मेरे प्यारे नबी

बीर-ए-मऊना का वाक़िआ

उसी साल सफ़र के महीने में अरब के नज्द इलाक़े के बनू आमिर क़बीले का सरदार अबू बरा आमिर इब्ने मालिक मदीना आया। वह रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ख़िदमत में हाज़िर हुआ। नबी-ए-करीम ने उसे इस्लाम के बारे में बताया और मुसलमान होने की नसीहत फ़रमाई। अबू बरा मुसलमान नहीं हुआ, लेकिन उसने कहा कि इस्लाम एक ख़ूबसूरत और इज़्ज़त वाला दीन है। इसके अलावा उसने गुज़ारिश की कि नज्द में इस्लाम फैलाने के लिए आप सहाबा-ए-किराम में से कुछ लोगों को वहाँ भेजें। हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “जिन्हें मैं भेजूँगा, उनके बारे में मुझे नज्द वालों पर भरोसा नहीं!” आमिर ने कहा: “मैं उन्हें अपनी पनाह में ले लूँगा। तब कोई उन्हें नुक़सान नहीं पहुँचा सकेगा।”

सारे जहानों के सरदार ने यह पक्की ज़िम्मेदारी क़बूल फ़रमाई और असहाब-ए-सुफ़्फ़ा में से सत्तर आदमियों का एक वफ़्द तैयार किया। ये रातों को क़ुरआन-ए-करीम पढ़ा करते थे। सब के सब क़ुरआन के हाफ़िज़ थे। उन्हें असहाब-ए-क़ुर्रा (क़ारी हज़रात) कहा जाता था। उनमें से कुछ के नाम ये हैं: आमिर इब्ने फ़ुहैरा, अम्र इब्ने ज़मरी, अतिय्या इब्ने अब्दुल्लाह, अनस इब्ने मुआविया, हकम इब्ने कैसान, हारिस इब्ने सम्मा, कअब इब्ने ज़ैद, मालिक इब्ने साबित, मुंज़िर इब्ने अम्र, राफ़े इब्ने मज़िल, सईद इब्ने हुज़ाम, सलीम इब्ने मिल्हान, सुहैल इब्ने आमिर, तुफ़ैल इब्ने असअद और उरवा इब्ने सल्त (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम)। रसूलुल्लाह के हुक्म से वे हज़रत मुंज़िर इब्ने अम्र की कमान में रवाना हुए। रसूलुल्लाह ने एक-एक ख़त भी लिखवाकर बनू अम्र और बनू नज्द के सरदारों को भेजा।

अबू बरा चाहता था कि उसका क़बीला इस्लाम से नवाज़ा जाए; वह असहाब-ए-सुफ़्फ़ा से पहले रवाना हुआ। अपने क़बीले में पहुँचकर उसने बताया कि वफ़्द को उसने अपनी पनाह में ले लिया है, और ताकीद की कि कोई उन्हें हाथ न लगाए। उसके भतीजे आमिर इब्ने तुफ़ैल के सिवा सबने यह बात मान ली। लेकिन आमिर इब्ने तुफ़ैल ने तीन क़बीलों के आदमियों को हथियारबंद किया, उनका सरदार बना और बीर-ए-मऊना पहुँचने वाले सहाबा-ए-किराम को घेर लिया। चारों तरफ़ से घिरे सहाबा ने अपनी तलवारें थाम लीं और सब के सब अपने ख़ून के आख़िरी क़तरे तक बहादुरी से लड़े। उनमें से दो के सिवा सबने शहादत का शरबत पिया। हज़रत अम्र इब्ने उमय्या को क़ैद कर लिया गया। हज़रत कअब इब्ने ज़ैद को मुर्दा समझकर छोड़ दिया गया।

शहीद होने वाले इन मुबारक सहाबा के आख़िरी अल्फ़ाज़ ये थे: “या रब! इस वक़्त रसूलुल्लाह को हमारे हाल की ख़बर देने वाला तेरे सिवा कोई नहीं। रसूलुल्लाह तक हमारा सलाम पहुँचा दे!” उसी पल जिबराईल अलैहिस्सलाम बहुत ग़मगीन हालत में नबी-ए-करीम के पास आए, उनका सलाम पहुँचाया और कहा: “वे अल्लाह तआला से जा मिले। अल्लाह तआला उनसे राज़ी हुआ और वे अल्लाह तआला से राज़ी हुए।”

नबी-ए-करीम ने “व अलैहिस्सलाम” कहकर जवाब देने के बाद बहुत ग़म के साथ सहाबा-ए-किराम की तरफ़ रुख़ किया और उन्हें यूँ हाल बताया: “तुम्हारे भाइयों का मुशरिकों से सामना हुआ। मुशरिकों ने उन्हें काट डाला, नेज़ों से छलनी कर दिया…”

“वे (बीर-ए-मऊना के शहीद) अल्लाह तआला से जा मिले। अल्लाह तआला उनसे राज़ी हुआ और वे अल्लाह तआला से राज़ी हुए” हदीस शरीफ़

बीर-ए-मऊना का वाक़िआ

आपकी रूह ख़ुदा के नूर का एक नुक़्ता है, या रसूलल्लाह!
आपका जमाल रूह को कैफ़ देने वाला, दिलों को खोलने वाला है, या रसूलल्लाह!
रहमत की निशानियाँ रखने वाले आपके वुजूद के तुलूअ ने
कुफ़्र का अँधेरा दूर कर दिया – हर मोमिन इससे वाक़िफ़ है, या रसूलल्लाह!
रिसालत के गुलिस्ताँ में आपकी ज़ात गुलाब का पौधा है,
फिर भी ख़ुदा का लगाया हुआ आख़िरी पौधा आप ही हैं, या रसूलल्लाह!
करम कीजिए, ऐ मेरे आक़ा, ऐ मौला की बुज़ुर्ग दलील!
नजीब के दर्द की दवा आपका फ़ैज़ है, या रसूलल्लाह!
Sultan III. Ahmed (Necîb)

इस वाक़िए में दुश्मन से लड़ते वक़्त जब्बार नाम के एक आदमी ने हज़रत आमिर इब्ने फ़ुहैरा की पीठ में अपना नेज़ा घोंप दिया। उसी पल हज़रत आमिर ने कहा: “अल्लाह की क़सम, मैंने जन्नत पा ली!” फिर वह जब्बार और दूसरे मुशरिकों की आँखों के सामने आसमान की तरफ़ उठा लिए गए। इस पर सब हैरान रह गए, लेकिन उनमें से सिर्फ़ जब्बार ही मुसलमान हुए, जिन्होंने उन्हें शहीद किया था।

नबी-ए-करीम रजीअ और बीर-ए-मऊना के वाक़िआत पर बहुत ग़मगीन हुए। जिन क़बीलों ने यह दर्दनाक काम किया था, उन पर बला उतरने के लिए आप एक महीने तक हर नमाज़ के बाद दुआ फ़रमाते रहे। अल्लाह तआला ने अपने रसूल की दुआ क़बूल फ़रमाई। उसने उन क़बीलों पर भयानक सूखा और क़हत भेजा। फिर एक छूत की बीमारी से सात सौ आदमी मर गए।1

आप सारे जहानों के तबीब हैं, और मेरा दिल बहुत बीमार,
शिफ़ा पाने की उम्मीद लेकर इसे आपके पास लाया हूँ।
मेरी पीठ पर गुनाहों का पहाड़ है और चेहरा भूसे-सा ज़र्द,
उम्मीद लेकर इसे यहाँ (गुनाहों के) मिट जाने के लिए लाया हूँ।
ऐ सारे जहानों के सरवर! मैं आपका आशिक़ हूँ, हैरान हूँ;
आपकी जुदाई में दिन-रात रोता हूँ।
आपकी बड़ी रहमत आब-ए-हयात है, और मैं प्यासा;
अगर उसका एक क़तरा न मिले, तो मर जाऊँ, जान दे दूँ।
आपकी तारीफ़ आपके अख़लाक़ से करना बेकार की कोशिश है,
आपको बातों से बयान करना इससे भी मुश्किल है।
आप माफ़ करने वाले, करीम और इतने सख़ी हैं कि
पानी से मोती, पत्थर से जौहर, काँटे से गुलाब आता है।
सूरज अगर नूर बिखेरता है, तो वह आपके नूरों से है,
गुलाब पर ओस की बूँद आपके गुलाब-से चेहरे से आती है।
आपकी सिफ़त बयान करना इससे भी बुलंद है, लेकिन
इससे भी ऊँचा कहूँ, तो ग़ैर इनकार करते हैं।
सारे आलम को एक ज़र्रे में समा देना मुमकिन है,
मगर आपको बातों से बयान करना इससे भी मुश्किल है।
मौलाना ख़ालिद बग़दादी

“अल्लाह की क़सम, मैंने जन्नत पा ली!” आमिर इब्ने फ़ुहैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु)

बनू नज़ीर का ग़ज़वा