल्लाह! आप हमारे शहर में तशरीफ़ लाइए। वहाँ हम अपनी जान की क़ीमत पर भी आपके दुश्मन से आपकी हिफ़ाज़त करेंगे और आपकी पैरवी करेंगे।” लेकिन अब वे मदीना से बाहर निकल आए थे, और उनके सामने दुश्मन का एक बड़ा लश्कर था, जो तादाद, हथियारों और माल में उनसे कई गुना ज़्यादा था।
जब रसूलुल्लाह ने अपने सहाबा से उनकी राय पूछी, तो मुहाजिरों में से अबू बकर सिद्दीक़ और उमरुल फ़ारूक़ ने अलग-अलग खड़े होकर बताया कि दुश्मन के लश्कर से मुक़ाबला करना ज़रूरी है। फिर मुहाजिरों ही में से मिक़दाद इब्ने असवद खड़े हुए और कहा: “या रसूलल्लाह! अल्लाह तआला का जो हुक्म है, उसे पूरा कीजिए। उसके फ़रमान के साथ आगे बढ़िए। हम हर लम्हा आपके साथ हैं, एक पल को भी आपसे जुदा नहीं होंगे। हम वैसी बात नहीं कहेंगे जैसी बनी इस्राईल ने मूसा अलैहिस्सलाम से कही थी: ‘ऐ मूसा! जब तक ज़बरदस्त और ज़ालिम लोगों की वह क़ौम उस इलाक़े में मौजूद है, हम वहाँ नहीं जाएँगे और उस शहर में कभी दाख़िल नहीं होंगे। तो तुम और तुम्हारा रब दोनों जाओ और उनसे लड़ो। हम तो यहीं बैठे रहेंगे…’8 हम अपनी जानें और अपने सिर अल्लाह तआला और उसके रसूल की राह में क़ुरबान करते हैं। उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसने आपको सच्चा नबी बनाकर भेजा है, अगर आप हमें समुंदर पार हब्शा भी भेजें, तो हम जाएँगे। हम किसी बात में कभी आपकी मुख़ालफ़त नहीं करेंगे। आपकी हर ख़्वाहिश पूरी करने के लिए तैयार हैं। मेरे माँ-बाप और मेरी जान आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह!…”
“जो हमारे दीन पर नहीं, वह हमारे साथ नहीं हो सकता!” हदीस शरीफ़
बद्र का ग़ज़वा
मिक़दाद की इन बातों से हमारे प्यारे नबी बेहद ख़ुश हुए और उनके लिए ख़ैर की दुआ फ़रमाई।9
यहाँ मदीना के मुसलमानों की राय बहुत अहम थी, क्योंकि एक तो वे तादाद में ज़्यादा थे, दूसरे उन्होंने रसूलुल्लाह की मदीना में हिफ़ाज़त करने का वादा किया था। मदीना से बाहर लड़ने का उनका कोई वादा नहीं था। जब यह बात समझ में आई, तो अन्सार में से साद इब्ने मुआज़ खड़े हुए और कहा: “या रसूलल्लाह! अगर आप इजाज़त दें, तो मैं अन्सार की तरफ़ से बात करूँ।” इजाज़त मिलने पर उन्होंने कहा: “या रसूलल्लाह! हम आप पर ईमान लाए हैं, आपकी नुबुव्वत की तस्दीक़ की है। आप जो कुछ लाए हैं, वह हक़ है, सच है। इस बारे में हमने सुनने और इताअत करने का आपसे पक्का वादा किया है, क़सम खाई है। हम अपने उस वादे से कभी नहीं फिरेंगे; आप जहाँ भी तशरीफ़ ले जाएँ, हम आपके हुक्म के ताबे हैं। आपका हुक्म हमारे सिर-आँखों पर है। हम अपनी जानें और अपने सिर आपकी राह में क़ुरबान करते हैं। उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसने आपको सच्चा नबी बनाकर भेजा है, अगर आप समुंदर में कूद पड़ें, तो आपके पीछे हम भी कूद पड़ेंगे। हममें से कोई एक क़दम भी पीछे नहीं रहेगा। आपके मुबारक दिल में जो कुछ है, उसका हुक्म दीजिए, हम उसे थाम लेंगे। हमारा माल भी हमारी जानों के साथ आप पर क़ुरबान हो। हम दुश्मन से कभी मुँह नहीं मोड़ेंगे। जंग में हम साबित-क़दम हैं। हमारी उम्मीद यही है कि आपको ख़ुश करें और आपकी रज़ा पाएँ। आप पर अल्लाह तआला की रहमत हो…” ये बातें सुनकर सहाबा-ए-किराम बहुत जोश में आ गए। सबने बताया कि वे इन बातों से दिल-ओ-जान से मुत्तफ़िक़ हैं। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बहुत ख़ुश हुए और हज़रत साद और अपने सहाबा के लिए दुआ फ़रमाई। अब सारे शक-शुबहे दूर हो चुके थे। दुश्मन चाहे कितना ही ज़्यादा और कितना ही ताक़तवर क्यों न हो, शान वाले सहाबा हमारे प्यारे नबी के पीछे पलक झपकाए बग़ैर शहादत की तरफ़ बढ़ने वाले थे और अल्लाह तआला और उसके रसूल की रज़ा हासिल करने वाले थे। जब तक उनके आगे कायनात के सरदार थे, कोई ऐसी जगह न थी जहाँ वे न जाते… फ़ख़्र-ए-आलम ने अपने सहाबा की अपने साथ वफ़ादारी और उनका जोश देखा, तो उन्हें यह ख़ुशख़बरी दी: “चलो, आगे बढ़ो! अल्लाह तआला के लुत्फ़-ओ-करम से ख़ुश हो जाओ। अल्लाह की क़सम, इस वक़्त मैं गोया वे जगहें देख रहा हूँ जहाँ क़ुरैश की क़ौम के लोग जंग के मैदान में ज़ख़्मी होकर गिरेंगे, उन्हें देख रहा हूँ!” इस ख़ुशख़बरी के बाद सहाबा-ए-किराम इश्क़ के साथ रसूलुल्लाह के पीछे चल पड़े।
फ़रिश्तों का मदद के लिए आना
जब वे बद्र के आस-पास पहुँचे, तो जुमा की रात थी। हमारे प्यारे नबी ने अपने सहाबा से फ़रमाया: “मुझे उम्मीद है कि उस छोटे टीले के पास वाले कुएँ पर तुम्हें कुछ मालूमात मिल सकेंगी।” आपने वहाँ अल्लाह तआला के शेर हज़रत अली, साद इब्ने अबी वक़्क़ास, ज़ुबैर इब्ने अव्वाम और कुछ दूसरे सहाबा को भेजा। हज़रत अली और उनके साथी फ़ौरन कुएँ पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने क़ुरैश के ऊँट वालों और पानी भरने वालों को देखा। वे मुसलमानों को देखते ही भाग गए। लेकिन उनमें से दो पकड़े गए। इनमें से एक बनू हज्जाज का ग़ुलाम अश्लम और दूसरा बनू आस इब्ने सईद का ग़ुलाम अरीज़ अबू यसार था।
जब उन्हें नबी-ए-करीम की ख़िदमत में लाया गया, तो रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उनसे पूछा: “क़ुरैश कहाँ हैं?” उन्होंने जवाब दिया: “वह जो रेत का टीला दिखाई दे रहा है, उसके पीछे पड़ाव डाले हुए हैं।” हमारे नबी ने पूछा: “क़ुरैश कितने आदमी हैं?” उन्होंने कहा: “हम नहीं जानते।” जब पूछा गया: “रोज़ाना कितने ऊँट ज़बह करते हैं?”, तो उन्होंने जवाब दिया: “एक दिन नौ, एक दिन दस।” इस पर नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “वे एक हज़ार से कम और नौ सौ से ज़्यादा हैं।” फिर पूछा: “क़ुरैश के बड़े लोगों में से कौन-कौन हैं?” जब उन्होंने कहा: “उत्बा, शैबा, हारिस इब्ने अम्र, अबुल बख़्तरी, हकीम इब्ने हिज़ाम, अबू जहल, उमय्या इब्ने ख़लफ़…”, तो रसूलुल्लाह ने अपने सहाबा की तरफ़ मुड़कर फ़रमाया: “मक्का वालों ने अपने जिगर के टुकड़े तुम्हारे सामने डाल दिए हैं।” फिर उन दोनों से पूछा: “आते वक़्त क़ुरैश में से कोई वापस भी लौटा?”, तो उन्होंने जवाब दिया: “हाँ। बनू ज़ुहरा में से अख़नस इब्ने अबी शरीक़ वापस लौट गया।” हमारे नबी ने फ़रमाया: “वह ख़ुद सीधे रास्ते पर नहीं है, आख़िरत को, अल्लाह तआला को और किताब को नहीं जानता, फिर भी उसने बनू ज़ुहरा को सीधा रास्ता दिखा दिया… उनके अलावा भी कोई लौटा?”, तो जवाब मिला: “बनू अदी इब्ने कअब लौट गए।”10
“या रसूलल्लाह! अल्लाह तआला का जो हुक्म है, उसे पूरा कीजिए। उसके फ़रमान के साथ आगे बढ़िए। हम हर लम्हा आपके साथ हैं, एक पल को भी आपसे जुदा नहीं होंगे” मिक़दाद इब्ने असवद (रज़ियल्लाहु अन्हु)
नबी-ए-करीम ने क़ुरैश को आख़िरी बार ख़बरदार करने के लिए हज़रत उमर को सुलह की पेशकश के साथ उनके पास भेजा। उमर इब्ने ख़त्ताब ने उनसे कहा: “ऐ ज़िद्दी क़ौम! रसूल अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं: ‘हर कोई इस काम से बाज़ आ जाए और सलामती के साथ वापस लौट जाए, क्योंकि तुम्हारे सिवा किसी और से लड़ना मुझे तुमसे लड़ने से ज़्यादा पसंद है!…’”
इस पेशकश पर क़ुरैश के मुशरिकों में से हकीम इब्ने हिज़ाम आगे बढ़ा और कहने लगा: “ऐ क़ुरैश के लोगो! मुहम्मद ने तुम्हारे साथ बहुत इंसाफ़ का बर्ताव किया है। वह जो चाहते हैं, उसे फ़ौरन क़बूल कर लो। अगर तुमने उनकी बात न मानी, तो मैं क़सम खाता हूँ कि इसके बाद वह तुम्हारे साथ ज़रा भी नरमी नहीं करेंगे!…” हकीम की इस बात पर ग़ुस्से में आकर अबू जहल ने कहा: “हम इसे हरगिज़ क़बूल नहीं करेंगे और मुसलमानों से बदला लिए बग़ैर वापस नहीं जाएँगे, ताकि फिर कभी कोई हमारे क़ाफ़िले पर हमला न कर सके।” इस तरह उसने सुलह के रास्ते बंद कर दिए। हज़रत उमर वापस लौट आए।
उस रात नबी-ए-करीम और आपके शान वाले सहाबा मुशरिकों से पहले बद्र पहुँचकर कुओं के क़रीब एक जगह उतरे। नबी-ए-करीम ने अपने सहाबा से मशवरा किया और उनकी राय पूछी कि लश्करगाह कहाँ क़ायम की जाए। उनमें से हुबाब इब्ने मुंज़िर, जो उस वक़्त सिर्फ़ तैंतीस साल के थे, खड़े हुए और बोलने की इजाज़त माँगी। इजाज़त मिलने पर उन्होंने पूछा: “या रसूलल्लाह! क्या यह वह जगह है जहाँ लश्करगाह क़ायम करने का अल्लाह तआला ने आपको हुक्म दिया है और जहाँ ठहरना हर हाल में ज़रूरी है? या इसे निजी राय से, जंगी तदबीर के तौर पर चुना गया है?” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “नहीं! इस जगह को जंगी तदबीर के तौर पर चुना गया है।”
इस पर हज़रत हुबाब ने कहा: “मेरे माँ-बाप और मेरी जान आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह!
हम जंग के लोग हैं। इन इलाक़ों को भी अच्छी तरह जानते हैं। क़ुरैश के लोग जहाँ पड़ाव डालने वाले हैं, उसके क़रीब वाले कुएँ में मीठा और भरपूर पानी है। अगर आप इजाज़त दें, तो हम वहाँ पड़ाव डालें। आस-पास के तमाम कुओं को पाट दें। फिर एक हौज़ बनाकर उसे पानी से भर दें। दुश्मन से लड़ते हुए जब प्यास लगेगी, हम अपने हौज़ से आकर पानी पी लेंगे, जबकि दुश्मन को पानी नहीं मिलेगा और वह बेहाल हो जाएगा।”11 उसी वक़्त जिबराईल अलैहिस्सलाम यह वह्य लेकर आए कि यह राय दुरुस्त है। नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ऐ हुबाब! सही राय वही है जिसकी तरफ़ तुमने इशारा किया है।” और आप उठ खड़े हुए। सब मिलकर बताए गए कुएँ पर आए। मीठे पानी वाले कुएँ के सिवा बाक़ी तमाम कुओं को पाटकर एक बड़ा हौज़ बनाया। उसे पानी से भरकर पीने के लिए बरतन रख दिए।
इसी दौरान हज़रत साद इब्ने मुआज़ नबी-ए-करीम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और यह पेशकश की: “या रसूलल्लाह! क्या हम आपके लिए खजूर की टहनियों से एक सायबान बना दें, जिसमें आप तशरीफ़ रखें?” फ़ख़्र-ए-आलम साद की इस राय से ख़ुश हुए और उनके लिए दुआ फ़रमाई। फ़ौरन एक सायबान बना दिया गया। नबियों के सुल्तान ने अपने इज़्ज़त वाले सहाबा के साथ जंग के मैदान का दौरा किया और उसका जायज़ा लिया। आप वक़्त-वक़्त पर रुककर अपने मुबारक हाथों से क़ुरैश के मुशरिकों के क़त्ल होने की जगहें एक-एक करके दिखाते हुए फ़रमाया: “इंशाअल्लाह, कल सुबह फ़लाँ के ज़ख़्मी होकर गिरने की जगह यह है! इंशाअल्लाह, कल सुबह फ़लाँ के ज़ख़्मी होकर गिरने की जगह यह है! बस यही है! यही है!…”
बाद में हज़रत उमर ने यह ख़बर दी: “मैंने देखा कि उनमें से हर एक ठीक उसी जगह ज़ख़्मी होकर मारा गया, जहाँ रसूल-ए-अकरम ने अपना मुबारक हाथ रखा था। कोई भी उस जगह से न ज़रा आगे था, न पीछे।”
सारे जहानों के सरदार (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सहाबा-ए-किराम को तीन गिरोहों में बाँटा। मुहाजिरों का झंडा मुसअब इब्ने उमैर को, औस क़बीले का साद इब्ने मुआज़ को और ख़ज़रज क़बीले का हुबाब इब्ने मुंज़िर को दिया। हर कोई अपने झंडे के नीचे जमा हो गया।12 नबी-ए-करीम ने लश्कर की सफ़ें बाँधकर उसे तरतीब दी।
लश्कर को तरतीब देते हुए आपने अपने मुबारक हाथ की छड़ी से सवाद इब्ने ग़ज़िय्या के सीने को छुआ, जो सफ़ से आगे निकल आए थे, और फ़रमाया: “सीधे हो जाओ, ऐ सवाद!” सवाद ने कहा: “या रसूलल्लाह! आपके हाथ की छड़ी से मुझे तकलीफ़ पहुँची है। उस अल्लाह तआला के वास्ते, जिसने आपको सच्चे दीन, किताब और इंसाफ़ के साथ भेजा है, मैं भी आपको इसी तरह छड़ी से छूना चाहता हूँ।” उनकी इस बात पर तमाम सहाबा-ए-किराम हैरान रह गए। भला कायनात के सरदार से क़िसास (बदला) माँगना कैसे हो सकता है? क्या ऐसा कुछ किया जा सकता है? लेकिन रसूलुल्लाह ने अपनी मुबारक क़मीज़ का अगला हिस्सा खोल दिया और फ़रमाया: “लो, क़िसास ले लो और अपना हक़ वसूल कर लो।” इस पर हज़रत सवाद ने बड़ी ख़ुशी और मुहब्बत के साथ हबीब-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के मुबारक सीने को चूम लिया।
सब लोग क़िसास के इंतिज़ार में थे, और जो मंज़र उन्होंने देखा, उसे देखकर वे अपने दीनी भाई सवाद पर फ़िदा हो गए और उनके हाल पर रश्क करने लगे। जब हमारे प्यारे नबी ने पूछा: “तुमने ऐसा क्यों किया?”, तो सवाद ने कहा: “मेरे माँ-बाप और मेरी जान आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह! आज मैं देख रहा हूँ कि अल्लाह तआला के हुक्म से मेरी मौत का वक़्त आ गया है, और मुझे आपकी बुलंद ज़ात से जुदा होने का डर है। इसलिए मैंने चाहा कि हमारे दरमियान गुज़रने वाले इन आख़िरी लम्हों में मेरे होंठ आपके मुबारक जिस्म को छू जाएँ। मैंने चाहा कि इसे क़यामत के दिन आपकी शफ़ाअत का, और इस तरह अज़ाब से अपनी नजात का वसीला बनाऊँ।” उनकी इस मुहब्बत पर नबी-ए-करीम भी बहुत मुतास्सिर हुए और हज़रत सवाद के लिए दुआ फ़रमाई।
मुबारक इस्लामी लश्कर के दाहिने बाज़ू की कमान बहादुर मुजाहिद ज़ुबैर इब्ने अव्वाम को और बाएँ बाज़ू की कमान मिक़दाद इब्ने असवद को करनी थी।13
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने इज़्ज़त वाले सहाबा से इस बारे में मशवरा करना चाहा कि जंग कैसे शुरू की जाए, और पूछा: “तुम किस तरह लड़ते हो?” आसिम इब्ने साबित अपने हाथ में कमान और तीर लिए खड़े हुए और अपनी राय बताई: “या रसूलल्लाह! जब क़ुरैश के लोग हमसे सौ मीटर के क़रीब रह जाएँ, तो हम उन पर तीर बरसाएँ। फिर जब वे हाथ से पत्थर फेंकने के फ़ासले पर आ जाएँ, तो पत्थर फेंकें। जब इतने क़रीब आ जाएँ कि नेज़ा पहुँच सके, तो अपने नेज़े टूटने तक उनसे मुक़ाबला करें। फिर अपनी तलवारें खींचकर लड़ें!” यह तरीक़ा नबी-ए-करीम को पसंद आया। आपने अपने सहाबा को यह हिदायत दी: “अपनी सफ़ें छोड़कर अलग न होना। अपनी जगहों पर बिना हिले-डुले जमे रहना। जब तक मैं हुक्म न दूँ, जंग शुरू न करना। दुश्मन के तुम्हारे क़रीब आने से पहले अपने तीर चलाकर ज़ाया न करना। जब दुश्मन अपनी ढाल हटाए, तब अपना तीर चलाना। जब दुश्मन अच्छी तरह क़रीब आ जाए, तो हाथ से पत्थर फेंकना। जब वे और क़रीब आ जाएँ, तो अपने नेज़े इस्तेमाल करना। और जब दुश्मन से सीना-ब-सीना मुक़ाबला हो, तो अपनी तलवारों से लड़ना…”
“इंशाअल्लाह, कल सुबह फ़लाँ के ज़ख़्मी होकर गिरने की जगह यह है! इंशाअल्लाह, कल सुबह फ़लाँ के ज़ख़्मी होकर गिरने की जगह यह है! बस यही है! यही है!…” हदीस शरीफ़
फिर पहरेदार मुक़र्रर किए गए और सहाबा-ए-किराम को आराम का मौक़ा दिया गया। अल्लाह तआला की हिकमत से वे ऐसी गहरी नींद में डूब गए कि पलकें उठाने की भी हालत में न थे। नबी-ए-करीम जब खजूर की टहनियों से बने सायबान में तशरीफ़ ले गए, तो हज़रत अबू बकर और फिर साद इब्ने मुआज़ अपनी तलवारें म्यान से खींचकर सायबान के दरवाज़े पर पहरा देने लगे। हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपने मुबारक हाथ उठाकर बड़े ग़म के साथ अल्लाह तआला से गिड़गिड़ाकर दुआ करने लगे: “या रब! अगर तूने इस मुट्ठी भर जमाअत को हलाक कर दिया, तो फिर ज़मीन पर तेरी कभी इबादत नहीं की जाएगी…” यह दर्द भरी दुआ सुबह तक जारी रही।
मुबारक इस्लामी लश्कर ने जहाँ पड़ाव डाला था, वह रेतीली जगह थी। इसलिए चलने में दुश्वारी होती थी और पाँव रेत में धँस जाते थे। अल्लाह तआला के एहसान और रसूलुल्लाह की दुआ की बरकत से उस रात बारिश होने लगी, जो बढ़ती ही चली गई; इतना पानी बहा कि नाले उफन पड़े। पानी के बरतन भर लिए गए और ज़मीन इतनी सख़्त हो गई कि अब पाँव नहीं धँसते थे।
उधर मुशरिक कीचड़ और सैलाब में फँसकर रह गए।
फ़ज्र होने के बाद रसूलुल्लाह ने अपने सहाबा को नमाज़ के लिए उठाया।
फ़ज्र की नमाज़ पढ़ाने के बाद आपने दुश्मन से जिहाद करने और शहादत की फ़ज़ीलत बयान करके उन्हें मुक़ाबले के लिए जोश दिलाया। आपने फ़रमाया: “बेशक अल्लाह तआला हक़ और सच का हुक्म देता है। वह किसी का भी ऐसा अमल क़बूल नहीं करता जो अल्लाह तआला की रज़ा के लिए न किया गया हो… हमारे रब ने इन जगहों पर तुमसे अपनी रहमत और मग़फ़िरत का वादा करते हुए जो हुक्म दिया है, उसे पूरा करने की कोशिश करो और इम्तिहान में कामयाब हो जाओ, क्योंकि उसका वादा हक़ है, उसकी बात सच है और उसकी सज़ा सख़्त है। मैं और तुम हय्य व क़य्यूम (हमेशा ज़िंदा और हर चीज़ को क़ायम रखने वाले) अल्लाह तआला ही से वाबस्ता हैं। हमने उसी की पनाह ली, उसी का दामन थामा, उसी पर भरोसा किया। हमारा आख़िरी लौटना भी उसी की तरफ़ है। अल्लाह तआला मुझे और तमाम मुसलमानों को बख़्श दे!…”
रमज़ान शरीफ़ की सत्रह तारीख़ को जुमा के दिन का सूरज निकला। थोड़ी देर बाद तारीख़ की सबसे बेरहम, सबसे बेमेल, सबसे अहम और सबसे बड़ी जंग शुरू होने वाली थी…
एक तरफ़ फ़ख़्र-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) और आपके वे मुट्ठी भर इज़्ज़त वाले सहाबा थे जो अपनी जानें क़ुरबान करने से ज़र्रा बराबर भी नहीं हिचकिचाते थे; दूसरी तरफ़ सरकश और हद से गुज़रे हुए काफ़िरों का वह गिरोह था जो इस्लाम को चुटकियों में कुचल देने और अल्लाह तआला का हबीब होने का शरफ़ पाने वाले एक नबी को मिटा देने के लिए जमा हुआ था। अफ़सोस, इनमें रसूल-ए-अकरम के रिश्तेदार भी थे। वे भी अपने प्यारे भतीजे से लड़ने के लिए बद्र आए थे।
नबी-ए-करीम ने अपने लश्कर की तरतीब का दोबारा जायज़ा लिया और दी हुई हिदायतें दोहराईं। इसी दौरान क़ुरैश के मुशरिक अपनी लश्करगाह से निकलकर बद्र की वादी की तरफ़ उमड़ने लगे। उनमें से ज़्यादातर ज़िरहों में ढके हुए थे। बड़े ग़ुरूर और तकब्बुर के साथ उन्होंने इस्लामी लश्कर पर हमला बोल दिया। जब रसूलुल्लाह ने मुशरिकों की यह हालत देखी, तो हज़रत अबू बकर के साथ ख़ेमे में तशरीफ़ ले गए और अपने मुबारक हाथ उठाकर अल्लाह पाक से गिड़गिड़ाकर दुआ करने लगे: “या रब! देख, क़ुरैश के मुशरिक अपने पूरे ग़ुरूर और तकब्बुर के साथ आ रहे हैं!… वे तुझे ललकार रहे हैं, तेरे नबी को झुठला रहे हैं। या अल्लाह! मैं तुझसे माँगता हूँ कि तूने मुझसे मदद और फ़तह का जो वादा फ़रमाया है, उसे पूरा फ़रमा!… या अल्लाह! अगर तू इन मुट्ठी भर मुसलमानों की हलाकत चाहता है, तो फिर कोई तेरी इबादत करने वाला न रहेगा!…”
आप इसी तरह लगातार, बार-बार मदद माँगते हुए अल्लाह तआला से गिड़गिड़ा रहे थे। नबी-ए-करीम की यह बेहद दर्द भरी, कलेजा चीर देने वाली इल्तिजा यहाँ तक जारी रही कि आप बेख़ुद हो गए और आपकी रिदा (ऊपर की चादर) आपके मुबारक कंधे से गिर पड़ी। हज़रत अबू बकर दिल से निकलने वाली इस फ़रियाद को बर्दाश्त न कर सके; उन्होंने बड़े एहतिराम के साथ मुबारक रिदा ज़मीन से उठाकर नबी-ए-करीम के मुबारक कंधे पर डाली और आपको यूँ तसल्ली दी: “मेरी जान आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह! इतनी इल्तिजा काफ़ी है!… आपने अपने रब से दुआ में बहुत इसरार फ़रमा लिया! बेशक अल्लाह तआला ने आपसे जिस फ़तह का वादा किया है, वह जल्द ही अता फ़रमाएगा।” उसी लम्हे सारे जहानों के सरदार ये आयात-ए-करीमा पढ़ते हुए ख़ेमे से बाहर तशरीफ़ लाए, जिनमें मफ़हूमन फ़रमाया गया है: “यह जमाअत (बद्र वाली) जल्द ही यक़ीनन शिकस्त खाएगी और पीठ फेरकर भागेगी। बल्कि इनके अज़ाब का असल वक़्त क़यामत है। और उस वक़्त का अज़ाब कहीं ज़्यादा हौलनाक और कहीं ज़्यादा कड़वा है।”14
हमारे प्यारे नबी अपने लश्कर के आगे तशरीफ़ लाए। अपने शान वाले सहाबा के सामने ये आयात-ए-करीमा पढ़ीं: “ऐ ईमान वालो! जब तुम्हारा किसी दुश्मन जमाअत से सामना हो, तो साबित-क़दम रहो और नजात पाने के लिए अल्लाह तआला को ख़ूब याद करो… इस तरह उम्मीद है कि तुम फ़लाह पाओगे। अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करो। आपस में झगड़ा न करो, वरना नाकाम हो जाओगे और तुम्हारी ताक़त (रोब और क़ुव्वत) जाती रहेगी। सब्र करो, क्योंकि अल्लाह तआला सब्र करने वालों के साथ है।”15
यह पहली जंग होने वाली थी जो पूरे लश्कर के साथ मिलकर दुश्मन से लड़ी जाती। जंग शुरू होने ही वाली थी। जोश अपनी इंतिहा को पहुँच चुका था। जब रसूल-ए-अकरम ने “अल्लाह तआला को ख़ूब याद करो…” के मफ़हूम वाली आयत-ए-करीमा पढ़ी, तो तमाम सहाबा-ए-किराम मिलकर “अल्लाहु अकबर!… अल्लाहु अकबर!…” पुकारने और फ़तह अता होने के लिए अल्लाह पाक से गिड़गिड़ाकर दुआ करने लगे। अब वे नबी-ए-करीम के बस एक इशारे के मुंतज़िर थे। उस ज़माने के दस्तूर के मुताबिक़ दोनों लश्करों के टकराने से पहले दोनों तरफ़ से सूरमा मैदान में निकलते और एक-दूसरे से मुक़ाबला करते थे। इस मुक़ाबले से दोनों तरफ़ लड़ाई का जोश और जज़्बा बढ़ता और वे जंग के लिए गर्म हो जाते थे। मुशरिकों में से आमिर इब्ने हज़रमी ने इस दस्तूर की पाबंदी न करते हुए, बल्कि उसे पाँव तले रौंदकर, इस्लामी लश्कर पर एक तीर चला दिया। तीर मुहाजिरों में से मिहजा को लगा; वह शहीद हो गए और उनकी मुबारक रूह जन्नत की तरफ़ बुलंद हुई। नबियों के सरदार ने इस पहले शहीद के बारे में यह ख़ुशख़बरी दी: “मिहजा शहीदों के सरदार हैं।” सहाबा-ए-किराम की हालत ऐसी हो गई थी कि अपनी जगह ठहर न सकते थे। लेकिन नबी-ए-करीम की तरफ़ से हुक्म आए बग़ैर वे ज़रा-सी भी हरकत नहीं कर सकते थे।
“या रब! देख, क़ुरैश के मुशरिक अपने पूरे ग़ुरूर और तकब्बुर के साथ आ रहे हैं!… वे तुझे ललकार रहे हैं, तेरे नबी को झुठला रहे हैं। या अल्लाह! मैं तुझसे माँगता हूँ कि तूने मुझसे मदद और फ़तह का जो वादा फ़रमाया है, उसे पूरा फ़रमा!…” हदीस शरीफ़
हर एक का सीना ज्वालामुखी की तरह खौलने लगा था!…
इसी दौरान मुशरिकों के लश्कर से तीन आदमी आगे झपटते दिखाई दिए। ये बनू रबीआ में से इस्लाम के कट्टर दुश्मन – उत्बा, उसका भाई शैबा और उसका बेटा वलीद थे। उन्होंने मुजाहिदों की तरफ़ चिल्लाकर कहा: “तुममें कोई है जो हमसे मुक़ाबला कर सके?” सहाबा-ए-किराम में से सबसे पहले हज़रत अबू हुज़ैफ़ा अपने बाप उत्बा से मुक़ाबले के लिए आगे बढ़े, तो सारे जहानों के सुल्तान ने उनसे फ़रमाया: “तुम ठहरो!” इस पर मदीना के मुजाहिदों में से अफ़रा ख़ातून के बेटे मुआज़ और मुअव्विज़ और अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा आगे बढ़े। वे हाथों में तलवारें लिए उत्बा, शैबा और वलीद के सामने तैयार जा खड़े हुए।
मुशरिकों ने कहा: “तुम कौन हो?” और चाहा कि वे अपना तआरुफ़ कराएँ। जब उन्होंने कहा: “हम मदीना के मुसलमानों में से हैं”, तो मुशरिक बोले: “हमें तुमसे कोई सरोकार नहीं! हमें अब्दुल मुत्तलिब की औलाद चाहिए। हम उनसे मुक़ाबला करना चाहते हैं।” और इस्लामी लश्कर की तरफ़ मुड़कर चिल्लाए: “ऐ मुहम्मद! हमारे मुक़ाबले में हमारी अपनी क़ौम में से हमारे बराबर वालों को निकालो!”
रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने मैदान में मौजूद अपने इन तीन बहादुर सहाबा के लिए दुआ फ़रमाने के बाद उन्हें अपनी जगहों पर लौट आने का हुक्म दिया। फिर अपने सहाबा पर नज़र डालकर फ़रमाया: “ऐ बनू हाशिम! उठो! जो लोग अल्लाह तआला के नूर को अपने बातिल दीनों से बुझाने आए हैं, उनके ख़िलाफ़ हक़ की राह में लड़ो, क्योंकि अल्लाह तआला ने तुम्हारे नबी को भी इसी लिए भेजा है। उठो, ऐ उबैदा! उठो, ऐ हमज़ा! उठो, ऐ अली!”
अल्लाह तआला के शेर हज़रत हमज़ा, हज़रत अली और हज़रत उबैदा अपने ख़ोद पहनकर मैदान में उतरे। जब वे उनके सामने पहुँचे, तो मुशरिकों ने कहा: “तुम कौन हो? अगर तुम हमारे बराबर के हो, तो हम तुमसे मुक़ाबला करेंगे।” जब उन्होंने जवाब दिया: “मैं हमज़ा हूँ! मैं अली हूँ! मैं उबैदा हूँ!”, तो मुशरिकों ने कहा: “तुम भी हमारी तरह शरफ़ वाले लोग हो। हम तुमसे मुक़ाबला करने को तैयार हैं।” बहादुर इस्लामी मुजाहिदों ने पहले मुशरिकों को ईमान की दावत दी, मगर उन्होंने क़बूल न की। इस पर तीनों ने एक साथ अपनी तलवारें म्यान से खींचीं और मुशरिकों पर टूट पड़े। हज़रत हमज़ा और हज़रत अली ने काफ़िर उत्बा और वलीद को एक ही वार में क़त्ल कर दिया। हज़रत उबैदा ने शैबा को ज़ख़्मी किया। शैबा ने भी उबैदा को ज़ख़्मी कर दिया। हज़रत हमज़ा और हज़रत अली उबैदा की मदद को पहुँचे और शैबा को वहीं ढेर कर दिया। फिर हज़रत उबैदा को उठाकर रसूलुल्लाह की ख़िदमत में ले आए।16 हज़रत उबैदा इब्ने हारिस के मुबारक टख़ने से ख़ून और गूदा बह रहा था। अपनी इस हालत की कोई परवाह किए बग़ैर उन्होंने पूछा: “मेरी जान आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह! अगर मैं इसी हालत में मर जाऊँ, तो क्या मैं शहीद नहीं हूँ?” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “हाँ, तुम शहीद हो।” और उनके जन्नती होने की ख़ुशख़बरी दी। (हज़रत उबैदा (रज़ियल्लाहु अन्हु) का जंग से वापसी पर सफ़रा नाम की जगह पर इंतिक़ाल हुआ।) इस मुक़ाबले में मुशरिक अपने तीन अहम आदमी खो बैठे और हक्के-बक्के रह गए। इसके बावजूद अबू जहल अपने लश्कर का हौसला बढ़ाने के लिए यह कहकर तसल्ली देने की कोशिश कर रहा था: “तुम उत्बा, शैबा और वलीद के मरने की तरफ़ मत देखो, उन्होंने मुक़ाबले में जल्दबाज़ी की और बेकार मारे गए! मैं क़सम खाता हूँ कि जब तक मुसलमानों को पकड़कर रस्सियों से बाँध न लें, वापस नहीं जाएँगे!…” उधर बहादुर सहाबा-ए-किराम बेताब थे कि जल्द से जल्द इस मुशरिक गिरोह को अपनी तलवारों से सज़ा दें। हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बार-बार यह दुआ दोहरा रहे थे, जो आपकी मुबारक ज़बान पर जारी थी: “या अल्लाह! तूने मुझसे जो वादा फ़रमाया है, उसे पूरा फ़रमा!… या अल्लाह! अगर तूने मुसलमानों की इस मुट्ठी भर जमाअत को हलाक कर दिया, तो फिर ज़मीन पर तेरी इबादत करने वाला कोई न रहेगा!…”
इसी दौरान मुशरिकों की सफ़ों में से क़ुरैश के सबसे बहादुर और सबसे अचूक तीरंदाज़ों में से एक, हज़रत अबू बकर का बेटा अब्दुर रहमान, जो अभी मुसलमान नहीं हुआ था, मैदान में आया और मुक़ाबले के लिए किसी को ललकारा। जुलाई महीने की इस दोपहर की गर्मी में मुजाहिदों की सफ़ों से भी एक शख़्स फ़ौरन अपनी तलवार की तरफ़ हाथ बढ़ाकर आगे निकलता दिखाई दिया। यह बहादुर हज़रत अबू बकर थे, जिन्हें सबसे पहले मुसलमान होने और सिद्दीक़ के मर्तबे का शरफ़ मिला और जो नबियों के बाद सब इंसानों में सबसे बुलंद हैं… वह अपने बेटे से मुक़ाबला करने के लिए आगे बढ़े थे। लेकिन सारे जहानों के सरदार ने उनसे फ़रमाया: “ऐ अबू बकर! क्या तुम नहीं जानते कि तुम मेरे लिए मेरी देखने वाली आँख और सुनने वाले कान की जगह हो? मेरे पास से न जाओ! मेरे जिस्म और मेरे दिल पर आने वाली हर तकलीफ़ तुम्हारे मुबारक चेहरे को देखकर हल्की हो जाती है। तुमसे मेरे दिल को क़ुव्वत मिलती है।”
इस तरह आपने उन्हें मुक़ाबले से रोक दिया। अबू बकर सिद्दीक़ अपने बेटे से यह कहे बग़ैर न रह सके: “ऐ ख़बीस! मुझसे तेरा रिश्ता कहाँ रह गया?”
फिर नबियों के सुल्तान हबीब-ए-अकरम ज़मीन की तरफ़ झुककर मुट्ठी भर रेत उठाते दिखाई दिए। यह रेत दुश्मन की तरफ़ फेंकते हुए आपने फ़रमाया: “इनके चेहरे काले हों!… या अल्लाह! इनके दिलों में ख़ौफ़ डाल दे, इनके क़दमों को लरज़ा दे!” और अपने सहाबा की तरफ़ मुड़कर हुक्म दिया: “हमला करो!… टूट पड़ो!” शान वाले सहाबा, जो बस एक इशारे के मुंतज़िर थे, पहले से दी गई हिदायत के मुताबिक़ हरकत में आ गए। “अल्लाहु अकबर!… अल्लाहु अकबर!…” की सदाओं के बीच तीर सनसनाने लगे, पत्थर अपने निशानों पर लगने लगे, नेज़े ज़िरहों से टकराने लगे… अल्लाह तआला के शेर हज़रत हमज़ा दोनों हाथों में दो तलवारें लिए लड़ रहे थे; हज़रत अली, हज़रत उमर, ज़ुबैर इब्ने अव्वाम, साद इब्ने अबी वक़्क़ास, अबू दुजाना17 और अब्दुल्लाह इब्ने जह्श मुशरिकों की सफ़ों में एक सिरे से घुसते और दूसरे सिरे से निकल जाते थे और काफ़िरों के होश उड़ा देते थे। उनमें से हर एक ऐसा क़िला बन गया था जिसे पार नहीं किया जा सकता था। “अल्लाहु अकबर!… अल्लाहु अकबर!…” की सदाएँ आलम में गूँज रही थीं, अल्लाह तआला की शान की बड़ाई काफ़िरों के सिरों पर हथौड़े की तरह बरस रही थी। नबी-ए-करीम “या हय्यु! या क़य्यूम! या हय्यु! या क़य्यूम!” कहकर अल्लाह तआला से गिड़गिड़ा रहे थे। हज़रत अली ने फ़रमाया है: “बद्र में हममें सबसे ज़्यादा हिम्मत वाले और सबसे बड़े बहादुर रसूल अलैहिस्सलाम थे। मुशरिकों की सफ़ों के सबसे क़रीब भी आप ही थे। जब हम मुश्किल में घिर जाते, तो आपकी पनाह लेते थे।”
मुशरिकों ने अपने सरदार अबू जहल को घेरे के बीच में ले लिया। अपने में से एक आदमी को अबू जहल जैसे कपड़े पहनाकर उसके जैसा बना दिया। इस बदनसीब का नाम अब्दुल्लाह इब्ने मुंज़िर था। हज़रत अली अब्दुल्लाह पर झपटे और अबू जहल की आँखों के सामने उसका सिर उड़ा दिया। फिर मुशरिकों ने अबू क़ैस को वैसे कपड़े पहनाए। उसे भी हज़रत हमज़ा ने क़त्ल कर दिया।
हज़रत अली एक मुशरिक से लड़ रहे थे। मुशरिक ने अपनी तलवार हज़रत अली पर चलाई थी, और तलवार ढाल में धँसकर रह गई थी। हज़रत अली ने अपनी ज़ुल्फ़िक़ार मुशरिक के ज़िरहपोश जिस्म पर चलाई और उसे ज़िरह समेत कंधे से सीने तक चीर डाला; उसी वक़्त उन्होंने अपने सिर के ऊपर एक तलवार चमकती देखी। उन्होंने तेज़ी से अपना सिर झुका लिया। तलवार चमकाने वाले ने कहा: “ले! यह हमज़ा इब्ने अब्दुल मुत्तलिब की तरफ़ से!” और उसी पल मुशरिक का सिर ख़ोद समेत ज़मीन पर आ गिरा। हज़रत अली ने मुड़कर देखा तो अपने चचा हज़रत हमज़ा को दो तलवारों से लड़ते पाया। नबी-ए-करीम जब भी अपने सहाबा को इस तरह बहादुरी से लड़ते देखते, तो उनकी तारीफ़ करते हुए फ़रमाते: “ये ज़मीन पर अल्लाह तआला के शेर हैं।”
“या अल्लाह! तूने मुझसे जो वादा फ़रमाया है, उसे पूरा फ़रमा!… या अल्लाह! अगर तूने मुसलमानों की इस मुट्ठी भर जमाअत को हलाक कर दिया, तो फिर ज़मीन पर तेरी इबादत करने वाला कोई न रहेगा!…” हदीस शरीफ़
एक मौक़े पर नबी-ए-करीम के बिल्कुल पास लड़ रहे हज़रत उक्काशा की तलवार टूट गई। यह देखकर हमारे प्यारे नबी ने ज़मीन पर पड़ी एक लकड़ी उठाकर उनकी तरफ़ बढ़ाई और फ़रमाया: “ऐ उक्काशा! इससे लड़ो!…” उक्काशा ने जैसे ही लकड़ी ली, नबी-ए-करीम के मोजिज़े से वह लकड़ी एक लंबी, चमकदार, मज़बूत पुश्त वाली और तेज़ धार तलवार बन गई। उन्होंने जंग के आख़िर तक इस तलवार से बहुत-से मुशरिकों को क़त्ल किया।
सारे जहानों के सरदार रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) एक तरफ़ लड़ रहे थे और दूसरी तरफ़ अपने सहाबा में जोश भर देने वाली यह मुबारक हदीस शरीफ़ फ़रमा रहे थे: “उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसके क़ब्ज़ा-ए-क़ुदरत में मेरी जान है, आज जो लोग अल्लाह पाक की रज़ा की उम्मीद में सब्र और साबित-क़दमी के साथ लड़ेंगे और जो पीठ फेरे बग़ैर आगे बढ़ते हुए क़त्ल किए जाएँगे, हक़ तआला उन्हें ज़रूर अपनी जन्नत में दाख़िल फ़रमाएगा।” यह मुबारक बात सुनकर उमैर इब्ने हुमाम ने कहा: “क्या ख़ूब! क्या ख़ूब! तो जन्नत में दाख़िल होने के लिए मुझे शहीद होने के सिवा किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं!” और अपने हमले और तेज़ कर दिए। एक तरफ़ दुश्मन से लड़ते और दूसरी तरफ़ कहते जाते: “अल्लाह तआला के पास माद्दी तोशे से नहीं, बल्कि सिर्फ़ हक़ तआला के ख़ौफ़, आख़िरत के अमल और जिहाद में सब्र और साबित-क़दमी से जाया जाता है। इसके सिवा तमाम तोशे यक़ीनन ख़त्म हो जाते हैं, मिट जाते हैं!…” इस तरह वह शहीद होने तक लड़ते रहे।
लड़ाई बहुत भड़क उठी थी!… एक-एक सहाबी पर कम से कम तीन-तीन मुशरिक एक साथ टूट पड़ते थे। शान वाले सहाबा-ए-किराम उनमें से हर एक तक अलग-अलग तलवार पहुँचाने की कोशिश करते रहे; उन्हें कोई चीज़ डरा न सकी। जब भी वे “अल्लाहु अकबर! अल्लाहु अकबर!…” पुकारते, नए सिरे से ताक़त पाते और बार-बार हमला करने से न थकते। एक मौक़े पर मुशरिकों का हमला तेज़ हो गया और सहाबा-ए-किराम मुश्किल में पड़ गए। उस वक़्त रसूलुल्लाह हज़रत अबू बकर के साथ खजूर की टहनियों से बने अपने ख़ेमे में तशरीफ़ ले गए। हमारे नबी फिर अल्लाह तआला से मुनाजात करने लगे और गिड़गिड़ाकर अर्ज़ करने लगे: “या रब! तूने मुझसे जिस मदद का वादा फ़रमाया है, वह अता फ़रमा!…” उसी लम्हे वह्य आई, जिसमें मफ़हूमन फ़रमाया गया: “उस वक़्त तुम अपने रब से मदद और फ़तह माँग रहे थे, तो उसने तुम्हारी इस दरख़्वास्त का जवाब देते हुए फ़रमाया: ‘यक़ीनन मैं लगातार आने वाले एक हज़ार फ़रिश्तों से तुम्हारी मदद करूँगा’, और तुम्हारी दुआ क़बूल फ़रमाई।”18 नबी-ए-करीम फ़ौरन उठ खड़े हुए और फ़रमाया: “ख़ुशख़बरी हो, ऐ अबू बकर! तुम्हें अल्लाह तआला की मदद आ पहुँची! यह देखो, ये जिबराईल हैं। रेत के टीलों पर अपने घोड़े की लगाम थामे, हथियारों से लैस, हुक्म के मुंतज़िर हैं।” जैसा कि सूरह अनफ़ाल में बताया गया है, अल्लाह पाक ने फ़रिश्तों से मफ़हूमन फ़रमाया था: “याद करो जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों की तरफ़ वह्य भेजी: ’मैं तुम्हारे साथ हूँ (मुसलमानों को फ़तह और मदद देने में)। चलो, मोमिनों को (फ़तह की ख़ुशख़बरी से) सहारा दो, उन्हें ताक़त और क़ुव्वत दो। मैं अभी काफ़िरों के दिलों में दहशत और ख़ौफ़ डाल दूँगा। उनकी गर्दनों के ऊपर मारो, उनके हाथ-पाँव की उँगलियों के जोड़ों और गिरहों को तोड़ दो।’ यह इसलिए कि उन्होंने अल्लाह तआला और उसके रसूल की मुख़ालफ़त की। और जो अल्लाह तआला और उसके रसूल की मुख़ालफ़त करे (वह उसके अज़ाब में पड़ता है), तो अल्लाह तआला की सज़ा बहुत सख़्त है!”19
इस हुक्म के बाद जिबराईल, मीकाईल और इसराफ़ील (अलैहिमुस्सलाम) अपने साथ एक-एक हज़ार फ़रिश्ते लेकर तरतीब से हमारे प्यारे नबी के पास, आपके दाएँ और आपके बाएँ अपनी-अपनी जगह पर आ गए।20
जिबराईल अलैहिस्सलाम ने अपने सिर पर पीला अमामा बाँध रखा था। दूसरे फ़रिश्तों के सिरों पर सफ़ेद अमामे थे। उन्होंने अमामों के शिमले अपनी पीठ पर लटका रखे थे और सफ़ेद घोड़ों पर सवार थे। सरवर-ए-आलम ने अपने सहाबा से फ़रमाया: “फ़रिश्तों की अलामतें और निशान हैं। तुम भी अपने लिए अलामत और निशान बना लो!”
ज़ुबैर इब्ने अव्वाम ने अपने सिर पर पीला और अबू दुजाना ने लाल कपड़ा अमामे की तरह बाँध लिया। हज़रत अली ने सफ़ेद कलग़ी और हज़रत हमज़ा ने अपने सीने पर शुतुरमुर्ग़ का पर लगा लिया। फ़रिश्तों के जंग में दाख़िल होते ही हालत पल भर में बदल गई। सहाबा-ए-किराम अपने सामने वाले काफ़िर पर तलवार चलाने भी न पाते थे कि उसका सिर धड़ से अलग होकर ज़मीन पर आ गिरता। नबी-ए-करीम के दाएँ-बाएँ और आगे-पीछे अजनबी लोग मुशरिकों से लड़ते दिखाई दे रहे थे।
हज़रत सह्ल ने बयान किया: “बद्र के ग़ज़वे में जब हममें से कोई किसी मुशरिक के सिर पर तलवार चलाता, तो हम देखते थे कि तलवार निशाने तक पहुँचने से पहले ही उसका सिर धड़ से अलग होकर ज़मीन पर लुढ़क जाता!…”
अबू जहल का क़त्ल
मुशरिकों का झंडा उठाने वाला अबू अज़ीज़ इब्ने उमैर क़ैद कर लिया गया। उनका सिपहसालार अबू जहल क़ुरैश के लोगों की हिम्मत बढ़ाने के लिए लगातार शेर पढ़कर अपने लश्कर का हौसला बुलंद करने की कोशिश कर रहा था। वह एक नौजवान की तरह हमले करता, यह कहकर डींग मारता: “मेरी माँ ने मुझे इन्हीं दिनों के लिए जना था!…” और जवानों को उकसाता। मुशरिकों में से उबैदा इब्ने सईद ने सिर से पाँव तक ज़िरह पहन रखी थी। सिर्फ़ उसकी आँखें दिखाई देती थीं। वह घोड़े पर कभी इस तरफ़, कभी उस तरफ़ मुड़कर “मैं अबू ज़ातुल करिश हूँ! मैं अबू ज़ातुल करिश हूँ!”, यानी “मैं बड़े पेट वाला, पेट का बाप हूँ” कहकर अपने तौर पर ललकार रहा था। बहादुर मुजाहिद हज़रत ज़ुबैर इब्ने अव्वाम उसके क़रीब पहुँचे, अपना नेज़ा ठीक उसकी आँख पर ताका और “अल्लाहु अकबर!” कहकर दे मारा। निशाने पर लगे नेज़े ने उसे घोड़े से ज़मीन पर गिरा दिया। हज़रत ज़ुबैर दौड़कर उसके पास पहुँचे, तो उबैदा मर चुका था। उन्होंने अपना पाँव उसके गाल पर टिकाकर पूरी ताक़त से खींचा, तब भी नेज़ा मुश्किल से निकला; वह मुड़ गया था। बद्र की जंग में हज़रत ज़ुबैर ने बड़ी बहादुरी दिखाई। उनके जिस्म पर कोई जगह ज़ख़्म से ख़ाली न रही थी। उनके बेटे उरवा ने यह बात यूँ बयान की है: “मेरे वालिद को तलवार के तीन गहरे ज़ख़्म लगे थे। उनमें से एक गर्दन पर था। ज़ख़्म ने इतना गहरा निशान छोड़ा था कि मैं उसमें अपनी उँगली डाल सकता था।” अब्दुर रहमान इब्ने औफ़ भी क़ुरैश के लोगों से बेदरेग़ लड़ रहे थे और अपने ज़ख़्मों से बहते ख़ून की परवाह किए बग़ैर जो सामने आता, उसे गिरा देते थे। हज़रत अब्दुर रहमान ने अपनी आँखों देखा एक वाक़िआ यूँ बयान किया: “एक मौक़े पर मेरे सामने कोई न रहा। मैंने अपने दाएँ-बाएँ देखा, तो अन्सार के दो नौजवानों पर मेरी नज़र पड़ी। मैंने चाहा कि उनमें से जो ज़्यादा ताक़तवर और ज़्यादा वार करने वाला हो, उसके साथ रहूँ। इन दो नौजवानों में से एक ने मुझे ग़ौर से देखा, फिर मेरी तरफ़ मुड़कर पूछा: ‘चचा! क्या आप अबू जहल को पहचानते हैं?’ मैंने कहा: ‘हाँ, पहचानता हूँ।’ जब मैंने पूछा: ‘भतीजे, अबू जहल का क्या करोगे?’, तो उसने कहा: ‘मुझे ख़बर दी गई है कि वह रसूलुल्लाह को गालियाँ देता है। अल्लाह तआला की क़सम, अगर मैंने उसे एक बार देख लिया, तो जब तक उसे मार न डालूँ या ख़ुद न मर जाऊँ, उससे हरगिज़ जुदा नहीं होऊँगा।’ सच पूछो तो एक नौजवान की जोश में कही हुई इस दो-टूक और पक्के इरादे वाली बात पर मैं हैरान रह गया।
“ऐ अबू बकर! क्या तुम नहीं जानते कि तुम मेरे लिए मेरी देखने वाली आँख और सुनने वाले कान की जगह हो? मेरे पास से न जाओ! मेरे जिस्म और मेरे दिल पर आने वाली हर तकलीफ़ तुम्हारे मुबारक चेहरे को देखकर हल्की हो जाती है। तुमसे मेरे दिल को क़ुव्वत मिलती है” हदीस शरीफ़
इन दो नौजवानों में से दूसरे ने भी मुझे सिर से पाँव तक देखा और वही कहा जो पहले ने कहा था। उसी वक़्त मैंने अबू जहल को देख लिया! वह क़ुरैश के लश्कर में बिना रुके आगे-पीछे चक्कर लगा रहा था। मैंने कहा: ‘ऐ नौजवानो! वह जो इधर-उधर हड़बड़ी में दौड़ रहा है, वही अबू जहल है।’ यह सुनते ही उन्होंने फ़ौरन अपनी तलवारें सँभालीं और अबू जहल की तरफ़ चल पड़े।
वे उससे लड़ने लगे। ये नौजवान अफ़रा ख़ातून के बेटे, मुआज़ और मुअव्विज़ नाम के दो भाई थे।” उसी वक़्त सहाबा-ए-किराम के बहादुरों में से मुआज़ इब्ने अम्र को अबू जहल के क़रीब पहुँचने का मौक़ा मिल गया। उन्होंने लंबी दुम वाले घोड़े पर सवार अबू जहल पर हमला किया और पूरी ताक़त से उसकी टाँग पर तलवार मारी। अबू जहल की टाँग कटकर ज़मीन पर आ गिरी। उसी वक़्त इकरिमा, जो अभी मुसलमान नहीं हुआ था, अपने बाप की मदद को पहुँचा और हज़रत मुआज़ इब्ने अम्र से लड़ने लगा।
उसी लम्हे मुआज़ और मुअव्विज़ दोनों भाई शाहीन की तरह आगे झपटे। जो सामने आया, उसे गिराते हुए अबू जहल तक जा पहुँचे। अपनी तलवारों से उस पर तब तक वार करते रहे जब तक यह न समझ लिया कि वह मर गया।
उधर हज़रत मुआज़ इब्ने अम्र इकरिमा से लड़ते हुए हाथ और बाज़ू पर ज़ख़्मी हो गए थे। उनका मुबारक हाथ कलाई से कट गया था और बस खाल से लटका रह गया था। लड़ाई में पूरी तरह डूबे हुए मुआज़ इब्ने अम्र के पास इतना वक़्त न था कि अपने हाथ की फ़िक्र करें या इलाज के लिए उसे बाँधें। कटा हुआ हाथ खाल से लटककर झूल रहा था, फिर भी वह बहादुरी से लड़ते रहे।
अल्लाहु अकबर!… यह कैसा मज़बूत ईमान है!… यह कैसा देखने लायक़ मंज़र था!… हज़रत मुआज़ कुछ देर इसी तरह लड़ने के बाद महसूस करने लगे कि उनकी हरकत करने की ताक़त कम हो गई है। इसकी वजह उनका कटा हुआ हाथ था। उन्होंने फ़ौरन उसे अपने पाँव के नीचे दबाया और खींचकर अलग कर फेंका…21
इस्लाम के कट्टर दुश्मनों में से नौफ़ल इब्ने ख़ुवैलिद क़ुरैश के सबसे नामी पहलवानों में से था। वह लगातार चीख़ रहा था और मुशरिकों के रेवड़ को जोश दिलाने और भड़काने की कोशिश कर रहा था। उसकी यह हालत देखकर नबी-ए-करीम ने दुआ फ़रमाई थी: “या अल्लाह! नौफ़ल इब्ने ख़ुवैलिद के मुक़ाबले में मेरा मददगार बन। उसका काम तमाम कर दे।” अल्लाह तआला के शेर हज़रत अली ने मुशरिक नौफ़ल को देखते ही फ़ौरन उस पर धावा बोल दिया। उन्होंने ऐसी ताक़त से तलवार चलाई कि उसकी दोनों टाँगें, ज़िरहों से ढकी होने के बावजूद, एक साथ कट गईं। फिर उसकी गर्दन पर तलवार मारकर उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।22
उमय्या इब्ने ख़लफ़ मुशरिकों में सबसे कट्टर लोगों में से था; उसी ने बिलाल हब्शी को तपती रेत पर लिटाकर उनके सीने पर बड़े-बड़े पत्थर रखे थे। इस्लाम का यह बड़ा दुश्मन रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को तकलीफ़ पहुँचाने का कोई मौक़ा हाथ से न जाने देता था; बद्र की वादी में भी वह मुशरिकों को इकट्ठा करने और इस्लाम के नूर को बुझाने की कोशिश कर रहा था। उसकी यह हालत देखकर हज़रत बिलाल नंगी तलवार लिए उसके क़रीब पहुँचे, उसके सामने डटकर खड़े हो गए और यह कहते हुए उस पर टूट पड़े: “ऐ कुफ़्र के सरग़ना उमय्या इब्ने ख़लफ़!… अगर तू बच निकला, तो मैं न बचूँ!” साथ ही जैसे ही उन्होंने पुकारा: “ऐ अन्सारी भाइयो! जल्दी पहुँचो, कुफ़्र का सरग़ना यहाँ है!”, सहाबा-ए-किराम ने उमय्या को घेर लिया और फ़ौरन क़त्ल कर दिया।23
मुशरिकों के लश्कर में अब कोई सरदार न रहा था। उनमें से हर एक को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे; जिधर मुँह उठा, भागने की कोशिश कर रहा था। कुफ़्र का क़िला ढह चुका था। शान वाले सहाबा पीछा करते रहे। मुशरिकों का एक हिस्सा क़ैद कर लिया गया। क़ैदियों में हमारे प्यारे नबी के चचा अब्बास भी थे।24
फ़तह ईमान वालों की हुई
नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने शान वाले सहाबा से पूछा: “क्या किसी को नौफ़ल इब्ने ख़ुवैलिद के बारे में कुछ मालूम है?” हज़रत अली आगे बढ़े और कहा: “या रसूलल्लाह! उसे मैंने क़त्ल किया है।” इस ख़बर से बहुत ख़ुश होकर हमारे प्यारे नबी ने “अल्लाहु अकबर!” कहकर तकबीर कही और फ़रमाया: “अल्लाह तआला ने उसके बारे में मेरी दुआ क़बूल फ़रमा ली।”
जब आपको बताया गया कि उमय्या इब्ने ख़लफ़ मारा गया है, तो भी आप बहुत ख़ुश हुए और फ़रमाया: “अलहम्दुलिल्लाह! अल्लाह तआला का शुक्र है। मेरे रब ने अपने बंदे की तस्दीक़ फ़रमाई और अपने दीन को ग़ालिब कर दिया।”
रसूल-ए-अकरम ने अबू जहल के बारे में फ़रमाया: “न जाने अबू जहल ने क्या किया, उसका क्या हुआ; कौन जाकर देखता है?” और मक़तूलों के बीच उसे तलाश करने का हुक्म दिया। सहाबा ने तलाश किया, मगर वह न मिला। नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “तलाश करो, उसके बारे में मुझे एक बात मालूम है। अगर तुम उसे पहचान न सको, तो उसके घुटने पर ज़ख़्म का निशान देखो। एक दिन मैं और वह अब्दुल्लाह इब्ने जुदआन की दावत में थे। हम दोनों जवान थे। मैं उससे कुछ बड़ा था। भीड़ में मैंने उसे धक्का दिया। वह घुटनों के बल गिर पड़ा। उसका एक घुटना ज़ख़्मी हो गया और इस ज़ख़्म का निशान उसके घुटने से कभी नहीं मिटा।”
इस पर अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद अबू जहल को ढूँढने निकले। उन्होंने उसे ज़ख़्मी हालत में पाया और पहचान लिया और कहा: “अबू जहल, तू ही है?” फिर उसकी गर्दन पर अपना पाँव रखा, उसकी दाढ़ी पकड़कर खींची और कहा: “ऐ अल्लाह तआला के दुश्मन! आख़िरकार अल्लाह तआला ने तुझे ज़लील-ओ-ख़्वार कर दिया न?” अबू जहल ने कहा: “वह मुझे क्यों ज़लील-ओ-ख़्वार करेगा! ऐ भेड़ों के चरवाहे! अल्लाह तुझे ज़लील-ओ-ख़्वार करे। तू तो बड़ी ऊँची, दुश्वार चढ़ाई वाली जगह पर चढ़ बैठा है! तू मुझे यह बता कि आज फ़तह और ग़लबा किसकी तरफ़ है।” हज़रत इब्ने मसऊद ने कहा: “फ़तह अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ है।” फिर अबू जहल के सिर से ख़ोद उतारते हुए उन्होंने कहा: “ऐ अबू जहल! मैं तुझे क़त्ल करूँगा।” अबू जहल ने कहा: “तू अपनी क़ौम के सरदार को क़त्ल करने वालों में पहला नहीं है। लेकिन सच यह है कि तेरा मुझे क़त्ल करना मुझ पर बहुत भारी गुज़रेगा। कम से कम मेरी गर्दन सीने के क़रीब से काटना, ताकि मेरा सिर रोबदार दिखाई दे!” इस तरह उसने दिखा दिया कि उसका कुफ़्र, ग़ुरूर और तकब्बुर किस हद तक पहुँचा हुआ था।
इब्ने मसऊद अबू जहल का सिर अपनी तलवार से न काट सके, तो उन्होंने अबू जहल की तलवार से काटा। फिर उसके हथियार, ज़िरह, ख़ोद और सिर लाकर नबी-ए-करीम के सामने रख दिए और कहा: “मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह! यह अल्लाह तआला के दुश्मन अबू जहल का सिर है।” हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “वह अल्लाह है जिसके सिवा कोई इलाह नहीं।” फिर आप उठे और अपने सहाबा के साथ अबू जहल की लाश तक तशरीफ़ ले गए। वहाँ फ़रमाया: “अल्लाह तआला की हम्द हो, जिसने तुझे ज़लील-ओ-ख़्वार किया।
ऐ अल्लाह के दुश्मन! तू इस उम्मत का फ़िरऔन था।” फिर “या रब! तूने मुझसे किया हुआ अपना वादा पूरा फ़रमा दिया” कहकर अल्लाह तआला का शुक्र अदा किया। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ज़ख़्मी सहाबा-ए-किराम के ज़ख़्मों पर पट्टियाँ बँधवाईं। शहीद होने वालों की निशानदेही करवाई। मुहाजिरों में से छह और अन्सार में से आठ, कुल चौदह शहीद हुए थे। जब उन सबकी मुबारक रूहें जन्नत की तरफ़ परवाज़ कर रही थीं, तब इस्लाम के नूर को बुझाने की कोशिश करने वाले मुशरिकों में से सत्तर आदमी क़त्ल हुए और सत्तर क़ैद किए गए। रसूलुल्लाह ने फ़तह की ख़ुशख़बरी देने के लिए अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा और ज़ैद इब्ने हारिसा को मदीना भेजा। नबी-ए-करीम ने शहीदों की जनाज़े25 की नमाज़ पढ़ाई और उन्हें क़ब्रों में दफ़न करवाया। मुशरिकों की लाशों में से चौबीस को एक अंधे कुएँ में और बाक़ी को इकट्ठा गड्ढों में डालकर ऊपर से मिट्टी भर दी गई। सारे जहानों के सरदार अपने इज़्ज़त वाले सहाबा के साथ कुएँ के किनारे तशरीफ़ लाए और फ़रमाया: “ऐ कुएँ में डाले गए लोगो!” फिर मारे गए मुशरिकों के नाम उनके बापों के नामों के साथ गिनाते हुए फ़रमाया: “ऐ उत्बा इब्ने रबीआ! ऐ उमय्या इब्ने ख़लफ़! ऐ अबू जहल इब्ने हिशाम!… तुम अपने नबी के लिए कितनी बुरी क़ौम थे! तुमने मुझे झुठलाया, और दूसरों ने मेरी तस्दीक़ की, मुझे सच्चा माना। तुमने मुझे मेरे शहर, मेरे वतन से निकाल दिया, और दूसरों ने मेरे लिए अपने दरवाज़े खोले और मुझे सीने से लगाया। तुमने मुझसे जंग की, और दूसरों ने मेरी मदद की। क्या तुमने वह पा लिया जिसका तुम्हारे रब ने वादा किया था? मैंने तो वह फ़तह पा ली जिसका मेरे रब ने वादा फ़रमाया था।”
“(ऐ मेरे सहाबा!) फ़रिश्तों की अलामतें और निशान हैं। तुम भी अपने लिए अलामत और निशान बना लो!” हदीस शरीफ़
हज़रत उमर ने पूछा: “या रसूलल्लाह! क्या आप सड़ चुकी लाशों से बात कर रहे हैं?” इस पर रसूल-ए-अकरम ने फ़रमाया: “उस रब के वास्ते, जिसने मुझे सच्चा नबी बनाकर भेजा है, मैं कहता हूँ कि तुम मेरी बात उनसे ज़्यादा नहीं सुनते। लेकिन वे जवाब नहीं दे सकते।”
जंग के मैदान से अपनी जानें बचाने के लिए तेज़ी से भागते हुए मुशरिक अपने साथ लाई हुई कोई भी चीज़ न ले जा सके। सब कुछ मुसलमानों के हाथ आ गया। नबी-ए-करीम ने ग़नीमत का माल बद्र की जंग में शरीक होने वाले और ज़िम्मेदारियाँ पाने वाले अपने तमाम सहाबा में बाँट दिया। आप बद्र में तीन रात और ठहरे और उन्नीस दिन बाद मदीना वापस तशरीफ़ लाए। इसी दौरान ख़ुशख़बरी देने के लिए भेजे गए अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा और ज़ैद इब्ने हारिसा मदीना के क़रीब पहुँच चुके थे। इतवार के दिन चाश्त के वक़्त अक़ीक़ नाम की जगह पर पहुँचकर वे अलग-अलग हो गए। अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा एक तरफ़ से और ज़ैद इब्ने हारिसा दूसरी तरफ़ से मदीना में दाख़िल हुए। वे घर-घर जाकर फ़तह की ख़बर सुना रहे थे। रसूलुल्लाह के शायर अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा बुलंद आवाज़ से यह शेर पढ़कर फ़तह की ख़ुशख़बरी दे रहे थे:
ऐ अन्सार की जमाअत! तुम्हें देता हूँ ख़ुशख़बरी,
सही-सलामत हैं अल्लाह के नबी।
मुशरिक क़त्ल हुए, क़ैदी भी बनाए गए,
क़ैदियों में हैं बड़े-बड़े नामवर भी।
रबीआ और हज्जाज के बेटे सब के सब,
बद्र में मारे गए, और अबू जहल अम्र इब्ने हिशाम भी।
हज़रत आसिम इब्ने अदी ने पूछा: “ऐ इब्ने रवाहा! क्या तुम्हारी बात सच है?” अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा ने कहा: “हाँ, अल्लाह की क़सम, सच है! इंशाअल्लाह, कल रसूलुल्लाह भी हाथ बँधे क़ैदियों के साथ तशरीफ़ ले आएँगे!”
हज़रत रुक़य्या का इंतिक़ाल
उस दिन हमारे प्यारे नबी की बेटी हज़रत रुक़य्या (रज़ियल्लाहु अन्हा) का इंतिक़ाल हो गया था। उनके शौहर हज़रत उस्मान ने उनकी जनाज़े की नमाज़ पढ़ाई थी। इस ग़म के बाद आने वाली फ़तह की ख़बर ने उनके दिलों को कुछ हल्का कर दिया।
नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने सहाबा के साथ उस अल्लाह तआला की हम्द की जिसने आपको बद्र की फ़तह अता फ़रमाई, और शुक्र का सज्दा किया। फिर क़ैदियों के साथ मदीना मुनव्वरा की तरफ़ रवाना हुए।
पहले ख़ुशख़बरी पहुँचाने वाले अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा और ज़ैद इब्ने हारिसा बद्र के ग़ज़वे में पेश आए वाक़िआत और शहीद होने वालों के नाम बता चुके थे। मदीना में रह जाने वाले बच्चे, औरतें और ज़िम्मेदारियाँ पाने वाले फ़तह पर बहुत ख़ुश हुए। वे नबी-ए-करीम के इस्तिक़बाल के लिए निकले। शहीद होने वालों में हारिसा इब्ने सुराक़ा भी थे। हज़रत हारिसा की वालिदा रुबैअ को मालूम हो चुका था कि उनका बेटा हौज़ से पानी पीते हुए दुश्मन के एक तीर से शहीद हो गया। हमारी माँ हज़रत रुबैअ ने यह ख़बर सुनकर कहा था: “जब तक रसूल अलैहिस्सलाम तशरीफ़ न लाएँ, मैं अपने बेटे के लिए नहीं रोऊँगी। जब आप ख़ैरियत से मदीना तशरीफ़ लाएँगे, तो आपसे पूछूँगी। अगर मेरा बेटा जन्नत में है, तो बिल्कुल नहीं रोऊँगी। और अगर जहन्नम में है, तो अपनी आँखों से आँसुओं की जगह ख़ून बहाऊँगी।”
जब हमारे प्यारे नबी अपने मुबारक सहाबा-ए-किराम के साथ मदीना तशरीफ़ लाए, तो रुबैअ आपकी ख़िदमत में हाज़िर हुईं और कहा: “मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह! आप जानते हैं कि मुझे अपने बेटे हारिसा से कितनी मुहब्बत है। क्या वह शहीद होकर जन्नत में दाख़िल हो गया है? अगर ऐसा है, तो सब्र कर लूँ। और अगर ऐसा नहीं है, तो अपनी आँखों से ख़ून के आँसू बहाऊँ।” हबीब-ए-अकरम ने उन्हें यह ख़ुशख़बरी दी: “ऐ उम्मे हारिसा! तुम्हारा बेटा एक नहीं, कई जन्नतों में है। उसकी जगह फ़िरदौस है।” इस पर रुबैअ ने कहा: “अब मैं अपने बेटे के लिए नहीं रोऊँगी।” कायनात के सुल्तान ने एक बरतन में पानी मँगवाया। रहम फ़रमाते हुए अपना मुबारक हाथ पानी में डालकर निकाला। यह पानी हज़रत हारिसा की वालिदा और बहन को पिलाया। इसके अलावा यह पानी उनके सिरों और चेहरों पर भी मला। उस दिन के बाद रुबैअ और उनकी बेटी के चेहरे बहुत नूरानी हो गए। उनकी उम्रें भी बहुत लंबी हुईं। ख़्वाजा-ए-कायनात (अलैहि अफ़ज़लुस्सलवात) ने मदीना लाए गए सत्तर क़ैदियों को अपने सहाबा में बाँट दिया और उनके साथ अच्छा बर्ताव करने का हुक्म दिया। क़ैदियों के अंजाम के बारे में अल्लाह तआला की तरफ़ से अभी कोई वह्य नहीं आई थी। रसूलुल्लाह ने अपने सहाबा से मशवरा करने के बाद फ़ैसला फ़रमाया कि क़ैदियों को फ़िदया लेकर रिहा कर दिया जाए।
हर क़ैदी की माली हैसियत के मुताबिक़ फ़िदये की मिक़दार मुक़र्रर की गई। जिनके पास पैसा न था, उनमें से जो पढ़ना-लिखना जानते थे, उन्हें मदीना के ऐसे दस लोगों को पढ़ना-लिखना सिखाना था जो पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे; इसके बाद ही वे मक्का जा सकते थे। नबी-ए-करीम ने क़ैदियों में मौजूद अपने चचा अब्बास से फ़रमाया: “ऐ अब्बास! अपना, अपने भतीजे अक़ील इब्ने अबी तालिब का और नौफ़ल इब्ने हारिस का फ़िदया अदा करो, क्योंकि तुम मालदार हो।” हज़रत अब्बास ने कहा: “या रसूलल्लाह! मैं मुसलमान हूँ। क़ुरैश के लोग मुझे ज़बरदस्ती बद्र ले आए थे।” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “तुम्हारे मुसलमान होने को अल्लाह तआला जानता है। अगर तुम सच कहते हो, तो अल्लाह तआला तुम्हें इसका अज्र ज़रूर देगा। लेकिन ज़ाहिर में तुम हमारे ख़िलाफ़ हो। इसलिए तुम्हें अपना फ़िदया अदा करना होगा।” जब अब्बास ने कहा: “या रसूलल्लाह! आपने जो 800 दिरहम मुझसे ग़नीमत में लिए हैं, उनके सिवा मेरे पास कोई दौलत नहीं”, तो नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ऐ अब्बास! और उन सोने के सिक्कों के बारे में क्यों नहीं बताते?” उन्होंने पूछा: “कौन-से सोने के सिक्के?” हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “वही सोना जो तुमने मक्का से निकलने के दिन अपनी बीवी, हारिस की बेटी उम्मुल फ़ज़्ल को दिया था! जब तुमने वह दिया, तो तुम दोनों के सिवा वहाँ कोई न था। तुमने उम्मुल फ़ज़्ल को वह देते हुए कहा था: ‘मैं नहीं जानता कि इस सफ़र में मुझ पर क्या गुज़रेगी। अगर किसी मुसीबत में पड़कर मैं लौट न सका, तो इतना तुम्हारा है, इतना फ़ज़्ल के लिए, इतना अब्दुल्लाह के लिए, इतना उबैदुल्लाह के लिए और इतना क़ुसम के लिए।’” यह सुनकर हज़रत अब्बास हैरान रह गए और कहा: “मैं क़सम खाता हूँ कि जब मैंने यह सोना अपनी बीवी को दिया, तो हमारे पास कोई न था। आपको यह कहाँ से मालूम हुआ?” जब नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “अल्लाह तआला ने ख़बर दी”, तो अब्बास ने कहा: “मैं गवाही देता हूँ कि आप अल्लाह तआला के रसूल हैं और सच फ़रमाते हैं।” फिर उन्होंने कलिमा-ए-शहादत पढ़ लिया।26 हज़रत अब्बास के मुसलमान होने पर नबी-ए-करीम ने उन्हें मक्का में एक ज़िम्मेदारी सौंपी: वहाँ के मुसलमानों की हिफ़ाज़त करना और इस्लाम के दुश्मनों से मुताल्लिक़ ख़बरें भेजते रहना।
“उस रब के वास्ते, जिसने मुझे सच्चा नबी बनाकर भेजा है, मैं कहता हूँ कि तुम मेरी बात उनसे (मुशरिकों की लाशों से) ज़्यादा नहीं सुनते। लेकिन वे जवाब नहीं दे सकते” हदीस शरीफ़
बद्र के ग़ज़वे में शिकस्त खाने वाले क़ुरैश को ख़बर भेजी गई और बताया गया कि वे फ़िदया देकर अपने क़ैदियों को ले जा सकते हैं। लेकिन हिजरत से पहले नबियों के सरदार को बहुत-सी तकलीफ़ें और अज़ियतें देने वाले नज़्र इब्ने हारिस की गर्दन मार दी गई। इसी तरह कमीना उक़बा इब्ने अबी मुऐत भी क़त्ल किया गया, जिसने रसूल अलैहिस्सलाम के काबा के पास नमाज़ पढ़ते वक़्त आपकी मुबारक पीठ पर ऊँट की ओझड़ी डालने की बदबख़्ती दिखाई थी। इस्लाम के इस कट्टर दुश्मन का सिर धड़ से अलग हुआ, तो रसूलुल्लाह ने अल्लाह तआला की हम्द की। उसके पास जाकर फ़रमाया: “अल्लाह की क़सम, अल्लाह तआला, उसके रसूल और क़ुरआन-ए-करीम का इनकार करने वाला और उसके नबी को एक के बाद एक तकलीफ़ें देने वाला तुझ जैसा बुरा आदमी मैं किसी को नहीं जानता।”
क़ैदी तब तक सहाबा-ए-किराम (अलैहिमुर्रिज़वान) के पास रहे, जब तक उनके रिश्तेदार फ़िदया देकर उन्हें छुड़ा न ले गए। तमाम सहाबा ने क़ैदियों के साथ बहुत अच्छा बर्ताव किया और उन्हें अपने खाने में शरीक किया।
मुसअब इब्ने उमैर का भाई अबू अज़ीज़ क़ैदियों में था। उसने बयान किया: “मैं भी मदीना के एक मुसलमान के घर में क़ैदी था। वे मेरे साथ बहुत अच्छा सुलूक करते थे: सुबह-शाम खाने की अपनी रोटियाँ मुझे दे देते और ख़ुद सिर्फ़ खजूर खाने पर मजबूर हो जाते। उनमें से किसी के हाथ रोटी का एक टुकड़ा भी आ जाता, तो सीधे लाकर मुझे दे देता। मैं शर्मिंदगी से रोटी लाने वाले को वापस कर देता। लेकिन वह रोटी फिर मुझे लौटा देता।”
इसी तरह क़ैदियों में से यज़ीद नाम के एक क़ुरैशी ने यूँ बयान किया: “मुसलमान जब बद्र से मदीना आ रहे थे, तो हम क़ैदियों को उन्होंने जानवरों पर सवार कराया और ख़ुद पैदल चलते रहे।”
क़ैदियों में हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) की बहन के बेटे, नबी-ए-करीम के दामाद अबुल आस इब्ने रबी भी थे। अबुल आस मक्का के ताजिरों में से थे और उनके पास बहुत माल था। वह अपनी अमानतदारी और दियानतदारी के लिए मशहूर थे। मक्का से जब क़ैदियों का फ़िदया भेजा जा रहा था, तो हज़रत ज़ैनब ने फ़िदया पूरा करने के लिए वह हार भी भेज दिया था जो उनकी वालिदा ने उन्हें शादी में तोहफ़े के तौर पर दिया था। जब फ़िदये आए, तो नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हार पहचान लिया और फ़रमाया: “ऐ मेरे सहाबा, अगर तुम मुनासिब समझो, तो मेरी बेटी ज़ैनब का क़ैदी उसके फ़िदये समेत उसे लौटा दो।” सहाबा राज़ी हो गए। इस शर्त पर कि वह ज़ैनब को मदीना भेज देंगे, अबुल आस को अपने माल के साथ मक्का जाने की इजाज़त दे दी गई। अबुल आस ने ज़ैनब और उनके साथ वालों को अपने भाई किनाना के साथ रवाना किया। यह ख़बर सुनकर मुशरिक ग़ुस्से में आ गए और उन्होंने अपने कुछ आदमी उनके पीछे भेजे। उन्होंने ज़ी तुवा में उन्हें जा लिया। हब्बार इब्ने असवद ने अपना नेज़ा फेंका, तो ऊँट भड़क उठा और उसने हज़रत ज़ैनब को अपनी पीठ से ज़मीन पर गिरा दिया। किनाना ने अपने तीर सामने बिखेर दिए और कहा कि जो ज़ैनब पर हाथ उठाएगा, वह उसे तीर से हलाक कर देगा। वह ज़ैनब को मक्का से निकालकर मंज़िल तक पहुँचा आया। हज़रत ज़ैनब अपने ज़ख़्मों की वजह से बीमार हो गईं। वह हामिला थीं; मदीना पहुँचकर उनका हमल गिर गया। रसूल अलैहिस्सलाम ने यह सुना, तो बहुत ग़मगीन हुए।
बद्र में मुशरिकों की शिकस्त और जंग के मैदान से बदहाली में उनके भाग खड़े होने से मक्का में बड़ी हैरानी फैल गई। ऐसा नतीजा सामने आया था जिसकी उन्हें बिल्कुल उम्मीद न थी, बल्कि जो कभी उनके ख़याल में भी न आया था। सबसे पहले ख़बर लाने वाले की बातों पर अबू लहब और दूसरे मुशरिकों ने यक़ीन नहीं किया। जंग के मैदान से भागा हुआ अबू सुफ़यान जब मक्का पहुँचा, तो उन्होंने उसे फ़ौरन अपने पास बुलाया। अबू लहब ने उससे पूछा: “ऐ भतीजे! ज़रा बताओ तो, क्या हुआ?” अबू सुफ़यान वहाँ एक जगह बैठ गया। बहुत-से लोग खड़े होकर सुन रहे थे। अबू सुफ़यान ने यूँ बयान किया:
“कुछ न पूछो, मुसलमानों से सामना होते ही ऐसा लगा जैसे हमारे हाथ बँधे हुए हों। उन्होंने जैसा चाहा, वैसा किया: हममें से कुछ को क़त्ल किया और कुछ को क़ैद कर लिया। मैं क़सम खाता हूँ कि मैं अपने लोगों में से किसी को मलामत नहीं करता, किसी पर ऐब नहीं लगाता, क्योंकि उस वक़्त ज़मीन और आसमान के बीच चितकबरे घोड़ों पर सफ़ेद लिबास वाले लोगों से हमारा सामना हुआ। उनके सामने न कोई चीज़ टिक सकती थी, न कोई ठहर सकता था!”
वहाँ अब्बास के ग़ुलाम हज़रत अबू राफ़े भी मौजूद थे, जो इस्लाम के शुरू के दौर में ही मुसलमान हो चुके थे, मगर मुशरिकों के शर से डरकर अपने इस्लाम को ज़ाहिर नहीं करते थे। अबू राफ़े ख़ामोशी से उनकी बातें सुन रहे थे; ख़ुशी में वह सब कुछ भूल गए और अचानक बोल उठे: “अल्लाह की क़सम, वे फ़रिश्ते थे।”
अबू लहब ने उन्हें ज़ोर का थप्पड़ मारा और उठाकर ज़मीन पर पटक दिया। फिर उन्हें ख़ूब पीटा। इस पर वहाँ मौजूद हज़रत अब्बास की बीवी उम्मुल फ़ज़्ल से बर्दाश्त न हो सका, क्योंकि वह भी पहले ही मुसलमान हो चुकी थीं। उम्मुल फ़ज़्ल ने कमरे के खंभों में से एक उठाया और यह कहते हुए अबू लहब को ज़ोर से दे मारा: “इसका कोई नहीं है, इसलिए इसे कमज़ोर समझा न?” अबू लहब का सिर फट गया। वह ख़ून बहाता हुआ ज़लील, ख़्वार और रुसवा होकर लौट गया। सात दिन बाद अल्लाह तआला ने उसे “काला ख़सरा” कहलाने वाली एक बीमारी दे दी। वह इसी बीमारी से मर गया। उसके बेटों ने उसे दो या तीन रात दफ़न किए बग़ैर छोड़े रखा। आख़िर लाश सड़ने लगी। अबू लहब को जो बीमारी लगी थी, उससे हर कोई ऐसे भागता और घिन करता था जैसे ताऊन (प्लेग) से भागा जाता है। इस पर क़ुरैश में से एक आदमी ने अबू लहब के बेटों से कहा: “अफ़सोस है तुम पर, क्या तुम्हें शर्म नहीं आती? तुमने अपने बाप को सड़ने तक घर में छोड़े रखा। कम से कम उसे कहीं दफ़न करके ठिकाने लगा दो।” बेटों ने उस आदमी को जवाब दिया: “हम उसकी बीमारी से डरते हैं!” इस बार उस आदमी ने उनसे कहा: “तुम चलो, मैं भी आता हूँ, तुम्हारी मदद करूँगा।” फिर तीनों इकट्ठा हुए। लाश को उठाकर एक दूर-दराज़ जगह पर डाल आए। उस पर तब तक पत्थर फेंकते रहे जब तक वह पत्थरों के नीचे छिप न गई। इस तरह अबू लहब अपने उस ठिकाने में, अपनी अँधेरी क़ब्र में, जो जहन्नम का गड्ढा है, दाख़िल हो गया, जहाँ वह हमेशा अज़ाब और आग में रहेगा।
बद्र में क़ैद किए गए क़ुरैश के लोगों में वलीद इब्ने वलीद भी था। उसे अब्दुल्लाह इब्ने जह्श ने क़ैद किया था। वलीद के भाई हिशाम और ख़ालिद इब्ने वलीद, जो अभी मुसलमान नहीं हुआ था, मदीना आए। अब्दुल्लाह इब्ने जह्श उसे फ़िदये (छुटकारे की रक़म) के बग़ैर छोड़ना नहीं चाहते थे। ख़ालिद इस पर राज़ी हो गया, मगर उसके बाप-शरीक, माँ-जुदा भाई हिशाम ने इसे क़बूल न किया। रसूलुल्लाह ने पेशकश फ़रमाई कि उनके बाप के हथियार और साज़-ओ-सामान दे दिए जाएँ। इस पर हिशाम राज़ी हो गया, मगर ख़ालिद ने क़बूल न किया। आख़िरकार वे अपने बाप की सौ दीनार क़ीमत की तलवार, ज़िरह और ख़ोद के बदले में राज़ी हो गए। वलीद को क़ैद से छुड़ाकर वे मक्का की तरफ़ रवाना हुए। लेकिन वलीद मक्का के रास्ते में मदीना से चार मील के फ़ासले पर ज़ुल हुलैफ़ा में उनसे अलग होकर नबी-ए-करीम के पास आ गए, ईमान लाए और सहाबा-ए-किराम में शामिल हो गए। मुसलमान होने के कुछ अरसे बाद वह मक्का में अपने भाइयों के पास गए। तब ख़ालिद इब्ने वलीद ने पूछा: “अगर मुसलमान ही होना था, तो फ़िदया अदा होने से पहले हो जाते! तुमने हमारे बाप की यादगार हमारे हाथ से निकलवा दी। तुमने ऐसा क्यों किया?” वलीद ने जवाब दिया: “मुझे डर था कि क़ुरैश के लोग कहेंगे: ‘क़ैद बर्दाश्त न कर सका, इसलिए मुहम्मद अलैहिस्सलाम की पैरवी कर ली।’”
“ऐ अब्बास! तुम्हारे मुसलमान होने को अल्लाह तआला जानता है। अगर तुम सच कहते हो, तो अल्लाह तआला तुम्हें इसका अज्र ज़रूर देगा। लेकिन ज़ाहिर में तुम हमारे ख़िलाफ़ हो। इसलिए तुम्हें अपना फ़िदया अदा करना होगा” हदीस शरीफ़
इस जवाब पर उनके भाई बहुत ग़ुस्से में आ गए और उन्होंने उन्हें बनू मख़ज़ूम के कुछ मुसलमानों – अय्याश इब्ने अबी रबीआ और सलमा इब्ने हिशाम (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) – के साथ क़ैद कर दिया। वलीद इब्ने वलीद (रज़ियल्लाहु अन्हु) ईमान लाने की वजह से बरसों क़ैद में रहे। अपने चचा हिशाम के हाथों, जो इस्लाम के कट्टर दुश्मनों में से था, और अपने मुशरिक रिश्तेदारों के हाथों उन्होंने बहुत ज़ुल्म और तकलीफ़ें सहीं। रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने मुशरिकों के ज़ुल्म का निशाना बने अय्याश इब्ने अबी रबीआ, सलमा इब्ने हिशाम और वलीद के लिए यूँ दुआ फ़रमाई: “या अल्लाह! वलीद इब्ने वलीद को, सलमा इब्ने हिशाम को, अय्याश इब्ने रबीआ को और (काफ़िरों के हाथों में घुटकर) कमज़ोर (और बेबस) समझे जाने वाले दूसरे मोमिनों को नजात दे। या अल्लाह, मुज़र को (क़ुरैश को) और ज़्यादा सख़्ती से (बहुत सख़्ती से) रौंद दे। इन सालों को (उनके लिए) यूसुफ़ के सालों जैसा बना दे।”
रसूलुल्लाह की दुआ की बरकत से हज़रत वलीद एक मौक़ा पाकर जहाँ उन्हें बाँधकर रखा गया था, वहाँ से भाग निकले। वह मदीना मुनव्वरा आकर हमारे प्यारे नबी से जा मिले। हबीबुल्लाह ने अय्याश इब्ने रबीआ और सलमा इब्ने हिशाम का हाल पूछा, तो वलीद ने बताया कि उनके पाँव एक-दूसरे से बँधे हुए हैं और वे सख़्त अज़ियतों और तकलीफ़ों में तड़प रहे हैं।
कायनात के सुल्तान उनके हाल पर बहुत ग़मगीन हुए और उन्हें छुड़ाने की तदबीरें सोचने लगे। जब आपने पूछा कि उन्हें कौन छुड़ा सकता है, तो बरसों तकलीफ़ों में रहने के बावजूद वलीद ने बड़ी हिम्मत और इश्क़ के साथ जवाब दिया: “या रसूलल्लाह! उन्हें मैं छुड़ाऊँगा, आपके पास ले आऊँगा।” वह फिर मक्का गए और एक औरत का पीछा करके, जो उन्हें खाना पहुँचाती थी, तकलीफ़ें झेल रहे इन मुसलमानों की जगह मालूम कर ली। दोनों एक बिना छत की इमारत में क़ैद थे। वलीद रात के वक़्त मौत को भी ख़ातिर में न लाते हुए बड़ी हिम्मत से दीवार से उतरे और अपने साथियों तक जा पहुँचे। ईमान लाने के सिवा जिनका कोई क़ुसूर न था, उन दोनों मज़लूमों को मुशरिकों ने एक पत्थर से बाँधकर अरब के रेगिस्तान की झुलसा देने वाली गर्मी में तरह-तरह के ज़ुल्म का निशाना बना रखा था। वलीद ने अपने इन मुबारक दीनी भाइयों को छुड़ाकर अपने ऊँट पर सवार किया और ख़ुद पैदल, नंगे पाँव, मदीना मुनव्वरा की तरफ़ – अपने बेहद प्यारे रसूलुल्लाह के पास जल्द से जल्द पहुँचने के लिए – चल पड़े। उन्हें रेगिस्तान की झुलसा देने वाली गर्मी नहीं, बल्कि सारे जहानों के सरदार से मिलने का इश्क़ जला रहा था।
भूखे, प्यासे, नंगे पाँव वह तीन दिन में मदीना पहुँचे। पत्थरों की वजह से उनकी उँगलियाँ चिथड़े-चिथड़े हो चुकी थीं। वलीद इब्ने वलीद ख़ून में लथपथ हालत में अपने बेहद प्यारे हबीबुल्लाह से जा मिले।
बद्र की फ़तह ने मुसलमानों को बड़ी ख़ुशी में डुबो दिया, और मुशरिक बड़े ग़म और नाउम्मीदी में पड़ गए। हब्शा के बादशाह नज्जाशी ने भी जब रसूलुल्लाह की फ़तह की ख़बर सुनी, तो फ़ौरन अपने मुल्क में मौजूद सहाबा-ए-किराम के पास जाकर यह ख़ुशख़बरी दी: “अल्लाह तआला की हम्द हो, जिसने अपने रसूल को बद्र में कामयाब करके फ़तह अता फ़रमाई।”
बद्र के ग़ज़वे के बाद के वाक़िआत
हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मदीना में यहूदियों से भी, अब्दुल्लाह इब्ने उबई जैसे मुसलमान दिखाई देने वाले मुनाफ़िक़ों से भी और मुशरिकों से भी मुक़ाबला कर रहे थे। इसके अलावा आप मदीना से बाहर के मुशरिक क़बीलों को इस्लाम की दावत दे रहे थे और कोशिश कर रहे थे कि वे मुसलमान होने के शरफ़ से मुशर्रफ़ हों। क़रक़रा, बनू क़ैनुक़ा, सवीक़, ग़तफ़ान, बहरान… जैसे तमाम ग़ज़वे बद्र के ग़ज़वे के बाद हुए।
हिजरत के दूसरे साल में पेश आने वाले कुछ वाक़िआत
इस साल ज़कात के फ़र्ज़ होने, सदक़ा-ए-फ़ित्र देने, ईद की नमाज़ें पढ़ने और क़ुरबानी करने का हुक्म आया। रसूलुल्लाह ने अपनी बेटी उम्मे कुलसूम का निकाह हज़रत उस्मान से कर दिया। नबी-ए-करीम ने हज़रत उमर की बेटी हफ़्सा और ज़ैनब बिन्ते ख़ुज़ैमा (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से निकाह फ़रमाया। हज़रत अली के बेटे हज़रत हसन पैदा हुए।
हज़रत आइशा से निकाह
नबी-ए-करीम की हज़रत आइशा से मक्का ही में मंगनी हो चुकी थी, मगर अभी रुख़सती नहीं हुई थी। एक दिन हज़रत अबू बकर ने सरवर-ए-आलम से पूछा: “या रसूलल्लाह! आपको अपनी अहलिया को घर लाने से कौन-सी चीज़ रोक रही है?” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “महर।” इस पर हज़रत अबू बकर ने रसूलुल्लाह के पास महर की रक़म भेज दी।27
इसके बाद हमारी माँ हज़रत आइशा की रुख़सती हुई। उस वक़्त नबी-ए-करीम की उम्र पचपन साल थी।28 हज़रत आइशा बहुत ज़हीन और क़ाबिल थीं और वाक़िआत को उसी वक़्त शेर की शक्ल में कह सकती थीं। जो कुछ सीखतीं और याद करतीं, उसे कभी न भूलती थीं। वह बहुत अक़्लमंद, ज़हीन, आलिमा, अदीबा, पाकदामन और नेक थीं। उनका हाफ़िज़ा बहुत मज़बूत था, इसलिए सहाबा-ए-किराम बहुत-सी बातें उनसे पूछकर सीखते थे। आयत-ए-करीमा में उनकी तारीफ़ की गई है।
क़रक़रतुल कुद्र का ग़ज़वा
ख़बर आई कि बनू सुलैम और ग़तफ़ान के एक गिरोह ने क़रक़रा में इकट्ठा होना शुरू कर दिया है। इस पर नबी-ए-करीम मुहाजिरों और अन्सार में से दो सौ आदमियों के साथ मदीना से रवाना हुए। मदीना में हज़रत इब्ने उम्मे मकतूम को नायब बनाकर छोड़ा गया था। सफ़ेद झंडा हज़रत अली उठाए हुए थे। मुसलमान उस जगह पहुँचे, मगर किसी को न पाया: इस्लामी लश्कर के आने की ख़बर सुनकर मुशरिक वह जगह छोड़कर जा चुके थे। वादी में आगे बढ़ते हुए उन्हें एक ऊँट वाला मिला। उन्होंने उससे पूछा कि बनू सुलैम और ग़तफ़ान के लोग कहाँ हैं। ऊँट वाले ने कहा: “उन्होंने मुझे अपने जानवरों की देखभाल के लिए पाँच दिन के लिए रखा था। अब मैं नहीं जानता कि वे कहाँ हैं।” पाँच सौ ऊँट ग़नीमत में हाथ आए। चरवाहा यसार भी क़ैद कर लिया गया। क़रक़रतुल कुद्र की वादी में तीन रातें ठहरने के बाद वे ऊँटों को हाँकते हुए मदीना की तरफ़ रवाना हुए। नबी-ए-करीम ने ज़िरार नाम की जगह पर ऊँटों का पाँचवाँ हिस्सा अलग करके बाक़ी बाँट दिए। हर एक के हिस्से में दो-दो ऊँट आए। अगले दिन फ़ज्र की नमाज़ पढ़ते हुए उन्होंने देखा कि यसार नाम का यह ऊँट वाला उनके साथ नमाज़ पढ़ रहा है। इस पर नबी-ए-करीम ने उस ग़ुलाम को आज़ाद कर दिया। फिर वे सलामती के साथ मदीना लौट आए।
“अल्लाह की क़सम, अल्लाह तआला, उसके रसूल और क़ुरआन-ए-करीम का इनकार करने वाला और उसके नबी को एक के बाद एक तकलीफ़ें देने वाला (उक़बा इब्ने अबी मुऐत) तुझ जैसा बुरा आदमी मैं किसी को नहीं जानता” हदीस शरीफ़
बेहद शौक़ की आग में जो जान भी जले, वह नूर बन जाती है,
इश्क़ के दर्द से जो दिल वीरान हो, वह आबाद हो जाता है।
बनू क़ैनुक़ा का ग़ज़वा
एक दिन बनू क़ैनुक़ा के यहूदियों ने एक मुसलमान ख़ातून का मज़ाक़ उड़ाना चाहा। सहाबा में से एक ने यह देखा, तो फ़ौरन अपनी तलवार खींचकर उस यहूदी को क़त्ल कर दिया। यहूदियों ने इकट्ठा होकर उस मुबारक सहाबी को शहीद कर दिया। इस वाक़िए की ख़बर नबी-ए-करीम को दी गई। रसूल-ए-अकरम ने उन्हें क़ैनुक़ा के बाज़ार में जमा किया और फ़रमाया: “ऐ यहूदियों के गिरोह! अल्लाह तआला ने क़ुरैश को जैसा अज़ाब दिया, वैसे अज़ाब में पकड़े जाने से डरो और मुसलमान हो जाओ। तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं अल्लाह तआला का भेजा हुआ नबी हूँ। यह बात भी और तुमसे अल्लाह तआला का अहद भी तुम अपनी किताब में पढ़ चुके हो…”
“अल्लाह तआला की हम्द हो, जिसने अपने रसूल को बद्र में कामयाब करके फ़तह अता फ़रमाई” नज्जाशी असहमा (रहमतुल्लाहि अलैहि)
बनू क़ैनुक़ा का ग़ज़वा
इस रहमत के बावजूद यहूदियों ने, जिन्होंने ख़ुद मुआहदा किया था, सारे जहानों के सुल्तान को यह कहकर ललकारा: “ऐ मुहम्मद! जंग करना न जानने वाली एक क़ौम को हरा देना तुम्हें धोखे में न डाले! हम क़सम खाते हैं कि हम जंगजू लोग हैं! जब तुम हमसे लड़ना शुरू करोगे, तभी समझोगे कि हम कैसे बहादुर हैं!…” इस तरह उन्होंने पहले मुआहदे को तोड़कर खुलेआम ललकारने का एलान कर दिया। इस पर जिबराईल अलैहिस्सलाम वह्य लाए, जिसमें मफ़हूमन फ़रमाया गया था: “(ऐ मेरे हबीब!) अगर तुम्हें (तुमसे) मुआहदा करने वाली किसी क़ौम की ख़यानत का (मुआहदे के ख़िलाफ़ अमल का) अंदेशा हो, तो (जंग छेड़ने से पहले) हक़ और इंसाफ़ के साथ सीधे उन्हें बता दो कि तुमने उनका अहद रद्द कर दिया है। क्योंकि अल्लाह तआला ख़यानत करने वालों को पसंद नहीं करता।”29
एक और आयत-ए-करीमा में मफ़हूमन फ़रमाया गया: “ऐ मेरे रसूल! उन काफ़िर यहूदियों से कह दो: तुम ज़रूर मग़लूब होगे और इकट्ठे करके जहन्नम की तरफ़ हाँके जाओगे, और वह जहन्नम रहने की कितनी बुरी जगह है!”30
हबीब-ए-अकरम फ़ौरन, शव्वाल के महीने के बीच में, शनिवार के दिन लश्कर तैयार करके उस क़िले की तरफ़ बढ़े जहाँ क़ैनुक़ा के यहूदी रहते थे। सफ़ेद झंडा हज़रत हमज़ा उठाए हुए थे, और मदीना में अबू लुबाबा को नायब बनाकर छोड़ा गया था।31
मुबारक लश्कर ने क़ैनुक़ा के क़िले का मुहासरा कर लिया। “हम कैसे जंगजू बहादुर हैं!…” कहने वाले यहूदी मुक़ाबला तो दूर, अपने क़िले से एक तीर चलाने की भी हिम्मत न कर सके। रसूलुल्लाह ने आने-जाने के रास्तों को अपनी निगरानी में ले लिया। कोई बाहर न निकल सका। यह हालत पंद्रह दिन तक रही।32
यहूदी डर के मारे हथियार डालकर ताबे हो गए। हालाँकि उनमें से हर एक क़त्ल का मुस्तहिक़ था, मगर सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजे गए हमारे प्यारे नबी ने रहम फ़रमाकर क़ैनुक़ा के यहूदियों को शाम (सीरिया) चले जाने की इजाज़त दे दी। उनमें से किसी को भी उन इलाक़ों में रहने की इजाज़त न दी गई। इस तरह वे मदीना की सरज़मीन से निकाल दिए गए।33 बनू क़ैनुक़ा अपने इलाक़े से कूच कर गए। उनका माल और हथियार मुसलमानों के लिए ग़नीमत बन गए।
सवीक़ का ग़ज़वा
अबू सुफ़यान बद्र की जंग से भागकर जब मक्का पहुँचा, तो उसने यह मन्नत मानी कि जब तक मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से बदला न ले लूँ, “न सिर पर तेल लगाऊँगा और न अपनी बीवियों के पास जाऊँगा।” अपनी मन्नत पूरी करने के लिए वह हिजरत के दूसरे साल, ज़िलहिज्जा महीने की पाँचवीं तारीख़ को इतवार के दिन दो सौ घुड़सवारों के साथ मदीना की तरफ़ रवाना हुआ। एक रात वह मदीना में किसी के घर जाकर नबी-ए-करीम के बारे में पूछताछ करने लगा। उस आदमी ने उसे कोई तवज्जोह न दी।
उसने अपना दरवाज़ा तक न खोला। अबू सुफ़यान वहाँ से हटकर सलाम इब्ने मिशकम के यहाँ मेहमान बना। अगले दिन वहाँ से चलकर अरीज़ नाम के इलाक़े में आया। वहाँ उसे अन्सार में से मअबद इब्ने अमरूश और उनका ख़िदमतगार मिले, और उसने उन्हें उनके काम के दौरान ही शहीद कर दिया। खजूरों के एक बाग़ में आग लगा दी और “मेरी क़सम पूरी हो गई” कहकर वहाँ से चला गया।
जब इस वाक़िए की ख़बर नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को दी गई, तो आपने मदीना में अबू लुबाबा को नायब बनाया और दो सौ आदमियों के साथ अबू सुफ़यान के पीछे निकले।
“तुम ज़रूर मग़लूब होगे और इकट्ठे करके जहन्नम की तरफ़ हाँके जाओगे, और वह जहन्नम रहने की कितनी बुरी जगह है!” आले इमरान: 12
मुशरिक यह सुनकर भागने लगे। बच निकलने के लिए वे अपना सामान और “सवीक़” कहलाने वाला एक क़िस्म का अनाज, पकाने के लिए लाई गई देगचियों समेत वहीं छोड़कर भाग गए। मुसलमानों ने ये चीज़ें पाकर ग़नीमत के तौर पर ले लीं। इसीलिए इस ग़ज़वे को सवीक़ का ग़ज़वा कहा जाता है।
हज़रत अली और हज़रत फ़ातिमा का निकाह
हिजरत का दूसरा साल था। फ़ख़्र-ए-कायनात (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की बेटी हज़रत फ़ातिमा पंद्रह साल की हो चुकी थीं।
एक दिन हज़रत फ़ातिमा किसी काम से रसूल-ए-अकरम की ख़िदमत में हाज़िर हुई थीं। रसूलुल्लाह ने देखा कि आपकी बेटी शादी की उम्र को पहुँच चुकी हैं। उस दिन के बाद बहुत-से लोगों ने हमारी माँ हज़रत फ़ातिमतुज़ ज़हरा का रिश्ता माँगा। रसूल अलैहिस्सलाम ने उनकी तरफ़ तवज्जोह नहीं फ़रमाई और फ़रमाया: “उनका मामला हक़ तआला के हुक्म पर मौक़ूफ़ है।”
एक दिन अबू बकर, उमर और साद इब्ने मुआज़ मस्जिद में बैठे आपस में बात कर रहे थे: “हज़रत अली के सिवा हर किसी ने हज़रत फ़ातिमा का रिश्ता माँगा। किसी की बात क़बूल नहीं की गई।” हज़रत सिद्दीक़ ने कहा: “मेरा ख़याल है कि वह अली के नसीब में होंगी। चलो, उनके पास चलें और यह बात छेड़ें। अगर वह अपनी ग़रीबी का उज़्र पेश करें, तो हम मदद करेंगे।” साद ने कहा: “ऐ अबू बकर! तुम हमेशा भलाई ही करते हो। उठो, हम भी तुम्हारे साथ चलते हैं।” तीनों मस्जिद से निकले और हज़रत अली से मिलने चल पड़े। हज़रत अली अपना ऊँट लेकर अन्सार में से एक शख़्स के खजूर के बाग़ को पानी देने गए हुए थे। उन्हें देखकर हज़रत अली ने उनका इस्तिक़बाल किया और उनकी ख़ैर-ख़ैरियत पूछी। हज़रत अबू बकर ने पूछा: “ऐ अली! हर नेक काम में तुम आगे रहने वाले हो और रसूल-ए-अकरम के यहाँ ऐसे मर्तबे पर हो जो किसी को नसीब नहीं हुआ। हर किसी ने हज़रत फ़ातिमा का रिश्ता माँगा। किसी की बात क़बूल नहीं की गई। हमारा ख़याल है कि वह तुम्हारे नसीब में हैं। तुम कोशिश क्यों नहीं करते?”
यह सुनकर हज़रत अली की मुबारक आँखें आँसुओं से भर आईं और उन्होंने कहा: “ऐ अबू बकर! तुमने मेरे दिल में आग लगा दी। मुझसे ज़्यादा उनकी चाहत रखने वाला कोई नहीं। लेकिन मेरी तंगदस्ती इसमें रुकावट है।” हज़रत अबू बकर ने कहा: “ऐसा न कहो। अल्लाह तआला और उसके रसूल के नज़दीक दुनिया कोई चीज़ नहीं। ग़रीबी इसमें रुकावट नहीं बन सकती। जाओ, रिश्ता माँगो।”
हज़रत अली बयान फ़रमाते हैं: “मैं शर्माता और झिझकता हुआ रसूलुल्लाह की ख़िदमत में हाज़िर हुआ। रसूलुल्लाह पर आपकी पूरी हैबत और वक़ार छाया हुआ था। मैं आपके सामने बैठ गया, मगर बात न कर सका। रसूलुल्लाह ने पूछा: ‘क्यों आए हो, कोई ज़रूरत है?’ मैं चुप रहा। जब आपने फ़रमाया: ‘शायद फ़ातिमा का रिश्ता माँगने आए हो’, तो मैं बस इतना कह सका: ‘जी हाँ।’ (नबी-ए-करीम ने हज़रत फ़ातिमा को बताया कि हज़रत अली ने उनका रिश्ता माँगा है। वह भी ख़ामोश रहीं।) नबी-ए-करीम ने पूछा: ‘फ़ातिमा को महर में देने के लिए तुम्हारे पास क्या है?’ मैंने कहा: ‘या रसूलल्लाह, मेरे पास उन्हें देने के लायक़ कोई चीज़ नहीं।’”
आपने फिर पूछा: “मैंने तुम्हें जो हुतमी ज़िरह दी थी, वह कहाँ है, उसका क्या हुआ?” जब उन्होंने कहा: “वह मेरे पास है”, तो आपने फ़रमाया: “उसे बेच दो और उसकी क़ीमत मेरे पास ले आओ। महर के लिए वही काफ़ी है।”34 एक दूसरी रिवायत में है कि जब रसूलुल्लाह ने हज़रत अली से पूछा: “तुम्हारे पास क्या है?”, तो उन्होंने जवाब दिया: “मेरा घोड़ा और मेरी ज़िरह है”, और रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “घोड़ा तुम्हारे काम आएगा, मगर अपनी ज़िरह बेच दो।” एक और रिवायत में आपने फ़रमाया: “ऐ अली, जाओ, अपने लिए एक घर किराए पर ले लो।”
हज़रत अली शादी होने तक नबी-ए-करीम के साथ रहते थे। नबी-ए-करीम के हुक्म पर उन्होंने मस्जिद-ए-नबवी के क़रीब, हज़रत आइशा के हुजरे के सामने वाला हारिसा इब्ने नोमान का घर किराए पर ले लिया। अपनी ज़िरह बाज़ार भेज दी। हज़रत उस्मान (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) बाज़ार में घूम रहे थे कि उन्होंने हज़रत अली की ज़िरह पहचान ली। दलाल को बुलाकर पूछा: “इस ज़िरह का मालिक कितनी क़ीमत माँगता है?” दलाल ने कहा: “चार सौ दिरहम माँगता है।” उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने फ़रमाया: “आओ, अपनी रक़म ले लो।” फिर वह अपने मुबारक घर तशरीफ़ ले गए। ज़िरह दलाल से लेकर उसकी क़ीमत अदा कर दी और फ़रमाया: “यह ज़िरह उनके सिवा किसी के लायक़ नहीं। यह रक़म भी वह शादी पर ख़र्च करें। और हमारी माज़िरत भी क़बूल फ़रमाएँ।” फिर चार सौ दिरहम और उनके साथ ज़िरह भी तोहफ़े के तौर पर हज़रत अली के पास भेज दी। जब हज़रत अली ज़िरह और दिरहम लेकर नबी-ए-करीम के पास आए, तो नबी-ए-करीम ने हज़रत उस्मान के लिए बहुत ख़ैर की दुआ फ़रमाई और फ़रमाया: “उस्मान जन्नत में मेरे रफ़ीक़ हैं।” फिर बिलाल हब्शी को बुलाया और रक़म का एक हिस्सा देकर हुक्म फ़रमाया: “यह रक़म लो और बाज़ार जाओ! थोड़ा गुलाब जल और बाक़ी रक़म से शहद ले आओ और मस्जिद के एक कोने में एक साफ़ बरतन में पानी के साथ घोल लो। शहद का शरबत बना लो, ताकि निकाह होने के बाद हम पिएँ। अन्सार और मुहाजिरों में से मेरे जो सहाबा यहाँ मौजूद हैं, उन्हें मस्जिद में बुलाओ और लोगों में एलान कर दो कि फ़ातिमा और अली का निकाह होने वाला है।”
बिलाल हब्शी ने बाहर निकलकर लोगों में एलान कर दिया कि हज़रत अली और हज़रत फ़ातिमा का निकाह होने वाला है। सहाबा-ए-किराम मस्जिद-ए-नबवी में आ गए और उसे अंदर-बाहर से भर दिया। तब नबी-ए-करीम खड़े हुए और यह ख़ुत्बा पढ़ा: “तमाम हम्द और शुक्र सारे जहानों के रब के लिए ख़ास है। वह अपनी दी हुई नेमतों की वजह से सराहा जाता है, अपनी बेहद क़ुदरत और ताक़त की वजह से उसकी इबादत की जाती है, उसके अज़ाब और हिसाब से डरा जाता है, उसका हुक्म और फ़रमान ज़मीन और आसमानों में जारी है। उसी ने मख़लूक़ात को अपनी क़ुदरत से पैदा किया, अपने इंसाफ़ वाले फ़ैसलों से उन्हें एक-दूसरे से अलग किया, और इंसानों को (इस्लाम के) दीन और नबी मुहम्मद (अलैहिस्सलाम) से इज़्ज़त बख़्शी… अल्लाह तआला ने मुझे हुक्म दिया है कि अपनी बेटी फ़ातिमा का निकाह अली इब्ने अबी तालिब से कर दूँ। अब मैं तुम्हें गवाह बनाता हूँ कि मैंने (अल्लाह तआला के हुक्म से) चाँदी के 400 मिस्क़ाल महर पर फ़ातिमा का निकाह अली इब्ने अबी तालिब से कर दिया। मेरा रब इन दोनों को एक साथ जोड़े रखे और इसे इनके लिए मुबारक बनाए। इनकी नस्ल को पाक, रहमत की कुंजी, हिकमत की खान और उम्मत-ए-मुहम्मद के लिए अमन बनाए।
मुझे इतना ही कहना है। मैं अपने रब से अपने लिए और तुम्हारे लिए मग़फ़िरत माँगता हूँ।”
इसके बाद हज़रत अली खड़े हुए और यह मुख़्तसर ख़ुत्बा पढ़ा: “… मैं उन मुहम्मद अलैहिस्सलाम पर दुरूद और सलाम भेजता हूँ जिनकी ख़िदमत में हम मौजूद हैं, जिन्होंने अपनी मुबारक बेटी फ़ातिमा का निकाह चाँदी के 400 मिस्क़ाल महर पर मुझसे कर दिया है। ऐ मेरे दीनी भाइयो! बेशक तुमने नबी-ए-करीम का फ़रमान सुना और गवाह बने। मैं भी इस पर गवाह हूँ और राज़ी हूँ। मैं इसे ज्यों का त्यों क़बूल करता हूँ। अल्लाह तआला हम सबकी बातों पर गवाह है और हम सबका कारसाज़ है।”35
“उस्मान जन्नत में मेरे रफ़ीक़ हैं” हदीस शरीफ़
निकाह मुकम्मल होने के बाद नबी-ए-करीम ने ताज़ा खजूरें मँगवाईं और फ़रमाया: “आओ, ये खजूरें लो और खाओ।” सबने लेकर खाईं। फिर हज़रत बिलाल ने शहद का शरबत बाँटा, वह भी पिया गया, और तमाम सहाबा ने यह दुआ की: “बारकल्लाहु फ़ीकुमा व अलैकुमा व जमआ शमलकुमा।” निकाह के वक़्त फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अन्हा) की उम्र पंद्रह और अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) की उम्र पच्चीस साल थी।
निकाह के बाद हज़रत फ़ातिमा रो रही थीं। नबी-ए-करीम उनके पास तशरीफ़ लाए और फ़रमाया: “ऐ फ़ातिमा! तुम्हें क्या हुआ, क्यों रो रही हो? अल्लाह तआला की क़सम, मैंने तुम्हारा निकाह रिश्ता माँगने वालों में सबसे बड़े आलिम, हिल्म और अक़्लमंदी में सबसे बुलंद और सबसे पहले मुसलमान होने वाले से किया है।” हज़रत फ़ातिमा ने कहा: “अब्बा जान! शादी करने वाली हर लड़की का महर सोने और चाँदी से तय और मुक़र्रर किया जाता है। अगर मेरा महर भी इसी तरह तय हो, तो आपमें और दूसरों में क्या फ़र्क़ रहेगा? क़यामत के दिन आप गुनहगार मोमिनों में से जितने लोगों की शफ़ाअत फ़रमाएँगे, मैं भी उनकी बीवियों की शफ़ाअत करना चाहती हूँ। मेरी मुराद यही है।”
जब अल्लाह तआला ने बता दिया कि हज़रत फ़ातिमा की यह ख़्वाहिश क़बूल कर ली गई है, तो रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “ऐ फ़ातिमा, तुमने दिखा दिया कि तुम नबी की औलाद हो!”
हज़रत अली ने फ़रमाया: “इन बातों को कुछ महीने गुज़र गए। इस बारे में मजलिस में कोई बात न हुई। मैं भी हिजाब, यानी शर्म की वजह से मुँह न खोल सका। लेकिन रसूलुल्लाह कभी-कभी मुझे तन्हाई में देखते, तो फ़रमाते: ‘तुम्हारी बीवी कितनी अच्छी बीवी है! तुम्हें ख़ुशख़बरी हो कि वह सारे आलम की औरतों की सरदार है।’”
उन्हीं दिनों हज़रत अली के भाई हज़रत अक़ील ने कहा: “ऐ अली! इस निकाह से हम ख़ुश हुए। लेकिन मेरी ख़्वाहिश यह है कि ये दोनों ख़ुशनसीब एक-दूसरे के क़रीब हों (रुख़सती हो जाए)।” इस पर हज़रत अली ने कहा: “मेरी भी यही ख़्वाहिश है, लेकिन मुझे शर्म आती है।” हज़रत अक़ील हज़रत अली का हाथ पकड़कर नबी-ए-करीम के घर की तरफ़ चले, तो रास्ते में रसूलुल्लाह की कनीज़ उम्मे ऐमन से मुलाक़ात हुई। उन्होंने उन्हें सारी बात बताई। उम्मे ऐमन ने कहा: “इस काम के लिए तुम्हारे आने की ज़रूरत नहीं। हम पाक बीवियों (अज़वाज-ए-ताहिरात) से मिलकर तुम्हें ख़बर कर देंगे, क्योंकि इस मामले में औरतों की बात सुनी जाती है।”
उम्मे ऐमन ने यह बात रसूलुल्लाह की बीवियों को बताई। इस पर दूसरी पाक बीवियाँ हज़रत आइशा के घर आईं। उन्होंने हज़रत ख़दीजा को याद करते हुए कहा: “अगर वह ज़िंदा होतीं, तो हमें कोई फ़िक्र न होती।” रसूलुल्लाह रो पड़े और फ़रमाया: “ख़दीजा जैसी औरत कहाँ? जब लोग मुझे झुठला रहे थे, तब उन्होंने मेरी तस्दीक़ की और अपना सारा माल मेरी राह में ख़र्च कर दिया। दीन-ए-इस्लाम की बहुत मदद की। उनकी ज़िंदगी में हक़ तआला ने मुझे हुक्म दिया: ‘ख़दीजा को ख़ुशख़बरी दो कि जन्नत में उनके लिए ज़मुर्रद का एक महल बनाया गया है।’” रसूलुल्लाह की बीवियों ने हज़रत अली की ख़्वाहिश आपके सामने रखी। इस पर रसूलुल्लाह ने उम्मे ऐमन को हुक्म दिया कि हज़रत अली को बुला लाएँ। जब अली आए, तो मजलिस में मौजूद औरतें उठकर चली गईं। हज़रत अली सिर झुकाकर बैठ गए। रसूलुल्लाह ने पूछा: “क्या तुम अपनी बीवी को (घर ले जाना) चाहते हो, ऐ अली?”
अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने कहा: “जी हाँ, या रसूलल्लाह! मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान।” रसूल-ए-अकरम ने अस्मा बिन्ते उमैस से फ़रमाया: “जाओ, फ़ातिमा का घर तैयार करो।” अस्मा उस घर में गईं जहाँ हज़रत फ़ातिमा दुल्हन बनकर जाने वाली थीं। उन्होंने एक गद्दा नए चमड़े से, एक गद्दा पैवंद लगे चमड़े से और एक गद्दा चटाई से बनाया और उनके अंदर खजूर की छाल का रेशा भर दिया। रसूलुल्लाह इशा की नमाज़ के बाद फ़ातिमा के घर तशरीफ़ लाए और जो कुछ तैयार किया गया था, उसका जायज़ा लिया।
नबी-ए-करीम ने हुक्म दिया कि हज़रत अली की लाई हुई रक़म के दो तिहाई से खाने-पीने, सजावट और ख़ुशबू जैसी चीज़ें और एक तिहाई से कपड़े ख़रीदे जाएँ, और घर का सामान पूरा करवाया। हज़रत फ़ातिमा के जहेज़ और घर के सामान में ये चीज़ें थीं: अस्मा बिन्ते उमैस के तैयार किए हुए तीन गद्दे, झालरदार एक क़ालीन, खजूर की छाल के रेशे से भरा हुआ एक तकिया, दो हाथ की चक्कियाँ, पानी का एक मश्कीज़ा, मिट्टी का बना एक पानी का घड़ा, चमड़े का बना एक पानी का प्याला, एक तौलिया, एक दामन (घाघरा), दबाग़त की हुई एक मेंढे की खाल, पुराना होकर रोएँ झड़ा हुआ एक धारीदार यमनी क़ालीन, खजूर के पत्तों से बुना एक तख़्त, यमनी काम के दो धारीदार कपड़े और एक मख़मली लिहाफ़। इसके बाद रसूलुल्लाह ने हज़रत अली को कुछ रक़म देकर खजूर और घी ख़रीदने को कहा। इसके बाद का हाल हज़रत अली ने यूँ बयान किया:
“मैंने पाँच दिरहम की खजूरें और चार दिरहम का घी ख़रीदा और रसूलुल्लाह की ख़िदमत में ले आया। आपने चमड़े का एक दस्तरख़्वान मँगवाया। खजूर, आटा, घी और दही को अपने मुबारक हाथ से मिलाकर एक क़िस्म का खाना तैयार किया और फ़रमाया: ‘ऐ अली! जाओ, जो भी मिले, उसे बुला लाओ।’ मैं बाहर निकला, बहुत-से लोग देखे, सबको दावत दी और अंदर आकर अर्ज़ किया: ‘या रसूलल्लाह! लोग बहुत ज़्यादा हैं।’
सारे जहानों के सरदार, फ़ख़्र-ए-कायनात ने फ़रमाया: ‘उन्हें दस-दस करके अंदर लाते रहो, ताकि खाना खा लें।’ मैंने ऐसा ही किया। गिनती की गई, तो मर्दों और औरतों में से सात सौ लोगों ने खाना खाया था और सब सेर हो गए थे।”
हज़रत अली और फ़ातिमा का वलीमा (शादी की दावत) खा लिए जाने के बाद, जैसा कि उम्मे ऐमन ने बयान किया, नबी-ए-करीम ने हज़रत अली से फ़रमाया: “ऐ अली, मेरी बेटी फ़ातिमा दुल्हन बनकर तुम्हारे घर चली गई है। मैं भी मग़रिब की नमाज़ के बाद आकर दुआ करूँगा। मेरा इंतिज़ार करना।”
हज़रत अली घर आकर एक कोने में बैठ गए। हज़रत फ़ातिमा भी घर के दूसरे कोने में बैठ गईं। फिर रसूलुल्लाह तशरीफ़ लाए और दरवाज़ा खटखटाया। दरवाज़ा उम्मे ऐमन ने खोला।
रसूलुल्लाह ने पूछा: “क्या मेरा भाई यहाँ है?” उम्मे ऐमन ने कहा: “मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह! आपका भाई कौन है?” जब रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “वह अली इब्ने अबी तालिब है”, तो उम्मे ऐमन ने कहा: “क्या आपने अपनी बेटी का निकाह अपने भाई से कर दिया?” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “हाँ।” रसूलुल्लाह के “क्या मेरा भाई यहाँ है?” पूछने से उम्मे ऐमन ने समझा कि यह निकाह जायज़ न होगा, और रसूलुल्लाह ने “हाँ” फ़रमाकर इशारा फ़रमाया कि निकाह में रुकावट बनने वाली चीज़ एक ही माँ से पैदा होना है।
फिर रसूलुल्लाह ने उम्मे ऐमन से पूछा: “क्या अस्मा बिन्ते उमैस भी यहाँ हैं?” जब उन्होंने जवाब दिया: “जी हाँ”, तो फ़रमाया: “तो वह रसूलुल्लाह की बेटी की ख़िदमत के लिए आई हैं।” जब उम्मे ऐमन ने कहा: “जी हाँ”, तो फ़रमाया: “उन्हें भलाई नसीब हो।” और उनके लिए दुआ फ़रमाई।
“ऐ फ़ातिमा! तुम्हें क्या हुआ, क्यों रो रही हो? अल्लाह तआला की क़सम, मैंने तुम्हारा निकाह रिश्ता माँगने वालों में सबसे बड़े आलिम, हिल्म और अक़्लमंदी में सबसे बुलंद और सबसे पहले मुसलमान होने वाले से किया है” हदीस शरीफ़
फिर आपने एक बरतन में पानी मँगवाया। अपने मुबारक हाथ धोए। पानी में थोड़ा मुश्क डाला। फिर हज़रत फ़ातिमा को बुलाया। हज़रत फ़ातिमा शर्म से अपने कपड़ों की तरफ़ देख रही थीं। रसूलुल्लाह ने पानी में से थोड़ा लेकर फ़ातिमा के सीने, सिर और पीठ पर छिड़का और यह दुआ फ़रमाई: “अल्लाहुम्मा इन्नी उईज़ुहा बिका व ज़ुर्रिय्यतहा मिनश्शैतानिर्रजीम” (या रब! मैं इसकी और इसकी औलाद की रजीम, यानी पत्थरों से धुतकारे हुए शैतान के शर से हिफ़ाज़त के लिए तेरी पनाह माँगता हूँ)। फिर हज़रत अली के साथ भी यही किया और यह दुआ फ़रमाई: “अल्लाहुम्मा बारिक फ़ीहिमा व बारिक अलैहिमा व बारिक लहुमा फ़ी नस्लिहिमा।” सूरह इख़लास और मुअव्विज़तैन पढ़कर फ़रमाया: “अल्लाह तआला के नाम और उसकी बरकत के साथ अपनी अहलिया के पास जाओ।” फिर अपने मुबारक हाथों से दरवाज़े के दोनों पट पकड़कर बरकत की दुआ फ़रमाई और वहाँ से तशरीफ़ ले गए।36
हज़रत अली ने फ़रमाया: “हमारी शादी के चार दिन बाद रसूलुल्लाह ने हमारे घर तशरीफ़ लाकर उसे इज़्ज़त बख़्शी। दिलों को मोह लेने वाली, हिकमत से भरी बातों से हमें नसीहत फ़रमाई और फ़रमाया: ‘ऐ अली! पानी लाओ!’ मैं उठा और पानी ले आया। आपने एक आयत-ए-करीमा पढ़ी और फ़रमाया: ‘इस पानी में से थोड़ा पी लो। कुछ बाक़ी रहने दो।’ मैंने ऐसा ही किया। बचा हुआ पानी आपने मेरे सिर और सीने पर छिड़क दिया। फिर फ़रमाया: ‘पानी लाओ।’ मैं फिर पानी ले आया। जैसा मेरे साथ किया था, वैसा ही फ़ातिमा के साथ भी किया। फिर मुझे बाहर भेज दिया।”
अली के बाहर जाने के बाद आपने अपनी बेटी से हज़रत अली के बारे में पूछा। फ़ातिमा ने कहा: “अब्बा जान, उनमें तमाम कमाल की सिफ़ात मौजूद हैं। लेकिन क़ुरैश की कुछ औरतें मुझसे कहती हैं: ‘तुम्हारा शौहर ग़रीब है।’” इस पर रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “ऐ मेरी बेटी! न तुम्हारा बाप ग़रीब है और न तुम्हारा शौहर। मेरे सामने ज़मीन और आसमान के तमाम ख़ज़ाने और दफ़ीने पेश किए गए। मैंने उन्हें क़बूल न किया। जो अल्लाह तआला के नज़दीक मक़बूल है, उसे क़बूल किया। ऐ मेरी बच्ची! अगर तुम वह जानतीं जो मैं जानता हूँ, तो दुनिया तुम्हारी नज़र में हक़ीर और कमतर हो जाती। अल्लाह तआला के वास्ते, तुम्हारा शौहर सहाबा में सबसे पहला है। इस्लाम में भी बड़ा है और इल्म के लिहाज़ से सबसे गहरा है। ऐ मेरी बेटी! अल्लाह तआला ने अहले बैत (नबी के घराने) में से दो लोगों को चुना। एक तुम्हारा बाप है और एक तुम्हारा शौहर। ख़बरदार, कभी उसकी नाफ़रमानी न करना और उसके हुक्म की मुख़ालफ़त न करना।”
फ़ख़्र-ए-कायनात (अलैहि अफ़ज़लुस्सलवात) ने अपनी बेटी को नसीहत फ़रमाने के बाद हज़रत अली को बुलाया। उन्हें फ़ातिमा सौंपते हुए फ़रमाया: “ऐ अली! फ़ातिमा के दिल का ख़याल रखना। वह मेरा एक टुकड़ा है। उसे ख़ुश रखना। अगर तुमने उसे रंजीदा किया, तो मुझे रंजीदा किया।” दोनों को अल्लाह तआला के सुपुर्द किया। फिर उठकर जाने का इरादा फ़रमाया ही था कि हज़रत फ़ातिमा ने कहा: “या रसूलल्लाह! घर के अंदर का काम मैं करूँगी, और बाहर का काम अली करेंगे। अगर आप मुझे एक कनीज़ इनायत फ़रमाएँ, तो वह मेरे कुछ कामों में मददगार होगी। आप मुझे ख़ुश कर देंगे।” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “ऐ फ़ातिमा! तुम्हें ख़ादिम से बेहतर कोई चीज़ दूँ, या ख़ादिम दूँ?”
हमारी माँ हज़रत फ़ातिमा ने कहा: “ख़ादिम से बेहतर चीज़ इनायत फ़रमाइए।” इस पर रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “हर रोज़ सोते वक़्त तैंतीस बार ‘सुब्हानअल्लाह’, तैंतीस बार ‘अलहम्दुलिल्लाह’, तैंतीस बार ‘अल्लाहु अकबर’ और एक बार ‘ला इलाह इल्लल्लाहु वहदहू ला शरीका लहू, लहुल मुल्कु व लहुल हम्दु व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर’ कहा करो। ये सब सौ कलिमे होते हैं। क़यामत में तुम्हें हज़ार नेकियाँ (भलाइयाँ) मिलेंगी। मीज़ान (तराज़ू) में तुम्हारी नेकियों का पलड़ा भारी होगा।” फिर नबी-ए-करीम अपनी बेटी के घर से निकलकर अपने मुबारक घर तशरीफ़ ले गए।
कअब इब्ने अशरफ़ का क़त्ल
बद्र की फ़तह से मदीना के यहूदियों और बुतपरस्त मुशरिकों के दिलों में ख़ौफ़ बैठ गया। कुछ यहूदी इंसाफ़ पर आए और यह कहकर मुसलमान हो गए: “जिनकी सिफ़ात हमने अपनी किताबों में पढ़ी हैं, वह ज़रूर यही हैं। अब उनके मुक़ाबले में खड़ा होना मुमकिन नहीं, क्योंकि वह हमेशा ग़ालिब आएँगे।” कुछ दूसरे लोगों ने कहा: “मुहम्मद ने जंग से नावाक़िफ़ क़ुरैश से जंग की, इसलिए जीत गया। अगर वह हमसे लड़ता, तो हम उसे दिखा देते कि जंग कैसे की जाती है और फ़तह कैसे हासिल की जाती है।”
कअब इब्ने अशरफ़ नाम का एक यहूदी बद्र में इस्लामी लश्कर की फ़तह की ख़बर सुनकर मुसलमानों से अपने कीने की वजह से मक्का चला गया। वहाँ के मुशरिकों को इकट्ठा करके उसने उन्हें मदीना पर हमला करने के लिए उकसाते हुए शेर पढ़े, उन्हें जोश दिलाया और भड़काया। नबी-ए-करीम से लड़ने के लिए उनसे मुआहदा किया। यहाँ तक कि हमारे प्यारे नबी को धोखे से क़त्ल करने की साज़िश भी रची। अल्लाह तआला ने यह हाल रसूलुल्लाह को बता दिया और मफ़हूमन फ़रमाया: “ये वे लोग हैं जिन पर अल्लाह तआला ने लानत की (जिन्हें अपनी रहमत से दूर कर दिया) है…”37
इस पर रसूल-ए-अकरम ने अपने इज़्ज़त वाले सहाबा से फ़रमाया: “कअब इब्ने अशरफ़ को कौन क़त्ल करेगा? उसने अल्लाह तआला और उसके रसूल को तकलीफ़ पहुँचाई है।”
मुहम्मद इब्ने मस्लमा ने पूछा: “या रसूलल्लाह! क्या आप चाहते हैं कि मैं उसे क़त्ल करूँ?” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “हाँ, चाहता हूँ।” मुहम्मद इब्ने मस्लमा ने कुछ दिन इस काम पर ग़ौर किया और मंसूबे बनाए। अपने साथियों में से अबू नाइला, अब्बाद इब्ने बिश्र, हारिस इब्ने औस और अबू अब्स इब्ने जब्र के पास जाकर उनसे यह बात खोली। सबने इसे मुनासिब समझा और कहा: “हम मिलकर क़त्ल करेंगे।” सब मिलकर नबी-ए-करीम के पास आए और अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! अगर आप इजाज़त दें, तो क्या हम उससे बात करते वक़्त आपके बारे में कुछ ऐसी बातें कह सकते हैं जो कअब को अच्छी लगें?” नबी-ए-करीम ने उन्हें जो चाहें कहने की इजाज़त दे दी।
इसके बाद मुहम्मद इब्ने मस्लमा अपने साथियों के साथ कअब इब्ने अशरफ़ के पास गए। कहा: “इस मुहम्मद ने हमसे सदक़ा माँगा है। हम पर बहुत महसूल डाल दिया है। इसलिए मैं तुमसे कुछ उधार लेने आया हूँ।” कअब यह समझकर ख़ुश हुआ कि मुहम्मद इब्ने मस्लमा उसी की तरह सोचते हैं, और कहा: “वह तुम्हें अभी और भी तंग करेगा।” मुहम्मद इब्ने मस्लमा ने कहा: “हम एक बार तो उनकी पैरवी कर ही चुके हैं। उनकी पैरवी जारी रखेंगे। देखते हैं, अंजाम क्या होता है? अभी तुम हमें कुछ खजूरें उधार दे दो।” कअब ने कहा: “ठीक है, देता हूँ, लेकिन तुम्हें मेरे पास कोई चीज़ गिरवी रखनी होगी!” मुहम्मद इब्ने मस्लमा और उनके साथियों ने कहा: “क्या चाहते हो?” जब कअब ने कहा: “मैं तुम्हारी औरतों को गिरवी चाहता हूँ”, तो वे राज़ी न हुए। कअब ने कहा: “तो अपने बेटों को गिरवी रख दो।” उन्होंने कहा: “उन्हें भी गिरवी नहीं रख सकते। उनमें से किसी के बारे में कहा जाएगा कि उसे एक-दो ऊँट के बोझ भर खजूरों के बदले गिरवी रखा गया था, और यह हमारे लिए ऐसा दाग़ होगा जो भुलाया न जा सकेगा। लेकिन हम अपने हथियार और ज़िरहें तुम्हारे पास गिरवी रख सकते हैं।” कअब ने यह पेशकश क़बूल कर ली। उसने उन्हें यह भी बता दिया कि कब आना है।38
“ऐ अली! फ़ातिमा के दिल का ख़याल रखना। वह मेरा एक टुकड़ा है। उसे ख़ुश रखना। अगर तुमने उसे रंजीदा किया, तो मुझे रंजीदा किया” हदीस शरीफ़
एक रात मुहम्मद इब्ने मस्लमा कअब के पास आए। उनके साथ अबू नाइला भी थे। कअब ने उन्हें क़िले में बुलाया और ख़ुद उनका इस्तिक़बाल करने के लिए नीचे उतरा। कअब की बीवी ने कहा: “इस वक़्त कहाँ जा रहे हो?” कअब ने कहा: “आने वाले मुहम्मद इब्ने मस्लमा और मेरा भाई अबू नाइला हैं।” उसकी बीवी ने कहा: “यह आवाज़ जो मैं सुन रही हूँ, मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं लगती। जैसे इससे ख़ून टपक रहा हो।” कअब ने कहा: “नहीं, ये मुहम्मद इब्ने मस्लमा और मेरा दूध-शरीक भाई अबू नाइला हैं। वह अच्छा जवान है। रात को तलवार की लड़ाई के लिए भी बुलाया जाए, तो बिना झिझके आ जाता है। ऐसा आदमी है वह।” मुहम्मद इब्ने मस्लमा अपने साथ दो, एक रिवायत के मुताबिक़ तीन आदमियों को क़िले में ले गए। ये अबू अब्स इब्ने जब्र, हारिस इब्ने औस और अब्बाद इब्ने बिश्र थे।39 हज़रत मुहम्मद इब्ने मस्लमा ने अपने साथियों से कहा: “जब कअब आएगा, तो मैं उससे कहूँगा कि मैं उसके बाल सूँघना चाहता हूँ, और उसका सिर पकड़कर सूँघूँगा। जब तुम देखो कि मैंने कअब का सिर मज़बूती से पकड़ लिया है, तो अपनी तलवारों से वार करना।” कअब इब्ने अशरफ़ अच्छे कपड़े पहने, ख़ुशबू बिखेरता हुआ उनके पास आया। इब्ने मस्लमा “आज तक मैंने ऐसी अच्छी ख़ुशबू नहीं सूँघी” कहते हुए कअब के पास पहुँचे। कअब ने यह कहकर डींग मारी: “अरब की सबसे ख़ुशबूदार औरतें मेरे पास हैं।” मुहम्मद इब्ने मस्लमा ने कहा: “क्या मुझे अपना सिर सूँघने की इजाज़त दोगे?” कअब ने कहा कि इजाज़त है। इब्ने मस्लमा ने उसे सूँघा और अपने साथियों को भी सुँघाया। फिर कहा कि वह दोबारा सूँघना चाहते हैं। इस बार मुहम्मद इब्ने मस्लमा ने कअब का सिर कसकर पकड़ लिया और अपने साथियों को तलवारों से वार करने का इशारा किया।
पहली तलवार पड़ी, तो कअब ज़ोर से चीख़ा, मगर मरा नहीं। इस पर मुहम्मद इब्ने मस्लमा ने अपने ख़ंजर से उसे मार डाला। कअब को क़त्ल करने वाले मुजाहिद फ़ौरन वहाँ से निकलकर मदीना पहुँच गए। जब उन्होंने रसूलुल्लाह को ख़ुशख़बरी सुनाई, तो नबी-ए-करीम ने अल्लाह तआला की हम्द की और मुजाहिदों के लिए दुआ फ़रमाई। काफ़िर कअब इब्ने अशरफ़ के क़त्ल ने यहूदियों को बड़े ख़ौफ़ में डाल दिया, क्योंकि कअब जैसे नामी सरदार के क़त्ल हो जाने के बाद ख़ुद उनका क़त्ल होना बस वक़्त की बात थी। सुबह वे इकट्ठा होकर नबी-ए-करीम की ख़िदमत में आए और रात के वाक़िए की शिकायत की। रसूल-ए-अकरम ने फ़रमाया: “वह हमें हमेशा तकलीफ़ देता था और हमारे ख़िलाफ़ शेर कहता था। अगर तुममें से कोई भी ऐसा करेगा, तो जान ले कि उसकी सज़ा तलवार है।” इस धमकी के बाद यहूदियों ने डर के मारे रसूलुल्लाह से दोबारा मुआहदा कर लिया…40
ग़तफ़ान का ग़ज़वा
इस ग़ज़वे को “अनमार का ग़ज़वा” भी कहा जाता है और “ज़ी अम्र का ग़ज़वा” भी। बनू सालबा और बनू मुहारिब क़बीलों के एक गिरोह ने ज़ी अम्र नाम की जगह पर इकट्ठा होकर यह तय किया था कि मदीना के आस-पास जो कुछ मिले, उसे लूट लें। उनका सरदार ग़ौरस लक़ब वाला दासूर इब्ने हारिस इब्ने मुहारिब नाम का एक आदमी था। नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने मदीना में उस्मान इब्ने अफ़्फ़ान (रज़ियल्लाहु अन्हु) को नायब बनाया और चार सौ पचास आदमियों के लश्कर के साथ मदीना से रवाना हुए। रास्ते में जब्बार नाम का एक आदमी मिला। उससे दुश्मन के बारे में पूछा गया। उसने कहा: “वे तुमसे लड़ना नहीं चाहते। तुम्हें देखकर पहाड़ों में भाग गए हैं।” रसूलुल्लाह ने उसके सामने इस्लाम पेश किया। उसने क़बूल कर लिया और मुसलमान हो गया।
इस्लामी लश्कर वादी की तरफ़ बढ़ रहा था कि बारिश शुरू हो गई। कुछ देर तक वह पूरे ज़ोर से बरसती रही, फिर धीमी होकर थम गई। नबी-ए-करीम समेत तमाम मुजाहिद सिर से पाँव तक पानी में भीग गए थे। हर कोई एक तरफ़ अपने कपड़े सुखा रहा था। रसूलुल्लाह ने भी एक सुनसान जगह पर अपने कपड़े सुखाने के लिए उतारकर एक पेड़ पर फैला दिए। जब आप पेड़ के नीचे आराम फ़रमा रहे थे, तो इस्लामी लश्कर की निगरानी करने वाले काफ़िरों ने रसूलुल्लाह को अकेला देखकर दासूर इब्ने हारिस को ख़बर दी। वह रसूलुल्लाह को क़त्ल करने के लिए दबे पाँव उस जगह के क़रीब आया जहाँ आप आराम फ़रमा रहे थे, और अपनी तलवार खींचकर बोला: “तुम्हें मेरे हाथ से कौन बचा सकता है?” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “अल्लाह तआला बचाएगा।” उसी पल जिबराईल अलैहिस्सलाम ने आकर दासूर के सीने पर एक वार किया और उसे ज़मीन पर गिरा दिया; उसकी तलवार उसके हाथ से छूट गई। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दासूर की तलवार उठाकर फ़रमाया: “अब तुम्हें मेरे हाथ से कौन बचाएगा?” दासूर ने कहा: “कोई नहीं बचा सकता।” फिर वह कलिमा-ए-शहादत पढ़कर मुसलमान हो गए। उनकी वजह से बहुत-से लोग ईमान लाए।41 उन्होंने वादा किया कि अब जंग के लिए कभी लश्कर जमा नहीं करेंगे। किसी हथियारबंद झड़प के बिना मदीना वापसी हुई। यह सफ़र ग्यारह दिन का रहा।
बहरान का ग़ज़वा
इस ग़ज़वे को “बनू सुलैम” या “नजरान का ग़ज़वा” भी कहते हैं। ख़बर आई कि बनू सुलैम में जमा हुए बहुत-से मुशरिक मदीना पर हमला करने वाले हैं। हज़रत इब्ने उम्मे मकतूम को नायब बनाकर छोड़ा गया। रसूलुल्लाह तीन सौ आदमियों की एक फ़ौज के साथ दुश्मन की तरफ़ बढ़े। इस्लामी लश्कर के आने की ख़बर पाकर दुश्मन पहाड़ों में भाग गया। इसलिए आमना-सामना न हो सका। यह सफ़र बारह दिन चला।
“वह (कअब इब्ने अशरफ़) हमें हमेशा तकलीफ़ देता था और हमारे ख़िलाफ़ शेर कहता था। अगर तुममें से कोई भी ऐसा करेगा, तो जान ले कि उसकी सज़ा तलवार है” हदीस शरीफ़
तेरे इश्क़ ने मुझसे मुझको छीन लिया,
मेरे रब, मुझे तुझसे मुहब्बत है!
तेरी मुहब्बत कितनी मीठी है,
मेरे रब, मुझे तुझसे मुहब्बत है!
न दौलत पर मैं ख़ुश होता हूँ,
न ग़रीबी पर ग़म करता हूँ।
तेरे इश्क़ से लज़्ज़त पाता हूँ,
मेरे रब, मुझे तुझसे मुहब्बत है!
तूने इबादतों का हुक्म दिया,
अच्छे हालों की तारीफ़ फ़रमाई,
बेहिसाब नेमतें अता कीं,
मेरे रब, मुझे तुझसे मुहब्बत है!
कैसा नाशुक्रा है मेरा नफ़्स, हैरत है,
अपनी लज़्ज़त के लिए मुझे हमेशा तबाह करता है!
मैंने तो असली लज़्ज़त पा ली,
मेरे रब, मुझे तुझसे मुहब्बत है!
इबादत को अच्छी तरह अदा करना,
दुनिया के लिए भी मेहनत करना,
दिन-रात यही मेरा काम है, क्योंकि
मेरे रब, मुझे तुझसे मुहब्बत है!
सिर्फ़ बातों से मुहब्बत नहीं होती, ऐ हिल्मी!
तेरे रब ने फ़रमाया: “मेहनत करो!”
तेरे हाल से भी यह ज़ाहिर हो:
मेरे रब, मुझे तुझसे मुहब्बत है!
इस्लाम के दुश्मन कितने ही हैं,
दीन पर चुपके-चुपके वार करते हैं;
तू चुप बैठा रहे, तो क्या यह ठीक होगा?
मेरे रब, मुझे तुझसे मुहब्बत है!
क्या आशिक़ सुस्त होकर बैठता है?
क्या अपने माशूक़ पर धूल पड़ने देता है?
दुश्मन को चुप करा दे, फिर कह:
“मेरे रब, मुझे तुझसे मुहब्बत है!”
