वे इलाक़े जहाँ ज़कात के आमिल भेजे गए
हज़रत अबू मूसा अशअरी को आपने क़ुरआन-ए-करीम और दीन की बातें सिखाने के लिए मक्का में मुक़र्रर किया।1 अबू सुफ़यान इब्ने हर्ब को यमन के इलाक़े में नजरान का अमीर बनाया और कसीर इब्ने अब्दुल्लाह को उनका मददगार मुक़र्रर किया। मक्का के काम पूरे होने के बाद आप मर्रुज़ ज़हरान पहुँचे। बाक़ी ग़नीमत भी वहीं बाँटी गई। फिर आप अपने शान वाले सहाबा के साथ दोबारा रवाना हुए और ज़िलक़ादा के आख़िर में मदीना पहुँच गए। आप मदीना से मुबारक रमज़ान महीने की दसवीं तारीख़, बुध के दिन निकले थे। यह सफ़र लगभग तीन महीने चला।
एक दिन ग़म के समुंदर में डूबकर सोच में खो गया, अपने आपको भूलकर बेख़ुदी में खो गया, अपने गुनाह याद करके अपने अंजाम से डर गया, तब एक सैयद को यह मतला दोहराते सुना: आप अहमद, महमूद और मुहम्मद हैं, मेरे सरदार, हक़ की तरफ़ से ताईद पाए हुए हमारे सुल्तान हैं, मेरे सरदार। हम उम्मीद में हैं, नाउम्मीदी से आह नहीं भरते, ईमान की पूँजी को बर्बाद नहीं करते, आपका दर छोड़कर ग़ैरों की पनाह नहीं लेते, आपके साए में किसी और की तरफ़ नज़र नहीं उठाते। आप अहमद, महमूद और मुहम्मद हैं, मेरे सरदार, हक़ की तरफ़ से ताईद पाए हुए हमारे सुल्तान हैं, मेरे सरदार। Şeyh Galib
हिजरत के आठवें साल पेश आने वाले कुछ वाक़िआत
बनू सअलबा के चार आदमी रसूलुल्लाह की मजलिस में आए। उन्होंने कहा: “हमें हमारी क़ौम ने भेजा है। हमने सुना है कि हिजरत किए बिना इस्लाम पूरा नहीं होता।” आपने फ़रमाया: “तुम जहाँ भी रहो, तक़्वा पर रहो; हिजरत न भी करो, तो कोई नुक़सान नहीं। तुम्हारे दीन और तुम्हारी मिल्लत में कोई कमी नहीं आएगी।” फिर उन्हें रमला बिन्ते हारिस के घर भेजकर उनकी ज़ियाफ़त की गई। बाद में हर एक को चार-चार ऊक़िया चाँदी देकर घर लौटने की इजाज़त दी गई। उसी साल रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की बेटी ज़ैनब का इंतिक़ाल हुआ। उनके लिए ताबूत बनाया गया। इस्लाम में पहला ताबूत उन्हीं के लिए बनाया गया था। वह अबुल आस के निकाह में थीं। बद्र के ज़माने में जब अबुल आस ने उन्हें मक्का से मदीना रवाना किया, तो रास्ते में हब्बार ने हज़रत ज़ैनब के ऊँट पर नेज़ा फेंका था। ऊँट से गिरने पर उनका हमल गिर गया था और वह बीमार हो गई थीं। यही उनके इंतिक़ाल का सबब बना। उनके दो बच्चे रहे। उसी साल ज़िलहिज्जा महीने में रसूलुल्लाह के बेटे इब्राहीम पैदा हुए। उनकी वालिदा मारिया ख़ातून (रज़ियल्लाहु तआला अन्हा) हैं। अबू राफ़े ने आकर ख़ुशख़बरी दी। इसकी ख़ुशी में आपने एक ग़ुलाम आज़ाद किया। अक़ीक़े के तौर पर एक मेंढा ज़बह किया। बच्चे का सिर मुँडवाकर उसके बालों के वज़न के बराबर चाँदी सदक़ा की।
हिजरत के नवें साल पेश आने वाले अहम वाक़िआत
हिजरत के नवें साल मुहर्रम महीने के शुरू में सारे जहानों के सरदार ने क़बीलों पर ज़कात वसूल करने वाले (आमिल, साई) मुक़र्रर किए। जहाँ तक मुमकिन हुआ, हर क़बीले के लिए उसी में से एक आमिल दिया गया। आपने इब्ने हसीब असलमी को असलम और ग़िफ़ार क़बीलों पर, अब्बाद इब्ने बिश्र को बनू सुलैम और मुज़ैना क़बीलों पर, अम्र इब्ने आस को फ़ज़ारा क़बीले पर, ज़ह्हाक इब्ने सिनान को बनू किलाब पर, राफ़े इब्ने मकनत जुहनी को जुहैना क़बीले पर और बिश्र इब्ने सुफ़यान कअबी को बनू कअब और बनू तमीम पर भेजा।
एक साल बाद ताइफ़ वालों ने मुसलमान होने के लिए छह आदमियों का एक वफ़्द मदीना में हमारे प्यारे नबी की ख़िदमत में भेजा। सारे जहानों के सरदार ने एक साल पहले ताइफ़ से रवाना होते वक़्त यह दुआ फ़रमाई थी: “या रब! सक़ीफ़ वालों को सीधा रास्ता दिखा, उन्हें हमारे पास ले आ।” अब सक़ीफ़ वाले मुसलमान होने के लिए आ गए थे। रसूल-ए-अकरम उनके मुसलमान होने से बहुत ख़ुश हुए और उन्हें कुछ रिआयतें देकर ताइफ़ लौटा दिया। हज़रत उस्मान इब्ने अबिल आस को उनका हाकिम मुक़र्रर किया।2
नज्जाशी का इंतिक़ाल
हिजरत के नवें साल का रजब महीना था। एक दिन रसूलुल्लाह ने अपने सहाबा से फ़रमाया: “आज तुम्हारे एक नेक भाई का इंतिक़ाल हो गया है। उठो, उनके जनाज़े की नमाज़ पढ़ो।” नबी-ए-करीम ने इमाम बनकर ग़ायबाना जनाज़े की नमाज़ पढ़ाई। फिर फ़रमाया: “हमने तुम्हारे भाई नज्जाशी असहमा के लिए अल्लाह तआला से मग़फ़िरत माँगी।”
कुछ दिनों बाद हब्शा से आई ख़बर से मालूम हुआ कि नज्जाशी असहमा (रहमतुल्लाहि तआला अलैहि) का इंतिक़ाल हो गया है। यह वही दिन था जिस दिन नबी-ए-करीम ने मदीना में उनके जनाज़े की नमाज़ पढ़ाई थी।3
“तुम जहाँ भी रहो, तक़्वा पर रहो; हिजरत न भी करो, तो कोई नुक़सान नहीं। तुम्हारे दीन और तुम्हारी मिल्लत में कोई कमी नहीं आएगी” हदीस शरीफ़
मेरी जान आपकी राह पर क़ुरबान हो,
नाम भी प्यारा, ज़ात भी प्यारी – मुहम्मद,
आइए, अपने इस अदना बंदे की शफ़ाअत कीजिए,
नाम भी प्यारा, ज़ात भी प्यारी – मुहम्मद।
मोमिन बनने वालों पर तकलीफ़ें बहुत हैं,
आख़िरत में उनके लिए ऐश और आराम है,
अठारह हज़ार आलमों के मुस्तफ़ा,
नाम भी प्यारा, ज़ात भी प्यारी – मुहम्मद।
सातों आसमानों की सैर करने वाले, कुर्सी के ऊपर गश्त करने वाले,
मेराज में हक़ से अपनी उम्मत माँगने वाले –
नाम भी प्यारा, ज़ात भी प्यारी – मुहम्मद।
यूनुस क्या करे दोनों जहान आपके बिना,
आप सच्चे नबी हैं, बिना शक, बिना गुमान,
जो आपकी पैरवी न करें, वे ईमान के बिना जाएँगे,
नाम भी प्यारा, ज़ात भी प्यारी – मुहम्मद।
