मेरे प्यारे नबी

ईमान की शर्तें

ईमान की छह शर्तें “आमन्तु” में बयान की गई हैं। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने बताया है कि ईमान मुक़र्रर छह चीज़ों पर ईमान लाने का नाम है। इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि अपने बच्चे को पहले “आमन्तु” ज़बानी याद कराए और उसके मायने भी अच्छी तरह सिखाए। आमन्तु: आमन्तु बिल्लाहि व मलाइकतिही व कुतुबिही व रुसुलिही वल यौमिल आख़िरि व बिल क़द्रि ख़ैरिही व शर्रिही मिनल्लाहि तआला, वल बअसु बअदल मौति हक़्क़ुन। अशहदु अन ला इलाह इल्लल्लाहु व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू।

1. अल्लाह तआला के वुजूद और उसके एक होने पर ईमान लाना

(आमन्तु बिल्लाहि) का मतलब है: “मैं अल्लाह तआला के वुजूद और उसके एक होने पर ईमान लाया, मैंने दिल से इसकी तस्दीक़ की (सच माना) और ज़बान से इक़रार किया।” अल्लाह तआला मौजूद है और एक है। उसकी ज़ात में और उसकी सिफ़ात में किसी तरह भी उसका कोई शरीक नहीं। जिस तरह तमाम मख़लूक़ात की ज़ात और सिफ़ात उन्हें पैदा करने वाले की ज़ात और सिफ़ात से मिलती-जुलती नहीं, उसी तरह पैदा करने वाले की ज़ात और सिफ़ात भी उसकी पैदा की हुई किसी चीज़ की ज़ात और सिफ़ात से मिलती-जुलती नहीं। तमाम मख़लूक़ात के हर अंग और हर ख़लिये (सेल) को पैदा करने वाला, अदम से वुजूद में लाने वाला सिर्फ़ अल्लाह तआला है। अल्लाह तआला की ज़ात की हक़ीक़त को कोई नहीं जान सकता। वह अक़्ल और ख़याल में आने वाली हर चीज़ से मुनज़्ज़ह (पाक) और बरी है। उसकी ज़ात को अक़्ल और ख़याल में लाना जाइज़ नहीं। बल्कि क़ुरआन-ए-करीम में बयान की गई उसकी सिफ़ात और उसके नामों को याद करके उनके ज़रिए उसकी उलूहियत (माबूद होने) की तस्दीक़ और इक़रार करना चाहिए। उसकी तमाम सिफ़ात और नाम अज़ली (जिनकी कोई शुरुआत नहीं) और अबदी (जिनका कोई अंत नहीं) हैं। अल्लाह तआला न माद्दा है, न जिस्म, न कोई हालत। उसका न कोई मिस्ल है, न शरीक, न ज़िद (मुक़ाबिल)। वह उन चीज़ों की तरह नहीं जिन्हें हम जानते हैं या सोच सकते हैं। वह कैसा है, यह न समझा जा सकता है, न सोचा जा सकता है। दिल में आने वाली हर चीज़ ग़लत है। अल्लाह तआला मौजूद है, एक है। उसके सिवा इबादत के लायक़ कोई इलाह नहीं। अल्लाह तआला ज़माने, जगह और दिशा का पाबंद नहीं। वह न किसी जगह में है, न किसी तरफ़। ज़मानों, जगहों और दिशाओं को उसी ने पैदा किया है। जाहिल लोग उसे अर्श के ऊपर या ऊपर आसमान में समझते हैं। अर्श को भी, उसके ऊपर को भी और नीचे को भी उसी ने पैदा किया है। बाद में पैदा की गई कोई चीज़ क़दीम [अज़ली] ज़ात के लिए जगह नहीं बन सकती। जिस तरह उसकी ज़ात किसी जगह में नहीं ठहरी हुई, उसी तरह वह जानी-पहचानी छह दिशाओं से भी पाक है। यानी वह न आगे है, न पीछे, न दाएँ, न बाएँ, न ऊपर, न नीचे। वह कायनात के न अंदर है, न बाहर। अंदर या बाहर होना तो दो मौजूद चीज़ों के दरमियान ही सोचा जाता है।

अल्लाह तआला के बारे में “हर जगह” नहीं कहा जाता। जब अल्लाह तआला जगह से पाक है, तो “वह हर जगह है” कहना उसके लिए जगह मुक़र्रर करना होगा। तमाम जगहों को, यानी हर मक़ाम को पैदा करने वाला अल्लाह तआला है। पैदा की गई चीज़ पैदा करने वाले के लिए जगह नहीं बन सकती। इसलिए “हर जगह” नहीं, बल्कि “अल्लाह तआला जगह से पाक है” कहना चाहिए। इसी वजह से अल्लाह के बारे में “हर जगह” नहीं कहा जाता। यूँ कहा जाता है: “अल्लाह तआला हर ज़माने में और हर जगह हाज़िर और नाज़िर है।”

“हर मुसलमान को चाहिए कि अपने बच्चे को पहले ‘आमन्तु’ ज़बानी याद कराए और उसके मायने भी अच्छी तरह सिखाए” Hüseyin bin Sa’id (रहमतुल्लाहि अलैहि)

हज़रत सैयद अब्दुल हकीम अरवासी भी फ़रमाते हैं:

“चूँकि अल्लाह तआला ज़माने और जगह का पाबंद नहीं, इसलिए ‘वह हाज़िर और नाज़िर है’ का क़ौल मजाज़ है। यानी इसका मतलब यह है कि वह बिना ज़माने और बिना जगह के [किसी जगह में हुए बिना] हाज़िर है [मौजूद है] और नाज़िर है [देखता है]। जिस तरह अल्लाह तआला की तमाम सिफ़ात ज़माने और जगह से पाक हैं, उसी तरह उसका हाज़िर और नाज़िर होना भी ज़माने और जगह के साथ नहीं।” कायनात ख़याल के मर्तबे में पैदा की गई है। ख़याल के मर्तबे वाले आलम का हमेशा मौजूद दिखाई देना अल्लाह की क़ुदरत से है। हर मौजूद चीज़ को पैदा करने वाला, उसका मालिक और हाकिम वही है। “उस पर न कोई हाकिम है, न हुक्म देने वाला, न उससे बढ़कर कोई” – इस बात पर ईमान रखना लाज़िम है। हर बड़ाई और हर कामिल सिफ़त उसी की है। उसमें न कोई ऐब है, न कोई नाक़िस सिफ़त। वह जो चाहे कर सकता है। उसके काम अपने या दूसरों के फ़ायदे के लिए नहीं होते। वह किसी बदले के लिए कुछ नहीं करता। इसके बावजूद उसके हर काम में हिकमतें, फ़ायदे, मेहरबानियाँ और एहसान हैं। वह अपने बंदों को अच्छी और फ़ायदेमंद चीज़ देने पर, किसी को सवाब और किसी को अज़ाब देने पर मजबूर नहीं। अगर वह नाफ़रमानों और गुनाह करने वालों सबको जन्नत में दाख़िल कर दे, तो यह उसके फ़ज़्ल और एहसान के लायक़ है। अगर इताअत और इबादत करने वालों सबको जहन्नम में डाल दे, तो यह अद्ल के ख़िलाफ़ नहीं होगा। लेकिन उसने चाहा है और बता दिया है कि वह मुसलमानों को, इबादत करने वालों को जन्नत में दाख़िल करेगा और उन्हें हमेशा रहने वाली नेमतें और भलाइयाँ अता करेगा, और काफ़िरों को जहन्नम में हमेशा का अज़ाब देगा। वह अपनी बात से नहीं फिरता। अगर तमाम जानदार ईमान ले आएँ, इताअत करें, तो इससे उसे कोई फ़ायदा नहीं। अगर सारा आलम काफ़िर हो जाए, सरकश और हद से बढ़ने वाला बन जाए, उसके मुक़ाबले पर आ जाए, तो इससे उसे कोई नुक़सान नहीं। शिर्क और कुफ़्र के सिवा कोई भी बड़ा गुनाह करके तौबा किए बिना मरने वाले को अगर चाहे तो माफ़ कर देता है। छोटे गुनाह पर भी, अगर चाहे तो अज़ाब देता है। उसने बता दिया है कि काफ़िर या मुरतद होकर मरने वालों को वह हरगिज़ माफ़ नहीं करेगा और उन्हें हमेशा का अज़ाब देगा।

जो शख़्स मुसलमान और अहले क़िब्ला हो, इबादत करता हो, मगर उसका अक़ीदा अहले सुन्नत के अक़ीदे के मुताबिक़ न हो और वह तौबा किए बिना मर जाए, उसे अल्लाह तआला अगरचे जहन्नम में अज़ाब देगा, फिर भी ऐसे बिदअती मुसलमान जहन्नम में हमेशा नहीं रहेंगे।

अल्लाह तआला को दुनिया में सिर की आँख से देखना जाइज़ (मुमकिन) है, लेकिन किसी ने उसे देखा नहीं। क़यामत के दिन महशर के मैदान में वह काफ़िरों और गुनहगार मोमिनों पर क़हर और जलाल के साथ, और नेक मोमिनों पर लुत्फ़ और जमाल के साथ ज़ाहिर होगा। मोमिन जन्नत में उसे जमाल की सिफ़त के साथ देखेंगे। फ़रिश्ते और औरतें भी देखेंगी। काफ़िर इससे महरूम रहेंगे।

अल्लाह तआला पर रात, दिन और ज़माने का गुज़रना सोचा भी नहीं जा सकता। चूँकि अल्लाह तआला में किसी भी लिहाज़ से कोई तब्दीली नहीं होती, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि “पहले वह ऐसा था, आगे ऐसा होगा।” अल्लाह तआला किसी चीज़ में हुलूल नहीं करता (दाख़िल नहीं होता)। यानी किसी चीज़ के साथ एक नहीं होता। अल्लाह तआला का न कोई ज़िद है, न उलटा, न मिस्ल, न शरीक, न मददगार, न हिफ़ाज़त करने वाला।

उसकी न माँ है, न बाप, न बेटा, न बेटी, न बीवी। वह हर वक़्त हाज़िर है, हर चीज़ को घेरे हुए (मुहीत) है और देखने वाला (नाज़िर) है। वह हर एक से उसकी शहरग से भी ज़्यादा क़रीब है। लेकिन उसका हाज़िर होना, घेरे हुए होना, साथ होना और क़रीब होना उस तरह नहीं जैसा हम समझते हैं। उसकी क़ुरबत को आलिमों के इल्म, साइंस वालों की ज़हानत और औलिया के कश्फ़ और शुहूद (दिल की आँख से खुलने और देखने) से नहीं समझा जा सकता। इनकी अंदरूनी हक़ीक़त को इंसानी अक़्ल नहीं पा सकती। अल्लाह तआला अपनी ज़ात और सिफ़ात में एक है; उनमें से किसी में भी न कोई तब्दीली होती है, न वह किसी और हालत में बदलती है।

अल्लाह तआला के नाम बेशुमार हैं। मशहूर है कि उसके एक हज़ार एक नाम हैं। यानी उसने अपने नामों में से एक हज़ार एक नाम इंसानों को बताए हैं। मुहम्मद अलैहिस्सलाम के दीन में उनमें से निन्यानवे बताए गए हैं। इन्हें “अस्माउल हुस्ना” कहा जाता है।

अल्लाह तआला की ज़ाती और सुबूती सिफ़ात

अल्लाह तआला की सिफ़ात-ए-ज़ातिया छह हैं:

1. वुजूद: अल्लाह तआला मौजूद है। उसका वुजूद अज़ली (बिना शुरुआत के) है। वह वाजिबुल वुजूद है, यानी उसका मौजूद होना लाज़िम है। 2. क़िदम: अल्लाह तआला के वुजूद की न कोई इब्तिदा है, न शुरुआत।

3. बक़ा: अल्लाह तआला के वुजूद का न कोई आख़िर है, न अंत। वह कभी ख़त्म नहीं होता। जिस तरह उसका कोई शरीक होना मुहाल (नामुमकिन) है, उसी तरह उसकी ज़ात और सिफ़ात के लिए ख़त्म होना भी मुहाल है।

4. वहदानियत: अल्लाह तआला की ज़ात में, उसकी सिफ़ात में और उसके कामों में न कोई शरीक है, न कोई मिस्ल।

5. मुख़ालफ़तुन लिल हवादिस: अल्लाह तआला अपनी ज़ात और अपनी सिफ़ात में किसी भी मख़लूक़ की ज़ात और सिफ़ात से मिलता-जुलता नहीं।

6. क़ियाम बि-नफ़्सिही: अल्लाह तआला अपनी ज़ात से क़ायम है। वह किसी जगह का मोहताज नहीं। जब न माद्दा था, न जगह, तब भी वह मौजूद था, क्योंकि वह हर मोहताजी से पाक है। इस कायनात को अदम से वुजूद में लाने से पहले उसकी ज़ात जैसी थी, हमेशा-हमेशा वैसी ही है।

अल्लाह तआला की सिफ़ात-ए-सुबूतिया आठ हैं:

1. हयात: अल्लाह तआला ज़िंदा है। उसकी ज़िंदगी मख़लूक़ों की ज़िंदगी से मिलती-जुलती नहीं; यह उसकी ज़ात के लायक़ और उसी के लिए ख़ास, अज़ली और अबदी ज़िंदगी है। 2. इल्म: अल्लाह तआला हर चीज़ को जानता है। उसका जानना मख़लूक़ात के जानने की तरह नहीं। अँधेरी रात में काले पत्थर पर चींटी चलती है, तो वह उसे देखता और जानता है। इंसानों के दिलों से गुज़रने वाले ख़यालात और उनकी नीयतों को जानता है। उसके जानने में कोई तब्दीली नहीं होती। उसका इल्म अज़ली और अबदी है।

3. समअ: अल्लाह तआला सुनता है। वह बिना किसी ज़रिये और बिना किसी दिशा के सुनता है। उसका सुनना बंदों के सुनने से मिलता-जुलता नहीं। उसकी यह सिफ़त भी उसकी हर सिफ़त की तरह अज़ली और अबदी है। 4. बसर: अल्लाह तआला देखता है। वह बिना किसी औज़ार और बिना किसी शर्त के देखता है। उसका देखना आँख से नहीं। 5. इरादा: अल्लाह तआला चाहने वाला है। वह जो चाहता है, पैदा करता है। हर चीज़ उसके चाहने से वुजूद में आती है। कोई ऐसी ताक़त नहीं जो उसके इरादे में रुकावट बन सके।

6. क़ुदरत: अल्लाह तआला हर चीज़ पर क़ादिर है। कोई भी चीज़ उसके लिए मुश्किल नहीं।

7. कलाम: अल्लाह तआला कलाम करने वाला है। उसका कलाम करना किसी औज़ार, हर्फ़ों, आवाज़ों और ज़बान से नहीं।

8. तकवीन: अल्लाह तआला पैदा करने वाला है। उसके सिवा कोई पैदा करने वाला नहीं। हर चीज़ को वही पैदा करता है। अल्लाह तआला के सिवा किसी को “पैदा करने वाला” (ख़ालिक़) नहीं कहना चाहिए। उसने तमाम मौजूदात को अदम से वुजूद बख़्शा। इंसानों और जानवरों की हरकतों, उनके सुकून [ठहराव], उनके ख़यालात, बीमारियों, शिफ़ाओं, भलाइयों, बुराइयों, फ़ायदों और नुक़सानों को पैदा करने वाला सिर्फ़ वही है। इंसान अपनी हरकतों को, अपने ख़यालात को, किसी भी चीज़ को पैदा नहीं कर सकता। इंसान के ख़यालात, उसकी हरकतें, उसकी खोजें और ईजादें हमेशा वही वुजूद में लाता है, वही पैदा करता है। उसके सिवा किसी और को पैदा करने वाला कहना जाहिलाना और बातिल बात है।

“चूँकि अल्लाह तआला ज़माने और जगह का पाबंद नहीं, इसलिए ‘वह हाज़िर और नाज़िर है’ का क़ौल मजाज़ है। यानी इसका मतलब यह है कि वह बिना ज़माने और बिना जगह के [किसी जगह में हुए बिना] हाज़िर है [मौजूद है] और नाज़िर है [देखता है]” सैयद अब्दुल हकीम अरवासी (रहमतुल्लाहि अलैहि)

अल्लाह तआला की सिफ़ात-ए-सुबूतिया भी सिफ़ात-ए-ज़ातिया की तरह क़दीम (अज़ली) हैं। ये सिफ़ात भी उसकी ज़ात से जुदा नहीं होतीं। यानी उसकी सिफ़ात न उसकी ज़ात का ऐन हैं, न उससे ग़ैर। कोई भी शख़्स और कोई भी चीज़ अल्लाह तआला की सिफ़ात में न शरीक हो सकती है, न उसके जैसी। ज़ाती सिफ़ात वे सिफ़ात हैं जो अल्लाह तआला की ज़ात के लिए ख़ास हैं। ये सिफ़ात किसी भी मख़लूक़ में नहीं। इनका मख़लूक़ों से किसी तरह का कोई ताल्लुक़ भी नहीं। सुबूती सिफ़ात वे सिफ़ात हैं जिनका मख़लूक़ों से ताल्लुक़ है। पैदा करने की सिफ़त के सिवा बाक़ी सिफ़ात में से उसने अपने बंदों को भी, चाहे जुज़्वी (थोड़ा-सा) ही सही, महदूद तौर पर हिस्सा अता किया है। उसकी इन सिफ़ात में भी कोई तब्दीली नहीं होती। ये भी ज़ाती सिफ़ात की तरह क़दीम, यानी अज़ली हैं। चूँकि मख़लूक़ बाद में पैदा की गई है, इसलिए इन सिफ़ात का मख़लूक़ों से जो ताल्लुक़ है, वह हादिस है, यानी अज़ली नहीं। उसकी ये सिफ़ात, यानी उसका ज़िंदा होना, जानना, सुनना, देखना, उसकी क़ुदरत, उसका चाहना और कलाम करना बंदों की सिफ़ात से बिल्कुल नहीं मिलतीं; इनके सिर्फ़ नाम मिलते-जुलते हैं। उसकी ज़ात और उसकी सिफ़ात की हक़ीक़त को समझना मुमकिन नहीं।

कोई भी मख़लूक़ अपने पैदा करने वाले को हरगिज़ नहीं समझ सकती, नहीं पा सकती। नबी-ए-करीम फ़रमाते हैं: “अल्लाह तआला की पैदा की हुई चीज़ों में ग़ौर करो, उसकी ज़ात में ग़ौर न करो, क्योंकि तुम उसकी क़द्र का अंदाज़ा नहीं कर सकते, उसे समझने की ताक़त नहीं रखते।” एक और हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया है: “अल्लाह तआला दिल में आने वाली हर चीज़ से दूर (पाक) है।”1

2. फ़रिश्तों पर ईमान लाना

व मलाइकतिही: यानी फ़रिश्तों पर ईमान लाना। फ़रिश्ते जिस्म हैं, लेकिन लतीफ़ (बारीक) हैं, गैस से भी ज़्यादा लतीफ़। वे नूरानी हैं। वे ज़िंदा हैं। वे अक़्ल वाले हैं। इंसानों में जो बुराइयाँ हैं, वे फ़रिश्तों में नहीं। वे हर शक्ल इख़्तियार कर सकते हैं। जिस तरह गैसें तरल और ठोस बन जाती हैं और ठोस होकर एक शक्ल ले लेती हैं, उसी तरह फ़रिश्ते भी ख़ूबसूरत शक्लें इख़्तियार कर सकते हैं। फ़रिश्ते बड़े इंसानों के बदन से जुदा होने वाली रूहें नहीं। ईसाई फ़रिश्तों को ऐसी रूहें समझते हैं। वे एनर्जी या ताक़त जैसे भी नहीं। पुराने फ़लसफ़ियों में से कुछ ने ऐसा समझा।

मलक (फ़रिश्ता) का मतलब है: सफ़ीर, ख़बर देने वाला। इसकी जमा “मलाइका” है। फ़रिश्ते हर जानदार से पहले पैदा किए गए। इसीलिए बताया गया कि किताबों पर ईमान से पहले फ़रिश्तों पर ईमान लाया जाए। किताबें भी नबियों से पहले हैं। क़ुरआन-ए-करीम में भी जिन चीज़ों पर ईमान लाना है, उनके नाम इसी तरतीब से बताए गए हैं। फ़रिश्तों पर ईमान इस तरह होना चाहिए: फ़रिश्ते अल्लाह तआला के बंदे हैं। वे उसके शरीक नहीं। वे उसकी बेटियाँ नहीं। काफ़िरों और मुशरिकों ने ऐसा समझा। अल्लाह तआला सब फ़रिश्तों से राज़ी है। वे अल्लाह तआला के हुक्मों की इताअत करते हैं। वे गुनाह नहीं करते। हुक्मों की नाफ़रमानी नहीं करते। वे न मर्द हैं, न औरत। वे शादी नहीं करते। उनकी औलाद नहीं होती। वे ज़िंदगी वाले, यानी ज़िंदा हैं।

“अल्लाह तआला की पैदा की हुई चीज़ों में ग़ौर करो, उसकी ज़ात में ग़ौर न करो, क्योंकि तुम उसकी क़द्र का अंदाज़ा नहीं कर सकते, उसे समझने की ताक़त नहीं रखते” हदीस शरीफ़

जब अल्लाह तआला ने इंसानों को पैदा करने की ख़बर दी, तो फ़रिश्तों ने पूछा: “या रब! क्या तू ज़मीन पर फ़साद फैलाने वाली और ख़ून बहाने वाली मख़लूक़ पैदा करेगा?” फ़रिश्तों के ऐसे सवाल, जिन्हें “ज़ल्ला” (लग़्ज़िश) कहा जाता है, उनके मासूम (बेगुनाह) और बेक़सूर होने को नुक़सान नहीं पहुँचाते। मख़लूक़ में सबसे ज़्यादा तादाद फ़रिश्तों की है। उनकी गिनती अल्लाह तआला के सिवा कोई नहीं जानता। आसमानों में कोई ख़ाली जगह ऐसी नहीं जहाँ फ़रिश्ते इबादत न करते हों। आसमानों की हर जगह रुकूअ या सज्दे में पड़े फ़रिश्तों से भरी हुई है। आसमानों में, ज़मीनों में, घास-पौधों में, सितारों में, जानदारों में, बेजान चीज़ों में, बारिश की बूँदों में, पेड़ों के पत्तों में, हर मॉलीक्यूल में, हर एटम में, हर रिएक्शन में, हर हरकत में – हर चीज़ में फ़रिश्तों के ज़िम्मे काम हैं। वे हर जगह अल्लाह तआला के हुक्मों को पूरा करते हैं। वे अल्लाह तआला और उसकी मख़लूक़ के दरमियान वास्ता हैं। उनमें से कुछ दूसरे फ़रिश्तों के अफ़सर हैं। कुछ इंसानों के नबियों के पास ख़बर लाते हैं। कुछ इंसानों के दिल में अच्छे ख़याल डालते हैं, जिसे इल्हाम कहा जाता है।

कुछ फ़रिश्तों को इंसानों की और तमाम मख़लूक़ की कोई ख़बर नहीं; वे अल्लाह तआला के जमाल के सामने अपने आप से बेख़ुद हो चुके हैं। हर एक की एक मुक़र्रर जगह है, वे वहाँ से अलग नहीं हो सकते। जन्नत के फ़रिश्ते जन्नत में हैं। उनके सरदार का नाम रिज़वान है। जहन्नम के फ़रिश्तों को ज़बानिया कहा जाता है। वे जहन्नम में उन कामों को अदा करते हैं जिनका उन्हें हुक्म दिया गया है। जहन्नम की आग उन्हें नुक़सान नहीं पहुँचाती, जैसे समुंदर मछली को नुक़सान नहीं पहुँचाता। जहन्नम के ज़बानिया के बड़े उन्नीस हैं। उनमें सबसे बड़े का नाम मालिक है। हर इंसान के भले-बुरे तमाम काम लिखने वाले उन चार फ़रिश्तों को, जिनमें से दो रात को और दो दिन को आते हैं, किरामन कातिबीन या हफ़ज़ा फ़रिश्ते कहा जाता है।

यह भी रिवायत किया गया है कि हफ़ज़ा फ़रिश्ते इनके अलावा हैं। दाईं तरफ़ वाला फ़रिश्ता बाईं तरफ़ वाले का अफ़सर है और अच्छे काम लिखता है। बाईं तरफ़ वाला बुराइयाँ लिखता है। क़ब्रों में काफ़िरों और नाफ़रमान मुसलमानों को अज़ाब देने वाले फ़रिश्ते और क़ब्र में सवाल करने वाले फ़रिश्ते हैं। सवाल करने वाले फ़रिश्तों को “मुनकर और नकीर” कहा जाता है। मोमिनों से सवाल करने वालों को “मुबश्शिर और बशीर” भी कहा जाता है। फ़रिश्तों को एक-दूसरे पर फ़ज़ीलत हासिल है। उनमें सबसे बुलंद चार हैं: 1. जिबराईल अलैहिस्सलाम। उनका काम नबियों के पास वह्य लाना, हुक्म और मनाहियाँ पहुँचाना है। 2. इसराफ़ील अलैहिस्सलाम। वह सूर नाम का बिगुल फूँकेंगे। वह सूर को दो बार फूँकेंगे। पहली बार में अल्लाह तआला के सिवा हर ज़िंदा चीज़ मर जाएगी। दूसरी बार में सब फिर से ज़िंदा हो जाएँगे। 3. मीकाईल अलैहिस्सलाम। सस्ती और महँगाई, क़हत और फ़रावानी लाना और हर माद्दे को हरकत देना उनका काम है। 4. इज़राईल अलैहिस्सलाम। इंसानों की रूह क़ब्ज़ करने वाले वही हैं।

ये चारों तमाम फ़रिश्तों के नबी हैं। इन चार फ़रिश्तों के बाद बुलंद दर्जे वाले चार गिरोह हैं: हमला-ए-अर्श (अर्श को उठाने वाले) कहलाने वाले फ़रिश्ते चार हैं, क़यामत में आठ होंगे; अल्लाह तआला की बारगाह में हाज़िर रहने वाले फ़रिश्तों को मुक़र्रबीन कहा जाता है; अज़ाब के फ़रिश्तों के बड़ों को करूबियान कहा जाता है; रहमत के फ़रिश्तों को रूहानियान कहा जाता है। ये सब फ़रिश्तों के ख़वास (चुने हुए), यानी उनमें सबसे बुलंद हैं।

ये नबियों के सिवा तमाम इंसानों से बुलंद हैं। मुसलमानों के नेक लोग और औलिया आम फ़रिश्तों से ज़्यादा अफ़ज़ल और बुलंद हैं, और आम फ़रिश्ते आम मुसलमानों से, यानी नाफ़रमान और फ़ासिक़ लोगों से अफ़ज़ल हैं।

3. किताबों पर ईमान लाना

व कुतुबिही: यानी: “मैं अल्लाह तआला की उतारी हुई किताबों पर ईमान लाया।” अल्लाह तआला ने ये किताबें कुछ नबियों पर जिबराईल नाम के फ़रिश्ते के ज़रिए वह्य करके, यानी पढ़वाकर, कुछ पर तख़्ती पर लिखी हुई सूरत में और कुछ पर बिना फ़रिश्ते के सुनवाकर उतारीं। ये सब अल्लाह तआला का कलाम हैं। ये अज़ली और अबदी हैं। ये मख़लूक़ (पैदा की हुई) नहीं। ये फ़रिश्तों या नबियों की अपनी बातें नहीं। अल्लाह तआला की उतारी हुई सब किताबें हक़ और सच्ची हैं। आसमानी किताबों में से जो हमें बताई गई हैं, वे एक सौ चार हैं। मशहूर है कि इनमें से दस सहीफ़े आदम अलैहिस्सलाम पर, पचास सहीफ़े शीस (शीत) अलैहिस्सलाम पर, तीस सहीफ़े इदरीस अलैहिस्सलाम पर और दस सहीफ़े इब्राहीम अलैहिस्सलाम पर उतारे गए। तौरात मूसा अलैहिस्सलाम पर, ज़बूर दाऊद अलैहिस्सलाम पर, इंजील ईसा अलैहिस्सलाम पर और क़ुरआन-ए-करीम मुहम्मद अलैहिस्सलातु वस्सलाम पर नाज़िल हुआ, उतरा। क़ुरआन-ए-करीम ने तमाम किताबों को मंसूख़ कर दिया, उनके हुक्मों को ख़त्म कर दिया। क़ुरआन-ए-करीम में क़यामत तक कभी भी कोई ग़लती, भूल, ज़्यादती और कमी नहीं होगी। गुज़रे हुए और आने वाले तमाम उलूम क़ुरआन-ए-करीम में मौजूद हैं। इसीलिए यह तमाम किताबों से बुलंद और क़ीमती है। रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का सबसे बड़ा मोजिज़ा क़ुरआन-ए-करीम है। अगर तमाम इंसान और जिन्नात इकट्ठे हो जाएँ और सब मिलकर क़ुरआन-ए-करीम की सबसे छोटी सूरह जैसा एक कलाम कहने की कोशिश करें, तब भी नहीं कह सकेंगे। आज तमाम इंसानों के लिए क़ुरआन-ए-करीम की पैरवी करना लाज़िम है। अब किसी भी मुल्क में असली तौरात और इंजील नहीं है। बिगाड़ी हुई इंजीलें मौजूद हैं। इन किताबों में बाद में तहरीफ़ कर दी गई, यानी इंसानों ने इन्हें बदल डाला। अगर ये न बिगाड़ी गई होतीं, तब भी इनका कोई एतिबार न होता: अल्लाह तआला ने इन सबको मंसूख़ कर दिया है।

क़ुरआन-ए-करीम आयत-आयत करके उतरा और 23 साल में पूरा हुआ। क़ुरआन-ए-करीम क़यामत तक लागू है। यह मंसूख़ होने से और इंसानों के बदलने से महफ़ूज़ रखा गया है। जो यह माने कि क़ुरआन-ए-करीम में कोई कमी या ज़्यादती है, वह अल्लाह तआला पर ईमान न लाने वाला हो जाता है। आयत-ए-करीमाओं में अल्लाह तआला मफ़हूमन फ़रमाता है:

“क़ुरआन-ए-करीम को हमने उतारा है और यक़ीनन हम ही उसकी हिफ़ाज़त करने वाले हैं” (सूरह हिज्र, 15:9)।

“क़ुरआन-ए-करीम बहुत क़ीमती, बेहद ज़बरदस्त (बेमिसाल) किताब है। बातिल न उसके आगे से उसके पास आ सकता है, न उसके पीछे से (किसी तरफ़ से, किसी तरह भी कोई बेबुनियाद चीज़ उसमें दाख़िल नहीं हो सकती। क्योंकि) यह उस अल्लाह तआला की तरफ़ से उतारा गया है जो हकीम (जिसकी हर बात और हर काम में हिकमत है) और महमूद (हर तरह की तारीफ़ के लायक़) है” (सूरह हा मीम सज्दा, 41:41–42)। क़ुरआन-ए-करीम गुज़रे ज़माने में हो चुकी और आगे होने वाली बहुत-सी छुपी बातों की ख़बर देता है। इसे सुनने वाले और पढ़ने वाले इसके मज़े से सेर नहीं होते। थक जाएँ, तब भी उकताते नहीं। बेशुमार तजुर्बों से मालूम हुआ है कि इसका पढ़ना या सुनना परेशानियों को दूर कर देता है। इसे सुनने वालों में ऐसे भी देखे गए जिनके दिलों पर दहशत और ख़ौफ़ छा गया, यहाँ तक कि इसी वजह से जान दे बैठे। इस्लाम के कितने ही कट्टर दुश्मनों के दिल क़ुरआन-ए-करीम सुनकर नर्म हो गए और वे ईमान ले आए।

क़ुरआन-ए-करीम अपने उतरने के वक़्त से आज तक किसी तब्दीली का शिकार नहीं हुआ और न आगे होगा। क़ुरआन-ए-करीम अल्लाह का कलाम है। ऐसी किताब का इंसानों के हाथों बनाया जाना मुमकिन नहीं। कोई इसकी एक आयत जैसा कलाम भी न कह सका। आज तक आने वाले तमाम शायर और अदीब क़ुरआन-ए-करीम की नज़्म (तरतीब) और मायनों के सामने आजिज़ और हैरान रह गए। हमारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के आख़िरत तशरीफ़ ले जाने के बाद आपके पहले ख़लीफ़ा हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने क़ुरआन-ए-करीम की आयतों को एक जगह जमा करवाया। इस तरह एक मुसहफ़ वुजूद में आया। तमाम सहाबा-ए-किराम ने एक राय होकर कहा कि यह मुसहफ़ अल्लाह का कलाम है। तीसरे ख़लीफ़ा उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने इस मुसहफ़ से छह नुस्ख़े और लिखवाए और उन्हें कुछ सूबों में भेजा।

क़ुरआन-ए-करीम को उसकी असल के मुताबिक़ पढ़ना लाज़िम है। दूसरे हर्फ़ों में लिखी गई इबारत को क़ुरआन-ए-करीम नहीं कहा जाता। मुसहफ़ को हाथ में लेते वक़्त बा-वुज़ू होना चाहिए। क़िब्ले की तरफ़ मुँह करके बैठकर, तवज्जोह के साथ, ठहर-ठहरकर, ख़ुशू (आजिज़ी) के साथ और मुसहफ़ में देखकर, हर आयत का हक़ अदा करते हुए तजवीद के क़ायदों के मुताबिक़ पढ़ना चाहिए। यह सोचना चाहिए कि जो कुछ वह पढ़ रहा है, वह अल्लाह का कलाम है, और क़ुरआन-ए-करीम के हुक्मों और मनाहियों पर अमल करना चाहिए।

4. नबियों पर ईमान लाना

व रुसुलिही: यानी: “मैं अल्लाह तआला के नबियों पर ईमान लाया।” नबी इसलिए भेजे गए कि इंसानों को उस रास्ते तक पहुँचाएँ जिसे अल्लाह तआला पसंद करता है, और सीधा रास्ता दिखाएँ। वे पैदाइश, अख़लाक़, इल्म और अक़्ल के लिहाज़ से अपने ज़माने के तमाम इंसानों से बुलंद, क़ीमती और मोहतरम हस्तियाँ हैं। उनमें न कोई बुरी आदत है, न कोई नापसंद हालत।

नबियों में इस्मत (बेगुनाही) की सिफ़त है। यानी नबी होने की ख़बर दिए जाने से पहले भी और बाद में भी नबी कोई छोटा या बड़ा गुनाह नहीं करते। नबी होने की ख़बर दिए जाने के बाद, उनके नबी होने की बात फैलने और समझ में आने तक उनमें अंधापन, बहरापन और इस जैसे ऐब और कमियाँ भी नहीं होतीं। नया दीन लाने वाले नबियों को रसूल कहा जाता है। जो नबी नया दीन नहीं लाए, बल्कि जिन्होंने इंसानों को पहले दीन की तरफ़ बुलाया, उन्हें नबी कहा जाता है। हुक्मों की तबलीग़ में और इंसानों को अल्लाह के दीन की तरफ़ बुलाने में रसूल और नबी में कोई फ़र्क़ नहीं। नबियों पर ईमान लाने का मतलब है उनमें कोई फ़र्क़ किए बिना इस पर ईमान रखना कि वे सब सच्चे और सच बोलने वाले हैं। जो उनमें से एक पर ईमान न लाए, वह किसी पर भी ईमान लाया हुआ नहीं माना जाता।

दुश्मनों की कसरत, ईमान न लाने वालों के मज़ाक़ उड़ाने और तकलीफ़ पहुँचाने के बावजूद नबियों ने अल्लाह तआला के हुक्म इंसानों तक पहुँचाए, बताए और दुश्मनों से नहीं डरे। अल्लाह तआला ने नबियों के सच्चे होने और सच बोलने को ज़ाहिर करने के लिए उन्हें मोजिज़ों से मज़बूत किया। कोई इन मोजिज़ों का मुक़ाबला न कर सका। जो शख़्स किसी नबी को क़बूल करके उस पर ईमान लाए, उसे उस नबी की उम्मत कहा जाता है। क़यामत के दिन नबियों को इजाज़त दी जाएगी कि अपनी उम्मत के ज़्यादा गुनाह वालों की शफ़ाअत करें और उनकी शफ़ाअत क़बूल होगी। अल्लाह तआला उनकी उम्मतों में से आलिम, नेक और वली लोगों को भी शफ़ाअत करने की इजाज़त देगा और उनकी शफ़ाअत क़बूल फ़रमाएगा।

“क़ुरआन को हमने उतारा है और यक़ीनन हम ही उसकी हिफ़ाज़त करने वाले हैं” हिज्र: 9

नबी (अलैहिमुस्सलवातु वत्तस्लीमात) अपनी क़ब्रों में एक ऐसी ज़िंदगी के साथ ज़िंदा हैं जिसे हम नहीं जानते। उनके मुबारक जिस्मों को मिट्टी नहीं गलाती। इसीलिए हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: “नबी अपनी क़ब्रों में नमाज़ पढ़ते हैं।” नबियों (अलैहिमुस्सलाम) की मुबारक आँखें जब सोती हैं, तो उनके दिल की आँखें नहीं सोतीं। नुबुव्वत के फ़र्ज़ अदा करने में और नुबुव्वत की ख़ूबियाँ रखने में तमाम नबी बराबर हैं। नबी (अलैहिमुस्सलवातु वत्तस्लीमात) इंसानों में से होते हैं। इंसानों के लिए जिन्नात में से, फ़रिश्तों में से और औरतों में से नबी नहीं होता। जिन्न और फ़रिश्ता नबियों के दर्जों तक नहीं पहुँच सकते। नबियों को एक-दूसरे पर फ़ज़ीलत हासिल है। मसलन उम्मत की कसरत, जिन मुल्कों में भेजे गए उनकी वुसअत, इल्म और मारिफ़त का बहुत-सी जगहों तक फैलना, मोजिज़ों का ज़्यादा और हमेशा रहने वाला होना और उनके लिए अलग ख़ूबियों और एहसानों का होना – इन फ़ज़ीलतों के लिहाज़ से आख़िरी ज़माने के नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम तमाम नबियों से बुलंद हैं। उलुल अज़्म नबी उन नबियों से जो ऐसे नहीं, और रसूल उन नबियों से जो रसूल नहीं, बुलंद हैं। आदम अलैहिस्सलाम अल्लाह तआला के एहसान से चुनकर पैदा की गई पाक हस्ती के मायने में सफ़ीयुल्लाह हैं। नूह अलैहिस्सलाम हमेशा अल्लाह तआला में मशग़ूल रहने वाली, इलाही फ़ैज़ पाने वाली हस्ती के मायने में नजीयुल्लाह हैं। इब्राहीम अलैहिस्सलाम ख़लीलुल्लाह हैं, क्योंकि उनके दिल में अल्लाह की मुहब्बत के सिवा किसी मख़लूक़ की मुहब्बत न थी। मूसा अलैहिस्सलाम कलीमुल्लाह हैं, क्योंकि उन्होंने अल्लाह तआला से कलाम किया। ईसा अलैहिस्सलाम रूहुल्लाह और कलिमतुल्लाह हैं, क्योंकि उनके वालिद नहीं; वह सिर्फ़ “हो जा!” के इलाही कलिमे से अपनी वालिदा से दुनिया में आए। इसके अलावा वह वाज़ करके अल्लाह तआला के हिकमत भरे कलिमे इंसानों के कानों तक पहुँचाते थे।

मुहम्मद अलैहिस्सलाम, जो मख़लूक़ों के पैदा किए जाने का सबब हैं और आदम की औलाद में सबसे बुलंद, सबसे इज़्ज़त वाले और सबसे क़ीमती हैं, हबीबुल्लाह हैं। आपके हबीबुल्लाह होने और आपकी बड़ाई और बुलंदी को दिखाने वाली चीज़ें बहुत ज़्यादा हैं। इसीलिए आपके बारे में “हार गए”, “शिकस्त खा गए” जैसे अल्फ़ाज़ नहीं कहे जा सकते। क़यामत में आप सबसे पहले क़ब्र से उठेंगे।

आप महशर के मैदान में सबसे पहले जाएँगे। आप जन्नत में सबसे पहले दाख़िल होंगे। आपके अच्छे अख़लाक़ गिनने से ख़त्म नहीं होते और उन्हें बयान करने की इंसान में ताक़त नहीं।

क़यामत के दिन तमाम नबी आपके झंडे के साये में होंगे। अल्लाह तआला ने हर नबी को यह हुक्म फ़रमाया: “अगर तुम मेरी मख़लूक़ में से मेरे चुने हुए और प्यारे, मेरे हबीब मुहम्मद अलैहिस्सलाम की नुबुव्वत का ज़माना पाओ, तो उन पर ईमान लाना और उनकी मदद करना!” तमाम नबियों ने भी अपनी उम्मतों को यही वसीयत की और यही हुक्म दिया। मुहम्मद अलैहिस्सलाम “ख़ातमुल अंबिया” (आख़िरी नबी) हैं, यानी आपके बाद कोई नबी नहीं आएगा।

नबियों की सिफ़ात

यह ईमान रखना लाज़िम है कि नबियों (अलैहिमुस्सलाम) में सात सिफ़ात होती हैं:

1. इस्मत: गुनाह न करना। नबी कोई ऐसा छोटा या बड़ा गुनाह नहीं करते जो किसी भी दीन में हराम हुआ हो या होगा।

“नबी अपनी क़ब्रों में नमाज़ पढ़ते हैं” हदीस शरीफ़

2. अमानत: नबी हर लिहाज़ से भरोसे के लायक़ हस्तियाँ हैं। वे कभी अमानत में ख़यानत नहीं करते।

3. सिद्क़: नबी अपनी बातों में, अपने कामों में और अपने हर तरह के रवैये में सच्चे और दियानतदार इंसान हैं। वे कभी झूठ नहीं बोलते।

4. फ़तानत: नबी बहुत अक़्लमंद और बहुत समझदार हस्तियाँ हैं। अंधेपन, बहरेपन जैसी कमियों वाले लोगों में से भी और औरतों में से भी कोई नबी नहीं आया। 5. तबलीग़: नबियों ने इंसानों को जो कुछ बताया और खोलकर समझाया, वह सब उन्होंने अल्लाह तआला की तरफ़ से आने वाली वह्य से जाना। उनके बताए हुए हुक्मों और मनाहियों में से कोई भी उनकी अपनी सोच नहीं। उन्होंने वह सब बता दिया जिसका उन्हें हुक्म दिया गया था। 6. अदालत: नबी कभी ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी नहीं करते। किसी की ख़ातिर इंसाफ़ से नहीं हटते। 7. अम्नुल अज़्ल: वे नुबुव्वत से हटाए नहीं जाते। दुनिया में भी और आख़िरत में भी वे हमेशा नबी हैं।

नबियों की तादाद मालूम नहीं। मशहूर है कि वे एक लाख चौबीस हज़ार से ज़्यादा हैं। उनमें से तीन सौ तेरह रसूल हैं। हर दो रसूलों के दरमियान औसतन एक हज़ार साल का फ़ासला है। रसूलों में से छह और भी बुलंद हैं। उन्हें उलुल अज़्म नबी कहा जाता है। वे हैं: आदम, नूह, इब्राहीम, मूसा, ईसा और मुहम्मद मुस्तफ़ा (अलैहिमुस्सलाम)। तैंतीस नबियों के नाम मशहूर हैं। वे हैं: आदम, इदरीस, शीस, नूह, हूद, सालेह, इब्राहीम, लूत, इस्माईल, इसहाक़, याक़ूब, यूसुफ़, अय्यूब, शुऐब, मूसा, हारून, ख़िज़्र, यूशा इब्ने नून, इल्यास, अल-यसअ, ज़ुल-किफ़्ल, शमऊन, इश्मोईल, यूनुस इब्ने मत्ता, दाऊद, सुलेमान, लुक़मान, ज़करिया, यह्या, उज़ैर, ईसा इब्ने मरयम, ज़ुलक़रनैन और मुहम्मद (अलैहि व अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम)।

इनमें से सिर्फ़ अट्ठाईस के नाम क़ुरआन-ए-करीम में बताए गए हैं। ज़ुलक़रनैन, लुक़मान, उज़ैर और ख़िज़्र के नबी होने या न होने में इख़्तिलाफ़ है। हज़रत मुहम्मद मासूम दूसरी जिल्द के 36वें मकतूब में लिखते हैं कि ख़िज़्र अलैहिस्सलाम के नबी होने की ख़बर देने वाली रिवायत मज़बूत है, और 182वें मकतूब में फ़रमाते हैं: ख़िज़्र अलैहिस्सलाम का इंसानी शक्ल में दिखाई देना और कुछ काम करना इस बात की दलील नहीं कि वह ज़िंदा हैं। अल्लाह तआला ने उनकी और बहुत-से नबियों और वलियों की रूहों को इंसानी शक्ल में दिखाई देने की इजाज़त दी है। उन्हें देखना उनके ज़िंदा होने की दलील नहीं।

5. आख़िरत पर ईमान लाना

वल यौमिल आख़िरि: यानी: “मैं आख़िरत के दिन पर ईमान लाया।” इस ज़माने की शुरुआत इंसान के मरने का दिन है और यह क़यामत के आख़िर तक है। इसे “आख़िरी दिन” इसलिए कहा जाता है कि इसके बाद रात नहीं आती, या इसलिए कि यह दुनिया के बाद आता है। क़यामत कब क़ायम होगी, यह नहीं बताया गया। लेकिन नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उसकी बहुत-सी निशानियों की ख़बर दी:

दीन का इल्म भुला दिया जाएगा। फ़िस्क़ (गुनाह) और बुराई बढ़ जाएगी।

बेदीन, बदअख़लाक़ और बेग़ैरत लोग अमीर (हाकिम) बनेंगे। अल्लाह तआला के हुक्मों पर अमल नहीं करवाया जाएगा। हर जगह हराम काम किए जाएँगे। हज़रत महदी आएँगे। ईसा अलैहिस्सलाम आसमान से दमिश्क़ में उतरेंगे। दज्जाल निकलेगा। याजूज और माजूज नाम के लोग हर जगह फ़साद मचाएँगे। सूरज पश्चिम से निकलेगा। बड़े-बड़े ज़लज़ले आएँगे। यमन से आग निकलेगी। आसमान और पहाड़ टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे। सूरज और चाँद काले पड़ जाएँगे। समुंदर एक-दूसरे में मिल जाएँगे और उबलकर सूख जाएँगे…2

गुनाह के काम करने वाले मुसलमानों को फ़ासिक़ कहा जाता है। फ़ासिक़ों के लिए और तमाम काफ़िरों के लिए क़ब्र में अज़ाब है। इस पर ज़रूर ईमान रखना लाज़िम है।

क़ब्र का सवाल हक़ है। मुर्दे को जब क़ब्र में रखा जाएगा, तो वह एक अनजानी ज़िंदगी के साथ ज़िंदा होगा, आराम में रहेगा या अज़ाब देखेगा। हदीसों में साफ़ बताया गया है कि मुनकर और नकीर नाम के दो फ़रिश्ते एक अनजानी डरावनी इंसानी शक्ल में क़ब्र में आकर सवाल करेंगे।3

क़ब्र का सवाल कुछ आलिमों के मुताबिक़ अक़ीदे की कुछ बुनियादों के बारे में होगा, और कुछ के मुताबिक़ अक़ीदे की तमाम बुनियादों के बारे में। इसलिए बच्चों को नीचे लिखे सवाल और जवाब ज़बानी याद करवाने चाहिए:

“तेरा रब कौन है? तेरा नबी कौन है? तेरा दीन कौन-सा दीन है? तेरी किताब क्या है? तेरा क़िब्ला कहाँ है? अक़ीदे (एतिक़ाद) में और अमल में तेरा मज़हब क्या है?”

“मेरा रब अल्लाह तआला है। मेरे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम हैं। मेरा दीन इस्लाम है। मेरी किताब क़ुरआन-ए-करीम है। मेरा क़िब्ला काबा शरीफ़ है। अक़ीदे में मेरा मज़हब अहले सुन्नत वल जमाअत है, अमल में मेरा मज़हब इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा का मज़हब है। मैं मोमिन हूँ, मैं मुसलमान हूँ, अलहम्दुलिल्लाह।”

“तज़किरा-ए-क़ुर्तुबी” में लिखा है कि जो अहले सुन्नत में से न हो, वह सही जवाब नहीं दे सकेगा। अच्छा जवाब देने वालों की क़ब्र कुशादा हो जाएगी, उनके लिए जन्नत से एक खिड़की खोल दी जाएगी। सुबह और शाम वे जन्नत में अपनी जगह देखेंगे, फ़रिश्ते उनके साथ भलाइयाँ करेंगे और उन्हें ख़ुशख़बरियाँ देंगे। अगर मुर्दा अच्छा [सही] जवाब न दे सके, तो उसे लोहे के हथौड़ों से इस तरह मारा जाएगा कि उसकी चीख़ इंसानों और जिन्नात के सिवा हर मख़लूक़ सुनेगी। क़ब्र इतनी तंग हो जाती है कि उसे इस तरह भींचती है कि उसकी हड्डियाँ एक-दूसरे में घुस जाती हैं। जहन्नम से एक सूराख़ खोल दिया जाता है। सुबह और शाम वह जहन्नम में अपनी जगह देखता है और क़ब्र में महशर तक कड़वे अज़ाब झेलता है।

मरने के बाद फिर से ज़िंदा होने पर ईमान रखना लाज़िम है। हड्डियों और गोश्त के गलकर मिट्टी और गैस बन जाने के बाद सब कुछ फिर से इकट्ठा होगा, रूहें अपने बदनों में दाख़िल होंगी और हर कोई क़ब्र से उठ खड़ा होगा। इसीलिए इस वक़्त को क़यामत का दिन कहा जाता है। तमाम जानदार महशर के मैदान में जमा होंगे।

हर इंसान के आमालनामे उड़कर उसके पास आएँगे। यह सब ज़मीनों, आसमानों, ज़र्रों और सितारों को पैदा करने वाला, बेहद क़ुदरत का मालिक अल्लाह तआला करेगा। इन बातों के होने की ख़बर अल्लाह तआला के रसूल, हमारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दी है। आपकी कही हुई बातें यक़ीनन सच हैं। यक़ीनन यह सब होकर रहेगा।

नेकों और भले लोगों का आमालनामा उनके दाईं तरफ़ से, और फ़ासिक़ों और बुरे लोगों का पीछे से या बाईं तरफ़ से दिया जाएगा। अच्छा और बुरा, बड़ा और छोटा, छुपकर और खुलेआम किया गया हर काम आमालनामे में मौजूद होगा। जिन कामों को किरामन कातिबीन फ़रिश्ते भी नहीं जानते, वे भी अंगों की गवाही से और अल्लाह तआला के बताने से सामने लाए जाएँगे, हर चीज़ के बारे में सवाल और हिसाब होगा। महशर में हर वह छुपी चीज़ ज़ाहिर हो जाएगी जिसे अल्लाह तआला चाहेगा। फ़रिश्तों से पूछा जाएगा: “ज़मीनों और आसमानों में तुमने क्या-क्या किया?”, नबियों से: “अल्लाह तआला के हुक्म बंदों तक तुमने किस तरह पहुँचाए?” और हर एक से: “तुमने नबियों की पैरवी कैसे की? तुम्हें जो फ़र्ज़ बताए गए थे, उन्हें तुमने कैसे अदा किया? आपस के हुक़ूक़ का तुमने कैसे ख़याल रखा?” महशर में जिनके पास ईमान होगा और जिनके अमल और अख़लाक़ अच्छे होंगे, उनके लिए इनाम और एहसान होंगे, और बुरी आदतों और बिगड़े अमल वालों को सख़्त सज़ाएँ दी जाएँगी।

“मुझ पर भेजा जाने वाला दुरूद पुल सिरात पर तुम्हारे लिए नूर बनेगा” हदीस शरीफ़

अल्लाह तआला अपने अद्ल से कुछ छोटे गुनाहों पर भी अज़ाब देगा, और जिन मोमिनों को चाहेगा, उनके तमाम बड़े और छोटे गुनाह अपने फ़ज़्ल और एहसान से माफ़ कर देगा। शिर्क और कुफ़्र के सिवा हर गुनाह को अगर चाहेगा तो माफ़ कर देगा, और अगर चाहेगा तो छोटे गुनाह पर भी अज़ाब देगा। वह बताता है कि मुशरिक और काफ़िर होकर मरने वाले को हरगिज़ माफ़ नहीं करेगा। किताब वाले और बिना किताब वाले काफ़िर, यानी वे लोग जो इस बात पर ईमान नहीं लाते कि मुहम्मद अलैहिस्सलाम तमाम इंसानों के लिए नबी हैं, और आपके बताए हुए अहकाम में से, यानी हुक्मों और मनाहियों में से एक को भी पसंद नहीं करते, अगर इसी हालत में मर जाएँ, तो यक़ीनन जहन्नम में डाले जाएँगे और हमेशा का अज़ाब झेलेंगे।

क़यामत के दिन आमाल और कामों को तौलने के लिए एक ऐसा मीज़ान है जिसे हम नहीं जानते – एक तौलने का आला, एक तराज़ू। ज़मीन और आसमान उसके एक पलड़े में समा जाते हैं। सवाब का पलड़ा रौशन है और अर्श की दाईं तरफ़, जन्नत की तरफ़ है। गुनाह का पलड़ा अर्श की बाईं तरफ़, जहन्नम की तरफ़ अँधेरे में है। दुनिया में किए गए काम, बातें, ख़यालात और नज़रें वहाँ एक शक्ल इख़्तियार करके, नेकियाँ रौशन और बुराइयाँ अँधेरी और घिनौनी दिखाई देंगी और इसी तराज़ू में तौली जाएँगी। यह तराज़ू दुनिया के तराज़ुओं जैसा नहीं। कहा गया है कि इसका भारी पलड़ा ऊपर उठता है और हल्का पलड़ा नीचे जाता है। आलिमों के एक गिरोह के मुताबिक़ कई तरह के तराज़ू होंगे।

पुल सिरात हक़ है। पुल सिरात अल्लाह तआला के हुक्म से जहन्नम के ऊपर क़ायम किया जाएगा। हर एक को इस पुल से गुज़रने का हुक्म दिया जाएगा। उस दिन तमाम नबी “या रब! सलामती दे!” कहकर गिड़गिड़ाएँगे। जन्नती लोग पुल से आसानी से गुज़रकर जन्नत में जाएँगे। उनमें से कुछ बिजली की तरह, कुछ हवा की तरह और कुछ दौड़ते घोड़े की तरह गुज़रेंगे। पुल सिरात बाल से ज़्यादा बारीक और तलवार से ज़्यादा तेज़ है। दुनिया में इस्लाम की पैरवी करना भी ऐसा ही है: इस्लाम की पूरी पैरवी की कोशिश करना पुल सिरात से गुज़रने की तरह है। जो यहाँ नफ़्स से जिहाद की मुश्किल को बर्दाश्त करते हैं, वे वहाँ सिरात से आसानी और आराम से गुज़रेंगे। इसीलिए अल्लाह तआला ने इस्लाम के दिखाए हुए सीधे रास्ते का नाम “सिरात-ए-मुस्तक़ीम” रखा। नाम की यह मुशाबहत भी यह दिखाती है कि इस्लाम के रास्ते पर रहना पुल सिरात से गुज़रने की तरह है। जहन्नमी लोग सिरात से जहन्नम में गिर जाएँगे। पुल सिरात पर ईमान लाना फ़र्ज़ है, क्योंकि पुल सिरात नस्स (साफ़ दलील) से साबित है। क़ुरआन-ए-करीम में मफ़हूमन फ़रमाया गया है: “उन्हें जहन्नम के सिरात की तरफ़ ले जाकर रोक लो! क्योंकि उनसे पूछा जाना है। (उन्हें हिसाब की जगह पर ठहराओ! उनका हिसाब होगा; उनसे उनके अक़ीदों और उनके कामों के बारे में पूछा जाएगा।)” (सूरह साफ़्फ़ात, 37:23–24)।

“नुख़बतुल लआली” किताब में लिखा है: सिरात जहन्नम के ऊपर एक पुल है। आयत-ए-करीमा में मफ़हूमन फ़रमाया गया है: “तुममें से कोई ऐसा नहीं जो वहाँ से न गुज़रे” (सूरह मरयम, 19:71)। अहले सुन्नत के आलिमों ने “तुम वहाँ से गुज़रोगे” वाली आयत-ए-करीमा की तफ़सीर सिरात के ऊपर से गुज़रने से की है। [Birgivî Vasiyetnâmesi] हदीसों में फ़रमाया गया:

“जहन्नम के ऊपर पुल सिरात क़ायम किया जाएगा। उस पर से अपनी उम्मत के साथ सबसे पहले गुज़रने वाला नबी मैं हूँ।” [बुख़ारी] “जो मेरे अहले बैत और मेरे सहाबा से बहुत मुहब्बत करे, पुल सिरात से गुज़रते वक़्त उसका पाँव नहीं फिसलेगा।” [दैलमी]

“क़यामत में मैं पुल सिरात के सिरे पर खड़ा होकर अपनी उम्मत के गुज़रने का इंतिज़ार करूँगा। अल्लाह तआला फ़रमाएगा: ‘जो चाहो माँगो, जिनकी चाहो शफ़ाअत करो, तुम्हारी शफ़ाअत क़बूल की जाएगी।’ अपनी उम्मत की शफ़ाअत के बाद भी मैं गिड़गिड़ाना जारी रखूँगा। जब तक मेरा रब मुझसे यह न फ़रमाए कि ‘अपनी उम्मत में से हर उस शख़्स को जन्नत में दाख़िल कर दो जिसने इख़लास के साथ एक बार ला इलाह इल्लल्लाह कहा और ईमान के साथ मरा’, मैं अपनी जगह से नहीं हटूँगा।” [इमाम अहमद]

“पुल सिरात से गुज़रना हर एक के नूर पर मौक़ूफ़ है। कोई पलक झपकते, कोई बिजली की तरह, कोई टूटते तारे की तरह, कोई दौड़ते घोड़े की तरह सिरात से गुज़र जाता है। जिसका नूर बहुत कम हो, वह मुँह के बल घिसटता है। उसके हाथ और पाँव फिसलते हैं, फिर जम जाते हैं। आख़िरकार घिसटते-घिसटते नजात पा जाता है।” [तबरानी] “कोई भी बिदअती सिरात से नहीं गुज़र सकेगा, वह जहन्नम में गिर जाएगा।” [इब्ने असाकिर]

“कितने ही लोग यह न जानते हुए कि वे सिरात से गुज़र चुके हैं, फ़रिश्तों से कहेंगे: ‘सिरात और जहन्नम कहाँ रह गए, क्या हम उनसे गुज़र गए?’ फ़रिश्ते जवाब देंगे: ‘तुम जहन्नम के ऊपर वाले सिरात से गुज़र चुके; लेकिन जहन्नम की आग तुम्हारे नूर के सामने से हटकर छुप गई थी।’” [जामिउस सग़ीर]

“सिरात बाल से ज़्यादा बारीक और तलवार से ज़्यादा तेज़ है। फ़रिश्ते मोमिनों को बचाने की कोशिश करते हैं। जिबराईल (अलैहिस्सलाम) मुझे कमर से थामे रहते हैं। और मैं दुआ करता हूँ: ‘या रब! मेरी उम्मत को सलामती दे, उन्हें बचा ले!’ उस दिन पाँव फिसलकर गिरने वाले बहुत होंगे।” [बैहक़ी]

नबी-ए-करीम की उम्मत में से कुछ लोग क़ब्र से उठते ही सीधे जन्नत में चले जाते हैं। फ़रिश्ते उनसे कहते हैं: – क्या तुम्हारा हिसाब हुआ? – नहीं, हमारा कोई हिसाब-विसाब नहीं हुआ। – क्या तुम पुल सिरात से गुज़रे? – नहीं, हमने कोई सिरात-विरात नहीं देखा। – क्या तुमने जहन्नम देखा? – नहीं, हमने जहन्नम भी नहीं देखा। – तुमने ऐसे कौन-से अमल किए कि इस तरह बिना हिसाब दिए, बिना सिरात पर ठहरे सीधे जन्नत में आ गए? – हममें दो ख़ूबियाँ थीं। उन्हीं की बदौलत हम इस नेमत तक पहुँचे। हम अल्लाह से शर्म करते थे और अकेले में भी गुनाह नहीं करते थे। दूसरी यह कि हम अल्लाह के दिए हुए थोड़े रिज़्क़ पर भी राज़ी रहते थे।

“जन्नत में ऐसी नेमतें हैं जिन्हें न किसी ने देखा, न किसी ने सुना और न कोई उनका तसव्वुर कर सका” हदीस शरीफ़

फ़रिश्ते कहते हैं: “ये नेमतें तुम्हारा हक़ हैं।” [इब्ने हिब्बान] “पुल सिरात” सुनकर उसे हमारे जाने-पहचाने पुलों जैसा नहीं समझना चाहिए! जैसे हम कहते हैं: “एक क्लास से दूसरी क्लास में जाने के लिए इम्तिहान के पुल से गुज़रना पड़ता है।” हालाँकि इम्तिहान में पुल जैसी कोई बात नहीं। पुल सिरात भी न जाने-पहचाने पुलों जैसा है, न इम्तिहान के पुल जैसा।4

नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के लिए ख़ास हौज़-ए-कौसर है। इसकी वुसअत एक महीने के सफ़र जितनी है। इसका पानी दूध से ज़्यादा सफ़ेद और इसकी ख़ुशबू मुश्क से ज़्यादा अच्छी है। इसके चारों तरफ़ के प्याले सितारों से भी ज़्यादा हैं। जो इसमें से एक बार पी ले, वह जहन्नम में भी हो तो फिर कभी प्यासा नहीं होगा। शफ़ाअत हक़ है। तौबा किए बिना मरने वाले मोमिनों के छोटे और बड़े गुनाहों की माफ़ी के लिए नबी, औलिया, नेक लोग, फ़रिश्ते और वे लोग जिन्हें अल्लाह तआला इजाज़त देगा, शफ़ाअत करेंगे और वह क़बूल की जाएगी।

जन्नत और जहन्नम इस वक़्त भी मौजूद हैं। जन्नत सात आसमानों के ऊपर है। जहन्नम हर चीज़ के नीचे है। आठ जन्नतें और सात जहन्नम हैं। जन्नत ज़मीन के गोले से, सूरज से और आसमानों से भी बड़ी है। जहन्नम भी सूरज से बड़ा है। “दुनिया मोमिन के लिए क़ैदख़ाने की तरह है।” [मुस्लिम] “दुनिया माँ के पेट के मुक़ाबले में जन्नत है, और जन्नत के मुक़ाबले में कूड़ाघर की तरह है।” [Ma’rifetnâme] भला कूड़ाघर का जन्नत से क्या मुक़ाबला? जिस तरह माँ के पेट में बच्चे के लिए यह जानना मुमकिन नहीं कि वह दुनिया में आकर तरह-तरह के वाक़िआत से दो-चार होगा, उसी तरह जन्नत में जाने वाले मोमिन के लिए भी यह जानना मुमकिन नहीं कि वहाँ उसे कौन-सी नेमतें मिलेंगी।

हदीसों में फ़रमाया गया: “जन्नत में ऐसी नेमतें हैं जिन्हें न किसी ने देखा, न किसी ने सुना और न कोई उनका तसव्वुर कर सका।” [मुस्लिम] “जन्नत की नेमतों और दुनिया की नेमतों में सिर्फ़ नाम की मुशाबहत है।” [बैहक़ी]

जो अल्लाह तआला की बेहद क़ुदरत पर ईमान रखता है, उसे उसकी बताई हुई हर बात पर ईमान लाना ज़रूरी है। अल्लाह पाक बताता है कि जन्नत में कोई तकलीफ़ नहीं होगी और जन्नत वालों को उनकी चाही हुई हर नेमत दी जाएगी।

जन्नत की नेमतों के सामने दुनिया की नेमतें उनका साया या उनकी तस्वीर भी नहीं। जिस तरह पेड़ की तस्वीर और ख़ुद पेड़ एक चीज़ नहीं, उसी तरह जन्नत की नेमतों के सामने दुनिया की नेमतें हैं। जिस तरह अल्लाह तआला ने दुनिया के लिए ख़ास नेमतें अदम से पैदा कीं, उसी तरह आख़िरत में भी वे नेमतें अदम से पैदा करेगा जो दिल और ख़याल में भी नहीं आतीं। अल्लाह तआला के लिए कोई मुश्किल नहीं। जन्नत में न ग़म है, न तकलीफ़। कुछ आयत-ए-करीमाओं का मफ़हूम: “नेकी करने वालों के लिए सबसे अच्छा बदला है और उससे भी ज़्यादा (अल्लाह तआला के जमाल का दीदार) है। उनके चेहरों पर न कोई कालिख (दाग़) छाएगी, न ज़िल्लत। यही जन्नत वाले हैं। वे उसमें हमेशा रहेंगे” (सूरह यूनुस, 10:26)। “जो ईमान लाए और नेक अमल किए, उनके लिए फ़िरदौस की जन्नत ठहरने की जगह होगी। वे उसमें हमेशा रहेंगे और वहाँ से निकलना कभी नहीं चाहेंगे” (सूरह कह्फ़, 18:107–108)। “जन्नत में जिधर भी देखोगे, बेशुमार नेमत और बड़ी बादशाहत (सल्तनत, बड़े एहसान) देखोगे” (सूरह इंसान, 76:20)।

हदीसों में यह भी फ़रमाया गया: “अल्लाह तआला ने फ़रमाया: ‘मैंने नेक बंदों के लिए वे चीज़ें तैयार की हैं जिन्हें न आँखों ने देखा, न कानों ने सुना और न किसी इंसान के दिल में उनका ख़याल आया।’” [बुख़ारी] “जो जन्नत में दाख़िल हो गया, वह नहीं मरेगा, हमेशा ज़िंदा रहेगा। वह हमेशा ख़ुश रहेगा, ग़मगीन नहीं होगा, मायूस नहीं होगा, उसके कपड़े पुराने नहीं होंगे और उसकी जवानी नहीं ढलेगी।” [इब्ने अबिद दुनिया] “जन्नत वाले न कभी बीमार होंगे, न बूढ़े; न कभी ग़मगीन होंगे, बल्कि हमेशा ख़ुश रहेंगे।” [मुस्लिम] “जन्नत में दाख़िल होने वाला अगर कहे: ‘घोड़े पर सवार हो जाऊँ’, तो सवार हो जाएगा; अगर कहे: ‘उड़ूँ’, तो उड़ने लगेगा।” [तिरमिज़ी] “जन्नत के सबसे निचले दर्जे वाले शख़्स से कहा जाएगा: ‘जो चाहो माँगो।’ वह भी जो कुछ उसके दिल में आएगा, सब माँगेगा। उससे कहा जाएगा: ‘तुमने जो कुछ चाहा, उसका दुगना तुम्हें दिया जाएगा।’” [मुस्लिम] “हर कोई 33 साल की उम्र का होगा।” [तिरमिज़ी, क़ुर्तुबी, नववी]

6. तक़दीर पर ईमान लाना

व बिल क़द्रि ख़ैरिही व शर्रिही मिनल्लाहि तआला: यानी: “मैं तक़दीर पर, और इस पर ईमान लाया कि ख़ैर और शर अल्लाह तआला की तरफ़ से हैं।” इंसानों को पहुँचने वाली भलाई और बुराई, फ़ायदा और नुक़सान, नफ़ा और घाटा – सब अल्लाह तआला के मुक़द्दर करने से होता है।

अल्लाह तआला का किसी चीज़ के वुजूद को चाहना “क़द्र” कहलाता है। क़द्र को, यानी जिस चीज़ का वुजूद मुक़द्दर किया गया है, उसे वुजूद में लाने को “क़ज़ा” कहा जाता है। क़द्र और क़ज़ा के अल्फ़ाज़ एक-दूसरे की जगह भी इस्तेमाल होते हैं। अज़ल से अबद तक होने वाली चीज़ों को – चीज़ों को, उनकी ख़ासियतों को, हरकतों को, वाक़िआत को – वह उसी के मुताबिक़ पैदा करता है जैसा उसने अज़ल में जान लिया था। इंसानों के तमाम अच्छे और बुरे कामों को, उनके मुसलमान होने को, उनके कुफ़्र को, उनके चाहकर और बिना चाहे किए गए तमाम कामों को अल्लाह तआला पैदा करता है। पैदा करने वाला, करने वाला सिर्फ़ वही है। असबाब से वुजूद में आने वाली हर चीज़ को पैदा करने वाला वही है। वह हर चीज़ को किसी सबब के ज़रिए पैदा करता है। नबी इल्म और साइंस के सबसे ऊँचे दर्जे पर पहुँचे हुए थे और हक़ीक़तों को पूरी तरह देखते थे; इस्लामी आलिमों ने उन बुज़ुर्गों के नक़्श-ए-क़दम पर चलकर इल्म के समुंदरों से क़तरे पाए। ये सब बताते हैं कि आज जिन चीज़ों को जलाने वाला और बनाने वाला समझा जाता है, वे आजिज़, बेचारे वसीले और मख़लूक़ हैं, यानी वे असबाब हैं जिन्हें असल बनाने वाले, पैदा करने वाले ने बीच में रखा है। जलाने वाला अल्लाह तआला है।

वह आग के बिना भी जलाता है। लेकिन आग से जलाना उसकी आदत है। अगर जलाना न चाहे, तो आग के अंदर भी नहीं जलाता। उसने इब्राहीम अलैहिस्सलाम को आग में नहीं जलाया: उनसे बहुत मुहब्बत की वजह से अपनी आदत तोड़ दी। अगर अल्लाह तआला चाहता, तो हर चीज़ को बिना सबब के पैदा करता: आग के बिना जलाता, खिलाए बिना पेट भर देता। लेकिन उसने मेहरबानी फ़रमाकर, अपने बंदों पर एहसान करके हर चीज़ के पैदा करने को किसी सबब से जोड़ दिया। उसने चाहा कि मुक़र्रर चीज़ों को मुक़र्रर असबाब से पैदा करे। उसने अपने कामों को असबाब के पर्दे में छुपा दिया। उसने अपनी क़ुदरत को असबाब के नीचे छुपा रखा। जो चाहता है कि अल्लाह कोई चीज़ पैदा करे, वह उस चीज़ के सबब को थामता है और उस चीज़ तक पहुँच जाता है। जो चिराग़ जलाना चाहता है, वह माचिस इस्तेमाल करता है। जो ज़ैतून का तेल निकालना चाहता है, वह कोल्हू इस्तेमाल करता है। जिसके सिर में दर्द हो, वह एस्पिरिन इस्तेमाल करता है। जो जन्नत में जाकर हमेशा की नेमतें पाना चाहता है, वह इस्लाम की पैरवी करता है। जो अपने ऊपर पिस्तौल चलाए या ज़हर पी ले, वह मर जाता है। जो पसीने की हालत में पानी पिए, वह बीमार हो जाता है। जो गुनाह करे, कुफ़्र में पड़ जाए, वह भी जहन्नम में जाता है। हर कोई जिस सबब का सहारा ले, उस चीज़ तक पहुँच जाता है जिसके लिए वह सबब वसीला बनाया गया है। जो मुसलमानों की किताबें पढ़ता है, वह इस्लाम को सीखता है, उससे मुहब्बत करता है और मुसलमान बन जाता है। जो बेदीनों के बीच रहता है और उनकी बातें सुनता है, वह दीन से जाहिल बन जाता है। दीन से जाहिल लोगों में से ज़्यादातर ईमान से ख़ाली होते हैं। इंसान जिस जगह जाने वाली सवारी पर बैठता है, वहीं पहुँच जाता है। अगर अल्लाह तआला अपने कामों को असबाब के ज़रिए पैदा न करता, तो कोई किसी का मोहताज न होता। हर कोई हर चीज़ अल्लाह तआला से माँगता और किसी चीज़ का सहारा न लेता। ऐसा होता, तो इंसानों के बीच अफ़सर और मुलाज़िम, मज़दूर और कारीगर, शागिर्द और उस्ताद जैसे और बहुत-से इंसानी रिश्ते न रहते, दुनिया और आख़िरत का निज़ाम बिगड़ जाता। ख़ूबसूरत और बदसूरत में, अच्छे और बुरे में, फ़रमाँबरदार और नाफ़रमान में कोई फ़र्क़ न रहता।

“नफ़्स को भलाई और बुराई देने वाले अल्लाह तआला की क़सम! जिसने अपने नफ़्स को कुफ़्र और नाफ़रमानी से पाक किया, वह कामयाब हुआ। और जिसने उसे इन्हीं में छोड़ दिया, वह घाटे में रहा” शम्स: 7–10

देखें, मौला क्या करता है

हक़ बुराइयों को भलाई बना देता है,
उसके सारे काम आला हैं,
यह न समझ कि वह कुछ और करता है,
सब एक-दूसरे के लायक़ हैं,
आरिफ़ इसका नज़ारा करता है,
जो भी करे, मुनासिब है,
देखें, मौला क्या करता है,
देखें, मौला क्या करता है,
जो भी करे, ख़ूब करता है।
जो भी करे, ख़ूब करता है।
तू हक़ पर तवक्कुल कर,
दिल से ग़म को दूर कर,
सब उसे सौंप दे और राहत पा,
अपने रब के साथ सुकून पा,
सब्र कर और राज़ी रह,
सारे काम उसके सुपुर्द कर,
देखें, मौला क्या करता है,
देखें, मौला क्या करता है,
जो भी करे, ख़ूब करता है।
जो भी करे, ख़ूब करता है।
अपना दिल उससे बाँध ले,
उसके अद्ल को ज़ुल्म न समझ,
अपनी तदबीरें छोड़ दे,
सिर झुका दे, आग में न जल,
उसकी तक़दीर को समझ ले,
सब्र कर, ख़बरदार, उकता न जा,
देखें, मौला क्या करता है,
देखें, मौला क्या करता है,
जो भी करे, ख़ूब करता है।
जो भी करे, ख़ूब करता है।
ख़ल्लाक़ और रहीम वही है,
“यह ऐसा क्यों है?” मत कह,
रज़्ज़ाक़ और करीम वही है,
कुछ अरसा इसे ऐसा ही होना है,
फ़अआल और हकीम वही है,
अंजाम को देख, सब्र कर,
देखें, मौला क्या करता है,
देखें, मौला क्या करता है,
जो भी करे, ख़ूब करता है।
जो भी करे, ख़ूब करता है।
हाजतें पूरी करने वाले को पहचान,
किसी को हक़ारत से न देख,
उसी से मुनाजात कर,
किसी को न सता, दिल न तोड़,
अपनी मुरादें छोड़ दे,
अपने नफ़्स की तरफ़दारी न कर,
देखें, मौला क्या करता है,
देखें, मौला क्या करता है,
जो भी करे, ख़ूब करता है।
जो भी करे, ख़ूब करता है।
किसी काम के पीछे न पड़,
जहाँ बेबसी छा जाए, वहाँ
जो हो गया, उस पर ज़िद न कर,
वह अचानक पर्दा उठा देता है,
वह हक़ की तरफ़ से है, उसे न ठुकरा,
वह उस दर्द की दवा कर देता है,
देखें, मौला क्या करता है,
देखें, मौला क्या करता है,
जो भी करे, ख़ूब करता है।
जो भी करे, ख़ूब करता है।
सारे काम हक़ की तरफ़ से हैं,
हर दम उसका ज़िक्र कर,
ग़म और परेशानियाँ बेकार हैं,
अपनी चालाकी एक तरफ़ रख दे,
वह अपनी हिकमत से काम करता है,
हक़ पर हैरान हो और कह:
“देखें, मौला क्या करता है,
देखें, मौला क्या करता है,
जो भी करे, ख़ूब करता है।
जो भी करे, ख़ूब करता है।”
İbrâhim Hakkı Erzurûmî

अल्लाह तआला ने अपने बंदों को इरादा दिया है और उनके इस इरादे को, उनके चाहने को कामों के पैदा किए जाने का सबब बनाया है। जब कोई बंदा कोई काम करना चाहता है, तो अगर अल्लाह तआला भी चाहे, तो उस काम को पैदा कर देता है। अगर बंदा न चाहे, तो अल्लाह तआला भी नहीं चाहता और उस चीज़ को पैदा नहीं करता।

बंदों की इख़्तियारी हरकतें दो चीज़ों से वुजूद में आती हैं। पहली – बंदे के इरादे और ताक़त से। इसीलिए बंदे की हरकतों को, यानी नीयत किए हुए कामों को अंगों के ज़रिए करने को “कस्ब करना” कहा जाता है; कस्ब इंसान की सिफ़त है। दूसरी – अल्लाह तआला के पैदा करने और वुजूद बख़्शने से। अल्लाह तआला के हुक्म, उसकी मनाहियाँ, उसका सवाब देना और अज़ाब देना इसीलिए हैं कि इंसान में कस्ब मौजूद है। अल्लाह तआला गुज़री हुई और आने वाली हर चीज़ को अपने अज़ली इल्म से जानता है। मसलन वह जानता है कि कोई काफ़िर हमेशा काफ़िर रहेगा या नहीं। वह जानता है कि होने वाली चीज़ें किस तरह होंगी। तमाम जानवरों, पौधों, बेजान चीज़ों, ठोस चीज़ों, तरल चीज़ों, गैसों, सितारों, मॉलीक्यूलों, एटमों, इलेक्ट्रॉनों, इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक लहरों की, मुख़्तसर यह कि हर मौजूद चीज़ की हरकत, फ़िज़िक्स के वाक़िआत, केमिस्ट्री के रिएक्शन, न्यूक्लियर रिएक्शन, एनर्जी का लेन-देन, जानदारों में होने वाली फ़िज़ियोलॉजिकल सरगर्मियाँ, हर चीज़ का होना या न होना, बंदों के अच्छे और बुरे काम, दुनिया और आख़िरत में उनका बदला पाना और हर चीज़ अज़ल में अल्लाह तआला के इल्म में मौजूद थी। वह इन सबको अज़ल में जानता था। कैलेंडरों में हिसाब लगाकर लिखा जाता है कि साल भर में सूरज कब निकलेगा और कब डूबेगा। सूरज कैलेंडर में बताए गए वक़्तों पर निकलता और डूबता है। लेकिन सूरज इस वजह से मुक़र्रर वक़्तों पर नहीं निकलता-डूबता कि कैलेंडर में ऐसा लिखा गया है। कैलेंडर में लिखा जाना सूरज के निकलने और डूबने पर कोई असर नहीं डालता। इसी तरह अल्लाह तआला ने भी, चूँकि वह जानता है कि इंसानों के साथ क्या होगा, इन बातों को लौह-ए-महफ़ूज़ में लिख दिया है। अल्लाह तआला का यह बताना कि कुछ लोग बदनसीब होंगे, इस वजह से है कि वे अपनी मर्ज़ी से कुफ़्र पर क़ायम रहना चाहते हैं और ईमान लाना नहीं चाहते। उनका काफ़िर होना इस वजह से नहीं कि अल्लाह तआला ने इसकी ख़बर दी है। क़ुरआन-ए-करीम में वह फ़रमाता है: “अल्लाह पाक ने इंसान को ख़ैर और शर (या इताअत और गुनाह) और इन दोनों की हालतें सिखाकर, इनमें से किसी एक को कर सकने के लिए उसे इख़्तियार (चुनने का हक़, इरादा-ए-जुज़्इय्या) दिया। जिसने अपने नफ़्स को पाक किया (बुराइयों से साफ़ करके फ़ज़ीलतों से भर दिया), वह कामयाब हुआ। और जिसने अपने नफ़्स को गुनाह, जहालत और गुमराही में छोड़ दिया, वह घाटे में रहा” (सूरह शम्स, 91:7–10)। इंसान अपना इरादा-ए-जुज़्इय्या (जुज़्वी इख़्तियार) इस्तेमाल करने में आज़ाद है; वह मजबूर नहीं। यानी अगर इरादा-ए-जुज़्इय्या भलाई में इस्तेमाल किया जाए, तो अल्लाह तआला भलाई पैदा करता है, और अगर बुराई में इस्तेमाल किया जाए, तो बुराई पैदा करता है। बंदा अपना इरादा-ए-जुज़्इय्या इस्तेमाल करता है और अल्लाह तआला पैदा करता है। [İrade-i cüziyye risalesi] मालूम हुआ कि जो भलाई चाहता है, उसे वह भलाई देता है और वह ख़ुशनसीब होता है। जो बुराई चाहता है, उसे वह बुराई देता है और वह बदनसीब रह जाता है। इसमें कोई ज़बरदस्ती नहीं। यानी अल्लाह तआला ज़बरदस्ती गुनाह नहीं करवाता, ज़बरदस्ती जहन्नम में नहीं डालता। नतीजे में कोई बात अद्ल के ख़िलाफ़ नहीं होती। अल्लाह तआला ने बता दिया है कि जो बंदे उसके हुक्मों पर अमल करें और उसकी मनाहियों से बचें, उन्हें इनाम, और जो इसका उलटा करें, उन्हें सज़ा देगा।