मेरे प्यारे नबी

हिजरत

औस और ख़ज़रज क़बीलों के अचानक मुसलमान हो जाने और मक्का के मुसलमानों और मदीना के मुसलमानों के एक हो जाने के इमकान ने मुशरिकों को बुरी तरह डरा दिया और आपे से बाहर कर दिया था। अक़बा की दूसरी बैअत की ख़बर सुनकर मक्का के मुशरिकों का रवैया बहुत सख़्त और बड़ा ख़तरनाक हो गया। मुसलमानों के लिए मक्का में रहना बर्दाश्त से बाहर हो चुका था। अक़बा की आख़िरी बैअत से मदीना मुसलमानों के लिए सुकून पाने और पनाह लेने की जगह बन गया था। वे चाहते थे कि किसी तरह इस शहर से हिजरत करके ऐसी ज़मीन पर चले जाएँ जहाँ थोड़ा-सा चैन की साँस ले सकें, थोड़ी-सी आज़ादी से रह सकें। उन्होंने नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को अपना हाल बताकर हिजरत की इजाज़त माँगी। आपने अपने सहाबा को सब्र करने की नसीहत फ़रमाई, क्योंकि मक्का छोड़ने की इजाज़त अभी नहीं आई थी। आख़िरकार हिजरत के लिए माँगी हुई इलाही इजाज़त आ गई। उस दिन हमारे प्यारे नबी ख़ुशी की हालत में सहाबा-ए-किराम के पास तशरीफ़ लाए और फ़रमाया: “तुम्हारी हिजरत की जगह मुझे बता दी गई है। वह यसरिब (मदीना) है। वहाँ हिजरत करो। वहाँ अपने मुसलमान भाइयों से जा मिलो। अल्लाह तआला ने उन्हें तुम्हारा भाई बनाया है। यसरिब (मदीना) को तुम्हारे लिए ऐसा वतन बनाया है जहाँ तुम अमन और सुकून पाओगे।” रसूलुल्लाह की इजाज़त और नसीहत पर मुसलमान एक के बाद एक, टोलियों में मदीना हिजरत करने लगे।1 नबी-ए-करीम हिजरत करने वालों को बहुत एहतियात और सूझबूझ से काम लेने की सख़्त ताकीद फ़रमाते थे। मुसलमान मुशरिकों का ध्यान अपनी तरफ़ न खींचने के लिए छोटे-छोटे क़ाफ़िलों में रवाना होते और जहाँ तक हो सके, छुपकर चलते थे। मदीना की तरफ़ सबसे पहले अबू सलमा ने हिजरत की थी; उन्होंने मुशरिकों से बहुत तकलीफ़ें उठाई थीं। मुशरिकों ने काफ़ी देर बाद मामले को भाँपा, तो हिजरत के लिए निकले मुसलमानों में से जिन्हें पा सके, उन्हें रास्ते से लौटाना, औरतों को उनके शौहरों से जुदा करना और जिन पर बस चला, उन्हें क़ैद करना शुरू कर दिया, और तरह-तरह के ज़ुल्म ढाए। उन्हें उनके दीन से फेरने के लिए हर क़िस्म की ईज़ा दी। लेकिन अंदरूनी जंग भड़क उठने के डर से उन्हें क़त्ल करने की हिम्मत न कर सके। मुसलमान, इसके बावजूद, हर मौक़े का फ़ायदा उठाकर मदीना की राहों पर निकल पड़े। एक दिन हज़रत उमर ने भी अपनी तलवार कमर से बाँधी। अपने तीर और नेज़ा साथ लेकर सबके सामने काबा का सात बार तवाफ़ किया। वहाँ मौजूद मुशरिकों से ऊँची आवाज़ में यह कहा: “सुन लो, मैं भी अपने दीन को बचाने के लिए अल्लाह तआला की राह में हिजरत कर रहा हूँ। जो अपनी बीवी को बेवा, अपने बच्चों को यतीम करना और अपनी माँ को रुलाना चाहता हो, वह उस वादी के पीछे मेरे सामने आए!…” इस तरह हज़रत उमर और बीस के क़रीब मुसलमान दिन-दहाड़े, बेख़ौफ़ होकर मदीना की तरफ़ रवाना हुए। उनके डर से किसी को इस क़ाफ़िले को छूने की भी हिम्मत न हुई। अब हिजरत का सिलसिला थमता न था और सहाबा-ए-किराम टोली-टोली मदीना पहुँच रहे थे।

“तुम्हारी हिजरत की जगह मुझे बता दी गई है। वह यसरिब (मदीना) है। वहाँ हिजरत करो” और “वहाँ अपने मुसलमान भाइयों से जा मिलो। अल्लाह तआला ने उन्हें तुम्हारा भाई बनाया है। यसरिब (मदीना) को तुम्हारे लिए ऐसा वतन बनाया है जहाँ तुम अमन और सुकून पाओगे” हदीस शरीफ़

हिजरत का रास्ता

इसी दौरान हज़रत अबू बकर ने भी हिजरत की इजाज़त माँगी। रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “सब्र करो। मुझे उम्मीद है कि अल्लाह तआला मुझे भी इजाज़त देगा। हम साथ हिजरत करेंगे।” हज़रत अबू बकर ने पूछा: “मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान हों! क्या ऐसा मुमकिन है?” तो हमारे नबी ने “हाँ, है” फ़रमाकर उन्हें ख़ुश कर दिया। हज़रत अबू बकर ने आठ सौ दिरहम देकर दो ऊँट ख़रीदे और उस दिन का इंतिज़ार करने लगे। अब मक्का में हमारे प्यारे नबी, हज़रत अबू बकर, हज़रत अली, ग़रीब, बीमार, बूढ़े और वे मोमिन ही रह गए थे जिन्हें मुशरिकों ने क़ैद कर रखा था।

दूसरी तरफ़ मदीना वालों (अन्सार) ने हिजरत करके आने वाले मक्का वालों (मुहाजिरों) का बहुत अच्छी तरह इस्तिक़बाल किया और उन्हें अपना मेहमान बनाया। उनके बीच मज़बूत इत्तिहाद क़ायम हो गया।

मक्का के मुशरिक इस ख़याल से घबरा उठे कि रसूलुल्लाह भी हिजरत करके मुसलमानों की रहनुमाई सँभाल लेंगे। वे दारुन नदवा में जमा हुए, जहाँ अहम मामलों पर बात करने के लिए इकट्ठे होते थे, और सोचने लगे कि क्या करें। शैतान शैख़-ए-नज्दी के भेस में, यानी नज्द के एक बूढ़े की शक्ल में मुशरिकों के पास आया। उसने उनकी बातें सुनीं। तरह-तरह की तजवीज़ें पेश की गईं। लेकिन उनमें से कोई पसंद न आई। फिर शैतान ने बात में दख़ल दिया और अपनी राय बताई: “तुम जो कुछ सोच रहे हो, उसमें से कोई भी तदबीर कारगर नहीं हो सकती, क्योंकि उसका हँसमुख चेहरा और मीठी ज़बान हर तदबीर को बिगाड़ देगी। कोई और तदबीर सोचो।”

क़ुरैश के सरदार अबू जहल ने कहा: “हर क़बीले से एक-एक ताक़तवर आदमी चुनें। वे हाथों में तलवारें लिए मुहम्मद पर टूट पड़ें। तलवारें मारकर उसका ख़ून बहा दें। यह पता न चले कि किसने मारा। इस तरह वे मजबूरन दियत (ख़ून-बहा) पर राज़ी हो जाएँगे। हम भी उसकी दियत देकर इस मुसीबत से छुटकारा पा लेंगे।” शैतान को भी यह राय पसंद आई और उसने बड़े जोश से इसकी हिमायत और ताईद की।2

मुशरिक जब इस तैयारी में लगे हुए थे, जिबराईल अलैहिस्सलाम ने आकर रसूल-ए-अकरम को मुशरिकों के फ़ैसले की ख़बर दी, यह भी बताया कि उस रात आप अपने बिस्तर पर न सोएँ, और अल्लाह तआला का हिजरत का हुक्म भी पहुँचाया। इस इलाही हुक्म पर हमारे प्यारे नबी ने हज़रत अली से अपने बिस्तर पर लेटने और जो अमानतें आपके पास रखी गई थीं, उन्हें उनके मालिकों को लौटा देने को कहा और फ़रमाया: “आज रात मेरे बिस्तर पर लेटकर सो जाओ, और मेरी यह चादर भी ओढ़ लो! डरो मत, तुम्हें कोई नुक़सान नहीं पहुँचेगा।”

हज़रत अली नबी-ए-करीम के हुक्म के मुताबिक़ लेट गए। उस वक़्त उनकी उम्र तेईस साल थी। वह हबीबुल्लाह की जगह बिल्कुल बेख़ौफ़ होकर अपनी जान क़ुरबान करने को तैयार थे।

हिजरत की रात काफ़िरों ने रसूलुल्लाह के मुबारक घर को घेर लिया था। उस रात सूरह यासीन की शुरुआती आयतें नाज़िल हुईं। नबी-ए-करीम ने अपने मुबारक घर से निकलते वक़्त सूरह यासीन की नवीं आयत-ए-करीमा “हमने उनके आगे एक दीवार और उनके पीछे एक दीवार खड़ी कर दी और उन्हें ढाँक दिया, तो अब वे देख नहीं सकते” पढ़ते हुए ज़मीन से एक मुट्ठी मिट्टी उठाई और काफ़िरों के सिरों पर डाल दी। (रिवायत है कि जिस-जिस के सिर पर यह मिट्टी पड़ी थी, वे सब बद्र के ग़ज़वे में मारे गए।) रसूलुल्लाह सही-सलामत उनके बीच से गुज़रकर हज़रत अबू बकर के घर पहुँच गए। मुशरिकों में से कोई भी आपको देख न सका।

“ऐ अबू बकर! सब्र करो। मुझे उम्मीद है कि अल्लाह तआला मुझे भी इजाज़त देगा। हम साथ हिजरत करेंगे” हदीस शरीफ़

कुछ देर बाद मुशरिकों के पास एक आदमी आया और पूछा: “यहाँ किस बात का इंतिज़ार कर रहे हो?” उन्होंने जवाब दिया: “मुहम्मद के घर से निकलने का।” उस आदमी ने कहा: “मैं क़सम खाता हूँ, मुहम्मद तुम्हारे बीच से गुज़रकर चला गया, और तुम्हारे सिरों पर मिट्टी भी डाल गया।” मुशरिकों ने अपने हाथ सिरों पर रखे। सचमुच उनके सिरों पर मिट्टी थी। उन्होंने अपने चेहरों और सिरों से मिट्टी पोंछी। फ़ौरन दरवाज़े पर टूट पड़े और अंदर घुस गए। रसूल अलैहिस्सलाम के बिस्तर पर हज़रत अली को देखकर उन्होंने पूछा कि रसूल-ए-अकरम कहाँ हैं।

हज़रत अली ने कहा: “मुझे नहीं मालूम! क्या तुमने मुझे उनकी निगरानी पर मुक़र्रर किया था?” इस पर उन्होंने हज़रत अली को धक्के देकर मारा-पीटा। काफ़िर रसूलुल्लाह को ढूँढने के लिए बाहर निकलकर तलाश करने लगे। हज़रत अली को कुछ देर काबा के पास क़ैद रखकर फिर छोड़ दिया।3

फिर वे हज़रत अबू बकर के घर गए और उनकी बेटी अस्मा से पूछा। उन्होंने जवाब न दिया तो उन्हें मारा। हर जगह ढूँढने के बावजूद वे उन्हें न पा सके और पागल-से हो गए। उनमें सबसे ज़्यादा सरकश अबू जहल ने मक्का और उसके आसपास मुनादी करने वालों से एलान करवाया कि जो कोई हमारे प्यारे नबी और हज़रत अबू बकर को ढूँढकर लाएगा या उनका पता बताएगा, उसे वह 100 ऊँट देगा। उसका यह वादा सुनकर माल के लालची कुछ लोग हथियार बाँधकर, घोड़ों पर सवार होकर तलाश में लग गए।

रसूलुल्लाह ने हज़रत अबू बकर के घर तशरीफ़ लाकर फ़रमाया: “मुझे हिजरत करने की इजाज़त मिल गई है।” तो हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ ने बड़े जोश से पूछा: “या रसूलल्लाह! आपके मुबारक क़दमों की धूल पर अपना चेहरा मल दूँ!… क्या मैं भी आपके साथ हूँ?” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “हाँ…” हज़रत सिद्दीक़ ख़ुशी से रो पड़े। आँसुओं के बीच उन्होंने कहा: “मेरे माँ-बाप और मेरी जान आप पर क़ुरबान हों, या रसूलल्लाह! ऊँट तैयार हैं। जो आप चाहें, उसे क़बूल फ़रमाइए।” सारे जहानों के सुल्तान ने फ़रमाया: “जो ऊँट मेरा नहीं, उस पर मैं सवार नहीं होता। (बस) क़ीमत देकर लूँगा।” इस पक्के हुक्म के आगे मजबूर होकर हज़रत सिद्दीक़ ने ऊँट की क़ीमत बताई। हज़रत अबू बकर ने रहबरी में मशहूर अब्दुल्लाह इब्ने उरैक़ित नाम के आदमी को बुलाकर रास्ता दिखाने के लिए उजरत पर रखा और उसे हुक्म दिया कि तीन दिन बाद ऊँटों को सौर पहाड़ के ग़ार में ले आए।

बेसत के तेरहवें साल, सफ़र महीने की 27 तारीख़ को, जुमेरात के दिन नबी-ए-करीम और अबू बकर सिद्दीक़ अपने साथ थोड़ा-सा खाने का सामान लेकर रवाना हुए।

हज़रत अबू बकर रसूलुल्लाह के इर्द-गिर्द कभी दाएँ, कभी बाएँ, कभी आगे और कभी पीछे चलते थे। हमारे नबी ने पूछा कि वह ऐसा क्यों कर रहे हैं, तो उन्होंने कहा: “आसपास से आने वाले किसी ख़तरे को रोकने के लिए। अगर कोई नुक़सान आए, तो पहले मुझ पर आए। मेरी जान आपकी बुलंद ज़ात पर क़ुरबान हो, या रसूलल्लाह!”

सरवर-ए-आलम ने फ़रमाया: “ऐ अबू बकर! क्या तुम चाहते हो कि जो मुसीबत मुझ पर आने वाली है, वह मेरे बजाय तुम पर आ जाए?” हज़रत सिद्दीक़ ने कहा: “हाँ, या रसूलल्लाह! उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसने आपको हक़ दीन के साथ सच्चा नबी बनाकर भेजा, मैं चाहता हूँ कि आने वाली मुसीबत आपके बजाय मुझ पर आए।”4

हमारे प्यारे नबी की जूती तंग थी, इसलिए रास्ते में फट गई और आपके मुबारक पाँव ज़ख़्मी हो गए, आपमें चलने की ताक़त न रही। दोनों बड़ी मुश्किल से पहाड़ पर चढ़कर ग़ार तक पहुँचे। ग़ार के मुँह पर पहुँचकर हज़रत अबू बकर ने कहा: “अल्लाह के वास्ते, या रसूलल्लाह, अंदर न जाइए! मैं जाता हूँ। वहाँ कोई नुक़सान देने वाली चीज़ हो तो मुझे लगे, आपकी मुबारक ज़ात को कोई रंज, कोई तकलीफ़ न छुए।” और अंदर चले गए। उन्होंने अंदर झाड़-बुहारकर सफ़ाई की। उसके दाएँ-बाएँ छोटे-बड़े बहुत-से सूराख़ थे। उन्होंने अपनी चादर फाड़कर सूराख़ बंद कर दिए, मगर एक खुला रह गया। उसे भी अपनी एड़ी से बंद करके रसूलुल्लाह को अंदर बुलाया। नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अंदर तशरीफ़ ले गए और अपना मुबारक सिर अबू बकर की गोद में रखकर सो गए।

उसी वक़्त एक साँप ने हज़रत सिद्दीक़ के पाँव में काट लिया। रसूलुल्लाह जाग न जाएँ, इसलिए उन्होंने सब्र किया और ज़रा भी हरकत न की। लेकिन जब उनका आँसू रसूलुल्लाह के मुबारक चेहरे पर टपका, तो आपने पूछा: “क्या हुआ, ऐ अबू बकर?” हज़रत अबू बकर ने कहा: “जिस सूराख़ को मैंने अपने पाँव से बंद किया था, उससे एक साँप ने मेरे पाँव में काट लिया।” रसूलुल्लाह ने अबू बकर के ज़ख़्म पर शिफ़ा के लिए अपना मुबारक लुआब लगाया तो उनका दर्द फ़ौरन थम गया और उन्हें आराम आ गया।

जिस वक़्त रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) और अबू बकर सिद्दीक़ अंदर थे, मुशरिक पैरों के निशान का पीछा करते-करते ग़ार के मुँह तक आ पहुँचे। उन्होंने देखा कि उसके मुँह पर एक मकड़ी ने जाला बुन दिया है और दो कबूतरों ने घोंसला बना लिया है। खोजी कुर्ज़ इब्ने अलक़मा ने कहा: “बस, यहाँ निशान ख़त्म हो गए।” काफ़िरों ने कहा: “अगर वे यहाँ घुसे होते, तो ग़ार के मुँह पर मकड़ी का जाला फट चुका होता।”

कुछ लोगों ने कहा: “यहाँ तक तो आ ही गए हैं, तुममें से कोई ग़ार में घुसकर देख ले!…” तो काफ़िर उमय्या इब्ने ख़लफ़ ने कहा: “क्या तुममें ज़रा भी अक़्ल नहीं? जिस ग़ार पर परत-दर-परत मकड़ी का जाला बुना हुआ है, उसमें तुम्हारा क्या काम? मैं क़सम खाता हूँ कि यह मकड़ी अपना जाला मुहम्मद के पैदा होने से पहले ही बुन चुकी थी।”

मुशरिक जब ग़ार के मुँह पर बहस कर रहे थे, अंदर हज़रत अबू बकर को फ़िक्र ने घेर लिया और उन्होंने कहा: “या रसूलल्लाह! अल्लाह की क़सम, मुझे अपनी फ़िक्र नहीं। लेकिन डरता हूँ कि आपकी बुलंद ज़ात को कुछ हो न जाए। अगर मैं मारा गया, तो मैं सिर्फ़ एक आदमी हूँ, कुछ नहीं बदलेगा। लेकिन अगर आपको कोई नुक़सान पहुँचा, तो सारी उम्मत हलाक हो जाएगी, दीन मिट जाएगा।” कायनात के सुल्तान ने फ़रमाया: “ऐ अबू बकर! ग़म न करो!… बेशक अल्लाह तआला हमारे साथ है।”

अबू बकर सिद्दीक़ ने कहा: “या रसूलल्लाह! मेरी जान आप पर क़ुरबान हो! अगर उनमें से कोई सिर झुकाकर देख ले, तो हमें देख लेगा!” तो नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ऐ अबू बकर! हम ऐसे दो हैं जिनका तीसरा अल्लाह तआला है। ग़म न करो!… बेशक हक़ तआला हमारे साथ है।” मुशरिक अंदर झाँके बग़ैर वापस लौट गए।5

अल्लाह तआला इस हाल के बारे में क़ुरआन-ए-करीम में फ़रमाता है, जिसका मफ़हूम है: “अगर तुम उनकी (मेरे हबीब की) मदद न करोगे, (तो याद करो वह वक़्त जब) काफ़िरों ने उन्हें (मक्का से) दो में का दूसरा बनाकर (हज़रत अबू बकर के साथ) निकाला था, जब वे दोनों (सौर पहाड़ की चोटी पर) ग़ार में थे, तो अल्लाह तआला ने उनकी (रसूलुल्लाह की) मदद की थी। उस वक़्त वह अपने साथी (अबू बकर सिद्दीक़) से फ़रमा रहे थे: ‘ग़म न करो, अल्लाह तआला की मदद और नुसरत यक़ीनन हमारे साथ है।’ अल्लाह तआला ने उन पर दिलों को सुकून देने वाली अपनी सकीना उतारी, उन्हें (अपने हबीब को) ऐसे (रूहानी) लश्कर से ताक़त दी जिसे तुमने नहीं देखा (फ़रिश्तों से उनकी हिफ़ाज़त की) और काफ़िरों की बात को बिल्कुल नीचा कर दिया। और अल्लाह तआला का (तौहीद का) कलिमा ही सबसे बुलंद है (उसने अल्लाह के नाम को सारे जहान में फैलाया और ग़ालिब किया)। अल्लाह तआला पूरी तरह ग़ालिब है, अकेला वही हुक्म और हिकमत वाला है।”6

“अल्लाह के वास्ते, या रसूलल्लाह, अंदर न जाइए! मैं जाता हूँ। वहाँ कोई नुक़सान देने वाली चीज़ हो तो मुझे लगे, आपकी मुबारक ज़ात को कोई रंज, कोई तकलीफ़ न छुए” अबू बकर सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु)

हमारे प्यारे नबी और हज़रत अबू बकर इस ग़ार में तीन दिन और तीन रातें रहे। हज़रत अबू बकर के बेटे अब्दुल्लाह मक्का में जो कुछ सुनते, रात को ग़ार में आकर बता जाते, और उनके आज़ाद किए हुए ग़ुलाम और उनके रेवड़ों के चरवाहे आमिर इब्ने फ़ुहैरा रातों को दूध लाते और पैरों के निशान मिटा देते थे।

चौथे दिन, पीर की रात सहर के वक़्त ग़ार-ए-सौर से निकलकर हमारे प्यारे नबी क़सवा नाम की अपनी ऊँटनी पर सवार हुए। एक रिवायत के मुताबिक़ आपने अपने पीछे हज़रत अबू बकर को बिठाया। दूसरे ऊँट पर हज़रत आमिर इब्ने फ़ुहैरा और रास्तों को अच्छी तरह जानने वाला अब्दुल्लाह इब्ने उरैक़ित सवार हुए।

सारे जहानों के सरदार (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) उस मक्का मुकर्रमा से, अपने वतन से जुदा हो रहे थे, जिसकी तारीफ़ अल्लाह तआला ने फ़रमाई है और जो शहरों में सबसे क़ीमती है। आपने अपनी ऊँटनी का रुख़ हरम शरीफ़ की तरफ़ फेरा और ग़मगीन हालत में फ़रमाया: “अल्लाह की क़सम! तू अल्लाह तआला की पैदा की हुई जगहों में सबसे बेहतर और मेरे रब के नज़दीक सबसे प्यारी है! अगर मुझे तुझसे निकाला न जाता, तो मैं न निकलता। मेरे लिए तुझसे ज़्यादा ख़ूबसूरत, तुझसे ज़्यादा प्यारा कोई वतन नहीं। अगर मेरी क़ौम मुझे तुझसे न निकालती, तो मैं न निकलता और तेरे सिवा कहीं और वतन, ठिकाना न बनाता।”

उसी घड़ी जिबराईल अलैहिस्सलाम उतरे और कहा: “या रसूलल्लाह! क्या आपको अपने वतन का इश्तियाक़ है, क्या उसकी याद आई?” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “हाँ, इश्तियाक़ है!” जिबराईल अलैहिस्सलाम ने सूरह क़सस की 85वीं आयत-ए-करीमा पढ़कर, जिसमें आपके आख़िरकार मक्का लौटने की ख़ुशख़बरी है, आपके मुबारक दिल को तसल्ली दी।

सफ़र सुकून से गुज़र रहा था। मुशरिक हर जगह ढूँढने के बावजूद उन्हें न पा सके; अल्लाह पाक अपने हबीब को उनके शर से महफ़ूज़ रख रहा था। रसूलुल्लाह जब क़ुदैद नाम की जगह पहुँचे, तो उम्मे मअबद नाम की एक ख़ातून के ख़ेमे के सामने रुके, जो अपनी सख़ावत के लिए मशहूर, समझदार और पाकदामन थीं। आपने क़ीमत देकर खाने की चीज़ें, खजूर और गोश्त ख़रीदना चाहा। उम्मे मअबद ने कहा: “अगर होता, तो पैसों से नहीं, दावत करके ख़ातिरदारी करती। क़हत और तंगदस्ती की वजह से हमारे पास कुछ नहीं बचा।” जब आपने पूछा: “दूध है?” तो उन्होंने जवाब दिया: “नहीं। जानवर बाँझ हैं, उनमें दूध नहीं।” कायनात के सुल्तान (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ख़ेमे के पास खड़ी एक दुबली भेड़ की तरफ़ इशारा करके फ़रमाया: “ऐ उम्मे मअबद! यह भेड़ यहाँ क्यों बँधी खड़ी है?” उन्होंने कहा: “यह बहुत बीमार और कमज़ोर होने की वजह से रेवड़ से पीछे रह गई। ताक़त न होने के कारण जा न सकी।” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “क्या इसमें थोड़ा-सा भी दूध है? क्या आप मुझे इस भेड़ को दुहने की इजाज़त देंगी?” तो उन्होंने कहा: “मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान हों, इसमें दूध नहीं है, लेकिन आपके दुहने में कोई रुकावट नहीं।”

रसूलुल्लाह भेड़ के पास आए और अल्लाह तआला का नाम लिया। बरकत की दुआ करने के बाद अपना मुबारक हाथ भेड़ के थन पर फेरा। उसी पल थन दूध से भर गया और दूध बहने लगा। फ़ौरन एक बरतन लाकर भर लिया गया। आपने पहले वह उम्मे मअबद को दिया। उम्मे मअबद के पी लेने के बाद हज़रत अबू बकर और दूसरों को दिया और वे सब पेट भरकर पी गए। सबसे आख़िर में आपने ख़ुद पिया। फिर दोबारा अपना मुबारक हाथ भेड़ के थन पर रखकर दुहा और ख़ेमे में मौजूद सबसे बड़ा बरतन माँगा। उसे भी भरकर उम्मे मअबद के हवाले कर दिया। रिवायत है कि वह भेड़ अठारह साल और ज़िंदा रही, और फ़ख़्र-ए-आलम की बरकत से वे सुबह-शाम उसी के दूध पर गुज़ारा करते रहे। रसूलुल्लाह के वहाँ से चले जाने के बाद उम्मे मअबद के शौहर आए और दूध देखा। ख़ुश होकर पूछा: “यह दूध कहाँ से आया?” उम्मे मअबद ने कहा: “एक मुबारक हस्ती ने आकर हमारे घर को इज़्ज़त बख़्शी। जो कुछ तुम देख रहे हो, वह उन्हीं का फ़ैज़ और उन्हीं की बरकत है।” शौहर ने पूछा: “क्या तुम उनका हुलिया बयान कर सकती हो? उनकी सिफ़ात और उनका जमाल कैसा है?”

उम्मे मअबद ने कहा: “मैंने जिस मुबारक हस्ती को देखा, वह बहुत सुडौल बदन वाले और हँसमुख चेहरे वाले थे। उनकी आँखों में हल्की-सी सुर्ख़ी और आवाज़ में नज़ाकत थी। उनकी मुबारक पलकें लंबी थीं। उनकी आँखों की सफ़ेदी बहुत सफ़ेद और स्याही बहुत काली थी, आँखें क़ुदरती सुरमगीं थीं। बाल काले और दाढ़ी घनी थी। जब ख़ामोश रहते, तो उन पर एक वक़ार और संजीदगी छाई रहती। बात करते वक़्त मुस्कुराते, और उनकी बातें पिरोए हुए मोतियों की तरह मुँह से मीठी-मीठी झड़ती थीं। दूर से बहुत रोबदार दिखाई देते, और क़रीब आने पर बहुत मीठे और दिलकश लगते। उनके पास मौजूद लोग उनका हुक्म पूरा करने के लिए जी-जान से दौड़ पड़ते थे।” इस तरह उन्होंने आपकी और भी बहुत-सी ख़ूबियाँ गिनाईं। उनके शौहर ये बातें हैरत से सुन रहे थे; उन्होंने कहा: “मैं क़सम खाता हूँ, यह वही हस्ती हैं जिन्हें क़ुरैश ढूँढ रहे हैं। अगर वह मुझे मिल जाते, तो उनकी ख़िदमत का शरफ़ हासिल करता और उनसे कभी जुदा न होता।” उम्मे मअबद के शौहर रसूलुल्लाह के पीछे-पीछे गए, रीम की वादी में आपसे जा मिले और मुसलमान हो गए। उन्हें सहाबी होने का शरफ़ हासिल हुआ। बाद में उम्मे मअबद भी मुसलमान हो गईं।7

सुराक़ा इब्ने मालिक

मुशरिक मुहम्मद अलैहिस्सलाम और हज़रत अबू बकर को, जो मदीना की तरफ़ रवाना हो चुके थे, लगातार ढूँढ रहे थे। अगर वे उन्हें न पा सकते, तो उनके लिए बहुत बड़ा ख़तरा खड़ा हो जाता, क्योंकि उनका ख़याल था कि मुसलमान एक “इस्लामी रियासत” क़ायम करके थोड़े ही अरसे में उनका नाम-ओ-निशान मिटा सकते हैं। इसलिए मुशरिकों ने अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया। उन्होंने वादा किया कि जो नबी-ए-करीम और हज़रत अबू बकर को क़त्ल करेगा या क़ैद कर लेगा, उसे सौ ऊँटों के साथ-साथ बेहिसाब माल और पैसा देंगे। यह ख़बर सुराक़ा इब्ने मालिक के क़बीले बनू मुदलिज में भी फैल गई।

सुराक़ा इब्ने मालिक पैरों के निशान पहचानने में माहिर था। इसलिए उसने जो कुछ हो रहा था, उसमें गहरी दिलचस्पी ली।

एक मंगल के दिन बनू मुदलिज सुराक़ा इब्ने मालिक के इलाक़े क़ुदैद में जमा हुए थे। मजलिस में सुराक़ा इब्ने मालिक भी मौजूद था। उसी वक़्त क़ुरैश के आदमियों में से एक ने आकर सुराक़ा से कहा: “ऐ सुराक़ा! अल्लाह की क़सम, मैंने अभी-अभी साहिल की तरफ़ जाता हुआ तीन-चार आदमियों का एक क़ाफ़िला देखा है। वे ज़रूर मुहम्मद और उसके साथी होंगे।” सुराक़ा मामला समझ गया। लेकिन चूँकि बहुत बड़ा इनाम रखा गया था, वह इसे अकेले हासिल करना चाहता था। इसलिए वह नहीं चाहता था कि किसी और को इसकी ख़बर हो। उसने ऐसे बात की जैसे कोई ख़ास बात न हो: “नहीं, तुमने जिन्हें देखा, वे फ़लाँ-फ़लाँ लोग हैं। थोड़ी देर पहले गुज़रे थे। हमने भी उन्हें देखा।”

सुराक़ा इब्ने मालिक ने कुछ देर और इंतिज़ार किया। ध्यान खींचे बिना अपने घर आया। अपने नौकर से कहा कि उसका घोड़ा और हथियार लेकर वादी के पीछे उसका इंतिज़ार करे। ख़ुद उसने अपना भाला लिया और उसकी चमक ध्यान न खींचे, इसलिए उसकी नोक नीचे की तरफ़ कर ली। उसने घोड़ा दौड़ाना शुरू किया। अपना सफ़र जारी रखते हुए आख़िरकार उसने उनके क़दमों के निशान पा लिए। वह इतना क़रीब आ गया कि नबी-ए-करीम की क़ुरआन-ए-करीम की तिलावत तक सुनने लगा। लेकिन रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पीछे मुड़कर बिल्कुल नहीं देखते थे। हज़रत अबू बकर ने पीछे मुड़कर देखा तो सुराक़ा को देखकर घबरा गए। नबी-ए-करीम ने उनसे वही फ़रमाया जो ग़ार में फ़रमाया था: “ग़म न करो, अल्लाह तआला हमारे साथ है।”

“(ऐ मक्का मुकर्रमा!) मेरे लिए तुझसे ज़्यादा ख़ूबसूरत, तुझसे ज़्यादा प्यारा कोई वतन नहीं। अगर मेरी क़ौम मुझे तुझसे न निकालती, तो मैं न निकलता और तेरे सिवा कहीं और वतन, ठिकाना न बनाता” हदीस शरीफ़

हज़रत बुख़ारी की रिवायत के मुताबिक़ उस वक़्त हज़रत अबू बकर ने रसूल-ए-अकरम को बताया कि एक घुड़सवार उनके पास आ पहुँचा है, तो नबी-ए-करीम ने दुआ फ़रमाई: “या रब! इसे गिरा दे!” एक और रिवायत में है कि जब सुराक़ा उनके बिल्कुल पास आ गया, तो हज़रत अबू बकर रोने लगे। रसूल-ए-अकरम ने पूछा कि वह क्यों रो रहे हैं, तो उन्होंने कहा: “अल्लाह की क़सम, मैं अपने लिए नहीं रो रहा। इस डर से रो रहा हूँ कि आपको कोई नुक़सान न पहुँचे।” सुराक़ा इतना क़रीब आ गया कि नबी-ए-करीम पर हमला कर सके। उसने कहा: “ऐ मुहम्मद! आज तुम्हें मुझसे कौन बचाएगा?” सरवर-ए-आलम ने जवाब दिया: “मुझे जब्बार और क़ह्हार अल्लाह तआला बचाएगा।” उसी वक़्त सुराक़ा का घोड़ा अपनी दोनों अगली टाँगों के साथ घुटनों तक ज़मीन में धँस गया। जब उसने इससे निकलकर दोबारा हमला करने की कोशिश की, तो घोड़े की टाँगें फिर ज़मीन में धँस गईं। सुराक़ा ने घोड़े पर कितना ही ज़ोर डाला, लेकिन उसे किसी तरह निकाल न सका। उसके पास करने को और कुछ न रहा। बेबस होकर वह शफ़क़त और रहमत वाले रसूलुल्लाह से मिन्नत करने लगा। हमारे नबी सारे कमालात और अच्छे अख़लाक़ के जामे थे और बुलंद अख़लाक़ और फ़ितरत पर पैदा किए गए थे; आपने उसकी यह दरख़्वास्त क़बूल कर ली। सुराक़ा कह रहा था: “ऐ मुहम्मद! मैं समझ गया कि तुम्हारी हिफ़ाज़त की जा रही है। दुआ करो कि मैं छूट जाऊँ। इसके बाद मैं तुम्हें कभी नुक़सान नहीं पहुँचाऊँगा। तुम्हारे पीछे लगे लोगों से भी तुम्हारा कोई ज़िक्र नहीं करूँगा।” कायनात के सरदार ने दुआ फ़रमाई: “या रब! अगर यह अपनी बात में सच्चा और मुख़लिस है, तो इसके घोड़े को छुटकारा दे।” तो अल्लाह तआला ने यह दुआ क़बूल फ़रमाई। सुराक़ा इब्ने मालिक का घोड़ा इस दुआ के बाद ही गड्ढे से निकल सका। उस वक़्त जहाँ घोड़े की टाँगें धँसी थीं, वहाँ से आसमान की तरफ़ धुएँ जैसी कोई चीज़ उठ रही थी। सुराक़ा हैरत में डूब गया और इन सब वाक़िआत से समझ गया कि मुहम्मद अलैहिस्सलाम की हमेशा हिफ़ाज़त की जा रही है। वह बहुत-सी बातों का गवाह बन चुका था। आख़िर में उसने कहा: “ऐ मुहम्मद! मैं सुराक़ा इब्ने मालिक हूँ! मेरी तरफ़ से बिल्कुल शक न रखिए। मैं आपसे वादा करता हूँ। इसके बाद ऐसा कोई काम नहीं करूँगा जो आपको नापसंद हो। तुम्हारी क़ौम ने वादा किया है कि जो तुम्हें और तुम्हारे साथियों को पकड़ेगा, उसे बहुत बड़ा इनाम देगी।” और उसने क़ुरैश के मुशरिकों के इरादे एक-एक करके बयान कर दिए। उसने उन्हें रास्ते के लिए खाने का सामान और सवारी के लिए ऊँट भी देना चाहा, लेकिन हमारे प्यारे नबी ने क़बूल न किया और उससे फ़रमाया: “ऐ सुराक़ा! जब तक तुम दीन-ए-इस्लाम क़बूल नहीं करते, मैं तुम्हारा ऊँट और तुम्हारे मवेशी न चाहता हूँ, न माँगता हूँ। तुम बस हमें देखने की बात छुपाए रखो, यही काफ़ी है।” इब्ने साद यूँ नक़ल करते हैं: सुराक़ा ने नबी-ए-करीम से कहा: “मुझे जो चाहें, हुक्म दीजिए।” तो रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “अपनी जगह ठहरे रहो। किसी को हम तक पहुँचने का मौक़ा न दो।” अल्लाह तआला चाहता, तो हर चीज़ हो जाती थी। जब उस पर ख़ालिस भरोसा करके उसकी रज़ा की राह पर चला जाता, तो अक़्ल में न आने वाले वाक़िआत पेश आते थे। जो सुराक़ा रसूलुल्लाह को क़त्ल करके बड़ा इनाम पाने के लालच में दहाड़ते शेर की तरह निकला था, वह अब एक नरम, सीधे-सादे बच्चे की तरह हो गया था। हर चीज़ पर क़ादिर अल्लाह तआला ने सुराक़ा के दिल को भलाई की तरफ़ फेर दिया था, ताकि वह उसके हबीब को नुक़सान न पहुँचाए। बेशक अल्लाह तआला अपने हबीब (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को अकेला छोड़ने वाला नहीं था, क्योंकि आप उसके वह प्यारे नबी थे जिन्हें उसने इंसानों पर रहमत के लिए, उनके दुनिया और आख़िरत में हमेशा की सआदत (ख़ुशनसीबी) पाने के लिए भेजा था। इसके बाद सुराक़ा जिस राह से आया था, उसी राह वापस लौट गया। जो कुछ उस पर बीता था, वह उसने रास्ते में मिलने वाले लोगों को भी न बताया।8

कायनात के सुल्तान तशरीफ़ ला रहे हैं!

नबी-ए-करीम, हज़रत अबू बकर, आमिर इब्ने फ़ुहैरा और उनका रहबर अब्दुल्लाह इब्ने उरैक़ित एक हफ़्ते के सफ़र के बाद बेसत के तेरहवें साल (622 ईसवी), ईसवी कैलेंडर के सितंबर महीने की बीस तारीख़ को और हिजरत के पहले साल रबीउल अव्वल महीने की आठ तारीख़ को, पीर के दिन चाश्त के वक़्त “क़ुबा” गाँव पहुँचे। वे कुलसूम इब्ने हिद्म नाम के एक मुसलमान के घर मेहमान हुए। रसूल-ए-अकरम के मदीना पहुँचने से पहले ही शुरुआती मुहाजिरों ने क़ुबा में बनू अम्र इब्ने औफ़ की खजूर सुखाने की एक जगह को नमाज़गाह बना लिया था। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने क़ुबा पहुँचकर इस नमाज़गाह को बढ़ाकर पहली मस्जिद बनाई। आपने अपनी नमाज़ें क़ुबा की मस्जिद में अदा कीं। सूरह तौबा की 108वीं आयत-ए-करीमा में क़ुबा की मस्जिद की तारीफ़ यूँ फ़रमाई गई, जिसका मफ़हूम है: “…वह मस्जिद जिसकी बुनियाद तक़्वा पर रखी गई है।”9

रात और दिन बराबर होने वाले दिन, सितंबर की तेईस तारीख़ भी आपने क़ुबा गाँव में गुज़ारी और रबीउल अव्वल की बारह तारीख़, जुमा के दिन मदीना की तरफ़ रवाना हुए। ज़ुहर की नमाज़ के वक़्त मदीना और क़ुबा के बीच रानूना की वादी में ठहरे। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने पहली जुमा की नमाज़ यहीं अदा फ़रमाई और पहला ख़ुत्बा भी यहीं दिया।10 उसी दिन आप मदीना पहुँच गए। (बाद में पहली जुमा की नमाज़ की यादगार के तौर पर यहाँ “मस्जिद-ए-जुमा” नाम की एक मस्जिद बनाई गई।) इस दौरान हज़रत अली, जो मक्का में रह गए थे, उस जगह बैठे जहाँ रसूलुल्लाह काबा में हमेशा बैठा करते थे। उन्होंने मुनादी करवाई: “रसूल-ए-अकरम के पास जिसकी भी कोई चीज़ हो, आकर ले जाए।” हर कोई आया और अपनी निशानी बताकर अपनी अमानत ले गया। इस तरह अमानतें उनके मालिकों के हवाले कर दी गईं। अल्लाह के शेर हज़रत अली क़ुरैश के काफ़िरों के जमा होने की जगह गए और फ़रमाया: “इंशाअल्लाह तआला, कल मैं मदीना मुनव्वरा जा रहा हूँ। क्या तुम्हें कुछ कहना है? जब तक मैं यहाँ हूँ, कह दो।” उन सबने सिर झुका लिए और कुछ न कहा। सुबह होने पर हज़रत अली रसूल-ए-अकरम का निजी सामान समेटकर रवाना हुए। क़ुरैश के 4–5 आदमियों ने उनका रास्ता रोका, मगर वह उनसे लड़कर ग़ालिब आए। फिर रास्ते में मिक़दाद इब्ने असवद उनके सामने आया। उसे भी एक ही वार में ज़मीन पर गिराकर उन्होंने ईमान की दावत दी। वह भी मुसलमान हो गए। फिर दोबारा सफ़र पर रवाना होकर, सूजे हुए पाँवों से ख़ून बहने की हालत में, वह क़ुबा में रसूलुल्लाह से जा मिले। दिन में छुपकर और रात को पैदल चलकर तय किए गए इस सफ़र के आख़िर में वह ऐसी हालत में पहुँच गए थे कि हमारे नबी की ख़िदमत में हाज़िर न हो सकते थे। रसूल-ए-अकरम ने यह सुना तो ख़ुद उनके पास तशरीफ़ ले गए, हज़रत अली को देखकर उनकी हालत पर तरस खाया, अपने प्यारे, जाँनिसार चचाज़ाद भाई को गले लगाया, उनके उन नाज़ुक, नर्म पाँवों पर, जिन्होंने हक़ की राह में हज़ारों मशक़्क़तें झेली थीं, अपने मुबारक हाथ फेरे और उनकी सेहत के लिए दुआ फ़रमाई। यहाँ तक कि रिवायत है कि हज़रत अली की इस क़ुरबानी पर वह आयत-ए-करीमा नाज़िल हुई जिसका मफ़हूम है: “लोगों में ऐसे भी हैं जो अल्लाह तआला की रज़ा के लिए अपनी जान (अपने आपको) क़ुरबान कर देते हैं।”1112

“ऐ सुराक़ा! मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं अभी तुम्हें ईरान के बादशाह (किसरा) के कंगन पहने, उसका कमरबंद बाँधे और उसका ताज पहने देख रहा हूँ!” हदीस शरीफ़

मदीना में पहले हिजरत कर चुके सहाबा-ए-किराम और मदीना के मुसलमानों ने जब सुना कि कायनात के सुल्तान हिजरत के लिए मक्का से रवाना हो चुके हैं, तो वे बड़े जोश और बेक़रारी से आपकी आमद का इंतिज़ार करने लगे। इसलिए उन्होंने मदीना मुनव्वरा के बाहरी इलाक़ों में निगहबान बिठा दिए और उस घड़ी आपके इस्तिक़बाल के लिए बेताब थे जब आप उनके शहर को इज़्ज़त बख़्शेंगे। आपकी मुहब्बत में जलने वाले ये लोग, जैसे तपता रेगिस्तान पानी को तरसता है, वैसे ही अपनी नज़रें उफ़क़ पर जमाए दिनों तक इंतिज़ार करते रहे।

आख़िरकार अचानक एक आवाज़ सुनाई दी: “आ रहे हैं! आ रहे हैं!…” आवाज़ सुनने वाले गर्म रेगिस्तान के बीच की तरफ़ नज़रें दौड़ाने लगे। हाँ!… हाँ!… उन्होंने भी देखा कि तपते रेगिस्तान में, सूरज की झुलसा देने वाली गर्मी के बावजूद, जिन मेहमानों का इंतिज़ार था, वे बड़े रोब और शान के साथ उनकी तरफ़ बढ़े चले आ रहे हैं। ख़ुशी से वे एक-दूसरे से चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे: “ख़ुशख़बरी!… ख़ुशख़बरी!… रसूलुल्लाह तशरीफ़ ला रहे हैं!… हमारे नबी तशरीफ़ ला रहे हैं!… ख़ुश हो जाओ, ऐ मदीना वालो! ईद मनाओ! हबीबुल्लाह तशरीफ़ ला रहे हैं!… हमारे सिर के ताज तशरीफ़ ला रहे हैं!…” यह ख़बर एक पल में मदीना मुनव्वरा की गली-गली में फैल गई। सात साल के बच्चे से सत्तर साल के बूढ़े तक, बूढ़ों से बीमारों तक हर कोई इस बेमिसाल ख़ुशी की ख़बर का इंतिज़ार कर रहा था।

मदीना के तमाम लोग अपने सबसे अच्छे कपड़े पहनकर सारे जहानों के सरदार के इस्तिक़बाल के लिए दौड़ पड़े। तकबीर की आवाज़ें आसमान को गुँजा रही थीं, ख़ुशी के आँसू सैलाब की तरह बह रहे थे। ग़म और ख़ुशी से भरी एक हवा चल रही थी, और मदीना अपनी तारीख़ का सबसे ख़ूबसूरत दिन देख रहा था। एक तरफ़ वे लोग थे जिन्होंने अल्लाह तआला के उस हबीब को, जिन्हें हर कोई “अमीन” के लक़ब से जानता था, क़त्ल करने के लिए इनाम रखा था; दूसरी तरफ़ वे थे जो आपकी और आपके साथियों की हिफ़ाज़त करना, उन्हें सीने से लगाना और इस राह में अपनी जानें क़ुरबान करना चाहते थे।

मदीना वाले जल्द से जल्द हमारे प्यारे नबी का नूरानी चेहरा देखना चाहते थे। जब से मदीना मदीना बना था, उसने ऐसा ख़ुशी भरा, ऐसा मुबारक लम्हा नहीं देखा था। यह एक ऐसी ईद थी जो उस दिन तक कभी न मनाई गई थी। इस ईद में, जिसकी मिसाल न देखी गई है, न देखी जाएगी, बच्चे, जवान, बड़े, ख़ुशनसीब इंसान पहली बार, एक ही वक़्त में, एक ज़बान होकर यह नज़्म गा रहे थे:13

तलअल बद्रु अलैना,
हम पर पूरा चाँद निकल आया
मिन सनिय्यातिल वदा,
वदा की घाटियों से।
वजबश शुक्रु अलैना,
हम पर शुक्र वाजिब हो गया,
मा दआ लिल्लाहि दा।
जब तक अल्लाह की तरफ़ बुलाने वाला बुलाता रहे।
अय्युहल मबऊसु फ़ीना,
ऐ वह ज़ात जो हम में भेजी गई,
जिअता बिल अम्रिल मुताअ,
आप अल्लाह का हुक्म (अम्रुल्लाह) लेकर आए।
जिअता शर्रफ़्तल मदीना,
आपने तशरीफ़ लाकर मदीना को इज़्ज़त बख़्शी,
मरहबन या ख़ैरा दाअ।
ख़ुश आमदीद, ऐ बुलाने वालों में सबसे बेहतर!
अन्ता शम्सुन, अन्ता बद्रुन,
आप सूरज हैं, आप पूरे चाँद हैं,
अन्ता नूरुन अला नूर,
आप नूर पर नूर हैं,
अन्ता मिस्बाहुस सुरैया,
आप सुरैया सितारों की रौशनी हैं,
या हबीबी, या रसूल!
ऐ मेरे प्यारे, ऐ रसूल!
क़द लबिसना सौबा इज़्ज़िन,
हम इज़्ज़त और इकराम से भर गए,
बअदा अस्वाबिर रिक़ा,
पुराने चिथड़ों से छुटकारा पा गए,
व रदअना सद्या मज्दिन,
बुज़ुर्गी पा गए, सेर हो गए,
बअदा अय्यामिद ज़िया।
नुक़सान में थे – नफ़ा पा गए।
क़ालत अहमारुद दयाजी,
अंधेरा मिटाने वाला चाँद कहता है:
क़ुल लि अर्बाबिल इस्लाम,
“इस्लाम वालों से कह दो:
कुल्लु मन यत्बअ मुहम्मद,
मुहम्मद (अलैहिस्सलाम) की पैरवी करने वाले पर
यम्बग़ी अल्ला युज़ाम।
कभी ज़ुल्म न करना।”
व तआहद्ना जमीअन,
हम सबने मिलकर वादा किया
यौमा अक़्सम्नल यमीन,
क़सम खाने के दिन:
लन नख़ूनल अह्दा यौमन,
सच्चाई हमारा रास्ता है,
वत्तख़ज़्नस सिद्क़ा दीन।
दीन में ख़यानत नहीं।
लस्तु वल्लाहि नसिय्यन,
अल्लाह की क़सम, मैं न भूलूँगा,
मा युक़ासीहिल इबाद,
बिना दर्द के एक दिन भी न था,
मश्हदन या नज्मा अम्निन,
आप गवाह हैं, ऐ अमन के सितारे:
ज़ू वफ़ाइन व विदाद।
आपकी वफ़ा और मुहब्बत बहुत बड़ी है।

“ख़ुश आमदीद, या रसूलल्लाह”, “हमारे यहाँ तशरीफ़ लाइए, या रसूलल्लाह” – हर तरफ़ इस तरह की दरख़्वास्तें गूँज रही थीं। मदीना के बड़े लोगों में से कुछ ने क़सवा की नकेल पकड़कर मिन्नत की: “या रसूलल्लाह! हमारे यहाँ तशरीफ़ लाइए…” तब नबी-ए-करीम ने उनसे फ़रमाया: “मेरी ऊँटनी की नकेल छोड़ दो, इसे हुक्म दिया गया है। जिसके घर के सामने यह बैठ जाएगी, मैं वहीं मेहमान बनूँगा!”

“लोगों में ऐसे भी हैं जो अल्लाह तआला की रज़ा के लिए अपनी जान क़ुरबान कर देते हैं” बक़रह: 207

हर किसी पर बड़ा जोश और तजस्सुस छा गया। क़सवा कहाँ बैठेगी? क़सवा मदीना के अंदर की तरफ़ बढ़ रही थी, और हर दरवाज़े के सामने से गुज़रते वक़्त घरवाले मिन्नतें कर रहे थे: “या रसूलल्लाह! हमारे यहाँ तशरीफ़ लाइए, हमारे यहाँ तशरीफ़ लाइए!” नबी-ए-करीम मुस्कुराकर उनसे फ़रमाते: “ऊँटनी का रास्ता छोड़ दो! इसे हुक्म दिया गया है कि कहाँ बैठना है।”

आख़िरकार क़सवा उस जगह बैठ गई जहाँ आज नबी-ए-करीम की मुबारक मस्जिद का दरवाज़ा है। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपनी ऊँटनी से नहीं उतरे। जानवर फिर उठ खड़ा हुआ और चलने लगा। फिर पहली जगह पर बैठ गया और दोबारा न उठा। इस पर नबी-ए-करीम क़सवा से उतरे और फ़रमाया: “इंशाअल्लाह, हमारी मंज़िल यही है।” फिर पूछा: “यह जगह किसकी है?” लोगों ने जवाब दिया: “या रसूलल्लाह! यह अम्र के बेटों सुहैल और सह्ल की है।” ये दोनों बच्चे यतीम थे। हमारे नबी ने पूछा: “हमारे रिश्तेदारों में से किसका घर इस जगह से ज़्यादा क़रीब है?” दरअसल रसूलुल्लाह के दादा अब्दुल मुत्तलिब की वालिदा बनू नज्जार से थीं। हज़रत ख़ालिद इब्ने ज़ैद अबू अय्यूब अन्सारी ने ख़ुशी से कहा: “या रसूलल्लाह! मेरा घर ज़्यादा क़रीब है। यह रहा मेरा घर, और यह उसका दरवाज़ा।” और बड़े जोश से दिखाया। उन्होंने क़सवा का सामान उतारा और रसूलुल्लाह को अपने घर तशरीफ़ लाने की दावत दी।14

मदीना के मुसलमान और मुहाजिर नबी-ए-करीम की हिजरत पर बहुत ज़्यादा ख़ुश हुए। इस साल को “सनतुल इज़्न” कहा जाता है।

हिजरत के वक़्त दिलों की दवा, इंसानों के सिर के ताज, अल्लाह तआला के हबीब नबी-ए-करीम की उम्र तिरपन साल थी।

मेरा हाल क्या हुआ?
मेरा हाल क्या हुआ, या रसूलल्लाह?
जलती है जान और तन, या रसूलल्लाह।
तड़पते शोले और लोबानदान की तरह
आपके इश्क़ में सुलगता हूँ, या रसूलल्लाह।
आपकी जुदाई के ग़म में न जाने कब से
घुल-घुलकर मिट रहा हूँ, या रसूलल्लाह।
आप शाह-ए-लौलाक हैं, आपके बुलंद दर पर
गर्दन झुकाए खड़ा हूँ, या रसूलल्लाह।
आपके क़दमों तले की मिट्टी में गुलाब खिले,
मैं उसमें एक काँटा हूँ, या रसूलल्लाह।

अबू अय्यूब अन्सारी रज़ियल्लाहु अन्हु