नबी-ए-करीम के बुलंद अख़लाक़1
अल्लाह तआला अपने प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को दी हुई भलाइयाँ और एहसान गिनाते हुए, आपके मुबारक दिल को सहलाते हुए फ़रमाता है: “तुम अच्छे अख़लाक़ वाले पैदा किए गए हो।”2
आयत-ए-करीमा में मफ़हूमन फ़रमाया गया: “बेशक तुम ख़ुलुक़-ए-अज़ीम पर हो (तुम बड़े अख़लाक़ के मालिक हो)”। ख़ुलुक़-ए-अज़ीम का मतलब है अल्लाह तआला के साथ राज़ और छुपी बातें होना और लोगों के बीच अच्छे अख़लाक़ वाला होना। हज़रत इकरिमा फ़रमाते हैं: “मैंने अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास से सुना: इस आयत-ए-करीमा में ‘ख़ुलुक़-ए-अज़ीम’, यानी अच्छी आदतें, वह अख़लाक़ है जिसे क़ुरआन-ए-करीम बयान करता है।”
रसूलुल्लाह के अच्छे अख़लाक़ बहुत से लोगों के दीन-ए-इस्लाम में दाख़िल होने का सबब बने।
आपकी बातें बेहद मीठी थीं, दिलों को मोह लेतीं और रूहों को खींच लेती थीं। आपकी अक़्ल इतनी ज़्यादा थी कि आप जज़ीरा-ए-अरब के सख़्त और ज़िद्दी लोगों के बीच तशरीफ़ लाए, उन्हें बहुत अच्छी तरह सँभाला, उनकी तकलीफ़ों पर सब्र किया और उन्हें नरमी और इताअत पर ले आए। उनमें से ज़्यादातर अपना दीन छोड़कर मुसलमान हो गए और दीन-ए-इस्लाम की राह में अपने बापों और बेटों के ख़िलाफ़ जंग की।
आपकी ख़ातिर उन्होंने अपने माल और वतन क़ुरबान किए और अपना ख़ून बहाया, हालाँकि वे ऐसी चीज़ों के आदी नहीं थे। आपके अच्छे अख़लाक़, नरमी, माफ़ी, सब्र, एहसान और करम इतने ज़्यादा थे कि हर किसी को हैरान कर देते थे। देखने और सुनने वाले ख़ुशी-ख़ुशी मुसलमान हो जाते थे। आपकी किसी हरकत में, किसी काम में, किसी बात में कभी भी कोई बुराई, कोई कमी नहीं देखी गई। अपने लिए किसी से नाराज़ न होने के बावजूद आप दीन के दुश्मनों पर, और दीन के ख़िलाफ़ ज़बान और हाथ उठाने वालों पर सख़्त और शदीद थे।
मुहम्मद अलैहिस्सलाम के हज़ारों मोजिज़े ज़ाहिर हुए; इसे दोस्त-दुश्मन सबने बयान किया। इन मोजिज़ों में सबसे क़ीमती आपका बाअदब और अच्छे अख़लाक़ वाला होना था। हज़रत अबू सईद ख़ुदरी ने फ़रमाया: “रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जानवर को चारा डालते थे। ऊँट को बाँधते थे। अपने घर में झाड़ू देते थे। भेड़ का दूध दुहते थे। अपने जूते की उधड़ी हुई जगह सी लेते और अपने कपड़ों में पैवंद लगाते थे।3 अपने ख़ादिम के साथ बैठकर खाते थे। ख़ादिम हाथ की चक्की चलाते हुए थक जाता, तो उसकी मदद करते थे। बाज़ार से सामान ख़रीदकर थैले में घर लाते थे। ग़रीब, अमीर, बड़े, छोटे, जिससे भी मिलते, पहले सलाम करते थे। उनसे मुसाफ़हा करने के लिए अपना मुबारक हाथ पहले बढ़ाते थे। ग़ुलाम और आक़ा को, सरदार को, काले और गोरे को बराबर समझते थे। कोई भी हो, जहाँ बुलाया जाता, वहाँ जाते थे। सामने रखी हुई चीज़ को, चाहे थोड़ी हो, हल्का और हक़ीर नहीं समझते थे।
शाम से सुबह और सुबह से शाम तक खाना बचाकर नहीं रखते थे। अच्छे अख़लाक़ वाले थे। भलाई करना पसंद करते और हर एक के साथ अच्छी तरह निभाते थे। हँसमुख और मीठी ज़बान वाले थे, मगर बात करते हुए हँसते नहीं थे। ग़मगीन दिखाई देते थे, मगर तेवरी चढ़ाए नहीं रहते थे। मुतवाज़े (आजिज़ी करने वाले) थे, मगर घटिया तबीयत के नहीं थे। रोब वाले थे, इज़्ज़त और ख़ौफ़ पैदा करते थे, मगर रूखे-सख़्त नहीं थे। नर्म दिल और सख़ी थे, मगर फ़ुज़ूलख़र्ची नहीं करते थे, बेफ़ायदा जगह कुछ नहीं देते थे, और हर एक पर तरस खाते थे। मुबारक सिर हमेशा आगे की तरफ़ झुका रहता था। किसी से कुछ उम्मीद नहीं रखते थे। जो सआदत और सुकून चाहता है, उसे आप जैसा होना चाहिए।” अनस इब्ने मालिक ने फ़रमाया: “मैंने दस साल रसूलुल्लाह की ख़िदमत की। आपने मुझसे एक बार भी ‘उफ़!’ नहीं कहा। आपने कभी नहीं फ़रमाया: ‘यह ऐसा क्यों किया?’ या ‘वह क्यों नहीं किया?’”4 अबू हुरैरा ने फ़रमाया: “एक ग़ज़वे (जंग) में हमने आपसे अर्ज़ किया कि काफ़िरों के ख़ात्मे के लिए दुआ फ़रमाइए। आपने फ़रमाया: ‘मैं लानत करने के लिए और लोगों को अज़ाब में डालने के लिए नहीं भेजा गया। मैं हर एक के साथ भलाई करने के लिए और इसलिए भेजा गया हूँ कि लोग सुकून पाएँ।’”5 अल्लाह तआला सूरह अंबिया की एक सौ सातवीं आयत-ए-करीमा में मफ़हूमन फ़रमाता है: “हमने तुम्हें सारे जहानों के लिए रहमत और भलाई बनाकर भेजा है।”
अबू सईद ख़ुदरी ने फ़रमाया: “रसूलुल्लाह की हया कुँवारी मुसलमान लड़कियों की हया से भी ज़्यादा थी।”6
अनस इब्ने मालिक कहते हैं: “जब रसूलुल्लाह किसी से मुसाफ़हा करते, तो जब तक वह शख़्स अपना हाथ न खींच लेता, आप अपना मुबारक हाथ उससे अलग नहीं करते थे।7 जब तक वह शख़्स अपना चेहरा न फेर लेता, आप अपना मुबारक चेहरा उससे नहीं फेरते थे। किसी के पास बैठते, तो दो ज़ानू होकर बैठते; उसके एहतिराम में अपनी मुबारक टाँग खड़ी करके नहीं बैठते थे।”
जाबिर इब्ने समुरा कहते हैं: “रसूलुल्लाह कम बोलते थे। ज़रूरत के वक़्त या कुछ पूछे जाने पर ही बोलते थे।” इससे मालूम होता है कि हर मुसलमान को लायानी, यानी बेफ़ायदा बातें छोड़कर ख़ामोश रहना चाहिए। आपकी मुबारक बातों में तरतील और तरसील थी, यानी आप बहुत साफ़ और तरतीब से बात करते थे और आपकी बात आसानी से समझ में आ जाती थी। अनस इब्ने मालिक ने फ़रमाया: “रसूल अलैहिस्सलाम बीमार की इयादत करते, जनाज़े के पीछे चलते और जहाँ बुलाया जाता, वहाँ जाते थे। गधे पर भी सवार होते थे। मैंने रसूल अलैहिस्सलाम को ख़ैबर के ग़ज़वे में देखा। आप एक गधे पर सवार थे जिसकी लगाम रस्सी की थी। जब रसूल अलैहिस्सलाम फ़ज्र की नमाज़ से फ़ारिग़ होकर निकलते, तो मदीना के बच्चे और मज़दूर पानी से भरे अपने बर्तन आपके सामने ले आते और दरख़्वास्त करते कि आप अपनी मुबारक उँगली उनमें डाल दें; सर्दी का मौसम और पानी ठंडा होने पर भी आप उनकी दरख़्वास्त रद्द नहीं करते थे और उनका दिल ख़ुश कर देते थे।”8
अनस इब्ने मालिक यह भी कहते हैं: “अगर कोई छोटी बच्ची रसूल अलैहिस्सलाम का हाथ पकड़कर किसी काम के लिए ले जाती, तो आप उसके साथ चले जाते और उसकी मुश्किल हल कर देते थे।”
“बेशक तुम ख़ुलुक़-ए-अज़ीम पर हो (तुम बड़े अख़लाक़ के मालिक हो)” क़लम: 4
जाबिर कहते हैं: “रसूल अलैहिस्सलाम से कुछ माँगा गया हो और आपने ‘नहीं’ कहा हो, ऐसा कभी नहीं सुना गया।”
नबी-ए-करीम हया के लिहाज़ से भी तमाम मख़लूक़ात से बढ़कर थे। नामुनासिब चीज़ों के सामने आपकी आँखें गोया बंद रहती थीं। किसी से ऐसी बात नहीं कहते थे जो उसे नापसंद हो।
हमारी माँ हज़रत आइशा ने बयान फ़रमाया: “जब रसूलुल्लाह को ख़बर दी जाती कि किसी ने कोई नापसंदीदा काम किया है, तो आप उसका नाम लिए बग़ैर आम अंदाज़ में फ़रमाते: ‘ये लोग ऐसा क्यों करते हैं?’ इस तरह आप नाम लिए बग़ैर उस शख़्स को उसके किए हुए या कहे हुए बुरे काम से रोक देते थे।”9
अनस इब्ने मालिक ने बयान किया: “एक दिन नबी-ए-करीम की ख़िदमत में एक शख़्स आया जिसके चेहरे पर पीले रंग की कोई चीज़ लगी हुई थी। आपने उससे कुछ नहीं कहा। उसे दुख पहुँचाने वाली कोई बात नहीं फ़रमाई। जब वह बाहर चला गया, तो आपने फ़रमाया: ‘तुम उससे कह देते, तो वह अपने चेहरे पर लगी चीज़ धो डालता!’”10
रसूलुल्लाह क़ौमों को जोड़ने वाले थे। उन्हें एक-दूसरे से नफ़रत नहीं दिलाते थे। हर क़ौम के बड़े की ख़ातिरदारी करते और उसे ऊँची जगह पर बिठाते थे।
किसी को अपने मुबारक जमाल के दीदार से महरूम नहीं करते थे। सहाबा-ए-किराम की ख़बर रखते और जो न आते, उनका हाल पूछते थे। पास बैठने वालों को नसीहत करते और उन्हें उनका हिस्सा देते थे।
आपके बर्ताव से किसी के दिल में यह ख़याल नहीं आता था कि आप किसी को दूसरे से ज़्यादा चाहते हैं। जो शिकायत लेकर आपके पास आता, उसे तहम्मुल से सुनते थे।
आने वाला शख़्स जब तक ख़ुद न उठ जाता, आप उसे छोड़कर नहीं जाते थे। तमाम लोगों के सामने अपने अच्छे अख़लाक़ बेहतरीन तरीक़े से पेश करते थे। आपके नज़दीक हक़ और इंसाफ़ के लिहाज़ से सब बराबर थे। किसी को किसी पर कोई बरतरी, कोई फ़र्क़ हासिल न था। हज़रत आइशा ने फ़रमाया: “मैंने रसूलुल्लाह जैसे अच्छे अख़लाक़ वाला कोई शख़्स कभी नहीं देखा। सहाबा में से या अहले बैत में से जिसने भी आपको पुकारा, आपने ज़रूर ‘लब्बैक!’ कहकर जवाब दिया।”11
रसूलुल्लाह अपने सहाबा को सबसे अच्छे नामों से पुकारते थे। किसी की बात बीच में नहीं काटते थे। जिससे बात हो रही होती, वह जब तक अपनी बात पूरी न कर लेता या जाने के लिए खड़ा न हो जाता, आप उसकी बात नहीं काटते थे। आपके अच्छे सुलूक, शफ़क़त और रहमत के बारे में अल्लाह तआला ने सूरह तौबा की एक सौ अट्ठाईसवीं आयत-ए-करीमा में मफ़हूमन फ़रमाया: “तुम्हारा तकलीफ़ में पड़ना उन्हें भारी पड़ता है और दुख देता है। वह तुम्हारी भलाई के बहुत ख़्वाहिशमंद हैं; मोमिनों पर बहुत मेहरबान हैं और उनके लिए बहुत भलाई चाहते हैं।”
और सूरह अंबिया की एक सौ सातवीं आयत-ए-करीमा में मफ़हूमन फ़रमाया: “(ऐ मेरे हबीब!) हमने तुम्हें सारे जहानों के लिए रहमत ही बनाकर भेजा है।”
अपनी उम्मत पर बोझ न पड़े, इस फ़िक्र से नबी-ए-करीम कुछ बातों में आसानी फ़रमाते थे। आपने फ़रमाया: “अगर मुझे अपनी उम्मत को मुश्किल में डालने का ख़याल न होता, तो मैं उन्हें हर वुज़ू में मिस्वाक करने का हुक्म देता।”12 वादा निभाने के लिहाज़ से भी इंसानों में नबी-ए-करीम से बढ़कर कोई नहीं आया। अब्दुल्लाह इब्ने अबिल हम्सा ने बयान किया: “नबी-ए-करीम को अभी नुबुव्वत की ख़बर दिए जाने से पहले मैंने आपसे एक लेन-देन किया था। आपका कुछ हिसाब बाक़ी रह गया था। मैंने आपसे वादा किया कि फ़लाँ वक़्त फ़लाँ जगह मिलूँगा, और भूल गया। तीन दिन बाद अपना वादा याद आया, तो फ़ौरन उस जगह दौड़ा। जब देखा कि आप तीन दिन से वहाँ इंतिज़ार कर रहे हैं, तो हैरत से सकते में आ गया। आपने मुझसे फ़रमाया: ‘ऐ नौजवान! तुमने मुझे थका दिया! मैं पूरे तीन दिन से यहाँ तुम्हारा इंतिज़ार कर रहा हूँ।’” नबी-ए-करीम की आजिज़ी (तवाज़ो) की ख़ूबी इतनी बड़ी और बेमिसाल थी कि किसी में, यहाँ तक कि नबियों (अलैहिमुस्सलाम) में से भी किसी में ऐसी न थी।
तकब्बुर का एहसास आपमें कभी पैदा नहीं हुआ। जब नबी-ए-करीम को बादशाह नबी होने और बंदा नबी होने में इख़्तियार दिया गया, तो आपने बंदा नबी होना पसंद फ़रमाया।13 इस पर इसराफ़ील अलैहिस्सलाम ने नबी-ए-करीम से कहा: “बेशक अल्लाह तआला ने वह ख़ूबी भी आपको अता कर दी है जिसमें आपने आजिज़ी दिखाई, क्योंकि क़यामत में आप आदम की औलाद में सबसे बड़े हैं। अपनी क़ब्र से सबसे पहले उठने वाले इंसान आप हैं। सबसे पहले शफ़ाअत करने वाले भी आप हैं।”
नबी-ए-करीम ने हज़रत आइशा से फ़रमाया:
“मुझे यह पेशकश की गई कि मक्का के पत्थर और मिट्टी सोना बना दिए जाएँ। मैंने अर्ज़ किया: ‘नहीं, या रब! एक दिन भूखा रहूँ, एक दिन पेट भरा रहूँ। जिस दिन भूखा रहूँ, तुझसे गिड़गिड़ाकर दुआ करूँ। जिस दिन पेट भरा हो, तेरी हम्द-ओ-सना करूँ।’”14
एक बार जिबराईल अलैहिस्सलाम नबी-ए-करीम के पास आए और फ़रमाया:
“अल्लाह तआला आपको सलाम कहता है। अगर आप चाहें, तो इन पहाड़ों को आपके लिए सोना बना दूँ। आप जहाँ भी जाएँ, ये सोने के पहाड़ आपके साथ रहेंगे।”
हमारे प्यारे नबी ने जवाब में फ़रमाया: “ऐ जिबराईल! दुनिया उसका घर है जिसका कोई घर नहीं, और उसका माल है जिसका कोई माल नहीं। इसे वही जमा करता है जिसके पास अक़्ल नहीं।”15 इस पर जिबराईल अलैहिस्सलाम ने कहा: “ऐ मुहम्मद! अल्लाह तआला ने आपको क़ौल-ए-साबित से साबित-क़दम रखा है।”
हज़रत आइशा ने फ़रमाया: “कभी-कभी पूरा एक महीना गुज़र जाता और हमारे घर में (खाना पकाने के लिए) आग नहीं जलती थी। सिर्फ़ खजूर और पानी होता था।”
इब्ने अब्बास ने फ़रमाया: “रसूलुल्लाह और आपके अहले बैत बहुत सी रातें रात का खाना खाए बग़ैर सो जाते थे। शाम को खाने के लिए कुछ नहीं पाते थे।” आइशा ने फ़रमाया: “रसूलुल्लाह का मुबारक पेट कभी खाने से नहीं भरा। आपने इस बारे में किसी से शिकायत भी नहीं की। मोहताजी आपके लिए अमीरी से बेहतर थी। सारी रात भूख से तड़पते, तब भी यह हाल आपको दिन के रोज़े से नहीं रोकता था।16
“मुझे यह पेशकश की गई कि मक्का के पत्थर और मिट्टी सोना बना दिए जाएँ। मैंने अर्ज़ किया: ‘नहीं, या रब! एक दिन भूखा रहूँ, एक दिन पेट भरा रहूँ। जिस दिन भूखा रहूँ, तुझसे गिड़गिड़ाकर दुआ करूँ। जिस दिन पेट भरा हो, तेरी हम्द-ओ-सना करूँ’” हदीस शरीफ़
अगर आप चाहते, तो अपने रब से ज़मीन के तमाम ख़ज़ाने, रोज़ी और ऐश की ज़िंदगी माँग लेते। मैं क़सम खाती हूँ कि जब मैं आपका यह हाल देखती, तो मुझे तरस आता और मैं रोती थी। अपने हाथ से आपके मुबारक पेट को सहलाती और कहती:
‘मेरी जान आप पर क़ुरबान! इस दुनिया से कुछ फ़ायदे हासिल कर लें जो आपको ताक़त दें, तो क्या हर्ज है?’
आप फ़रमाते: ‘ऐ आइशा! मैं दुनिया का क्या करूँ? उलुल अज़्म नबियों में से मेरे भाइयों ने इससे भी ज़्यादा सख़्त हालात पर सब्र किया। लेकिन वे इन्हीं हालात में ज़िंदगी गुज़ारते रहे और अपने रब से जा मिले। इसी वजह से उनके रब ने अपनी तरफ़ उनकी वापसी को बहुत ख़ूबसूरत बनाया और उनके सवाब बढ़ा दिए। मैं ऐश की ज़िंदगी गुज़ारने से हया करता हूँ, क्योंकि ऐसी ज़िंदगी मुझे उनसे पीछे छोड़ देगी। मेरे लिए सबसे अच्छी और सबसे प्यारी चीज़ अपने भाइयों और दोस्तों से जा मिलना और उनके साथ शामिल हो जाना है।’”
हज़रत आइशा ने फ़रमाया: “रसूलुल्लाह ने इन बातों के लगभग एक महीने बाद इंतिक़ाल फ़रमाया।” नबी-ए-करीम की सख़ावत के भी चर्चे ज़बान-ज़बान पर थे। इस अच्छी आदत में भी कोई नबी-ए-करीम की बराबरी नहीं कर सका।
इब्ने अब्बास ने कहा: “रसूलुल्लाह भलाई करने के लिहाज़ से इंसानों में सबसे ज़्यादा सख़ी थे। रमज़ान शरीफ़ में और जिबराईल अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात के वक़्त आप सुबह की हवा से भी ज़्यादा सख़ी हो जाते थे।” अनस इब्ने मालिक फ़रमाते हैं: “मैं रसूल अलैहिस्सलाम के साथ जा रहा था। आपके ऊपर बुर्द-ए-नजरानी, यानी यमन के कपड़े का एक लबादा था। पीछे से एक देहाती आया और आपका गिरेबान इतने ज़ोर से खींचा कि लबादे के गिरेबान ने आपकी मुबारक गर्दन को छील दिया और निशान पड़ गया। रसूल अलैहिस्सलाम उस आदमी की इस हरकत पर मुस्कुरा दिए और उसे कुछ देने का हुक्म फ़रमाया।” रसूल अलैहिस्सलाम की एक बूढ़ी पड़ोसन थी। उसने अपनी बेटी को रसूल अलैहिस्सलाम के पास भेजा और गिड़गिड़ाकर कहा: “नमाज़ पढ़ने के लिए मेरे पास ढकने का कोई कपड़ा नहीं। मुझे नमाज़ में ढकने के लिए एक कपड़ा भेज दीजिए।” उस वक़्त रसूल अलैहिस्सलाम के पास कोई दूसरा कपड़ा न था। आपने अपने मुबारक जिस्म पर पहना हुआ कुर्ता उतारकर उस औरत को भेज दिया। नमाज़ का वक़्त आया, तो आप कपड़ा न होने की वजह से मस्जिद न जा सके। सहाबा-ए-किराम ने यह सुना तो कहा: “रसूल अलैहिस्सलाम इतनी सख़ावत फ़रमाते हैं कि क़मीस के बग़ैर रह गए और मस्जिद में जमाअत के लिए तशरीफ़ नहीं ला सकते। हम भी अपना सब कुछ ग़रीबों में बाँट दें।” अल्लाह तआला ने उसी वक़्त सूरह बनी इस्राईल (इसरा) की उनतीसवीं आयत-ए-करीमा उतारी। पहले अपने हबीब से मफ़हूमन फ़रमाया:
“अपने हाथ अपनी गर्दन से बाँध न लो, और न उन्हें बिल्कुल खोल दो (कंजूसी न करो, और कुछ न देने का रवैया भी न अपनाओ)”, फिर फ़रमाया: “अपना माल इस तरह मत बाँटो कि तुम्हारे पास कुछ न बचे (इतना कि तंगी में पड़ जाओ और नमाज़ छूट जाने से ग़मगीन हो जाओ)! (सदक़े में बीच का रास्ता अपनाओ।)”
उस दिन नमाज़ के बाद हज़रत अली रसूलुल्लाह के पास आए और अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! आज मैंने अपने बाल-बच्चों का ख़र्च चलाने के लिए आठ दिरहम चाँदी क़र्ज़ ली थी। इसमें से आधे आपको दे दूँ। अपने लिए एक कुर्ता (लिबास) ख़रीद लीजिए।” रसूल अलैहिस्सलाम बाज़ार गए और दो दिरहम में एक कुर्ता ख़रीदा। बाक़ी दो दिरहम से खाने का सामान ख़रीदने जा रहे थे कि एक अंधे को बैठे देखा, जो कह रहे थे: “कौन है जो अल्लाह की रज़ा के लिए और जन्नत के लिबास पाने के लिए मुझे एक क़मीस दे?” आपने अपना ख़रीदा हुआ कुर्ता उसे दे दिया। अंधे ने कुर्ता हाथ में लिया, तो मुश्क जैसी ख़ुशबू महसूस की। वह समझ गए कि यह ख़ुशबू रसूल अलैहिस्सलाम के मुबारक हाथ से आई है, क्योंकि रसूल अलैहिस्सलाम ने जो चीज़ एक बार पहन ली, वह पुरानी होकर फट भी जाती, तब भी उसका हर टुकड़ा मुश्क की तरह महकता था।
अंधे ने दुआ की: “या रब! इस क़मीस के सदक़े मेरी आँखें खोल दे!” उसी वक़्त उनकी दोनों आँखें खुल गईं। रसूल अलैहिस्सलाम वहाँ से चले गए और एक दिरहम में एक कुर्ता ख़रीदा। बाक़ी एक दिरहम से खाने का सामान लेने जा रहे थे कि एक ख़ादिमा लड़की को रोते देखा और पूछा: “बेटी, क्यों इस तरह रो रही हो?” लड़की ने कहा: “मैं एक यहूदी की ख़ादिमा हूँ। उसने मुझे एक दिरहम दिया और कहा कि आधे दिरहम की एक शीशी और आधे दिरहम का तेल ख़रीद ला। मैं इन्हें ख़रीदकर जा रही थी। ये मेरे हाथ से गिर गए। शीशी भी गई और तेल भी। अब मुझे समझ नहीं आता कि क्या करूँ।” रसूल अलैहिस्सलाम ने अपना आख़िरी दिरहम उस लड़की को दे दिया और फ़रमाया: “इससे शीशी और तेल ख़रीदकर अपने घर ले जाओ।” लेकिन बेचारी लड़की ने कहा: “मुझे डर है कि घर देर से पहुँचने की वजह से यहूदी मुझे मारेगा।” रसूल अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: “डरो मत! मैं तुम्हारे साथ चलूँगा और उससे कहूँगा कि तुम्हें कुछ न कहे।” वे घर पहुँचे और दरवाज़ा खटखटाया। यहूदी ने दरवाज़ा खोला और रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को देखा, तो हैरान रह गया। आपने यहूदी को सारा माजरा सुनाया और लड़की को कुछ न कहने के लिए उससे सिफ़ारिश फ़रमाई। यहूदी रसूलुल्लाह के क़दमों पर गिर पड़ा और कहा: “ऐ हज़ारों इंसानों के सिर के ताज, ऐ वह बुलंद नबी जिनके हुक्म को पूरा करने के लिए हज़ारों शेर इंतिज़ार में रहते हैं! आपने एक ख़ादिमा लड़की की ख़ातिर मुझ जैसे एक मिस्कीन के दरवाज़े को इज़्ज़त बख़्शी। या रसूलल्लाह! आपकी ख़ातिर मैंने इस लड़की को आज़ाद किया। मुझे ईमान और इस्लाम सिखाइए। आपकी ख़िदमत में मुसलमान हो जाऊँ।” रसूल अलैहिस्सलाम ने उन्हें इस्लाम सिखाया। वह मुसलमान हो गए। अपने घर में जाकर अपने बाल-बच्चों को सारी बात सुनाई। वे सब मुसलमान हो गए। यह सब रसूलुल्लाह के अच्छे अख़लाक़ की बरकत से हुआ।
हर मुसलमान को चाहिए कि रसूलुल्लाह के इन हालात को अपने लिए नमूना बनाए! अल्लाह तआला के अख़लाक़ से आरास्ता होना हर मुसलमान के लिए ज़रूरी है, क्योंकि रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “अल्लाह तआला के अख़लाक़ से आरास्ता हो जाओ!” मसलन अल्लाह तआला की सिफ़ात में से एक “सत्तार” है, यानी वह गुनाहों को छुपाने वाला है।
मुसलमान को भी अपने दीनी भाई के ऐब और कमी को छुपाना चाहिए। अल्लाह तआला अपने बंदों के गुनाह माफ़ करने वाला है। इसलिए मुसलमानों को भी एक-दूसरे की कमियाँ और ग़लतियाँ माफ़ करनी चाहिए। अल्लाह तआला करीम और रहीम है, यानी उसका लुत्फ़ और एहसान बहुत है और उसकी रहमत बहुत ज़्यादा है। मुसलमान को सख़ी और रहमदिल होना चाहिए। तमाम अच्छे अख़लाक़ का यही हाल है।
“हाँ! मैं जानता हूँ कि तुम सब कुछ कर लोगे। लेकिन मैं काम करने वालों से अलग होकर बैठना नहीं चाहता। अल्लाह तआला अपने साथियों से अलग होकर बैठने वाले को पसंद नहीं करता” हदीस शरीफ़
रसूल अलैहिस्सलाम के अच्छे अख़लाक़ बहुत हैं। हर मुसलमान को इन्हें सीखना और इन्हीं जैसे अख़लाक़ से आरास्ता होना चाहिए। इस तरह दुनिया और आख़िरत में मुसीबतों और तकलीफ़ों से छुटकारा पाना और उन दोनों जहान के सरदार की शफ़ाअत हासिल करना नसीब होगा।
आपके अच्छे अख़लाक़ में से कुछ ये हैं:
1. रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) का इल्म, इरफ़ान, समझ, यक़ीन, ईक़ान, अक़्ल, ज़हानत, सख़ावत, आजिज़ी, हिल्म, शफ़क़त, सब्र, ग़ैरत, हमिय्यत, सच्चाई, अमानतदारी, शुजाअत, महाबत (रोब), बहादुरी, बलाग़त, फ़साहत, फ़तानत, मलाहत (ख़ूबसूरती), वरअ, इफ़्फ़त, करम, इंसाफ़, हया, ज़ुह्द और तक़्वा तमाम नबियों से ज़्यादा था।
2. आप दोस्त और दुश्मन से पहुँचने वाले नुक़सान और तकलीफ़ें माफ़ कर देते थे। किसी से बदला नहीं लेते थे। उहुद के ग़ज़वे में जब काफ़िरों ने आपके मुबारक गाल को लहूलुहान कर दिया और आपके दाँत तोड़ दिए, तो आपने ऐसा करने वालों के लिए दुआ फ़रमाई: “या रब! इन्हें माफ़ कर दे! इनकी जहालत की वजह से इन्हें बख़्श दे।”
3. आपकी शफ़क़त बहुत ज़्यादा थी। जानवरों को पानी पिलाते थे। पानी का बर्तन अपने हाथ से थामे रहते और उनके सैर होने तक इंतिज़ार करते थे। जिस घोड़े पर सवार होते, उसका चेहरा और आँखें पोंछते थे।
4. हर बुलाने वाले को “लब्बैक” (“जी”) कहकर जवाब देते थे। किसी के पास बैठकर पाँव नहीं फैलाते थे। दो ज़ानू होकर बैठते थे। 5. अपने आपको किसी से बड़ा नहीं समझते थे। एक सफ़र में जब भेड़ का कबाब बनाना था, तो एक ने कहा: “मैं ज़बह करूँगा।” दूसरे ने कहा: “मैं खाल उतारूँगा।” तीसरे ने कहा: “मैं पकाऊँगा।” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “मैं लकड़ियाँ जमा करूँगा।” तो उन्होंने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! आप आराम फ़रमाइए! हम जमा कर लेंगे।” आपने फ़रमाया: “हाँ! मैं जानता हूँ कि तुम सब कुछ कर लोगे। लेकिन मैं काम करने वालों से अलग होकर बैठना नहीं चाहता। अल्लाह तआला अपने साथियों से अलग होकर बैठने वाले को पसंद नहीं करता।” और उठकर लकड़ियाँ जमा करने चले गए। 6. जब अपने सहाबा (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम अजमईन) के बैठने की जगह पर तशरीफ़ लाते, तो सदर की जगह पर नहीं जाते थे। जो ख़ाली जगह दिखाई देती, वहीं बैठ जाते थे। एक दिन हाथ में छड़ी लिए गली में निकले, तो देखने वाले खड़े हो गए। आपने फ़रमाया: “जिस तरह दूसरे लोग एक-दूसरे की ताज़ीम में खड़े होते हैं, उस तरह मेरे लिए खड़े न हुआ करो! मैं भी तुम्हारी तरह एक इंसान हूँ। सबकी तरह खाता हूँ। थक जाता हूँ तो बैठ जाता हूँ।”
7. खाने में, पहनने में और हर चीज़ में अपने ख़ादिमों को अपने से अलग नहीं रखते थे। उनके कामों में मदद करते थे। आपको कभी किसी को मारते या बुरा-भला कहते नहीं देखा गया।
हमेशा आपकी ख़िदमत में रहने वाले अनस इब्ने मालिक कहते हैं: “मैंने दस साल रसूलुल्लाह की ख़िदमत की। मैंने आपकी जितनी ख़िदमत की, आपने उससे ज़्यादा मेरी ख़िदमत की। मैंने कभी आपको मुझसे नाराज़ होते या सख़्ती से बात करते नहीं देखा।”17
8. अपने उधड़े और फटे कपड़ों में ख़ुद पैवंद लगाते, अपनी भेड़ों का दूध ख़ुद दुहते और अपने जानवरों को ख़ुद चारा डालते थे। बाज़ार से ख़रीदी हुई चीज़ ख़ुद घर ले जाते थे। सफ़र में अपने जानवरों को चारा डालते और कभी उनका ख़रहरा भी करते थे। ये काम कभी अकेले करते और कभी अपने ख़ादिमों की मदद करते थे। 9. जब कुछ लोगों के ख़ादिम आकर आपको बुलाते, तो मदीना के रिवाज के मुताबिक़ उनके हाथ में हाथ डालकर चलते थे।
10. बीमारों की इयादत करते और जनाज़ों में शरीक होते थे। दिल जीतने के लिए काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों के बीमारों की भी इयादत करते थे। 11. फ़ज्र की नमाज़ पढ़ाने के बाद जमाअत की तरफ़ रुख़ करके बैठते और फ़रमाते: “क्या हमारा कोई भाई बीमार है? चलो, उसकी इयादत को चलें!” कोई बीमार न होता, तो फ़रमाते: “क्या किसी के यहाँ जनाज़ा है? चलो, मदद को चलें!” अगर जनाज़ा होता, तो उसे ग़ुस्ल देने और कफ़न पहनाने में मदद करते, उसकी नमाज़ पढ़ाते और क़ब्र तक साथ जाते थे। जनाज़ा न होता, तो फ़रमाते: “अगर किसी ने ख़्वाब देखा हो, तो बयान करे! हम सुनें और उसकी ताबीर करें!”
12. सहाबा में से किसी को तीन दिन न देखते, तो उनका हाल पूछते थे। अगर वह सफ़र पर गए होते, तो उनके लिए भलाई की दुआ करते, और अगर शहर में होते, तो उनसे मिलने जाते थे। 13. रास्ते में मिलने वाले मुसलमान को पहले ख़ुद सलाम करते थे। 14. ऊँट, घोड़े, ख़च्चर और गधे पर सवार होते, और कभी किसी और को भी अपने पीछे बिठा लेते थे।
15. अपने मेहमानों और सहाबा की ख़िदमत करते और फ़रमाते: “क़ौम का सरदार, उनमें सबसे बढ़कर, वह है जो उनकी ख़िदमत करता है।”
16. आपको कभी क़हक़हा लगाकर हँसते नहीं देखा गया। ख़ामोशी से मुस्कुराते थे। कभी हँसते वक़्त आपके मुबारक आगे के दाँत दिखाई देते थे।
17. हमेशा फ़िक्रमंद और ग़मगीन दिखाई देते और कम बोलते थे। बात मुस्कुराकर शुरू करते थे। 18. ग़ैरज़रूरी और बेफ़ायदा बात नहीं करते थे। ज़रूरत होती, तो मुख़्तसर, फ़ायदेमंद और साफ़ मायने वाली बात फ़रमाते थे। अच्छी तरह समझ में आने के लिए कभी तीन बार दोहराते थे।
19. अजनबियों, जान-पहचान वालों, बच्चों, बूढ़ी औरतों और अपने घर की महरम औरतों के साथ लतीफ़े और मज़ाक़ की बातें करते थे। लेकिन यह चीज़ आपके एक पल के लिए भी अल्लाह तआला को भूलने का सबब नहीं बनती थी।
20. आपके रोब की वजह से कोई आपके चेहरे की तरफ़ नहीं देख पाता था। एक शख़्स आया और आपके मुबारक चेहरे को देखा, तो काँपने लगा। आपने फ़रमाया: “घबराओ मत! मैं न बादशाह हूँ, न ज़ालिम। मैं सूखा गोश्त खाने वाली एक बेचारी औरत का बेटा हूँ।” उस आदमी का डर जाता रहा और वह अपना दुखड़ा सुनाने लगा।
21. आपके न पहरेदार थे, न दरबान। हर कोई आसानी से आपके पास आकर अपना दुख बयान कर सकता था। 22. आपकी हया बहुत ज़्यादा थी। जिससे बात करते, उसके चेहरे की तरफ़ देखने से शरमाते थे।
“क़ौम का सरदार, उनमें सबसे बढ़कर, वह है जो उनकी ख़िदमत करता है” हदीस शरीफ़
23. किसी का ऐब उसके मुँह पर नहीं कहते थे। किसी की शिकायत नहीं करते थे, किसी की पीठ पीछे बात नहीं करते थे। जब किसी की बात या काम पसंद न आता, तो फ़रमाते: “न जाने कुछ लोग ऐसा क्यों करते हैं?”
24. अल्लाह तआला के प्यारे, उसके रसूल और उसके मक़बूल होने के बावजूद फ़रमाते थे: “तुममें अल्लाह तआला को सबसे अच्छी तरह पहचानने वाला और उससे सबसे ज़्यादा डरने वाला मैं हूँ।” और फ़रमाते: “जो मैं देखता हूँ, अगर तुम देखते, तो कम हँसते और ज़्यादा रोते।”18 आसमान में बादल दिखाई देता, तो फ़रमाते: “या रब! इस बादल के साथ हम पर अज़ाब न भेज!” हवा चलती, तो दुआ करते: “या रब! हम पर भलाई वाली हवा भेज!” बादल गरजता, तो फ़रमाते: “या रब! हमें अपने ग़ज़ब से न मार, अपने अज़ाब से हलाक न कर और इससे पहले हमें आफ़ियत अता फ़रमा!”
नमाज़ के लिए खड़े होते, तो रोने वाले इंसान की सिसकियों की तरह आपके सीने से आवाज़ सुनाई देती थी। क़ुरआन-ए-करीम पढ़ते वक़्त भी ऐसा ही होता था। 25. आपके दिल की ताक़त और आपकी शुजाअत हैरान कर देने की हद तक ज़्यादा थी। हुनैन के ग़ज़वे में मुसलमान बिखर गए थे और आप तीन-चार लोगों के साथ रह गए थे। आपने कई बार अकेले काफ़िरों के हमले का मुक़ाबला किया और हरगिज़ पीछे नहीं हटे। उनके सामने डटे रहे और उन्हें भगा दिया।
26. बहुत सख़ी थे। सैकड़ों ऊँट और भेड़ें बख़्श देते और अपने लिए कुछ नहीं रखते थे। कितने ही सख़्त दिल काफ़िर आपके इन एहसानों को देखकर ईमान ले आए।
27. आपसे कुछ माँगा जाता, तो कभी “नहीं” कहते नहीं सुना गया। होता तो दे देते, न होता तो ख़ामोश रहते।
28. अल्लाह तआला ने फ़रमाया था: “माँगो, मैं दूँगा”, फिर भी आपने दुनिया की दौलत नहीं माँगी। छने हुए गेहूँ के आटे की रोटी कभी नहीं खाई। हमेशा बिना छने जौ के आटे की रोटी खाते थे। आपको कभी पेट भरकर खाते नहीं देखा गया। ऐसा भी हुआ कि घर में दो-तीन महीने तक न खाना पका, न रोटी बनी, और सिर्फ़ खजूर खाते रहे। ऐसा भी होता था कि दो-तीन दिन कुछ न खाते।
29. जब आपने इंतिक़ाल फ़रमाया, तो आपकी लोहे की एक ज़िरह तीस किलो जौ के बदले एक यहूदी के पास गिरवी रखी हुई पाई गई। 30. कभी नहीं सुना गया कि आपने किसी खाने को नापसंद किया हो। जो पसंद आता, खा लेते; जो पसंद न आता, न खाते और कुछ न कहते। दिन में एक बार खाते थे। कभी सुबह, कभी शाम को खाते थे। घर आते तो पूछते: “खाने को कुछ है?” अगर कहा जाता कि नहीं, तो रोज़ा रख लेते थे। खाना मेज़पोश, थाल या मेज़ जैसी किसी चीज़ के ऊपर रखकर नहीं खाते थे; ज़मीन पर रखते, दो ज़ानू बैठते और किसी चीज़ से टेक लगाए बग़ैर खाते थे। खाने की शुरुआत बिस्मिल्लाह पढ़कर करते थे। दाहिने हाथ से खाते थे। 31. अपनी अज़वाज और कुछ ख़ादिमों के लिए कभी साल भर का जौ और खजूर अलग रख देते, और उसमें से ग़रीबों को सदक़ा भी देते थे।
32. दूसरे नबियों की तरह आप भी सदक़ा और ज़कात का माल नहीं लेते थे। तोहफ़ा क़बूल करते थे। अक्सर उसका बदला बढ़ाकर देते थे।
33. आपका बिस्तर दबाग़त किए हुए चमड़े का था, जिसके अंदर खजूर के रेशे भरे हुए थे। जब लोग ऊन भरा हुआ एक बिस्तर लाए, तो आपने उसे क़बूल नहीं किया और फ़रमाया: “ऐ आइशा! अल्लाह तआला की क़सम, अगर मैं चाहूँ, तो अल्लाह तआला हर जगह सोने और चाँदी के ढेर मेरे पास रख दे।” कभी चटाई, तख़्ते, गद्दे, ऊन के बने नमदे या सूखी मिट्टी पर सोते थे।
34. इशा के बाद आधी रात तक सोते और फिर फ़ज्र की नमाज़ तक इबादत करते थे। दाहिनी करवट लेटते, दाहिना हाथ गाल के नीचे रखते और कुछ सूरतें पढ़कर सोते थे। 35. तफ़ाउल करते थे, यानी जो चीज़ पहली बार या अचानक देखते, उससे अच्छा शगुन लेते थे। किसी चीज़ को मनहूस नहीं समझते थे।
36. ग़म के वक़्त अपनी दाढ़ी पकड़कर सोच में डूब जाते थे।
37. जब ग़मगीन होते, तो फ़ौरन नमाज़ शुरू कर देते और नमाज़ की लज़्ज़त और सुकून से ग़म दूर कर देते थे। 38. ग़ीबत करने वाले, यानी दूसरों की पीठ पीछे बुराई करने वाले की बात हरगिज़ नहीं सुनते थे।
39. चलते हुए अगर बग़ल में या पीछे देखना होता, तो पूरे जिस्म के साथ मुड़कर देखते थे। सिर्फ़ सिर घुमाकर नहीं देखते थे। 40. नबी-ए-करीम का अल्लाह तआला से डरना, उसकी इताअत और इबादत करना इतना ज़्यादा था कि आपके इस हाल की ताब कोई नहीं ला सकता था। इतनी नमाज़ पढ़ते कि मुबारक पाँव सूज जाते थे। जब अर्ज़ किया गया: “या रसूलल्लाह! आपकी तो अगली-पिछली तमाम ख़ताएँ माफ़ कर दी गई हैं, फिर आप अपने आपको इतनी तकलीफ़ क्यों देते हैं?” तो आपने जवाब में फ़रमाया: “क्या मैं अल्लाह तआला का सबसे ज़्यादा शुक्र करने वाला बंदा न बनूँ?”
जान की बुलबुल एक गुलाब की लगातार आरज़ू करती है,
यह न समझो कि वह ग़ैरों से झगड़े की आरज़ू करती है।
बिना रुके उसके चारों तरफ़ परकार की तरह घूमती है,
अचानक तन्हाई के लिए तड़पने की आरज़ू करती है।
मैं समझ गया, उस हसीन गुलाब ने ग़ैर पर अपना राज़ नहीं खोला,
कली की तरह वह हमेशा बुलबुल की आरज़ू करता है।
उस दिलबर ने ग़ैरों से अपना रुख़सार छुपा रखा है,
वे बेकार ही सूखे इश्क़ की आरज़ू करते हैं।
ज़ाती! वस्ल की राह में वह मजनूँ की तरह चलती है,
ख़ुद को पिघलाकर बस लैला की आरज़ू करती है।
“क्या मैं अल्लाह तआला का सबसे ज़्यादा शुक्र करने वाला बंदा न बनूँ?” हदीस शरीफ़
