मेरे प्यारे नबी

ग़म का साल

औलाद का ग़म

नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के बड़े बेटे क़ासिम का सत्रह महीने की उम्र में इंतिक़ाल हो गया था। इस दर्दनाक वाक़िए के बरसों बाद दूसरे बेटे अब्दुल्लाह का भी इंतिक़ाल हो गया। रसूलुल्लाह ने, जबकि आपकी मुबारक आँखों से आँसू बह रहे थे, पहाड़ की तरफ़ मुड़कर फ़रमाया: “ऐ पहाड़! जो मुझ पर गुज़री है, अगर तुझ पर गुज़रती तो तू सह न पाता, ढह जाता!” और इस तरह अपने ग़म का इज़हार फ़रमाया। हमारी माँ हज़रत ख़दीजा ने पूछा: “या रसूलल्लाह! वे अब कहाँ हैं?” तो आपने फ़रमाया: “वे जन्नत में हैं।”

कायनात के सुल्तान हमारे प्यारे नबी के दोनों बेटों के इंतिक़ाल पर मुशरिक बहुत ख़ुश हुए। अबू जहल जैसे काफ़िरों ने इसे मौक़ा जानकर चारों तरफ़ यह शोर मचाया: “अब मुहम्मद अबतर है, उसकी नस्ल कट गई है। उसकी नस्ल आगे चलाने वाला कोई बेटा नहीं बचा। वह ख़ुद भी मर जाएगा तो उसका नाम-निशान भुला दिया जाएगा।”

इस पर अल्लाह तआला ने सूरह कौसर उतारकर अपने रसूल को तसल्ली दी। उसका मफ़हूम यह है: “(मेरे हबीब!) हक़ीक़त यह है कि हमने तुम्हें कौसर अता किया (हौज़-ए-कौसर, बहुत ज़्यादा भलाई अता की)। तो अपने रब के लिए नमाज़ पढ़ो और क़ुरबानी करो। सच यह है कि बे-ख़ैर और नस्ल-कटा वही है जो तुम पर (नस्ल-कटा कहकर) ज़बान दराज़ी करता है। (तुम्हें अबतर कहने वाला ख़ुद बे-औलाद, बे-इज़्ज़त और बेनाम है। रही तुम्हारी बात, ऐ मेरे हबीब, तुम्हारी पाक नस्ल, तुम्हारी शान और इज़्ज़त क़यामत के दिन तक बाक़ी रहेगी। आख़िरत में भी तुम्हारे लिए ऐसी बहुत-सी बड़ी इज़्ज़तें तैयार हैं जो अक़्ल में भी नहीं आ सकतीं।)”1

अबू तालिब का इंतिक़ाल

रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के बेटों के इंतिक़ाल के बाद के दिनों में अबू तालिब बीमार हो गए और दिन-ब-दिन उनकी बीमारी बढ़ती गई। यह सुनकर क़ुरैश के मुशरिकों ने सोचा: “अबू तालिब ने ज़िंदगी भर मुहम्मद की हिफ़ाज़त के लिए बहुत कोशिश की। अब उसके कूच का वक़्त क़रीब आ गया है। आख़िरी वक़्त में ही सही, उसकी ख़ैरियत पूछने चलें, क्योंकि हमज़ा जैसा बेमिसाल अरब बहादुर भी और हैबत, ताक़त और निडरता में सूरज की तरह मशहूर उमर भी मुसलमान हो गए हैं। हर दिन अरब क़बीलों से लोग आकर टोलियों की टोलियाँ उसकी पैरवी कर रहे हैं। इस तरह मुसलमान दिन-ब-दिन बढ़ रहे हैं और उनकी आवाज़ दुनिया में गूँज रही है। इस हालत में या तो हमें उनकी पैरवी करनी होगी या जंग और लड़ाई के लिए तैयार रहना होगा। चलो, अबू तालिब के पास जाकर हालत बताएँ कि वह हमारे बीच सुलह करा दे। हम उसके दीन पर हमला न करें, वह भी हमारे दीन पर हमला न करे।” इसी सोच के साथ वे अबू तालिब के पास आए। उक़बा, शैबा, अबू जहल, उमय्या इब्ने ख़लफ़ जैसे मशहूर लोग अबू तालिब के बिस्तर के पास बिछे गद्दों पर बैठ गए। उन्होंने कहा: “हम तुम्हारी बड़ाई पर यक़ीन रखते हैं, तुम्हारी बरतरी मानते हैं। इसी वजह से हमने कभी तुम्हारी मुख़ालफ़त नहीं की। हमें डर है कि तुम्हारे मरने के बाद मुहम्मद हमसे उलझेगा और हमारे बीच दुश्मनी चलती रहेगी। हमारी सुलह करा दो कि हम एक-दूसरे के दीन पर हमला न करें।”

“ऐ पहाड़! जो मुझ पर गुज़री है, अगर तुझ पर गुज़रती तो तू सह न पाता, ढह जाता!” हदीस शरीफ़

हमारी माँ हज़रत ख़दीजा का मक़बरा / जन्नतुल मुअल्ला

इस्लाम के बहुत-से बुज़ुर्गों की क़ब्रों की तरह हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) की पहली ज़ौजा हमारी माँ हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का मक़बरा भी ढहाकर मिटा दिया गया है।

अबू तालिब ने नबी-ए-करीम को बुलवाकर कहा: “क़ुरैश के तमाम सरदार तुमसे दरख़्वास्त करते हैं कि तुम उनके दीन में दख़ल न दो। अगर तुम यह मान लो तो वे तुम्हारे हुक्म पर चलेंगे और तुम्हारे मददगार बनेंगे।” सारे जहानों के सरदार ने फ़रमाया: “चचाजान! मैं उन्हें सिर्फ़ एक कलिमे की दावत देना चाहता हूँ। उस कलिमे से तमाम अरब उनके आगे सिर झुका देंगे और जो अरब नहीं हैं, वे भी उन्हें जिज़्या देंगे।” क़ुरैश के सरदारों से भी फ़रमाया: “हाँ! अगर तुम मुझसे एक कलिमा कह दो तो उससे तमाम अरबों पर हुकूमत करोगे और ग़ैर-अरब भी तुम्हारे आगे सिर झुकाएँगे।” अबू जहल ने कहा: “ठीक है। हम उसे दस गुना कहेंगे। आख़िर वह कलिमा है क्या?” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “यह कि तुम ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ कहो और अल्लाह तआला के सिवा जिन बुतों को पूजते हो, उन्हें उठाकर फेंक दो।” यह सुनते ही मुशरिक बोल उठे: “इसके सिवा हमसे कुछ और माँगो!…” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “अगर तुम सूरज लाकर मेरे हाथों में रख दो, तब भी मैं तुमसे इसके सिवा कुछ नहीं माँगूँगा।”

मुशरिकों ने कहा: “ऐ अबुल क़ासिम! तुम बड़ी अजीब पेशकश कर रहे हो। हम तुम्हारा ख़याल रखना चाहते हैं, और तुम हमारा दिल ख़ुश नहीं करते!” यह कहकर वे उठकर चले गए। उनके जाने के बाद अबू तालिब ने नबी-ए-करीम से कहा: “तुमने क़ुरैश से जो चीज़ माँगी, वह बिल्कुल ठीक थी। तुमने सच कहा।” चचा की इस बात से रसूलुल्लाह को उम्मीद बँधी और यह समझकर कि अबू तालिब ईमान ला सकते हैं, आपने फ़रमाया: “चचाजान! एक बार ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ कह दीजिए!… ताकि क़यामत के दिन मैं आपकी शफ़ाअत करूँ।” अबू तालिब ने कहा: “मुझे डर है कि लोग यह कहकर ऐब लगाएँगे कि ‘मौत से डर गया, इसीलिए मुसलमान हो गया।’ वरना मैं तुम्हारा दिल ख़ुश कर देता।” यह कहकर उन्होंने बताया कि यह बात उनके नफ़्स पर भारी है। उनकी बीमारी दिन-ब-दिन बढ़ती गई और उनका इंतिक़ाल हो गया।2

हमारी माँ हज़रत ख़दीजा का इंतिक़ाल

बेसत के दसवें साल, अबू तालिब के इंतिक़ाल के तीन दिन बाद, हमारी मुबारक माँ हज़रत ख़दीजा का भी इंतिक़ाल हो गया। वह रसूलुल्लाह के दुख-दर्द की शरीक और पच्चीस बरस की रफ़ीक़-ए-हयात थीं। उनका इंतिक़ाल दुखों और तकलीफ़ों में गुज़रे तीन साल के मुहासरे के बाद, हिजरत से तीन साल पहले, रमज़ान महीने के शुरू में, 65 साल की उम्र में हुआ।3 फ़ख़्र-ए-कायनात (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हज़रत ख़दीजा को अपने मुबारक हाथों से दफ़न फ़रमाया। उनकी जुदाई से आप बहुत ग़मगीन हुए।

एक ही साल में हज़रत ख़दीजा और आपके चचा अबू तालिब के एक के बाद एक इंतिक़ाल ने नबी-ए-करीम को ग़म में डुबो दिया था। इसी वजह से इस साल को “सनतुल हुज़्न”, यानी ग़म का साल कहा गया।

हज़रत ख़दीजा के इंतिक़ाल ने हमारे प्यारे नबी को हिला दिया था और हद से ज़्यादा ग़मगीन कर दिया था, क्योंकि सबसे पहले ईमान लाने वाली और रसूलुल्लाह की तस्दीक़ करने वाली वही थीं। इसके अलावा वह आपका सबसे बड़ा सहारा थीं और आपको तसल्ली देने वाली थीं। जब हर कोई दुश्मन था, तब उन्होंने अपना पूरा दिल खोल दिया था और उनका दिल हमारे नबी की मुहब्बत से भरा हुआ था। अपना सारा माल और दौलत, जो कुछ उनके पास था, इस्लाम की राह में ख़र्च कर दिया था; हमारे प्यारे नबी की ख़िदमत के लिए रात-दिन एक कर दिया था। उन्होंने रसूलुल्लाह को कभी दुखी नहीं किया, कभी आपका दिल नहीं तोड़ा। नबी-ए-करीम इसे वक़्तन-फ़वक़्तन बयान फ़रमाते और इस तरह अपनी मुबारक ज़ौजा की फ़ज़ीलतों को याद फ़रमाते थे।

“चचाजान! एक बार ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ कह दीजिए!… ताकि क़यामत के दिन मैं आपकी शफ़ाअत करूँ” हदीस शरीफ़

एक दिन, जब हमारे नबी घर से बाहर थे, हज़रत ख़दीजा आपको ढूँढने निकलीं। जिबराईल अलैहिस्सलाम इंसान की शक्ल में हज़रत ख़दीजा को दिखाई दिए। हज़रत ख़दीजा ने उनसे नबी-ए-करीम के बारे में पूछना चाहा, लेकिन यह सोचकर कि शायद वह दुश्मनों में से हों, लौट आईं। हमारे प्यारे नबी को घर में देखा तो सारा वाक़िआ सुनाया। फ़ख़्र-ए-कायनात ने फ़रमाया: “क्या तुम जानती हो कि जिन्हें तुमने देखा और जिनसे मेरे बारे में पूछना चाहा, वह कौन थे? वह जिबराईल (अलैहिस्सलाम) थे। उन्होंने कहा कि मैं तुम्हें उनका सलाम पहुँचा दूँ। और यह भी कहा कि तुम्हें बता दूँ कि जन्नत में तुम्हारे लिए मोतियों से बनी एक इमारत तैयार की गई है। ज़ाहिर है, वहाँ यहाँ जैसी ग़म, परेशानी, मशक़्क़त और तकलीफ़ वाली कोई चीज़ नहीं होगी।”

एक का हाथ हवा में रह गया, एक अंधा हो गया

हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपने सहाबा के साथ, जो इंसानों में सबसे ख़ुशनसीब थे, ऐसी सोहबतें फ़रमाते जिनकी कोई मिसाल नहीं, और उनके दिलों को रौशन फ़रमाते थे। उतरने वाली आयात-ए-करीमा की वज़ाहत फ़रमाते, कोई बात बिना बताए, बिना समझाए नहीं छोड़ते थे। साथ ही, मुशरिक भी ईमान ले आएँ, इसके लिए उनके इकट्ठा होने की जगहों पर तशरीफ़ ले जाते और बिना थके, बिना हारे ईमान की दावत देते थे। इस पर अबू जहल और वलीद इब्ने मुग़ीरा बहुत चिढ़ते और कहते: “इसी तरह चलता रहा तो मुहम्मद हर किसी को अपने दीन में ले आएगा, हमारे बुतों को पूजने वाला कोई नहीं छोड़ेगा।” एक दिन उन्होंने फ़ैसला कर लिया कि इस काम को ख़त्म करने का एक ही इलाज सारे जहानों के सरदार हमारे प्यारे नबी को क़त्ल करना है। अबू जहल वलीद इब्ने मुग़ीरा और बनू मख़ज़ूम के कुछ नौजवानों को साथ लेकर बैतुल्लाह आया। उस वक़्त हमारे प्यारे नबी नमाज़ पढ़ रहे थे। अबू जहल हाथ में एक पत्थर लेकर फ़ौरन आगे लपका। जिस पल उसने हबीब-ए-अकरम और नबी-ए-मुहतरम को पत्थर मारने के लिए हाथ उठाया, उसके हाथ हवा में बेहरकत होकर रह गए। वह कुछ न कर सका और हैरान रह गया। उसी हालत में जहाँ से आया था, वहीं लौट गया। मुशरिकों के पास पहुँचा तो उसका हाथ पहली हालत पर लौट आया और पत्थर ज़मीन पर गिर पड़ा। वही पत्थर बनू मख़ज़ूम में से एक ने झपटकर उठा लिया और यह कहते हुए नबी-ए-करीम की तरफ़ बढ़ा: “देख लेना! उसे मैं क़त्ल करूँगा!…” क़रीब पहुँचा तो वह अचानक अंधा हो गया, उसे आस-पास कुछ दिखाई न देता था। इस पर बनू मख़ज़ूम सब मिलकर हमारे प्यारे नबी की तरफ़ बढ़े। जिस पल वे नबी-ए-करीम के बिल्कुल क़रीब पहुँचे, आप उन्हें दिखाई देना बंद हो गए। लेकिन वे आपकी मुबारक आवाज़ सुन रहे थे। आवाज़ की तरफ़ बढ़ते तो आवाज़ पीछे से आती, पीछे मुड़ते तो फिर पहली जगह से आने लगती। यही हालत उन्होंने कई बार देखी। आख़िर हैरान होकर, रसूलुल्लाह का कुछ भी बिगाड़े बिना, वह जगह छोड़कर चले गए।

हज़रत आइशा और हज़रत सौदा से मंगनी

हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) के इंतिक़ाल के बाद रसूलुल्लाह का घर सँभालने वाला कोई न रहा। ख़ौला बिन्ते हकीम ख़ातून यह हालत देखकर सरवर-ए-आलम की ख़िदमत में हाज़िर हुईं। उन्होंने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)! आपको एक मुनासिब हमदम और आपकी ख़िदमत के लायक़ एक बीवी की ज़रूरत है। अगर आप चाहें तो मैं आपके लिए किसी से रिश्ते की बात करूँ।” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “ऐ ख़ौला, इस ख़िदमत के लायक़ ख़ातून कहाँ है?” ख़ौला ने कहा: “अगर कुँवारी चाहें तो आपके दोस्त अबू बकर की बेटी आइशा हैं। बेवा चाहें तो सौदा बिन्ते ज़मआ मुनासिब रहेंगी।” रसूल अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: “दोनों के लिए मेरा पैग़ाम दे दो।” रसूलुल्लाह की पहले हज़रत आइशा से, फिर सौदा से मंगनी हुई। हज़रत सौदा को आप मक्का में ही अपने घर ले आए। हज़रत आइशा से आपकी शादी हिजरत के दूसरे साल शव्वाल महीने में मदीना में हुई।

अक़बा की मुलाक़ात

हमारे प्यारे नबी हर साल काबा की ज़ियारत को आने वाले क़बीलों को दीन की दावत देते थे। आप कोशिश करते कि वे जहन्नम की आग से बचकर हमेशा की सआदत पाएँ और हर तरह की तौहीन की परवाह किए बिना नुबुव्वत का फ़र्ज़ अदा करते रहते थे। आप क़बीलों के पड़ाव की जगहों पर खड़े होते और आने वालों से फ़रमाते: “कौन है जो मुझे पनाह दे और मेरी मदद करे, यहाँ तक कि मैं अल्लाह तआला की सौंपी हुई नुबुव्वत की ज़िम्मेदारी पूरी कर लूँ? (इस तरह) उसे जन्नत दी जाए।” लेकिन न कोई पनाह देने वाला मिलता था, न मदद करने वाला।

बेसत के दसवें साल का ज़िलहिज्जा महीना था। मेले में नबी-ए-करीम की मुलाक़ात काबा की ज़ियारत के लिए आए हुए मदीना के कुछ लोगों से हुई। आपने उनसे पूछा: “तुम लोग कौन हो?” तो उन्होंने बताया कि वे मदीना के हैं और ख़ज़रज क़बीले से हैं। हमारे नबी के दादा अब्दुल मुत्तलिब की वालिदा सलमा ख़ातून भी ख़ज़रज क़बीले की बनू नज्जार शाख़ से थीं। हमारे नबी ने ख़ज़रज के इन छह लोगों के साथ अक़बा में कुछ देर बैठकर उन्हें सूरह इब्राहीम की 35वीं से 52वीं तक की आयात-ए-करीमा पढ़कर सुनाईं और इस्लाम के बारे में बताया। उन्हें इस दीन में दाख़िल होने की दावत दी।

मदीना में पुराने ज़माने से औस और ख़ज़रज क़बीले यहूदियों के दुश्मन थे; जब भी मौक़ा मिलता, वे एक-दूसरे पर हमला करते थे। जब कभी उनके बीच कोई झगड़ा होता, यहूदी कहते: “जल्द ही एक नबी आने वाले हैं। ज़्यादा देर नहीं, आज-कल में ज़ाहिर हो जाएँगे। हम उनकी पैरवी करके ताक़तवर बन जाएँगे। फिर तुमसे भी निपट लेंगे।” औस और ख़ज़रज वाले भी यह मानते थे कि अगर वे यहूदियों से पहले मुसलमान होकर इस्लाम से शरफ़ पा लें तो उन पर ग़ालिब आ जाएँगे और उन्हें मदीना से निकाल देंगे।

इन ख़ुशनसीब लोगों ने अपने क़बीले के बड़ों से और मदीना में रहने वाले यहूदियों से एक नबी के जल्द आने की बात सुन रखी थी। अब उन्होंने रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) में नुबुव्वत की निशानियाँ देखीं। जब आपने उन्हें दीन की दावत दी तो उन्होंने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। फिर आपस में कहने लगे: “यहूदी जिस नबी की ख़बर देते थे, वह यही हैं!”

इसी लिए वे फ़ौरन रसूलुल्लाह की ख़िदमत में कलिमा-ए-शहादत पढ़कर मुसलमान हो गए। उन्होंने नबी-ए-करीम से अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! हम अपनी क़ौम को यहूदियों से लड़ती हुई हालत में छोड़कर आए थे। उम्मीद है कि अल्लाह तआला आपकी बरकत से उन्हें भी ईमान का शरफ़ बख़्श देगा। हम लौटते ही उन्हें और अपनी क़ौम को आपकी नुबुव्वत क़बूल करने की दावत देंगे। इस दीन की जो बातें हमने क़बूल की हैं, वे हम उन्हें भी बताएँगे। अगर अल्लाह तआला उन्हें इस दीन पर इकट्ठा करके एक कर दे, तो आपसे ज़्यादा इज़्ज़त और शरफ़ वाला कोई न होगा।”

ये छह लोग सचमुच ईमान ला चुके थे और अल्लाह तआला ने हमारे नबी तक जो कुछ पहुँचाया था, उसे क़बूल करके उसकी तस्दीक़ कर चुके थे।

“कौन है जो मुझे पनाह दे और मेरी मदद करे, यहाँ तक कि मैं अल्लाह तआला की सौंपी हुई नुबुव्वत की ज़िम्मेदारी पूरी कर लूँ? (इस तरह) उसे जन्नत दी जाए” हदीस शरीफ़