हक़ीक़ी मुसलमान होने की शर्तें
“इस्लाम” का लफ़्ज़ अरबी में “अपने नफ़्स को सौंप देना, सिर झुकाना, सलामती तक पहुँचना” और साथ ही “अमन” के मायने में आता है। इमाम-ए-आज़म (रहिमहुल्लाहु तआला) ने इस्लाम का मतलब यूँ बयान किया है: “अल्लाह तआला के हुक्मों के आगे ख़ुद को सौंप देना और सिर झुका देना।”
इससे यह बात ख़ुद-ब-ख़ुद सामने आ जाती है कि एक अच्छा मुसलमान कैसा होना चाहिए। हमारे आलिमों ने मुसलमान में पाई जाने वाली ख़ूबियों को यूँ बयान किया है: अच्छा मुसलमान सबसे पहले जिस्म और रूह के लिहाज़ से पाक-साफ़ होता है।
अल्लाह तआला क़ुरआन-ए-करीम में कई जगह फ़रमाता है: “मैं पाक-साफ़ रहने वालों को पसंद करता हूँ!” मुसलमान मस्जिदों और घरों में जूतों के साथ दाख़िल नहीं होते। उनके क़ालीन और फ़र्श धूल से पाक, साफ़ होते हैं। हर मुसलमान के घर में ग़ुस्लख़ाना होता है। वे ख़ुद, उनके कपड़े और उनके खाने हमेशा साफ़ होते हैं। इसलिए उनमें न जरासीम होते हैं, न बीमारी।
हक़ीक़ी मुसलमान अपनी सेहत की हिफ़ाज़त करना जानता है। वह शराब इस्तेमाल नहीं करता, जो हराम भी है और ज़हर भी। वह सूअर का गोश्त नहीं खाता, जिसके बहुत-से ख़तरे हैं और जिसे हराम क़रार देकर मना किया गया है।
हमारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने तिब्ब के इल्म की तरह-तरह से तारीफ़ फ़रमाई। मसलन आपने फ़रमाया: “इल्म दो हैं: जिस्म का इल्म और दीन का इल्म।” यानी इल्मों में सबसे ज़रूरी रूह की हिफ़ाज़त करने वाला दीन का इल्म और जिस्म की हिफ़ाज़त करने वाला सेहत का इल्म है – यह फ़रमाकर आपने हुक्म दिया कि सबसे पहले रूह और जिस्म की तंदुरुस्ती के लिए कोशिश करनी चाहिए। इस्लाम जिस्म का इल्म दीन के इल्म से पहले सीखने का हुक्म देता है, क्योंकि तमाम भलाइयाँ जिस्म के तंदुरुस्त होने से ही की जा सकती हैं। नबी-ए-करीम ने रूम के बादशाह हिरक़्ल को ख़त लिखकर इस्लाम क़बूल करने की दावत दी थी। हिरक़्ल ने ख़त का जवाब दिया था और बहुत-से तोहफ़े भेजे थे। उनमें से एक तबीब (डॉक्टर) भी था। तबीब ने आकर कहा: “हुज़ूर! बादशाह ने मुझे आपकी ख़िदमत के लिए भेजा है। मैं आपके बीमारों का मुफ़्त इलाज करूँगा!” नबी-ए-करीम ने क़बूल फ़रमा लिया। आपके हुक्म से उसे एक घर दिया गया। हर दिन उसके पास उम्दा खाने-पीने की चीज़ें पहुँचाई जाती रहीं। दिन और महीने गुज़र गए। कोई भी मुसलमान तबीब के पास नहीं आया। तबीब शर्मिंदा होकर आपकी ख़िदमत में हाज़िर हुआ और कहा: “हुज़ूर! मैं यहाँ ख़िदमत के लिए आया था। आज तक कोई भी बीमार नहीं आया। मैं ख़ाली बैठा रहा। खाया-पिया, आराम किया। अब मुझे जाने दीजिए।” जब उसने इस तरह इजाज़त माँगी, तो हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “तुम्हारी मर्ज़ी। अगर और रुको, तो मेहमान की ख़िदमत करना, उसकी ख़ातिरदारी करना मुसलमानों का फ़र्ज़ है। जाओ, तो भी तुम्हारा सफ़र मुबारक हो। लेकिन इतना जान लो कि अगर तुम यहाँ बरसों भी रहो, तो तुम्हारे पास कोई नहीं आएगा, क्योंकि मेरे सहाबा बीमार नहीं होते! दीन-ए-इस्लाम ने बीमार न होने का रास्ता दिखाया है। मेरे सहाबा सफ़ाई का बहुत ख़याल रखते हैं। भूख लगे बग़ैर कुछ नहीं खाते और पेट भरने से पहले दस्तरख़्वान से उठ जाते हैं।”
इसका मतलब यह नहीं कि मुसलमान कभी बीमार ही नहीं होता। लेकिन अपनी सेहत और सफ़ाई का ख़याल रखने वाला मुसलमान लंबे अरसे तक तंदुरुस्त रहता है और आसानी से बीमार नहीं पड़ता। मौत हक़ है। कोई भी मौत से बच नहीं सकता, और हर कोई किसी न किसी बीमारी के नतीजे में मरेगा। लेकिन उस वक़्त तक अपनी सेहत की हिफ़ाज़त कर पाना सिर्फ़ उन बातों की, जिनका इस्लाम में हुक्म दिया गया है, और सफ़ाई की पाबंदी की बदौलत होता है। अच्छा मुसलमान जिस्म की सफ़ाई का जितना ख़याल रखता है, रूह की सफ़ाई का भी उतना ही ख़याल रखता है। हमारे नबी ने फ़रमाया: “मैं अच्छी आदतों को पूरा करने, अच्छे अख़लाक़ को दुनिया में फैलाने के लिए भेजा गया हूँ।” एक हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “तुममें ईमान में सबसे बुलंद वह है जिसके अख़लाक़ सबसे अच्छे हैं।” यहाँ तक कि ईमान भी अख़लाक़ से नापा जाता है।
मुसलमान के लिए रूह की पाकीज़गी बुनियादी चीज़ है। जो शख़्स झूठ बोले, धोखेबाज़ी करे, लोगों को धोखा दे, ज़ुल्म करे, नाइंसाफ़ी करे, अपने दीनी भाइयों की मदद न करे, बड़ाई जताए और सिर्फ़ अपना फ़ायदा सोचे, वह चाहे कितनी ही इबादत करे, हक़ीक़ी मुसलमान नहीं गिना जा सकता। सूरह माऊन की पहली तीन आयतों में मफ़हूमन फ़रमाया गया है: “ऐ मेरे रसूल! क्या तुमने उस शख़्स को देखा जो क़यामत के दिन को झुठलाता है, यतीम को सताकर उसका हक़ छीन लेता है, फ़क़ीर को खाना नहीं खिलाता और दूसरों को भी फ़क़ीर के साथ भलाई करने पर नहीं उभारता?” ऐसे लोगों की इबादत क़बूल नहीं होती। दीन-ए-इस्लाम में मनाहियों से बचना हुक्मों को अदा करने से पहले आता है। हक़ीक़ी मुसलमान सबसे पहले एक पूरा और कामिल इंसान होता है। वह हँसमुख, मीठी ज़बान वाला और सच बोलने वाला होता है। ग़ुस्सा क्या चीज़ है, जानता ही नहीं।
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “जिसे नरमी दी गई, उसे दुनिया और आख़िरत की भलाइयाँ दे दी गईं।”
मुसलमान बेहद आजिज़ी वाला होता है। अपने पास आने वाले हर शख़्स की बात सुनता है और जहाँ तक हो सके मदद करता है। मुसलमान बावक़ार और शाइस्ता होता है। अपने घरवालों और अपने वतन से मुहब्बत करता है। हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया है: “वतन की मुहब्बत ईमान से है।”
अल्लाह तआला के बंदों को कैसा होना चाहिए, यह वह क़ुरआन-ए-करीम में यूँ बयान फ़रमाता है। सूरह फ़ुरक़ान की 63–69 आयात-ए-करीमा का बुलंद मफ़हूम यह है: “रहमान के (यानी अपने बंदों पर बहुत रहम करने वाले अल्लाह तआला के फ़ज़ीलत वाले) बंदे ज़मीन पर आजिज़ी और वक़ार के साथ चलते हैं। जब जाहिल उनसे उलझते हैं, तो वे उनसे (तुम्हें सलामती और अमन हो) जैसी अच्छी बातें कहकर सच्चाई और नरमी के साथ गुनाह से बचते हैं। अपने रब के लिए सज्दा और क़ियाम करते हुए (नमाज़ पढ़ते हुए) रातें गुज़ारते हैं (उसकी हम्द करते हैं)। वे कहते हैं: ‘ऐ हमारे रब! जहन्नम का अज़ाब हमसे दूर कर दे! बेशक उसका अज़ाब हमेशा का और दर्दनाक है। वह बिला शुबहा कैसी बुरी जगह और कैसा बुरा ठिकाना है!’ वे जब ख़र्च करते हैं, तो न फ़ुज़ूलख़र्ची करते हैं, न कंजूसी, बल्कि दोनों के बीच का रास्ता अपनाते हैं और किसी का हक़ नहीं मारते। वे अल्लाह तआला के साथ किसी को शरीक नहीं ठहराते। अल्लाह तआला ने जिस जान को हराम किया है, उस पर हाथ उठाकर किसी को क़त्ल नहीं करते। (सिर्फ़ मुजरिमों को सज़ा देते हैं।) ज़िना नहीं करते।” और 72–74 आयतों में: “झूठी गवाही नहीं देते। बेफ़ायदा और नुक़सानदेह कामों से बचते हैं। अगर इत्तिफ़ाक़ से किसी ऐसे बेफ़ायदा, नुक़सानदेह या ज़बरदस्ती कराए जाने वाले काम में जा पड़ें, तो मुँह फेरकर वक़ार के साथ अलग हो जाते हैं। जब उन्हें अल्लाह तआला की आयतें याद दिलाई जाती हैं, तो अंधों और बहरों की तरह अनदेखा-अनसुना नहीं करते। वे गिड़गिड़ाकर यूँ दुआ करते हैं: ‘ऐ हमारे रब! हमें हमारी बीवियों और हमारी औलाद में से ऐसे नेक लोग अता फ़रमा जो हमारी आँखों की ठंडक हों (हमारे वारिस और बेहतरीन जानशीन हों)! और हमें अल्लाह तआला की मुख़ालफ़त से बचने वालों का पेशवा बना!’”
इसके अलावा सूरह सफ़्फ़ की आयत 2 और 3 का बुलंद मफ़हूम यह है: “ऐ ईमान वालो! जो काम तुम करते नहीं, उसे क्यों कहते हो? जो तुमने नहीं किया, उसे ‘हमने किया’ कहना अल्लाह के नज़दीक बड़ी नाराज़गी का सबब है।” यह आयत बताती है कि अगर कोई शख़्स ऐसी चीज़ की मन्नत माने जिसे वह पूरा न कर सके, या ऐसा वादा करे जिसे वह निभा न सके, तो यह बात उसे अल्लाह के नज़दीक बुरा इंसान बना देगी।
“मैं अल्लाह तआला की क़सम खाता हूँ कि कोई शख़्स जो अपने लिए पसंद करता है, जब तक वही अपने दीनी भाई के लिए भी पसंद न करे, उसका ईमान पूरा नहीं होता” हदीस शरीफ़
हक़ीक़ी मुसलमान अपने दीन, अपनी माँ, अपने बाप, अपने उस्ताद, अपने अफ़सर, मुल्क के बड़ों और क़ानूनों का बेहद एहतिराम करता है। फ़ुज़ूल चीज़ों में नहीं उलझता। सिर्फ़ फ़ायदेमंद कामों में मशग़ूल रहता है। जुआ नहीं खेलता। अपना वक़्त बेकार नहीं गँवाता।
हक़ीक़ी मुसलमान अपनी इबादतें अदा करता है। अल्लाह तआला के शुक्र का क़र्ज़ अदा करता है। इबादत बस नाम के लिए, या सिर्फ़ इसलिए नहीं की जाती कि सिर से एक पाबंदी टल जाए। इबादत अल्लाह तआला की रज़ा के लिए की जानी चाहिए। अल्लाह तआला से डरने का मतलब उससे बहुत मुहब्बत करना है। जिस तरह इंसान नहीं चाहता कि उसका कोई बहुत प्यारा रंजीदा हो, और डरता है कि कहीं वह उसे रंजीदा न कर दे, उसी तरह अल्लाह तआला की इबादत भी इस तरह की जानी चाहिए कि उससे हमारी मुहब्बत साबित हो। अल्लाह तआला की हमें दी हुई नेमतें इतनी बड़ी हैं कि हम उनका हक़ सिर्फ़ उससे बहुत मुहब्बत करके और दिल-ओ-जान से उसकी इबादत करके ही अदा कर सकते हैं।
ये इबादतें तरह-तरह की हैं। इनमें से कुछ अल्लाह तआला और बंदे के बीच हैं। अल्लाह तआला अपनी इबादत में कोताही करने वालों को शायद माफ़ कर दे। दूसरों के हक़ का ख़याल रखना भी इबादत है। उनके साथ बुराई करने वालों को और जिन पर दूसरों का हक़ हो उन्हें, जब तक हक़ वाले माफ़ न करें, वह हरगिज़ माफ़ नहीं करता। हदीसों में फ़रमाया गया है:
“जो लोगों पर रहम नहीं करता, अल्लाह तआला उस पर रहम नहीं करता।”
“ज़ुल्म को रोककर ज़ालिम की भी और मज़लूम की भी मदद करो।”
“जिस क़मीज़ को ख़रीदने के लिए दी गई रक़म में दस में से नौ हिस्से हलाल और एक हिस्सा हराम हो, उस क़मीज़ में पढ़ी गई नमाज़ अल्लाह तआला क़बूल नहीं करता।”
“मुसलमान मुसलमान का भाई है। वह उस पर ज़ुल्म नहीं करता। उसकी मदद को दौड़ता है। उसे छोटा और अपने से कमतर नहीं समझता। उसके ख़ून, माल, आबरू और इज़्ज़त को नुक़सान पहुँचाना हराम है।”
“मैं अल्लाह तआला की क़सम खाता हूँ कि कोई शख़्स अपने साथ जो किया जाना पसंद करता है, जब तक वही अपने दीनी भाई के लिए भी पसंद न करे, उसका ईमान पूरा नहीं होता।”
“अल्लाह की क़सम! जिसकी बुराई से उसका पड़ोसी महफ़ूज़ न हो, उसका ईमान नहीं (यानी वह हक़ीक़ी मोमिन नहीं)।”
दुनिया में सआदत, भलाइयों और सुकून तक पहुँचने और आख़िरत में अज़ाबों से बचने के लिए दो काम करने ज़रूरी हैं।
पहला, अल्लाह तआला के हुक्मों को अदा करना। दूसरा, उसकी मना की हुई चीज़ों से बचना। दूसरा पहले से ज़्यादा अहम और ज़्यादा फ़ायदेमंद है। मनाहियों से बचने का फ़र्ज़ पूरी तरह निभा पाने के लिए ज़रूरी है कि मुबाह, यानी इजाज़त वाली चीज़ें हद से ज़्यादा न की जाएँ, ज़रूरत की मिक़दार से बाहर न निकला जाए, क्योंकि मुबाह करने में हद से बढ़ जाना इंसान को हराम की तरफ़ खींच ले जाता है। इस्लामी आलिमों ने फ़रमाया है: “गुनाह करने वालों का सिर झुकाना हुक्म अदा करने वालों के फ़ख़्र करने से ज़्यादा प्यारा है।”
गुनाहों से बचना भी दो क़िस्म का है। पहला, अल्लाह तआला के हक़ों से मुताल्लिक़ मनाहियों से बचना। दूसरा, उन मनाहियों से बचना जिनमें बंदों के हक़ शामिल हों। दूसरा ज़्यादा अहम है, क्योंकि अल्लाह तआला किसी चीज़ का मोहताज नहीं और बहुत रहम करने वाला है, जबकि इंसान बहुत मोहताज और कंजूस हैं। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) फ़रमाते हैं:
“जिस पर किसी बंदे का हक़ हो, जिसने मख़लूक़ के माल या आबरू को हाथ लगाया हो, वह मरने से पहले उससे माफ़ करा ले, क़र्ज़ अदा कर दे! आख़िरत के जिस दिन पैसा और माल काम नहीं आएगा, उस दिन बंदे का हक़ सिर पर लेकर न जाए! उस दिन उसकी दुनिया में की हुई इबादतें हक़ वाले को दे दी जाएँगी। इबादत न हो या ख़त्म हो जाए, तो हक़ वाले के गुनाह उस पर लाद दिए जाएँगे।” एक बार आपने अपने पास बैठे लोगों से फ़रमाया: “क्या तुम जानते हो कि मुफ़लिस कौन है?” उन्होंने कहा: “जिसका पैसा और पूँजी ख़त्म हो जाए।” तब आपने फ़रमाया: “अच्छी तरह जान लो कि मुफ़लिस वह है जिसने दुनिया में नमाज़ पढ़ी हो, रोज़ा रखा हो, ज़कात दी हो, मगर लोगों को गाली दी हो, उनकी ग़ीबत की हो, दूसरों का माल खाया हो, किसी की जान ली हो, किसी को पीटा हो, ज़ख़्मी किया हो। आख़िरत में उसकी नेकियाँ हक़ वालों को दे दी जाएँगी; नेकियाँ ख़त्म हो गईं, तो हक़ वालों के गुनाह उस पर लादकर उसे जहन्नम में फेंक दिया जाएगा।”
हज़रत मुहम्मद मासूम फ़ारूक़ी सरहिंदी अपनी किताब “मकतूबात” की दूसरी जिल्द के 110वें मकतूब में फ़रमाते हैं: “गुनाह करते ही फ़ौरन तौबा करनी चाहिए। छिपे गुनाह की तौबा छिपकर और खुलेआम किए गए गुनाह की तौबा खुलेआम होती है। तौबा में देर नहीं करनी चाहिए। किरामन कातिबीन फ़रिश्ते गुनाह को फ़ौरन नहीं लिखते। तौबा कर ली जाए, तो बिल्कुल नहीं लिखा जाता। तौबा न की जाए, तो लिख देते हैं। जाफ़र इब्ने सिनान (क़ुद्दिसा सिर्रुहू) ने फ़रमाया: ‘जिसने गुनाह से तौबा नहीं की, उसे मरने से पहले तौबा कर लेनी चाहिए।’ वरअ और तक़्वा को हाथ से नहीं छोड़ना चाहिए। तक़्वा खुले तौर पर मना की गई चीज़ों को न करना है, और वरअ शक वाली चीज़ों को भी न करना। मना की गई चीज़ों से बचना उन कामों को करने से ज़्यादा फ़ायदेमंद है जिनका हुक्म दिया गया है। हमारे बुज़ुर्गों ने फ़रमाया: ‘भलाई तो अच्छे भी करते हैं और बुरे भी। मगर गुनाह से सिर्फ़ सिद्दीक़ और अच्छे लोग ही बचते हैं…’ हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: ‘क़यामत के दिन अल्लाह तआला के हुज़ूर पहुँचने वाले वरअ और ज़ुह्द वाले हैं।’ एक और हदीस शरीफ़ में: ‘वरअ वाले की नमाज़ क़बूल होती है’, और एक दूसरी हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: ‘वरअ वाले के साथ रहना इबादत है। उससे बात करना सदक़ा देने जितने सवाब का काम है।’ जिन कामों में शक हो, उनमें अपने दिल से मशवरा करो! जिस काम से तुम्हारा दिल खटके, उसे मत करो! अपने नफ़्स के पीछे मत चलो!”
“हिकमत के दस हिस्से हैं। उनमें से नौ उज़्लत (तन्हाई) में हैं और एक कम बोलने में” हदीस शरीफ़
हदीसों में फ़रमाया गया है: “जो काम नफ़्स को सुकून और दिल को राहत दे, वह अच्छा काम है। जो काम नफ़्स को भड़काए और दिल में बेचैनी पैदा करे, वह गुनाह है।” “हलाल चीज़ें ज़ाहिर हैं, हराम भी बता दिए गए हैं। शक वाली चीज़ों से बचो। जिन्हें तुम बिना शक के जानते हो, उन्हें करो!” ये हदीसें बताती हैं कि जिस चीज़ में शक हो और जो दिल को तंग करे, उसे नहीं करना चाहिए। जिसमें शक न हो, उसे करना जाइज़ है। एक हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “अल्लाह तआला ने क़ुरआन-ए-करीम में जो चीज़ें हलाल की हैं, वे हलाल हैं। जो चीज़ें उसने क़ुरआन-ए-करीम में नहीं बताईं, उन्हें वह माफ़ करता है।” किसी शक वाली चीज़ से सामना हो, तो हाथ दिल पर रखना चाहिए। अगर दिल की धड़कन न बढ़े, तो वह काम कर लेना चाहिए। अगर धड़कन ज़्यादा हो जाए, तो नहीं करना चाहिए। हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “अपना हाथ अपने सीने पर रखो! हलाल चीज़ में दिल पुरसुकून रहता है। हराम चीज़ में दिल धड़कने लगता है। शक हो जाए, तो मत करो। चाहे दीन के आलिम फ़तवा भी दे दें, फिर भी मत करो!”
ईमान वाला बड़े गुनाह में न पड़ने के लिए छोटे गुनाह से भी बचता है। अपनी तमाम इबादतों और भलाइयों को कोताही भरा समझना चाहिए। यही सोचना चाहिए कि मैंने अल्लाह तआला के हुक्म पूरे तौर पर अदा नहीं किए। अबू मुहम्मद अब्दुल्लाह इब्ने मनाज़िल (क़ुद्दिसा सिर्रुहू) ने फ़रमाया: “अल्लाह तआला ने तरह-तरह की इबादतें बताईं। उसने सब्र, सच्चाई, नमाज़, रोज़े और सहर के वक़्तों में इस्तिग़फ़ार करने का हुक्म दिया। इस्तिग़फ़ार को सबसे आख़िर में बयान किया। इस तरह बंदे के लिए ज़रूरी हो गया कि अपनी इबादतों और भलाइयों को कोताही भरा देखकर उन सबके लिए माफ़ी और मग़फ़िरत माँगे।”
जाफ़र इब्ने सिनान ने फ़रमाया: “इबादत और भलाई करने वालों का ख़ुद को गुनाह करने वालों से बेहतर समझना, उनके गुनाहों से भी ज़्यादा बुरा है।”
हज़रत अली मुर्तइश मुबारक रमज़ान की बीसवीं तारीख़ के बाद एतिकाफ़ छोड़कर मस्जिद से बाहर निकल आए। लोगों ने पूछा: “आप क्यों निकल आए?” तो उन्होंने फ़रमाया: “हाफ़िज़ों को तग़न्नी (गाने के अंदाज़) से पढ़ते और इस पर फ़ख़्र करते देखकर मैं अंदर न ठहर सका।”
अपनी और अपने बाल-बच्चों की रोज़ी हलाल से कमाने के लिए मेहनत करनी चाहिए। इसके लिए तिजारत या कोई हुनर अपनाना ज़रूरी है। सलफ़-ए-सालिहीन (रहमतुल्लाहि तआला अलैहिम अजमईन) हमेशा इसी तरह मेहनत करके कमाते थे। हलाल कमाई का सवाब बताने वाली बहुत-सी हदीसें हैं। हज़रत मुहम्मद इब्ने सालिम से पूछा गया: “हम मेहनत करके कमाएँ, या सिर्फ़ इबादत करें और तवक्कुल करें?” तो उन्होंने फ़रमाया: “तवक्कुल करना रसूलुल्लाह का हाल है, और मेहनत करके कमाना आपकी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) सुन्नत है। मेहनत भी करो और तवक्कुल भी करो।”
अबू मुहम्मद इब्ने मनाज़िल ने फ़रमाया: “मेहनत के साथ तवक्कुल करना, किसी कोने में बैठकर इबादत करने से बेहतर है।” खाने-पीने में एतिदाल, यानी दरमियानी हालत का ख़याल रखना चाहिए। इतना ज़्यादा नहीं खाना चाहिए कि सुस्ती आ जाए, और न इतना परहेज़ करना चाहिए कि इबादत ही न कर सके। बड़े औलिया में से शाह नक़्शबंद (क़ुद्दिसा सिर्रुहू) ने फ़रमाया: “अच्छा खाओ, अच्छा काम करो!” मुख़्तसर यह कि इबादत और भलाई करने में मदद देने वाली हर चीज़ अच्छी और मुबारक है। हर अच्छे काम में नीयत का ध्यान रखना चाहिए। जब तक अच्छी नीयत न हो, वह काम नहीं करना चाहिए।
इस्लाम की पैरवी न करने वालों से, बिदअत और गुनाह करने वालों से दूर रहना चाहिए और उनसे मेल-जोल नहीं रखना चाहिए। हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “हिकमत के दस हिस्से हैं। उनमें से नौ उज़्लत (तन्हाई) में हैं और एक कम बोलने में है।”
ऐसे लोगों से ज़रूरत भर ही मिलना चाहिए। मौज-मस्ती का वक़्त मरने के बाद है। नेक, पाक मुसलमानों (रहमतुल्लाहि तआला अलैहिम अजमईन) से मिलना चाहिए, उन्हें फ़ायदा पहुँचाना और उनसे फ़ायदा उठाना चाहिए। फ़ुज़ूल, बेफ़ायदा बातों में वक़्त ज़ाया नहीं करना चाहिए।
अच्छे-बुरे हर एक से हँसमुख चेहरे के साथ मिलना चाहिए। फ़ितना खड़ा नहीं करना चाहिए, दुश्मन नहीं बनाने चाहिए। हाफ़िज़ शीराज़ी की इस बात पर चलना चाहिए: “दोस्तों से सच कहना चाहिए, और दुश्मनों से हँसमुख चेहरे और मीठी ज़बान से निबाह करना चाहिए।” माफ़ी माँगने वालों को माफ़ कर देना चाहिए। हर एक के साथ अच्छे अख़लाक़ से पेश आना चाहिए। किसी की बात काटनी नहीं चाहिए, बहस नहीं करनी चाहिए। हर एक से नरमी से बोलना चाहिए, सख़्ती से नहीं।
शैख़ अब्दुल्लाह बयाल (क़ुद्दिसा सिर्रुहू) ने फ़रमाया: “तसव्वुफ़ नमाज़, रोज़ा और रातों को इबादत करने का नाम नहीं। इन्हें करना तो हर इंसान का बंदगी का फ़र्ज़ है। तसव्वुफ़ लोगों को तकलीफ़ न देना है। जिसने यह पा लिया, वह मंज़िल तक पहुँच गया।”
लोगों ने हज़रत मुहम्मद इब्ने सालिम से पूछा कि औलिया को दूसरे लोगों से कैसे पहचाना जाए। उन्होंने फ़रमाया: “वे अपनी बातों की नरमी, अपनी आदतों की ख़ूबी और अपने चेहरों के हँसमुख होने से, अपने एहसान की कसरत से, बातचीत में एतिराज़ न करने से, माफ़ी माँगने वालों को माफ़ कर देने से और हर एक पर रहम करने से पहचाने जाते हैं।”
अबू अहमद मक्कारी ने भी फ़रमाया: “फ़ुतुव्वत (जवाँमर्दी) का मतलब है उस शख़्स के साथ भलाई करना जिससे तुम्हें रंज पहुँचा हो, जिसे तुम पसंद नहीं करते उस पर एहसान करना और जिससे तुम तंग आ गए हो उसके साथ हँसमुख रहना।”
कम बोलना, कम सोना और कम हँसना चाहिए। क़हक़हा लगाकर हँसना दिल को स्याह कर देता है। मेहनत करनी चाहिए, मगर उसका बदला अल्लाह तआला से चाहना चाहिए। उसके हुक्म अदा करने में लज़्ज़त महसूस करनी चाहिए। जब इंसान सिर्फ़ उसी पर भरोसा करे, तो वह उसकी हर मुराद पूरी कर देता है। हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “अल्लाह तआला सिर्फ़ अपने ऊपर भरोसा करने वाले की हर मुराद पूरी करता है और तमाम लोगों को उसका मददगार बना देता है।”
यह्या इब्ने मुआज़ राज़ी ने फ़रमाया: “तुम अल्लाह तआला से जितनी मुहब्बत करोगे, हर कोई तुमसे उतनी ही मुहब्बत करेगा। अल्लाह तआला से जितना डरोगे, हर कोई तुमसे उतना ही डरेगा। अल्लाह तआला की जितनी बंदगी करोगे, हर कोई उतनी ही तुम्हारी मदद करेगा। अपने फ़ायदों के पीछे मत भागो।”
अबू मुहम्मद अब्दुल्लाह राशी (रहमतुल्लाहि तआला अलैहि) ने फ़रमाया: “अल्लाह तआला और इंसान के बीच सबसे बड़ा पर्दा इंसान का अपने नफ़्स के बारे में सोचना और अपने ही जैसे किसी आजिज़ बंदे पर भरोसा करना है। लोगों की नहीं, अल्लाह तआला की मुहब्बत पाने की फ़िक्र करनी चाहिए।” घरवालों और बच्चों के साथ मीठी ज़बान और हँसमुख चेहरे से पेश आना चाहिए। उनके हक़ अदा कर सकने जितना उनके बीच रहना चाहिए। लेकिन उनसे इतना दिल नहीं लगाना चाहिए कि अल्लाह तआला से मुँह फिर जाए।
दीन के कामों में उन लोगों से मशवरा नहीं करना चाहिए जो दीन के आलिम कहलाते हैं, मगर जाहिल और फ़ासिक़ हैं। दुनिया पर जान देने वालों के साथ नहीं रहना चाहिए। हर काम में सुन्नत की पैरवी करनी चाहिए और बिदअत से बचना चाहिए। ख़ुशी के वक़्तों में इस्लाम की हदों से बाहर नहीं निकलना चाहिए, तकलीफ़ के लम्हों में अल्लाह तआला से उम्मीद नहीं तोड़नी चाहिए। यह नहीं भूलना चाहिए कि हर मुश्किल के साथ आसानी है। ख़ुशी और तकलीफ़ में हाल नहीं बदलना चाहिए; अमीरी और ग़रीबी में एक ही हाल में रहना चाहिए। बल्कि ग़रीबी में राहत और अमीरी में बेचैनी महसूस करनी चाहिए। हालात का बदलना इंसान को नहीं बदलना चाहिए।
“जिसके घरवाले ज़्यादा हों, रोज़ी कम हो, और वह अपनी नमाज़ें अच्छी तरह पढ़े और ग़ीबत न करे, वह क़यामत के दिन मेरे पास होगा” हदीस शरीफ़
किसी के ऐब की तरफ़ नहीं देखना चाहिए, अपने ऐब देखने चाहिए। ख़ुद को किसी भी मुसलमान से बेहतर नहीं समझना चाहिए। हर मुसलमान को अपने से बेहतर समझना चाहिए। यह यक़ीन रखना चाहिए कि हर मुसलमान की दुआ से सआदत नसीब हो सकती है। जिनका अपने ऊपर हक़ हो, उनके ग़ुलाम की तरह रहना चाहिए। हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “तीन काम करने वाले मुसलमान का ईमान कामिल है: अपने घरवालों की ख़िदमत करना, फ़क़ीरों के बीच बैठना (भिखारियों के बीच नहीं) और अपने ख़ादिम के साथ खाना खाना।” क़ुरआन-ए-करीम में बताया गया है कि ये तीन बातें मोमिनों की अलामत हैं। सलफ़-ए-सालिहीन के हालात सीखने चाहिए, उन जैसा बनने की कोशिश करनी चाहिए। किसी की ग़ीबत नहीं करनी चाहिए, ग़ीबत करने वाले को रोकना चाहिए। (किसी की पीठ पीछे ऐसी बात कहना जिसे सुनकर उसे दुख पहुँचे, अगर बात सच हो तो ग़ीबत है, और झूठ हो तो बोहतान। दोनों बड़े गुनाह हैं।) अम्र बिल मारूफ़ व नह्य अनिल मुनकर को अपनी आदत बना लेना चाहिए।
हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “जिसके घरवाले ज़्यादा हों, रोज़ी कम हो, और वह अपनी नमाज़ें अच्छी तरह पढ़े और ग़ीबत न करे, वह क़यामत के दिन मेरे पास होगा।” मुसलमान अपने मुसलमान भाई की ज़रूरतें पूरी करता है, उसे ख़ुश करता है। चुनाँचे नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “मुसलमान मुसलमान का भाई है। वे एक-दूसरे को तकलीफ़ नहीं देते, रंजीदा नहीं करते। जो अपने दीनी भाई के किसी काम में मदद करे, अल्लाह तआला भी उसका काम आसान कर देता है। जो किसी मुसलमान की तकलीफ़ दूर करे, उसे ख़ुश करे, अल्लाह तआला क़यामत के दिन की सबसे सख़्त घड़ियों में उसे तकलीफ़ से नजात देता है। जो किसी मुसलमान के ऐब और कमी पर पर्दा डाले, अल्लाह तआला क़यामत के दिन उसके ऐब पर पर्दा डालता है।” “जो अपने दीनी भाई का मददगार बने, अल्लाह तआला भी उसका मददगार बन जाता है।”
“अल्लाह तआला ने अपने कुछ बंदों को इसलिए पैदा किया है कि वे बंदों की ज़रूरतें पूरी करें, उनके मददगार बनें। ज़रूरतमंद उन्हीं के पास जाते हैं। उनके लिए आख़िरत में अज़ाब का कोई डर नहीं होगा।”
“जो अपने दीनी भाई का कोई काम करने के लिए जाए, उसके हर क़दम पर उसके बहुत-से गुनाह माफ़ किए जाते हैं और सत्तर सवाब दिए जाते हैं। काम पूरा होने तक यही सिलसिला चलता रहता है। काम हो जाने पर उसके सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं। अगर यह काम करते हुए मर जाए, तो बिना सवाल-जवाब के जन्नत में जाता है।”
“जो अपने दीनी भाई को राहत दिलाने या उसे तकलीफ़ से छुड़ाने के लिए हुकूमत के लोगों के पास जाकर कोशिश करे, क़यामत के दिन जब पुल-सिरात पर हर एक के पाँव फिसल रहे होंगे, अल्लाह तआला उसे तेज़ी से पार होने में मदद करता है।”
“अपने दीनी भाई के साथ हँसमुख रहना, उसे अच्छी बातें सिखाना, उसे बुराई करने से रोकना, अजनबी को वह जगह बता देना जिसे वह ढूँढ रहा हो, रास्ते से पत्थर, काँटा, हड्डी और इसी तरह की नुक़सानदेह, भद्दी और गंदी चीज़ें हटा देना, दूसरों को पानी पिलाना – ये सब सदक़ा है” हदीस शरीफ़
“अल्लाह तआला को सबसे प्यारा काम किसी मोमिन को कपड़ा देकर, या खाना खिलाकर, या उसकी कोई और ज़रूरत पूरी करके ख़ुश करना है।”
“जब कोई शख़्स किसी मोमिन के साथ भलाई करता है, तो अल्लाह तआला एक फ़रिश्ता पैदा करता है। वह फ़रिश्ता हमेशा इबादत करता रहता है। उसकी इबादतों का सवाब उस शख़्स को दिया जाता है। जब यह शख़्स मरकर क़ब्र में रखा जाता है, तो वह फ़रिश्ता नूरानी और प्यारी सूरत में उसकी क़ब्र पर आता है। फ़रिश्ते को देखकर वह शख़्स राहत पाता है, ख़ुश हो जाता है और पूछता है: ‘तुम कौन हो?’ फ़रिश्ता कहता है: ‘मैं वह भलाई हूँ जो तुमने फ़लाँ शख़्स के साथ की थी, और वह ख़ुशी हूँ जो तुमने उसके दिल में डाली थी। अल्लाह तआला ने मुझे आज तुम्हें ख़ुश करने, तुम्हारी शफ़ाअत करने और जन्नत में तुम्हारी जगह तुम्हें दिखाने के लिए भेजा है।’”
“इंसान अपने अच्छे अख़लाक़ की वजह से जन्नत के सबसे ऊँचे दर्जों तक पहुँचता है। (नफ़्ल) इबादतें इंसान को इन दर्जों तक नहीं पहुँचा सकतीं। बुरे अख़लाक़ इंसान को जहन्नम के सबसे निचले गढ़ों में खींच ले जाते हैं।” “सलाम करते वक़्त हँसमुख रहने वाले को वह सवाब दिया जाता है जो सदक़ा देने वालों को मिलता है।”
“अपने दीनी भाई के साथ हँसमुख रहना, उसे अच्छी बातें सिखाना, उसे बुराई करने से रोकना, अजनबी को वह जगह बता देना जिसे वह ढूँढ रहा हो, रास्ते से पत्थर, काँटा, हड्डी और इसी तरह की नुक़सानदेह, भद्दी और गंदी चीज़ें हटा देना, दूसरों को पानी पिलाना – ये सब सदक़ा है।”
“जन्नत में ऐसे महल हैं कि उनमें रहने वाला जो जगह चाहे देखता है, और जहाँ चाहे अपने आपको दिखाता है।” अबू मालिक अशअरी ने पूछा: “ऐसे महल किन्हें दिए जाएँगे?” तो नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “जो मीठी बात करने वाले, खुले हाथ वाले हों, और जब सब सो रहे हों, तब अल्लाह तआला के वुजूद और उसकी बड़ाई पर ग़ौर करते हों और उससे गिड़गिड़ाकर दुआ करते हों, उन्हें दिए जाएँगे।”
हक़ीक़ी मुसलमान बातिल अक़ीदों पर यक़ीन नहीं करता। वह जादू, बदशगुनी, फ़ाल, झाड़-फूँक, ऐसे तावीज़ों को जिनमें क़ुरआन-ए-करीम के सिवा कुछ और लिखा हो, नीले मनकों, कहानत और ऐसी ही चीज़ों को, और इस बात को कि ये ज़रूर असर करती हैं, क़ब्रों पर मोमबत्तियाँ जलाने और तार-धागे बाँधने को कोई अहमियत नहीं देता, और करामत वाला होने का दावा करने वाले धोखेबाज़ों के धोखे में नहीं आता। ये बातिल और बिगड़ी हुई चीज़ें ज़्यादातर असल में दूसरे दीनों से हम तक पहुँची हैं। जो लोग कुछ दीनी बुज़ुर्गों से “करामत” की उम्मीद रखते हैं, उनसे बड़े इस्लामी आलिम इमाम रब्बानी (रहिमहुल्लाहु तआला) यूँ फ़रमाते हैं: “लोग दीनी बुज़ुर्गों से करामत की उम्मीद रखते हैं। इनमें से कुछ की कोई करामत नहीं होती, मगर वे दूसरों से ज़्यादा अल्लाह तआला के क़रीब होते हैं। सबसे बड़ी करामत इस्लाम को सीखना और उसके मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ार पाना है।”
लोग दूसरे दीन के हों तब भी उनसे हमेशा मीठी ज़बान और समझदारी के साथ बात करने का क़ुरआन-ए-करीम में हुक्म दिया गया है। फ़िक़्ह की किताबों में लिखा है कि जो मुसलमान नहीं, उसके मुँह पर “काफ़िर”, “बेदीन” कहकर उसका दिल दुखाना गुनाह है और ऐसा कहने वाले को सज़ा दी जानी चाहिए। मक़सद हर एक को दीन-ए-इस्लाम की बुलंदी समझाना है। यह जिहाद भी सिर्फ़ मीठी ज़बान, सब्र, इल्म और ईमान से होता है। जो किसी को किसी बात का यक़ीन दिलाना चाहे, उसके लिए शर्त है कि पहले वह ख़ुद उस पर यक़ीन रखे। मोमिन तो कभी अपना सब्र नहीं खोता और जिस पर ईमान रखता है, उसे समझाने में दिक़्क़त महसूस नहीं करता। दीन-ए-इस्लाम जैसा साफ़ और अक़्ल के मुताबिक़ कोई दीन नहीं। यह बात आसानी से साबित की जा सकती है कि यही अकेला सच्चा दीन है। मुख़्तसर यह कि हक़ीक़ी मुसलमान तमाम अच्छी आदतों वाला, बावक़ार, अच्छे किरदार वाला, जिस्म और रूह के लिहाज़ से पाक, हर तरह के भरोसे के लायक़, कामिल इंसान है। अगर तमाम इंसान दीन-ए-इस्लाम क़बूल कर लें, तो दुनिया में न बुराई रहे, न धोखेबाज़ी, न जंग, न तशद्दुद, न ज़ुल्म। इसलिए पूरा और कामिल मुसलमान बनने की कोशिश करना और इस्लाम की बुनियादें और उसकी बारीकियाँ समझाकर उसे पूरी दुनिया में फैलाना तमाम मुसलमानों के ज़िम्मे क़र्ज़ है।
