मेरे प्यारे नबी

मक्का – ताइफ़ का सफ़र

अगले साल ज़िलहिज्जा महीने में फिर आने की नीयत करके वे अपने वतन लौटने के लिए हमारे नबी से इजाज़त लेकर रुख़सत हुए। नए-नए मुसलमान हुए ये छह लोग थे: उक़बा इब्ने आमिर, असअद इब्ने ज़ुरारा, औफ़ इब्ने हारिस, राफ़े इब्ने मालिक, क़ुतबा इब्ने आमिर और जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अन्हुम)।1

ये छह नए मुसलमान मदीना में अपनी क़ौम के पास लौटे तो फ़ौरन इस्लाम और हमारे नबी के बारे में बताने लगे और लोगों को इस्लाम में दाख़िल होने की दावत देने लगे। यह काम उन्होंने ऐसे जोश से किया कि मदीना में एक भी घर ऐसा न बचा जिसमें हमारे नबी और इस्लाम की बात न होती हो। इस तरह इस्लाम ख़ज़रज क़बीले में फैल गया और औस क़बीले के भी कुछ लोग मुसलमान हो गए।

ताइफ़ वालों को ईमान की दावत

मुशरिकों ने हमारे प्यारे नबी के बहुत-से मोजिज़े देखे, फिर भी अपनी ज़िद की वजह से ईमान नहीं लाए; ऊपर से अपने मुसलमान हुए बच्चों, भाइयों, रिश्तेदारों और दोस्तों को सताने और उन पर ज़ुल्म करने से बाज़ नहीं आते थे। उनके इस बढ़ते हुए ज़ुल्म और सितम से हमारे प्यारे नबी बहुत दुखी हुए। आपने सोचा कि मक्का के क़रीब ताइफ़ जाकर वहाँ के लोगों को इस्लाम की दावत दें। इसी लिए आप ज़ैद इब्ने हारिसा को साथ लेकर ताइफ़ तशरीफ़ ले गए।

ताइफ़ के सरदारों में से अम्र के बेटों – अब्दे यालील, हबीब और मसऊद – से आपकी मुलाक़ात हुई। आपने उन्हें इस्लाम के बारे में बताया और उनसे अल्लाह तआला पर ईमान लाने को कहा। वे ईमान लाना तो दूर, आपकी तौहीन करने लगे और ऊपर से बोले: “क्या अल्लाह तआला को नबी बनाकर भेजने के लिए तुम्हारे सिवा कोई नहीं मिला? क्या अल्लाह तआला तुम्हारे सिवा किसी और को नबी बनाकर भेजने से आजिज़ है? हमारे मुल्क से निकल जाओ और जहाँ चाहो चले जाओ!… तुम्हारी क़ौम ने तुम्हारी बातें नहीं मानीं, इसी लिए तुम यहाँ आए हो, है न? हम क़सम खाते हैं, हम भी तुमसे दूर रहेंगे। तुम्हारी कोई बात नहीं मानेंगे।”

रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) दुख के साथ उनके पास से लौट आए। आपने दस दिन या एक महीने तक सक़ीफ़ क़बीले को इस्लाम की दावत दी, लेकिन उनमें से एक भी ईमान न लाया; ऊपर से उन्होंने आपका मज़ाक़ उड़ाया, आपको सताया और आप पर आवाज़ें कसकर शोर मचाया। आपके गुज़रने के रास्ते के किनारों पर बच्चों और नौजवानों को क़तार में खड़ा करके आप पर पत्थर बरसवाए और आप पर हमला करवाया। ताइफ़ के नौजवानों के फेंके हुए पत्थरों के आगे हज़रत ज़ैद अपना जिस्म ढाल बनाकर हमारे नबी को किसी नुक़सान से बचाने की कोशिश कर रहे थे। हज़रत ज़ैद हमारे प्यारे नबी के चारों तरफ़ घूम रहे थे और तड़प-तड़पकर कोशिश कर रहे थे कि पत्थर आप तक न पहुँचें। आपके मुबारक जिस्म को कोई नुक़सान न पहुँचे, इसलिए वह अपने ऊपर लगने वाले पत्थरों की परवाह नहीं कर रहे थे। क्या वह इन्हीं दिनों में अपनी जान क़ुरबान करने के लिए मौक़े के इंतिज़ार में नहीं थे? और अब वे लोग सारे जहानों के सरदार पर पत्थर बरसा रहे थे, सताकर और ज़ुल्म करके आपको अपने वतन से निकालने की कोशिश कर रहे थे।

हज़रत ज़ैद रसूलुल्लाह को बचाने के लिए जितना दाएँ-बाएँ दौड़ते, पत्थर उतना ही एक के बाद एक उनके सिर, जिस्म और पाँवों पर लगते। इस वजह से हज़रत ज़ैद सिर से पाँव तक ख़ून में लथपथ हो गए। वह अपने प्यारे नबी को बचाने के लिए अपना सब कुछ लगा रहे थे और पत्थर फेंकने वाले ज़ालिमों पर पूरी आवाज़ से चिल्ला रहे थे: “रुक जाओ!… मत मारो! यह सारे जहानों के सरदार हैं! यह रसूलुल्लाह हैं! मेरे जिस्म के टुकड़े-टुकड़े कर दो, लेकिन हमारे नबी को कोई नुक़सान न पहुँचे!” जो पत्थर ज़ैद इब्ने हारिसा से बचकर रसूलुल्लाह तक पहुँच जाते, उन्होंने आपके मुबारक पाँवों को ख़ून में लथपथ कर दिया था।

हमारे प्यारे नबी दुखी, थके और ज़ख़्मी हालत में उत्बा और शैबा नाम के दो भाइयों के अंगूर के बाग़ के क़रीब पहुँचे। वहाँ रसूलुल्लाह ने, जिन पर तमाम मोमिन अपनी जानें क़ुरबान करना चाहते हैं, अपने मुबारक पाँवों से बहता हुआ ख़ून पोंछा।

आपने वुज़ू करके एक पेड़ के नीचे दो रकअत नमाज़ पढ़ी। फिर अपने मुबारक हाथ उठाकर अपने रब से गिड़गिड़ाकर मुनाजात करने लगे।

बाग़ के मालिक यह सब देख रहे थे। उन्होंने रसूलुल्लाह पर गुज़री मुसीबतें देखी थीं और आपकी बेकसी के गवाह बने थे। उनकी रहम की रग फड़क उठी। उन्होंने अद्दास नाम के अपने ग़ुलाम के हाथ अंगूर भेजे। हमारे प्यारे नबी ने अंगूर खाते हुए बिस्मिल्लाह (बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम) पढ़ी। अंगूर लाने वाले ग़ुलाम ईसाई थे। बिस्मिल्लाह सुनकर वह हैरान हुए और पूछा: “मैं बरसों से यहाँ हूँ, किसी से ऐसी बात नहीं सुनी। यह कैसा कलाम है?”

रसूलुल्लाह ने पूछा: “तुम कहाँ के हो?” अद्दास ने कहा: “मैं नैनवा का हूँ।” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “तो तुम यूनुस (अलैहिस्सलाम) के शहर के हो।” अद्दास ने कहा: “आप यूनुस को कहाँ से जानते हैं? उन्हें यहाँ कोई नहीं जानता।” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “वह मेरे भाई हैं। वह भी मेरी तरह नबी थे।”

अद्दास ने कहा: “इस ख़ूबसूरत चेहरे और इन मीठी बातों वाला झूठा नहीं हो सकता। मुझे यक़ीन हो गया कि आप अल्लाह के रसूल हैं।” वह मुसलमान हो गए और अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! बरसों मैंने इन ज़ालिमों, इन झूठों की ग़ुलामी की है। ये हर किसी का हक़ खाते हैं। हर किसी को धोखा देते हैं। इनमें कोई भी अच्छाई नहीं। दुनिया का माल जमा करने और अपनी ख़्वाहिशें पूरी करने के लिए हर कमीनगी पर उतर आते हैं। मुझे इनसे नफ़रत है। मैं चाहता हूँ कि आपके साथ चलूँ, आपकी ख़िदमत का शरफ़ पाऊँ, जाहिल और बेवक़ूफ़ लोग आपके साथ जो बेअदबियाँ करते हैं, उनका निशाना मैं बनूँ और आपके मुबारक जिस्म की हिफ़ाज़त के लिए अपनी जान क़ुरबान कर दूँ।”2

रसूलुल्लाह ने मुस्कुराकर फ़रमाया: “अभी अपने मालिकों के पास रहो! थोड़े ही अरसे बाद तुम हर जगह मेरा नाम सुनोगे। तब मेरे पास आ जाना।”

“रुक जाओ!… मत मारो! यह सारे जहानों के सरदार हैं! यह रसूलुल्लाह हैं! मेरे जिस्म के टुकड़े-टुकड़े कर दो, लेकिन हमारे नबी को कोई नुक़सान न पहुँचे!” ज़ैद इब्ने हारिसा (रज़ियल्लाहु अन्हु)

कुछ देर आराम फ़रमाकर आप मक्का की तरफ़ रवाना हुए। मक्का दो पड़ाव दूर रह गया तो आपने देखा कि एक बादल आप पर साया किए हुए है। ग़ौर से देखा तो समझ गए कि वह जिबराईल अलैहिस्सलाम हैं। यह वाक़िआ हमारे प्यारे नबी ने बाद में हमारी माँ हज़रत आइशा सिद्दीक़ा को सुनाया था।

“सहीह बुख़ारी” में और अहमद इब्ने हंबल की “मुसनद” में बताया गया है कि एक दिन हज़रत आइशा ने पूछा: “या रसूलल्लाह! क्या आप पर उहुद के दिन से भी ज़्यादा तकलीफ़ वाला कोई दिन गुज़रा है?” रसूलुल्लाह ने यह जवाब दिया: “अल्लाह की क़सम, मैंने तुम्हारी क़ौम से ऐसी तकलीफ़ उठाई कि उहुद के ग़ज़वे के काफ़िरों से भी वैसी नहीं उठाई। जब मैंने अपने आपको इब्ने अब्दे यालील इब्ने अब्दे कुलाल के सामने पेश किया (यानी उसे अपनी नुबुव्वत बताकर दीन की दावत दी), तो उसने क़बूल नहीं किया। मैं उनके पास से ऐसे गहरे दुख के साथ लौटा कि क़र्नुस सआलिब नाम की जगह पहुँचने तक होश में न आ सका। वहाँ मैंने सिर उठाया। देखा कि एक बादल मुझ पर साया डाले हुए है। देखा तो बादल के अंदर जिबराईल (अलैहिस्सलाम) खड़े हैं। उन्होंने मुझे पुकारकर कहा: ‘ऐ मुहम्मद! हक़ तआला ने आपके बारे में आपकी क़ौम की बातें सुन लीं। यह भी जान लिया कि वे आपकी हिफ़ाज़त नहीं करना चाहते। उसने पहाड़ों पर मुक़र्रर इस फ़रिश्ते को आपके पास भेजा है, आप जो चाहें इसे हुक्म दें।’ उस फ़रिश्ते ने भी मुझे पुकारा और सलाम करने के बाद कहा: ’ऐ मुहम्मद! जैसा कि जिबराईल ने कहा, हक़ तआला ने मुझ पहाड़ों के फ़रिश्ते को आपके पास भेजा है, आप जो चाहें मुझे हुक्म दें। मैं आपके हुक्म के लिए हाज़िर हूँ। अगर आप चाहते हैं कि ये दो सीधे खड़े पहाड़ (क़ुऐक़िआन पहाड़ और अबू क़ुबैस पहाड़) मक्का वालों के ऊपर इस तरह आपस में मिल जाएँ कि उन्हें ढाँप लें (और मुशरिकों को पूरी तरह कुचल दें), तो हुक्म दीजिए, मैं इन्हें मिला दूँ।’ मैं राज़ी न हुआ और मैंने कहा: ’(नहीं! मैं सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजा गया हूँ।) मैं दुआ करता हूँ कि अल्लाह तआला इन मुशरिकों की नस्ल से ऐसी पीढ़ी पैदा करे जो सिर्फ़ अल्लाह पाक की इबादत करे और अल्लाह तआला के साथ किसी चीज़ को शरीक न ठहराए।’”

नबी-ए-करीम ताइफ़ से मक्का लौटते हुए नख़्ला नाम की जगह पर कुछ देर ठहरे। इसी बीच आप नमाज़ के लिए खड़े हुए। नसीबीन के जिन्नात का एक गिरोह वहाँ से गुज़र रहा था; हमारे प्यारे नबी जो क़ुरआन-ए-करीम की आयतें पढ़ रहे थे, उन्हें सुनकर वे रुक गए और सुनने लगे। फिर नबी-ए-करीम से बात करके मुसलमान हो गए। नबी-ए-करीम ने उनसे फ़रमाया: “अपनी क़ौम के पास जाओ तो मेरी ईमान की दावत उन्हें भी पहुँचाओ। उन्हें भी ईमान की दावत दो।”

उन जिन्नों ने अपनी क़ौम के पास जाकर यह बात बताई तो सुनने वाले सारे जिन्नात ईमान ले आए।3 इसकी ख़बर क़ुरआन-ए-करीम में सूरह जिन्न में और “बुख़ारी शरीफ़” और “मुस्लिम” नाम की मशहूर हदीस शरीफ़ की किताबों में दी गई है।

आप मक्का के क़रीब पहुँचे तो मोमिनों ने रसूलुल्लाह को ख़बर भेजी: “क़ुरैश को पता चल गया है कि ताइफ़ के कमीने लोगों ने आपके साथ कैसा बुरा सुलूक किया। अगर आप अभी तशरीफ़ लाएँगे तो वे अपना ज़ुल्म बढ़ा सकते हैं।” नबी-ए-करीम हिरा पहुँचे तो एक आदमी को सुहैल इब्ने अम्र के पास भेजकर दरख़्वास्त की कि वह आपको अपनी पनाह में ले ले। उस बदनसीब ने क़बूल न किया तो आपने मुतइम इब्ने अदी को ख़बर भेजी। उसने यह दरख़्वास्त क़बूल कर ली। हबीब-ए-अकरम और नबी-ए-मुहतरम मुतइम इब्ने अदी की पनाह में मक्का तशरीफ़ लाए। मुतइम ने यह बात क़ुरैश को बता दी। रसूलुल्लाह ने बैत-ए-शरीफ़ का तवाफ़ किया और हजर-ए-असवद (काले पत्थर) को चूमा। कुछ दिन बाद आपने मुतइम से फ़रमाया: “अब मैं और ज़्यादा तुम्हारी पनाह में नहीं रहूँगा।” मुतइम ने यह भी क़बूल कर लिया। अल्लाह पाक ने अपने हबीब को अपनी हिफ़ाज़त में रखा।

“ला इलाह इल्लल्लाह” कहकर नजात पाओ

रसूल अलैहिस्सलाम लोगों को हक़ की राह की दावत देते रहे। इसके जवाब में मुशरिक फिर हद से गुज़र गए और पहले से भी ज़्यादा सितम और ज़ुल्म करने लगे। इस पर अल्लाह पाक ने नबी-ए-करीम को हुक्म दिया कि काबा की ज़ियारत के ज़माने में ज़ियारत को आने वाले अरब क़बीलों से मिलें और उन्हें इस्लाम की दावत दें। इस हुक्म के बाद हमारे प्यारे नबी मक्का के आस-पास लगने वाले ज़ुल मजाज़, उकाज़ और मजन्ना के मेलों में जाने लगे।

आप अक्सर वहाँ जाकर क़बीलों को अल्लाह तआला की वहदानियत और उसकी इबादत की दावत देते और उनसे कहते कि आपके नबी होने को क़बूल करें। आप बताते कि अगर वे क़बूल कर लें तो अल्लाह पाक उन्हें जन्नत देगा। नबी-ए-करीम बड़े दर्द से ये दावतें देते, मगर अफ़सोस, उनमें से कोई कान न धरता; कुछ बदतमीज़ी से पेश आते और तौहीन करते, कुछ मुँह बनाकर बुरी बातें कहते। क़ुरैश के मुशरिक भी आपके पीछे-पीछे जाकर उन क़बीलों को बहकाते थे जिनके पास आप जाते।

इमाम अहमद, बैहक़ी, तबरानी और इब्ने इसहाक़ के बयान के मुताबिक़ रबीआ इब्ने अब्बाद ने यह रिवायत की: “मैं जवान था। अपने वालिद के साथ मिना गया था। रसूल अलैहिस्सलाम अरब क़बीलों के पड़ाव पर जाते और फ़रमाते: ‘ऐ फ़लाँ के बेटो! मैं अल्लाह तआला का वह रसूल हूँ जो तुम्हें यह हुक्म देता है कि जिन बुतों को तुम पूजते हो, उन्हें छोड़कर अल्लाह तआला के साथ किसी को शरीक ठहराए बिना उसकी इबादत करो, मुझ पर ईमान लाकर मेरी तस्दीक़ करो, और जब तक मैं हक़ तआला की तरफ़ से सौंपी गई अपनी ज़िम्मेदारी को खोलकर बयान न कर दूँ और पूरी न कर लूँ, मेरी हिफ़ाज़त करो!…’

आपके पीछे-पीछे भेंगी आँखों और गुँथे हुए बालों वाला एक आदमी चलता और कहता: ‘ऐ फ़लाँ के बेटो! यह आदमी तुम्हें हमारे बुतों लात और उज़्ज़ा की पूजा से रोकता है और अपने गढ़े हुए एक दीन की तरफ़ बुलाता है!… होशियार रहो! इसकी बात न सुनो और इसका कहना न मानो!…’ मैंने अपने वालिद से पूछा: ‘इस हस्ती के पीछे चलने वाला कौन है?’ उन्होंने कहा: ‘उनका चचा अबू लहब।’”

तबरानी ने तारिक़ इब्ने अब्दुल्लाह से यह रिवायत की: “मैंने रसूल अलैहिस्सलाम को ज़ुल मजाज़ के मेले में देखा था। लोग सुन सकें, इसलिए आप ऊँची आवाज़ से पुकार रहे थे: ’ऐ लोगो! “ला इलाह इल्लल्लाह (अल्लाह तआला के सिवा कोई इलाह नहीं)” कहो और नजात पाओ!’ आपके पीछे-पीछे एक आदमी चलता, जो पत्थर हाथ लगता, आपके पाँवों पर फेंकता और कहता: ‘ऐ लोगो! यक़ीन न करो!… इससे बचो, यह झूठा है!…’ पत्थरों की चोटों ने आपके मुबारक पाँव लहूलुहान कर दिए थे, फिर भी आप बिना हारे, बिना थके दावत देते जा रहे थे। लोगों ने पूछा: ‘यह जवान कौन है?’ किसी ने जवाब दिया: ‘बनू अब्दुल मुत्तलिब का एक जवान है।’ जब उन्होंने पूछा: ‘और पत्थर फेंकने वाला कौन है?’ तो उसने कहा: ‘उनका चचा अबू लहब।’”

इमाम बुख़ारी ने “तारीख़ुल कबीर” में और तबरानी ने “मुअजमुल कबीर” में यह बयान किया है: मुदरिक इब्ने मुनीब ने अपने वालिद से, और उन्होंने अपने दादा से रिवायत की कि उनके दादा ने कहा: “मैं अपने वालिद के साथ मिना आकर ठहरा था। हमें लोगों का एक मजमा मिला। एक शख़्स उनसे फ़रमा रहे थे: ‘ऐ लोगो! ला इलाह इल्लल्लाह कहो और नजात पाओ!’ उनके आस-पास के लोगों में से कुछ उनके उस ख़ूबसूरत चेहरे पर थूकते, कुछ उनके सिर पर मिट्टी डालते, कुछ गालियाँ देकर तरह-तरह से तौहीन करते थे। यह हालत दोपहर तक चलती रही। उसी वक़्त एक बच्ची हाथ में पानी का बर्तन लिए वहाँ आई। उसने उन्हें उस हालत में देखा तो रोने लगी। उन्होंने पानी पीने के बाद बच्ची की तरफ़ मुड़कर फ़रमाया: ‘मेरी बेटी! अपने बाप के बारे में यह डर न रखो कि वह जाल में फँसाकर क़त्ल कर दिया जाएगा, ज़लील किया जाएगा!’ फिर हमने वहाँ मौजूद लोगों से पूछा: ‘यह कौन हैं और यह बच्ची कौन है?’ उन्होंने कहा: ‘यह बनू अब्दुल मुत्तलिब में से मुहम्मद हैं, और उनके पास उनकी बेटी ज़ैनब हैं।’”

“वह (यूनुस अलैहिस्सलाम) मेरे भाई हैं। वह भी मेरी तरह नबी थे” हदीस शरीफ़

सईद इब्ने यह्या इब्ने सईद उमवी ने “मग़ाज़ी” में अपने वालिद से रिवायत की। उन्होंने अबू नईम से और अब्दुर रहमान आमिरी से, और अब्दुर रहमान आमिरी ने बहुत-से लोगों से रिवायत की। उन्होंने बताया: एक दिन हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) उकाज़ के मेले में तशरीफ़ ले गए। आप बनू आमिर क़बीले के पास गए और उनसे पूछा: “ऐ बनू आमिर! तुम्हारे यहाँ पनाह लेने वालों की हिफ़ाज़त कैसी होती है?” उन्होंने कहा: “हम पर कोई ताना नहीं कस सकता, हमारी इजाज़त के बिना हमारी आग से कोई गर्मी नहीं ले सकता!…” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “मैं अल्लाह तआला का रसूल हूँ। अगर मैं तुम्हारे पास आऊँ, तो जब तक अपने रब की दी हुई नुबुव्वत की ज़िम्मेदारी लोगों तक न पहुँचा दूँ, क्या तुम मेरी हिफ़ाज़त करोगे?” उन्होंने पूछा: “तुम क़ुरैश के किन लोगों में से हो?” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “बनू अब्दुल मुत्तलिब में से।” तो उन्होंने कहा: “जब तुम बनू अब्दुल मुत्तलिब में से हो, तो वे तुम्हारी हिफ़ाज़त क्यों नहीं करते?” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “मुझे झुठलाने वालों में सबसे आगे वही रहे।” बनू आमिर के गिरोह ने कहा: “ऐ मुहम्मद! हम न तुम्हें ठुकराते हैं, न तुम्हारी लाई हुई बातों पर ईमान लाते हैं। लेकिन जब तक तुम अपनी नुबुव्वत की ज़िम्मेदारी लोगों तक न पहुँचा दो, हम तुम्हारी हिफ़ाज़त करेंगे।”

इस पर नबी-ए-करीम उनके पास बैठ गए। उसी वक़्त बनू आमिर के सरदारों में से बैहरा इब्ने फ़ारिस मेले में अपनी ख़रीद-फ़रोख़्त पूरी करके उनके पास आया और नबी-ए-करीम की तरफ़ इशारा करके पूछा: “यह कौन है?” उन्होंने कहा: “यह मुहम्मद इब्ने अब्दुल्लाह हैं।” बैहरा ने कहा: “तुम्हारा इससे क्या काम कि इसे अपने पास बिठा लिया?” तो उन्होंने कहा: “इन्होंने हमारी पनाह ली है; कहते हैं कि वह अल्लाह के रसूल हैं और चाहते हैं कि जब तक वह अपनी नुबुव्वत की ज़िम्मेदारी लोगों तक न पहुँचा दें, हम उनकी हिफ़ाज़त करें।” इस पर बैहरा ने नबी-ए-करीम की तरफ़ मुड़कर कहा: “तुम्हारी हिफ़ाज़त का ज़िम्मा उठाने का मतलब है तमाम अरबों के तीरों के आगे अपना सीना निशाना बनाकर रख देना।” और अपनी क़ौम से कहा: “कोई क़बीला अपने वतन ऐसी बुरी चीज़ लेकर नहीं लौटा होगा, जैसी तुम ले जा रहे हो। तो तुम तमाम अरबों से लड़ोगे, उनके तीरों के आगे अपने जिस्म निशाना बनाकर रखोगे, है न!… अगर इसकी क़ौम को इसमें कोई भलाई दिखती तो सबसे पहले वे ख़ुद इसकी हिफ़ाज़त करते। जिसे उसकी क़ौम ने झुठलाकर अपने पास से दूर कर दिया, तुम उसे पनाह देने और उसकी मदद करने चले हो!… तुम बहुत ग़लत सोच रहे हो!…”

फिर इस बदबख़्त ने हमारे प्यारे नबी की तरफ़ मुड़कर कहा: “अभी हमारे बीच से निकलकर अपनी क़ौम के पास लौट जाओ!… क़सम खाता हूँ, अगर तुम मेरी क़ौम के बीच न होते तो मैं अभी तुम्हारी गर्दन उड़ा देता!…” इन बातों के बाद सारे जहानों के सरदार बड़े ग़म के साथ अपने ऊँट पर सवार हुए। उस गुस्ताख़ बैहरा ने रसूलुल्लाह को ऊँट से गिरा दिया। यह वाक़िआ देखकर सहाबा-ए-किराम में से ज़ुबाआ बिन्ते आमिर नाम की एक ख़ातून चीख़ उठीं और अपने रिश्तेदारों को पुकारकर कहा: “अल्लाह तआला के हबीब के साथ किए गए इस सुलूक को तुम कैसे गवारा कर रहे हो? क्या मेरी ख़ातिर रसूलुल्लाह को इनके हाथ से छुड़ाने वाला कोई नहीं?” उनके चचाज़ाद भाइयों में से तीन लोग फ़ौरन बदबख़्त बैहरा पर टूट पड़े। बैहरा की क़ौम के दो आदमियों ने उसकी मदद करनी चाही, लेकिन उन तीनों ने बैहरा और उसके मददगारों की ख़ूब पिटाई की। हमारे प्यारे नबी यह हालत देख रहे थे; आपने अपने लिए लड़ने वाले उन तीनों के लिए यह दुआ फ़रमाई: “या रब! इन लोगों को अपनी बरकत अता फ़रमा!” और बैहरा और उसके मददगारों के लिए यह दुआ फ़रमाई: “या रब! इन्हें अपनी रहमत से दूर कर दे!”

जिनके लिए आपने भलाई की दुआ फ़रमाई थी, वे मुसलमान होने के शरफ़ से नवाज़े गए, और बाक़ी काफ़िर होकर मरे। बनू आमिर क़बीले के लोग अपने वतन लौटे तो उन्होंने अपने क़बीले के एक बूढ़े को, जिसने आसमानी किताबें पढ़ी थीं, मक्का में अपने साथ गुज़रा हुआ सब कुछ सुनाया। उस आदमी ने नबी-ए-करीम का नाम सुना तो अपने क़बीले वालों को मलामत करते हुए कहा: “ऐ बनू आमिर! तुमने यह क्या किया? बनू इस्माईल में से आज तक किसी ने नुबुव्वत का झूठा दावा नहीं किया। यक़ीनन उनकी बात सच और हक़ थी। हाथ से निकल गए इस मौक़े की भरपाई अब बहुत मुश्किल है!…”

हो रहा था जिबराईल से जब कलाम,
रफ़रफ़ आया सामने, किया सलाम।
उस घड़ी ले लिया उसने जहान के शाह को,
फ़ौरन ले गया वह सिदरा की राह को।

“ऐ लोगो! ला इलाह इल्लल्लाह कहो और नजात पाओ!” हदीस शरीफ़

इसरा और मेराज