मेराज
हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हज के लिए आने वालों को भी और मक्का और मेलों में ख़रीद-फ़रोख़्त के लिए आने वालों को भी – जिस किसी को और जिस क़बीले को देखा, सबको इस्लाम के बारे में बताया। उनसे कहा कि वे आपकी हिफ़ाज़त करें और लोगों तक इस्लाम पहुँचाने में आपके मददगार बनें। लेकिन न कोई मुसलमान हुआ, न कोई आपकी हिफ़ाज़त करने को तैयार हुआ। ऊपर से उन्होंने तौहीन की, ज़ुल्म किया, सताया, मज़ाक़ उड़ाया और झुठलाया। सारे जहानों के सरदार बहुत थके हुए, भूखे, प्यासे, दुखी और बड़े ग़मगीन थे। दिन इसी तरह गुज़रते और यह हालत रात के देर पहर तक जारी रहती। मक्का के मुशरिक लगातार आपके पीछे घूमते रहते; काबा की ज़ियारत को आने वाले लोगों को मुसलमान होने से रोकने के साथ-साथ हबीब-ए-अकरम पर ज़ुल्म करने से भी बाज़ नहीं आते थे। अब रसूलुल्लाह के लिए जाने की कोई जगह न रही थी। हर तरफ़ दुश्मन थे। मक्का में कुछ महीने बड़ी तंगी में गुज़रे।
मुबारक रजब की 27वीं रात आप सीधे अपने चचा अबू तालिब की बेटी उम्मे हानी के घर आए, जो अबू तालिब के मोहल्ले में था। उम्मे हानी उस वक़्त तक ईमान नहीं लाई थीं। उन्होंने पूछा: “कौन है?” तो रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “मैं तुम्हारे चचा का बेटा मुहम्मद हूँ। अगर क़बूल करो तो मेहमान बनकर आया हूँ।”
उम्मे हानी ने कहा: “आप जैसे सच्चे, अमानतदार, शरीफ़ और इज़्ज़त वाले मेहमान पर जान क़ुरबान। बस, अगर आप अपने तशरीफ़ लाने की ख़बर पहले दे देते तो मैं कुछ तैयार कर लेती। अभी खिलाने के लिए मेरे पास कुछ नहीं।” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “मुझे खाना-पीना नहीं चाहिए। इनमें से किसी चीज़ की मुझे ख़्वाहिश नहीं। अपने रब की इबादत करने और उससे गिड़गिड़ाकर दुआ करने के लिए एक जगह मेरे लिए काफ़ी है।”
उम्मे हानी ने हमारे प्यारे नबी को अंदर बुलाया और आपको एक चटाई, एक तश्त और एक लोटा दिया। आए हुए मेहमान की ख़ातिरदारी करना और उसे दुश्मन से बचाना अरबों के यहाँ सबसे इज़्ज़त वाला फ़र्ज़ समझा जाता था। घर में ठहरे मेहमान को कोई नुक़सान पहुँचना मेज़बान के लिए मुँह की कालिख होता था। उम्मे हानी ने सोचा: “मक्का में इनके दुश्मन बहुत हैं। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो इन्हें क़त्ल करना चाहते हैं। अपनी इज़्ज़त की ख़ातिर मैं सुबह तक इनकी निगरानी करूँगी।” वह अपने वालिद की तलवार लेकर घर के चारों तरफ़ घूमने लगीं। रसूलुल्लाह उस दिन बहुत आज़ुर्दा थे। आप वुज़ू करके अपने रब से गिड़गिड़ाने, माफ़ी माँगने और बंदों के ईमान लाकर सआदत पाने के लिए दुआ करने लगे। आप बहुत थके हुए, भूखे और दुखी थे। चटाई पर लेटते ही सो गए।
उसी पल अल्लाह तआला ने जिबराईल अलैहिस्सलाम से फ़रमाया: “मैंने अपने प्यारे नबी को बहुत दुख में डाला। उनके मुबारक जिस्म और नाज़ुक दिल को बहुत तकलीफ़ पहुँचाई। इस हालत में भी वह फिर मुझसे ही गिड़गिड़ा रहे हैं। मेरे सिवा किसी चीज़ के बारे में नहीं सोचते। जाओ, मेरे हबीब को ले आओ! उन्हें मेरी जन्नत और मेरा जहन्नम दिखाओ। उनके लिए और उनसे मुहब्बत करने वालों के लिए मैंने जो नेमतें तैयार की हैं, वह उन्हें देखें। उन पर ईमान न लाने वालों के लिए और अपनी बातों, अपनी तहरीरों और अपने कामों से उन्हें तकलीफ़ पहुँचाने वालों के लिए मैंने जो अज़ाब तैयार किए हैं, उन्हें देखें। उन्हें मैं ख़ुद तसल्ली दूँगा। उनके नाज़ुक दिल के ज़ख़्मों पर मैं ख़ुद मरहम रखूँगा।”
जिबराईल अलैहिस्सलाम रसूलुल्लाह के पास आए तो आपको गहरी नींद में सोते पाया।
उनका दिल न माना कि आपको जगाएँ। वह इंसान की शक्ल में थे। उन्होंने आपके मुबारक पाँव के तलवे को चूमा। जिबराईल के न दिल था, न ख़ून, इसलिए उनके ठंडे होंठों ने रसूलुल्लाह को जगा दिया। हमारे नबी ने जिबराईल अलैहिस्सलाम को फ़ौरन पहचान लिया और इस डर से कि शायद आपका रब आपसे नाराज़ हो गया है, बहुत घबराकर फ़रमाया: “ऐ मेरे भाई जिबराईल! ऐसे बेवक़्त क्यों आए? क्या मुझसे कोई ख़ता हो गई? क्या मैंने अपने रब को नाराज़ कर दिया? या मेरे लिए कोई दुखभरी ख़बर लाए हो?”
“मुझे खाना-पीना नहीं चाहिए। इनमें से किसी चीज़ की मुझे ख़्वाहिश नहीं। अपने रब की इबादत करने और उससे गिड़गिड़ाकर दुआ करने के लिए एक जगह मेरे लिए काफ़ी है” हदीस शरीफ़
जिबराईल अलैहिस्सलाम ने कहा: “ऐ तमाम मख़लूक़ात में सबसे बुलंद! ऐ पैदा करने वाले के महबूब, ऐ नबियों के सरदार, भलाइयों के सरचश्मे, फ़ज़ीलतों के मंबा, इज़्ज़त वाले और अज़ीम नबी! आपका रब आपको सलाम भेजता है और आपको अपने पास बुलाता है। उठिए, तशरीफ़ ले चलिए।” हमारे प्यारे नबी ने वुज़ू किया। जिबराईल अलैहिस्सलाम ने रसूलुल्लाह के मुबारक सिर पर नूर का अमामा रखा, आपको नूर का लिबास पहनाया और मुबारक कमर में याक़ूत का कमरबंद बाँधा। मुबारक हाथ में चार सौ मोतियों से सजा ज़मुर्रद का एक असा दिया। हर मोती ज़ोहरा सितारे की तरह चमकता था। मुबारक पाँवों में हरे ज़मुर्रद की नालैन पहनाईं।
फिर दोनों साथ-साथ काबा आए। यहाँ जिबराईल अलैहिस्सलाम ने हमारे प्यारे नबी का मुबारक सीना चाक किया। दिल निकालकर उसे ज़मज़म के पानी से धोया। फिर हिकमत और ईमान से भरा एक तश्त लाए, उसमें जो कुछ था, वह दिल में उँडेल दिया और सीना बंद कर दिया।
हमारा पहला क़िब्ला मस्जिद-ए-अक़्सा / बैतुल मुक़द्दस (यरूशलम)
फिर जिबराईल अलैहिस्सलाम ने जन्नत से लाए हुए बुराक़ नाम के सफ़ेद जानवर की तरफ़ इशारा करके कहा: “या रसूलल्लाह! इस पर सवार हो जाइए! तमाम फ़रिश्ते आपकी राह देख रहे हैं।” उसी वक़्त नबी-ए-करीम पर एक उदासी छा गई और आप गहरी सोच में डूब गए। उस पल अल्लाह तआला ने जिबराईल अलैहिस्सलाम से ख़िताब फ़रमाया: “ऐ जिबराईल! पूछो! मेरे हबीब क्यों ग़मगीन हैं?” तो नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने जवाब में फ़रमाया: “मैंने इतनी इज़्ज़त और इकराम देखा। मेरे दिल में ख़याल आया कि क़यामत के दिन मेरी कमज़ोर उम्मत का क्या हाल होगा? पचास हज़ार साल अरसात के मैदान में पैदल खड़े रहकर वे अपने इतने गुनाहों का बोझ कैसे उठाएँगे और तीस हज़ार साल के रास्ते वाले पुल-सिरात को कैसे पार करेंगे?” तब इलाही फ़रमान आया: “ऐ मेरे हबीब! अपना दिल ख़ुश रखो। तुम्हारी उम्मत के लिए पचास हज़ार साल के वक़्त को मैं एक पल की तरह कर दूँगा। ग़म न करो!”
नबी-ए-करीम बुराक़ पर सवार हुए। बुराक़ बहुत तेज़ चलता था, एक क़दम में नज़र की हद से भी आगे पहुँच जाता था। सफ़र के दौरान जिबराईल अलैहिस्सलाम ने हमारे प्यारे नबी से कहा कि कुछ पड़ावों पर उतरकर नमाज़ पढ़ें। इस पर सारे जहानों के सरदार ने ठीक तीन बार उतरकर नमाज़ पढ़ी। फिर जिबराईल अलैहिस्सलाम ने पूछा कि क्या आप जानते हैं कि आपने कहाँ-कहाँ नमाज़ पढ़ी। फिर ख़ुद ही जवाब देते हुए उन्होंने बताया कि पहली जगह, जहाँ आप उतरे, मदीना है और आप इस शहर की तरफ़ हिजरत करेंगे। यह भी ख़बर दी कि बाक़ी जगहों में एक तूर-ए-सीना है, जहाँ हज़रत मूसा ने अल्लाह तआला से बिना सम्त के और ऐसे तरीक़े से कलाम किया जो जाना नहीं जा सकता, और आख़िरी जगह, जहाँ आपने नमाज़ पढ़ी, ईसा अलैहिस्सलाम की पैदाइश की जगह बैतुल लहम है। फिर वे बैतुल मुक़द्दस की मस्जिद-ए-अक़्सा पहुँचे।
मस्जिद-ए-अक़्सा में जिबराईल अलैहिस्सलाम ने अपनी उँगली से एक चट्टान में सूराख़ करके बुराक़ को उससे बाँध दिया। वहाँ पहले के नबियों में से कुछ की रूहें इंसानी शक्ल में जमा थीं। जमाअत से नमाज़ के लिए आदम, नूह और इब्राहीम नबियों (अलैहिमुस्सलाम) से बारी-बारी इमाम बनने को कहा गया। उन्होंने माज़रत करके क़बूल न किया। जिबराईल ने यह कहकर हबीबुल्लाह को आगे किया: “आपके होते हुए कोई और इमाम नहीं बन सकता।”
नबी-ए-करीम ने नबियों के इमाम बनकर दो रकअत नमाज़ पढ़ाई। उसके बाद जो वाक़िआ हुआ, उसे आपने यूँ बयान फ़रमाया: “जिबराईल (अलैहिस्सलाम) मेरे पास एक बर्तन जन्नत की शराब और एक बर्तन दूध लाए। मैंने दूध ले लिया। जिबराईल (अलैहिस्सलाम) ने मुझसे कहा: ‘आपने फ़ितरत (दोनों जहान की सआदत) को चुन लिया।’ फिर दो प्याले और पेश किए गए। एक में पानी था, एक में शहद; मैंने दोनों से पिया। जिबराईल ने कहा: ‘शहद इस बात का इशारा है कि आपकी उम्मत क़यामत तक बाक़ी रहेगी, और पानी इस बात का कि आपकी उम्मत अपने गुनाहों से पाक होगी।’ फिर हम साथ-साथ आसमान की तरफ़ बुलंद हुए। जिबराईल (अलैहिस्सलाम) ने दरवाज़ा खटखटाया। पूछा गया: ‘तुम कौन हो?’ ‘मैं जिबराईल हूँ।’ ‘और तुम्हारे साथ कौन है?’ ‘यह मुहम्मद (अलैहिस्सलाम) हैं।’ ‘क्या उन्हें (आसमान पर चढ़ने के लिए वह्य और मेराज की दावत) भेजी गई?’ उन्होंने कहा: ‘हाँ, भेजी गई।’ उन्होंने कहा: ‘आने वाली हस्ती को मरहबा! यह आने वाला कितना अच्छा मुसाफ़िर है!’ और फ़ौरन दरवाज़ा खुल गया। मैंने ख़ुद को आदम (अलैहिस्सलाम) के सामने पाया। उन्होंने मुझसे ‘मरहबा’ कहा और दुआ की… आदम अलैहिस्सलाम के दाएँ और बाएँ कुछ इंसानों की रूहें परछाइयों की तरह खड़ी थीं। आदम (अलैहिस्सलाम) जब दाईं तरफ़ देखते तो मुस्कुराते और जब बाईं तरफ़ देखते तो रोते थे। जिबराईल (अलैहिस्सलाम) ने अर्ज़ किया: ‘या रसूलल्लाह, ये परछाइयाँ आदम की नस्ल से आने वाली उनकी औलाद की रूहें हैं। दाईं तरफ़ वाले जन्नती हैं और बाईं तरफ़ वाले जहन्नमी! दाईं तरफ़ देखते हैं तो मुस्कुराते हैं, बाईं तरफ़ देखते हैं तो रोते हैं!’
“ऐ तमाम मख़लूक़ात में सबसे बुलंद! ऐ पैदा करने वाले के महबूब, ऐ नबियों के सरदार, भलाइयों के सरचश्मे, फ़ज़ीलतों के मंबा, इज़्ज़त वाले और अज़ीम नबी! आपका रब आपको सलाम भेजता है और आपको अपने पास बुलाता है। उठिए, तशरीफ़ ले चलिए” जिबराईल अलैहिस्सलाम
वहाँ मैंने बहुत-से फ़रिश्ते देखे। वे सब ख़ुशू और ख़ुज़ू के साथ क़ियाम में खड़े होकर ‘सुब्बूहुन क़ुद्दूसुन रब्बुल मलाइकति वर्रूह’ के ज़िक्र में लगे हुए थे। मैंने जिबराईल से पूछा: ‘क्या इन फ़रिश्तों की इबादत यही है?’ उन्होंने कहा: ‘हाँ। ये पैदा होने के वक़्त से क़यामत तक क़ियाम की हालत में रहते हैं। हक़ तआला से माँगिए कि यह इबादत आपकी उम्मत को नसीब करे।’ मैंने हक़ तआला से माँगा। उसने मेरी दुआ क़बूल की। नमाज़ में जो क़ियाम है, वह यही है।
(वहाँ) मैं लोगों के एक गिरोह के पास से गुज़रा। फ़रिश्ते उनके सिर कुचलते, फिर उनके सिर पहली हालत पर लौट आते। फिर मारते, फिर पहले जैसे हो जाते। मैंने पूछा: ‘ये कौन हैं?’ उन्होंने कहा: ‘ये जुमा और जमाअत को छोड़ने वाले, रुकूअ और सज्दे पूरे न करने वाले हैं।’
मैंने लोगों का एक गिरोह देखा। वे भूखे और नंगे थे। ज़बानिया फ़रिश्ते उन्हें जहन्नम में चरने के लिए हाँकते थे। मैंने पूछा: ‘ये कौन हैं?’ उन्होंने कहा: ‘ग़रीबों पर रहम न करने वाले और ज़कात न देने वाले।’
मैं एक गिरोह के पास से गुज़रा। उनके सामने लज़ीज़ खाने रखे हुए थे। एक तरफ़ मुरदार पड़ा था। वे उन लज़ीज़ खानों को छोड़कर मुरदार खाते थे। मैंने पूछा: ‘ये कौन हैं?’ उन्होंने कहा: ‘ये हलाल को छोड़कर हराम की तरफ़ झुकने वाले मर्द और औरतें हैं। हलाल माल होते हुए भी हराम खाने वाले लोग।’
मैंने (कुछ) ऐसे लोग देखे जिनमें पीठ पर लदे भारी बोझ की वजह से हिलने की भी ताक़त न रही थी। वे इसी हालत में लोगों को पुकारकर कह रहे थे कि उन पर कुछ और बोझ लाद दें। मैंने पूछा: ‘ये कौन हैं?’ उन्होंने कहा: ‘ये अमानत में ख़यानत करने वाले लोग हैं। लोगों का हक़ ले लेने के बाद भी फिर ज़ुल्म करते हैं।’
हम उन लोगों के एक गिरोह के पास से गुज़रे जो अपना ही गोश्त काटकर खा रहे थे। मैंने पूछा: ‘ये कौन हैं?’ जिबराईल (अलैहिस्सलाम) ने कहा: ‘ये ग़ीबत करने वाले और चुग़ली खाने वाले हैं।’
मैंने लोगों का एक गिरोह देखा जिनके चेहरे काले और आँखें नीली थीं, ऊपर के होंठ पेशानी तक पहुँचे हुए और नीचे के होंठ पाँवों तक लटके हुए थे, और मुँह से ख़ून और पीप बह रही थी। उन्हें आग के प्यालों में जहन्नम से बहने वाला ज़हरीला ख़ून और पीप पिलाया जाता था और वे गधों की तरह चिल्लाते थे। मैंने पूछा: ‘ये कौन हैं?’ उन्होंने कहा: ‘ये शराब पीने वाले हैं।’
हमें लोगों का एक गिरोह मिला जिनकी ज़बानें उनके सिरों से खींच ली गई थीं और जिनकी शक्लें बदलकर ख़िंज़ीर (सुअर) की सूरत में कर दी गई थीं; इसी हालत में उन्हें अज़ाब दिया जा रहा था। जिबराईल (अलैहिस्सलाम) ने कहा: ‘ये झूठी गवाही देने वाले हैं।’
हमें एक और क़ौम मिली। उनके पेट फूले हुए और नीचे लटके हुए थे, रंग नीला पड़ गया था, हाथ-पाँव बँधे हुए थे और वे अपनी जगह से उठ नहीं सकते थे। मैंने जिबराईल से उनके बारे में पूछा। उन्होंने कहा: ‘ये सूद खाने वाले हैं।’1
हमें कुछ औरतें मिलीं। उनके चेहरे काले और आँखें नीली थीं। उन्हें आग के कपड़े पहनाए गए थे। फ़रिश्ते उन्हें आग के गुर्ज़ों से मारते थे। वे कुत्तों और सुअरों की तरह चीख़ती थीं। मैंने पूछा: ‘ये कौन हैं?’ जिबराईल ने कहा: ‘ये ज़िना करने वाली और अपने शौहरों को सताने वाली औरतें हैं।’
मैंने लोगों का एक गिरोह देखा। वे बहुत ज़्यादा थे। उन्हें जहन्नम की वादियों में क़ैद किया गया था। आग उन्हें जला देती, वे फिर ज़िंदा हो जाते, आग फिर जला देती। मैंने पूछा: ‘ये कौन हैं?’ उन्होंने कहा: ‘ये अपने बापों की नाफ़रमानी करने वाले हैं।’
मैं एक गिरोह के पास से गुज़रा। वे खेती बोते थे और वह पल भर में बढ़कर बालियाँ दे देती थी। मैंने पूछा: ‘ये कौन हैं?’ जिबराईल ने कहा: ‘अल्लाह तआला के लिए इबादत करने वाले।’
मैं एक समुंदर पर पहुँचा। इस समुंदर की अजीब हालत बयान करना मुमकिन नहीं। वह दूध से भी सफ़ेद था और उसमें पहाड़ों जैसी लहरें थीं। मैंने पूछा: ‘यह कौन-सा समुंदर है?’ उन्होंने कहा: ‘इस समुंदर का नाम हयात का समुंदर है। हक़ तआला जब मुर्दों को ज़िंदा करेगा तो इस समुंदर से बारिश बरसाएगा। गले-सड़े, बिखरे हुए जिस्म ज़िंदा होकर, घास उगने की तरह, अपनी क़ब्रों से उठ खड़े होंगे…’
फिर हम दूसरे आसमान पर चढ़े। जिबराईल (अलैहिस्सलाम) ने फिर दरवाज़ा खटखटाया। पूछा गया: ‘तुम कौन हो?’ ‘मैं जिबराईल हूँ।’ ‘और तुम्हारे साथ कौन है?’ ‘यह मुहम्मद अलैहिस्सलाम हैं।’ ‘क्या उन्हें वह्य और मेराज की दावत भेजी गई?’ उन्होंने कहा: ‘हाँ, आई है।’ कहा गया: ‘आने वाली हस्ती को मरहबा! यह आने वाला कितना अच्छा मुसाफ़िर है!’ और फ़ौरन दरवाज़ा खुल गया। मैंने ख़ुद को आपस में ख़ालाज़ाद भाई ईसा और यह्या इब्ने ज़करिया (अलैहिमस्सलाम) के पास पाया। उन्होंने मुझसे ‘मरहबा’ कहा और दुआ की… (ईसा अलैहिस्सलाम दरमियाना क़द और सफ़ेद गेहुँए रंग के थे।)
मुझे फ़रिश्तों का एक गिरोह मिला। वे सफ़ बाँधे खड़े थे, सबके सब रुकूअ में थे। उनकी अपनी ख़ास तस्बीह थी। वे हमेशा रुकूअ में रहते हैं, सिर उठाकर ऊपर नहीं देखते। जिबराईल (अलैहिस्सलाम) ने कहा: ‘इन फ़रिश्तों की इबादत ऐसी है। हक़ तआला से माँगिए कि यह आपकी उम्मत को नसीब हो।’
मैंने दुआ की। उसने क़बूल फ़रमाकर नमाज़ में रुकूअ अता किया। फिर हम तीसरे आसमान पर चढ़े। वही सवाल-जवाब होने के बाद दरवाज़ा खुला और मैंने ख़ुद को यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) के पास पाया। मैंने देखा कि उन्हें ख़ूबसूरती का आधा हिस्सा दिया गया है। उन्होंने मुझसे ‘मरहबा’ कहा और दुआ की…
मैंने बहुत-से फ़रिश्ते देखे। वे सफ़ बाँधे थे, सबके सब सज्दे में थे। जब से पैदा हुए हैं, सज्दे में हैं और अपनी ख़ास तस्बीह के साथ तस्बीह करते हैं। जिबराईल (अलैहिस्सलाम) ने कहा: ‘इन फ़रिश्तों की इबादत ऐसी है। अल्लाह तआला से माँगिए कि यह अमल आपकी उम्मत के लिए आसान कर दे।’ मैंने हक़ तआला से माँगा। उसने क़बूल किया और यह नमाज़ में तुम्हें नसीब फ़रमाया।
फिर मैं चौथे आसमान पर पहुँचा। उसका दरवाज़ा नूर का, ख़ालिस चाँदी का बना हुआ था। उस पर नूर का एक ताला लगा था। ताले पर ‘ला इलाह इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह’ लिखा हुआ था। वही सवाल-जवाब होने के बाद मैंने ख़ुद को इदरीस (अलैहिस्सलाम) के पास पाया। उन्होंने मुझसे ‘मरहबा’ कहा और दुआ की। अल्लाह तआला ने उनके बारे में (मफ़हूमन) फ़रमाया है: ‘हमने उन्हें एक बुलंद मक़ाम पर उठा लिया।’2
मैंने एक फ़रिश्ते को एक कुर्सी पर ग़मगीन और उदास बैठे देखा। उनके आस-पास इतने फ़रिश्ते थे कि उनकी गिनती सिर्फ़ अल्लाह पाक ही जानता है। उनके दाईं तरफ़ मैंने नूरानी फ़रिश्ते देखे। वे हरे कपड़े पहने थे और उनसे बहुत अच्छी ख़ुशबू आती थी। उनके चेहरे इतने ख़ूबसूरत थे कि उनकी तरफ़ देखा नहीं जाता था। उनके बाईं तरफ़ ऐसे फ़रिश्ते थे जिनके मुँह से आग की लपटें निकलती थीं। उनके आगे आग के भाले और कोड़े पड़े थे। उनकी आँखें ऐसी थीं कि कोई उनकी नज़र की ताब नहीं ला सकता था। तख़्त पर बैठे फ़रिश्ते की सिर से पाँव तक आँखें थीं। वह हमेशा अपने सामने रखे दफ़्तर को देखते रहते, एक पल के लिए भी उससे नज़र नहीं हटाते थे। उनके सामने एक पेड़ था। उसके हर पत्ते पर एक आदमी का नाम लिखा था। उनके सामने तश्त जैसी एक चीज़ भी थी। वह कभी दाहिने हाथ से उसमें से कुछ लेकर दाईं तरफ़ के नूरानी फ़रिश्तों को देते, कभी बाएँ हाथ से कुछ लेकर बाईं तरफ़ के ज़ुल्मानी फ़रिश्तों को देते थे। (उस) फ़रिश्ते पर नज़र पड़ी तो मेरे दिल में डर पैदा हुआ। मैंने जिबराईल से पूछा: ‘यह फ़रिश्ता कौन हैं?’ उन्होंने कहा: ‘यह इज़राईल हैं। इनका चेहरा देखने की किसी में ताक़त नहीं।’ जिबराईल ने उनके पास जाकर कहा: ’ऐ इज़राईल!
“उन्होंने कहा: ‘आने वाली हस्ती को मरहबा! यह आने वाला कितना अच्छा मुसाफ़िर है!’ और फ़ौरन दरवाज़ा खुल गया, मैंने ख़ुद को आदम (अलैहिस्सलाम) के सामने पाया” हदीस शरीफ़
यह आख़िरी ज़माने के नबी, अल्लाह तआला के हबीब और प्यारे हैं।’ इज़राईल (अलैहिस्सलाम) सिर उठाकर मुस्कुराए। उन्होंने खड़े होकर मेरी ताज़ीम की और कहा: ‘मरहबा! हक़ तआला ने आपसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला कोई इंसान पैदा नहीं किया। आपकी उम्मत भी तमाम उम्मतों से बेहतर है। मैं आपकी उम्मत पर उनके माँ-बाप से भी ज़्यादा रहम करता हूँ।’ तब मैंने कहा: ‘तुमसे मेरी एक दरख़्वास्त है। मेरी उम्मत कमज़ोर है। उनके साथ नरमी बरतना। उनकी रूहें नरमी से क़ब्ज़ करना।’ उन्होंने कहा: ’उस अल्लाह तआला के हक़ की क़सम, जिसने आपको आख़िरी नबी बनाकर भेजा और अपना हबीब बनाया, अल्लाह तआला दिन और रात में सत्तर बार मुझे यूँ हुक्म देता है:
‘मुहम्मद की उम्मत की रूहें नरमी और आसानी से क़ब्ज़ करो और उनके काम मेहरबानी से अंजाम दो।’ इसी लिए मैं भी आपकी उम्मत पर उनकी माँओं और बापों से भी ज़्यादा शफ़क़त करता हूँ।’ फिर हम पाँचवें आसमान पर चढ़े। वहाँ हारून3 (अलैहिस्सलाम) से हमारी मुलाक़ात हुई। उन्होंने मुझसे ‘मरहबा’ कहा और भलाई की दुआ की। मैंने पाँचवें आसमान के फ़रिश्तों की इबादत देखी। वे सब पाँवों पर खड़े थे और अपने पाँवों की उँगलियों को देख रहे थे। वे किसी और तरफ़ बिल्कुल नहीं देखते थे और ऊँची आवाज़ से तस्बीह करते थे। मैंने जिबराईल (अलैहिस्सलाम) से पूछा: ‘क्या इन फ़रिश्तों की इबादत ऐसी है?’ उन्होंने कहा: ‘हाँ, हक़ तआला से माँगिए कि यह इबादत आपकी उम्मत को नसीब करे।’ मैंने दुआ की। अल्लाह पाक ने अता फ़रमाई। फिर हम छठे आसमान पर चढ़े। वहाँ मूसा (अलैहिस्सलाम) से हमारी मुलाक़ात हुई। उन्होंने मुझसे ‘मरहबा’ कहा और भलाई की दुआ की।
फिर हम सातवें आसमान पर चढ़े। वही सवाल-जवाब होने के बाद मैंने इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) को बैतुल मामूर से पीठ टिकाए बैठे पाया। इस बैतुल मामूर में हर दिन सत्तर हज़ार फ़रिश्ते दाख़िल होते हैं (और उनकी बारी फिर कभी नहीं आती)। मैंने इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) को सलाम किया। उन्होंने मेरे सलाम का जवाब दिया और कहा: ‘मरहबा, नेक नबी, नेक बेटे!’ (फिर) कहा: ‘ऐ मुहम्मद! जन्नत की ज़मीन बहुत लतीफ़ और उसकी मिट्टी पाक है। अपनी उम्मत से कहो कि वहाँ बहुत-से पेड़ लगाएँ।’ मैंने पूछा: ‘जन्नत में पेड़ कैसे लगाया जाता है?’ उन्होंने कहा: ‘“ला हौल वला क़ुव्वत इल्ला बिल्लाह” की तस्बीह पढ़कर’ (और एक रिवायत में: ‘सुब्हानअल्लाहि वलहम्दुलिल्लाहि व ला इलाह इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर’)। फिर जिबराईल (अलैहिस्सलाम) मुझे सिदरतुल मुंतहा ले गए। सिदरतुल मुंतहा एक ऐसा पेड़ है जिसकी जड़ छठे आसमान में और तना और डालियाँ सातवें आसमान के ऊपर हैं; उसके पत्ते हाथी के कानों जैसे और फल मीनारों जैसे थे।4 वह ऐसा पेड़ था जैसे अपने साये से तमाम आसमानों और जन्नत पर साया किए हुए हो। अल्लाह तआला के जलाल और अज़मत के नूर की तजल्ली से वह तरह-तरह के रंगों में ढल जाता, याक़ूत, ज़मुर्रद या उन जैसे जवाहरात से सज जाता और इतना ख़ूबसूरत हो जाता कि अल्लाह तआला की पैदा की हुई मख़लूक़ात में से कोई भी उसकी ख़ूबसूरती बयान नहीं कर सकता।
जिबराईल (अलैहिस्सलाम) मुझे सिदरतुल मुंतहा से आगे ले गए और मुझसे रुख़सत हुए। मैंने कहा: ‘ऐ जिबराईल! क्या मुझे अकेला छोड़ रहे हो?’ जिबराईल (अलैहिस्सलाम) बेचैन हो गए। हक़ तआला की हैबत से काँपने लगे और कहा: ‘ऐ मुहम्मद! अगर मैं (एक) क़दम (और) आगे बढ़ाऊँ तो अल्लाह तआला की अज़मत से हलाक हो जाऊँगा। मेरा पूरा वुजूद जलकर मिट जाएगा।’”
सारे जहानों के सरदार यहाँ तक जिबराईल अलैहिस्सलाम के साथ आए थे। यहाँ जिबराईल अलैहिस्सलाम ने रसूलुल्लाह को अपनी वह असली सूरत दिखाई जिस पर वह पैदा किए गए थे – अपने छह लाख पर फैलाए हुए, हर पर से मोती और याक़ूत बिखरते हुए।
फिर रफ़रफ़ नाम का जन्नत का एक हरा बिछौना आया, जिसकी चमक सूरज से भी ज़्यादा थी। वह लगातार अल्लाह तआला के ज़िक्र में लगा रहता था; जिस आलम में वह होता, उसे तस्बीह की आवाज़ भर देती थी। उसने नबी-ए-करीम को सलाम किया। रसूलुल्लाह रफ़रफ़ पर बैठ गए। पल भर में आप बहुत ऊँचाइयों पर पहुँच गए और हिजाब कहलाने वाले सत्तर हज़ार परदों से गुज़रे। हर हिजाब के बीच बहुत दूरी थी। हर परदे पर ज़िम्मेदार फ़रिश्ते थे। रफ़रफ़ नबी-ए-करीम को उन परदों से एक-एक करके गुज़ारता गया। इस तरह आप कुर्सी, अर्श और रूहों के आलमों से पार हो गए। हबीब-ए-अकरम और नबी-ए-मुहतरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) हर परदे से गुज़रते हुए यह हुक्म सुनते थे: “डरो नहीं, ऐ मुहम्मद! क़रीब आओ, क़रीब आओ!” आप इतने क़रीब हुए कि क़ाब-ए-क़ौसैन के मक़ाम तक पहुँच गए। ऐसे तरीक़े से, जो न जाना जा सकता है, न समझा जा सकता है, न बयान किया जा सकता है, आप अल्लाह तआला की चाही हुई बुलंदियों तक पहुँचे। बिना मकान, बिना ज़मान, बिना सम्त और बिना कैफ़ियत के रुयत (देखना) हुई, यानी आपने अल्लाह तआला को देखा। बिना आँख, बिना कान, बिना वसीले और बिना किसी दरमियानी के अपने रब से कलाम किया। ऐसी नेमतें पाईं जिन्हें कोई मख़लूक़ न जान सकती है, न समझ सकती है।
हज़रत इमाम रब्बानी “मकतूबात” में फ़रमाते हैं: “उन सरवर (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) ने मेराज की रात अपने रब को दुनिया में नहीं देखा, आख़िरत में देखा, क्योंकि रसूल अलैहिस्सलाम उस रात ज़मान और मकान के दायरे से बाहर निकल गए। आपने अज़ली और अबदी एक आन पाई। शुरुआत और आख़िर को एक नुक़्ते की तरह देखा। जन्नत में जाने वालों का हज़ारों साल बाद जन्नत में जाना और जन्नत में होना आपने उस रात देख लिया। तो उस मक़ाम का देखना दुनिया में देखना नहीं है। यह आख़िरत की नज़र से देखना है।”
नबी-ए-करीम से जब फ़रमाया गया: “अपने रब की तारीफ़ करो!” तो आपने फ़ौरन अर्ज़ किया: “अत्तहिय्यातु लिल्लाहि वस्सलवातु वत्तय्यिबातु” (यानी ज़बानों से होने वाली तमाम तारीफ़ें, मदहें और सनाएँ, जिस्म से होने वाली तमाम ख़िदमतें और इताअतें, और माल से होने वाली तमाम भलाइयाँ और एहसान अल्लाह तआला के लिए हों)।
“हक़ तआला ने आपसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला कोई इंसान पैदा नहीं किया। आपकी उम्मत भी तमाम उम्मतों से बेहतर है” इज़राईल अलैहिस्सलाम
पहले अल्लाह तआला ने अपने हबीब को बिना आँख, बिना कान, बिना वसीले और बिना मकान के यूँ सलाम फ़रमाया: “अस्सलामु अलैका अय्युहन्नबिय्यु व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू” (ऐ मेरे रसूल! मेरा सलाम, मेरी बरकत और मेरी रहमत तुम पर हो)। नबी-ए-करीम ने जवाब दिया: “अस्सलामु अलैना व अला इबादिल्लाहिस्सालिहीन” (या रब! हम पर भी और तेरे नेक बंदों पर भी सलाम हो)।
यह सुनकर फ़रिश्तों ने एक ज़बान होकर कहा: “अशहदु अल्ला इलाह इल्लल्लाहु व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू” (मैं आँखों से देखे हुए की तरह जानता हूँ और ईमान रखता हूँ कि अल्लाह तआला के सिवा इबादत के लायक़ कोई इलाह नहीं। मुहम्मद अलैहिस्सलाम उसके बंदे और रसूल हैं)।
नबी-ए-करीम ने जब “अस्सलामु अलैना…” कहा तो अल्लाह तआला ने फ़रमाया: “ऐ मेरे हबीब! यहाँ हम दोनों के सिवा कोई नहीं। तुमने ‘अलैना’ (हम पर) क्यों कहा?” रसूलुल्लाह ने यूँ जवाब दिया:
“इलाही! मेरी उम्मत के जिस्म अगरचे मेरे साथ नहीं, लेकिन उनकी रूहें मेरे साथ हैं। मेरी इनायत की नज़र और मेरी पूरी हिम्मत उनसे दूर नहीं। तूने मुझे सलाम फ़रमाया, मुझे तमाम बुराइयों से दूर रखा। आख़िरी ज़माने के फ़ितने में घिरी अपनी उस ग़रीब, दुखी उम्मत को मैं इस बड़े इकराम और एहसान से कैसे महरूम करूँ? ऐसी नेमत से उन्हें कैसे बेनसीब छोड़ूँ?”
अल्लाह तआला ने फ़रमाया: “ऐ मेरे हबीब! आज रात तुम मेरे मेहमान हो। मुझसे माँगो, क्या चाहते हो?” रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अर्ज़ किया: “अपनी उम्मत चाहता हूँ (या रब!)”
रिवायत है कि हक़ तआला ने यह सवाल सात सौ बार दोहराया। रसूलुल्लाह ने हर बार यही जवाब दिया: “अपनी उम्मत चाहता हूँ।” अल्लाह तआला ने जब फ़रमाया: “तुम हमेशा अपनी उम्मत ही चाहते हो”, तो आपने अर्ज़ किया: “ऐ मेरे रब! माँगने वाला मैं हूँ, देने वाला तू है। मेरी सारी उम्मत मुझे बख़्श दे।” अल्लाह पाक ने फ़रमाया: “अगर मैं तुम्हारी सारी उम्मत आज रात तुम्हें बख़्श दूँ तो न मेरी रहमत ज़ाहिर होगी, न तुम्हारी इज़्ज़त। उसका एक हिस्सा मैंने आज रात तुम्हें बख़्श दिया। दो हिस्सों को मैंने बाद के लिए रख दिया। क़यामत के दिन तुम माँगोगे और मैं बख़्श दूँगा, ताकि मेरी रहमत भी और तुम्हारी इज़्ज़त (शरफ़) भी ज़ाहिर हो जाए।”
हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने एक हदीस शरीफ़ में फ़रमाया: “उस रात (मेराज की रात) मैंने अल्लाह तआला से माँगा कि मेरी सारी उम्मत का हिसाब मेरे सुपुर्द कर दे। हक़ तआला ने फ़रमाया: ‘ऐ मुहम्मद! तुम्हारी मुराद यह है कि कोई भी तुम्हारी उम्मत के क़ुसूरों से वाक़िफ़ न हो। और मेरी मुराद यह है कि – क्योंकि तुम शफ़क़त वाले नबी हो – उनके क़ुसूर और बुरे काम ग़ैरों की तरह तुमसे भी छिपे रहें। ऐ मुहम्मद! तुम उनके रहनुमा हो। मैं उनका रब हूँ। तुमने उन्हें अभी देखा है। मैंने अज़ल से अबद तक उन पर नज़र की है और करता हूँ। ऐ मुहम्मद! अगर मुझे तुम्हारी उम्मत से बात करना पसंद न होता तो क़यामत के दिन उनसे हिसाब न लेता। उनका कोई गुनाह, बड़ा हो या छोटा, न पूछता।’”
“अल्लाह तआला ने फ़रमाया: ‘ऐ मुहम्मद! अपनी मुबारक आँख खोलो और अपने पाँव के नीचे देखो।’ मैंने देखा तो एक मुट्ठी मिट्टी दिखाई दी। हक़ तआला ने फ़रमाया: ‘तमाम मौजूद चीज़ें तुम्हारे पाँव की मिट्टी हैं। क्या तुम मेरी उस मिट्टी को दोस्त के हुज़ूर में लाए हो? किसी दोस्त के दामन पर लगी धूल को माफ़ करने से ज़्यादा आसान मेरे लिए तुम्हारी उम्मत को बख़्श देना है।’”
अपनी उम्मत मैंने तुम्हें दी, ऐ हबीब!
अपनी जन्नत उनको कर दी नसीब।
ऐ मेरे हबीब, क्या थी तुम्हारी मुराद,
क्या एक मुट्ठी ख़ाक के लिए की तुमने फ़रियाद?
नबी-ए-करीम ने एक हदीस शरीफ़ में फ़रमाया: “मैंने हक़ तआला से बहुत-से सवाल किए। उनका जवाब सुना। सवाल करने पर मैं पछताया। (उनमें से कुछ ये हैं:)
‘या रब! तूने जिबराईल को छह लाख पर दिए। इसके मुक़ाबले में मुझ पर तेरा एहसान क्या है?’ हक़ तआला ने फ़रमाया: ‘तुम्हारा एक बाल मुझे जिबराईल के छह लाख परों से ज़्यादा प्यारा है। तुम्हारे एक बाल के सदक़े क़यामत के दिन मैं हज़ारों नाफ़रमान गुनहगारों को आज़ाद कर दूँगा। ऐ मुहम्मद! जिबराईल अपना पर फैला दें तो मशरिक़ और मग़रिब के बीच की जगह भर दें। अगर मशरिक़ और मग़रिब के बीच की जगह नाफ़रमानों से भरी हो और तुम शफ़ाअत करो, तब भी मैं उन सबको तुम्हें बख़्श दूँगा।’ मैंने अर्ज़ किया: ‘तूने फ़रिश्तों को मेरे बाप आदम (अलैहिस्सलाम) के आगे सज्दा कराया। इसके मुक़ाबले में मुझ पर तेरा इकराम क्या है?’
हक़ तआला ने फ़रमाया: ‘फ़रिश्तों का आदम को सज्दा करना इस वजह से था कि तुम्हारा नूर उनकी पेशानी में था। ऐ मुहम्मद! मैंने तुम्हें इससे भी बढ़कर चीज़ दी। तुम्हारे नाम को अपने नाम के क़रीब किया और अर्श-ए-आला पर लिखा। उस वक़्त आदम अभी पैदा नहीं हुए थे, उनका नाम-निशान भी न था। मैंने तुम्हारा नाम आसमानों के दरवाज़ों पर, हिजाबों पर, जन्नतों के दरवाज़ों पर, महलों और पेड़ों पर, जन्नत की हर जगह लिखा। जन्नत में कोई चीज़ ऐसी न थी जिस पर “ला इलाह इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” न लिखा हो। यह मर्तबा आदम को दिए गए मर्तबे से ज़्यादा बुलंद है।’
जब मैं तुम पर आशिक़ हुआ, ऐ शरीफ़!
क्या दोनों जहान न होंगे तुम्हारे, ऐ लतीफ़!
अपनी ज़ात का आईना बनाया तुम्हारी ज़ात को,
अपने नाम के साथ लिखा तुम्हारे नाम को।
‘या रब! तूने नूह (अलैहिस्सलाम) को कश्ती दी। इसके मुक़ाबले में मुझे क्या अता किया?’ उसने फ़रमाया: ‘मैंने तुम्हें बुराक़ दिया और एक रात में तुम्हें ज़मीन से अर्श तक पहुँचाया। तुमने जन्नत और जहन्नम देखी। तुम्हारी उम्मत को मैंने मस्जिदें दीं; क़यामत के दिन तुम्हारी उम्मत उन मस्जिदों पर कश्तियों में सवार होने की तरह सवार होकर पलक झपकने की देर में पुल-सिरात से गुज़र जाएगी और जहन्नम से नजात पाएगी।’ ‘या रब! तूने बनी इस्राईल पर आसमान से मन्न का हलवा और बटेर जैसे परिंदे का गोश्त उतारा।’ हक़ तआला ने फ़रमाया: ’मैंने तुम्हें और तुम्हारी उम्मत को दुनिया और आख़िरत की नेमत अता की। बनी इस्राईल की शक्लें इंसानी सूरत से रीछ, बंदर और सुअर की सूरत में बदल दीं। तुम्हारी उम्मत में से किसी के साथ मैंने ऐसा नहीं किया। वे उनके जैसे अमल करें, तब भी मैंने यह बला उनके लिए रवा नहीं रखी। ऐ मुहम्मद! मैंने तुम्हें एक ऐसी सूरह दी जिसकी मिसाल न तौरात में है, न इंजील में। वह सूरह, सूरह फ़ातिहा है। जो कोई उस सूरह को पढ़े, उसका जिस्म जहन्नम पर हराम हो जाता है। उस आदमी के माँ-बाप का अज़ाब मैं हल्का कर देता हूँ। ऐ मुहम्मद! मैंने तुमसे ज़्यादा अकरम (क़ीमती, बुलंद, इज़्ज़त वाला) कोई पैदा नहीं किया। तुम पर और तुम्हारी उम्मत पर मैंने रात और दिन में पचास वक़्त की नमाज़ फ़र्ज़ की।
“उस रात (मेराज की रात) मैंने अल्लाह तआला से माँगा कि मेरी सारी उम्मत का हिसाब मेरे सुपुर्द कर दे” हदीस शरीफ़
ऐ मुहम्मद! जो कोई मेरी वहदानियत क़बूल करे और मेरे साथ किसी को शरीक न ठहराए, जन्नत उसी की है। तुम्हारी ऐसी उम्मत पर मैंने जहन्नम हराम कर दिया। तुम्हारी उम्मत पर मेरी रहमत मेरे ग़ज़ब से आगे बढ़ गई है।
ऐ मुहम्मद! मेरे नज़दीक तुम तमाम मख़लूक़ में सबसे अकरम हो, सबसे इज़्ज़त वाले हो। क़यामत के दिन मैं तुम्हारा ऐसा इकराम करूँगा कि सारा आलम हैरान रह जाएगा। ऐ मेरे हबीब! जब तक तुम जन्नत में दाख़िल न हो जाओ, दूसरे नबियों और उनकी उम्मतों के लिए उसमें दाख़िल होना मना है। जब तक तुम्हारी उम्मत दाख़िल न हो, कोई और उम्मत दाख़िल न होगी। ऐ मुहम्मद! क्या तुम देखना चाहते हो कि मैंने तुम्हारे और तुम्हारी उम्मत के लिए क्या-क्या तैयार किया है?’ मैंने कहा: ‘चाहता हूँ, या रब!’ उसने इसराफ़ील से ख़िताब करके फ़रमाया: ‘ऐ इसराफ़ील! मेरे बंदे, मेरे अमीन और मेरे रसूल जिबराईल से कहो कि मेरे हबीब को जन्नत में ले जाएँ और मैंने अपने हबीब और उनकी उम्मत के लिए जन्नत में जो कुछ तैयार किया है, वह दिखाएँ, ताकि उनका मुबारक दिल फ़िक्र से आज़ाद हो जाए।’”
सारे जहानों के सरदार हमारे प्यारे नबी इसराफ़ील अलैहिस्सलाम के साथ जिबराईल अलैहिस्सलाम के पास आए। अल्लाह तआला का हुक्म पूरा करने के लिए जिबराईल अलैहिस्सलाम नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को जन्नत में ले गए। फ़रिश्ते हाथों में थाल लिए इंतिज़ार कर रहे थे; एक में हुल्ला था और दूसरा नूर से भरा था। जिबराईल अलैहिस्सलाम ने कहा: “या रसूलल्लाह! ये आदम अलैहिस्सलाम से अस्सी हज़ार साल पहले पैदा किए गए। इस मक़ाम पर ये थालों में रखी चीज़ें आप पर और आपकी उम्मत पर निछावर करने के लिए बेसब्री से इंतिज़ार कर रहे हैं। क़यामत के दिन जब आप और आपकी उम्मत अल्लाह तआला के हुक्म से जन्नत की दहलीज़ पर क़दम रखेंगे तो ये फ़रिश्ते थालों के जवाहरात आप लोगों पर निछावर करेंगे।” जन्नत पर मुक़र्रर रिज़वान नाम के फ़रिश्ते ने आपका इस्तिक़बाल किया। उन्होंने नबी-ए-करीम को ख़ुशख़बरियाँ सुनाईं और कहा: “हक़ तआला ने जन्नत को तीन हिस्सों में बाँटा है, ताकि दो हिस्से आपकी उम्मत को और एक हिस्सा दूसरे नबियों की उम्मतों को दे।” फिर उन्होंने आपको पूरी जन्नत की सैर कराई। हबीब-ए-अकरम ने फ़रमाया: “मैंने जन्नत के बीच में एक नहर देखी।
वह अर्श से भी ऊपर बहती है। एक जगह से पानी, दूध, शराब और शहद निकलते हैं। वे आपस में बिल्कुल नहीं मिलते। उस नहर के किनारे ज़बरजद के थे। उसके अंदर के पत्थर जवाहरात, उसकी कीचड़ अंबर और उसकी घास ज़ाफ़रान थी। उसके चारों तरफ़ चाँदी के प्याले रखे थे, जिनकी गिनती आसमान के सितारों से भी ज़्यादा थी। उसके आस-पास परिंदे थे, जिनकी गर्दनें ऊँट की गर्दन जैसी थीं। जो कोई उनका गोश्त खाए और उस नहर से पिए, वह हक़ तआला की रज़ा पा लेता है। मैंने जिबराईल से पूछा: ‘यह कौन-सी नहर है?’ उन्होंने कहा: ‘यह कौसर है। हक़ तआला ने इसे आपको दिया है। आठों जन्नतों के बाग़ों में इसी कौसर से पानी बहता है।’ उस नहर के किनारे मैंने ख़ेमे देखे। वे सब मोती और याक़ूत के थे। मैंने जिबराईल से उनके बारे में पूछा। उन्होंने कहा: ‘ये आपकी बीवियों के ठिकाने हैं।’ उन ख़ेमों में मैंने हूरें देखीं। उनके चेहरे सूरज की तरह चमकते थे और वे सब आवाज़ मिलाकर तरह-तरह के नग़मे गा रही थीं। वे कहती थीं: ’हम ख़ुश और शादमाँ हैं। हमें कभी कोई ग़म नहीं आता।
हम सजी-सँवरी हैं, कभी बेलिबास नहीं होतीं। हम जवान हैं, कभी बूढ़ी नहीं होतीं। हम अच्छे मिज़ाज वाली हैं, कभी ग़ुस्सा नहीं होतीं। हम हमेशा ऐसी ही हैं, कभी नहीं मरतीं।’ उनके नग़मे और आवाज़ें सआदत के महलों और पेड़ों तक पहुँचकर हर जगह छा जाती थीं। उनकी आवाज़ें इतनी प्यारी थीं कि अगर वे नग़मे दुनिया में आ जाते तो दुनिया में न मौत रहती, न मुसीबत। जिबराईल ने कहा: ‘क्या आप इनके चेहरे देखना चाहते हैं?’ मैंने कहा: ‘चाहता हूँ।’ उन्होंने एक ख़ेमे का दरवाज़ा खोला। मैंने देखा। ऐसी ख़ूबसूरत सूरतें देखीं कि अगर सारी उम्र उनकी ख़ूबसूरती बयान करूँ तो भी ख़त्म न कर सकूँ। उनके चेहरे दूध से भी सफ़ेद, गाल याक़ूत से भी सुर्ख़ और सूरज से भी ज़्यादा रौशन थे। उनकी खाल रेशम से भी नर्म और चाँद की तरह रौशन थी, उनकी ख़ुशबू मुश्क से भी अच्छी थी। उनके बाल बहुत काले थे – किसी के गुँथे हुए, किसी के समेटे हुए, किसी के खुले हुए; बैठती तो बाल उसके चारों तरफ़ ख़ेमे की तरह हो जाते, खड़ी होती तो पाँव तक पहुँच जाते। हर एक के सामने एक ख़ादिम खड़ा रहता था। जिबराईल ने कहा: ‘ये आपकी उम्मत के लिए हैं।’”
नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “मैंने आठों जन्नतों के बाग़-बग़ीचे और हर तरह की नेमतें देखीं। मेरे दिल में ख़याल आया कि काश जहन्नम और उसके दर्जे भी देख लूँ। जिबराईल मेरा हाथ पकड़कर मुझे जहन्नम के सबसे बड़े फ़रिश्ते मालिक के पास ले गए। उन्होंने कहा: ‘ऐ मालिक! हज़रत मुहम्मद दुश्मनों के जहन्नम में ठिकाने देखना चाहते हैं, इन्हें जहन्नम दिखाओ।’” मालिक ने जहन्नम के ऊपर से उसका ढक्कन हटाया तो जहन्नम ऐसा उबलने और उफनने लगा कि नबी-ए-करीम (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) ने देखा कि जहन्नम हर चीज़ को पकड़कर जला डालता है; आपने जहन्नम में प्यास के अज़ाब, अज़ाब की ज़ंजीरें, अज़ाब के साँप और बिच्छू, और वहाँ के कुछ अज़ाब अपनी आँखों से देखे।
“मालिक ने जहन्नम के तबक़े खोले। मैंने सातों तबक़े (सबके सब) देखे। सातवें तबक़े को हाविया कहते हैं। उसका अज़ाब दूसरे तबक़ों से कई गुना ज़्यादा था। मैंने मालिक से पूछा: ‘इस तबक़े में किस गिरोह को अज़ाब दिया जाता है?’ मालिक ने कहा: ‘फ़िरऔन, क़ारून और आपकी उम्मत के मुनाफ़िक़ों (दोग़लों) को।’ छठा तबक़ा लज़ा है। वहाँ मुशरिकों (जिनका कोई दीन ही न था) को अज़ाब दिया जाता है। पाँचवाँ तबक़ा हुतमा है। वहाँ आग और बैल को पूजने वालों और बौद्धों को अज़ाब दिया जाता है।
चौथा तबक़ा जहीम है। वहाँ सूरज और सितारों को पूजने वालों को अज़ाब दिया जाता है। तीसरा तबक़ा सक़र है। वहाँ ईसाइयों को अज़ाब दिया जाता है। दूसरा तबक़ा सईर है। वहाँ यहूदियों को अज़ाब दिया जाता है। पहला तबक़ा जहन्नम है। उसका अज़ाब दूसरे तबक़ों के अज़ाब से हल्का था। (इसके बावजूद) मैंने वहाँ आग के सत्तर हज़ार समुंदर देखे। हर समुंदर इतना बड़ा था कि अगर ज़मीनों और आसमानों को एक समुंदर में डाल दें और एक फ़रिश्ते को ढूँढने का हुक्म दें, तो हज़ार साल ढूँढे तब भी उन्हें पाना मुमकिन न हो। ज़बानिया (जहन्नम पर मुक़र्रर फ़रिश्ते) इतने अज़ीम थे कि अगर उनमें से एक ज़मीनों और आसमानों को अपने मुँह के एक कोने में रख ले तो पता भी न चले। वे समुंदर लहराते और उनसे ख़ौफ़नाक आवाज़ें पैदा होती थीं। अगर उस आवाज़ में से थोड़ी-सी आवाज़ भी दुनिया में आ जाती तो सारे जानदार हलाक हो जाते।
मैंने पूछा: ‘यह तबक़ा किस गिरोह के लिए है?’ मालिक ने जवाब न दिया। मैंने फिर पूछा। वह ख़ामोश रहे… जिबराईल ने मालिक से कहा: ‘यह तुमसे जवाब चाहते हैं।’ उन्होंने यह कहकर माज़रत चाही: ‘मुझे माफ़ रखिए।’ मैंने कहा: ‘जो भी हो, जवाब दो, ताकि आज ही उसकी तदबीर मुमकिन हो।’ मालिक ने कहा: ‘या रसूलल्लाह! यह आपकी उम्मत के नाफ़रमानों के लिए है। उन्हें नसीहत कीजिए, ताकि इस ख़ौफ़नाक जगह से ख़ुद को बचाएँ। अपने जिस्मों को ऐसे अज़ाब की तरफ़ घसीटने वाली चीज़ों से बचें। उस दिन मैं नाफ़रमानों पर रहम नहीं करूँगा। न उनके सफ़ेद दाढ़ी वाले बूढ़ों पर शफ़क़त करूँगा, न उनके जवानों पर।’”
“मेराज वह जगह है जहाँ अक़्ल ख़त्म होती है और ईमान शुरू होता है” हदीस शरीफ़
सारे जहानों के सरदार रोने लगे। आप मुबारक सिर से अमामा उतारकर शफ़ाअत करने और (अल्लाह तआला से) गिड़गिड़ाने लगे। आप अपनी उम्मत की कमज़ोरी बयान करते हुए और यह कहते हुए कि वे ऐसे अज़ाब की ताब न ला सकेंगे, इतना रोए कि आपके साथ जिबराईल अलैहिस्सलाम और तमाम फ़रिश्ते भी रो पड़े। तब अल्लाह तआला की तरफ़ से ख़िताब आया: “ऐ मेरे हबीब! मेरे नज़दीक तुम्हारी इज़्ज़त और क़द्र बड़ी है, तुम्हारी दुआ क़बूल हो गई। अपना दिल ख़ुश रखो। मैंने तुम्हें तुम्हारी मुराद तक पहुँचा दिया। मैं तुम्हें ऐसा मक़ाम दूँगा कि तुम्हारी शफ़ाअत से बहुत-से नाफ़रमानों को बख़्श दूँगा, यहाँ तक कि तुम कहोगे ‘बस, काफ़ी है।’ ऐ मेरे हबीब! जो कोई मेरे हुक्म को थामे रहे, वह अज़ाब और सज़ा से बच जाएगा, मेरी रहमत पा लेगा। जन्नत में मुझे देखने के शरफ़ से नवाज़ा जाएगा। तुम पर और तुम्हारी उम्मत पर मैंने रात और दिन में पचास वक़्त की नमाज़ फ़र्ज़ की।”
नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपनी बात जारी रखते हुए फ़रमाया: “उस मक़ाम से (आगे) मैं अर्श तक पहुँचा। आसमानों से गुज़रकर उस जगह आया जहाँ मूसा (अलैहिस्सलाम) थे। उन्होंने मुझसे पूछा: ‘हक़ तआला ने तुम पर और तुम्हारी उम्मत पर क्या फ़र्ज़ किया?’ मैंने कहा: ‘हर दिन और रात के लिए पचास वक़्त की नमाज़ मुझ पर फ़र्ज़ की।’ उन्होंने कहा: ‘अपने रब के पास लौट जाओ और उससे इसमें कुछ कमी की दरख़्वास्त करो, क्योंकि तुम्हारी उम्मत इसे न उठा सकेगी। मैंने बनी इस्राईल को आज़माया और परखा है।’ इस पर मैं अपने रब के पास लौटा और अर्ज़ किया: ‘या रब! मेरी उम्मत के लिए (इस हुक्म को) कुछ हल्का कर दे!’ तो उसने पचास वक़्तों में से सिर्फ़ पाँच वक़्त कम किए। मैं मूसा (अलैहिस्सलाम) के पास लौटा और बताया (कि पाँच वक़्त कम किए)। उन्होंने कहा: ‘अपने रब के पास लौट जाओ! कुछ और कमी की दरख़्वास्त करो, क्योंकि तुम्हारी उम्मत इसे न उठा सकेगी।’ इस तरह मैं मूसा (अलैहिस्सलाम) और अपने रब के बीच आता-जाता रहा, यहाँ तक कि आख़िर में अल्लाह तआला ने फ़रमाया: ‘इस नमाज़ को मैंने पाँच वक़्त कर दिया। हर नमाज़ के लिए दस सवाब हैं। इस लिहाज़ से आख़िर में फिर भी पचास नमाज़ें होती हैं, क्योंकि जो कोई एक नेकी का इरादा करे और उसे न कर सके, उसके लिए एक सवाब लिखा जाता है। और अगर कर ले तो एक के बदले पूरे दस सवाब लिखे जाते हैं। लेकिन अगर किसी गुनाह का इरादा करे और उसे न करे तो कुछ नहीं लिखा जाता। अगर कर ले तो सिर्फ़ एक गुनाह लिखा जाता है।’ फिर मैंने मूसा (अलैहिस्सलाम) के पास उतरकर हाल बताया। उन्होंने फिर कहा: ‘लौट जाओ, कुछ और कमी की दरख़्वास्त करो।’ इस पर मैंने उनसे कहा: ‘अपने रब से इतनी बार इल्तिजा कर चुका हूँ कि अब मुझे शर्म आती है।’”5 अल्लाह तआला ने इस तरह हमारे प्यारे नबी के उस मुबारक दिल को तसल्ली दी जो उठाई हुई तकलीफ़ों से ज़ख़्मी था। आपको वे नेमतें अता फ़रमाईं जो उसने अपनी किसी मख़लूक़ को नहीं दीं, जिन्हें कोई न जान सकता है, न समझ सकता है।
आ इधर, ऐ इश्क़ की आग में जलने वाले,
ख़ुद को महबूब का आशिक़ समझने वाले।
आ, सुन उस शाह की मेराज का खुला बयान,
आशिक़ है तो इश्क़ की आग में जल, न रुक इक आन।
वह पीर की रात थी, सच्ची है यह ख़बर,
वह रात दरअसल थी लैलतुल क़द्र।
वह मुबारक नसीब और बुलंद क़द्र वाले
उस रात उम्मे हानी के घर में थे।
पहले आने वाले इस दौलत को न पा सके,
इस बुलंदी तक कोई भी न जा सके।
क्योंकि सब कुछ देखकर आप आगे गुज़र गए,
जाकर उस बुलंद बारगाह तक पहुँच गए।
छहों सम्तों से पाक वह ज़ुल जलाल,
बिना कैसे और कितने के दिखाया आपको जमाल।
देखा आपने खुलकर रब्बुल इज़्ज़त को,
आख़िरत में यूँ ही देखेगी आपकी उम्मत उसको।
तुमने मेराज में आकर मुझसे की इल्तिजा,
नमाज़ को तुम्हारी उम्मत की मेराज बना दिया।
“ऐ मेरे हबीब! जो कोई मेरे हुक्म को थामे रहे, वह अज़ाब और सज़ा से बच जाएगा, मेरी रहमत पा लेगा। जन्नत में मुझे देखने के शरफ़ से नवाज़ा जाएगा” हदीस-ए-क़ुदसी
मैं ईमान लाया! मेरी जान आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह
फिर सारे जहानों के सरदार पल भर में बैतुल मुक़द्दस आए और वहाँ से मस्जिद-ए-अक़्सा के दरवाज़े पर बँधे बुराक़ पर सवार होकर मक्का मुकर्रमा लौट आए। नबी-ए-करीम बैतुल मुक़द्दस से मक्का आते हुए क़ुरैश के एक क़ाफ़िले के पास से गुज़रे। क़ाफ़िले का एक ऊँट बिदककर गिर पड़ा। मक्का मुकर्रमा में आप उम्मे हानी के घर तशरीफ़ लाए। आपके लेटने की जगह अभी ठंडी नहीं हुई थी, तश्त में वुज़ू के पानी की हरकत अभी थमी नहीं थी। बाहर घूमती उम्मे हानी को ऊँघ आ गई थी और उन्हें किसी बात की ख़बर न हुई थी।
सुबह होने पर रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उम्मे हानी को अपनी मेराज का हाल सुनाने के बाद फ़रमाया: “सुबह काबा जाकर मैं यह बात सुनाऊँगा।” हज़रत उम्मे हानी ने अर्ज़ किया: “ऐ मेरे चचा के बेटे! ख़बरदार, यह बात क़ुरैश से न कहिए! वे आपको झुठलाएँगे और आपको दुख पहुँचाएँगे। जिनका ईमान कमज़ोर है, वे इस पर यक़ीन नहीं करेंगे और दीन से निकल जाएँगे। मुशरिक तो इसी की ताक में हैं, उनका ईमान बिगाड़ देंगे। इस वक़्त मुसलमान थोड़े हैं।
अगर आप तब बताएँ जब मुसलमान कुछ ताक़तवर और मज़बूत हो जाएँ, तो कैसा रहे?” सारे जहानों के सरदार और कायनात के सुल्तान ने जो तारीख़ी जवाब दिया, वह यह था: “अल्लाह की क़सम, मैं यह बात उन्हें ज़रूर बताऊँगा। जो आज सड़ा हुआ है, वह कल भी सड़ा हुआ ही रहेगा। मैं इस इस्लाम की बुनियाद मज़बूत ईमान वालों के साथ रखूँगा। अगर किसी को अब भी मुझ पर शक है तो अलग होकर चला जाए। मेरा उनसे कोई काम नहीं। सड़ा हुआ हमेशा सड़ा हुआ है। आज न सड़े तो कल सड़ जाएगा। बाद में सड़ने से बेहतर है कि अभी सड़ जाए, ताकि हम उस पर भरोसा करके राह पर न निकलें। मज़बूत लोग हमारे लिए काफ़ी हैं।”
फिर आप सुबह काबा तशरीफ़ ले गए और बयान करने लगे… काफ़िरों ने यह कहकर मज़ाक़ उड़ाया: “मुहम्मद की अक़्ल मारी गई है, वह पूरी तरह बहक गया है।” मुसलमान होने का इरादा रखने वाले भी शक में पड़ गए। मुशरिकों में से कुछ ख़ुश होकर अबू बकर के घर आए, क्योंकि वे अच्छी तरह जानते थे कि वह अक़्लमंद, तजुर्बेकार और हिसाब-किताब वाले सौदागर हैं। वह दरवाज़े पर आए तो मुशरिकों ने पूछा: “ऐ अबू बकर! तुम कई बार बैतुल मुक़द्दस जाकर आ चुके हो। अच्छी तरह जानते हो। मक्का से बैतुल मुक़द्दस जाकर लौटने में कितना वक़्त लगता है?” हज़रत अबू बकर ने कहा: “अच्छी तरह जानता हूँ। एक महीने से ज़्यादा।” इस बात से ख़ुश होकर काफ़िरों के गिरोह ने कहा: “अक़्लमंद, तजुर्बेकार आदमी की बात ऐसी ही होती है।” हँसते हुए, मज़ाक़ उड़ाते हुए और यह उम्मीद करते हुए कि हज़रत अबू बकर भी उनकी तरह सोचेंगे, उन्होंने कहा: “तुम्हारा आक़ा कहता है कि वह एक रात में बैतुल मुक़द्दस जाकर लौट आया है; अब तो वह बिल्कुल बहक गया है।” उन्होंने हज़रत अबू बकर से मुहब्बत और इज़्ज़त जताकर उनसे उम्मीद बाँध रखी थी।
हज़रत अबू बकर ने रसूलुल्लाह का मुबारक नाम सुना तो (अपनी अक़्ल और मंतिक़ पर ज़रा भी तौले बिना) कहा: “अगर उन्होंने ऐसा कहा है तो यह सच है। मैं भी ईमान लाया कि वह एक पल में जाकर लौट आए।” यह कहकर वह घर के अंदर चले गए। काफ़िर हैरान होकर यह कहते हुए लौट गए: “लो भई, मुहम्मद कैसा ज़बरदस्त जादूगर निकला। अबू बकर पर जादू कर दिया।”
हज़रत अबू बकर फ़ौरन रसूलुल्लाह के पास आए। बड़े मजमे के बीच उन्होंने ऊँची आवाज़ से कहा: “या रसूलल्लाह! आपकी मेराज मुबारक हो! अल्लाह तआला ने हमें आप जैसे अज़ीम नबी का ख़ादिम बनाकर इज़्ज़त बख़्शी, आपका मुबारक चेहरा देखने और दिलों को जीत लेने वाली, रूहों को खींच लेने वाली आपकी मीठी बातें सुनने की नेमत से नवाज़ा; इस पर मैं अल्लाह तआला का बेहद शुक्र अदा करता हूँ। या रसूलल्लाह! आपकी हर बात सच है। मैं ईमान लाया। मेरी जान आप पर क़ुरबान!” हज़रत अबू बकर की बातों ने काफ़िरों को हैरान कर दिया। कहने को कोई बात न पाकर वे बिखर गए। इन बातों ने शक में पड़े, कमज़ोर ईमान वाले कुछ लोगों के दिलों को भी ताक़त दी। रसूलुल्लाह ने उस दिन अबू बकर को “सिद्दीक़” कहा। यह नाम पाने से उनका दर्जा एक सीढ़ी और ऊपर उठ गया।6
इस बात पर काफ़िर बहुत भड़क उठे। वे मोमिनों के मज़बूत ईमान को, हमारे नबी की हर बात पर उनके फ़ौरन यक़ीन कर लेने को और आपके चारों तरफ़ परवाने की तरह घूमने को बरदाश्त न कर सके। रसूलुल्लाह को शर्मिंदा करने और हराने के लिए वे आपका इम्तिहान लेने लगे।
“ऐ मुहम्मद! कहते हो कि बैतुल मुक़द्दस गए थे। ज़रा बताओ तो, मस्जिद के कितने दरवाज़े और कितनी खिड़कियाँ हैं?” – इस तरह के सवाल उन्होंने किए।
“मेराज का हाल बताना मुझ पर लाज़िम है; जो ईमान नहीं लाएगा, वह बाद में भी फिर जाएगा; सड़ी हुई बुनियाद पर इमारत नहीं बनती; जिसे अलग होना है, अभी से अलग हो जाए, मज़बूत लोग रह जाएँ” हदीस शरीफ़
अक़बा की बैअत की जगह पर बनाई गई मस्जिद-ए-बैअत
रसूलुल्लाह ने उनमें से हर एक को एक-एक करके जवाब दिया। आप जवाब देते जाते और हज़रत अबू बकर कहते जाते: “ऐसा ही है, या रसूलल्लाह।” हालाँकि रसूलुल्लाह अपने अदब और हया की वजह से सामने वाले के चेहरे की तरफ़ भी नहीं देखते थे। आपने फ़रमाया: “मस्जिद-ए-अक़्सा में मैंने अपने आस-पास नहीं देखा था। जो वे पूछ रहे थे, वह मैंने नहीं देखा था। उसी पल जिबराईल (अलैहिस्सलाम) ने मस्जिद-ए-अक़्सा को मेरी आँखों के सामने ला दिया। मैं उसकी खिड़कियाँ देखकर गिनता जाता और उनके सवालों का फ़ौरन जवाब देता जाता था।” रसूलुल्लाह ने बताया कि आपने रास्ते में ऊँटों वाले मुसाफ़िर देखे थे, और फ़रमाया: “इंशाअल्लाह, वे बुध के दिन आ जाएँगे।” बुध के दिन सूरज डूबते वक़्त क़ाफ़िला मक्का पहुँच गया। क़ाफ़िले वालों से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि ऐसा लगा जैसे आँधी चली हो, और एक ऊँट गिर पड़ा था। इस बात से मोमिनों का ईमान मज़बूत हुआ और काफ़िरों की दुश्मनी और बढ़ती गई।7 हिजरत से एक साल पहले, रजब महीने की 27 तारीख़ को, जुमा की रात होने वाले इस मोजिज़े को मेराज कहते हैं। रसूलुल्लाह मेराज पर रूह और जिस्म के साथ, जागने की हालत में तशरीफ़ ले गए। मेराज की रात आपको बहुत-सी इलाही हक़ीक़तें दिखाई गईं और पाँच वक़्त की नमाज़ इसी रात फ़र्ज़ हुई। इसके अलावा सूरह बक़रह की आख़िरी दो आयात-ए-करीमा अता की गईं। मेराज की ख़बर क़ुरआन-ए-करीम में सूरह बनी इस्राईल (इसरा) की पहली आयत में, सूरह नज्म की शुरू की आयतों में और कुछ हदीसों में दी गई है।8
हमारे प्यारे नबी ने मेराज के बाद अपने सहाबा को जन्नत का हाल बताते हुए फ़रमाया: “ऐ अबू बकर! मैंने तुम्हारा महल देखा। वह लाल सोने का था। तुम्हारे लिए तैयार की गई नेमतें मैंने अपनी आँखों से देखीं।” इस पर हज़रत अबू बकर ने कहा: “वह महल भी और महल का मालिक भी आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह।”
नबी-ए-करीम ने हज़रत उमर की तरफ़ मुड़कर फ़रमाया: “ऐ उमर! मैंने तुम्हारा महल देखा। वह याक़ूत का था। उस महल में बहुत-सी हूरें थीं। लेकिन मैं अंदर नहीं गया। मुझे तुम्हारी ग़ैरत का ख़याल आया।” हज़रत उमर बहुत रोए। आँसुओं के बीच उन्होंने कहा: “मेरे माँ-बाप और मेरी जान आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह! क्या आपसे भी ग़ैरत की जाती है?” फिर आपने हज़रत उस्मान से फ़रमाया: “ऐ उस्मान! मैंने तुम्हें हर आसमान में देखा। जन्नत में तुम्हारा महल देखकर तुम्हें याद किया।” हज़रत अली से फ़रमाया: “ऐ अली! मैंने तुम्हारी सूरत चौथे आसमान में देखी। मैंने जिबराईल से पूछा। उन्होंने कहा: ‘या रसूलल्लाह! फ़रिश्ते हज़रत अली के दीदार के मुश्ताक़ हो गए। हक़ तआला ने उनकी सूरत में एक फ़रिश्ता पैदा किया। वह चौथे आसमान में रहता है, फ़रिश्ते उसकी ज़ियारत करते हैं और बरकत हासिल करते हैं।’ फिर मैं तुम्हारे महल में गया। एक पेड़ के फल को सूँघा। उसमें से एक हूर निकली और उसने अपने चेहरे पर परदा डाल लिया। मैंने पूछा: ‘तुम कौन हो और किसकी हो?’ उसने कहा: ‘आपके चचा के बेटे अली के लिए पैदा की गई हूँ, या रसूलल्लाह!’”
मेराज की रात की सुबह जिबराईल अलैहिस्सलाम ने आकर इमाम बनकर रसूलुल्लाह को पाँचों वक़्त की नमाज़ उनके वक़्तों में पढ़ाई। एक हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया है: “जिबराईल (अलैहिस्सलाम) ने काबा के दरवाज़े के पास दो दिन मेरी इमामत की। हम दोनों ने फ़ज्र की नमाज़ फ़ज्र (सुबह की सफ़ेदी) फूटते वक़्त, ज़ुहर सूरज के ढलते वक़्त, अस्र जब हर चीज़ का साया उसके अपने क़द के बराबर हो गया, मग़रिब सूरज डूबते वक़्त (जब उसका ऊपरी किनारा छिप गया) और इशा शफ़क़ के अंधेरा होने पर पढ़ी। दूसरे दिन फ़ज्र की नमाज़ उजाला होने पर, ज़ुहर जब हर चीज़ का साया उसके क़द का दोगुना हो गया, अस्र उसके फ़ौरन बाद, मग़रिब रोज़ा खोलने के वक़्त और इशा रात का तिहाई हिस्सा गुज़रने पर पढ़ी। फिर उन्होंने कहा: ‘ऐ मुहम्मद! आपकी और आपसे पहले के नबियों की नमाज़ों के वक़्त यही हैं। हमने जिन दो वक़्तों में नमाज़ पढ़ी, आपकी उम्मत पाँचों वक़्त की हर नमाज़ उन्हीं दो वक़्तों के बीच पढ़े।’”9 नमाज़ के वक़्त इस तरह बताए जाने के बाद हब्शा में भी ख़बर भेजी गई कि वहाँ के मुसलमान पाँच वक़्त की नमाज़ पढ़ें और नमाज़ के फ़र्ज़ होने के दिन से लेकर उनके पढ़ना शुरू करने तक की नमाज़ों की क़ज़ा करें।
“(ऐ मदीना वालो!) क्या तुम वादा करते हो कि अल्लाह की राह में अल्लाह के लिए हक़ बात कहोगे और जिस तरह अपनी जान और इज़्ज़त की हिफ़ाज़त करते हो, उसी तरह मेरे मददगार बनोगे?” हदीस शरीफ़
