हिल्या-ए-सआदत
हबीब-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सूरत-ओ-शक्ल को “हिल्या-ए-सआदत” कहा जाता है। इस्लामी आलिमों ने मुहम्मद अलैहिस्सलाम के तमाम ज़ाहिरी आज़ा (अंगों), आपकी शक्ल, सिफ़ात और अच्छी आदतों को, और बारीक से बारीक बातों तक आपकी पूरी ज़िंदगी को सनद और दस्तावेज़ों के साथ खोलकर लिखा है। ये मालूमात ख़ुद नबी-ए-करीम के अपने बयानात, यानी हदीसों से और आपके सहाबा की बताई हुई ख़बरों से जमा की गई हैं। इन्हें अपने अंदर रखने वाली किताबों को सीरत की किताबें कहा जाता है। हज़ारों सीरत की किताबों में नबी-ए-करीम का हिल्या-ए-सआदत बयान करने वाली सबसे मशहूर किताबें ये हैं: इमाम तिरमिज़ी की “अश-शमाइलुर रसूल”, क़ाज़ी इयाज़ की “शिफ़ा शरीफ़”, इमाम बैहक़ी और अबू नुऐम इस्फ़हानी की “दलाइलुन नुबुव्वा” और हज़रत इमाम क़स्तल्लानी की “मवाहिब-ए-लदुन्निया”। हदीसों में और सहाबा-ए-किराम की बताई हुई ख़बरों में हमारे प्यारे नबी का हिल्या-ए-सआदत इस तरह बयान किया गया है: “फ़ख़्र-ए-कायनात (कायनात की शान) का मुबारक चेहरा, आपके तमाम मुबारक आज़ा और आपकी मुबारक आवाज़ तमाम इंसानों के चेहरों, आज़ा और आवाज़ों से ज़्यादा ख़ूबसूरत थी।
मुबारक चेहरा कुछ गोलाई लिए हुए था और ख़ुशी के वक़्त चाँद की तरह चमक उठता था।1 आपकी ख़ुशी आपकी मुबारक पेशानी से ज़ाहिर हो जाती थी।
रसूलुल्लाह जिस तरह दिन में देखते थे, उसी तरह रात में भी देखते थे; जिस तरह सामने की चीज़ें देखते थे, उसी तरह पीछे की चीज़ें भी देखते थे। जब दाएँ-बाएँ या पीछे देखना होता, तो पूरे जिस्म के साथ मुड़कर देखते थे। आसमान से ज़्यादा ज़मीन की तरफ़ देखते थे। मुबारक आँखें बड़ी और पलकें लंबी थीं। मुबारक आँखों में कुछ सुर्ख़ी थी और आँखों की पुतलियाँ बहुत काली थीं; रात को सुरमा लगाते थे। फ़ख़्र-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की पेशानी कुशादा थी।
मुबारक भौंहें बारीक थीं और दोनों भौंहों के बीच फ़ासला था। दोनों भौंहों के बीच की रग ग़ुस्से के वक़्त उभर आती थी। मुबारक नाक बहुत ख़ूबसूरत थी और उसका बीच का हिस्सा कुछ उठा हुआ था। मुबारक सिर बड़ा था। मुबारक मुँह छोटा नहीं था। मुबारक दाँत सफ़ेद थे और आगे के दाँतों के बीच हल्का फ़ासला था। बात करते तो ऐसा लगता जैसे दाँतों के बीच से नूर निकल रहा हो। अल्लाह तआला के बंदों में आपसे ज़्यादा फ़सीह और मीठी बात करने वाला कोई नहीं देखा गया।
फ़ख़्र-ए-आलम जब चालीस बरस के हुए,
सिर पर रिसालत का ताज रखा गया।
हर दम आवाज़ आती थी: ’ऐ अमीन!
मैंने तुम्हें सारे जहानों के लिए रहमत बनाया।’
“मैं जिस गिरजे से भी गुज़रा, उसके बिशप से रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सिफ़ात और हिल्या (शक्ल-ओ-सूरत) के बारे में पूछा और सब कुछ एक-एक करके अपने हाफ़िज़े में बिठा लिया। मदीना लौटकर सब कुछ रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को सुनाया। आपको यह पसंद आया” मुग़ीरा इब्ने शुअबा (रज़ियल्लाहु अन्हु)
क़ुरआन-ए-करीम आयत-आयत खुली दलीलों के साथ उतरा,
तरह-तरह के बहुत से मोजिज़े ज़ाहिर हुए।
अगरचे वह पाक ज़ात सिर से पाँव तक नूर थे,
फिर भी आपके हर अंग में मोजिज़े थे।
सबसे पहले यह कि आपके मुबारक जिस्म का
साया कभी ज़मीन पर नहीं पड़ता था।
सिर से पाँव तक आपका बदन नूर था,
और यह ज़ाहिर है कि नूर का साया नहीं होता।
और आपके मुबारक सिर के ऊपर हर वक़्त
बादल का एक टुकड़ा साया किए रहता था।
आप जहाँ भी जाते, वह भी साथ जाता,
हमेशा आपके सिर के ऊपर ठहरा रहता।
और आपकी मुबारक आँखों में जो मोजिज़ा था,
वह कैसा था, यह भी तुम्हें बताऊँ।
जिस तरह सामने की चीज़ें साफ़ देखते थे,
उसी तरह पीछे की चीज़ें भी देख लेते थे।
अब सुनो आपकी मुबारक नाक का भी हाल,
देखो, उसमें कैसा मोजिज़ा था।
जब जिबराईल-ए-अमीन वह्य लेकर उतरते,
जिस घड़ी वह आसमान से जुदा होते, उसी घड़ी
आप जिबराईल की ख़ुशबू पा लेते थे,
और जान लेते थे कि वह वह्य लेकर उतर रहे हैं।
जब वह चाँद जैसे चेहरे वाले अपने होंठ हिलाते,
आसमान में सूरज की टिकिया भी हिल उठती थी।
आपकी मुबारक बातें बहुत आसानी से समझ में आ जाती थीं, दिलों को मोह लेती थीं और रूहों को खींच लेती थीं। जब आप बात करते, तो लफ़्ज़ मोतियों की तरह पिरोए हुए होते। अगर कोई गिनना चाहता, तो आपके लफ़्ज़ों को गिन सकता था। कभी-कभी अच्छी तरह समझाने के लिए बात को तीन बार दोहराते थे। (जन्नत में मुहम्मद अलैहिस्सलाम की तरह बोला जाएगा।) आपकी मुबारक आवाज़ वहाँ तक पहुँचती थी जहाँ किसी और की आवाज़ नहीं पहुँच पाती थी। फ़ख़्र-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) हँसमुख थे। मुस्कुराकर हँसते थे और आपके मुबारक आगे के दाँत दिखाई देते थे।
हँसते तो आपका नूर दीवारों पर झलकता था। आपका रोना भी आपके हँसने की तरह हल्का था। आप न क़हक़हा लगाकर हँसते थे, न ऊँची आवाज़ से रोते थे; मगर जब ग़मगीन होते, तो मुबारक आँखों से आँसू बहते और मुबारक सीने से आवाज़ सुनाई देती थी। अपनी उम्मत के गुनाहों को सोचकर, अल्लाह तआला के ख़ौफ़ से, क़ुरआन-ए-करीम सुनकर और कभी नमाज़ पढ़ते हुए भी रोते थे। फ़ख़्र-ए-आलम की मुबारक उँगलियाँ मोटी और मुबारक बाज़ू भरे हुए थे। मुबारक हथेलियाँ चौड़ी थीं। आपके पूरे जिस्म की ख़ुशबू मुश्क से भी अच्छी थी। मुबारक बदन नर्म भी था और मज़बूत भी। अनस इब्ने मालिक कहते हैं: ‘मैंने दस साल रसूलुल्लाह की ख़िदमत की। आपके मुबारक हाथ रेशम से भी नर्म थे।’
आपकी मुबारक जिल्द से मुश्क और फूलों से भी अच्छी ख़ुशबू आती थी। मुबारक बाज़ू, पाँव और उँगलियाँ लंबी थीं। मुबारक पाँवों की उँगलियाँ मोटी थीं; तलवों का बीच ज़्यादा ऊँचा नहीं था और वे नर्म थे। मुबारक पेट चौड़ा और सीने के बराबर था। कंधों की हड्डियाँ बड़ी और मुबारक सीना चौड़ा था। रसूलुल्लाह का मुबारक दिल नज़रगाह-ए-इलाही (अल्लाह तआला की नज़र की जगह) था। रसूल-ए-अकरम न बहुत लंबे क़द के थे, न छोटे क़द के। अगर कोई लंबा आदमी आपके पास आ जाता, तो आप उससे लंबे दिखाई देते थे। बैठते तो आपके मुबारक कंधे बैठे हुए तमाम लोगों से ऊँचे होते थे।
मुबारक सिर और दाढ़ी के बाल न बहुत घुँघराले थे, न बिल्कुल सीधे, बल्कि पैदाइशी तौर पर लहरदार थे। मुबारक बाल लंबे थे; पहले आप पेशानी पर बालों की लट छोड़ते थे, बाद में माँग निकालने लगे। मुबारक बालों को कभी बढ़ाते और कभी कटवाकर छोटा करते थे। बाल और दाढ़ी को रंगते नहीं थे। इंतिक़ाल के वक़्त आपके बालों और दाढ़ी में सफ़ेद बाल बीस से भी कम थे। मुबारक मूँछें कतरवाते थे। मूँछों की लंबाई और शक्ल मुबारक भौंहों जितनी थी। आपकी ख़िदमत में ख़ास हज्जाम थे।
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मिस्वाक और कंघी को अपने पास से जुदा नहीं करते थे। मुबारक बालों और दाढ़ी में कंघी करते वक़्त आईना देखते थे। फ़ख़्र-ए-कायनात सामने देखते हुए तेज़ चलते थे, और आप किसी जगह से गुज़रते, तो आपकी ख़ुशबू से मालूम हो जाता था। रसूलुल्लाह अरब थे। यानी आपका रंग सुर्ख़ी मिला सफ़ेद था; आप बेहद ख़ूबसूरत, नूरानी और प्यारे थे।” जो शख़्स नबी-ए-करीम को काला कहे, वह काफ़िर हो जाता है। लुग़त में “अरब” का मतलब है “ख़ूबसूरत”। मसलन “लिसानुल अरब” का मतलब है “ख़ूबसूरत ज़बान”। इस्तिलाही मायने में, यानी जुग़राफ़िया के लिहाज़ से, अरब वह शख़्स है जो अरब नाम के जज़ीरा-नुमा में पैदा होकर बड़ा हुआ, वहाँ की आब-ओ-हवा, पानी और ग़िज़ा से पला और वहीं के लोगों की नस्ल से है। जिस तरह अनातोलिया की नस्ल वालों को तुर्क, बुल्गारिया में पैदा होकर बड़े होने वालों को बुल्गार और जर्मनी वालों को जर्मन कहा जाता है, उसी तरह रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) भी जज़ीरा-ए-अरब में पैदा होने की वजह से अरब हैं। अरब सफ़ेद और गेहुँए रंग के होते हैं। ख़ास तौर पर हमारे नबी का ख़ानदान सफ़ेद रंग का और बहुत ख़ूबसूरत था। वैसे भी आपके जद्द-ए-अमजद इब्राहीम अलैहिस्सलाम सफ़ेद रंग के थे और बसरा शहर के रहने वाले तारूख़ नाम के एक सफ़ेद रंग वाले मोमिन के बेटे थे। काफ़िर आज़र इब्राहीम अलैहिस्सलाम का बाप नहीं, बल्कि चचा और सौतेला बाप था।
“मैंने दस साल रसूलुल्लाह की ख़िदमत की। आपके मुबारक हाथ रेशम से भी नर्म थे। आपकी मुबारक जिल्द से मुश्क और फूलों से भी अच्छी ख़ुशबू आती थी” अनस इब्ने मालिक (रज़ियल्लाहु अन्हु)
हमारे प्यारे नबी के वालिद अब्दुल्लाह की ख़ूबसूरती के चर्चे मिस्र तक फैल गए थे, और उनकी पेशानी के नूर की वजह से लगभग दो सौ लड़कियाँ उनसे शादी करने के लिए मक्का आई थीं। लेकिन मुहम्मद अलैहिस्सलाम का नूर आमिना को नसीब हुआ। आपके चचा अब्बास और अब्बास के बेटे अब्दुल्लाह भी सफ़ेद रंग के थे। क़यामत तक हमारे नबी की औलाद भी ख़ूबसूरत और सफ़ेद रंग की है। रसूलुल्लाह के सहाबा भी सफ़ेद रंग के और ख़ूबसूरत थे। उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) गोरे और सुनहरे बालों वाले थे। रसूलुल्लाह ने रूम के बादशाह हिरक़्ल की हुकूमत के पास जिन्हें सफ़ीर बनाकर भेजा था, वह दिहया कल्बी बहुत ख़ूबसूरत थे; जब वह गलियों में चलते, तो रूम की लड़कियाँ उनका चेहरा देखने के लिए गलियों में निकल आती थीं। जिबराईल अलैहिस्सलाम अक्सर दिहया (रज़ियल्लाहु अन्हु) की शक्ल में आते थे। मिस्र, शाम (सीरिया), अफ़्रीक़ा, सिसली और स्पेन के असली बाशिंदे अरब नहीं हैं। लेकिन चूँकि अरब इस्लाम को दुनिया में फैलाने के लिए जज़ीरा-ए-अरब से निकलकर इन इलाक़ों में आए, इसलिए आज वे यहाँ भी मौजूद हैं। इसी तरह अनातोलिया, हिन्दुस्तान और दूसरे मुल्कों में भी मौजूद हैं। लेकिन आज इन मुल्कों में से किसी के भी बाशिंदों को अरब कहना सही नहीं होगा।
मिस्र के लोग साँवले हैं। हब्शा के लोग काले हैं; इन्हें हब्शी कहा जाता है। ज़ंजिबार के लोगों को ज़ंजी कहा जाता है; ये भी काले हैं। हमारे नबी के रिश्तेदारों और आपकी नस्ल से मुहब्बत करना और उनकी इज़्ज़त करना इबादत है। हर मुसलमान उनसे मुहब्बत करता है। अनातोलिया में मेहमान बनकर आने वाले काले फ़ल्लाहों, हब्शियों और ज़ंजियों ने इज़्ज़त और ख़ातिरदारी पाने के लिए ख़ुद को अरब बताया, और अनातोलिया के सीधे-सादे मुसलमानों ने उनकी बातों पर यक़ीन करके उनसे मुहब्बत की, क्योंकि इस मुहब्बत में काले और गोरे का कोई फ़र्क़ नहीं। एक काला मुसलमान एक गोरे काफ़िर से कई गुना बेहतर, ज़्यादा क़ीमती और ज़्यादा प्यारा है। इंसान का काला होना ईमान के शरफ़ को कम नहीं करता। हज़रत बिलाल हब्शी और रसूलुल्लाह के बहुत प्यारे उसामा काले थे। जिनकी बुराइयाँ और कमीनापन सब पर ज़ाहिर है, वे काफ़िर अबू लहब और अबू जहल गोरे थे। अल्लाह तआला इंसान का रंग नहीं देखता, बल्कि उसके ईमान की ताक़त और तक़्वा की क़द्र करता है। लेकिन कालों का ख़ुद को अरब बताना इस्लाम के दुश्मनों, यानी यहूदियों के काम आया। एक तरफ़ उन्होंने काले इंसानों को घटिया और घिनौना बताकर पेश किया। उन्हें ग़ुलाम बनाकर इस्तेमाल किया।
दूसरी तरफ़ काली बिल्लियों और कुत्तों को “अरब, अरब” कहकर पुकारा, अख़बारों और रिसालों में छापी गई काली तस्वीरों और कार्टूनों को अरब कहा, और इस तरह नौजवानों के सामने अरब को काला बताकर मुसलमान बच्चों को हमारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से दूर करने की कोशिश की।
तमाम अच्छी आदतें हमारे प्यारे नबी में जमा थीं। आपकी अच्छी आदतें वहबी, यानी अल्लाह तआला की तरफ़ से दी हुई थीं; कसबी, यानी मेहनत करके बाद में हासिल की हुई नहीं थीं। आपने कभी किसी मुसलमान का नाम लेकर उस पर लानत नहीं की और कभी अपने मुबारक हाथ से किसी को नहीं मारा। अल्लाह के लिए बदला लिया, मगर अपने लिए किसी से कभी बदला नहीं लिया। अपने रिश्तेदारों, सहाबा और ख़िदमतगारों से आजिज़ी के साथ अच्छा सुलूक करते थे। घर में बहुत नर्म और हँसमुख रहते थे। बीमारों की इयादत को जाते और जनाज़ों में शरीक होते थे। सहाबा के कामों में हाथ बँटाते और उनके बच्चों को गोद में लेते थे। लेकिन आपका दिल इन चीज़ों में मशग़ूल नहीं होता था। आपकी मुबारक रूह फ़रिश्तों के आलम में थी। जो रसूलुल्लाह को अचानक देखता, उस पर रोब छा जाता। अगर आप ख़ुद नरमी न बरतते, तो नुबुव्वत की शान की वजह से कोई आपके पास बैठ न सकता और आपकी बात सुनने की ताब न ला पाता। हालाँकि आप ख़ुद हया की वजह से अपनी मुबारक आँखों से किसी के चेहरे की तरफ़ नज़र भरकर नहीं देखते थे।
फ़ख़्र-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इंसानों में सबसे ज़्यादा सख़ी थे। ऐसा कभी नहीं देखा गया कि आपसे कुछ माँगा गया हो और आपने “नहीं” कहा हो। माँगी हुई चीज़ होती तो दे देते, न होती तो ख़ामोश रहते।
आपकी भलाइयाँ और एहसान इतने थे कि रूम के बादशाह, ईरान के शाह और कोई भी बादशाह आपके जितना एहसान नहीं कर सकता था। लेकिन आप ख़ुद तंगी में रहना पसंद करते थे; ऐसी ज़िंदगी गुज़ारते थे कि खाने-पीने का ख़याल भी आपके दिल में नहीं आता था। कभी यह नहीं फ़रमाते थे: “खाना लाओ, खाएँ” या “फ़लाँ खाना पकाओ।” खाना लाया जाता तो खा लेते, जो भी फल पेश किया जाता, क़बूल कर लेते। कभी महीनों तक थोड़ा खाते और भूख को पसंद करते थे। कभी ज़्यादा भी खाते थे। खाने के बाद पानी नहीं पीते थे। पानी बैठकर पीते थे।2 दूसरों के साथ खाते, तो सबके बाद हाथ रोकते थे।3 हर एक का तोहफ़ा क़बूल करते थे। तोहफ़ा लाने वाले को बदले में उससे कई गुना ज़्यादा देते थे।
तरह-तरह के कपड़े पहनना आपकी आदत थी। जब ग़ैर मुल्कों के सफ़ीर आते, तो आप सज-सँवरकर, क़ीमती और उम्दा लिबास पहनकर अपना ख़ूबसूरत चेहरा दिखाते थे। अक़ीक़ के नगीने वाली चाँदी की अँगूठी पहनते थे और उसे मुहर के तौर पर इस्तेमाल करते थे। अँगूठी पर “मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” लिखा हुआ था। आपका बिस्तर चमड़े का था और उसके अंदर खजूर के पेड़ की छाल के रेशे भरे हुए थे। कभी इस बिस्तर पर, कभी ज़मीन पर बिछे चमड़े पर, और कभी चटाई या सूखी मिट्टी पर सोते थे। अपनी मुबारक हथेली दाहिने गाल के नीचे रखकर दाहिनी करवट पर सोते थे।4 रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ज़कात का माल नहीं लेते थे, कच्ची प्याज़ और लहसुन जैसी चीज़ें नहीं खाते थे और शेर नहीं कहते थे। नबी-ए-करीम की मुबारक आँखें सोती थीं, मगर मुबारक दिल नहीं सोता था। भूखे सोते और ऐसे उठते जैसे पेट भरा हो। कभी जमाही नहीं लेते थे। आपका मुबारक जिस्म नूरानी था, उसका साया ज़मीन पर नहीं पड़ता था। आपके कपड़ों पर मक्खी नहीं बैठती थी, मच्छर और दूसरे कीड़े आपका मुबारक ख़ून नहीं चूसते थे।
अल्लाह तआला की तरफ़ से आपके रसूलुल्लाह होने की ख़बर दिए जाने के बाद शैतान आसमानों पर चढ़कर ख़बरें न ला सके और काहिन भी ग़ैब की ख़बरें न बता सके। सरवर-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) आज भी ऐसी ज़िंदगी के साथ ज़िंदा हैं जिसे हम नहीं जानते। आपका मुबारक जिस्म कभी नहीं गलता। आपकी क़ब्र-ए-मुबारक में एक फ़रिश्ता खड़ा रहता है जो आपकी उम्मत के भेजे हुए दुरूद शरीफ़ आप तक पहुँचाता है। आपके मिम्बर और क़ब्र-ए-मुबारक के बीच की जगह को रौज़ा-ए-मुतह्हरा कहा जाता है। यह जगह जन्नत के बाग़ों में से है। आपकी क़ब्र-ए-मुबारक की ज़ियारत करना इताअतों में सबसे बड़ी और इबादतों में सबसे क़ीमती है। सहाबा-ए-किराम के बड़ों ने नबी-ए-करीम की ख़ूबसूरती इस तरह बयान की: अबू हुरैरा ने फ़रमाया: “मैंने रसूलुल्लाह से ज़्यादा ख़ूबसूरत कोई शख़्स नहीं देखा। ऐसा लगता था जैसे सूरज अपनी पूरी चमक के साथ आपके चेहरे में चमक रहा हो। जब आप हँसते, तो आपके दाँत दीवारों पर रौशनी बिखेरते थे।”
“मेरी उम्मत में मुझसे सबसे ज़्यादा मुहब्बत करने वाले वे लोग हैं जो मेरे बाद आएँगे और मुझे देखने के लिए अपने घर वालों और माल को क़ुरबान कर देंगे” हदीस शरीफ़
इब्ने अबी हाला ने फ़रमाया: “नबी-ए-करीम का मुबारक चेहरा चौदहवीं के चाँद की तरह चमकता था।” हज़रत अली ने फ़रमाया: “जो आपको अचानक देखता, आपके रोब से उस पर ख़ौफ़ छा जाता। और जो आपके साथ बैठकर बातचीत करता और आपको पहचान लेता, वह फ़ौरन आपसे घुल-मिल जाता और आपसे मुहब्बत करने लगता।”
जाबिर इब्ने समुरा ने फ़रमाया: “रसूलुल्लाह ने अपना मुबारक हाथ मेरे चेहरे पर फेरा। मैंने आपके हाथ में ऐसी ख़ुशबू और ठंडक पाई, जैसे उसे अभी-अभी अत्तारों, यानी ख़ुशबू बेचने वालों के थैले से निकाला गया हो। अगर रसूलुल्लाह मुसाफ़हा के लिए किसी के हाथ से अपना हाथ मिला देते, तो सारा दिन उस शख़्स के हाथ से वह प्यारी ख़ुशबू नहीं जाती थी।”5
हमारी माँ हज़रत आइशा ने फ़रमाया: “जब रसूलुल्लाह किसी बच्चे के सिर पर हाथ फेरते, तो दूसरे बच्चों के बीच वह बच्चा अपनी ख़ुशबू से फ़ौरन पहचान लिया जाता था।”6
एक दिन रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपने घर में सो रहे थे। अनस इब्ने मालिक की वालिदा उम्मे सुलैम आईं। नींद के दौरान रसूलुल्लाह के मुबारक चेहरे पर पसीने की बूँदें नमूदार हो गई थीं। उम्मे सुलैम नबी-ए-करीम का मुबारक पसीना जमा करने लगीं। आप जागे और इसकी वजह पूछी, तो नबी-ए-करीम की रज़ाई ख़ाला उम्मे सुलैम ने कहा: “हम इसे अपनी ख़ुशबुओं में मिलाते हैं। आपका पसीना ख़ुशबुओं में सबसे अच्छी और सबसे प्यारी ख़ुशबू है।”7
अबू हुरैरा ने फ़रमाया: “मैंने चलने में रसूलुल्लाह से ज़्यादा तेज़ कोई शख़्स नहीं देखा। ऐसा लगता था जैसे ज़मीन आपके लिए लपेटी जा रही हो। आपके साथ चलते हुए हमें अपनी पूरी ताक़त लगानी पड़ती थी।”
नबी-ए-करीम बेहद ख़ूबसूरत अंदाज़ में बात करते थे। बात कहाँ से शुरू करनी है और कहाँ ख़त्म करनी है, यह सबसे कामिल तरीक़े से जानते थे। आपकी बातें अदायगी के लिहाज़ से साफ़, बेहद फ़सीह और बलीग़ थीं। आपकी बातों और लफ़्ज़ों में मायने की सच्चाई हमेशा झलकती थी। बयान करने की ताक़त बेहद बुलंद होने की वजह से बात करते हुए आप न कभी थकते थे और न कोई तकल्लुफ़ करते थे।
नबी-ए-करीम की ख़ूबसूरती
“उलेमा-ए-रासिख़ीन” कहलाने वाले, ज़ाहिरी और बातिनी दोनों इल्मों में उस्ताद और नबी-ए-करीम के वारिस बुलंद इस्लामी आलिमों ने आपको आपकी तमाम ख़ूबसूरतियों के साथ देखा और आप पर आशिक़ हुए। इनमें सबसे आगे अबू बकर सिद्दीक़ हैं। उन्होंने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) में नुबुव्वत का नूर देखकर, आपकी बरतरी, ख़ूबसूरती और बुलंदी को समझकर आपसे इश्क़ किया, और इसमें इतना आगे बढ़ गए कि कोई और उनके जैसा न हो सका। हज़रत अबू बकर हर पल, जहाँ भी नज़र डालते, रसूलुल्लाह को देखते थे। एक बार उन्होंने अपना हाल यूँ अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! जहाँ भी देखता हूँ, आपको ही देखता हूँ।” एक और बार कहा: “मैं अपनी तमाम नेकियाँ आपकी एक सह्व (भूल) के बदले दे दूँ।” रसूलुल्लाह की ख़ूबसूरती को सबसे अच्छी तरह देखने, समझने और बयान करने वालों में से एक उम्मुल मोमिनीन (मोमिनों की माँ), हमारी माँ हज़रत आइशा थीं। हज़रत आइशा आलिमा, मुज्तहिद, अक़्लमंद, ज़हीन और अदीबा थीं। बेहद बलीग़ और फ़सीह बात करती थीं। क़ुरआन-ए-करीम के मायने, हलाल और हराम, अरबी शायरी और हिसाब का इल्म बहुत अच्छी तरह जानती थीं। रसूलुल्लाह की तारीफ़ में उनके शेर हैं। ये दो शेर हज़रत आइशा ने कहे हैं:
“जब रसूलुल्लाह किसी बच्चे के सिर पर हाथ फेरते, तो दूसरे बच्चों के बीच वह बच्चा अपनी ख़ुशबू से फ़ौरन पहचान लिया जाता था” हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा)
व लौ समिऊ अहलु मिस्रा औसाफ़ा ख़द्दिही,
लमा बज़लू फ़ी सौमि यूसुफ़ा मिन नक़्दिन।
लवाइमु ज़ुलैख़ा लौ रऐना जबीनहू,
लआसरना बिल क़त्इल क़ुलूबि अलल ऐदी।
तर्जुमा:
मिस्र वाले अगर आपके रुख़सारों की ख़ूबसूरती का हाल सुन लेते,
तो यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के सौदे में एक पैसा भी न देते।
(अपना सारा माल आपके रुख़सार देखने के लिए बचाकर रखते।)
ज़ुलैख़ा को बुरा कहने वाली औरतें अगर आपकी चमकती पेशानी देख लेतीं,
तो हाथों के बजाय अपने दिल काट डालतीं (और उसका दर्द भी महसूस न करतीं)।
हज़रत आइशा फ़रमाती हैं: “एक दिन रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपनी मुबारक जूतियों के तस्मे निकाल रहे थे, और मैं सूत कात रही थी। मैंने आपके मुबारक चेहरे की तरफ़ देखा। आपकी चमकती पेशानी से पसीना टपक रहा था। पसीने का हर क़तरा चारों तरफ़ नूर बिखेर रहा था और मेरी आँखों को चकाचौंध कर रहा था। मैं हैरान रह गई। आपने मेरी तरफ़ देखकर फ़रमाया: ‘तुम्हें क्या हुआ कि इस तरह खोई-खोई हो?’ मैंने अर्ज़ किया: ‘या रसूलल्लाह! आपके मुबारक चेहरे के नूरों की चमक और आपकी मुबारक पेशानी के पसीने के क़तरों से बिखरती रौशनी को देखकर मैं अपने आप में न रही।’ रसूलुल्लाह उठकर मेरे पास आए। मेरी दोनों आँखों के बीच चूमा और फ़रमाया: ‘ऐ आइशा! अल्लाह तआला तुम्हें भलाइयाँ अता फ़रमाए! जिस तरह तुमने मुझे ख़ुश किया, उस तरह मैं तुम्हें ख़ुश न कर सका।’” यानी आपने फ़रमाया: “तुम्हारा मुझे ख़ुश करना मेरे तुम्हें ख़ुश करने से ज़्यादा है।” आपने हज़रत आइशा की दोनों मुबारक आँखों के बीच इसलिए चूमा कि वह रसूलुल्लाह से मुहब्बत करते हुए, आपके जमाल को समझकर देखती थीं। इसी वजह से उनकी क़द्रदानी की गई और उन पर नवाज़िश हुई।
मिसरा:
शाबाश मेरी आँखों को, कि आपकी ख़ूबसूरती देख पाती हैं!
और शेर:
कितनी अच्छी हैं वे आँखें, जो हसीन को देख रही हैं!
कितना ख़ुशनसीब है वह दिल, जो आपके लिए जल रहा है!
रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के मुबारक बदन में बातिनी ख़ूबसूरतियों को ज़ाहिर करने वाली जो ज़ाहिरी ख़ूबसूरतियाँ जमा थीं, वे किसी और शख़्स के बदन में जमा नहीं हुईं।
हज़रत इमाम क़ुर्तुबी ने यह रिवायत की है: “रसूल-ए-अकरम की ख़ूबसूरती पूरी तरह ज़ाहिर नहीं हुई। अगर आपकी असली ख़ूबसूरती ज़ाहिर हो जाती, तो सहाबा-ए-किराम आपको देखने की ताब न ला पाते। अगर आप अपनी असली ख़ूबसूरती दिखा देते, तो कोई भी आपको देखने की ताब न ला सकता।”
यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ज़ाहिरी और रसूलुल्लाह बातिनी ख़ूबसूरतियों के साथ लोगों के सामने ज़ाहिर हुए। यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का जमाल देखकर हाथ कट गए। रसूलुल्लाह के कमाल से ज़ुन्नार कट गए, बुत टूट गए और कुफ़्र के बादल छँट गए। सहाबा-ए-किराम ने नबी-ए-करीम से पूछा: “या रसूलल्लाह! आप ज़्यादा ख़ूबसूरत हैं या यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ज़्यादा ख़ूबसूरत थे?” आपने जवाब में फ़रमाया: “मेरे भाई यूसुफ़ मुझसे सबीह (ख़ूबसूरत) हैं, और मैं उनसे मलीह (प्यारा) हूँ। उनकी ज़ाहिरी ख़ूबसूरती मेरी ज़ाहिरी ख़ूबसूरती से ज़्यादा है।”
एक हदीस शरीफ़ में नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “अल्लाह तआला ने जो भी नबी भेजा, वह ख़ूबसूरत चेहरे और ख़ूबसूरत आवाज़ वाला था। और तुम्हारे नबी उन सबमें सबसे ख़ूबसूरत चेहरे और सबसे ख़ूबसूरत आवाज़ वाले हैं।”
एक शख़्स रसूलुल्लाह के पास आया और कहा: “ऐ अल्लाह तआला के रसूल! क़यामत कब क़ायम होगी?” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “तुमने क़यामत के लिए क्या तैयारी की है?” उस शख़्स ने कहा: “सच तो यह है कि मैंने बहुत नमाज़ें पढ़कर, रोज़े रखकर और सदक़ा देकर क़यामत की तैयारी नहीं की। लेकिन मैं अल्लाह तआला से और उसके रसूल से मुहब्बत करता हूँ।” इस पर नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “आदमी उसी के साथ है जिससे वह मुहब्बत करता है।”8
रसूलुल्लाह से मुहब्बत करना तमाम मुसलमानों पर फ़र्ज़-ए-ऐन है।
जब उस सरवर की मुहब्बत किसी दिल में बस जाती है, तो इस्लाम पर अमल करना और ईमान और इस्लाम के मज़े और कभी न भरने वाली लज़्ज़त तक पहुँचना बहुत आसान हो जाता है। यह मुहब्बत दोनों जहान के सरदार की पूरी पैरवी का सबब बनती है। इस मुहब्बत से इंसान उन बेहद और बयान से बाहर नेमतों और बरकतों को पाने का शरफ़ हासिल करता है जो अल्लाह तआला ने अपने हबीब को अता फ़रमाई हैं। छोटे-बड़े हर मुसलमान को सीधे रसूलुल्लाह की मुहब्बत तक पहुँचाने वाले अहले सुन्नत के आलिम और उनकी किताबें इन बरकतों की सनद हैं।
जो मोमिन रसूल अलैहिस्सलाम का मुबारक नाम ले या सुने, उस पर वाजिब है कि वह ऐसे सुकून और अदब के साथ, दिल और बदन से ताज़ीम करता हुआ रहे, जैसे वह रसूलुल्लाह की मुबारक मजलिस में बैठा हो।
रसूलुल्लाह की मुबारक बातों और कामों में से बताई गई किसी चीज़ का जवाब ऐसी बात से देना जो आपकी शान को बुलंद करे, आपकी ताज़ीम और एहतिराम में से है। लोगों के बीच घटिया और गिरे हुए दर्जे के लिए इस्तेमाल होने वाले लफ़्ज़ों से रसूलुल्लाह का वस्फ़ न करना भी आपकी ताज़ीम में से है।
मसलन रसूलुल्लाह को फ़क़ीर या चरवाहा नहीं कहा जाता। जब कहा जाए कि “रसूलुल्लाह फ़लाँ चीज़ पसंद फ़रमाते थे”, तो यह न कहना कि “मगर मुझे वह पसंद नहीं”, आपकी ताज़ीम में से है। इसी तरह रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के इस इरशाद के मुक़ाबले में: “मैं किसी चीज़ से टेक लगाकर, सहारा लेकर नहीं खाता”,9 यह कहकर कि “मैं तो टेक लगाकर खाता हूँ” और फिर टेक लगाकर खाकर आपकी मुख़ालफ़त नहीं करनी चाहिए। इन बातों का ख़याल रखना रसूलुल्लाह की ताज़ीम में शामिल है। जान-बूझकर, इन्हें अहमियत न देने की नीयत से इनका लिहाज़ न करना कुफ़्र के दरवाज़े खोल देता है।
क़ुरआन-ए-करीम और हदीस शरीफ़ की किताबों के ऊपर कोई दूसरी किताब या घर का कोई सामान न रखना भी अल्लाह तआला और उसके रसूल की ताज़ीम में से है। उन पर से गर्द साफ़ करना, और ऐसे काग़ज़ को न फेंकना जिसमें अल्लाह तआला का मुबारक नाम या रसूलुल्लाह के मुबारक नाम लिखे हों, अल्लाह तआला और उसके रसूल की ताज़ीम है। ऐसे काग़ज़ फाड़े नहीं जाते। इस्लामी हुरूफ़ में लिखे हुए काग़ज़ों का और भी ज़्यादा एहतिराम करना ज़रूरी है। अगर ऐसी किताबें और काग़ज़, जिनमें अल्लाह तआला का मुबारक नाम और आयात-ए-करीमा हों, पुराने होने की वजह से फट जाएँ, तो उन्हें पाक कपड़े में लपेटकर ज़मीन में दफ़न कर देना चाहिए, या पानी से धोकर उनकी लिखावट मिटा देनी चाहिए, या जला देना चाहिए। जलाने के बाद उनकी राख दफ़न की जाती है। जलाना धोकर लिखावट मिटाने से बेहतर है, क्योंकि धोने में इस्तेमाल होने वाला पानी पाँव के नीचे आ सकता है।
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के हरम मदीना मुनव्वरा की ताज़ीम और एहतिराम करना, वहाँ मना की गई चीज़ों से (या गुनाह करने से) बचना और मदीना मुनव्वरा के रहने वालों की ख़ातिरदारी करना भी रसूलुल्लाह की ताज़ीम में गिना जाता है।
मेरे वुजूद की सल्तनत के सुल्तान आप हैं,
बेशक मेरी जान के जानाँ आप हैं।
सेज़ाई ने अब अपना सब कुछ मिटा दिया,
जो कुछ मौजूद है, वह आपका एहसान ही है।
Hasan Sezâî
“मेरे भाई यूसुफ़ मुझसे सबीह (ख़ूबसूरत) हैं, और मैं उनसे मलीह (प्यारा) हूँ। उनकी ज़ाहिरी ख़ूबसूरती मेरी ज़ाहिरी ख़ूबसूरती से ज़्यादा है” हदीस शरीफ़
