नबी-ए-करीम की औलाद
नबी-ए-करीम की सात औलाद हुईं: तीन बेटे और चार बेटियाँ। हज़रत फ़ातिमा के सिवा सबका इंतिक़ाल रसूलुल्लाह से पहले हो गया। हमारे प्यारे नबी की नस्ल हमारी माँ हज़रत फ़ातिमा से चली। आपके नवासे हज़रत हुसैन की नस्ल को सैयद और हज़रत हसन की नस्ल को शरीफ़ कहा जाता है। सैयदों और शरीफ़ों की इज़्ज़त करना नबी-ए-करीम की इज़्ज़त करना है। सैयदों और शरीफ़ों से मुहब्बत करना आख़िरी साँस में ईमान के साथ जाने का सबब बनता है।
क़ासिम (रज़ियल्लाहु अन्हु): वह रसूलुल्लाह के तीन बेटों में सबसे पहले हैं। इसी लिए रसूलुल्लाह को “अबुल क़ासिम” कहा गया। वह नुबुव्वत से पहले मक्का में पैदा हुए। उनकी वालिदा ख़दीजतुल कुबरा हैं। सत्रह महीने की उम्र में उनका इंतिक़ाल हो गया।1
ज़ैनब (रज़ियल्लाहु अन्हा): वह रसूलुल्लाह की चार बेटियों में सबसे पहली हैं। वह उस वक़्त पैदा हुईं जब हमारे नबी तीस साल के थे। नुबुव्वत से पहले उनका निकाह उनकी वालिदा ख़दीजा की बहन के बेटे अबुल आस इब्ने रबी से हुआ।2 अबुल आस पहले ईमान नहीं लाए थे। वह बद्र के ग़ज़वे में क़ैद हुए और इस शर्त पर रिहा किए गए कि अपनी बीवी को मदीना भेज देंगे। उन्होंने उन्हें अपने भाई के साथ भेजा, लेकिन काफ़िरों ने ज़ैनब को रास्ते से वापस लौटा दिया। रसूल अलैहिस्सलाम ने ज़ैद इब्ने हारिसा को मक्का भेजा, और ज़ैनब को रात के वक़्त छिपाकर मदीना ले आया गया। अबुल आस हुदैबिया के सफ़र के बाद ईमान ले आए। ज़ैनब फिर उन्हीं को लौटा दी गईं। हिजरत के आठवें साल, इकतीस साल की उम्र में उनका इंतिक़ाल हुआ। उनके दो बच्चे रह गए। एक अली थे, जिनका इंतिक़ाल बालिग़ होने के क़रीब की उम्र में हुआ। दूसरी उमामा थीं। ज़ैनब ने फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अन्हा) को वसीयत करके अपने बच्चे इमाम अली के सुपुर्द किए थे। उनके बेटे अली मक्का की फ़तह के दिन रसूलुल्लाह के ऊँट पर आपके पीछे बैठे थे। उमामा से हज़रत अली ने ख़ुद निकाह किया।3
रुक़य्या (रज़ियल्लाहु अन्हा): वह रसूलुल्लाह की दूसरी बेटी हैं। वह उस वक़्त पैदा हुईं जब हमारे नबी तैंतीस साल के थे। उनकी वालिदा ख़दीजतुल कुबरा हैं। वह बहुत ख़ूबसूरत थीं। वह हज़रत उस्मान की ज़ौजा हैं। पहले उनकी मंगनी अबू लहब के बेटे उत्बा से हुई थी। अबू लहब और उसकी बीवी ने रसूलुल्लाह को तकलीफ़ पहुँचाने के लिए अपने बेटे से यह मंगनी तुड़वा दी। जब सूरह “तब्बत यदा” उतरी, तो उत्बा ने शादी से पहले ही उन्हें छोड़ दिया। वह्य आई, और उनका निकाह हज़रत उस्मान से कर दिया गया। दोनों ने साथ मिलकर दो बार हब्शा की तरफ़ और फिर मदीना मुनव्वरा की तरफ़ हिजरत की। बद्र के ग़ज़वे से पहले, बाईस साल की उम्र में हज़रत रुक़य्या बीमार पड़ गईं। हज़रत उस्मान को हुक्म दिया गया कि बद्र न जाएँ और अपनी बीवी की तीमारदारी करें। जिस दिन बद्र की फ़तह की ख़ुशख़बरी मदीना मुनव्वरा पहुँची, उसी दिन उनका इंतिक़ाल हुआ और उसी दिन उन्हें दफ़न किया गया।4
उम्मे कुलसूम (रज़ियल्लाहु अन्हा): वह रसूलुल्लाह की तीसरी बेटी हैं। उनकी मंगनी अबू लहब के दूसरे बेटे उतैबा से हुई थी। जब सूरह “तब्बत यदा” उतरी, तो उतैबा ने उनकी शादी होने से पहले ही उन्हें छोड़ दिया और रसूलुल्लाह को दुख देने वाली बातें कहीं। इस पर रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उसके लिए यह बद्दुआ फ़रमाई: “या रब! इस पर अपने दरिंदों में से एक दरिंदा मुसल्लत कर दे!” शाम के रास्ते में एक शेर ने उसे चीर-फाड़ डाला। रुक़य्या के इंतिक़ाल के बाद वह्य आई, और उम्मे कुलसूम का निकाह भी हज़रत उस्मान से कर दिया गया। हिजरत के नौवें साल उनका इंतिक़ाल हुआ। उनके जनाज़े की नमाज़ रसूलुल्लाह ने पढ़ाई, और जब उन्हें दफ़न किया जा रहा था, तो आप उनकी क़ब्र के पास खड़े थे और आपकी मुबारक आँखों से आँसू बह रहे थे।5
फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अन्हा): वह रसूलुल्लाह की चौथी बेटी, हज़रत अली की ज़ौजा और हज़रत उमर की सास हैं। निकाह के वक़्त उनकी उम्र पंद्रह साल थी।6 “मवाहिब-ए-लदुन्निया” किताब में, सवीक़ के ग़ज़वे वाले बाब में लिखा है कि उनका महर चार सौ मिस्क़ाल चाँदी था। यह 57.14 मिस्क़ाल सोने के बराबर है। (आज के हिसाब से यह सोने के 38 लीरा होते हैं।) अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) उस वक़्त पच्चीस साल के थे। वह अहले बैत में से हैं। फ़ातिमा गोरी और बहुत ख़ूबसूरत थीं। वह हिजरत से तेरह साल पहले मक्का में पैदा हुईं और हिजरत के ग्यारहवें साल चौबीस साल की उम्र में उनका इंतिक़ाल हुआ। उनके हसन, हुसैन और मुहसिन नाम के तीन बेटे और उम्मे कुलसूम और ज़ैनब नाम की दो बेटियाँ हुईं।7
रसूलुल्लाह की नस्ल फ़ातिमा से चली। ज़ैनब का निकाह अब्दुल्लाह इब्ने जाफ़र तय्यार से हुआ, और उनके अली और उम्मे कुलसूम नाम के बच्चे हुए। इन्हें शरीफ़-ए-जाफ़री कहा जाता है।
“मेरे अहले बैत नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती की तरह हैं। जो इनकी पैरवी करेगा, नजात पाएगा। बाक़ी हलाक हो जाएँगे” हदीस शरीफ़
1. जन्नतुल बक़ी – मदीना मुनव्वरा
2. अहले बैत
3. बनातुन नबी (नबी-ए-करीम की बेटियाँ)
4. शुहदाउल बक़ी (जन्नतुल बक़ी के शहीद)
5. अज़वाजुन नबी (नबी-ए-करीम की बीवियाँ)
6. इमाम मालिक
जन्नतुल बक़ी के मक़बरे गिराए जाने से पहले
अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अन्हु): वह रसूलुल्लाह की ख़दीजतुल कुबरा से होने वाली आख़िरी औलाद हैं। वह नुबुव्वत के बाद पैदा हुए और दूध पीने की उम्र ही में उनका इंतिक़ाल हो गया। उन्हें तय्यिब और ताहिर भी कहा जाता है। जब अब्दुल्लाह का इंतिक़ाल हुआ, तो आस इब्ने वाइल ने कहा: “मुहम्मद अबतर हो गया।” इससे उसका मतलब यह था कि आपकी नस्ल कट गई। अल्लाह तआला ने सूरह “इन्ना अअतैना” के ज़रिए उस काफ़िर आस को जवाब दिया।8
इब्राहीम (रज़ियल्लाहु अन्हु): वह रसूलुल्लाह के बेटों में तीसरे और आपकी तमाम औलाद में सबसे आख़िरी हैं। वह हज़रत मारिया के बेटे हैं, जिन्हें हिरक़्ल के मिस्र के हाकिम मुक़ौक़िस ने तोहफ़े के तौर पर भेजा था। वह हिजरत के आठवें साल पैदा हुए और डेढ़ साल की उम्र में उनका इंतिक़ाल हो गया। जब वह बीमार थे, तो रसूलुल्लाह उन्हें गोद में ले लेते और आपकी मुबारक आँखों से आँसू बहते थे। जब इब्राहीम का इंतिक़ाल हुआ, तो आपने फ़रमाया: “ऐ इब्राहीम! तुम्हारी मौत पर हम बहुत ग़मगीन हैं। हमारी आँखें रो रही हैं, हमारा दिल दुख रहा है। लेकिन हम कोई ऐसी बात नहीं कहते जो हमारे रब को नाराज़ करे।”9 उन्हें जन्नतुल बक़ी के क़ब्रिस्तान में दफ़न किया गया। उस दिन सूरज को ग्रहण लगा। लोगों ने कहा: “इनके इंतिक़ाल की वजह से सूरज को ग्रहण लगा है।” रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने जब यह सुना, तो फ़रमाया: “चाँद और सूरज अल्लाह तआला के वुजूद और उसकी वहदानियत को ज़ाहिर करने वाली दो मख़लूक़ हैं। किसी के मरने या जीने की वजह से इन्हें ग्रहण नहीं लगता। जब इन्हें ग्रहण लगा देखो, तो अल्लाह तआला को याद करो!”
इलाही! फ़ातिमा की औलाद के सदक़े,
मेरी आख़िरी बात कलिमा-ए-तौहीद हो!
तू मेरी यह दुआ रद्द करे या क़बूल,
मैंने तो नबी के अहले बैत का दामन थाम लिया है।
अहले बैत-ए-रसूल (आल-ए-रसूल – आल-ए-अबा)
अल्लाह तआला क़ुरआन-ए-करीम में अहले बैत से फ़रमाता है, जिसका मफ़हूम है: “अल्लाह तआला तुमसे रिज्स, यानी हर ऐब और हर गंदगी को दूर करना और तुम्हें पूरी पाकीज़गी के साथ पाक-साफ़ करना चाहता है।”10
सहाबा-ए-किराम ने पूछा: “या रसूलल्लाह! अहले बैत कौन हैं?” उसी वक़्त इमाम अली आए। हमारे नबी ने उन्हें अपने मुबारक जुब्बे के नीचे ले लिया। फिर बारी-बारी फ़ातिमतुज़ ज़हरा, इमाम हसन और इमाम हुसैन आए। आपने उनमें से हर एक को अपनी एक तरफ़ लेकर फ़रमाया: “ये हैं मेरे अहले बैत।” इन बुलंद हस्तियों को “आल-ए-अबा और आल-ए-रसूल” भी कहा जाता है।11
अहले बैत-ए-नबवी से मुहब्बत करना आख़िरत की तरफ़ ईमान के साथ जाने और आख़िरी साँस में नजात पाने का सबब बनता है। अहले बैत से मुहब्बत करना हर मोमिन पर फ़र्ज़ है। सरवर-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) एक हदीस शरीफ़ में फ़रमाते हैं: “मेरे अहले बैत नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती की तरह हैं। जो इनकी पैरवी करेगा, नजात पाएगा। बाक़ी हलाक हो जाएँगे।”12
अहले बैत-ए-नबवी के फ़ज़ाइल और कमालात बहुत ज़्यादा हैं। उन्हें गिनकर ख़त्म नहीं किया जा सकता। उन्हें बयान करने और उनकी तारीफ़ करने की ताक़त इंसान में नहीं। उनकी क़द्र और बड़ाई सिर्फ़ आयात-ए-करीमा ही से समझी जा सकती है।
वहाँ अली हैं, हसन हैं और हुसैन हैं,
इनकी चाहत दिल में, इनकी मुहब्बत जान में है।
कल महशर के दिन, उस बड़े दीवान में,
या मुहम्मद! मेरी जान आपकी आरज़ू करती है।
अरफ़ात का पहाड़ हमारा पहाड़ है,
वहीं क़बूल होती हमारी दुआ है,
मदीना में आराम फ़रमा हमारे नबी हैं,
या मुहम्मद! मेरी जान आपकी आरज़ू करती है।
इमाम शाफ़ई इस बात को सबसे ख़ूबसूरत अंदाज़ में यूँ बयान करते हैं: “ऐ अहले बैत-ए-रसूल! तुमसे मुहब्बत करने का हुक्म अल्लाह तआला क़ुरआन-ए-करीम में देता है। जो लोग अपनी नमाज़ों में तुम्हारे लिए दुआ नहीं करते, उनकी नमाज़ों का क़बूल न होना तुम्हारी क़द्र और तुम्हारे बुलंद दर्जे को ज़ाहिर करता है। तुम्हारी शान कितनी बड़ी है कि अल्लाह तआला क़ुरआन-ए-करीम में तुम्हें सलाम फ़रमाता है!” हज़रत अनस फ़रमाते हैं: “रसूलुल्लाह से पूछा गया: ‘अहले बैत में से आप सबसे ज़्यादा किससे मुहब्बत करते हैं?’ आपने फ़रमाया: ‘हसन और हुसैन से।’”13
हज़रत अबू हुरैरा फ़रमाते हैं: “मैं रसूलुल्लाह के पास था। हसन आए। रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: ‘या रब! मैं इससे मुहब्बत करता हूँ। तू भी इससे मुहब्बत कर और इससे मुहब्बत करने वालों से भी मुहब्बत कर।’ और एक दूसरे मौक़े पर फ़रमाया: ‘हसन और हुसैन दुनिया में मेरे ख़ुशबूदार फूल हैं।’” इसके अलावा नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “मैं अपने बाद तुम्हारे पास दो चीज़ें छोड़ रहा हूँ। अगर तुम इन्हें मज़बूती से थामे रहोगे, तो रास्ते से नहीं भटकोगे। इनमें से पहली दूसरी से बड़ी है। एक अल्लाह तआला की किताब क़ुरआन-ए-करीम है, जो आसमान से ज़मीन तक तनी हुई एक मज़बूत रस्सी है। दूसरी मेरे अहले बैत हैं। ये दोनों एक-दूसरे से जुदा नहीं होंगे। जो इनकी पैरवी नहीं करेगा, वह मेरे रास्ते से अलग हो जाएगा।”14
हज़रत हसन और हज़रत हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) बीमार हो गए थे। नबी-ए-करीम ने हज़रत अली और हज़रत फ़ातिमा से फ़रमाया: “अपने इन जिगर के टुकड़ों के लिए कोई मन्नत मान लो!” हज़रत अली, हमारी माँ हज़रत फ़ातिमा और उनकी फ़िज़्ज़ा नाम की बाँदी ने तीन-तीन दिन रोज़ा रखने की मन्नत मानी। जन्नत की वे दोनों ख़ुशबुएँ शिफ़ायाब हो गईं। लेकिन उनके घर में खाने को कुछ न था। हज़रत अली ने एक यहूदी से तीन साअ15 जौ उधार लिए। तीनों ने मन्नत वाले रोज़ों की नीयत की। हज़रत फ़ातिमा ने जौ का एक पैमाना पीसकर पाँच रोटियाँ पकाईं। वे पाँच लोग थे। इफ़्तार का वक़्त हुआ। उन्होंने उन पाँच रोटियों में से एक हज़रत अली के सामने, एक हज़रत हसन के सामने, एक हज़रत हुसैन के सामने, एक बाँदी फ़िज़्ज़ा के सामने और एक अपने सामने रखी। वे रोज़ा खोलने ही वाले थे कि एक मिस्कीन आया और बोला: “ऐ रसूलुल्लाह के अहले बैत! मैं मिस्कीन मुसलमानों में से एक मिस्कीन हूँ। मुझे खाने को दीजिए! अल्लाह तआला आपको जन्नत की नेमतों से नवाज़े।” उन्होंने अपने हाथों की रोटियाँ उसे सदक़े में दे दीं और ख़ुद पानी से रोज़ा खोला। अगले दिन उन्होंने फिर रोज़ा रखा। ख़िदमतगार ने जौ का एक और पैमाना पीसकर फिर पाँच रोटियाँ पकाईं। इफ़्तार के वक़्त जब वे रोटियाँ सामने रखकर रोज़ा खोलने वाले थे, तो एक यतीम आ गया। पाँचों ने अपनी रोटियाँ उसे देकर उस यतीम को ख़ुश किया, और ख़ुद पानी से रोज़ा खोलकर सो गए। तीसरे दिन फिर रोज़ा रखा। बचे हुए आख़िरी पैमाने के जौ से फिर पाँच रोटियाँ पकाकर सामने रखीं। जब रोज़ा खोलने लगे, तो एक क़ैदी आकर बोला: “मैं तीन दिन से भूखा हूँ। उन्होंने मुझे बाँध रखा था और खाने को भी कुछ नहीं दिया। अल्लाह तआला की रज़ा के लिए मुझ पर रहम कीजिए!” पाँचों ने अपनी रोटियाँ उसे दे दीं और फिर पानी से रोज़ा खोला। इस पर उतरने वाली आयात-ए-करीमा में अल्लाह तआला ने फ़रमाया, जिसका मफ़हूम है: “उन्होंने अपनी मन्नतें पूरी कीं। लंबे और लगातार रहने वाले क़यामत के दिन से डरकर उन्होंने वह खाना, जिसकी उन्हें बड़ी ख़्वाहिश थी और जिसके लिए उनका जी ललचाता था, मिस्कीन, यतीम और क़ैदी को खिला दिया और कहा: ‘हमने तुम्हें अल्लाह तआला की रज़ा के लिए खिलाया है। हम तुमसे न कोई शुक्रिया चाहते हैं, न कोई और बदला; हम कुछ नहीं चाहते।’”16 “इसलिए अल्लाह पाक ने उन्हें शराब-ए-तहूर (बिल्कुल पाक-साफ़ मशरूब) पिलाया…”17 अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) बयान करते हैं कि हमारे नबी ने फ़रमाया: “तुममें सबसे बेहतर वे हैं जो मेरे बाद मेरे अहले बैत के साथ भलाई करें।”
“पुल-सिरात से जिनके क़दम फिसले बिना गुज़रेंगे, वे मेरे अहले बैत और मेरे सहाबा से बहुत मुहब्बत करने वाले हैं” हदीस शरीफ़
हज़रत अली बयान करते हैं कि हमारे नबी ने फ़रमाया: “जो मेरे अहले बैत के साथ भलाई करेंगे, क़यामत के दिन मैं उनकी शफ़ाअत करूँगा।” “पुल-सिरात से जिनके क़दम फिसले बिना गुज़रेंगे, वे मेरे अहले बैत और मेरे सहाबा से बहुत मुहब्बत करने वाले हैं।”
हज़रत इमाम रब्बानी की बयान की हुई एक हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “जिसने अली से मुहब्बत की, उसने यक़ीनन मुझसे मुहब्बत की। जिसने उससे दुश्मनी की, उसने यक़ीनन मुझसे दुश्मनी की। जिसने उसे सताया, उसने यक़ीनन मुझे सताया। और जिसने मुझे सताया, उसने अल्लाह तआला को सताया।”
रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “अल्लाह तआला ने मुझे चार लोगों से मुहब्बत करने का हुक्म दिया। उसने बताया कि वह ख़ुद भी उनसे मुहब्बत करता है।” आपसे पूछा गया: “वे कौन हैं? क्या आप हमें उनके नाम बताएँगे?”
आपने फ़रमाया: “अली उनमें से हैं, अली उनमें से हैं, अली उनमें से हैं; और अबू ज़र, मिक़दाद और सलमान।”
“मेरे घराने की वजह से मुझे सताने वालों के लिए सख़्त अज़ाब है।”
एक हदीस शरीफ़ में आपने यह भी फ़रमाया: “फ़ातिमा मेरा एक जुज़ है (यानी मेरा एक टुकड़ा है)। जिसने उसे सताया, उसने मुझे सताया।” हज़रत अबू हुरैरा फ़रमाते हैं: “नबी-ए-करीम ने हज़रत अली से फ़रमाया: ’फ़ातिमा मुझे तुमसे ज़्यादा प्यारी है। और तुम मुझे उससे ज़्यादा अज़ीज़ (यानी क़ीमती) हो!’”18
आपने यह भी फ़रमाया: “मैं तुम्हारे पास दीन-ए-इस्लाम लाने के बदले कोई अज्र नहीं माँगता। मैं सिर्फ़ यह चाहता हूँ कि तुम मेरे क़रीबी अहले बैत से मुहब्बत करो।”
इस्लाम के आलिमों ने अहले बैत की मुहब्बत को आख़िरी साँस में ईमान के साथ जाने की शर्त समझा है। इनमें रसूलुल्लाह के ज़र्रे मौजूद हैं। अहले बैत की क़द्र करना और उनकी इज़्ज़त करना हर मुसलमान का फ़र्ज़ है। इस्लाम के बड़े आलिम इमाम रब्बानी (रहमतुल्लाहि अलैहि) ने फ़रमाया: “मेरे वालिद ज़ाहिरी और बातिनी, यानी दिल के उलूम में बहुत बड़े आलिम थे। वह हमेशा अहले बैत से मुहब्बत करने की नसीहत और तरग़ीब फ़रमाते थे। फ़रमाते थे कि यह मुहब्बत आख़िरी साँस में इंसान के ईमान के साथ जाने में बहुत मदद करती है। जब उनका इंतिक़ाल हो रहा था, तो मैं उनके सिरहाने था। आख़िरी लम्हों में जब उनका होश कम होने लगा, तो मैंने उन्हें ये नसीहतें याद दिलाईं और पूछा कि उस मुहब्बत ने क्या असर किया। उस हालत में भी उन्होंने फ़रमाया: ‘मैं अहले बैत की मुहब्बत के समुंदर में तैर रहा हूँ।’ मैंने फ़ौरन अल्लाह तआला की हम्द और सना की। अहले बैत की मुहब्बत अहले सुन्नत का सरमाया है। आख़िरत की सारी कमाई यही सरमाया लाएगा।”
हज़रत फ़ातिमा और क़यामत तक होने वाली उनकी औलाद अहले बैत हैं। चाहे वे गुनहगार हों, उनसे मुहब्बत करना ज़रूरी है। उनसे मुहब्बत करना, दिल, जिस्म और माल से उनकी मदद करना, उनकी इज़्ज़त करना और उनका ख़याल रखना ईमान के साथ मरने का सबब बनता है। (सीरिया के शहर हमा में सैयदों के लिए एक अदालत थी। इस मुबारक नस्ल में पैदा होने वाले बच्चों को दो गवाहों के साथ हाकिम के सामने दर्ज किया जाता था। अंग्रेज़ों के वफ़ादार दोस्त मुस्तफ़ा रशीद पाशा ने यह अदालत ख़त्म कर दी।) अहले सुन्नत के इमामों ने ईमान और फ़िक़्ह के उलूम, तसव्वुफ़ की मारिफ़तें, बल्कि तफ़सीर और हदीस के उलूम का भी ज़्यादातर हिस्सा अहले बैत के इमामों से सीखा। उन्हीं की तरबियत से वे परवान चढ़े। उन्हीं की तवज्जोह से वे बुलंद हुए। उन्हीं से ख़ुशख़बरियाँ पाईं। मुसलमान रसूलुल्लाह के अहले बैत (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम अजमईन) से हर किसी से बढ़कर मुहब्बत करते हैं और अहले बैत से मुहब्बत करने वालों से भी मुहब्बत करते हैं। अहले बैत से मुहब्बत करने वालों को, अहले बैत के रास्ते पर चलने वाले सच्चे मुसलमानों को (अहले सुन्नत) कहा जाता है। तमाम अहले सुन्नत अपनी हर नमाज़ में अहले बैत के लिए भलाई की दुआ करते हैं।
रसूल को देखने वाले मोमिन को “सहाबी” का नाम दिया गया।
सबको एक साथ बताने के लिए “सहाबा-ए-किराम” कहा गया।
नबी से मुहब्बत करने वाला हर दिल एक पल में नूर से भर जाता था,
जो आपके सहाबी बने, क़ुरआन में उनकी तारीफ़ की गई।
सबने रसूलुल्लाह के लिए अपना माल भी दिया, जान भी दी।
सुलह में इल्म फैलाते थे, जंग में शेर की तरह दहाड़ते थे।
हदीस शरीफ़ में सहाबा को सितारों से तश्बीह दी गई:
इनमें से जिसकी भी पैरवी करो, रौशन राहों पर पहुँच जाओगे।
सहाबा आपस में बहुत मुहब्बत करते, एक-दूसरे की तारीफ़ करते थे;
बाद में आने वाले सब मुसलमानों ने भी यही कहा।
क़ुरआन और हदीसें हम तक उन्होंने ही पहुँचाईं।
उनके दिलों की पाकीज़गी ने ज़हनों को भरोसा दिया।
उनमें से किसी एक को भी गाली दी जाए, तो दीन-ए-इस्लाम ज़ख़्मी होता है।
सहाबी को बुरा कहने वाला क़ुरआन-ए-करीम को झुठलाता है।
अगर तुम सच्चे मुसलमान हो, तो उनमें से हर एक की इज़्ज़त करो,
पहले रसूल के अहले बैत पर दुरूद और सलाम भेजो!
