मुहासरा (घेराबंदी)
मुहासरे की शुरुआत
बेसत का सातवाँ साल… मुशरिक इस्लाम को दिलों में उतरने और फैलने से रोकने के लिए लगातार कोशिश कर रहे थे। इसके बावजूद हर गुज़रते दिन के साथ मुसलमान कुछ और बढ़ते जा रहे थे। मुसलमानों पर किए जाने वाले ज़ुल्म और सितम उन्हें उनके रास्ते से नहीं फेरते थे, बल्कि उन्हें एक-दूसरे से और ज़्यादा लिपटने और मज़बूती से जुड़ जाने का सबब बनते थे। उनमें से कोई भी अपने दीन से नहीं फिरता था; वे रसूलुल्लाह की राह में अपनी जानें क़ुरबान करने से नहीं झिझकते थे। यह सुनकर मक्का से बाहर के क़बीलों का शौक़ बढ़ता जा रहा था और इस्लाम की रौशनी दूर-दूर तक पहुँच रही थी। मुशरिकों को जब पता चला कि हब्शा भेजे गए उनके आदमी अपनी मुराद न पा सके, बल्कि नज्जाशी असहमा मुसलमान हो गए हैं और मुसलमानों की हिफ़ाज़त करके उनके साथ अच्छा सुलूक कर रहे हैं, तो वे आपे से बाहर हो गए। इन सबका बदला कई गुना लेने और इस्लाम की जड़ सुखाने के लिए उन्होंने इकट्ठा होकर यह ख़ौफ़नाक फ़ैसला किया: “वह कहीं भी हो, कहीं भी दिखाई दे, मुहम्मद को हर हाल में क़त्ल किया जाएगा!”
काफ़िरों ने इसके लिए क़समों पर क़समें खाईं।
मुशरिकों के इस फ़ैसले का पता चला तो अबू तालिब को बहुत दुख हुआ। अपने जिगर के टुकड़े, अपने मुबारक भतीजे की जान के बारे में वह फ़िक्रमंद हो गए। उन्होंने अपने क़बीले को इकट्ठा किया और उन्हें हुक्म दिया कि कायनात के सुल्तान की क़ुरैश के मुशरिकों से हिफ़ाज़त करें। बनू हाशिम रिश्तेदारी की ग़ैरत से इस हुक्म को पूरा करने के लिए एक हो गए। इसी लिए उन्होंने नबी-ए-करीम को और आप पर ईमान लाने वाले तमाम सहाबा को मक्का के उत्तर में, बैतुल्लाह से लगभग तीन किलोमीटर दूर एक टीले पर वाक़े शिअब-ए-अबू तालिब, यानी अबू तालिब के मोहल्ले में बुला लिया। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपने सहाबा को इकट्ठा करके शिअब में रहने लगे। बनू हाशिम में से सिर्फ़ अबू लहब ने नबी-ए-करीम की हिफ़ाज़त के फ़ैसले की मुख़ालफ़त की और शिअब नहीं गया। उसे भी साथ मिलाकर मुशरिक एक हो गए और हमारे नबी को क़त्ल करने के लिए मौक़े की ताक में रहने लगे।1
मुशरिकों ने जब देखा कि नबी-ए-करीम और आपके सहाबा अबू तालिब के मोहल्ले में इकट्ठा हो गए हैं, तो वे फिर जमा हुए। फिर उन्होंने यह फ़ैसला किया: “जब तक मुहम्मद अलैहिस्सलाम क़त्ल किए जाने के लिए क़ुरैश के हवाले नहीं किए जाते, बनू हाशिम से लड़की नहीं ली जाएगी!… उन्हें लड़की नहीं दी जाएगी!… उन्हें कोई चीज़ नहीं बेची जाएगी!… उनसे कोई चीज़ नहीं ख़रीदी जाएगी!… उनसे न मिलकर बात की जाएगी, न मेल-जोल रखा जाएगा!… उनके घरों और मोहल्लों में क़दम नहीं रखा जाएगा!… उनकी तरफ़ से सुलह की कोई ख़्वाहिश हरगिज़ क़बूल नहीं की जाएगी!… उन पर कभी तरस नहीं खाया जाएगा!…”
यह फ़ैसला मंसूर इब्ने इकरिमा नाम के एक मुशरिक ने एक काग़ज़ पर लिखा और सबने उस पर मुहर लगा दी। फिर उसे काबा मुअज़्ज़मा की दीवार पर लटका दिया, ताकि हर कोई उसे देखे और उसकी पाबंदी करे।
यह ख़बर हमारे प्यारे नबी तक पहुँची तो आपको बहुत दुख हुआ और आपने दुआ फ़रमाई। आपकी दुआ फ़ौरन क़बूल हुई और बदबख़्त मंसूर के हाथ पल भर में सूख गए। मुशरिक हैरान रह गए और कहने लगे: “देखो! बनू हाशिम पर हमारे ज़ुल्म के बदले में मंसूर के हाथ सूख गए, उस पर मुसीबत आ पड़ी।” होश में आने के बजाय वे और ज़्यादा सरकश हो गए। शिअब की तरफ़ जाने वाले रास्तों के सिरों पर पहरेदार बिठा दिए। वहाँ खाने-पहनने की चीज़ें पहुँचाने से रोक दिया। मक्का आने वाले सौदागरों से कहा कि शिअब में न जाएँ, अपना माल वहाँ न ले जाएँ; ज़रूरत हो तो ऊँचे दामों पर वे ख़ुद ख़रीद लेंगे। उन्होंने समझा कि इस तरह शिअब वालों को भूख से मार डालेंगे या बनू हाशिम पछताकर नबी-ए-करीम को उनके हवाले कर देंगे। यह हालत हर साल काबा की ज़ियारत के ज़माने तक जारी रहती थी।
“ऐ मेरे नबी! तुम्हारे लिए अल्लाह और मोमिनों में से तुम्हारी पैरवी करने वाले काफ़ी हैं!” अनफ़ाल: 64
रिवाज के मुताबिक़ इस ज़माने में ख़ून नहीं बहाया जाता था। इसलिए बनू हाशिम आज़ादी से मक्का जाते और ख़रीद-फ़रोख़्त करके साल भर की ज़रूरतें पूरी करने की कोशिश करते थे। उनमें से कोई किसी सौदागर के पास माल ख़रीदने आता तो मुशरिकों के सरदारों में से अबू लहब और अबू जहल जैसे मुशरिक फ़ौरन आ पहुँचते और सौदागरों से कहते: “ऐ सौदागरो! मुहम्मद के साथियों के लिए अपने दाम बहुत ऊँचे कर दो, इतने कि महँगाई की वजह से कोई कुछ भी न ख़रीद सके! अगर इस वजह से तुम्हारा माल न बिके और तुम्हारे हाथ में रह जाए, तो हम सारा ख़रीदने को तैयार हैं।” सौदागर अपने माल के ऊँचे दाम बताते और मुसलमान कुछ ख़रीदे बिना लौट आते…
इस राह में हमारे प्यारे नबी, हमारी माँ हज़रत ख़दीजा और अबू बकर सिद्दीक़ ने अपना सारा माल ख़र्च कर दिया; बच्चों की चीख़-पुकार, जो भूख से आसमान तक पहुँच रही थी, थामने की कोशिश की। उन्हें पेड़ों की छाल, घास की जड़ें, यहाँ तक कि सूखे चमड़े के टुकड़े खिलाए। माँ-बाप बेबसी से सूखकर हड्डियों का ढाँचा रह गए थे। सबसे पहले नबी-ए-करीम ने और दूसरे सहाबा-ए-किराम ने भूख की वजह से अपने मुबारक पेटों पर पत्थर बाँधे। मुशरिकों में से कोई तरस खाकर चुपके से कुछ ले आता तो उसे पीटते और बहुत ज़लील करते थे। ग़रज़ आना-जाना बंद हो गया था और मोमिन बड़ी मुश्किल हालत में पड़ गए थे।
मुशरिक इस सख़्त ज़ुल्म के सहारे यह इंतिज़ार करते रहे कि बनू हाशिम राह पर आ जाएँगे और अबू तालिब नबी-ए-करीम को उनके हवाले कर देंगे। मगर अबू तालिब के मोहल्ले के मुसलमान उनकी इस सोच के बिल्कुल उलट नबी-ए-करीम की हिफ़ाज़त करते और आपको कोई नुक़सान न पहुँचे, इसके लिए हर तदबीर अपनाते थे। अबू तालिब किसी मुमकिन क़ातिलाना हमले को रोकने के लिए रसूलुल्लाह के सोने की जगह पर बारी-बारी पहरेदार बिठाते और इसका इंतिज़ाम करते कि आप अपने घर में सुकून से सोएँ। नबी-ए-करीम बेझिझक अल्लाह तआला का हुक्म पूरा करने और इस्लाम फैलाने में लगे रहते और अपना एक पल भी बेकार नहीं जाने देते थे। लोगों को दीन की दावत देकर उनके जहन्नम से बचने का ज़रिया बनने की कोशिश करते और इस राह में सब्र के साथ नसीहत करते रहते थे। आपको झुठलाने वाले क़ुरैश के मुशरिक भी भूख का मतलब समझें, इसलिए एक दिन रसूलुल्लाह ने यूँ दुआ फ़रमाई: “या अल्लाह! यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) के ज़माने के क़हत के सात सालों की तरह इन्हें भी क़हत के सात साल का अज़ाब देकर मेरी मदद फ़रमा।” उसके बाद के दिनों में आसमान से बारिश की एक बूँद न बरसी। मिट्टी प्यास से झुलस गई। ज़मीन पर कोई हरा पौधा नज़र न आता था। क़ुरैश के मुशरिक हैरान रह गए कि उन पर यह क्या आ पड़ा। वे भूख से मरे हुए जानवरों की लाशें और सड़ी हुई कुत्तों की खालें खाकर मौत से बचने की कोशिश करने लगे।
उनके बच्चे भी भूख से रोने-चिल्लाने लगे। बहुत-से भूख से मर गए। भूख की वजह से जब वे आसमान की तरफ़ देखते तो उन्हें ऐसा दिखाई देता जैसे हर तरफ़ धुआँ छाया हुआ हो। उनके होश कुछ ठिकाने आए और जैसे उन्होंने अपने ज़ुल्म की संगीनी समझ ली। उन्होंने अपने बीच से अबू सुफ़यान को नबी-ए-करीम की मुबारक ख़िदमत में भेजा। अबू सुफ़यान ने आकर क़सम खाई और कहा: “ऐ मुहम्मद! तुम कहते हो कि तुम सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजे गए हो; हमें अल्लाह पर ईमान लाने और रिश्तेदारी के हक़ों का ख़याल रखने का हुक्म देते हो। जबकि तुम्हारी क़ौम सूखे और भूख से तबाह होकर मर रही है। अपने रब से एक दुआ कर दो कि यह मुसीबत हम पर से उठ जाए; अल्लाह तुम्हारी दुआ क़बूल करता है। अगर तुम ऐसी दुआ करोगे तो हम सब ईमान ले आएँगे!…”
इस तरह वे अपने ज़ुल्म और सितम एक तरफ़ रखकर तंगी में पड़ गए थे और रसूलुल्लाह के आगे गिड़गिड़ाने लगे थे। नबी-ए-करीम ने उनके किए हुए को उनके मुँह पर नहीं मारा; “हम ईमान ले आएँगे” की उनकी बात पर अपने मुबारक हाथ उठाकर अल्लाह पाक से दुआ फ़रमाई। अल्लाह तआला ने अपने हबीब की दुआ क़बूल की और मक्का पर ख़ूब बारिश बरसाई; ज़मीन सेराब हो गई और पौधे हरे होने लगे। मुशरिक सूखे और क़हत से बच गए, फिर भी अपना वादा भूलकर कुफ़्र पर अड़े रहे…
अल्लाह तआला ने उनके जवाब में जो आयात-ए-करीमा उतारीं, उनमें मफ़हूमन फ़रमाया: “बल्कि वे (अल्लाह तआला और मुहम्मद अलैहिस्सलाम पर ईमान नहीं लाते; क़ुरआन-ए-करीम, आख़िरत और दोबारा ज़िंदा होने के बारे में) शक में पड़े खेल रहे हैं। तो (ऐ मेरे हबीब!) उस दिन का इंतिज़ार करो जब आसमान एक खुला हुआ धुआँ लाएगा। वह धुआँ तमाम इंसानों को पूरी तरह ढाँप लेगा। यह बड़ा सख़्त अज़ाब है! (लोग) कहेंगे: ‘ऐ हमारे रब! हम पर से यह अज़ाब हटा दे, हम ईमान लाते हैं।’ उनके लिए सोचना और इबरत लेना कहाँ, जबकि उनके पास हक़ीक़तों को खोलकर बताने वाले एक नबी आ चुके हैं? फिर उन्होंने उनसे मुँह मोड़ा और कहा: ‘यह सिखाया-पढ़ाया हुआ दीवाना है।’ हम यह अज़ाब ज़रा हटा देंगे तो तुम फिर अपनी पुरानी हालत पर लौट जाओगे। जिस दिन वे बड़ी सख़्ती से पकड़े जाएँगे (बद्र के दिन), हम यक़ीनन (उनसे) बदला लेंगे। मेरे जलाल की क़सम, हमने इनसे (क़ुरैश के मुशरिकों से) पहले फ़िरऔन की क़ौम को भी आज़माया था। उनके पास हमारी तरफ़ से एक इज़्ज़त वाले नबी आए (वह मूसा अलैहिस्सलाम हैं)। उन्होंने उनसे कहा: ’अल्लाह के बंदों (बनी इस्राईल) को मेरे हवाले कर दो। (उन्हें मेरे साथ भेज दो। उनका पीछा छोड़ दो, उन्हें अज़ाब न दो।) बेशक मैं तुम्हारे पास अल्लाह तआला की तरफ़ से वह्य के साथ भेजा गया एक अमानतदार नबी हूँ। अल्लाह तआला के मुक़ाबले में घमंड न करो। क्योंकि मैं तुम्हारे पास अपने दावे के सच होने को साफ़ करने वाली दलील के साथ, खुले मोजिज़े के साथ आया हूँ। जान लो, तुम्हारे मुझे संगसार करने से और क़त्ल करने से मैं अपने और तुम्हारे रब अल्लाह तआला की पनाह माँगता हूँ; वही मेरी हिफ़ाज़त करेगा। अगर तुम मेरी तस्दीक़ न करो और मुझ पर ईमान न लाओ तो मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो। (मैंने तुम्हारी भलाई से हाथ धो लिए। कम से कम तुम्हारी बुराई मुझे न पहुँचे।)’ (वे ईमान न लाए, उन्हें झुठलाया, बल्कि उन्हें तरह-तरह की तकलीफ़ें और सितम देने लगे, तो) मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह तआला से दुआ करते हुए कहा: ‘या रब! ये कुफ़्र पर अड़ी हुई एक क़ौम हैं।’ अल्लाह तआला ने उन पर वह्य भेजकर फ़रमाया: ’मेरे बंदों (बनी इस्राईल) को लेकर रात को (मिस्र से) निकल जाओ! फ़िरऔन और उसके साथी तुम्हारे निकलने की ख़बर पाएँगे तो ज़रूर तुम्हारा पीछा करेंगे। अपनी क़ौम के साथ समुंदर पार कर लो तो उसे जैसा है वैसा ही छोड़ देना (अपनी लाठी दोबारा मारकर खुले हुए रास्तों को बंद न करना; खुला छोड़ देना)। क्योंकि फ़िरऔन और उसका लश्कर उन रास्तों में घुसकर ग़र्क़ होंगे, डूब जाएँगे।’”2
मुहासरे का ख़ात्मा
मुशरिक “हम ईमान ले आएँगे” की अपनी बात से फिर गए और फिर से ज़ुल्म करने लगे। एक दिन अल्लाह तआला ने वह्य के ज़रिए नबी-ए-करीम को ख़बर दी: “काबा में लटके हुए अहदनामे पर उसने लकड़ी का एक कीड़ा (घुन) मुसल्लत कर दिया है और उस कीड़े ने अल्लाह तआला के नाम के सिवा सारी तहरीरें खा डाली हैं…” नबी-ए-करीम ने अबू तालिब से फ़रमाया: “चचाजान! मेरे रब अल्लाह तआला ने क़ुरैश के अहदनामे पर लकड़ी का कीड़ा मुसल्लत कर दिया है। अल्लाह तआला के नाम के सिवा उसमें लिखी हुई ज़ुल्म, रिश्तेदारी तोड़ने, बोहतान… जैसी चीज़ों में से कुछ भी नहीं छोड़ा, सबको मिटा दिया है।”
“या अल्लाह! यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) के ज़माने के क़हत के सात सालों की तरह इन्हें भी क़हत के सात साल का अज़ाब देकर मेरी मदद फ़रमा!” हदीस शरीफ़
अबू तालिब ने पूछा: “क्या यह बात तुम्हें तुम्हारे रब ने बताई है?” तो नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “हाँ।” तब अबू तालिब ने कहा: “मैं गवाही देता हूँ कि तुम हमेशा सच ही बोलते हो।” वह फ़ौरन कपड़े पहनकर काबा की तरफ़ चल दिए। वहाँ मुशरिकों के सरदार बैठे हुए थे। अबू तालिब को आते देखकर वे बोले: “शायद मुहम्मद को हमारे हवाले करने आ रहा है!…” अबू तालिब उनके पास पहुँचे तो कहा: “ऐ क़ुरैश के लोगो! मेरे भतीजे ने, जिसे ‘अल-अमीन’ कहा जाता है और जिसने कभी झूठ नहीं बोला, ख़बर दी है कि तुम्हारे लिखे हुए सहीफ़े में अल्लाह तआला के नाम के सिवा सारी तहरीरें लकड़ी के एक कीड़े ने खा ली हैं। चलो, हमारे ख़िलाफ़ लिखा हुआ अपना काग़ज़ ले आओ, हम भी देखें!… अगर यह बात सच निकली तो क़सम खाता हूँ, हम सब मरते दम तक उनकी हिफ़ाज़त करते रहेंगे! अब तुम भी अपने इस ज़ुल्म और बुरे रवैये से बाज़ आ जाओ…” मुशरिक जोश में आकर काबा की दीवार से सहीफ़ा उतार लाए। अबू तालिब ने कहा: “पढ़ो!” तो उनमें से एक ने पढ़ने के लिए सहीफ़ा खोला और देखा कि “बिस्मिका अल्लाहुम्मा” के सिवा सारी तहरीरें मिट चुकी हैं।3 मुशरिक हैरान रह गए कि क्या कहें और क्या करें। आख़िरकार जब कुछ लोग अहदनामे से पीछे हट गए, तो उन्होंने इस सख़्त मुहासरे को ख़त्म कर दिया, जो तीन साल से जारी था, जिसका दुख कभी भुलाया न जा सकेगा और जिसने दिलों में गहरे ज़ख़्म छोड़े थे। लेकिन वे अपनी दुश्मनी से किसी तरह बाज़ न आए; ऊपर से और ज़्यादा सख़्ती दिखाने लगे। इस्लाम को फैलने से रोकने के लिए हर रास्ता आज़माया। इन तमाम कोशिशों के बावजूद इस्लाम तेज़ी से फैल रहा था। हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम जाहिलिय्यत के दौर के अँधेरे (ज़ुल्मत) में घुटते हुए इंसानों को बचाने की कोशिश कर रहे थे और उन्हें हक़ीक़ी सआदत तक पहुँचा रहे थे। इस सआदत को पाने वाले उस बड़ी नेमत पर शुक्र अदा करते और मुशरिकों की तौहीन और सितम के सामने हरगिज़ हिम्मत नहीं हारते थे। मुहम्मद अलैहिस्सलाम के मोजिज़ों और मुसलमानों की अपने दीन पर साबित-क़दमी को देखकर कितने ही दिल इस्लाम के नूर से रौशन हो रहे थे।
चाँद का दो टुकड़े होना
नबी-ए-करीम के बड़े मोजिज़ों में से एक चाँद का दो टुकड़े होना है। मुशरिकों के एक गिरोह ने, जिसमें अबू जहल और वलीद इब्ने मुग़ीरा भी थे, रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से कहा: “अगर तुम सचमुच नबी हो तो चाँद के दो टुकड़े कर दो, इस तरह कि आधा क़ुऐक़िआन पहाड़ पर और आधा अबू क़ुबैस पहाड़ पर दिखाई दे!…” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “अगर मैं ऐसा कर दूँ तो क्या तुम ईमान ले आओगे?” उन्होंने कहा: “हाँ, ईमान ले आएँगे।” रसूलुल्लाह ने चाँद के दो टुकड़े होने के लिए अल्लाह तआला से दुआ फ़रमाई। जिबराईल अलैहिस्सलाम फ़ौरन हमारे प्यारे नबी के पास आए और कहा: “ऐ मुहम्मद! आज रात मक्का वालों को ख़बर कर दीजिए कि मोजिज़ा देखें।” नबी-ए-करीम ने बताया कि चाँद की चौदहवीं रात को, जब वह पूरा बद्र (पूरा चाँद), यानी बिल्कुल गोल और सबसे ज़्यादा रौशन होगा, चाँद दो टुकड़े होगा, और जो इबरत लेना चाहें, वे देखें। उस रात हमारे प्यारे नबी ने अपनी मुबारक उँगली से इशारा फ़रमाया तो चाँद दो टुकड़े हो गया। एक टुकड़ा अबू क़ुबैस पहाड़ पर और दूसरा क़ुऐक़िआन पहाड़ पर दिखाई दिया। फिर दोनों आसमान में दोबारा मिल गए।
रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “ऐ अबू सलमा इब्ने अब्दुल असद, अरक़म इब्ने अबिल अरक़म! गवाह रहो!” फिर अपने पास मौजूद दूसरे सहाबा से भी फ़रमाया: “गवाह रहो!” मुशरिकों ने अपनी आँखों से एक और खुला मोजिज़ा देख लिया। लेकिन अपनी बात पर क़ायम रहकर ईमान लाने के बजाय, दूसरों को भी ईमान लाने से रोकने के लिए कहने लगे: “यह तो बस मुहम्मद का हम पर किया हुआ जादू है! मगर तमाम इंसानों पर तो वह जादू नहीं कर सकता!… चलो, दूसरे इलाक़ों से आने वाले लोगों से भी पूछें। देखें, क्या उन्होंने भी यही वाक़िआ देखा है? अगर उन्होंने देखा है तो मुहम्मद का नुबुव्वत का दावा सच है। वरना यह जादू है।” उन्होंने आने वालों से पूछा, यहाँ तक कि दूसरी जगहों पर आदमी भेजकर पुछवाया। सबसे एक ही बात सुनी: “हाँ, उस रात हमने चाँद को दो टुकड़े होते देखा!” फिर भी उन्होंने इनकार किया। इनकार करने वालों में सबसे आगे अबू जहल था। लोग ईमान की नेमत न पा सकें, इसलिए वह यह कहकर दिलों को बिगाड़ता था: “अबू तालिब के यतीम का जादू आसमान पर भी असर कर गया!…”4 उसके इस इनकार पर अल्लाह तआला ने आयात-ए-करीमा उतारीं, जिनका मफ़हूम है:
“वह घड़ी (क़यामत) क़रीब आ गई और चाँद फट गया (दो टुकड़े हो गया)। वे (क़ुरैश के काफ़िर) अगर कोई मोजिज़ा (मुहम्मद अलैहिस्सलाम की नुबुव्वत की दलील बनने वाला मोजिज़ा) देखें तो मुँह फेर लेते हैं (उस पर ग़ौर करने और ईमान लाने से) और कहते हैं: ’यह लगातार (कभी न रुकने वाला, सब पर छा जाने वाला, ज़ोरदार) जादू है।’ उन्होंने (नबी को या मोजिज़े को) झुठलाया और अपनी ख़्वाहिशों (अपने नफ़्स की चाहतों और आरज़ुओं) की पैरवी की। हालाँकि हर काम (जिस तरफ़ वह जा रहा है, उस) नतीजे तक पहुँचता है, अपनी जगह पा लेता है। क़सम है, उनके पास (मक्का के मुशरिकों के पास) कितनी ही अहम ख़बरें (हुक्म, मनाहियाँ) आ चुकी हैं, जो उन्हें (बुराई से) रोक सकती थीं। (ये हुक्म और इल्म) पूरी हिकमत हैं। लेकिन रसूल, चेतावनियाँ और डरावे (उन्हें) कुछ भी फ़ायदा नहीं देते। तो तुम भी (ऐ मेरे हबीब, अगर वे इनकार पर अड़े रहें तो) उनसे मुँह फेर लो। जिस दिन वह पुकारने वाला (इसराफ़ील अलैहिस्सलाम) एक अनदेखी और अनजानी चीज़ (महशर के मैदान, हिसाब) की तरफ़ बुलाएगा, उस दिन वे निगाहें ज़लील और पस्त किए हुए (डर और दहशत से यह न जानते हुए कि कहाँ जाएँ), बिखरी हुई टिड्डियों की तरह अपनी क़ब्रों से निकलेंगे। काफ़िर (गर्दनें झुकाए) उस पुकारने वाले की तरफ़ दौड़ते हुए कहेंगे: ‘यह हमारे लिए कैसा कठिन और कैसा सख़्त दिन है!’”5
मेरा रब तुम्हें भी हिदायत नसीब करे
मुशरिकों की मुसलमानों पर तीन साल की घेराबंदी ख़त्म होने के बाद नजरान से कुछ लोग रसूलुल्लाह की ख़िदमत में आए। वे लगभग बीस थे; उन्होंने हब्शा की तरफ़ हिजरत करने वाले सहाबा-ए-किराम से इस्लाम के बारे में सुना था और इस्लाम सीखने और नबी-ए-करीम को देखने की सआदत पाने के लिए मक्का आए थे। काबा मुअज़्ज़मा के पास रसूलुल्लाह से उनकी मुलाक़ात हुई। उन्होंने बहुत-से सवाल किए और जैसा चाहते थे उससे भी ज़्यादा ख़ूबसूरत और मुकम्मल जवाब पाए। क़ुरैश के मुशरिक भी आस-पास से उन्हें देख रहे थे। सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजे गए हमारे प्यारे नबी ने उन्हें क़ुरआन-ए-करीम की कुछ आयात-ए-करीमा पढ़कर सुनाईं। इससे वे बहुत मुतास्सिर हुए और आँसू न रोक सके, रो पड़े। फिर नबी-ए-करीम की दावत पर उन्होंने बड़ी ख़ुशी से कलिमा-ए-शहादत पढ़ा और मुसलमान होने के शरफ़ से नवाज़े गए। जब उन्होंने अपने वतन लौटने की इजाज़त माँगी तो अबू जहल उनके पास आया और तौहीन भरी ये बातें कहीं: “तुम जैसे बेवक़ूफ़ हमने नहीं देखे!… उसके पास एक बार बैठते ही तुम अपने दीन से अलग हो गए और उसने जो कुछ कहा, सबकी तस्दीक़ कर दी!…” इन लोगों ने, जो अभी-अभी सहाबी होने के शरफ़ से नवाज़े गए थे, जवाब दिया: “हम चाहते हैं कि अल्लाह तआला तुम्हें भी हिदायत (सीधा रास्ता) नसीब करे। तुमने हमारे साथ जो तौहीन और जहालत की, वह हम तुम्हारे साथ नहीं करेंगे। हमने तो तुम्हारा कोई हक़ नहीं मारा। लेकिन यह अच्छी तरह जान लो कि चंद जाहिलों की बात से हम अपनी पाई हुई इस बड़ी नेमत को हरगिज़ खोना नहीं चाहते; इस सच्चे दीन से हम नहीं फिरेंगे।”6
“चचाजान! मेरे रब अल्लाह तआला ने क़ुरैश के अहदनामे पर लकड़ी का कीड़ा मुसल्लत कर दिया है। अल्लाह तआला के नाम के सिवा उसमें लिखी हुई ज़ुल्म, रिश्तेदारी तोड़ने, बोहतान… जैसी चीज़ों में से कुछ भी नहीं छोड़ा, सबको मिटा दिया है” हदीस शरीफ़
अल्लाह तआला ने इस वाक़िए पर जो आयात-ए-करीमा उतारीं, उनमें मफ़हूमन फ़रमाया: “इससे (क़ुरआन-ए-करीम से) पहले जिन्हें हमने किताब दी, ऐसे कितने ही लोग हैं जो इस पर (क़ुरआन-ए-करीम पर) ईमान रखते हैं। जब उनके सामने यह (क़ुरआन-ए-करीम) पढ़ा गया तो उन्होंने कहा: ’हम इस पर ईमान लाए। बेशक यह हमारे रब की तरफ़ से (आया हुआ) हक़ है। हम तो इससे पहले भी मुसलमान थे।’ यही वे लोग हैं जिन्हें उनके सब्र (और साबित-क़दमी) की वजह से दो बार अज्र दिया जाएगा। वे बुराई को भलाई से दूर करते हैं। हमने उन्हें जो रिज़्क़ दिया है, उसमें से (भलाई के कामों में) ख़र्च करते हैं। जब वे कोई बेहूदा बात सुनते हैं तो उससे मुँह फेर लेते हैं और कहते हैं: ’हमारे अमल हमारे लिए और तुम्हारे अमल तुम्हारे लिए। तुम्हें सलाम हो (हमसे बेफ़िक्र रहो)। हम जाहिलों को नहीं चाहते (और उनकी दोस्ती भी नहीं चाहते)।’”7
पानी का क़सीदा8
ऐ आँख, आँसुओं से मेरे दिल की आग पर न छिड़क पानी,
ऐसी भड़कती आग का इलाज नहीं कर सकता पानी।
मैं नहीं जानता, घूमता आसमानी गुंबद पानी के रंग का है,
या मेरी आँखों से उमड़कर गुंबद पर छा गया पानी।
तेरी तलवार के मज़े से दिल चाक-चाक हो तो अजब नहीं,
कि गुज़रते हुए दीवार में दरारें छोड़ जाता है पानी।
ज़ख़्मी दिल तेरे तीर की नोक की बात डर-डर के करता है9,
ज़ख़्म वाला जो भी हो, एहतियात से पीता है पानी।
माली गुलज़ार को पानी में बहा दे, मेहनत न उठाए,
तेरे चेहरे-सा गुल न खिलेगा, हज़ार बाग़ों को दे पानी।
कोई लिखने वाला तेरी मुकम्मल सूरत खींच न सकेगा,
क़लम की तरह टकटकी बाँधे तो आँखों में उतरे स्याह पानी।
तेरे रुख़सार की याद में पलकें नम हों तो क्या हुआ,
गुल की उम्मीद में काँटे को दिया बेकार नहीं जाता पानी।
ग़म के दिन बीमार दिल से अपनी तलवार-सी निगाह न रोक,
नेकी है अँधेरी रात में बीमार को देना पानी।
ऐ दिल, तीर की नोक माँग और जुदाई की तपिश बुझा,
प्यासा हूँ; इस सहरा में मुझे ढूँढना है पानी।
ज़ाहिद कौसर के तालिब, मैं तेरे होंठों का मुश्ताक़ हूँ,
जैसे मस्त को शराब भली लगे, होश वाले को पानी।
तेरी जन्नत-सी गली की तरफ़ लगातार बहता जाता है,
शायद उस नाज़ुक चाल वाले सर्व पर आशिक़ हुआ है पानी।
मिट्टी बनकर उस गली से उसका रास्ता रोकना होगा मुझे,
उसे वहाँ जाने न दूँगा, कि मेरा रक़ीब है पानी।
ऐ दोस्तो, अगर मैं उसके हाथ चूमने की आरज़ू में मर जाऊँ,
मेरी मिट्टी का कूज़ा बनाकर महबूब को पेश करना पानी।
“इससे पहले जिन्हें हमने किताब दी, ऐसे कितने ही लोग हैं जो इस पर ईमान रखते हैं। जब उनके सामने (क़ुरआन-ए-करीम) पढ़ा गया तो उन्होंने कहा: ‘हम इस पर ईमान लाए। बेशक यह हमारे रब की तरफ़ से (आया हुआ) हक़ है। हम तो इससे पहले भी मुसलमान थे’” क़सस: 52–53
जन्नतुल मुअल्ला
वह क़ब्रिस्तान जिसमें हमारी माँ हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) समेत बहुत-से सहाबा-ए-किराम के
मक़बरे हैं।
आज इन मक़बरों को देखना मुमकिन नहीं। अफ़सोस, इन ख़ूबसूरत
तारीख़ी यादगारों को पूरी तरह ढहा दिया गया है।
