मेरे प्यारे नबी

माख़ज़ – हवाले की किताबें

- क़ुरआन-ए-करीम

- Envâr-üt-tenzîl – क़ाज़ी बैज़ावी

- Tefsîr-i Mazharî – सनाउल्लाह पानीपती

- Tefsîr-i Kurtubî – इमाम क़ुर्तुबी

- Tefsîr-i Beydâvî – क़ाज़ी बैज़ावी

- Tefsîr-i Kebîr – फ़ख़रुद्दीन राज़ी

- Tefsîr-i Hâzin – अलाउद्दीन बग़दादी

- Tefsîrü’l- Kur’ân – इमाम तिरमिज़ी

- Tefsîrü’l- Kur’ân-ı azim – अबुल फ़िदा

- Sahîh-i Buhârî – इमाम बुख़ारी

- Sahîh-i Müslim – इमाम मुस्लिम

- Sünen-i Dârekütnî – दारक़ुतनी

- Sünen-i Tirmizî – इमाम तिरमिज़ी

- Muvattâ – इमाम मालिक

- Müstedrek – हाकिम नीशापूरी

- Sünen-i İbni Mâce – इब्ने माजा

- Sünen-i Beyhekî – बैहक़ी

- Sünen-i Dâvûd – अबू दाऊद

- Sünen-i sâgir – इमाम नसाई

- Müsned – बज़्ज़ार

- Müsned – दारिमी

- Müsned – अबू याला

- Müsned – इमाम अहमद इब्ने हंबल

- Sahîh – इब्ने हिब्बान

- Ahbâr-u Mekke – अज़रक़ी

- Birgivî Vasiyetnâmesi – İmâm-ı Birgivî

- Câliyetü’l-ekdâr – मौलाना ख़ालिद बग़दादी

- Câmi-ul Ehâdis – सुयूती

- Cevâb Veremedi – Harputlu İshâk Efendi

- Delâilü’n-Nübüvve – अबू नुऐम इस्फ़हानी

- Delâilü’n-Nübüvve – बैहक़ी

- Dinî Sözlük – Türkiye Gazetesi

- El-Bidâye ve’n-nihâye – इब्ने कसीर (अबुल फ़िदा)

- Ensâbu’l-eşrâf – बलाज़ुरी

- El-Envâr – बग़वी

- El-İktifâ fî megâz-il-Mustafâ vesselâset-il-hulefâ – किलाई

- El-Leâli’l-Masnûa – सुयूती

- El-Mu’cemu’s-sağîr – इमाम तबरानी

- El-Muhabber – इब्ने हबीब

- El-Musannef – इमाम अब्दुर रज़्ज़ाक़ सनआनी

- El-Musannef – इमाम इब्ने अबी शैबा

- El-Vefâ bi ahvâl-il-Mustafâ – इब्ने जौज़ी (अब्दुर रहमान जौज़ी / अबुल फ़रज इब्ने जौज़ी)

- Evsaf-un Nebî – सुयूती

- Feyz-ül-kadîr – मुनावी

- Fütühu’l-büldân – बलाज़ुरी

- Herkese Lâzım Olan Îmân – Hacı Feyzullah Efendi

- Hilyet-ül-evliyâ – अबू नुऐम

- İhyâ – इमाम ग़ज़ाली

- İnsân-u’l-uyûn – नूरुद्दीन अली हलबी

- İsâbe – इब्ने हजर अस्क़लानी

- İsbâtü’n-Nübüvve – इमाम रब्बानी

- İslâm Âlimleri Ansiklopedisi – Türkiye Gazetesi

- İstiâb – इब्ने अब्दुल बर्र

- İ’tikâdnâme – मौलाना ख़ालिद बग़दादी

- Keşf-ül-hafâ – इस्माईल अजलूनी

- Kısas-ı Enbiyâ – Ahmed Cevdet Paşa

- Kimyâ-i Se’âdet – इमाम ग़ज़ाली

- Me’âricü’n-Nübüvve Tercümesi (Peygamberler Tarihi) – Altıparmak Muhammed Efendi

- Mecma’uz-zevâid – हैसमी

- Megâzî – वाक़िदी

- Mektûbât-ı İmâm-ı Rabbânî – इमाम रब्बानी

- Mektûbât-ı Ma’sûmiyye – मुहम्मद मासूम फ़ारूक़ी

- Mevâhib-i ledüniyye – क़स्तल्लानी

- Mevlid-i Şerîf (Vesîletü’n-necât) – Süleyman Çelebi

- Mir’ât-ı Kâinât – Nişancızâde Muhammed Efendi

- Mu’cem-ül-Kebîr – तबरानी

- Mukaddime – दारिमी

- Ravd-ül-ünf – सुहैली

- Siret – इब्ने कसीर

- Sîret-i Resûl – इब्ने इसहाक़

- Sîretü’n-Nebeviyye – इब्ने हिशाम

- Sîretü’n-Nebî – अहमद इब्ने ज़ैनी दहलान

- Siyerü’l-Kebîr – इमाम मुहम्मद

- Siyer-il-kebîr şerhi – इमाम सरख़सी

- Sübülü’l-Hüdâ – शम्सुद्दीन शामी

- Şemâil-i şerîfe – इमाम तिरमिज़ी

- Şifâ-i şerîf – क़ाज़ी इयाज़

- Şevâhidü’n-Nübüvve – मौलाना अब्दुर रहमान जामी

- Şu’ab-ül-îmân – बैहक़ी

- Tabakât-ül-kübrâ – अब्दुल वह्हाब शारानी

- Tabakât-üs-Sahâbe – इब्ने साद

- Târih-ül-Kebîr – बुख़ारी

- Tahrîc – ख़ुज़ाई

- Tarih-i Dımeşk (Şâm târîhi) – इब्ने असाकिर

- Tam İlmihâl Se’âdet-i Ebediyye – Hüseyin Hilmi Işık

- Târih-i Taberî – तबरी

- Târih-ül-İslâm – इमाम ज़हबी

- Terâtîb-ül-idâriyye – कत्तानी

- Usudü’l-gâbe – इब्नुल असीर

- Uyûn-ül-eser – इब्ने सय्यिदुन नास

अब्दुल हमीद ख़ान सानी

“यिल्दिज़” एल्बम: मक्का – मदीना

की तस्वीरें

काबा शरीफ़ – मक्का मुकर्रमा मस्जिद-ए-हराम का दाख़िली दरवाज़ा

सफ़ा पहाड़ी – मक्का मरवा पहाड़ी – मक्का

मक्का में सुर्रा-ए-हुमायूँ अब्दुल हमीद ख़ान अव्वल का बनवाया हुआ ज़मज़म का कुआँ

मौलिद-ए-बैत-ए-शरीफ़ (1909)

बड़ी तस्वीर में, और नीचे दाईं तरफ़ वाली तस्वीर के दाएँ हिस्से में, एक गुंबद और एक मीनार वाली जो मस्जिद दिखाई देती है, वह वही मुबारक जगह है जहाँ रसूलुल्लाह दुनिया में तशरीफ़ लाए और उसे शरफ़ बख़्शा।

नबी-ए-करीम ने हिजरत के वक़्त यह मुबारक घर हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) के भाई अक़ील इब्ने अबी तालिब के सुपुर्द किया था। अक़ील के पोतों ने इसे हज्जाज के भाई मुहम्मद इब्ने यूसुफ़ सक़फ़ी के हाथ बेच दिया था।

बाद में अब्बासी ख़लीफ़ा हारून रशीद की माँ ख़ैज़ुरान ख़ातून ने यह मुबारक घर ख़रीदकर इसे मस्जिद में बदल दिया।

अब्बासियों के बाद मम्लूकों ने इस मस्जिद की हिफ़ाज़त की, और उस्मानी दौर में भी इसे बड़ी एहतियात से महफ़ूज़ रखा गया।

क़ानूनी सुल्तान सुलेमान ख़ान ने मस्जिद को नए सिरे से बनवाया और हमारे नबी की पैदाइश की जगह को चाँदी की सलाख़ों वाली जाली से घिरवा दिया।

सुल्तान अहमद ख़ान अव्वल ने भी सोने के झूले की शक्ल में मक़ाम के लिए एक कुर्सी बनवाई और उसे इस जाली के अंदर रखवाया।

वालिदा सुल्तानें बड़ी एहतियात से इस मस्जिद की देख-रेख करती थीं, और इसकी ज़रूरतें भी महल की बेगमें ही पूरी करती थीं।

इस बारे में सबसे ज़्यादा ख़िदमत सुल्तान मेहमद ख़ान राबे की बीवी (मुस्तफ़ा ख़ान सानी और अहमद ख़ान सालिस की माँ) अमतुल्लाह राबिया गुलनूश सुल्तान ने की।

तारीख़ में इस मस्जिद की कई बार मरम्मत हुई।

1924 में ढा दी गई मस्जिद की जगह शैख़ अब्बास क़त्तान ने 1950 में जो इमारत बनवाई, वह 1959 से मक्का के आम कुतुबख़ाने के तौर पर इस्तेमाल हो रही है।

अजयाद क़िला (1890)

मुक़द्दस सरज़मीन पर आख़िरी उस्मानी निशानियाँ – रिवाक़

बैतुल्लाह को घेरने वाले पहले सायबान हज़रत उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) के ज़माने में लगाए गए। फिर अब्बासी ख़लीफ़ा महदी के बनवाए हुए रिवाक़ वक़्त के साथ ख़स्ता हो गए।

क़ानूनी सुल्तान सुलेमान ने रिवाक़ों की मरम्मत मेमार सिनान से करवाई; इस मरम्मत के बाद रिवाक़ों के ऊपर गुंबद जोड़े गए। मेमार सिनान के शागिर्दों में से मेमार मेहमत आग़ा ने 1590 में रिवाक़ों के सुतूनों में नए इज़ाफ़े किए और लकड़ी के खंभों और मेहराबों को संगमरमर से दोबारा बनवाया।

सुल्तान अब्दुल अज़ीज़ ख़ान और अब्दुल हमीद ख़ान सानी के ज़माने में भी उनकी देख-रेख की गई।

2014 में काबा की तौसीअ के मंसूबे के तहत रिवाक़ों को उनकी जगह से उखाड़कर अरफ़ात के पास तामीराती साइट पर ले जाया गया। 2016 में उन्हें फिर से उनकी जगह लगा दिया गया।

मदीना का रेलवे स्टेशन

हज़रत उस्मान का मज़ार

काबा शरीफ़

जन्नतुल मुअल्ला का दाख़िली रास्ता

एक उस्मानी चौकी – मक्का मुकर्रमा

क़ानूनी का बनवाया हुआ सू हानिया क़िला – मदीना मुनव्वरा

मदीना मुनव्वरा

मक्का मुकर्रमा

1. अजयाद क़िला

अजयाद क़िला सुल्तान अब्दुल हमीद ख़ान अव्वल के दौर में काबा की हिफ़ाज़त, हाजियों की सलामती और मक्का शहर के अमन-ओ-अमान और दिफ़ा के लिए 1781–1783 के दरमियान बनवाया गया, और पहली आलमी जंग में तुर्क फ़ौजी छावनी के तौर पर इस्तेमाल हुआ। लेकिन उस्मानियों की यादगार अजयाद क़िला 2002 में गिरवा दिया गया।

2. उमर पहाड़

3. हिंद क़िला: हिंद क़िला भी मक्का की सलामती बढ़ाने के लिए 1806 में सुल्तान सलीम ख़ान सालिस ने बनवाया।

मदीना मुनव्वरा

1. उहुद पहाड़
2. मजीदिया मीनार

मजीदिया मीनार, मस्जिद के बाबुस सलाम और बाबुर रहमत नाम के दूसरे मीनारों की तरह, सुल्तान अब्दुल मजीद ख़ान ने बनवाया। ये मीनार उस्मानी फ़न-ए-तामीर के अंदाज़ की झलक दिखाते हैं। 3. क़ुब्बा-ए-सआदत (क़ुब्बा-ए-ख़ज़रा – सब्ज़ गुंबद): मिस्र के तुर्कमान सुल्तान सैफ़ुद्दीन सालेह क़लावून ने सन् 678 [ईसवी 1279] में हुजरा-ए-सआदत के ऊपर आज का गुंबद बनवाकर उस पर सीसे की चादर चढ़वाई। 1253 [ईसवी 1837] में सुल्तान महमूद ख़ान सानी (रहमतुल्लाहि अलैहि) के हुक्म से गुंबद को सब्ज़ रंग दिया गया।

4. रईसिया मीनार

रईसिया मीनार मम्लूकों ने बनवाया था; क़ानूनी सुल्तान सुलेमान ख़ान और मेहमद ख़ान राबे के ज़मानों में इसकी मरम्मत हुई। चूँकि बड़े मुअज़्ज़िन यहीं अज़ान देते थे, इसलिए इस मुख्य मीनार को रईसिया कहते हैं।

5. ख़ालिदिया चौकी

6. क़िश्ला-ए-असाकिर-ए-शाहाना (उस्मानी फ़ौजी बैरक)

4. फ़ुलफ़ुल क़िला

चूँकि मक्का की हिफ़ाज़त का इंतिज़ाम काफ़ी नहीं समझा गया, इसलिए फ़ुलफ़ुल क़िला सुल्तान सलीम ख़ान सालिस ने 1800–1801 के दरमियान बनवाया।

1885 में, जब ओस्मान नूरी पाशा मक्का के अमीर थे, इसे अस्पताल में बदल दिया गया।

नोट:

हिंद और फ़ुलफ़ुल क़िले भी अजयाद क़िले से पहले गिरवा दिए गए थे।

7. मस्जिद-ए-ग़मामा

“ग़मामा” अरबी में बादल को कहते हैं। जो बादल नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर साया करता था, जब आप मस्जिद-ए-नबवी तशरीफ़ ले जाते, तो वह यहाँ इंतिज़ार करता था, इसलिए इस इलाक़े का नाम “बादल की जगह” पड़ा और मस्जिद ने भी यही नाम पाया। नबी-ए-करीम ने ईद की नमाज़ें यहीं पढ़ी हैं। सुल्तान अब्दुल मजीद ख़ान के ज़माने में इस मस्जिद की मरम्मत हुई।

8. हज़रत अबू बकर की मस्जिद

आज हज़रत अबू बकर की मस्जिद में मौजूद उस्मानी कतबे में लिखा है कि मस्जिद की आख़िरी मरम्मत सुल्तान अब्दुल अज़ीज़ ख़ान ने करवाई थी। यह तस्वीर इस मरम्मत के कुछ साल बाद खींची गई है।

9. हज़रत अली की मस्जिद

नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने यहाँ ईदुल फ़ित्र की नमाज़ पढ़ाई थी। हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने भी अपनी ख़िलाफ़त के दौर में, और जब हज़रत उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) अपने घर में घिरे हुए थे, उस वक़्त ईद की नमाज़ इसी जगह पढ़ाई थी। इसीलिए इसे “हज़रत अली की मस्जिद” का नाम दिया गया।

10. फ़ातिमतुज़ ज़हरा सबील

काबा – हरम शरीफ़

1. मक़ाम-ए-मालिकी
2. मक़ाम-ए-हनफ़ी
3. हजर-ए-असवद
4. मक़ाम-ए-इब्राहीम और मक़ाम-ए-शाफ़ई

5. ज़मज़म शरीफ़ का कुआँ

6. मक़ाम-ए-हंबली

7. मुवक़्क़ितख़ाना: मुवक़्क़ित जहाँ अपनी ख़िदमत अंजाम देते हैं, वक़्त और नमाज़ के औक़ात तय करने का काम करते हैं, और जिनके अंदर वक़्त मालूम करने में इस्तेमाल होने वाले आलात और मिलाई हुई घड़ियाँ होती हैं – छोटी रसदगाह जैसी ऐसी इमारतों को मुवक़्क़ितख़ाना कहते हैं। ये आम तौर पर बड़ी मस्जिदों के पास होती हैं। घड़ियाँ मिलाने वाले और ख़ास तौर पर नमाज़ के औक़ात तय करने वाले कारकुनों को मुवक़्क़ित कहा जाता है, और उनके ख़र्च वक़्फ़ों से पूरे किए जाते हैं। 8. कुतुबख़ाना: जन्नत-मकान सुल्तान अब्दुल मजीद ख़ान ने 1262 (ईसवी 1846) में काबा की पूरबी तरफ़ मौजूद, पुराने ज़माने की, छह-छह मीटर क़ुतर के गुंबद वाली दो इमारतों में से एक को मुवक़्क़ितख़ाने में और दूसरी को कुतुबख़ाने में बदलवा दिया [Mirâtü’l Haremeyn – Mirâtü’l Mekke, II, 770]। अब्दुल मजीद ख़ान ने कुतुबख़ाने को 3653 जिल्द किताबें वक़्फ़ कीं।

अस-सलातु हौलल काबा (काबा के चारों तरफ़ नमाज़)

क़ुब्बा-ए-सआदत और रईसिया मीनार

1. फ़ातिमतुज़ ज़हरा का बाग़
2. मेहराब-ए-उस्मान का गुंबद

पाकीज़ा शहर मदीना मुनव्वरा

मस्जिद-ए-नबवी

मनाहा मैदान (ऊँटों का बाज़ार)

जन्नतुल बक़ी क़ब्रिस्तान

1. हज़रत इमाम मालिक और हज़रत नाफ़े का मज़ार

2. हज़रत अक़ील इब्ने अबी तालिब (हमारे नबी के चचाज़ाद भाई) और हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने जाफ़र तय्यार (हमारे नबी के चचा के पोते, जाफ़र तय्यार के बेटे) का मज़ार

3. अज़वाज-ए-मुतह्हरात का मज़ार:

इस मज़ार में हज़रत ख़दीजा और हज़रत मैमूना के सिवा नबी की तमाम बीवियाँ दफ़न हैं। हज़रत आइशा की क़ब्र भी इसी मज़ार में है; इसे क़ानूनी सुल्तान सुलेमान ने 1543 में नए सिरे से बनवाया।

4. हज़रत इब्राहीम इब्ने रसूलुल्लाह (रज़ियल्लाहु अन्हु) का मज़ार

हमारे नबी के अपने घराने में से जन्नतुल बक़ी में सबसे पहले दफ़न होने वाले आपके बेटे इब्राहीम थे, जिनका बचपन ही में इंतिक़ाल हो गया था।

हज़रत उस्मान इब्ने मज़ऊन जन्नतुल बक़ी में दफ़न होने वाले पहले सहाबी हैं। 5. बनातुन नबी का मज़ार: यहाँ नबी-ए-करीम की बेटियाँ हज़रत रुक़य्या, हज़रत उम्मे कुलसूम और हज़रत ज़ैनब (रज़ियल्लाहु अन्हुन्न) दफ़न हैं।

6. हज़रत फ़ातिमा बिन्ते असद (रज़ियल्लाहु अन्हा) का मज़ार

7. मुर्ज़िअतुल मुर्सलीन हज़रत हलीमा सादिया: यहाँ नबी-ए-करीम (अलैहिस्सलाम) की दूध पिलाने वाली माँ हज़रत हलीमा (रज़ियल्लाहु अन्हा) दफ़न हैं।

8. हज़रत उस्मान इब्ने अफ़्फ़ान (रज़ियल्लाहु अन्हु) का मज़ार: तीसरे ख़लीफ़ा हज़रत उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) का मज़ार 1205 में सलाहुद्दीन अय्यूबी ने बनवाया था। उस्मानियों के ज़माने में इसकी मरम्मत और देख-रेख की गई। 9. अहले बैत का मज़ार: इस मज़ार में हज़रत अब्बास (नबी-ए-करीम के चचा), हज़रत इमाम हसन मुज्तबा, हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन, हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर और हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (रज़ियल्लाहु अन्हुम) दफ़न हैं।

10. हज़रत फ़ातिमतुज़ ज़हरा का मज़ार
नोट:

जन्नतुल बक़ी में नबी-ए-करीम की चार बेटियाँ और एक बेटा दफ़न हैं। अब्दुर रहमान इब्ने औफ़, साद इब्ने अबी वक़्क़ास, अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद, सुहैब इब्ने सिनान, अबू हुरैरा, अबू सुफ़यान इब्ने हर्ब, साद इब्ने मुआज़ और सुफ़यान इब्ने हारिस (रज़ियल्लाहु अन्हुम) जन्नतुल बक़ी में दफ़न उन सहाबा में से सबसे नुमायाँ हैं जिनकी क़ब्रों की जगहें तस्वीर में नहीं दिखाई गईं। 1806 में मदीना पर क़ब्ज़ा होने पर जन्नतुल बक़ी की क़ब्रों के पत्थर और मज़ार ढा दिए गए। सुल्तान अब्दुल हमीद ख़ान सानी के ज़माने में क़ब्रों के पत्थर दुरुस्त किए गए और मज़ार नए सिरे से बनवाए गए। यह तस्वीर उसी तामीर के बाद खींची गई है।

लेकिन 1926 में हरमैन में उस्मानियों की ख़िदमत ख़त्म होने के बाद जन्नतुल बक़ी एक बार फिर उसी अंजाम से दो-चार हुआ।

जन्नतुल मुअल्ला क़ब्रिस्तान

1. ख़दीजतुल कुबरा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का मज़ार: नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की बीवी हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का जन्नतुल मुअल्ला में मौजूद मज़ार 1543 में क़ानूनी सुल्तान सुलेमान ने मक्का के नायब दाऊद पाशा की निगरानी में बनवाया।

इससे पहले मज़ार की जगह लकड़ी का एक संदूक़ था।

2. अजदाद-ए-रसूलुल्लाह का मज़ार: इस मज़ार में नबी-ए-करीम के दादा अब्दुल मुत्तलिब और परदादा अब्दे मनाफ़ की क़ब्रें हैं।

3. अबू तालिब का मज़ार

4. हमारे प्यारे नबी की मुबारक वालिदा हज़रत आमिना (रज़ियल्लाहु अन्हा) का मक़ाम (मज़ार)

हमारी माँ हज़रत आमिना की क़ब्र, सबसे मशहूर रिवायत के मुताबिक़, अबवा में है। लेकिन कुछ किताबों में यह भी रिवायत है कि उन्हें जन्नतुल मुअल्ला में मुंतक़िल किया गया था।

नोट:

इन मज़ारों की मरम्मत 1879 में सुल्तान अब्दुल हमीद ख़ान सानी ने करवाई।

एवलिया चेलेबी लिखते हैं कि उस्मानी दौर में जन्नतुल मुअल्ला में नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के दादा, चचा, दूसरे सहाबा और इस्लाम के बुज़ुर्गों के पचहत्तर मज़ार थे।

अरफ़ात का क़िब्ले की तरफ़ वाला दायाँ हिस्सा

मिना में ईदुल अज़हा

(13 नवंबर 1880)

उहुद पहाड़ पर हज़रत हमज़ा (रज़ियल्लाहु अन्हु) का मज़ार और मस्जिद

मस्जिद-ए-जबल-ए-ऐनिय्या: हज़रत हमज़ा (रज़ियल्लाहु अन्हु) यहीं शहीद हुए। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने यहाँ हथियारबंद और जंगी साज़-ओ-सामान पहने हुए नमाज़ पढ़ी थी।

मिना

हमीदिया मस्जिद – मक्का

हज़रत अय्यूब सुल्तान का घर

उस्मानी फ़ौजी बैरक – मक्का

तय्यिबा हम्माम – मदीना

रईसिया मीनार – मदीना

बाबुस सलाम – मदीना

एक उस्मानी इमारती शाहकार – मक्का

मक्का (दाईं तरफ़ की मस्जिद हमारे प्यारे नबी की पैदाइश का घर है।)