मेरे प्यारे नबी

अक़बा की बैअतें

अक़बा की पहली बैअत

बेसत के ग्यारहवें साल ज़िलहिज्जा के महीने में असअद इब्ने ज़ुरारा और उनके ग्यारह साथी हज के ज़माने में फिर मक्का आए। सारे जहानों के सरदार से उनकी पिछली मुलाक़ात को पूरा एक साल गुज़र चुका था। उस साल मुशरिक मुसलमानों को हर साल से ज़्यादा तकलीफ़ें और ईज़ाएँ दे रहे थे। वे रसूलुल्लाह का लगातार पीछा करते और जो भी आपसे बात करता, उस पर ज़ुल्म ढाते थे। यह जानकर मदीना वालों ने हमारे नबी से रात के वक़्त अक़बा में मिलने का वादा लिया। रात हुई तो वे मिले। उन्होंने अपनी वफ़ादारी पेश की और आपके हर हुक्म और हर ख़्वाहिश के आगे सिर झुकाने का वादा करके बैअत की। इस अहद में उन्होंने “अल्लाह तआला के साथ किसी को शरीक न ठहराने, ज़िना न करने, चोरी न करने, बोहतान से बचने और रुसवाई और रोज़ी के डर से अपनी औलाद को क़त्ल न करने” का पक्का वादा किया।1

हमारे प्यारे नबी ने इन 12 लोगों को, जिनमें से दो औस क़बीले के और बाक़ी ख़ज़रज क़बीले के थे, अपने-अपने क़बीलों का नुमाइंदा बनाया। उन्हें अपने क़बीलों को इस्लाम समझाना था और उनकी तरफ़ से रसूलुल्लाह के सामने ज़ामिन बनना था। असअद इब्ने ज़ुरारा को सबकी तरफ़ से नुमाइंदा मुक़र्रर किया गया। पिछले साल अक़बा की मुलाक़ात में शामिल 5 और नए-नए इस्लाम क़बूल करने वाले 7 लोग ये थे: बनू मालिक इब्ने नज्जार से असअद इब्ने ज़ुरारा, औफ़ इब्ने हारिस और मुआज़ इब्ने हारिस; बनू ज़ुरैक़ इब्ने आमिर से राफ़े इब्ने मालिक और ज़कवान इब्ने अब्दे क़ैस; बनू ग़न्म इब्ने औफ़ से उबादा इब्ने सामित; बनू ग़ुसैना से यज़ीद इब्ने सालबा; बनू अजलान इब्ने ज़ैद से अब्बास इब्ने उबादा; बनू हराम इब्ने कअब से उक़बा इब्ने आमिर; बनू सवाद इब्ने ग़न्म से क़ुतबा इब्ने आमिर; बनू अब्दुल अशहल इब्ने जुशम से अबुल हैसम मालिक इब्ने तय्यिहान और बनू अम्र इब्ने औफ़ से उवैम इब्ने साइदा।

मदीना में उगा सूरज

अक़बा की पहली बैअत (अहद) के बाद हज़रत असअद इब्ने ज़ुरारा और उनके साथी मदीना लौटे और दिन-रात अपने क़बीलों को इस्लाम समझाकर उन्हें हक़ दीन की दावत देते रहे। इस दावत के नतीजे में इस्लाम मदीना में तेज़ी से फैलने लगा। यहाँ तक कि औस और ख़ज़रज क़बीले, जो पहले एक-दूसरे के दुश्मन थे, एक हो गए और इस्लाम को और अच्छी तरह सीखने के लिए उन्होंने रसूलुल्लाह से एक मुअल्लिम माँगा। रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने क़ुरआन-ए-करीम और इस्लाम सिखाने के लिए मक्का के अपने सहाबा में से हज़रत मुसअब इब्ने उमैर को उस्ताद बनाकर मदीना भेजा। हज़रत मुसअब, हज़रत असअद के घर ठहरे। दोनों ने मिलकर घर-घर जाकर हर किसी तक इस्लाम का पैग़ाम पहुँचाया। उन्होंने लोगों से चाहा कि वे रसूलुल्लाह से मुहब्बत करें और आपको तमाम दुश्मनों से बचाने के लिए जी-जान से कोशिश करने का वादा करें। इस तरह उन्होंने लोगों को रसूलुल्लाह के साथ होने वाली बैअत के लिए तैयार किया। असअद इब्ने ज़ुरारा के क़बीले के सरदार साद इब्ने मुआज़ थे, और दोनों आपस में रिश्तेदार थे। उस ज़माने में अरबों में रिश्तेदारों की तौहीन से बचने का रिवाज था, इसलिए साद इब्ने मुआज़ ने, जो अभी ईमान नहीं लाए थे, असअद इब्ने ज़ुरारा के घर जाकर इस काम को रोकने की कोशिश नहीं की। क़बीले के सरदार की हैसियत से वह ख़ुद इसमें दख़ल नहीं देना चाहते थे। इसी मक़सद से उन्होंने अपने क़बीले के बड़े लोगों में से उसैद इब्ने हुज़ैर से कहा: “हमारे मोहल्ले में जाओ, उस आने वाले आदमी को देखो और जो करना हो, करो। अगर असअद मेरी ख़ाला का बेटा न होता, तो मैं यह काम तुम्हारे सुपुर्द न करता।”

इस पर उसैद इब्ने हुज़ैर अपना नेज़ा लेकर उस घर गए जहाँ हज़रत मुसअब इब्ने उमैर ठहरे हुए थे। वहाँ पहुँचकर वह ग़ुस्से से बोलने लगे: “तुम हमारे यहाँ क्यों आए हो? लोगों को बहकाते हो! अगर अपनी जान प्यारी है, तो फ़ौरन यहाँ से चले जाओ!” उनकी यह ग़ुस्से भरी हालत देखकर मुसअब इब्ने उमैर ने बहुत नरमी और अदब से जवाब दिया: “ज़रा बैठिए तो, हमारी बात सुनिए! हमारा मक़सद समझिए, पसंद आए तो क़बूल कर लीजिए। वरना हमें रोक दीजिए…” उसैद का ग़ुस्सा ठंडा हो गया। उन्होंने कहा: “तुमने ठीक कहा।” और अपना नेज़ा ज़मीन में गाड़कर बैठ गए। उन्होंने हज़रत मुसअब की मीठी बातें, इंसान के दिल में उतर जाने वाले अल्फ़ाज़ और ख़ूबसूरत आवाज़ में पढ़ी गई क़ुरआन-ए-करीम की आयतें सुनीं। बेख़ुद होकर बोल उठे: “यह कितनी अच्छी चीज़ है!” फिर पूछा: “इस दीन में दाख़िल होने के लिए क्या करना होता है?” उन्हें बताया गया, और उसैद इब्ने हुज़ैर कलिमा-ए-शहादत पढ़कर मुसलमान हो गए। हज़रत उसैद ख़ुशी के मारे अपनी जगह टिक नहीं पा रहे थे। उन्होंने कहा: “मैं जाकर आपके पास एक आदमी को भेजता हूँ। अगर वह मुसलमान हो गया, तो मदीना में उसकी क़ौम का कोई ऐसा आदमी नहीं बचेगा जो ईमान न लाए…” और जल्दी से उठकर चल दिए। वह सीधे साद इब्ने मुआज़ के पास पहुँचे। उन्हें देखते ही साद इब्ने मुआज़ ने कहा: “मैं क़सम खाता हूँ, उसैद यहाँ से जिस चेहरे के साथ गए थे, उस चेहरे के साथ नहीं लौट रहे।” फिर पूछा: “ऐ उसैद! क्या किया?” हज़रत उसैद इब्ने हुज़ैर दिल से चाहते थे कि साद इब्ने मुआज़ मुसलमान हो जाएँ, इसलिए उन्होंने यह जवाब दिया: “मैंने उस आदमी (मुसअब इब्ने उमैर) से बात की, उनमें कोई बुराई नहीं देखी। मगर हमने सुना है कि बनू हारिसा तुम्हारी ख़ाला के बेटे असअद को क़त्ल करने निकल पड़े हैं, क्योंकि उन्हें शक है कि उसने ऐसे आदमी को अपने घर में पनाह दी है।” ये बातें साद इब्ने मुआज़ को बहुत चुभीं, क्योंकि कुछ साल पहले एक जंग में उन्होंने बनू हारिसा को हराकर ख़ैबर में पनाह लेने पर मजबूर कर दिया था। एक साल बाद उन्हें माफ़ करके अपने वतन लौटने की इजाज़त भी दे दी थी। इसके बावजूद उनके ऐसा रवैया अपनाने के ख़याल ने साद इब्ने मुआज़ को बहुत ग़ुस्सा दिला दिया। हालाँकि असल में ऐसी कोई बात नहीं थी। उसैद इब्ने हुज़ैर ने यह तदबीर इसलिए अपनाई थी कि साद इब्ने मुआज़ अपनी ख़ाला और उनके बेटे असअद इब्ने ज़ुरारा को, और इस तरह मुसअब इब्ने उमैर को कोई नुक़सान न पहुँचाएँ। यूँ उन्होंने साद के उन लोगों की तरफ़ आने और आख़िरकार मुसलमान होने की ज़मीन तैयार कर दी। उसैद इब्ने हुज़ैर की इन बातों पर साद इब्ने मुआज़ अपनी जगह से उछलकर उठे और हज़रत असअद इब्ने ज़ुरारा के पास चल दिए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि असअद और मुसअब इब्ने उमैर बड़े सुकून और इत्मीनान से बैठे बातचीत कर रहे हैं। उनके क़रीब जाकर उन्होंने कहा: “ऐ असअद! अगर हमारे बीच रिश्तेदारी न होती, तो तुम ये सब न कर पाते…” इन बातों का जवाब हज़रत मुसअब इब्ने उमैर ने दिया: “ऐ साद! ज़रा ठहरिए, बैठिए और हमारी बात सुनिए, समझिए… हमारी बातें आपको अच्छी लगें तो क्या ही ख़ूब, और पसंद न आएँ, तो हम यह आपके सामने पेश नहीं करेंगे। आप भी उठकर चले जाइएगा!” इन नरम और मीठी बातों के आगे साद इब्ने मुआज़ का ग़ुस्सा ठंडा हो गया, वह एक तरफ़ बैठ गए और उनकी बात सुनने लगे। हज़रत मुसअब इब्ने उमैर ने साद इब्ने मुआज़ को पहले इस्लाम के बारे में बताया। इस्लाम के बुनियादी उसूल समझाए। फिर अपनी मीठी और ख़ूबसूरत आवाज़ में क़ुरआन-ए-करीम का कुछ हिस्सा पढ़ा। जैसे-जैसे वह पढ़ते जाते, साद इब्ने मुआज़ की हालत बदलती जाती, वह बेख़ुद होते जाते। क़ुरआन-ए-करीम की बेमिसाल बलाग़त के आगे उनका दिल नरम पड़ गया और उन पर गहरा असर हुआ। वह ख़ुद को रोक न सके और पूछ बैठे: “आप लोग इस दीन में दाख़िल होने के लिए क्या करते हैं?” मुसअब इब्ने उमैर ने फ़ौरन उन्हें कलिमा-ए-शहादत सिखाया। उन्होंने भी “अशहदु अल्ला इलाह इल्लल्लाह व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू” कहकर इस्लाम क़बूल कर लिया। मुसलमान होने से मिलने वाले सुकून और ख़ुशी के मारे साद इब्ने मुआज़ अपनी जगह न टिक पाते थे। वह फ़ौरन अपने घर गए और जैसा सिखाया गया था, ग़ुस्ल किया। फिर उन्होंने अपनी क़ौम को जमा करने को कहा। उसैद इब्ने हुज़ैर को साथ लेकर वह लोगों के मजमे में पहुँचे। बनू अब्दुल अशहल को मुख़ातब करके पूछा: “ऐ बनू अब्दुल अशहल! तुम मुझे कैसा आदमी जानते हो?” उन्होंने एक ज़बान होकर जवाब दिया: “आप हमारे सरदार और हमारे बड़े हैं, हम आपके पीछे चलने वाले हैं!” उनकी यह बात सुनकर साद इब्ने मुआज़ ने कहा: “तो फिर मैं तुम सबको ख़बर देता हूँ: मुझे मुसलमान होने का शरफ़ हासिल हुआ है। मैं चाहता हूँ कि तुम भी अल्लाह तआला और उसके रसूल पर ईमान लाओ। अगर तुम ईमान नहीं लाए, तो मैं तुममें से किसी से न बात करूँगा, न मिलूँगा!…”

“तो फिर मैं तुम सबको ख़बर देता हूँ: मुझे मुसलमान होने का शरफ़ हासिल हुआ है। मैं चाहता हूँ कि तुम भी अल्लाह तआला और उसके रसूल पर ईमान लाओ” साद इब्ने मुआज़ (रज़ियल्लाहु अन्हु)

सनतुस सुरूर (ख़ुशी का साल)

बनू अब्दुल अशहल ने जैसे ही सुना कि उनके सरदार साद इब्ने मुआज़ मुसलमान हो गए हैं और उन्हें भी इस्लाम की दावत दे रहे हैं, सब के सब मुसलमान हो गए। उस दिन शाम तक उन्होंने मदीना के आसमान को कलिमा-ए-शहादत और तकबीर की आवाज़ों से गुँजा दिया।2 बनू अब्दुल अशहल के इकट्ठे मुसलमान होने के थोड़े ही अरसे बाद मदीना की सारी आबादी, औस और ख़ज़रज क़बीलों ने भी इस्लाम क़बूल कर लिया। हर घर इस्लाम के नूर से रौशन हो गया। साद इब्ने मुआज़ और उसैद इब्ने हुज़ैर ने अपने क़बीलों के तमाम बुत तोड़ डाले। जब यह ख़बर हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को दी गई, तो आप बहुत ख़ुश हुए। मक्का के मुसलमान ख़ुशी से भर उठे। इसी वजह से इस साल (621 ईसवी) को “सनतुस सुरूर” (ख़ुशी का साल) कहा गया।

अस्सलातु वस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह!
अस्सलातु वस्सलामु अलैका या हबीबल्लाह!
अस्सलातु वस्सलामु अलैका या सय्यिदल अव्वलीना वल आख़िरीन!

अक़बा की दूसरी बैअत

बेसत के बारहवें साल मक्का के मुशरिकों का मुसलमानों पर ज़ुल्म अपनी इंतिहा को पहुँच गया था और बर्दाश्त से बाहर हो चुका था। मदीना में, इसके बरख़िलाफ़, असअद इब्ने ज़ुरारा और मुसअब इब्ने उमैर की ख़िदमतों की बदौलत औस और ख़ज़रज के लोग ऐसे इश्क़ और शौक़ में डूबे हुए थे कि वे मुसलमानों के लिए अपनी बाँहें खोलने, उन्हें सीने से लगाने और उनकी राह में हर क़ुरबानी देने को तैयार थे। वे चाहते थे कि रसूलुल्लाह जल्द से जल्द मदीना तशरीफ़ लाएँ, और वादा कर रहे थे कि आपकी राह में अपने माल और अपनी जानें दरेग़ नहीं करेंगे। हज का ज़माना आ गया। ज़िलहिज्जा के महीने में मुसअब इब्ने उमैर के साथ मदीना के 73 मर्द और 2 औरतें, सब मुसलमान, मक्का आए। हज के बाद ये सब फिर अक़बा में हमारे नबी से मिले। असअद इब्ने ज़ुरारा समेत 12 नुमाइंदों ने अपने क़बीलों की तरफ़ से हमारे नबी से मदीना हिजरत फ़रमाने की गुज़ारिश और पेशकश की। रसूलुल्लाह ने उन्हें क़ुरआन-ए-करीम की कुछ आयतें पढ़कर सुनाईं, फिर उनसे पक्का वादा माँगा कि जिस तरह वे अपनी जानों और अपने बाल-बच्चों की हिफ़ाज़त और देखभाल करते हैं, उसी तरह आपकी भी हिफ़ाज़त करेंगे। वहाँ रसूलुल्लाह के चचा हज़रत अब्बास भी मौजूद थे, जो अभी मुसलमान नहीं हुए थे। उन्होंने बैअत के लिए आए इन लोगों से यूँ ख़िताब किया: “ऐ मदीना वालो! यह मेरे भाई के बेटे हैं। लोगों में मुझे सबसे ज़्यादा प्यारे भी यही हैं। अगर तुम इनकी तस्दीक़ करते हो, जो कुछ यह अल्लाह की तरफ़ से लाए हैं उस पर ईमान रखते हो और इन्हें अपने साथ ले जाना चाहते हो, तो तुम्हें मुझे मुतमइन करने वाला पक्का वादा देना होगा। जैसा कि तुम जानते हो, मुहम्मद अलैहिस्सलाम हम में से हैं। हमने इन्हें उन लोगों से बचाया जो इन पर ईमान नहीं लाए। यह हमारे बीच इज़्ज़त और शरफ़ के साथ महफ़ूज़ रहकर ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं। इस सबके बावजूद इन्होंने सबसे मुँह मोड़कर तुमसे मिल जाने और तुम्हारे साथ जाने का फ़ैसला किया है। अगर तुम्हारे पास इतनी जंगी ताक़त है कि जब तमाम अरब क़बीले मिलकर तुम पर हमला करें तो उनका मुक़ाबला कर सको, तो इस काम में हाथ डालो। इस मामले पर आपस में अच्छी तरह मशवरा और बातचीत कर लो, बाद में फूट का शिकार न होना। क्या तुम अपने दिए हुए वादे पर क़ायम रहकर इन्हें इनके दुश्मनों से बचा सकोगे? अगर यह काम जैसा चाहिए वैसा कर सको, तो क्या ही अच्छा। लेकिन अगर मक्का से निकलने के बाद इन्हें अकेला छोड़ दोगे, तो अभी से इरादा छोड़ दो, ताकि यह अपने वतन में इज़्ज़त के साथ महफ़ूज़ रहकर ज़िंदगी गुज़ारें।” हज़रत अब्बास की इस बात से मदीना के मुसलमान रंजीदा हो गए। मानो उन्हें ऐसी बात सुननी पड़ी हो कि जब वे रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को अपने वतन ले जाएँगे तो आपको मुशरिकों से बचा नहीं सकेंगे और मुश्किल पड़ते ही आपको छोड़ देंगे। मदीना के सहाबा में से हज़रत असअद इब्ने ज़ुरारा ने नबी-ए-करीम की तरफ़ मुड़कर अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! इजाज़त हो तो कुछ बातें आपकी ख़िदमत में अर्ज़ करूँ।” फ़ख़्र-ए-कायनात ने इजाज़त दी, तो हज़रत असअद ने कहा: “मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान हों, या रसूलल्लाह! हर दावत का एक नरम या सख़्त रास्ता और तरीक़ा होता है। अब आप हमें एक ऐसी बात की दावत दे रहे हैं जिसे क़बूल करना लोगों के लिए बहुत मुश्किल है, क्योंकि लोगों के लिए उन बुतों को छोड़कर, जिनकी वे पुराने ज़माने से पूजा करते आए हैं, इस्लाम क़बूल करना बहुत भारी है। इसके बावजूद हमने इस्लाम को पूरे दिल से क़बूल किया। फिर आपने हमें अपने मुशरिक रिश्तेदारों से ताल्लुक़ तोड़ने का हुक्म दिया, हमने इसे भी इख़लास से क़बूल किया। आप जानते हैं कि इसे क़बूल करना भी बहुत मुश्किल है। आपकी उस बुलंद ज़ात के लिए, जिसकी हिफ़ाज़त आपके चचाओं तक ने दुश्मन बनकर नहीं की, हमने अपनी बाँहें खोल दीं और इस इज़्ज़त वाले फ़र्ज़ को अपने ऊपर वाजिब और ज़रूरी जाना। हम सब अपनी इन बातों पर एक राय हैं। जो कुछ ज़बान से कहते हैं, दिल से उसकी तस्दीक़ करते हैं। जिस तरह हम अपने बाल-बच्चों की हिफ़ाज़त करते हैं, उसी तरह आपके मुबारक जिस्म की भी अपने ख़ून के आख़िरी क़तरे तक हिफ़ाज़त करने की क़सम खाते हैं। अगर हम यह अहद तोड़ें, तो अल्लाह तआला से किए हुए वादे पर क़ायम न रहकर बदबख़्तों के गिरोह में शामिल हो जाएँ। या रसूलल्लाह! हम अपनी इस बात में सच्चे हैं। अल्लाह तआला कामयाबी अता फ़रमाए!” फिर उन्होंने अपनी बात यूँ जारी रखी: “या रसूलल्लाह! आप हमसे अपने लिए जो ज़मानत चाहें, ले सकते हैं और जो शर्त चाहें, रख सकते हैं।”

नबी-ए-करीम ने उन्हें इस्लाम पर उभारा और क़ुरआन-ए-करीम पढ़ा। फिर फ़रमाया: “तुमसे मेरे रब के लिए मेरी शर्त यह है कि तुम अल्लाह तआला की इबादत करो और किसी चीज़ को उसका शरीक न ठहराओ; और अपने और अपने सहाबा के लिए मेरी शर्त यह है कि तुम हमें अपने यहाँ ठिकाना दो, मेरी और मेरे सहाबा की मदद करो और जिन चीज़ों से तुम अपना बचाव और अपनी हिफ़ाज़त करते हो, उनसे हमें भी बचाओ।”

बरा इब्ने मारूर ने कहा: “उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसने आपको हक़ दीन और किताब के साथ नबी बनाकर भेजा, जिस तरह हम अपने बाल-बच्चों का बचाव और हिफ़ाज़त करते हैं, उसी तरह आपकी भी हिफ़ाज़त करेंगे! हमसे बैअत लीजिए, या रसूलल्लाह!” मदीना के मुसलमानों में से अब्बास इब्ने उबादा ने नबी-ए-करीम के साथ होने वाले इस अहद को पक्का करने के लिए अपने साथियों से कहा: “ऐ ख़ज़रज वालो! क्या तुम जानते हो कि तुम मुहम्मद अलैहिस्सलाम को किस लिए क़बूल कर रहे हो?” उन्होंने जवाब दिया: “हाँ।” इस पर उन्होंने कहा: “तुम इन्हें अमन के ज़माने के लिए भी और जंग के ज़माने के लिए भी क़बूल करके इनकी पैरवी कर रहे हो। अगर तुम्हारे मालों को नुक़सान पहुँचने पर, तुम्हारे रिश्तेदारों और अज़ीज़ों के हलाक होने पर तुम हमारे नबी को अकेला और बेयार-ओ-मददगार छोड़ दोगे, तो यह अभी कर लो। अल्लाह की क़सम, अगर तुमने ऐसा किया तो दुनिया और आख़िरत दोनों में हलाक हो जाओगे! अगर इनकी दावत की राह में तुम्हारे माल चले जाने और तुम्हारे क़रीबी रिश्तेदारों के क़त्ल हो जाने के बावजूद तुम्हारी अक़्ल यह मानती है कि तुम इनसे वफ़ा करोगे, तो इनका दामन थाम लो। अल्लाह की क़सम, यह तुम्हारी दुनिया और आख़िरत दोनों के लिए बेहतर है।” इस पर उनके साथियों ने कहा: “हमारे माल बर्बाद हो जाएँ, हमारे अज़ीज़ क़त्ल कर दिए जाएँ, तब भी हम अपने नबी को नहीं छोड़ेंगे। इनसे कभी जुदा नहीं होंगे। मरना मंज़ूर है, पीछे हटना नहीं!”

“अगर हम यह अहद तोड़ें, तो अल्लाह तआला से किए हुए वादे पर क़ायम न रहकर बदबख़्तों के गिरोह में शामिल हो जाएँ। या रसूलल्लाह! हम अपनी इस बात में सच्चे हैं। अल्लाह तआला कामयाबी अता फ़रमाए!” असअद इब्ने ज़ुरारा (रज़ियल्लाहु अन्हु)

फिर उन्होंने नबी-ए-करीम की तरफ़ मुड़कर पूछा: “या रसूलल्लाह! अगर हम अपना यह अहद पूरा करें, तो हमारे लिए क्या है?” तब हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “अल्लाह तआला की रज़ा और जन्नत!” उनमें से हर एक ने अपनी क़ौम के नुमाइंदे और वकील की हैसियत से वादा किया। सबसे पहले हज़रत असअद इब्ने ज़ुरारा ने यह कहते हुए मुसाफ़हा किया: “मैं अल्लाह तआला और उसके रसूल से किया हुआ अपना वादा पूरा करने और अपनी जान और अपने माल से आपकी मदद करने का अपना अहद निभाने के लिए बैअत करता हूँ।” उनके बाद हर एक ने इसी तरह बैअत पूरी की और यह कहकर अपनी ख़ुशी और फ़रमाँबरदारी ज़ाहिर की: “हमने अल्लाह तआला और उसके रसूल की दावत क़बूल की, सुना और सिर झुका दिया।” इस तरह उन्होंने रसूलुल्लाह की राह में बेझिझक अपनी जानें और अपने माल पेश कर दिए। औरतों से बैअत सिर्फ़ ज़बानी हुई। हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उनसे “अल्लाह तआला के साथ किसी चीज़ को शरीक न ठहराने, चोरी, बोहतान और ज़िना न करने, अपनी औलाद को क़त्ल न करने, झूठ न बोलने, नेक कामों में मुख़ालफ़त न करने…” का वादा लिया। जिस वक़्त मदीना वाले नबी-ए-करीम से बैअत कर रहे थे, अक़बा की पहाड़ी से एक आवाज़ ने चिल्लाकर कहा: “ऐ मिना में पड़ाव डालने वालो! नबी और मदीना के मुसलमानों ने तुमसे जंग करने का अहद कर लिया है!” हमारे नबी ने इस आवाज़ के बारे में फ़रमाया: “यह अक़बा का शैतान है।” और पुकारने वाले से फ़रमाया: “ऐ अल्लाह तआला के दुश्मन! तेरी भी ख़बर लूँगा!” और बैअत करने वाले मदीना वालों से फ़रमाया: “तुम फ़ौरन अपने पड़ाव की जगहों पर लौट जाओ।” अब्बास इब्ने उबादा ने कहा: “या रसूलल्लाह! मैं क़सम खाता हूँ, अगर आप चाहें तो कल सुबह हम मिना में मौजूद काफ़िरों पर चढ़ाई करके उन सबको तलवार के घाट उतार दें।” नबी-ए-करीम ख़ुश हुए, लेकिन फ़रमाया: “हमें अभी इस तरह क़दम उठाने का हुक्म नहीं दिया गया। फ़िलहाल अपनी जगहों पर लौट जाओ।” इमाम नसाई की अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास से रिवायत के मुताबिक़ अन्सार में से जो लोग अक़बा की बैअत में शामिल थे, वे रसूलुल्लाह के पास आ जाने की वजह से मुहाजिरों में भी शुमार हुए।3

सर्व घमंड से तना है, क़ुमरी की फ़रियाद नहीं सुनता,
जब तक उसके क़दमों पर गिरकर मिन्नत न करे पानी।
गुलाब किसी चाल से बुलबुल का ख़ून पीना चाहता है,
जब तक गुलाब की टहनी में उतरकर उसे न बचाए पानी।
अपनी पाक फ़ितरत जहान वालों पर रौशन कर दी उसने,
अहमद-ए-मुख़्तार के रास्ते की पैरवी करता है पानी।
इंसानों के सरदार, चुने हुए मोतियों का समुंदर –
आपके मोजिज़े बने बदकारों की आग के लिए पानी।
नुबुव्वत के गुलज़ार की रौनक़ ताज़ा करने के लिए
आपके मोजिज़े से सख़्त चट्टान से निकला पानी।
आपका मोजिज़ा जहान में एक बेकिनार समुंदर है,
उसी से काफ़िरों के आतिशकदे तक भी पहुँचा पानी।
जो सुने, हैरत से दाँतों तले उँगली दबा ले:
सख़्ती के दिन अन्सार को उँगलियों से दिया पानी।