सहाबा-ए-किराम की तरबियत
मस्जिद-ए-नबवी
नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जब मदीना तशरीफ़ लाए, तो सबसे पहले आप एक ऐसी मस्जिद बनाना चाहते थे जहाँ आप अपने सहाबा की तरबियत करें और जहाँ जमाअत से नमाज़ अदा की जाए। उसी वक़्त जिबराईल अलैहिस्सलाम आए और कहा: “या रसूलल्लाह! अल्लाह तआला आपको हुक्म देता है कि आप उसके लिए पत्थर और कच्ची ईंटों का एक घर (मस्जिद) बनाएँ।” हबीब-ए-अकरम ने फ़ौरन वह जगह उसके मालिकों से ख़रीदनी चाही जहाँ मदीना तशरीफ़ लाते वक़्त आपकी ऊँटनी क़सवा बैठी थी। उसके मालिकों ने कहा: “या रसूलल्लाह! हम इसकी क़ीमत सिर्फ़ अल्लाह पाक से चाहते हैं। यह जगह हम आपको अल्लाह की रज़ा के लिए हदिया करते हैं।” और उन्होंने बहुत इसरार किया कि आप इसे तोहफ़े के तौर पर क़बूल फ़रमा लें। इसके बावजूद नबी-ए-करीम ने हदिया क़बूल न फ़रमाया और उसकी क़ीमत बढ़ाकर अदा फ़रमाई।1
एक तरफ़ ज़मीन को बराबर करके दुरुस्त किया जा रहा था, दूसरी तरफ़ कच्ची ईंटें बनाई जा रही थीं और पत्थर ढोए जा रहे थे। आख़िरकार सारी तैयारी पूरी होने के बाद बुनियाद रखने के लिए सब जमा हुए। बुनियाद का पहला पत्थर मुहम्मद मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) ने अपने मुबारक हाथों से रखा। फिर आपने बारी-बारी फ़रमाया: “अबू बकर अपना पत्थर मेरे पत्थर के पास रखें! उमर अपना पत्थर अबू बकर के पत्थर के पास रखें! उस्मान अपना पत्थर उमर के पत्थर के पास रखें! अली अपना पत्थर उस्मान के पत्थर के पास रखें!” आपके हुक्म की तामील हो गई तो आपने वहाँ मौजूद सहाबा-ए-किराम से फ़रमाया: “तुम भी अपने पत्थर रखो।” वे भी रखने लगे।
मस्जिद की तामीर में, हमारे प्यारे नबी से लेकर तमाम सहाबा-ए-किराम ने लगातार, बिना आराम किए काम किया। उन्होंने अपनी मुबारक पीठों पर पत्थर और कच्ची ईंटें ढोईं। पत्थर से बुनियाद को डेढ़ मीटर ऊँचा उठाया और उसके ऊपर कच्ची ईंटों से दीवार चुनी। एक दिन रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) कच्ची ईंट उठाए लिए जा रहे थे। सहाबा में से एक आपकी ख़िदमत में हाज़िर हुए और बड़े अदब से अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! क्या आप मुझे ईंट ढोने की इजाज़त देंगे?” ख़ातमुल अंबिया ने उनसे और भी ज़्यादा नरमी से फ़रमाया कि सवाब हासिल करने के मोहताज तो आप ख़ुद उनसे भी ज़्यादा हैं, और ईंट उन्हें न दी। उन्हें भी जाकर पत्थर लाने की नसीहत फ़रमाई।
मस्जिद-ए-नबवी की तामीर में सबसे ज़्यादा काम करने वालों में से एक ख़ुद रसूलुल्लाह थे। आप सबसे भारी पत्थर उठाकर, जबकि आपका मुबारक सीना दबता जाता, उन्हें मिस्त्रियों के पास ले जाते। इन पत्थरों और ईंटों को ढोते हुए आप किए जा रहे काम की क़द्र बताकर और मिलने वाली नेमतों की ख़ुशख़बरी देकर अपने सहाबा का हौसला बढ़ाते थे।
नबी-ए-करीम की यह मेहनत देखकर मुसलमान बड़े इश्क़ से काम करते थे। यहाँ तक कि जब हर कोई एक-एक ईंट उठाता, तो अम्मार इब्ने यासिर दो-दो ईंटें ढोते थे – एक नबी-ए-करीम की तरफ़ से और एक अपनी तरफ़ से। यह देखकर रसूलुल्लाह उनके पास तशरीफ़ ले गए। अपने मुबारक हाथ से हज़रत अम्मार की पीठ सहलाई और फ़रमाया: “ऐ सुमय्या के बेटे! तुम्हारे लिए दो अज्र हैं, दूसरों के लिए एक!”
मस्जिद की दीवारें थोड़े ही अरसे में पूरी हो गईं और उस पर छत डाल दी गई। हुजरे अरब रिवाज के मुताबिक़ खजूर की टहनियों से बने थे और उनके ऊपर बालों के नमदे डाले हुए थे। उनके दरवाज़ों पर सिर्फ़ पर्दा लटका हुआ था। हुजरे मस्जिद के दक्षिण-पूर्व और उत्तर की तरफ़ थे। उनमें से ज़्यादातर के दरवाज़े मस्जिद में खुलते थे। उनकी छतों की ऊँचाई दरमियाने क़द के इंसान के क़द से एक बालिश्त ज़्यादा थी। हज़रत फ़ातिमा और हज़रत आइशा के हुजरों के बीच एक दरवाज़ा था। इसके अलावा मस्जिद से मिलाकर रसूलुल्लाह के लिए कच्ची ईंटों के दो हुजरे बनाए गए। उनकी छतें भी खजूर के तनों और टहनियों से ढकी गईं। वक़्त के साथ ये हुजरे बढ़कर नौ तक हो गए। मस्जिद की तामीर पूरी होने के बाद नबी-ए-करीम हज़रत ख़ालिद इब्ने ज़ैद के घर से अपने लिए बनाए गए घर में मुंतक़िल हो गए।2
“मोमिन तो आपस में भाई ही हैं” हुजुरात: 10
या रसूलल्लाह!
आशिक़ों को हमेशा दीवाना बनाए रखने वाला
– आपका रुख़-ए-अनवर है, या रसूलल्लाह।
सुबह-शाम उनसे दर्द भरी आहें भरवाने वाली
– आपकी हसरत है, या रसूलल्लाह!
दिन-रात मेरा काम आह-ओ-फ़ुग़ाँ बना देने वाली,
हसरत की आग से मेरे दिल को जलाने वाली,
हर दम मेरी इन आँखों को रुलाने वाली
– आपकी जुदाई है, या रसूलल्लाह!
असफ़िया ने जो देखा, अल्लाह का वह लुत्फ़,3
औलिया ने जो पाया, वह ज़ौक़ और सफ़ा,4
नबियों ने जो पाई, वह बुलंदी, ऐ शाह!
– आपकी दौलत और बुलंदी है, या रसूलल्लाह!
मुझ ग़रीब, आवारा पर रहम कीजिए,
मैं मुजरिम हूँ, इस स्याह-रू पर करम कीजिए,
बेकस और बेचारे पर शफ़क़त करना
– आपकी आदत है, या रसूलल्लाह!
ऐ गुनाहगारों की शफ़ाअत करने वाले, अहद के नूर,
नसूही आपका अपना ग़ुलाम है, इसे दूर न कीजिए।
अपने लुत्फ़ के दर से करम कीजिए, इसे लौटाइए नहीं,
यह आपकी उम्मत में से है, या रसूलल्लाह!
Nasûhî Üsküdârî
खजूर के तने का कराहना
मस्जिद-ए-नबवी में खजूर का एक तना गड़ा हुआ था। नबी-ए-करीम जुमा के दिनों में मस्जिद के इसी सुतून से, जिसे हन्नाना कहा जाता था, टेक लगाकर ख़ुत्बा दिया करते थे।
बाद में आपने तीन सीढ़ियों वाला एक मिम्बर बनवाया। एक जुमा के दिन रसूलुल्लाह और सहाबा-ए-किराम मस्जिद-ए-नबवी में जमा थे। नबी-ए-करीम ख़ुत्बे के लिए नए मिम्बर पर चढ़े, तो खजूर का वह सूखा तना, जिससे आप पहले टेक लगाया करते थे, इतनी ज़ोर से कि हर कोई सुन ले, गाभिन ऊँटनी की तरह रोने और कराहने लगा। तमाम सहाबा-ए-किराम हैरत से यह आवाज़ सुनते रहे। लेकिन आवाज़ किसी तरह थमती न थी। इस पर सारे जहानों के सरदार मिम्बर से उतरे और अपने मुबारक हाथों से तने को सहलाया। उसी पल रोना और कराहना थम गया। खजूर के सूखे तने की हमारे नबी से यह मुहब्बत और यह इश्क़ देखकर सहाबा अपने आँसू न रोक सके।
इस वाक़िए के बारे में हज़रत अनस इब्ने मालिक ने फ़रमाया: “उसकी आवाज़ से मस्जिद तक हिल गई”, और इब्ने अबी वदाआ ने फ़रमाया: “खजूर का तना चटख़कर अपनी जगह से हिल गया। रसूलुल्लाह ने आकर अपना मुबारक हाथ उस पर रखा, तब जाकर वह ख़ामोश हुआ।”
नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसके क़ब्ज़ा-ए-क़ुदरत में मेरी जान है, अगर मैं इसे न सहलाता, तो यह मेरी जुदाई और ग़म में क़यामत तक इसी तरह रोता रहता।” एक और रिवायत में यूँ बताया गया है: रसूल अलैहिस्सलाम ने खजूर के सूखे तने की तरफ़ मुड़कर फ़रमाया: “अगर तुम चाहो, तो तुम्हें उस बाग़ में लौटा दूँ जहाँ तुम थे। तुम फिर से शाख़ें और पत्ते निकालो और अपनी पहली हालत पर आ जाओ। और अगर चाहो, तो तुम्हें जन्नत में लगा दूँ, ताकि अल्लाह तआला के दोस्त तुम्हारा फल खाएँ।” रसूलुल्लाह ने उसकी तरफ़ कान लगाकर सुना कि वह यूँ कह रहा था: “मुझे जन्नत में लगा दीजिए, ताकि अल्लाह तआला के दोस्त मुझसे खाएँ और मैं ऐसी जगह रहूँ जहाँ न पुराना होऊँ, न सड़ूँ।” पेड़ की यह बात नबी-ए-करीम के पास मौजूद लोगों ने भी सुनी। इस पर रसूलुल्लाह ने उससे फ़रमाया: “जो तुम चाहते हो, वही करूँगा।” फिर अपने सहाबा की तरफ़ मुड़कर फ़रमाया: “इसने दार-ए-बक़ा को दार-ए-फ़ना (इस दुनिया) पर तरजीह दी।”5 फिर रसूलुल्लाह के हुक्म से खजूर का तना ज़मीन में दफ़न कर दिया गया।
घर वालों का मदीना आना
सरवर-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) और हज़रत अबू बकर ने जब हिजरत की थी, तो अपने बच्चों को मक्का में छोड़ आए थे। इमाम बुख़ारी की रिवायत की हुई हदीस शरीफ़ में हज़रत आइशा ने बयान फ़रमाया कि रसूलुल्लाह ने उनसे फ़रमाया: “ऐ आइशा! तुम मुझे दो बार ख़्वाब में दिखाई गईं। शायद मैंने हरे रेशमी कपड़े के एक टुकड़े पर तुम्हारी तस्वीर देखी थी और मुझसे कहा गया था: ‘इस तस्वीर वाली तुम्हारी होने वाली बीवी है।’” इस ख़्वाब के बाद (हमारी माँ हज़रत ख़दीजा के इंतिक़ाल के एक साल बाद) नबी-ए-करीम और हमारी माँ हज़रत आइशा की मक्का ही में मंगनी हो गई थी। लेकिन अभी रुख़सती नहीं हुई थी। हज़रत आइशा ने इसे यूँ बयान फ़रमाया: “रसूलुल्लाह ने जब मदीना हिजरत फ़रमाई, तो हमें और अपनी बेटियों को मक्का में छोड़ दिया था। मदीना पहुँचकर बस जाने के बाद आपने अपने आज़ाद किए हुए ग़ुलाम ज़ैद इब्ने हारिसा और अबू राफ़े को दो ऊँट और ज़रूरत की चीज़ें ख़रीदने के लिए 500 दिरहम ख़र्च के साथ हमारे पास भेजा।
मेरे वालिद ने भी अब्दुल्लाह इब्ने उरैक़ित को दो-तीन ऊँटों के साथ उनके साथ कर दिया और मेरे भाई अब्दुल्लाह को ख़त लिखकर हुक्म दिया कि मेरी वालिदा को, मुझे और मेरी बहन अस्मा को ऊँटों पर सवार करके रवाना कर दें। मैं, मेरी वालिदा उम्मे रूमान, रसूलुल्लाह की साहबज़ादियों में से हज़रत फ़ातिमतुज़ ज़हरा और उम्मे कुलसूम, आपकी ज़ौजा सौदा, और उम्मे ऐमन और उसामा, हम सब एक साथ रवाना हुए। क़ुदैद नाम की जगह पहुँचे तो ज़ैद ने 500 दिरहम से तीन ऊँट और ख़रीदे। क़ाफ़िले में तल्हा इब्ने उबैदुल्लाह भी शामिल हो गए। मिना से बैद नाम की जगह पहुँचे, तो मेरा ऊँट भाग खड़ा हुआ। मैं हौदज में थी। मेरी वालिदा भी मेरे पास थीं। मेरी वालिदा तड़प-तड़पकर कह रही थीं: ‘हाय मेरी बच्ची, हाय मेरी दुल्हन!’ अल्लाह तआला ने हमारे ऊँट को सुकून दिया और हमें बचा लिया। आख़िरकार हम मदीना आ गए। मैं अपने वालिद के घर वालों के साथ उतरी। रसूलुल्लाह के घर वाले आपके हुजरों के सामने उतरे।”
“अगर मैं इसे (हन्नाना को) गले न लगाता, तो यह मेरी जुदाई में क़यामत तक रोता रहता” हदीस शरीफ़
हज़रत आइशा कुछ अरसे अपने वालिद हज़रत अबू बकर के घर रहीं। उनकी रुख़सती बद्र के ग़ज़वे के बाद हुई।
कितना ख़ुशनसीब है वह इंसान,
जिसका वज़ीफ़ा क़ुरआन हो!
अज़ान और इक़ामत सुनकर
जिसका दिल ईमान से भरा हो!
अज़ान-ए-मुहम्मदी
मस्जिद-ए-नबवी बनने के बाद नमाज़ का वक़्त होने की ख़बर देने और मुसलमानों को मस्जिद की तरफ़ बुलाने का कोई तरीक़ा न था। बस “अस्सलातु जामिआ (आओ, नमाज़ की तरफ़)” कहा जाता था।
एक दिन रसूलुल्लाह ने अपने सहाबा से मशवरा किया कि नमाज़ के वक़्तों में मोमिनों को मस्जिद की तरफ़ किस तरह बुलाया जाए। कुछ ने कहा कि नमाज़ के वक़्त बताने के लिए नसारा की तरह नाक़ूस, यानी घंटा बजाया जाए; कुछ ने कहा कि यहूदियों की तरह नरसिंगा फूँका जाए। कुछ ने अपनी यह राय बताई: “नमाज़ के वक़्त आग जलाकर उसे ऊँचा उठाएँ।” रसूलुल्लाह ने इनमें से किसी को क़बूल न फ़रमाया।6
अब्दुल्लाह इब्ने ज़ैद इब्ने सालबा और हज़रत उमर ने ख़्वाब में अज़ान दी जाती देखी। हज़रत अब्दुल्लाह ने हमारे प्यारे नबी के पास आकर अपना ख़्वाब यूँ बयान किया: “मैंने एक बुज़ुर्ग को देखा जिन्होंने एक हरा शाल ओढ़ रखा था और तहबंद बाँध रखा था, और हाथ में एक घंटा लिए हुए थे। मैंने उनसे पूछा: ‘अपने हाथ का यह घंटा बेचोगे?’ उन्होंने मुझसे कहा: ‘इसका क्या करोगे?’ मैंने कहा: ‘नमाज़ के वक़्त बताने के लिए बजाऊँगा।’ तो उन बुज़ुर्ग ने कहा: ‘मैं तुम्हें इससे बेहतर चीज़ सिखाता हूँ।’ और क़िब्ले की तरफ़ मुँह करके ऊँची आवाज़ में ‘अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर…’ पढ़ने लगे। पूरा करने के बाद उन्होंने कहा: ‘और जब नमाज़ के लिए खड़े होने लगो, तब भी’, और अज़ान दोहराई, और उसके आख़िर के क़रीब ‘क़द क़ामतिस सलात’ के अल्फ़ाज़ बढ़ाए।”
इस पर रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “यह ख़्वाब सच्चा है। ये अल्फ़ाज़ बिलाल को सिखा दो, वह पढ़ें!” इसका नाम अज़ान रखा गया।7
फिर हज़रत बिलाल ने मस्जिद शरीफ़ के क़रीब एक ऊँची छत पर चढ़कर सिखाए गए अल्फ़ाज़ में पहली अज़ान दी।
हज़रत उमर अज़ान की आवाज़ सुनकर दौड़ते हुए रसूलुल्लाह की ख़िदमत में हाज़िर हुए। उन्होंने अर्ज़ किया कि हज़रत बिलाल ने जो अल्फ़ाज़ कहे, बिल्कुल वही उन्होंने ख़्वाब में देखे थे। उस रात सहाबा-ए-किराम में से कुछ ने भी यही ख़्वाब देखा था। ठीक उसी वक़्त सूरह जुमुआ की 9वीं आयत-ए-करीमा नाज़िल हुई, और यह वह्य के ज़रिए भी बता दिया गया।
एक दिन फ़ज्र की नमाज़ के वक़्त बिलाल हब्शी ने हमारे प्यारे नबी के दरवाज़े के सामने दो बार पुकारा: “अस्सलातु ख़ैरुम मिनन नौम।”8 यह बात नबी-ए-करीम को पसंद आई। आपने फ़रमाया: “ऐ बिलाल, यह कितनी अच्छी बात है! फ़ज्र की अज़ान देते वक़्त यह भी कहा करो।” इस तरह फ़ज्र की अज़ान में यह कलिमा भी कहा जाने लगा।
बिलाल हब्शी नबी-ए-करीम के इंतिक़ाल तक मुअज़्ज़िन रहे। उनकी आवाज़ बुलंद, बहुत ख़ूबसूरत और बड़ी असरदार थी। जब वह अज़ान शुरू करते, तो हर कोई बड़े इश्क़ और वज्द से सुनता और बेख़ुद हो जाता। अज़ान देते हुए वह सबको रुला देते थे।
सहाबा-ए-किराम का नमाज़ के वक़्तों में एक-दूसरे को अज़ान-ए-मुहम्मदी के ज़रिए मस्जिद की तरफ़ बुलाना मदीना के मुशरिकों और यहूदियों को बहुत अजीब लगा। अज़ान दी जाती तो वे उसका मज़ाक़ उड़ाते और उसे खेल-तमाशा बना लेते। उनकी इन हरकतों के जवाब में अल्लाह तआला ने क़ुरआन-ए-करीम में फ़रमाया, जिसका मफ़हूम है: “जब तुम नमाज़ के लिए अज़ान देकर बुलाते हो, तो वे उसे खेल और तमाशा बना लेते हैं। यह इसलिए कि वे ऐसी क़ौम हैं जो अक़्ल से काम नहीं लेती।”9
मुअज़्ज़िन ने पुकारा, खड़ा हुआ, इक़ामत कही,
काबा की तरफ़ मुँह फेरा, और नीयत भी की।
ईमान वालों ने सुना तो अदब से सुना,
फिर नमाज़ में खड़े होकर रब की बंदगी की।
असहाब-ए-सुफ़्फ़ा
नबी-ए-करीम ने मस्जिद-ए-नबवी की उत्तरी दीवार से लगाकर खजूर की टहनियों का एक सायबान बनवाया। आपने हुक्म फ़रमाया कि मक्का से हिजरत करके आने वाले वे कुँवारे सहाबा, जिनके पास कोई माल-असबाब न था, वहाँ रहें।10 ये कुँवारे सहाबा और अन्सार व मुहाजिरों के ग़रीब लोग मस्जिद-ए-नबवी के पास सुफ़्फ़ा कहलाने वाले बड़े छप्पर के नीचे रहते और इल्म सीखने-सिखाने में लगे रहते थे। उनकी तादाद दस से चार सौ के बीच घटती-बढ़ती रहती थी। ज़्यादातर वे सत्तर लोग होते थे। ये सहाबा रसूलुल्लाह के पास से कभी जुदा न होते और आपकी किसी सोहबत से कभी पीछे न रहते थे। दिन-रात क़ुरआन-ए-करीम पढ़ते, इल्म हासिल करते, हदीस शरीफ़ याद करते थे। अपने ज़्यादातर दिन रोज़ा रखकर गुज़ारते; इबादत और फ़रमाँबरदारी से एक पल को भी अलग न होते थे। यहाँ तैयार होने वालों को नए-नए मुसलमान हुए क़बीलों में भेजा जाता, और वे उन्हें क़ुरआन-ए-करीम और सुन्नतें, यानी दीन-ए-इस्लाम सिखाते थे। बहुत-सी फ़ज़ीलतों वाले ये मुबारक सहाबा इरफ़ान का एक बड़ा लश्कर थे। नबी-ए-करीम उनसे बहुत मुहब्बत फ़रमाते, उनके साथ बैठकर बातें करते और मिलकर खाना खाते थे। वहाँ रहने वालों को असहाब-ए-सुफ़्फ़ा कहा जाता था। एक दिन रसूलुल्लाह ने असहाब-ए-सुफ़्फ़ा को देखा और उनकी बेहद ग़रीबी के बारे में सोचा। ऐसी हालत में होने के बावजूद वे दिल के सुकून और नूरानियत के साथ इबादत कर रहे थे। नबी-ए-करीम ने उन पर रहम फ़रमाकर उनसे फ़रमाया: “ऐ सुफ़्फ़ा वालो! तुम्हें ख़ुशख़बरियाँ हों! अगर मेरी उम्मत में कोई ऐसा शख़्स बाक़ी रहा जो उन सख़्त हालात पर राज़ी हो जिनमें तुम हो, तो वह ज़रूर मेरे दोस्तों में से है।”
“जब तुम नमाज़ के लिए अज़ान देकर बुलाते हो, तो वे उसे खेल और तमाशा बना लेते हैं। यह इसलिए कि वे ऐसी क़ौम हैं जो अक़्ल से काम नहीं लेती” माइदा: 58
हबीब-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) हर चीज़ से पहले अपने इन चुने हुए सहाबा की ज़रूरतें पूरी फ़रमाते, उसके बाद अपने अहले बैत की ज़रूरतें पूरी करने की कोशिश फ़रमाते थे। अबू हुरैरा ने यूँ बयान किया: “उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसके सिवा कोई माबूद नहीं, मैं कभी भूख से अपना पेट ज़मीन से लगाकर लेट जाता, कभी ज़मीन से उठाया हुआ पत्थर अपने पेट पर दबा लेता था। एक बार फिर मैं इसी हालत में था। उस दिन मैं उस रास्ते पर बैठा था जिससे रसूलुल्लाह मस्जिद जाया करते थे। उसी वक़्त आप, जिन्हें सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजा गया है और जो दोनों जहान की ज़ीनत हैं, नूर बिखेरते हुए मेरे पास तशरीफ़ लाए। आप मेरा हाल समझकर मुस्कुराए और फ़रमाया: ‘ऐ अबू हुरैरा!’ मैंने अर्ज़ किया: ‘मेरी जान आप पर क़ुरबान, हाज़िर हूँ, या रसूलल्लाह!’ तो आपने फ़रमाया: ‘मेरे साथ आओ।’ मैं फ़ौरन आपके पीछे चल दिया। आप अपने मुबारक घर में तशरीफ़ ले गए। घर में दूध का एक प्याला था। आपने फ़रमाया: ‘जाओ, अहले सुफ़्फ़ा के पास जाओ। उन्हें मेरे पास बुला लाओ।’ उन्हें बुलाने जाते हुए मैं अपने आप से सोच रहा था: ‘दूध का एक प्याला तमाम अहले सुफ़्फ़ा के लिए कैसे काफ़ी होगा? मुझे भी एक घूँट मिलेगा या नहीं?…’ मैंने उन्हें बुलाया, हम मुबारक घर पर आए, इजाज़त माँगकर अंदर दाख़िल हुए। जब सब मुनासिब जगहों पर बैठ गए, तो रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: ‘ऐ अबू हुरैरा! यह दूध का प्याला लो और उन्हें दो!’ मैंने प्याला लिया और बारी-बारी अपने साथियों को देने लगा। हर एक प्याला लेता, पेट भरकर पीता और मुझे लौटा देता। हर एक से लेते वक़्त मैं देखता कि प्याले में ज़रा भी कमी नहीं आई, वह पहले की तरह दूध से भरा हुआ है। इस तरह मैंने आए हुए अपने तमाम साथियों को पेश किया। सबने पी लिया और सेर हो गए। फिर रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने प्याला लिया, मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराए और फ़रमाया: ‘ऐ अबू हुरैरा! अब दूध पीने को बस मैं और तुम रह गए हैं। चलो, तुम भी बैठो और पियो!’ मैंने बैठकर पिया। आपने फ़रमाया: ‘और पियो!’ मैंने पिया। नबी-ए-करीम ने कई बार ‘पियो!’ फ़रमाया, और मैं भी हर बार पीता रहा। आख़िरकार मैंने अर्ज़ किया: ‘मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान हों, या रसूलल्लाह! अब और नहीं पी सकता। उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसने आपको हक़ दीन के साथ भेजा, मैं ख़ूब सेर हो गया हूँ।’ आपने फ़रमाया: ‘तो फिर प्याला मुझे दो।’ मैंने दे दिया। आपने अल्लाह तआला की हम्द-ओ-सना करने के बाद बिस्मिल्लाह पढ़कर दूध पिया।”
ये मुमताज़ सहाबा मस्जिद में रसूलुल्लाह की कोई सोहबत छोड़े बग़ैर इल्म हासिल करते थे, और मदीना के सहाबा उनसे बेमिसाल मुहब्बत रखते थे। एक शाम सुफ़्फ़ा वालों में से एक सहाबी, जिनमें भूख से ताक़त न रही थी, रसूलुल्लाह की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अपना हाल अर्ज़ किया। नबी-ए-करीम ने अपने मुबारक घर से पुछवाया कि खाने की कोई चीज़ है या नहीं। “इस वक़्त घर में पानी के सिवा खाने की कोई चीज़ नहीं” – यह जवाब मिला तो आपने वहाँ मौजूद सहाबा से फ़रमाया: “इस भूखे की मेहमाननवाज़ी कौन करेगा?” मदीना के सहाबा-ए-किराम में से एक ने सबसे पहले आगे बढ़कर अर्ज़ किया: “मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान हों, या रसूलल्लाह! इनकी मेहमाननवाज़ी मैं करूँगा।” वह अपने मेहमान के साथ घर गए और अपनी बीवी से कहा: “रसूलुल्लाह के मेहमान की ख़ातिरदारी के लिए कुछ तैयार करो।” बीवी ने जवाब दिया: “इस वक़्त हमारे घर में बच्चों के खाने के सिवा कुछ नहीं।” सहाबी ने कहा: “पहले बच्चों को सुला दो। फिर वह खाना ले आओ।” और सिर्फ़ एक आदमी के लायक़ खाना लेकर उस कमरे में गए जहाँ मेहमान था। दस्तरख़्वान बिछाकर उन्हें खाने की दावत दी। साथ खाना शुरू करने के बाद वह उठे और चिराग़ ठीक करने के बहाने उसे बुझा दिया। फिर अंधेरे में दस्तरख़्वान पर आ बैठे। ऐसी हरकतें करते हुए जैसे ख़ुद भी खा रहे हों, मेहमान के पेट भरने का इंतिज़ार करते रहे। मेहमान का पेट भर गया तो उन्होंने दस्तरख़्वान उठा लिया। उस रात उन्होंने अपने बच्चों समेत भूखे रहकर सुबह की। सुबह जब वे नबी-ए-करीम की ख़िदमत में हाज़िर हुए, तो रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “अल्लाह तआला तुम्हारे रात के इस अमल से ख़ुश हुआ।” इसके बाद अल्लाह तआला ने सूरह हश्र की 9वीं आयत-ए-करीमा नाज़िल फ़रमाई, जिसका मफ़हूम है: “वे (अन्सार) ख़ुद तंगी और मोहताजी में हों, तब भी (मुहाजिरों को) अपनी जानों पर तरजीह देते हैं।”
मिसरा:
चाहे कुछ भी हो, दोस्त की बातें करना सबसे मीठा है!
दिलों के सुल्तान की सोहबत
फ़ख़्र-ए-कायनात (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) सहाबा-ए-किराम की तरबियत करने और उन्हें कामिल बनाने के लिए मस्जिद-ए-नबवी में बेमिसाल सोहबतें फ़रमाते और अल्लाह तआला के अता किए हुए फ़ैज़ और बरकतें उनके दिलों में उतारते थे। जिन्हें नबी-ए-करीम की सोहबत में शामिल होने का शरफ़ मिलता, वे पहली ही सोहबत में अपने दिलों में बड़ी तब्दीली महसूस करते और बहुत ऊँची इलाही मारिफ़तें पा लेते थे। इन सोहबतों की बरकत से सहाबा-ए-किराम सबसे पहले हमारे प्यारे नबी से और फिर अपने तमाम सहाबी भाइयों से अपनी जानों से भी ज़्यादा मुहब्बत करने लगते थे। अल्लाह तआला ने आयात-ए-करीमा में उनकी तारीफ़ फ़रमाई है। रसूलुल्लाह की मुबारक मजलिस में वे ऐसे बैठते मानो उनके सिरों पर परिंदा बैठा हो और ज़रा-सी हरकत से उड़ जाएगा – बेहद अदब और बड़ी तवज्जोह के साथ। इस तरह सहाबा-ए-किराम नबियों और बड़े फ़रिश्तों के बाद तमाम मख़लूक़ात में सबसे अफ़ज़ल और सबसे बुलंद हो गए। रसूलुल्लाह अपने सहाबा को हमारे दीन के अहकाम और मनाहियाँ बारीकी से समझाते और सिखाते थे: ईमान और इस्लाम की शर्तें; नमाज़, रोज़े, हज और ज़कात के तमाम अहकाम; आयात-ए-करीमा की तफ़सीरें; हराम और हलाल खाने-पहनने की चीज़ें; क़समें, मन्नतें11 और कफ़्फ़ारे; ख़रीद-फ़रोख़्त के मसाइल; खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, मिलने-जुलने, बातचीत और सलाम के आदाब; पड़ोस, रिश्तेदारी और दोस्ती के ताल्लुक़ात; निकाह, नफ़क़ा, विरासत और मीरास के अहकाम; मुक़दमे, सज़ाएँ, मुआहदे और शिराकतें; सेहत और तंदुरुस्ती की बातें; दुश्मन से जंग, जंग के क़ानून… ग़रज़ दीन-ए-इस्लाम से ताल्लुक़ रखने वाले, आख़िरत और दुनिया से जुड़े तमाम इल्म अलिफ़ से ये तक इस तरह बयान फ़रमाते कि हर कोई समझ ले, और जिस बात को अहम समझते, उसे तीन बार दोहराते थे।12 औरतों से मुताल्लिक़ इल्म अपनी मुबारक बीवियों के ज़रिए सिखाते थे।
हदीस-ए-जिबराईल
मुसलमानों के बहादुर इमाम, सहाबा-ए-किराम के बुलंद मरतबा लोगों में से, हमेशा सच बोलने वाले के तौर पर मशहूर हमारे प्यारे बुज़ुर्ग उमर इब्ने ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं:
– वह एक ऐसा दिन था कि सहाबा-ए-किराम में से हम कुछ लोग रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ख़िदमत में और आपके हुज़ूर में हाज़िर थे। वह दिन, वह घड़ी ऐसी इज़्ज़त वाली, ऐसी क़ीमती और कभी हाथ न आने वाली थी। उस दिन हमें रसूलुल्लाह की सोहबत में, आपके पास होने का शरफ़ और आपका वह जमाल देखना नसीब हुआ था जो रूहों की ग़िज़ा है और जानों को ज़ौक़ और सफ़ा बख़्शता है। (इस दिन की इज़्ज़त और क़द्र बताने के लिए उन्होंने “वह एक ऐसा दिन था कि…” फ़रमाया। जिबराईल अलैहिस्सलाम को इंसानी शक्ल में देखना, उनकी आवाज़ सुनना, बंदों को जिस इल्म की ज़रूरत है उसे बहुत ख़ूबसूरत और साफ़ तौर पर रसूलुल्लाह के मुबारक मुँह से सुनना जिस दिन नसीब हुआ हो, क्या उस जैसा इज़्ज़त वाला और क़ीमती कोई वक़्त हो सकता है?)
“ऐ सुफ़्फ़ा वालो! तुम्हें ख़ुशख़बरियाँ हों! अगर मेरी उम्मत में कोई ऐसा शख़्स बाक़ी रहा जो उन सख़्त हालात पर राज़ी हो जिनमें तुम हो, तो वह ज़रूर मेरे दोस्तों में से है” हदीस शरीफ़
उसी वक़्त चाँद के निकलने की तरह एक बुज़ुर्ग हस्ती हमारे पास आई। उनके कपड़े बहुत सफ़ेद और बाल बहुत काले थे। उन पर गर्द, मिट्टी, पसीने जैसी सफ़र की कोई निशानी दिखाई नहीं देती थी। रसूलुल्लाह के सहाबा होते हुए भी हममें से कोई उन्हें नहीं पहचानता था। यानी वह हमारे देखे-भाले लोगों में से न थे। वह रसूलुल्लाह के सामने बैठ गए। अपने घुटने आपके मुबारक घुटनों से मिला दिए। (यह आने वाले जिबराईल थे। इंसान की शक्ल में आए थे। जिबराईल अलैहिस्सलाम का इस तरह बैठना एक अहम बात बताने के लिए था। यानी यह दिखाता है कि दीन का इल्म सीखने के लिए शर्माना ठीक नहीं और उस्ताद के सामने ग़ुरूर और तकब्बुर मुनासिब नहीं। हर किसी को चाहिए कि दीन में जो कुछ सीखना चाहे, मुअल्लिमों से बेझिझक और बिना शर्माए पूछे – यह बात जिबराईल अलैहिस्सलाम अपनी इस हालत से सहाबा-ए-किराम को समझा रहे थे, क्योंकि दीन सीखने में शर्माना और अल्लाह तआला का हक़ अदा करने, सिखाने और सीखने में झिझकना ठीक नहीं।)
उस मुबारक हस्ती ने अपने हाथ रसूल-ए-अकरम के मुबारक घुटनों पर रखे और कहा: “या रसूलल्लाह! मुझे इस्लाम और मुसलमान होने के बारे में बताइए।”
रसूल-ए-अकरम ने फ़रमाया: “इस्लाम की शर्तों में से पहली कलिमा-ए-शहादत पढ़ना है। (कलिमा-ए-शहादत पढ़ने का मतलब है ‘अशहदु अल्ला इलाह इल्लल्लाह व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू’ कहना। यानी अक़्ल वाला, बालिग़ और बोल सकने वाला इंसान यह कहे: ’ज़मीन में और आसमान में उसके सिवा कोई चीज़ और कोई हस्ती इबादत और बंदगी के लायक़ नहीं।
हक़ीक़ी माबूद सिर्फ़ अल्लाह तआला है। वह वाजिबुल वुजूद है। हर कमाल उसी में है। उसमें कोई कमी नहीं। उसका नाम अल्लाह है।’ – और इस पर दिल से पक्का यक़ीन रखे। और यह भी कहे: ‘गुलाब जैसे रंग वाले, सफ़ेद-सुर्ख़, चमकते, प्यारे चेहरे वाले, काली भौंहों और काली आँखों वाले, खुली मुबारक पेशानी वाले, अच्छे अख़लाक़ वाले, जिनका साया ज़मीन पर नहीं पड़ता और जो मीठी बात करने वाले हैं, अरब में, मक्का में पैदा होने की वजह से अरबी कहलाने वाले, हाशिमी ख़ानदान से, अब्दुल्लाह के बेटे मुहम्मद नाम की बुलंद हस्ती अल्लाह तआला के बंदे और रसूल, यानी नबी हैं।’)
फिर वक़्त आने पर नमाज़ पढ़ना है। माल की ज़कात देना है। रमज़ान शरीफ़ के महीने में हर दिन रोज़ा रखना है। जिसमें ताक़त हो, उसका ज़िंदगी में एक बार हज करना है।”
उस हस्ती ने रसूलुल्लाह से ये जवाब सुनकर कहा: “आपने सच फ़रमाया, या रसूलल्लाह!” हम सुनने वालों को उनकी इस बात पर हैरत हुई: “ख़ुद ही पूछते हैं, ख़ुद ही तस्दीक़ करते हैं!”
उस हस्ती ने फिर कहा: “या रसूलल्लाह! मुझे यह भी बताइए कि ईमान क्या है।” (इस हदीस शरीफ़ में ईमान के लुग़वी मायने के बारे में नहीं सोचना चाहिए, क्योंकि लुग़वी मायने तस्दीक़ करना और यक़ीन करना है, और अरब के जाहिलों में भी कोई ऐसा न था जो यह मायने न जानता हो। फिर भला सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम अजमईन) इसे कैसे न जानते? जिबराईल अलैहिस्सलाम सहाबा-ए-किराम को ईमान का मतलब सिखाना चाहते थे। यहाँ यह पूछा जा रहा है कि इस्लाम में किस चीज़ को ईमान कहा जाता है।) रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने भी बताया कि ईमान छह मुक़र्रर चीज़ों पर यक़ीन करने का नाम है: “सबसे पहले अल्लाह तआला पर, उसके फ़रिश्तों पर, उसकी किताबों पर, उसके रसूलों पर, आख़िरत के दिन पर, तक़दीर पर, और इस पर कि भलाई और बुराई अल्लाह तआला की तरफ़ से है, ईमान लाना।” उस हस्ती ने फिर कहा: “आपने सच फ़रमाया।” और तस्दीक़ की।
फिर उन्होंने दोबारा कहा: “या रसूलल्लाह! मुझे यह भी बताइए कि एहसान क्या है।” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “यह है कि तुम अल्लाह तआला की इबादत ऐसे करो जैसे उसे देख रहे हो, क्योंकि अगरचे तुम उसे नहीं देखते, मगर वह तुम्हें यक़ीनन देखता है।” उस हस्ती ने फिर कहा: “या रसूलल्लाह! मुझे क़यामत के बारे में ख़बर दीजिए!” रसूल अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: “इस मसले में जिससे पूछा जा रहा है, वह पूछने वाले से ज़्यादा नहीं जानता।” उस हस्ती ने फिर कहा: “तो उसकी निशानियाँ बताइए।” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “जब लौंडियाँ अपने मालिकों को जनें, और जब तुम देखो कि नंगे पाँव, नंगे बदन, ग़रीब चरवाहे (अमीर होकर) ऊँची इमारतें बनाने में एक-दूसरे से मुक़ाबला कर रहे हैं।” इसके बाद वह मुड़े और चले गए। रसूलुल्लाह ने मेरी तरफ़ मुड़कर पूछा: “ऐ उमर! जानते हो, पूछने वाला कौन था?” मैंने अर्ज़ किया: “अल्लाह तआला और उसके रसूल बेहतर जानते हैं।” तब रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “वह जिब्रील (जिबराईल) थे। तुम्हें तुम्हारा दीन सिखाने आए थे।”13 हमारे प्यारे नबी अपने सहाबा को उनके दीनी दर्जों के मुताबिक़, उनकी समझ के लायक़ बयान फ़रमाते थे।
सहाबा-ए-किराम में सबसे बुलंद लोगों में से हज़रत उमर एक दिन मस्जिद जा रहे थे कि उन्होंने देखा, रसूलुल्लाह अबू बकर सिद्दीक़ को कुछ बयान फ़रमा रहे हैं। वह उनके पास जाकर सुनने लगे। यह दूसरों ने भी देखा, लेकिन आकर सुनने से झिझके। अगले दिन हज़रत उमर को देखकर उन्होंने कहा: “ऐ उमर! कल रसूलुल्लाह आप लोगों को कुछ बता रहे थे। हमें भी बताइए, ताकि हम भी जान लें।” दरअसल रसूलुल्लाह हमेशा फ़रमाया करते थे: “मुझसे जो सुनो, अपने दीनी भाइयों को भी बताओ! एक-दूसरे तक पहुँचाओ!” हज़रत उमर ने कहा: “कल हज़रत अबू बकर ने क़ुरआन-ए-करीम की एक ऐसी आयत-ए-करीमा का मतलब पूछा था जो वह समझ न सके थे, और रसूलुल्लाह उन्हें समझा रहे थे। मैं एक घंटा सुनता रहा, मगर कुछ न समझ सका।” दरअसल आप हज़रत अबू बकर के बुलंद दर्जे के मुताबिक़ बयान फ़रमा रहे थे। हज़रत उमर इतने बुलंद थे कि रसूलुल्लाह ने उनके बारे में फ़रमाया: “मैं नबियों में आख़िरी हूँ। मेरे बाद कोई नबी नहीं आएगा। अगर मेरे बाद कोई नबी आता, तो उमर नबी होते।” इतने बुलंद होने और अपनी मादरी ज़बान अरबी को बहुत अच्छी तरह जानने के बावजूद वह क़ुरआन-ए-करीम की उस तफ़सीर को न समझ सके जो हज़रत अबू बकर को बयान की गई थी। अबू बकर का दर्जा उनसे बहुत ज़्यादा बुलंद था। हज़रत अबू बकर, बल्कि जिबराईल अलैहिस्सलाम भी क़ुरआन-ए-करीम के मायने और उसके असरार रसूलुल्लाह से पूछा करते थे। रसूलुल्लाह ने पूरे क़ुरआन-ए-करीम की तफ़सीर अपने सहाबा को बता दी है।
हमारे प्यारे नबी अपने सहाबा को दीन सिखाने के साथ-साथ मुक़दमों की सुनवाई भी फ़रमाते, गवाहों को सुनकर सबसे मुश्किल झगड़ों का फ़ैसला करते, इस्लाम को पहचनवाने और फैलाने के लिए, एक और इंसान को जहन्नम की आग से बचाने के लिए बड़ी कोशिश फ़रमाते, अपने तौर-तरीक़ों से लोगों के लिए नमूना बनते, और मोमिनों को मुशरिकों के शर से बचाने के लिए ज़रूरी तदबीरें भी करवाते थे।
“ऐ उमर! जानते हो, पूछने वाला कौन था? वह जिब्रील (जिबराईल) थे। तुम्हें तुम्हारा दीन सिखाने आए थे” हदीस शरीफ़
ऐ वह जमाल जो औलिया की आँखों का नूर है,
मदद कीजिए, ऐ अल्लाह के नूर की खान!
आपके क़दमों की ख़ाक असफ़िया की आँखों का सुरमा है,
मदद कीजिए, ऐ अल्लाह के नूर की खान!
आपके बिना कोई हक़ तक नहीं पहुँच सकता,
आपके लुत्फ़ के फ़ैज़ से इंसान मक़बूल होता है,
आप “रहमतुल लिल आलमीन” हैं, ऐ रसूल,
मदद कीजिए, ऐ अल्लाह के नूर की खान!
मैंने बेहद ख़ताएँ कीं, गुनाह किए,
नफ़्स की ख़्वाहिश के पीछे चलने वालों का साथी बना,
मेरे गुनाहों की माफ़ी के लिए शफ़ाअत कीजिए, ऐ करीम,
मदद कीजिए, ऐ अल्लाह के नूर की खान!
ऐ सख़ावत की खान, किबरिया के रसूल,
ख़ताओं से भरा यह सलीमी आपका अदना ग़ुलाम है,
आपके दर पर पनाह लेता है, आपसे अता माँगता है,
मदद कीजिए, ऐ अल्लाह के नूर की खान!
Yavuz Sultan Selim (Selîmî)
