मेरे प्यारे नबी

तबूक का ग़ज़वा

तबूक मदीना मुनव्वरा और दमिश्क़ शहर के बीच एक मशहूर जगह है। कुछ लोगों ने कहा है कि यह एक चश्मे का नाम है। यह सफ़र नबी-ए-करीम का आख़िरी जंगी सफ़र था, इसलिए इसे “तबूक का ग़ज़वा” कहा गया। इसे “फ़ाज़िहा” भी कहते हैं, क्योंकि इस जंग में मुनाफ़िक़ रुसवा हुए। इसे “जैशुल उसरा” भी कहते हैं। इस सफ़र में मुसलमानों ने बहुत मशक़्क़त उठाई। ऊपर से फ़ासला लंबा था और मौसम बहुत गर्म था। दुश्मन के सिपाही बहुत ज़्यादा और ताक़तवर थे। क़हत का ज़माना था। दस-दस आदमी बारी-बारी एक ऊँट पर सवार होते थे। ज़्यादातर सिपाहियों ने एक महीने तक खजूर के सिवा कुछ न खाया। कभी भुने हुए जौ खा लेते थे। कभी वह भी न मिलता था। मुसलमान हिजरत के नवें साल, रजब महीने में, जुमेरात के दिन तबूक के सफ़र पर रवाना हुए।

इस्लाम जज़ीरा-ए-अरब में तेज़ी से फैल रहा था। इसी नवें साल ईसाई अरबों ने रूम के बादशाह हिरक़्ल को ख़त लिखा, जो “इस्लामी रियासत” से जलता था और उसकी तरक़्क़ी रोकना चाहता था। उन्होंने लिखा था: “नुबुव्वत का दावा लेकर उठने वाला वह शख़्स वफ़ात पा गया है। मुसलमान इस वक़्त क़हत और तंगी में हैं। अगर तुम उन्हें अपने दीन की तरफ़ फेरना चाहते हो, तो अभी ठीक वक़्त है।” इस ख़त पर हिरक़्ल ने मुसलमानों से लड़ने के लिए क़ुबाद की कमान में चालीस हज़ार का लश्कर रवाना किया। यह ख़बर पाकर फ़ख़्र-ए-कायनात ने अपने सहाबा को जमा किया और उन्हें जंग की तैयारी का हुक्म दिया। उस साल सूखा पड़ा था, इसलिए सहाबा माली तौर पर बड़ी तंगी में थे। सिर्फ़ तिजारत करने वालों का हाल कुछ बेहतर था। इस्लामी लश्कर बहुत बड़ा था। खाने का सामान और जंग का साज़-ओ-सामान कम था। मुश्किलें उठानी ही थीं। नबी-ए-करीम ने चाहा कि आपके सहाबा जंग में शरीक होने वाले सिपाहियों के साज़-ओ-सामान के लिए माली मदद करें। नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की इस ख़्वाहिश ने सहाबा को हरकत में ला दिया। हर कोई जो कुछ उसके पास था, ला रहा था और अपने माल और जान के साथ जिहाद की तैयारी में लगा था।

नबी-ए-करीम के ग़ार के साथी हज़रत अबू बकर अपना सारा माल ले आए थे। रसूल-ए-अकरम ने उनसे पूछा: “ऐ अबू बकर! अपने घर वालों के लिए क्या छोड़ा?” तो उन्होंने जवाब दिया: “अल्लाह तआला और उसके रसूल को छोड़ आया हूँ।” हज़रत उमर अपना आधा माल मदद के तौर पर लाए थे। नबी-ए-करीम ने उनसे भी पूछा: “ऐ उमर! अपने घर वालों के लिए क्या छोड़ा?” उन्होंने जवाब दिया: “जितना लाया हूँ, उतना छोड़ आया हूँ।” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “तुम दोनों के बीच का फ़र्क़ वैसा ही है जैसा तुम्हारी बातों के बीच का फ़र्क़।” इस पर हज़रत उमर ने उनकी क़द्र करते हुए कहा: “मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान, ऐ अबू बकर! भलाई की राह की हर दौड़ में आप मुझसे आगे निकल जाते हैं। अब मैं अच्छी तरह समझ गया कि मैं किसी भी चीज़ में आपसे आगे नहीं बढ़ सकूँगा।”1 सहाबा-ए-किराम अपनी ताक़त भर मदद करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन मुनाफ़िक़ यह कहकर उनका मज़ाक़ उड़ाते थे: “तुम दिखावे के लिए देते हो।” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “जो आज कोई सदक़ा देगा, क़यामत के दिन अल्लाह तआला के यहाँ उसका सदक़ा उसके हक़ में गवाही देगा।” नबी-ए-करीम की इन मुबारक बातों के बाद मोमिन और ज़्यादा मदद करने लगे। हज़रत उस्मान इब्ने अफ़्फ़ान ने आधे लश्कर का साज़-ओ-सामान मुहैया किया।2 उस्मान ज़िन्नूरैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने इस लश्कर को साज़-ओ-सामान समेत नौ सौ पचास ऊँट और पचास घोड़े दिए, उनके सवारों का साज़-ओ-सामान भी अपने ज़िम्मे लिया, और इसके अलावा दस हज़ार दीनार या सात सौ रुक़िया सोना भी भेजा।3 इस तरह वह मुसलमानों में सबसे ज़्यादा मदद करने वाले बने। हज़रत उस्मान ने लश्कर की ज़रूरतें इस तरह पूरी कीं कि पानी की मशकों की मरम्मत में काम आने वाला बड़ा सूआ तक रखना न भूले। उनकी इस मदद पर रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “आज के बाद उस्मान के लिए कोई गुनाह नहीं लिखा जाएगा।”4 और एक सहाबी, जिनकी माली हालत बहुत कमज़ोर थी, जिहाद में मदद का सवाब पाने के लिए उस रात सुबह तक एक खजूर के बाग़ में पानी खींचते रहे, फिर कमाई हुई खजूरें नबी-ए-करीम के पास लाए और कहा: “या रसूलल्लाह! अपने रब की रज़ा हासिल करने के लिए जो कुछ मेरे हाथ में था, ले आया हूँ। क़बूल फ़रमाइए।”

“ऐ उमर! तुम दोनों (अबू बकर और तुम) के बीच का फ़र्क़ वैसा ही है जैसा तुम्हारी बातों के बीच का फ़र्क़” हदीस शरीफ़

मुसलमान मर्द जहाँ अपनी ताक़त भर मदद की कोशिश कर रहे थे, वहीं औरतें भी इस राह में अपनी ज़िम्मेदारी पूरी तरह निभा रही थीं। तबूक के सफ़र की तैयारी के वक़्त मुसलमान बड़ी तंगी में थे। क़हत इतना सख़्त था कि सहाबा-ए-किराम में से बहुत-से लोग, जिनके हाथ में कुछ भी न बचा था, रसूलुल्लाह की ख़िदमत में आकर कहते: “या रसूलल्लाह! हम पैदल रह गए हैं! खाने को भी कुछ नहीं! हम इस ग़ज़वे में आपके साथ रहकर जिहाद का सवाब पाना चाहते हैं।” हमारे प्यारे नबी उन्हें अफ़सोस के साथ बताते कि आपके पास उन्हें सवार करने के लिए कुछ नहीं बचा। एक बार सालिम इब्ने उमैर, अब्दुल्लाह इब्ने मुग़फ़्फ़ल, अबू लैला माज़िनी, उल्बा इब्ने ज़ैद, अम्र इब्ने हुमाम, हरमी इब्ने अब्दुल्लाह और इरबाज़ इब्ने सारिया इसी गुज़ारिश के साथ हमारे प्यारे नबी की ख़िदमत में आए। नबी-ए-करीम ने बड़े ग़म के साथ उनसे फ़रमाया: “मुझे कोई ऐसी चीज़ नहीं मिल रही जिस पर तुम्हें सवार करूँ।” तो वे नबी-ए-करीम से जुदा रह जाने और जिहाद में शरीक न हो पाने के ग़म में रोने लगे। इस पर अल्लाह तआला ने यह आयत-ए-करीमा उतारी, जिसका मफ़हूम है: “(ऐ मेरे रसूल!) जब वे (जिहाद में शरीक होने के लिए) तुम्हारे पास आए, तो तुमने उनसे कहा: ‘मुझमें तुम्हें सवारी देने की ताक़त नहीं।’ इस राह में ख़र्च करने के लिए कुछ न होने की वजह से (जंग में शरीक न हो पाने के कारण) वे ग़म से आँसू बहाते हुए लौट गए। उन पर कोई ज़िम्मेदारी (गुनाह) नहीं।”5 आख़िर में हज़रत अब्बास और हज़रत उस्मान ने उन्हें भी ग़ज़वे के लिए तैयार कर दिया। तैयारी पूरी हुई तो नबी-ए-करीम ने लश्कर को सनिय्यतुल वदा में जमा किया। ग़ज़वे में शरीक न होने वाले न के बराबर थे। लश्कर जमा हो गया और रवाना होने का फ़ैसला हुआ, तो रसूल-ए-अकरम ने मुहम्मद इब्ने मस्लमा को मदीना में अपनी जगह छोड़ा।6 सफ़र शुरू होने के वक़्त नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “अपने साथ ज़्यादा जूते ले लो। जब तक तुम्हारे पास फ़ालतू जूते रहेंगे, तुम तकलीफ़ नहीं उठाओगे।”

लश्कर रवाना हुआ तो मुनाफ़िक़ों के सरदार अब्दुल्लाह इब्ने उबई ने मुसलमानों को डराने के लिए बेसिर-पैर की बातें कीं। यहाँ तक कि वह कहता था: “क़सम खाता हूँ, गोया मैं उन्हें और उनके साथियों को दो-दो करके रस्सियों में बँधा हुआ देख रहा हूँ…” लेकिन सहाबा-ए-किराम इन बातों की ज़रा परवाह न करते थे, उनका जिहाद में शरीक होने का शौक़ बढ़ता ही जाता था। यह देखकर मुनाफ़िक़ जल-भुन जाते थे। रसूलुल्लाह जब सनिय्यतुल वदा से तबूक की तरफ़ रवाना होने लगे, तो आपने लश्कर के झंडे (परचम और अलम) खुलवाए। बड़ा झंडा हज़रत अबू बकर को और एक झंडा हज़रत ज़ुबैर इब्ने अव्वाम को दिया। औस क़बीले का झंडा उसैद इब्ने हुज़ैर को और ख़ज़रज क़बीले का झंडा अबू दुजाना को दिया।7 नबी-ए-करीम की कमान में सहाबा-ए-किराम की तादाद तीस हज़ार थी, जिनमें दस हज़ार सवार थे। दाएँ बाज़ू की कमान पर हज़रत तल्हा इब्ने उबैदुल्लाह और बाएँ बाज़ू पर हज़रत अब्दुर रहमान इब्ने औफ़ मुक़र्रर किए गए।8 शान वाले सहाबा बहुत गर्म मौसम में अपने नबी की कमान में रवाना हुए। जब उनके आगे अल्लाह तआला के हबीब हों, तो खाने-पीने की चीज़ों का न होना उन्हें उनकी राह से नहीं लौटा सकता था; राह की दूरी और दुश्मन के सिपाहियों की कसरत भी उन्हें डरा नहीं सकती थी। ऐसी हालत में हर जगह जाया जा सकता था। हमारे प्यारे नबी और बहादुर सहाबा हर पड़ाव पर कुछ देर आराम करने के बाद फिर अपनी राह पर चल पड़ते थे। उनका आठवाँ पड़ाव हिज्र था, जहाँ सालेह अलैहिस्सलाम की क़ौम हलाक की गई थी। अपने नबी का हुक्म न मानने की वजह से अल्लाह तआला ने एक सख़्त सैहा, यानी आवाज़ से उन्हें हलाक कर दिया था। कायनात के सुल्तान ने अपने सहाबा से फ़रमाया: “आज रात उलटी तरफ़ से एक तेज़ आँधी चलेगी। कोई अपने साथी के बिना अपनी जगह से न उठे। हर कोई अपने ऊँट का घुटना बाँध दे। यह वह जगह है जहाँ अज़ाब उतरा था। कोई इस पानी से न पिए और न वुज़ू करे!…” हर किसी ने इस हुक्म की पाबंदी की। रात को उठी तेज़ आँधी ने चारों तरफ़ सब कुछ उलट-पुलट करना शुरू कर दिया। उसी वक़्त एक शख़्स, जिसने अपना ऊँट बाँधने में लापरवाही की थी, उसे ढूँढने के लिए अकेला उठा, तो आँधी उसे उड़ा ले गई और तय पहाड़ के दामन में ला फेंका। एक और शख़्स को हाजत की सख़्त ज़रूरत थी। जिस जगह वह हाजत के लिए गया, वहाँ उसे ख़ुन्नाक़ (काली खाँसी) नाम की बीमारी लग गई। नबी-ए-करीम की दुआ से वह फिर से तंदुरुस्त हो गया।

उस सुबह पानी के बर्तनों में एक बूँद भी पानी न बचा था। प्यास से हर कोई मरने के क़रीब पहुँच गया था। मुनाफ़िक़ों ने इसे मौक़ा जाना और यह कहकर फ़ितना खड़ा करने की कोशिश की: “अगर मुहम्मद सचमुच नबी होते, तो दुआ करके बारिश बरसा देते।”

यह हाल सारे जहानों के सरदार के सामने पेश किया गया तो आपने अपने मुबारक हाथ उठाए और अल्लाह तआला से बारिश अता करने की इल्तिजा की। गर्म और बादलों से ख़ाली मौसम में फ़ौरन बारिश के बादल नमूदार हो गए। ज़ोरदार बारिश शुरू हो गई। हर किसी ने अपने बर्तन भर लिए, वुज़ू किया और जानवरों को पानी पिलाया। बारिश रुकी और बादल छँट गए तो दिखाई दिया कि बारिश सिर्फ़ लश्कर के ऊपर ही बरसी थी।

“जो आज कोई सदक़ा देगा, क़यामत के दिन अल्लाह तआला के यहाँ उसका सदक़ा उसके हक़ में गवाही देगा” हदीस शरीफ़

तबूक का ग़ज़वा

हमारे प्यारे नबी और सहाबा ने तकबीर कही, अल्लाह तआला की हम्द की और मुनाफ़िक़ों से कहा: “अब तुम्हारे पास कोई बहाना नहीं रहा। अल्लाह तआला और उसके रसूल पर ईमान लाओ और नेक मुसलमान बन जाओ!…” लेकिन बेशर्म मुनाफ़िक़ों ने जवाब दिया: “इसमें क्या हुआ?… एक बादल गुज़रते हुए बरसा और चला गया!…” भूख भी अपनी आख़िरी हद को पहुँच गई थी: एक खजूर को दो आदमी बाँटकर खाने की नौबत आ गई थी। सख़्त गर्मी, भूख और प्यास के बावजूद वे तबूक के क़रीब पहुँच गए। हबीब-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “इंशाअल्लाह, कल चाश्त के वक़्त तुम तबूक के चश्मे पर पहुँच जाओगे। मेरे पहुँचने तक उस पानी को हाथ न लगाना।” अगले दिन वे वहाँ पहुँच गए। चश्मे का पानी बहुत कम था। हमारे प्यारे नबी ने उस पानी में से कुछ एक बर्तन में डलवाया, उसमें अपना मुबारक हाथ डालकर दुआ फ़रमाई। फिर वह पानी चश्मे में उँडेल दिया गया। एक ही पल में पानी उबलकर बढ़ गया। तीस हज़ार के इस्लामी लश्कर के पीने के बावजूद वह ज़रा भी कम न हुआ। बाद में फ़ख़्र-ए-कायनात के मोजिज़े से बढ़े इस पानी से चारों तरफ़ की ज़मीन सींची गई। वह इलाक़ा हरा-भरा मैदान बन गया और बरकतों से लबरेज़ हो गया। रसूल-ए-अकरम अपने शान वाले सहाबा के साथ तबूक पहुँचे, तो वहाँ रूम वालों और आमिला, लख़्म और जुज़ाम जैसे ईसाई बना दिए गए अरब क़बीलों पर मुश्तमिल रूमी लश्करों का कोई निशान न था। मूता में तीन हज़ार मुजाहिदों के मुक़ाबले एक लाख का रूमी लश्कर हार गया था। अब तो उनके सामने तीस हज़ार मुजाहिद थे, और उनके सिपहसालार कायनात के सरदार थे। रूम वालों ने जब सुना कि हमारे प्यारे नबी अपने बहादुर सहाबा को जमा करके आ रहे हैं, तो उनमें से हर एक भागने की जगह ढूँढने लगा।

रसूलुल्लाह ने अपने सहाबा से मशवरा किया और तबूक से आगे नहीं गए। इस दौरान उस इलाक़े में रहने वाले कुछ क़बीलों और रियासतों ने इस्लामी लश्कर के आने की ख़बर सुनी। डर के मारे उन्होंने नबी-ए-करीम के पास वफ़्द भेजे और जिज़्या देने की शर्त पर अमान माँगी। नबी-ए-करीम ने रहम फ़रमाकर उनकी पेशकश क़बूल की; हर एक के साथ अलग-अलग मुआहदे की शर्तें लिखी गईं और उन्हें बता दिया गया कि वे अमान में हैं।

सरवर-ए-कायनात (अलैहि अफ़ज़लुस्सलवात) ने लगभग बीस दिन तक दुश्मन का इंतिज़ार किया। तबूक में आपने अपने सहाबा-ए-किराम के साथ बहुत-सी सोहबतें कीं और उनके दिलों को नूर के समुंदर से धोया। अपने मुबारक दिल से उमड़ने वाले फ़ैज़ और बरकतें उनके दिलों में उँडेल दीं। अपनी बेमिसाल सोहबतों में से एक में आपने फ़रमाया: “क्या मैं तुम्हें लोगों में सबसे बेहतर और सबसे शरफ़ वाले की ख़बर न दूँ?” सहाबा-ए-किराम ने कहा: “जी हाँ, ख़बर दीजिए, या रसूलल्लाह!”

इस पर आपने फ़रमाया: “लोगों में सबसे बेहतर वह है जो अपने घोड़े या ऊँट की पीठ पर, या अपने दोनों पाँव पर, आख़िरी साँस तक अल्लाह तआला की राह में मेहनत करता है। और लोगों में सबसे बुरा वह सरकश है जो अल्लाह तआला की किताब पढ़ता है और उससे कोई फ़ायदा नहीं उठाता।”

शहादत के बारे में पूछने वाले एक शख़्स से आपने फ़रमाया: “उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसके क़ब्ज़ा-ए-क़ुदरत में मेरी जान है, शहीद क़यामत के दिन अपनी तलवारें गर्दनों में लटकाए हुए आएँगे। वे नूर के मिम्बरों पर बैठेंगे।”9

इस ग़ज़वे में नबी-ए-करीम के बहुत-से मोजिज़े देखे गए। मसलन, तबूक से मदीना लौटने की तैयारियों के दौरान भूख से बेहाल सहाबा ने अपना हाल नबी-ए-करीम के सामने पेश किया। रसूलुल्लाह ने उनका बचा हुआ खाना चमड़े के एक दस्तरख़्वान पर जमा करवाया। इससे मुश्किल से एक छोटी हाँडी भरी। सरवर-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपना वुज़ू ताज़ा किया और दो रकअत नमाज़ पढ़ी। अपने मुबारक हाथ उठाकर खाने में बरकत की दुआ फ़रमाई। फिर अपने सहाबा को अपने बर्तन लाने का हुक्म दिया। इतने बड़े लश्कर में कोई बर्तन ख़ाली न रहा, सब भर दिए गए। इसके अलावा, तमाम मुजाहिदों के पेट भरकर खाने के बावजूद दस्तरख़्वान का खाना ज़रा भी कम न हुआ।

“इंशाअल्लाह, कल चाश्त के वक़्त तुम तबूक के चश्मे पर पहुँच जाओगे। मेरे पहुँचने तक उस पानी को हाथ न लगाना” हदीस शरीफ़

ख़ालिद इब्ने वलीद का दूमतुल जंदल वाला सरिय्या

हज़रत हबीब-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने तबूक में रहते हुए ख़ालिद इब्ने वलीद (रज़ियल्लाहु अन्हु) को दूमतुल जंदल भेजा। वहाँ का हाकिम उकैदिर इब्ने अब्दुल मलिक ईसाई था। इस्लामी लश्कर क़िले के आसपास पहुँचकर घात लगाकर बैठ गया। उसी वक़्त क़िले के दरवाज़े पर एक जंगली बैल के आने की ख़बर पाकर उकैदिर उसका शिकार करने के लिए घोड़े पर सवार हुआ और उसके पीछे निकल पड़ा। जब उकैदिर, उसका भाई हस्सान और उनके आदमी शिकार में थे, तो मुजाहिदों ने उन्हें घेर लिया। हस्सान ने तलवार की तरफ़ हाथ बढ़ाया तो मारा गया। उकैदिर क़ैद कर लिया गया। बाक़ी भागकर क़िले में जा छुपे। हज़रत ख़ालिद ने उकैदिर से कहा: “मैं तुम्हें अमान देकर रसूलुल्लाह की ख़िदमत में ले चलूँगा। लेकिन इस शर्त पर कि तुम क़िले में जाकर दो हज़ार ऊँट, आठ सौ घोड़े, आठ सौ ढालें और चार सौ नेज़े हवाले करोगे। हुकूमत तुम्हारे ही पास रहेगी।” उकैदिर राज़ी हो गया। क़िले में जाकर उन्होंने ग़नीमत ली और मदीना आए। उकैदिर और उसके भाई हसार को ऊँची बारगाह में हाज़िरी का शरफ़ मिला और वे ईमान लाकर मुसलमान हो गए।

घात

मुजाहिद तबूक से रवाना होकर मदीना की राह पर चल पड़े। मुनाफ़िक़ों ने आपस में तय किया कि हमारे प्यारे नबी के लिए जाल बिछाकर आपकी जान ले लेंगे। एक रात वे इस्लामी लश्कर के रास्ते में पड़ने वाले एक तंग दर्रे में घात लगाकर इंतिज़ार करने लगे। नबी-ए-करीम के ऊँट की नकेल हज़रत अम्मार इब्ने यासिर थामे चल रहे थे और पीछे हज़रत हुज़ैफ़ा इब्ने यमान आ रहे थे। मुनाफ़िक़ों ने आपस में मिलकर जो साज़िश की थी, उसकी ख़बर जिबराईल अलैहिस्सलाम ने दी। नबी-ए-करीम दर्रे के क़रीब पहुँचे तो लश्कर से फ़रमाया: “तुम घाटी के अंदर से जाओ; वह तुम्हारे लिए ज़्यादा आसान भी है और ज़्यादा खुली भी।” आप ख़ुद तंग दर्रे की तरफ़ चले, जबकि लश्कर घाटी के अंदर की तरफ़ चल पड़ा। रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) दर्रे के क़रीब पहुँचे तो मुनाफ़िक़ों का यह गिरोह अपने चेहरे ढककर हमले के लिए टूट पड़ा। हज़रत हुज़ैफ़ा ने पुकारा: “ऐ अल्लाह तआला के दुश्मनो!” और अपने हाथ की लाठी से मुनाफ़िक़ों और उनके जानवरों को मारने लगे। इस चीख़-पुकार से डरकर बारह मुनाफ़िक़ फ़ौरन सिपाहियों के बीच घुलमिल गए। रसूलुल्लाह ने उनके नाम हज़रत हुज़ैफ़ा को बताए और उन्हें ताकीद की कि किसी और को न बताएँ।

हज़रत उसैद इब्ने हुज़ैर वाक़िआ सुनकर ख़िदमत में हाज़िर हुए और नबी-ए-करीम से बड़ी मिन्नत की: “मेरी जान आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह! मुझे उनके नाम बता दीजिए, मैं उनके सिर आपके पास ले आऊँ!” लेकिन रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इजाज़त न दी।10

मस्जिद-ए-ज़िरार

आख़िरकार हमारे प्यारे नबी और आपके बहादुर सहाबा रूम वालों पर ख़ौफ़ तारी करके और उनका मुक़ाबला तोड़कर नूरानी मदीना के क़रीब पहुँचे। कायनात के सुल्तान ने मदीना के बहुत क़रीब ज़ी अवान नाम की जगह पर अपने सहाबा को ठहरकर आराम करने का हुक्म दिया। सहाबा आराम कर रहे थे कि कुछ मुनाफ़िक़ हमारे प्यारे नबी के पास आए और आपसे मस्जिद-ए-ज़िरार में तशरीफ़ लाने की गुज़ारिश की। मस्जिद-ए-ज़िरार क़ुबा में थी। मुनाफ़िक़ों ने इसे उस पहली मस्जिद के सामने बनाया था जो रसूलुल्लाह ने मदीना की हिजरत के वक़्त क़ुबा में बनवाई थी। जब हमारे प्यारे नबी अपने सहाबा के साथ तबूक जा रहे थे, तो मुनाफ़िक़ों ने आपकी ख़िदमत में आकर यह दावत दी थी: “या रसूलल्लाह! हमने एक नई मस्जिद बनाई है, क्या आप तशरीफ़ लाकर हमें नमाज़ नहीं पढ़ाएँगे?” लेकिन सारे जहानों के सरदार उस वक़्त सफ़र पर निकल रहे थे; आपने फ़रमाया था कि अगर नसीब हुआ, तो तबूक से लौटते वक़्त तशरीफ़ लाएँगे।

मुनाफ़िक़ों का मक़सद मुसलमानों की जमाअत में फूट डालना, उसे अपने मक़सदों का औज़ार बनाना और फ़ितना खड़ा करके मुसलमानों को आपस में लड़ाना था। यहाँ तक कि वे रूमी फ़ौजों को मदीना बुलाने वाले थे और इस मस्जिद में जमा किए हुए हथियारों से उनकी मदद करने वाले थे। नबी-ए-करीम के वहाँ नमाज़ पढ़ लेने से यह तअस्सुर पैदा होता कि मस्जिद-ए-ज़िरार एक मुक़द्दस जगह है। इस तरह मुसलमान वहाँ नमाज़ पढ़ने के लिए एक-दूसरे से होड़ करते और, जैसा मुनाफ़िक़ समझते थे, उनके जाल में फँस जाते!… सरवर-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने मुनाफ़िक़ों की यह दावत क़बूल फ़रमा ली थी और जाने का इरादा कर लिया था। अल्लाह तआला ने सूरह तौबा की 107वीं और 108वीं आयात-ए-करीमा उतारकर मामले की असलियत बता दी। इस पर सारे जहानों के सरदार ने मालिक इब्ने दुख़्शुम और आसिम इब्ने अदी से फ़रमाया: “उस मस्जिद में जाओ जिसके लोग ज़ालिम हैं। उसे गिरा दो, जला दो!” वे मग़रिब और इशा के बीच गए और इमारत में आग लगा दी। फिर उसे गिराकर ज़मीन के बराबर कर दिया। मुनाफ़िक़ों की तरफ़ से कोई आवाज़ न उठी।11 नबी-ए-करीम और आपके शान वाले सहाबा के आने की ख़बर सुनकर मदीना वाले फ़ौरन जमा हुए और बड़े जोश के साथ इस्तिक़बाल के लिए निकल पड़े…

अब्दुल्लाह इब्ने उबई की मौत

हमारे प्यारे नबी के तबूक के सफ़र से लौटने के दो महीने बाद, शव्वाल महीने में मुनाफ़िक़ों का सरदार अब्दुल्लाह इब्ने उबई मर गया। इसके बाद मुनाफ़िक़ों की एकता टूट गई और वे बिखर गए।12 इस तरह अरब में सिर्फ़ मुनाफ़िक़ों का ही नहीं, मुशरिकों और यहूदियों का भी सिर कुचल दिया गया और इस्लाम के ख़िलाफ़ खड़े होने और उसकी राह रोकने की उनकी सरगर्मियाँ ठंडी पड़ गईं।

हिजरत के नवें साल पेश आने वाले दूसरे वाक़िआत

रसूलुल्लाह जब तबूक पहुँचे, तो पहले ऐला के, फिर जरबा के हाकिमों ने आकर ख़िराज (महसूल) अदा किया। रसूलुल्लाह ने एक अहदनामा लिखवाकर उनके हाथ में दिया। इस ग़ज़वे में आपने हिरक़्ल को ख़त भेजकर उसे फिर इस्लाम की दावत दी, लेकिन उसे हिदायत नसीब न हुई।

“उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसके क़ब्ज़ा-ए-क़ुदरत में मेरी जान है, शहीद क़यामत के दिन अपनी तलवारें गर्दनों में लटकाए हुए आएँगे। वे नूर के मिम्बरों पर बैठेंगे” हदीस शरीफ़

इसी साल रसूलुल्लाह की बेटी उम्मे कुलसूम का इंतिक़ाल हुआ। उनकी जनाज़े की नमाज़ रसूलुल्लाह ने ख़ुद पढ़ाई, और उन्हें दफ़न करते वक़्त क़ब्र के पास आपकी मुबारक आँखों से आँसू बहे।

सनतुल वुफ़ूद (वफ़्दों का साल)

तबूक के सफ़र से लौटने के बाद सरवर-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अलग-अलग रियासतों में सफ़ीर भेजकर उन्हें इस्लाम की दावत दी। उमान और बहरैन के लोग मुसलमान होने के शरफ़ से नवाज़े गए।

अब इस्लाम बड़ी तेज़ी से फैल रहा था। आसपास के क़बीलों और रियासतों में दीन की बुनियादी बातें सिखाने के लिए मुअल्लिम और उनका इंतिज़ाम चलाने के लिए हाकिम भेजे जा रहे थे। हिजरत के नवें साल मदीना में मुसलमान होने वाले वफ़्दों का ताँता लग गया। अलग-अलग क़बीलों से आए वफ़्दों ने सारे जहानों के सरदार की पैरवी का एलान किया और सआदत पाई। आने वालों की कसरत की वजह से इस साल को सनतुल वुफ़ूद (वफ़्दों का साल) कहा गया। रसूलुल्लाह के पास जब भी कोई सफ़ीर आता, तो आप क़ीमती लिबास पहनते थे। सहाबा को भी अच्छे कपड़े पहनाते थे। आने वालों को साफ़-सुथरी और अच्छी जगह ठहराकर उनकी मेहमाननवाज़ी करते थे। उनकी ज़ियाफ़त करते और बहुत-से तोहफ़े देकर उन्हें रुख़सत करते थे। वे भी ख़ुश होकर तारीफ़ करते और शुक्रिया अदा करते हुए लौटते थे। सफ़ीर भेजने वाले क़बीलों में से एक बनू मुर्रा क़बीला था। उन्होंने तेरह आदमी सफ़ीर बनाकर भेजे। उन्होंने बताया कि उनका क़बीला मुसलमान हो गया है। उन्होंने यह भी बताया कि उनके इलाक़े में बिल्कुल बारिश नहीं हुई, घास नहीं उगी और वे सख़्त क़हत में मुब्तला हैं। इस मुसीबत से छुटकारे के लिए उन्होंने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से दुआ की दरख़्वास्त की। आपने दुआ फ़रमाई: “या रब! उन्हें बारिश से सैराब कर दे।” बनू मुर्रा क़बीले के सफ़ीर अपने इलाक़े में लौटे तो देखा कि उनकी क़ौम को पूरी तरह राहत मिल गई है, क्योंकि जिस दिन रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उनके लिए दुआ फ़रमाई थी, उस दिन वहाँ ख़ूब बारिश हुई थी। यह ठीक दुआ के वक़्त हुआ था।

बनू असद क़बीले के दस आदमी आए और अपने मुसलमान होने का एहसान जताया। उन्होंने कहा: “हम क़हत के साल दूर से आए हैं। हम पर कोई लश्कर आने से पहले ही हम अपनी मर्ज़ी से मुसलमान हो गए।” उनके बारे में सूरह हुजुरात की सत्रहवीं आयत उतरी। बनू बिकार के वफ़्द के सरदार मुआविया इब्ने सौर इब्ने उबादा इब्ने बिकार की उम्र लगभग सौ साल थी। उनके साथ उनके बेटे बुशैर, मजमा इब्ने अब्दुल्लाह और अब्दे अम्र इब्ने असम थे। उन्होंने रसूलुल्लाह से गुज़ारिश की कि आप अपना मुबारक हाथ उनके बेटे के जिस्म पर फेरें, और कहा: “इसने मेरी बहुत इज़्ज़त की है और मेरे साथ बहुत भलाई की है।” रसूलुल्लाह ने बुशैर के चेहरे पर अपना मुबारक हाथ फेरा और उन्हें बहुत-सी बकरियाँ अता कीं। आपने अब्दे अम्र का नाम भी बदलकर अब्दुर रहमान रख दिया। बनू नजीब का वफ़्द दस आदमियों का था। वे अपने माल और जानवरों की ज़कात भी साथ लाए थे। रसूलुल्लाह उनके आने से बहुत ख़ुश हुए। उन्हें अच्छी जगह ठहराने का हुक्म दिया। नजीब के सफ़ीर ने फ़र्ज़ और सुन्नत के बारे में इतने सवाल पूछे कि रसूलुल्लाह की मुहब्बत उनसे और बढ़ गई। आपने उनकी इज़्ज़त और इकराम बढ़ा दिया और दूसरे सफ़ीरों से अलग बरताव फ़रमाया। जो नौजवान सामान के पास रह गया था, उसे भी बुलवाया और यह देखकर कि उसने अल्लाह तआला के सिवा हर चीज़ से मुँह मोड़ लिया है, उसके लिए भी भलाई की दुआ फ़रमाई। दूसरों की तरह उसे भी तोहफ़े दिए। वह गिरोह अपनी मुराद पाकर ख़ुशी-ख़ुशी अपने क़बीले लौट गया। बनू किनाना से एक गिरोह आया और मुसलमान हुआ। उनके सरदार वासिला इब्ने असक़ा थे। जब वह आए, तो रसूलुल्लाह तबूक के सफ़र की तैयारी कर रहे थे। वासिला ने बैअत की और अपने क़बीले लौट गए। उनका बाप ईमान न लाया, लेकिन उनकी बहन ईमान ले आईं। फिर वह मदीना गए और तबूक जाने वाले लश्कर के पीछे-पीछे चल पड़े और रसूलुल्लाह से जा मिले। उन्हें ख़ालिद के साथ उकैदिर से जंग के लिए भेजा गया। उनके हिस्से में बहुत-से ऊँट आए।

बनू साइदा से ज़माम इब्ने सालबा आए। उन्होंने रसूलुल्लाह की ख़िदमत में हाज़िर होकर आपसे नमाज़, रोज़े, हज और ज़कात के बारे में बहुत-से सवाल पूछे। सवाल ख़त्म हुए तो उन्होंने कहा: “मैं ईमान ले आया; आप अल्लाह की तरफ़ से जो कुछ लाए हैं, उस सब पर मैंने यक़ीन कर लिया।” फिर अपनी क़ौम के पास जाकर उन तक इस्लाम पहुँचाया। वह पूरा क़बीला मुसलमान हो गया।

या रसूलल्लाह! आपके दर के ग़ुलाम के
पाँव को छूने वाली मिट्टी को जो न चूमे,
और इस सआदत के लिए अपनी जान फ़िदा न करे,
उसे आपसे मुहब्बत नहीं; मैं नहीं मानता, उसकी बात झूठी है।
आपके क़दमों तले की मिट्टी को अपने सिर का ताज बनाऊँ,
चूमूँ, आँखों से लगाऊँ, दिल की दवा बनाऊँ,
सीधा रास्ता रौशन करने वाला चिराग़ बनाऊँ,
और आपकी राहों में पड़ा रहूँ, आपका आशिक़ और हैरान।
आपकी तरफ़ से आने वाली हर हवा को सूँघता हूँ,
टटोलता हूँ कि क्या इसमें आपकी ख़ुशबू का कोई निशान है;
आपकी राह में मेरे घर वाले और मेरे बच्चे क़ुरबान हों,
मेरी माँ, मेरे बाप, मेरे रिश्तेदार और हज़ारों जानें भी।
आपके दिल-ओ-जान से आशिक़ मौलाना ख़ालिद कहते हैं:
ऐ जहान के सुल्तान, ऐ सारे जहान के महबूब!
मेरी एक ही जान है, वह भी आपकी दी हुई, आपका मुझ पर एहसान;
मैं यह नहीं कह सकता कि आप पर फ़िदा करने को एक जान लाया हूँ।
मौलाना ख़ालिद बग़दादी

“या रब! उन्हें (बनू मुर्रा क़बीले को) बारिश से सैराब कर दे” हदीस शरीफ़

काबा मुअज़्ज़मा का रात का एक मंज़र