मेरे प्यारे नबी

रजीअ का वाक़िआ

उहुद के ग़ज़वे के ख़ास तीरंदाज़ों में से हज़रत आसिम इब्ने साबित ने इस जंग में मुशरिकों में से मुसाफ़े इब्ने तल्हा और उसके भाई हारिस को मारा था। उन दोनों भाइयों की माँ सुलाफ़ा बिन्ते साद कीना रखने में मशहूर थी। उसने वादा किया कि जो उसके दोनों बेटों को मारने वाले आसिम इब्ने साबित का सिर लाएगा, उसे वह सौ ऊँट देगी। उसने क़सम खाई कि हज़रत आसिम की खोपड़ी में शराब पिएगी। इसके अलावा रसूलुल्लाह के भेजे हुए एक सरिय्ये में अब्दुल्लाह इब्ने उनैस ने बनू लिह्यान के ख़ालिद इब्ने सुफ़यान को मार डाला था, इसलिए बनू लिह्यान ने अज़ल और क़ारा क़बीलों से गठजोड़ कर लिया। मक्का के आसपास रहने वाले इन दोनों क़बीलों ने एक मंसूबा बनाकर सफ़ीर तैयार किए। उनसे कहा: “तुम कहोगे कि हम मुसलमान हो गए हैं। कहोगे: ‘हम ज़कात देंगे, उसे लेने और हमें इस्लाम सिखाने के लिए हम मुअल्लिम (उस्ताद) चाहते हैं।’ आने वालों में से कुछ को मारकर हम अपना बदला लेंगे। कुछ को मक्का ले जाकर क़ुरैश के हाथ बेच देंगे।”

हिजरत के चौथे साल सफ़र के महीने में इन दोनों क़बीलों का छह या सात आदमियों का एक वफ़्द नबी-ए-करीम के पास आया और कहा: “हम मुसलमान हो गए हैं, हमें क़ुरआन-ए-करीम और दीन सिखाने वाले मुअल्लिम भेजिए।”

उसी वक़्त हमारे प्यारे नबी ने यह जाँचने के लिए कि मक्का के मुशरिक जंग की तैयारी में हैं या नहीं, दस आदमियों का एक सरिय्या तैयार किया था। अज़ल और क़ारा क़बीले से भी ऐसा वफ़्द आकर मुअल्लिम माँगने लगा, तो आपने हालात की छानबीन करके ख़बर देने के लिए दस आदमियों के इस टोही दस्ते को आने वालों के साथ भेज दिया।

इस सरिय्ये में सहाबा-ए-किराम में से मरसद इब्ने अबी मरसद, ख़ालिद इब्ने अबी बुकैर, आसिम इब्ने साबित, ख़ुबैब इब्ने अदी, ज़ैद इब्ने दसिन्ना, अब्दुल्लाह इब्ने तारिक़, मुअत्तिब (मुग़ीर) इब्ने उबैद और तीन और सहाबी (रज़ियल्लाहु अन्हुम) थे जिनके नाम मालूम नहीं।

यह टोही दस्ता दिन में छिपकर और रात में चलकर एक दिन सहर के वक़्त रजीअ के पानी पर पहुँचा। वहाँ कुछ देर आराम करके उन्होंने अजवा नाम की मदीना की उम्दा क़िस्म की खजूरें खाईं। फिर वहाँ से हटकर क़रीब के एक पहाड़ पर चढ़कर छिप गए।

हुज़ैल क़बीले की भेड़ें चराने वाली एक औरत भी रजीअ के पानी पर आई। खजूर की गुठलियाँ देखकर वह समझ गई कि यहाँ मदीना की खजूरें खाई गई हैं। उसने चिल्लाकर अपने क़बीले को ख़बर दी: “यहाँ मदीना से आने वाले लोग आए हैं!”

उसी वक़्त अज़ल और क़ारा क़बीले के वफ़्द का एक आदमी, जो सहाबा-ए-किराम के इस दस आदमियों के सरिय्ये के साथ था, किसी बहाने से उनके पास से खिसक गया। उसने फ़ौरन बनू लिह्यान के पास जाकर ख़बर दे दी।

यह ख़बर पाकर बनू लिह्यान हरकत में आ गए। इस छोटे-से सरिय्ये के मुक़ाबले पर उन्होंने दो सौ आदमियों की एक फ़ौज भेजी, जिनमें सौ तीरंदाज़ थे। मुशरिकों के इस गिरोह ने हज़रत आसिम इब्ने साबित और उनके साथियों को पहाड़ की चोटी पर पाकर घेर लिया। इसी बीच वह आदमी भी उनसे आ मिला जिसने मुशरिकों को दस सहाबा की ख़बर दी थी। सहाबा-ए-किराम उसी वक़्त समझ गए कि उनके साथ धोखा हुआ है, और लड़ने का फ़ैसला करके उन्होंने तलवारें खींच लीं। यह भाँपकर मुशरिकों ने उन्हें बहकाने की कोशिश करते हुए कहा: “अगर तुम नीचे हमारे पास आ जाओ, तो हम तुममें से किसी को नहीं मारेंगे। हम पक्का वादा करते हैं। अल्लाह की क़सम, हम तुम्हें मारना नहीं चाहते। बल्कि तुम्हारे बदले में मक्का वालों से फ़िदया (छुड़ौती) वसूल करना चाहते हैं।”

“जिन्होंने ज़ख़्मी होने के बाद भी अल्लाह तआला और उसके नबी की पुकार पर लब्बैक कहा, ख़ास तौर पर उनमें से जिन्होंने भलाई की और जो बुराई से बचे, उनके लिए बहुत बड़ा अज्र है” आले इमरान: 172

रजीअ का वाक़िआ

आसिम इब्ने साबित, मरसद इब्ने अबी मरसद और ख़ालिद इब्ने अबी बुकैर (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने यह कहकर उनकी सारी पेशकशें ठुकरा दीं: “हम मुशरिकों की बातें और उनके अहद कभी क़बूल नहीं करते।” हज़रत आसिम इब्ने साबित ने कहा: “मैंने क़सम खाई है कि मुशरिकों की पनाह कभी क़बूल नहीं करूँगा। अल्लाह की क़सम, मैं उनकी पनाह और उनकी बातों के धोखे में आकर नीचे उतरकर हथियार नहीं डालूँगा।” उन्होंने हाथ उठाकर दुआ की: “या अल्लाह! अपने नबी को हमारे हाल की ख़बर दे दे।” अल्लाह तआला ने हज़रत आसिम की दुआ क़बूल फ़रमाई और रसूलुल्लाह को उनके बारे में ख़बर दे दी।

हज़रत आसिम ने मुशरिकों से फ़रमाया: “हम मरने से नहीं डरते, क्योंकि हम अपने दीन में बसीरत रखते हैं (मरेंगे तो शहीद होकर जन्नत में जाएँगे)।” मुशरिकों के सरदार ने कहा: “ऐ आसिम! अपने आपको और अपने साथियों को बर्बाद न करो, हथियार डाल दो!” तो आसिम इब्ने साबित ने तीर से जवाब दिया। तीर चलाते हुए वह ये मिसरे पढ़ रहे थे:

मैं ताक़तवर हूँ, मुझमें कोई कमी नहीं।
मेरी कमान का मोटा चिल्ला तना हुआ है।
मौत हक़ है, ज़िंदगी खोखली और गुज़र जाने वाली है।
जो कुछ मुक़द्दर में है, वह सब सिर पर आकर रहेगा।
इंसान देर-सवेर अल्लाह की तरफ़ लौटने वाले हैं।
अगर मैं तुमसे न लड़ूँ,
तो मेरी माँ (ग़म से) अपने होश खो बैठेगी।

आसिम के तरकश में सात तीर थे। हर तीर से उन्होंने एक मुशरिक को मार गिराया। तीर ख़त्म हो गए तो बहुतों को अपने नेज़े से छलनी कर दिया, लेकिन फिर उनका नेज़ा भी टूट गया। फ़ौरन उन्होंने तलवार खींची और उसकी म्यान तोड़कर फेंक दी। (इसका मतलब होता था: “मैं मरते दम तक लड़ूँगा, हथियार नहीं डालूँगा।”) फिर यूँ दुआ की: “या अल्लाह! मैंने आज तक तेरे दीन की हिफ़ाज़त की। आज के दिन के आख़िर में मैं तुझसे दुआ करता हूँ कि तू मेरे जिस्म की हिफ़ाज़त फ़रमा, उसे महफ़ूज़ रख।” हज़रत आसिम इब्ने साबित और दूसरे सहाबा के “अल्लाहु अकबर!” के नारों से पहाड़ गूँज रहे थे। दो सौ आदमियों के मुक़ाबले में दस मुजाहिद जान की बाज़ी लगाकर लड़ रहे थे, और जो उनके क़रीब आता, अपने किए की सज़ा पाता। आख़िरकार आसिम (रज़ियल्लाहु अन्हु) दोनों पाँवों से ज़ख़्मी होकर ज़मीन पर गिर पड़े। काफ़िर उनसे बहुत डरते थे, इसलिए उनके गिरने के बाद भी उनके पास न आ सके और दूर से तीर चलाकर उन्हें शहीद कर दिया। उस दिन वहाँ मौजूद दस सहाबा में से सात शहीद हुए और तीन क़ैद कर लिए गए।

बनू लिह्यान ने सुलाफ़ा बिन्ते साद के हाथ बेचने के लिए आसिम इब्ने साबित का मुबारक सिर काटना चाहा। लेकिन चूँकि अल्लाह तआला ने हज़रत आसिम इब्ने साबित की दुआ क़बूल फ़रमा ली थी, उसने वहाँ शहद की मक्खियों का एक झुंड भेज दिया। वे बादल की तरह आसिम इब्ने साबित के ऊपर छा गईं। मुशरिक उनके पास न आ सके। आख़िर उन्होंने कहा: “छोड़ो, शाम होगी तो मक्खियाँ बिखर जाएँगी, और हम सिर काटकर ले जाएँगे।”

शाम को अल्लाह तआला ने ज़ोरदार बारिश बरसाई। वादियों से सैलाब बह निकले और हज़रत आसिम इब्ने साबित के मुबारक जिस्म को बहाकर किसी अनजानी जगह ले गए। मुशरिकों ने बहुत ढूँढा, मगर न पा सके। इस तरह मुशरिक हज़रत आसिम इब्ने साबित के जिस्म का कोई हिस्सा न काट सके।

“या अल्लाह! मैंने आज तक तेरे दीन की हिफ़ाज़त की। आज के दिन के आख़िर में मैं तुझसे दुआ करता हूँ कि तू मेरे जिस्म की हिफ़ाज़त फ़रमा, उसे महफ़ूज़ रख” आसिम इब्ने साबित (रज़ियल्लाहु अन्हु)

जब यह वाक़िआ बयान किया गया कि शहद की मक्खियों ने हज़रत आसिम की हिफ़ाज़त की, तो हज़रत उमर ने फ़रमाया: “अल्लाह तआला ज़रूर अपने मोमिन बंदे की हिफ़ाज़त करता है। आसिम इब्ने साबित अपनी ज़िंदगी में जिस तरह मुशरिकों से महफ़ूज़ रहे, उसी तरह अल्लाह तआला ने उनकी मौत के बाद भी उनके जिस्म की हिफ़ाज़त की और मुशरिकों को उसे छूने न दिया।” इसीलिए आसिम इब्ने साबित का ज़िक्र होता तो उन्हें “वह शख़्स जिसकी हिफ़ाज़त शहद की मक्खियों ने की” कहकर याद किया जाता था।1

क़ैद किए गए तीन सहाबा ख़ुबैब इब्ने अदी, ज़ैद इब्ने दसिन्ना और अब्दुल्लाह इब्ने तारिक़ (रज़ियल्लाहु अन्हुम) थे। बनू लिह्यान ने तीनों को कमानों के चिल्लों से बाँध दिया। उनमें से अब्दुल्लाह इब्ने तारिक़ मक्का के मुशरिकों के पास ले जाए जाने पर राज़ी न हुए। न जाने के लिए उन्होंने मुक़ाबला किया। वह चिल्लाए: “शहीद किए गए मेरे साथी जन्नत से नवाज़े गए!” उन्होंने अपने हाथों के बंधन तोड़ दिए, लेकिन बनू लिह्यान ने पत्थर बरसाकर उन्हें भी शहीद कर दिया। हज़रत ख़ुबैब इब्ने अदी और ज़ैद इब्ने दसिन्ना ने इस ख़याल से सब्र किया: “शायद रसूलुल्लाह की दी हुई टोही की ज़िम्मेदारी पूरी करने का कोई मौक़ा मिल जाए।”

बनू लिह्यान दोनों को मक्का ले गए। बद्र और उहुद की जंगों में जिनके रिश्तेदार मारे गए थे, वे मुशरिक कीने और बदले की हवस में जल रहे थे और मौक़े की तलाश में थे। हज़रत ख़ुबैब को मुशरिकों में से हुजैर इब्ने अबी इहाब तमीमी ने बद्र के ग़ज़वे में मारे गए अपने भाई का, और हज़रत ज़ैद इब्ने दसिन्ना को सफ़वान इब्ने उमय्या ने बद्र के ग़ज़वे में मारे गए अपने बाप उमय्या इब्ने ख़लफ़ का बदला लेने के लिए ख़रीद लिया। मुशरिकों की नीयत दोनों को क़त्ल करने की थी। लेकिन वे दिन उन महीनों के थे जिनमें वे जंग करना मना समझते थे, इसलिए उन्हें क़ैद में रखकर वक़्त गुज़रने का इंतिज़ार करने लगे। उन्होंने उन्हें अलग-अलग जगहों पर क़ैद किया। दोनों सहाबा ने इस क़ैद में बड़ा सब्र, बर्दाश्त और शराफ़त दिखाई।

हज़रत ख़ुबैब इब्ने अदी जिस घर में क़ैद थे, उसमें रहने वाली आज़ाद की हुई एक बाँदी माविया ने (यह ख़ातून बाद में मुसलमान हो गईं) यूँ बयान किया:

“ख़ुबैब मेरे घर की एक कोठरी में क़ैद थे। मैंने उनसे बेहतर कोई क़ैदी नहीं देखा। एक दिन मैंने देखा कि उनके हाथ में लोटे जितना बड़ा अंगूर का एक गुच्छा है। वह उसमें से खा रहे थे। हर दिन उनके हाथ में ऐसा ही अंगूर का गुच्छा देखा जाता था। साल के उस मौसम में, और वह भी मक्का में, अंगूर मिलना हरगिज़ मुमकिन न था। अल्लाह तआला उन्हें रिज़्क़ दे रहा था। अपनी क़ैद की कोठरी में वह नमाज़ पढ़ते और क़ुरआन-ए-करीम की तिलावत करते थे। उनकी तिलावत सुनने वाली औरतें रोतीं और उन पर तरस खाती थीं। कभी मैं पूछती: ‘तुम्हारी कोई ख़्वाहिश है?’ तो वह कहते: ‘मुझे मीठा पानी दो, बुतों के लिए ज़बह किए गए जानवरों का गोश्त न लाना, और जब मुझे क़त्ल करने का वक़्त आए, तो पहले से ख़बर दे देना; इसके सिवा मुझे कुछ नहीं चाहिए।’ जब उन्हें क़त्ल करने का दिन तय हो गया, तो मैंने जाकर उन्हें बता दिया। यह जानकर उनमें ज़रा भी बदलाव न आया और ग़म का ज़र्रा भर भी असर ज़ाहिर न हुआ।

जब वह दिन क़रीब आया, तो उन्होंने कहा कि मरने से पहले जिस्म की सफ़ाई करना चाहते हैं, और एक उस्तरा माँगा। मैंने अपने बच्चे के हाथ उस्तरा देकर उसे भेज दिया। बच्चा उनके पास गया तो मैं अचानक डर गई। मैंने कहा: ‘हाय! यह आदमी बच्चे को उस्तरे से काट डालेगा। इसे तो वैसे भी क़त्ल कर दिया जाएगा।’ मैं दौड़कर बच्चे को देखने गई। ख़ुबैब ने मेरा भेजा हुआ उस्तरा बच्चे के हाथ से ले लिया था और बच्चे को प्यार करने के लिए अपने घुटने पर बिठा रखा था। यह हाल देखकर मैं बहुत डर गई और चीख़ने लगी। मामला समझकर उन्होंने कहा: ‘क्या तुम समझती हो कि मैं इस बच्चे को मार डालूँगा? हमारे दीन में ऐसी कोई बात नहीं। नाहक़ किसी की जान लेना हमारे हाल और हमारी शान के ख़िलाफ़ है।’”

मुशरिकों ने ख़ुबैब इब्ने अदी और ज़ैद इब्ने दसिन्ना को क़त्ल करने का जो दिन तय किया था, वह आ पहुँचा। उस दिन सुबह-सवेरे उन्होंने क़ैदियों की ज़ंजीरें खोलीं और उन्हें मक्का के बाहर तनईम नाम की जगह ले गए। (तनईम काबा से 5–8 किलोमीटर के फ़ासले पर है। वहाँ के पहाड़ का नाम भी तनईम पहाड़ है।) मक्का के लोग और मुशरिकों के बड़े-बड़े लोग उनके क़त्ल का मंज़र देखने के लिए जमा थे। चारों तरफ़ बड़ी भीड़ थी।

मुशरिकों ने क़ैदियों को क़त्ल करने की जगह पर सूली के दो खंभे खड़े किए थे। जब वे हज़रत ख़ुबैब को सूली पर चढ़ाकर बाँधने लगे, तो ख़ुबैब ने कहा: “मुझे छोड़ दो, मैं दो रकअत नमाज़ पढ़ लूँ।” उन्होंने उन्हें छोड़ दिया और कहा: “वहाँ पढ़ ले।” ख़ुबैब फ़ौरन नमाज़ के लिए खड़े हो गए और ख़ुशू के साथ दो रकअत नमाज़ पढ़ी। जमा हुए मुशरिक, औरतें और बच्चे बड़ी बेचैनी से उन्हें देख रहे थे। नमाज़ पूरी करने के बाद उन्होंने कहा: “अल्लाह की क़सम, अगर तुम यह न समझते कि मैंने मौत के डर से नमाज़ लंबी कर दी, तो मैं नमाज़ लंबी करता और ज़्यादा देर तक पढ़ता।” इस तरह हज़रत ख़ुबैब इब्ने अदी वह पहले शख़्स हैं जिन्होंने क़त्ल किए जाते वक़्त दो रकअत नमाज़ पढ़ी, और उन्हीं की वजह से यह एक तरीक़ा और सुन्नत बन गई। नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने जब सुना कि उन्होंने क़त्ल किए जाते वक़्त दो रकअत नमाज़ पढ़ी, तो उनके इस अमल को मुनासिब और दुरुस्त क़रार दिया।2

नमाज़ के बाद मुशरिकों ने हज़रत ख़ुबैब को सूली पर चढ़ाकर बाँध दिया। उनका चेहरा क़िब्ले से मदीना की तरफ़ फेर दिया। फिर कहा: “चल, अपने दीन से फिर जा! हम तुझे आज़ाद कर देंगे।” उन्होंने यूँ जवाब दिया: “अल्लाह की क़सम, मैं नहीं फिरूँगा! अगर सारी दुनिया मेरी हो जाए, मुझे दे दी जाए, तब भी इस्लाम से नहीं फिरूँगा!”

यह जवाब पाकर मुशरिकों ने कहा: “क्या तू चाहता है कि अब तेरी जगह मुहम्मद हो और उसे क़त्ल किया जाए? अगर ‘हाँ’ कहे, तो बच जाएगा और अपने घर में आराम से बैठेगा!” ख़ुबैब ने कहा: “मैं तो इस पर भी हरगिज़ राज़ी नहीं कि मुहम्मद अलैहिस्सलाम के पाँव में एक काँटा भी चुभे!”

मुशरिकों ने मज़ाक़ उड़ाते और हँसते हुए कहा: “ऐ ख़ुबैब! इस्लाम के दीन से फिर जा! अगर नहीं फिरा, तो हम तुझे ज़रूर क़त्ल कर देंगे!” ख़ुबैब ने उन्हें जवाब दिया: “जब मैं अल्लाह तआला की राह में हूँ, तो मेरे लिए क़त्ल किए जाने की कोई अहमियत नहीं।”

इसके बाद ख़ुबैब ने दुआ की: “या अल्लाह! यहाँ मुझे दुश्मन के चेहरे के सिवा कोई चेहरा नज़र नहीं आता। या अल्लाह! मेरी तरफ़ से अपने रसूल को सलाम पहुँचा दे। हमारे साथ जो किया गया, वह अपने रसूल को बता दे!” और कहा: “अस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह।” ख़ुबैब जब यह दुआ कर रहे थे, उस वक़्त हमारे प्यारे नबी सहाबा-ए-किराम के साथ बैठे थे। ज़ैद इब्ने हारिसा ने बयान किया: “एक दिन रसूलुल्लाह अपने सहाबा के साथ बैठे हुए थे कि आपने फ़रमाया: ‘व अलैहिस्सलाम।’ सहाबा-ए-किराम ने पूछा: ‘या रसूलल्लाह! यह किसके सलाम का जवाब है?’ आपने फ़रमाया: ’यह हमारे भाई ख़ुबैब के सलाम का जवाब है। जिबराईल (अलैहिस्सलाम) ने ख़ुबैब का सलाम मुझे पहुँचाया।’”3

ख़ुबैब के इर्द-गिर्द जमा हुए क़ुरैश के मुशरिकों ने यह कहकर नौजवानों को नेज़ों के साथ उन पर हमला करने के लिए उकसाया: “यही वह आदमी है जिसने तुम्हारे बापों को मारा था।” इस पर नौजवान उनके मुबारक जिस्म को ज़ख़्मी करने लगे। इसी बीच ख़ुबैब का चेहरा काबा की तरफ़ फिर गया। मुशरिकों ने उसे मदीना की तरफ़ फेर दिया। हज़रत ख़ुबैब ने दुआ की: “या अल्लाह! अगर मैं तेरे हुज़ूर मक़बूल बंदा हूँ, तो मेरा चेहरा क़िब्ले की तरफ़ फेर दे।” उनका चेहरा फिर क़िब्ले की तरफ़ फिर गया। मुशरिकों में से कोई भी उनका चेहरा काबा के सिवा किसी और तरफ़ न फेर सका। इसी दौरान ख़ुबैब ने एक नज़्म कही, जिसमें बयान किया कि वह सूली पर, दुश्मनों के बीच परदेसी और बेकस हालत में शहीद किए जा रहे हैं। जब मुशरिक अपने हाथों के नेज़े उनके जिस्म में चुभोकर उन्हें तकलीफ़ देने लगे, तो उन्होंने कहा: “अल्लाह की क़सम, जब मैं मुसलमान होकर क़त्ल किया जा रहा हूँ, तो वार खाकर चाहे किसी भी पहलू पर गिरूँ, मुझे कोई ग़म नहीं! यह सब अल्लाह तआला की राह में है।”

“मैं तो इस पर भी हरगिज़ राज़ी नहीं कि मुहम्मद अलैहिस्सलाम के पाँव में एक काँटा भी चुभे!” ख़ुबैब इब्ने अदी (रज़ियल्लाहु अन्हु)

इसके बाद ख़ुबैब ने मुशरिकों को यूँ बद्दुआ दी: “या अल्लाह! क़ुरैश के तमाम मुशरिकों को हलाक कर दे! उनके जत्थों को बिखेर दे! एक-एक करके उनकी जानें ले ले, उनमें से किसी को ज़िंदा न छोड़!” यह बद्दुआ सुनकर मुशरिक बहुत डर गए, और उनमें से कुछ वहाँ से भागकर दूर चले गए। बाक़ी रह जाने वालों में से कुछ एक के बाद एक नेज़े घोंपने लगे; उनमें से एक ने उनके सीने में नेज़ा घोंपा, नेज़ा पीठ से निकल गया। जब जिस्म से ख़ून के फ़व्वारे छूट रहे थे और सूली पर झूलते हुए वह आख़िरी साँस ले रहे थे, तब ख़ुबैब ने कहा: “अशहदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाहु व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू।” और शहीद हो गए।4

ख़ुबैब इब्ने अदी (रज़ियल्लाहु अन्हु) का मुबारक जिस्म चालीस दिन तक सूली पर लटका रहा। उनका बदन न सड़ा, न उसमें बू आई। उससे लगातार ताज़ा ख़ून बहता रहा। हमारे प्यारे नबी ने उनकी लाश लाने के लिए सहाबा-ए-किराम में से हज़रत ज़ुबैर इब्ने अव्वाम और मिक़दाद इब्ने असवद को भेजा। वे रात को चुपके से मक्का में दाख़िल हुए। उन्होंने ख़ुबैब की लाश को उस सूली से उतारा जिस पर उन्हें लटकाया गया था, ऊँट पर लादा और मदीना की तरफ़ चल पड़े। हाल जानकर मुशरिक एक बड़ी भीड़ की शक्ल में उन पर चढ़ आए। दोनों सहाबा ने अपना बचाव करने के लिए लाश को ज़मीन पर रख दिया। थोड़ी देर बाद उन्होंने देखा कि जहाँ उन्होंने लाश रखी थी, वहाँ ज़मीन फट गई और लाश को अपने अंदर लेकर फिर बंद हो गई; इसके बाद उन्होंने मदीना की राह ली।

हज़रत ज़ैद इब्ने दसिन्ना को भी मुशरिकों ने वहाँ खड़ी की हुई दूसरी सूली से बाँध दिया और उन्हें अपने दीन से फिर जाने पर मजबूर किया। लेकिन मुशरिक ज़ैद के ईमान को और मज़बूत करने के सिवा कुछ हासिल न कर सके। इस पर उन्होंने ज़ैद पर तीरों की बौछार कर दी। आख़िरकार सफ़वान इब्ने उमय्या के आज़ाद किए हुए ग़ुलाम निस्तास ने उन्हें शहीद कर दिया।