मेरे प्यारे नबी

नबी-ए-करीम का इंतिक़ाल

हिजरत का ग्यारहवाँ साल था। पिछले रमज़ान में जिबराईल अलैहिस्सलाम आए तो उन्होंने हमारे प्यारे नबी के सामने क़ुरआन-ए-करीम शुरू से आख़िर तक दो बार पढ़ा, जबकि इससे पहले के सालों में वह क़ुरआन-ए-करीम एक बार पढ़ते थे। सरवर-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने जब वह सूरह नस्र सुनी, जो जिबराईल अलैहिस्सलाम ने सबसे आख़िर में पहुँचाई थी और जिसका मफ़हूम है: “जब अल्लाह तआला की मदद और फ़तह का दिन आ जाए और तुम लोगों को अल्लाह तआला के दीन में (इस्लाम में) फ़ौज-दर-फ़ौज दाख़िल होते देखो, तो अपने रब की हम्द के साथ तस्बीह करो! उससे माफ़ी माँगो! क्योंकि वह हमेशा तौबा क़बूल करने वाला है”1, तो आपने फ़रमाया: “ऐ जिबराईल! मैं अपने अंदर महसूस कर रहा हूँ कि मेरी मौत क़रीब आ गई है।” इस पर जिबराईल अलैहिस्सलाम ने वे आयात-ए-करीमा पढ़ीं जिनका मफ़हूम है: “आख़िरत तुम्हारे लिए दुनिया से बेहतर है। तुम्हारा रब तुम्हें हर वह चीज़ देगा जो तुम चाहोगे, यहाँ तक कि तुम कह दो: ‘मैं राज़ी हो गया।’”2

हिजरत के ग्यारहवें साल, सफ़र महीने की सत्ताईसवीं तारीख़ को रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के मुबारक सिर में दर्द शुरू हुआ। आप अपनी मोहतरम बीवी हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) के हुजरे में तशरीफ़ ले गए। अब्दुर रहमान इब्ने अबी बक्र को बुलाकर बताया कि आप अपने बाद अबू बकर सिद्दीक़ के ख़लीफ़ा चुने जाने के लिए वसीयत लिखवाएँगे, और दवात और क़लम लाने का हुक्म दिया। हज़रत अबू बकर के बेटे अब्दुर रहमान हुक्म की तामील के लिए जा रहे थे कि आपने फ़रमाया: “बाद में ले आना, अभी रहने दो!” और मस्जिद शरीफ़ में तशरीफ़ ले गए। हमारे प्यारे नबी ने उस दिन मदीना में मौजूद तमाम सहाबा-ए-किराम को ख़बर भेजी कि ज़ुहर की नमाज़ के लिए मस्जिद में जमा हों। नमाज़ पढ़ाने के बाद सरवर-ए-आलम ने मिम्बर पर चढ़कर ख़ुत्बा दिया। अपने सहाबा को नसीहत की और उनसे अपने हक़ माफ़ कर देने की दरख़्वास्त की। फिर सहाबा के बीच अबू बकर सिद्दीक़ की फ़ज़ीलत और क़द्र बताई और यह भी बताया कि आप उनसे बहुत ख़ुश हैं। इस ख़ुत्बे को सुनकर तमाम दिल काँप उठे, आँखों से आँसू उमड़ पड़े। फिर आपने फ़रमाया: “ऐ लोगो! तुमने मुझे अपना नबी कैसा पाया?” तो सहाबा-ए-किराम ने कहा: “या रसूलल्लाह! अल्लाह तआला हमारी तरफ़ से आपको ढेरों भलाइयाँ अता फ़रमाए। आप हमारे लिए एक बहुत मेहरबान बाप की तरह, नसीहत करने वाले शफ़ीक़ भाई की तरह थे। अल्लाह तआला ने आपको जो नुबुव्वत की ज़िम्मेदारी अता फ़रमाई थी, आपने उसे पूरा किया। आप पर जो वह्य की गई, वह हम तक पहुँचाई। अपने रब की राह, इस्लाम की तरफ़ हिकमत से और अच्छी नसीहत से बुलाया। अल्लाह तआला आपको सबसे अच्छा और सबसे बुलंद बदला अता फ़रमाए।”

इसके बाद नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ऐ मोमिनो! अल्लाह के वास्ते, जिसका मुझ पर कोई हक़ हो, वह उठे, आए और क़यामत से पहले यहीं ले ले।”

लेकिन अपना हक़ लेने के लिए कोई उठकर न आया। रसूलुल्लाह ने अल्लाह तआला का नाम लेकर दूसरी और तीसरी बार भी फ़रमाया: “जिसका हक़ हो, वह आए और ले ले।” इस पर सहाबा-ए-किराम में से हज़रत उक्काशा उठे, जो बहुत बूढ़े थे। वह रसूलुल्लाह की ख़िदमत में हाज़िर हुए और कहा: “मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह! तबूक के ग़ज़वे में मैं आपके साथ था। तबूक से रवाना होते वक़्त मेरा ऊँट और आपका ऊँट बराबर आ गए थे। मैं अपने ऊँट से उतरकर आपके क़रीब गया। मेरा मक़सद आपके मुबारक जिस्म को चूमना था; उसी वक़्त आपने मेरी पीठ पर कोड़ा मारा था। मुझे नहीं मालूम कि आपने क्यों मारा।”

“आख़िरत तुम्हारे लिए दुनिया से बेहतर है। तुम्हारा रब तुम्हें हर वह चीज़ देगा जो तुम चाहोगे, यहाँ तक कि तुम कह दो: ‘मैं राज़ी हो गया’” ज़ुहा: 4–5

नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ऐ उक्काशा! अल्लाह तआला तुम्हें इससे महफ़ूज़ रखे कि उसका रसूल तुम्हें जान-बूझकर मारे।” फिर हुक्म दिया: “ऐ बिलाल! मेरी बेटी फ़ातिमा के घर जाओ। वह कोड़ा मेरे पास ले आओ।” हज़रत बिलाल मस्जिद से निकले। सिर पर हाथ रखे हुए वह बड़ी हैरत में कह रहे थे: “रसूलुल्लाह अपने आपसे क़िसास लिवाएँगे!” घर पहुँचकर उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया और कहा: “ऐ रसूलुल्लाह की बेटी! मुझे रसूलुल्लाह का कोड़ा दे दीजिए!” हमारी माँ हज़रत फ़ातिमा ने पूछा: “ऐ बिलाल! अभी न हज का वक़्त है, न ग़ज़वे का! अब्बा कोड़े का क्या करेंगे?” हज़रत बिलाल ने कहा: “ऐ फ़ातिमा! क्या आपको ख़बर नहीं? उससे रसूलुल्लाह से क़िसास लिया जाएगा!”

फ़ातिमा ने हज़रत बिलाल को सख़्त ताकीद की: “ऐ बिलाल! रसूलुल्लाह से क़िसास के ज़रिए अपना हक़ लेने पर किसका दिल राज़ी होगा? जब उन्होंने माँगा है, तो दे देती हूँ। लेकिन हसन और हुसैन से कहना कि जो भी अपना हक़ लेना चाहे, क़िसास उन्हीं से लिया जाए। वह शख़्स अपना हक़ उनसे ले ले। हरगिज़ रसूलुल्लाह से क़िसास न लिया जाए।” हज़रत बिलाल मस्जिद आए और कोड़ा रसूलुल्लाह को दिया, और आपने वह हज़रत उक्काशा को दे दिया। यह देखकर हज़रत अबू बकर और हज़रत उमर ने मिन्नत की: “ऐ उक्काशा! देखो, हम तुम्हारे सामने हाज़िर हैं, अपना हक़ हमसे ले लो। मेहरबानी करके रसूलुल्लाह से न लो!” इस पर नबी-ए-करीम ने हज़रत अबू बकर से फ़रमाया: “ऐ अबू बकर! तुम छोड़ो, बीच से हट जाओ। ऐ उमर! चलो, तुम भी हट जाओ। अल्लाह तआला तुम्हारे बुलंद दर्जे को जानता है।” फिर हज़रत अली उठे और बोले: “ऐ उक्काशा! तुम्हारे रसूलुल्लाह को मारने पर मेरा दिल राज़ी नहीं होता। यह रही मेरी पीठ और मेरा पेट, आओ, अपना हक़ मुझसे ले लो, चाहो तो सौ बार मारो। लेकिन रसूलुल्लाह को हाथ न लगाना!” तो नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ऐ अली! तुम भी बैठ जाओ। अल्लाह तआला तुम्हारे भी बुलंद मर्तबे और हाल को जानता है।” इस बार हज़रत हसन और हुसैन उठे और कहा: “ऐ उक्काशा! तुम भी जानते हो कि हम रसूलुल्लाह के नवासे हैं। इसलिए हमसे क़िसास लेना रसूलुल्लाह से क़िसास लेने के बराबर है। अपना हक़ हमसे ले लो, मेहरबानी करके रसूलुल्लाह को न मारो!” तो नबी-ए-करीम ने उनसे फ़रमाया: “तुम भी बैठ जाओ, ऐ मेरी आँखों की ठंडक!” फिर फ़रमाया: “ऐ उक्काशा! आओ, मारो!”

उक्काशा ने कहा: “या रसूलल्लाह! जब आपने मुझे मारा था, तो मेरा जिस्म खुला था।” इस पर हमारे प्यारे नबी ने अपनी मुबारक पीठ खोल दी। उस वक़्त सहाबा-ए-किराम के बीच से सिसकियाँ सुनाई दीं और उन्होंने कहा: “ऐ उक्काशा! क्या तुम रसूलुल्लाह की मुबारक पीठ पर मारोगे?” हर कोई ग़म में डूबा इंतिज़ार कर रहा था। हज़रत उक्काशा ने जब रसूलुल्लाह की मुबारक पीठ पर नुबुव्वत की मुहर देखी, तो अचानक कहा: “मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह! अपना हक़ लेने के लिए आपकी मुबारक पीठ पर मारने की, आपसे क़िसास लेने की किसमें ताक़त है, किसमें हिम्मत है?” और कायनात के सुल्तान की मुबारक मुहर-ए-नुबुव्वत को चूम लिया। इस पर रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उनसे फ़रमाया: “नहीं, या तो मारो, या माफ़ कर दो।” हज़रत उक्काशा ने कहा: “मेरी जान आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह! मैंने माफ़ कर दिया। क्या अल्लाह तआला भी क़यामत के दिन मुझे माफ़ कर देगा?” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “जो जन्नत में मेरे साथी को देखना चाहे, वह इस बूढ़े को देख ले।” रसूलुल्लाह का यह मुबारक कलाम सुनकर सहाबा-ए-किराम उनकी दोनों आँखों के बीच चूमने लगे। सब कह रहे थे: “मुबारक हो, मुबारक हो! ऐ उक्काशा! रसूलुल्लाह के साथ रहने के सदक़े तुमने जन्नत में बुलंद दर्जे पा लिए।”3

उसामा इब्ने ज़ैद का सिपहसालार मुक़र्रर किया जाना

सफ़र महीने के आख़िरी दिन थे। सारे जहानों के सरदार (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) चाहते थे कि उत्तर की रूमी सल्तनत मुसलमानों के लिए बड़ा ख़तरा बनने से पहले रूम वालों को फिर से इस्लाम की दावत दें, क़बूल न करें तो उनसे जंग करें और उन्हें इस्लामी रियासत के मातहत ले आएँ। इसलिए आपने अपने बहादुर सहाबा को रूम वालों से जंग की तैयारी का हुक्म दिया। सहाबा-ए-किराम तैयारी के लिए बिखर गए। रसूल-ए-अकरम ने हज़रत उसामा इब्ने ज़ैद को बुलाया और फ़रमाया: “ऐ उसामा! अल्लाह तआला के नाम और उसकी बरकत के साथ शाम की तरफ़, बलक़ा की सरहद तक, फ़िलिस्तीन के दारूम तक, उस जगह तक जाओ जहाँ तुम्हारे वालिद शहीद किए गए थे। उन इलाक़ों को घोड़ों से रौंदवा दो। मैंने तुम्हें इस लश्कर का सिपहसालार-ए-आला मुक़र्रर किया है। उबना वालों पर अचानक पहुँचकर बिजली की तरह टूट पड़ो। इतनी तेज़ी से जाओ कि जहाँ पहुँचना है, वहाँ तुमसे पहले ख़बर न पहुँचे। अपने साथ रहनुमा ले लो, जासूसों और निगरानों को अपने आगे रखो। अगर अल्लाह तआला फ़तह अता फ़रमाए, तो उनके बीच थोड़ी ही देर ठहरना।” फिर आपने जुर्फ़ में लश्करगाह क़ायम करने का हुक्म दिया और अपने मुबारक हाथों से झंडा बाँधकर उनके सुपुर्द किया।4

आप मस्जिद में मिम्बर पर चढ़े और फ़रमाया: “ऐ मेरे सहाबा! जिस तरह उसामा के वालिद ज़ैद सिपहसालारी के लायक़ थे और मेरे नज़दीक सबसे प्यारे थे, उसी तरह उनके बाद उनके बेटे उसामा भी सिपहसालारी के लायक़ हैं। उसामा मेरे नज़दीक लोगों में सबसे प्यारों में से हैं।”

हज़रत उसामा की कमान में जंग पर जाने वालों में हज़रत अबू बकर, हज़रत उमर, हज़रत अबू उबैदा इब्ने जर्राह, हज़रत साद इब्ने अबी वक़्क़ास जैसे बड़े सहाबा भी थे।

लेकिन अगले दिन कायनात के सुल्तान अचानक बीमार हो गए, इसलिए लश्कर की रवानगी नबी-ए-करीम के आख़िरत की तरफ़ रेहलत फ़रमाने के बाद तक टल गई। हमारे प्यारे नबी सख़्त बुख़ार (हुम्मा) की बीमारी में मुब्तला हो गए। बुख़ार दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था, बीमारी ज़ोर पकड़ती जा रही थी।

एक रात, जब दर्द कुछ कम हुआ, आधी रात को आप अपने बिस्तर से उठे। कपड़े पहनकर जाने को तैयार हुए। यह देखकर हमारी माँ हज़रत आइशा ने पूछा: “मेरे माँ-बाप, मेरी जान आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह! आप कहाँ जा रहे हैं?” सरवर-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने जवाब दिया: “मुझे हुक्म मिला है कि बक़ी के क़ब्रिस्तान में दफ़न लोगों के लिए इस्तिग़फ़ार करूँ। वहीं जा रहा हूँ।”

आप अबू मुवैहिबा और अबू राफ़े को साथ लेकर वहाँ तशरीफ़ ले गए। क़ब्रिस्तान में देर तक दुआ फ़रमाई, उनकी माफ़ी और मग़फ़िरत के लिए अल्लाह तआला से गिड़गिड़ाकर इल्तिजा की। नबी-ए-करीम की इस इसरार भरी इल्तिजा को देखकर आपके साथ के सहाबा ने कहा: “काश हम भी इस वक़्त यहाँ दफ़न होते और रसूलुल्लाह की इस दुआ को पाने का शरफ़ हासिल करते!” हमारे प्यारे नबी अबू मुवैहिबा की तरफ़ मुड़े और फ़रमाया: “ऐ अबू मुवैहिबा! मुझे दुनिया के ख़ज़ानों और आख़िरत की नेमतों में से चुनने का इख़्तियार दिया गया। मुझसे कहा गया: ’चाहो तो दुनिया में रहो, फिर जन्नत में जाओ; चाहो तो लिक़ाउल्लाह (अल्लाह तआला से मुलाक़ात) हो और जन्नत में दाख़िल हो जाओ।’ मैंने लिक़ाउल्लाह को, फिर जन्नत को चुन लिया।”

“ऐ मोमिनो! अल्लाह के वास्ते, जिसका मुझ पर कोई हक़ हो, वह उठे, आए और क़यामत से पहले यहीं ले ले” हदीस शरीफ़

एक दिन आप उहुद में दफ़न शहीदों के लिए मग़फ़िरत माँगने निकले। उनके लिए अल्लाह तआला से देर तक गिड़गिड़ाकर दुआ फ़रमाई। फिर मस्जिद आकर सहाबा-ए-किराम से फ़रमाया: “मैं हौज़-ए-कौसर पर तुममें सबसे पहले पहुँचने वाला, तुम्हारा इस्तिक़बाल करने वाला होऊँगा। हमारी मुलाक़ात की जगह वहीं है… मुझे तुम्हारे बारे में यह डर नहीं कि मेरे बाद तुम शिर्क की तरफ़ लौट जाओगे। लेकिन मुझे डर है कि तुम दुनिया में फँस जाओगे, उसकी ख़ातिर एक-दूसरे से हसद करोगे, एक-दूसरे को क़त्ल करोगे और आख़िरकार जिस तरह तुमसे पहले वाले मिट गए, तुम भी मिट जाओगे…” फिर आप अपने सआदतख़ाने में तशरीफ़ ले गए। बीमारी बढ़ गई। आपकी मुबारक बीवियों ने हमारे प्यारे नबी से अर्ज़ किया कि वे चाहती हैं कि आप हज़रत आइशा के घर में रहें, और उन्होंने अपना हक़ उन्हें दे दिया। आप अपनी पाक बीवियों की इस क़ुरबानी से ख़ुश हुए, उन सबके लिए दुआ फ़रमाई और बाक़ी दिन हज़रत आइशा के घर में गुज़ारने लगे। रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का बुख़ार बहुत बढ़ गया। बुख़ार की शिद्दत से आपको बिस्तर पर एक करवट से दूसरी करवट बदलनी पड़ती थी। इस हालत में सहाबा-ए-किराम आपकी इयादत को आते और नबी-ए-करीम की सख़्त तकलीफ़ पर बहुत ग़मगीन होते थे। अबू सईद ख़ुदरी ने बयान किया: “मैं रसूलुल्लाह की मुबारक ख़िदमत में हाज़िर हुआ था। आप पर मख़मल की एक चादर थी। बुख़ार की गर्मी चादर के बाहर तक आ रही थी, हरारत की वजह से हम चादर को हाथ नहीं लगा पा रहे थे। हमारी हैरानी और ग़म देखकर रसूलुल्लाह ने फ़रमाया:

‘सबसे सख़्त बला नबियों पर आती है। इसके बावजूद नबी का बलाओं पर ख़ुश होना तुम्हारे उन नेमतों पर ख़ुश होने से कहीं ज़्यादा है जो तुम्हें दी जाती हैं।’”

उम्मे बिश्र बिन्ते बरा ने बयान किया: “मैं रसूलुल्लाह की इयादत को गई थी। आपका मुबारक जिस्म आग की तरह तप रहा था। मैंने कहा: ‘मेरी जान आप पर क़ुरबान, या रसूलल्लाह! मैंने कभी इतनी सख़्त बीमारी नहीं देखी!…’ आपने फ़रमाया: ‘ऐ उम्मे बिश्र! बुख़ार का सख़्त होना मेरे सवाब के ज़्यादा होने के लिए है। यह बीमारी उस ज़हरीले गोश्त का असर है जो मैंने ख़ैबर में चखा था। उस गोश्त की कड़वाहट मैं हमेशा महसूस करता रहा। उस दिन खाया हुआ ज़हर अब मेरी अबहर, यानी दिल की सबसे बड़ी रग को काट रहा है।’”5

हमारे प्यारे नबी ने हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद से भी फ़रमाया: “कोई मुसलमान ऐसा नहीं जो बीमारी में मुब्तला हो और अल्लाह तआला उसकी ख़ताएँ और गुनाह इस तरह न झाड़ दे जैसे पेड़ के पत्ते झड़ते हैं!”6 बीमारी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी। सहाबा-ए-किराम इस हालत पर बहुत ग़मगीन थे, अपने घरों में चैन से न रह पाते थे। वे मस्जिद में जमा हुए। नबी-ए-करीम का हाल पूछने के लिए उन्होंने हज़रत अली को ख़िदमत में भेजा। सारे जहानों के सरदार ने इशारे से पूछा: “मेरे सहाबा क्या कह रहे हैं?” उन्होंने कहा: “‘अगर रसूलुल्लाह हमारे बीच से चले गए तो!…’ – यह सोचकर वे बहुत ग़मगीन और बेचैन हैं।” हमारे प्यारे नबी, जो अपने सहाबा पर बेहद मेहरबान थे, बीमारी की शिद्दत सहते हुए उठे और हज़रत अली और हज़रत फ़ज़्ल इब्ने अब्बास का सहारा लेकर मस्जिद तशरीफ़ लाए। मिम्बर पर चढ़कर अल्लाह तआला की हम्द-ओ-सना के बाद आपने सहाबा-ए-किराम से फ़रमाया:

“ऐ मेरे सहाबा! सुना है कि तुम मेरी मौत के बारे में सोचकर परेशान हो रहे हो। क्या कोई नबी अपनी उम्मत के दरमियान हमेशा रहा है कि मैं भी तुम्हारे दरमियान हमेशा रहूँ? जान लो कि मैं अपने रब से जा मिलूँगा। तुम्हें मेरी नसीहत यह है कि मुहाजिरों के बड़ों की इज़्ज़त करो! ऐ मुहाजिरो! तुम्हें भी मेरी वसीयत यह है कि अन्सार के साथ भलाई करो! उन्होंने तुम्हारे साथ भलाई की। तुम्हें अपने घरों में ठिकाना दिया। ख़ुद तंगी से गुज़र-बसर करने के बावजूद तुम्हें अपने ऊपर तरजीह दी। अपने मालों में तुम्हें शरीक किया। जो कोई अन्सार पर हाकिम बने, वह उनका ख़याल रखे, और उनमें से जो कोताही करें, उन्हें माफ़ कर दे।” फिर बहुत अच्छी, असरदार नसीहतें करके फ़रमाया: “अल्लाह तआला ने अपने एक बंदे को दुनिया में रहने और अपने रब से जा मिलने के दरमियान इख़्तियार दिया। उस बंदे ने अपने रब से जा मिलना चाहा।” हज़रत अबू बकर समझ गए कि रसूलुल्लाह इन बातों से अपनी वफ़ात की तरफ़ इशारा फ़रमा रहे हैं, और रोते हुए कहने लगे: “हमारी जानें आप पर क़ुरबान हों, या रसूलल्लाह!” रहमत के समुंदर हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “मत रोओ, ऐ अबू बकर!” और उन्हें सब्र करने और बर्दाश्त करने का हुक्म दिया। आपकी मुबारक आँखों से आँसू बह रहे थे। फिर फ़रमाया: “ऐ मेरे सहाबा! दीन-ए-इस्लाम की राह में सच्चाई और इख़लास के साथ अपना माल क़ुरबान करने वाले अबू बकर से मैं बहुत राज़ी हूँ। अगर आख़िरत की राह के लिए कोई दोस्त बनाना मेरे इख़्तियार में होता, तो मैं उन्हें चुनता।” और हुक्म दिया: “मस्जिद की तरफ़ खुलने वाले दरवाज़ों में से अबू बकर के दरवाज़े के सिवा सब बंद कर दो!”

फिर मिम्बर से उतरकर हज़रत आइशा के हुजरे में तशरीफ़ ले गए। सहाबा-ए-किराम रोने लगे। इस पर नबी-ए-करीम हज़रत अली और फ़ज़्ल इब्ने अब्बास के बाज़ुओं का सहारा लेकर फिर मस्जिद में तशरीफ़ लाए। मिम्बर की निचली सीढ़ी पर खड़े होकर सहाबा-ए-किराम से यूँ फ़रमाया: “ऐ मुहाजिरो और ऐ अन्सार! जिस चीज़ का वक़्त मुक़र्रर है, उस तक पहुँचने के लिए जल्दी करने का कोई फ़ायदा नहीं। अल्लाह तआला अपने किसी भी बंदे के लिए जल्दी नहीं करता। जो शख़्स अल्लाह तआला की क़ज़ा व क़द्र को बदलने और उसके इरादे से ऊपर होने की कोशिश करे, अल्लाह उसे क़हर में डालकर तबाह कर देता है।

जो अल्लाह तआला से चालबाज़ी करना और उसे धोखा देना चाहे, उसके काम बिगड़ जाते हैं और वह ख़ुद धोखा खाता है। जान लो कि मैं तुम पर बहुत मेहरबान और रहम करने वाला हूँ। तुम भी मुझसे आ मिलोगे। तुम्हारे मिलने की जगह हौज़-ए-कौसर का किनारा है। जो जन्नत में दाख़िल होना और मुझसे मिलना चाहे, वह फ़ुज़ूल बातें न करे। ऐ मुसलमानो! काफ़िर होना और गुनाह करना नेमत के बदल जाने और रिज़्क़ के घट जाने का सबब बनता है। अगर लोग अल्लाह तआला के हुक्मों की इताअत करें, तो हुकूमत के सरबराह, अफ़सर और हाकिम उन पर रहम और शफ़क़त करते हैं। अगर वे फ़िस्क़-ओ-फ़ुजूर और सरकशी करें और गुनाह करें, तो रहम-दिल हुक्मरान नहीं पाते। जिस तरह मेरी ज़िंदगी तुम्हारे लिए भलाई है, उसी तरह मेरी मौत भी भलाई और रहमत है। अगर मैंने किसी को नाहक़ मारा हो या उससे कोई बुरी बात कही हो, तो मैं राज़ी हूँ कि वह मेरे साथ वैसा ही करके अपना हक़ ले ले; अगर मैंने तुममें से किसी से नाहक़ कोई चीज़ ली हो, तो मैं राज़ी हूँ कि वह उसे वापस माँग ले, और मैं आपस में हक़ माफ़ कराने के लिए तैयार हूँ, क्योंकि दुनिया की सज़ा आख़िरत की सज़ा से बहुत हल्की है और इसे बर्दाश्त करना ज़्यादा आसान है।” जिस तरह आपने पहले हज़रत अबू बकर से अपनी ख़ुशनूदी ज़ाहिर फ़रमाई थी, उसी तरह इस ख़ुत्बे में हज़रत उमर से भी अपनी ख़ुशनूदी ज़ाहिर करते हुए फ़रमाया: “उमर मेरे साथ हैं और मैं उनके साथ हूँ। मेरे बाद हक़ उमर के साथ है।”

“सबसे सख़्त बला नबियों पर आती है। इसके बावजूद नबी का बलाओं पर ख़ुश होना तुम्हारे उन नेमतों पर ख़ुश होने से कहीं ज़्यादा है जो तुम्हें दी जाती हैं” हदीस शरीफ़

रसूलुल्लाह इस ख़ुत्बे के बाद मिम्बर से उतरे। नमाज़ के बाद फिर मिम्बर पर तशरीफ़ ले गए और वसीयत और नसीहत करके फ़रमाया: “मैंने तुम्हें अल्लाह तआला के सुपुर्द किया।” और सहाबा से जुदा होकर अपने हुजरे में तशरीफ़ ले गए। एक दिन, जब आपको सख़्त दर्द था, सारे जहानों के सरदार (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सहाबा-ए-किराम से हक़ माफ़ कराने और बंदों के हक़ों का बोझ लेकर आख़िरत में न जाने के लिए हज़रत बिलाल हब्शी को बुलवाया। उनसे फ़रमाया: “लोगों में आवाज़ लगाओ! मस्जिद में जमा हो जाएँ। मैं उन्हें अपनी आख़िरी वसीयत करना चाहता हूँ!…”

हज़रत बिलाल ने सहाबा को मस्जिद में जमा किया। हमारे प्यारे नबी हज़रत अली और फ़ज़्ल का सहारा लेकर मस्जिद में तशरीफ़ लाए। मिम्बर पर बैठकर अल्लाह तआला की हम्द-ओ-सना के बाद फ़रमाया: “ऐ मेरे सहाबा! जान लो कि तुम्हारे दरमियान से मेरी जुदाई क़रीब आ गई है। जिसका मुझ पर कोई हक़ हो, वह मुझसे माँग ले। जो मुझे प्यारा है, वह मुझसे अपना हक़ माँग ले या उसे माफ़ कर दे, ताकि मैं ये हक़ अदा करके अपने रब और उसकी रहमत से जा मिलूँ।” फिर मिम्बर से उतरकर ज़ुहर की नमाज़ पढ़ाई। नमाज़ के बाद फिर मिम्बर पर तशरीफ़ ले गए और नमाज़ से पहले जो फ़रमाया था, उसे दोहराया। नबी-ए-करीम अपनी बीमारी के दौरान जब भी अज़ान होती, हमेशा मस्जिद शरीफ़ में तशरीफ़ ले जाते और सहाबा-ए-किराम के इमाम बनकर जमाअत से नमाज़ पढ़ते थे।7 हमारे प्यारे नबी की वफ़ात से तीन दिन पहले आपकी बीमारी बढ़ गई। आप मस्जिद में तशरीफ़ ले जाकर जमाअत को नमाज़ न पढ़ा सके। जो पहली नमाज़ आप जमाअत से न पढ़ सके, वह इशा की नमाज़ थी।

हज़रत बिलाल हमेशा की तरह उस वक़्त दरवाज़े पर आए और कहा: “अस्सलात, या रसूलल्लाह!” हमारे प्यारे नबी में कमज़ोरी की वजह से मस्जिद तक जाने की ताक़त न थी। फ़रमाया: “अबू बकर से कहो! मेरे सहाबा को नमाज़ पढ़ाएँ।” हज़रत आइशा ने पूछा: “मेरी जान आप पर क़ुरबान हो, या रसूलल्लाह! मेरे वालिद नर्म-दिल हैं और बहुत जल्द ग़मगीन हो जाते हैं। आपकी जगह खड़े होकर जब वहाँ आपको न देखेंगे, तो रोने की वजह से पढ़ न सकेंगे। क्या आप उमर को इमामत के लिए आगे बढ़ने का हुक्म न देंगे?” नबी-ए-करीम ने फिर फ़रमाया: “अबू बकर से कहो! मेरे सहाबा के इमाम बनकर उन्हें नमाज़ पढ़ाएँ।” हज़रत बिलाल ने अबू बकर सिद्दीक़ को यह बात बताई। हज़रत अबू बकर ने जब मेहराब में रसूलुल्लाह को न देखा, तो उनका हाल ऐसा हो गया जैसे दिल में तीर लगा हो, होश उड़ने को हो गए। रोए!… रोए!… सहाबा-ए-किराम भी रोने लगे। हबीबुल्लाह ने जब पूछा कि मस्जिद से आने वाली यह फ़रियाद कैसी है, तो हज़रत फ़ातिमा ने हाल अर्ज़ किया: “मेरी जान आप पर क़ुरबान हो, या रसूलल्लाह! आपके सहाबा आपकी जुदाई बर्दाश्त न कर पाने की वजह से रो रहे हैं!…”8 रहमत के समुंदर हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बहुत मुतअस्सिर हुए। अपने सहाबा को तसल्ली देने के लिए, बीमारी इतनी सख़्त होने के बावजूद, बड़ी मुश्किल से उठे। हज़रत अली और हज़रत अब्बास का सहारा लेकर मस्जिद में तशरीफ़ लाए। नमाज़ के बाद फ़रमाया: “ऐ मेरे सहाबा! तुम अल्लाह तआला की हिफ़ाज़त में हो और मैंने तुम्हें अल्लाह तआला के सुपुर्द किया! तक़्वा पर क़ायम रहो। अल्लाह तआला से डरो। अल्लाह तआला के हुक्म को थामे रहो और इताअत करो। मैं अब इस दुनिया से जा रहा हूँ।”

यह हमारे प्यारे नबी की वफ़ात से तीन दिन पहले की बात है। जिबराईल अलैहिस्सलाम रसूलुल्लाह की इयादत के लिए आए और कहा: “या रसूलल्लाह! अल्लाह तआला आपको सलाम भेजता है। आपका हाल जानते हुए भी पूछता है कि आप कैसे हैं, अपने आपको कैसा महसूस करते हैं।” सारे जहानों के सरदार ने फ़रमाया: “मैं ग़मगीन हूँ!” जिबराईल अलैहिस्सलाम इतवार के दिन भी आए और वही बातें कहीं। नबी-ए-करीम ने फिर पहले वाला जवाब दिया। इसके अलावा जिबराईल अलैहिस्सलाम ने ख़बर दी कि यमन में नबी होने का दावा करने वाला असवद अनसी मार डाला गया है। रसूल-ए-अकरम ने भी अपने सहाबा को इसकी ख़बर दी। बीमारी से पहले आपके पास जो कुछ सोने के सिक्के आए थे, उनमें से कुछ आपने फ़क़ीरों को और कुछ हज़रत आइशा को दे दिए थे। इतवार के दिन रसूलुल्लाह की बीमारी बढ़ गई। लश्कर के सिपहसालार हज़रत उसामा आपकी ख़िदमत में आए, तो आपने उनसे कुछ न फ़रमाया, लेकिन अपने मुबारक हाथ उठाकर उन पर फेरे। मालूम हुआ कि आप उनके लिए दुआ फ़रमा रहे हैं। बीमारी का तेरहवाँ और आख़िरी दिन… वह दिन भी, उस दिन की तरह जिस दिन हमारे प्यारे नबी ने दुनिया को शरफ़ बख़्शा था, रबीउल अव्वल की बारह तारीख़ और पीर का दिन था। कायनात के सुल्तान ने अपने मुबारक जिस्म में कुछ हल्कापन महसूस किया… सहाबा-ए-किराम जब हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ के पीछे फ़ज्र की नमाज़ पढ़ने वाले थे, तो सारे जहानों के सरदार मस्जिद शरीफ़ में तशरीफ़ लाए। अपनी उम्मत को सफ़-दर-सफ़ इबादत करते देखा, तो ख़ुश होकर मुस्कुराए। सहाबा-ए-किराम भी रसूलुल्लाह को मस्जिद में देखकर यह समझकर ख़ुश हुए कि बीमारी जाती रही। अबू बकर सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) समझ गए कि हमारे प्यारे नबी तशरीफ़ लाए हैं, और पीछे हटना चाहा। नबी-ए-करीम ने उन्हें “अपनी जगह ठहरे रहो!” के मायने में इशारा फ़रमाया और ख़ुद हज़रत अबू बकर की इक़्तिदा करके उनके पीछे नमाज़ पढ़ी।9 इस तरह रसूलुल्लाह के हुक्म से हज़रत अबू बकर ने सहाबा-ए-किराम को सत्रह वक़्त की नमाज़ें पढ़ाईं। रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) नमाज़ के बाद हज़रत आइशा के हुजरे में तशरीफ़ ले जाकर लेट गए और फ़रमाया: “मैं अल्लाह तआला के हुज़ूर दुनिया का माल छोड़े बग़ैर जाना चाहता हूँ। तुम्हारे पास जो सोने के सिक्के बाक़ी हैं, उन्हें भी फ़क़ीरों में बाँट दो!” फिर आपका बुख़ार बढ़ गया। कुछ देर बाद आपने फिर आँखें खोलकर हज़रत आइशा से पूछा कि उन्होंने सोने के सिक्के बाँटे या नहीं। उन्होंने कहा कि बाँट देंगी। आपने बार-बार हुक्म दिया कि उन्हें फ़ौरन बाँट दिया जाए। जब वे फ़ौरन बाँट दिए गए और आपको ख़बर दी गई, तो फ़रमाया: “अब मुझे इत्मीनान हो गया।” अपने बिस्तर पर कुछ देर आराम फ़रमाने के बाद आपने हज़रत अली को अपने पास बुलाया। अपना मुबारक सिर उनकी गोद में रख दिया। आपकी मुबारक पेशानी पर पसीना आ गया था, मुबारक रंग बदल गया था। हज़रत फ़ातिमा ने अपने मुबारक वालिद की यह हालत देखी, तो उसे देखने की ताब न ला सकीं और अपने बेटों हज़रत हसन और हज़रत हुसैन के पास गईं। उनके हाथ पकड़कर रोते हुए कहने लगीं: “ऐ मेरे अब्बा जान! आपकी बेटी की देखभाल कौन करेगा? हसन और हुसैन को किसके सुपुर्द करते हैं? हाय मेरे अब्बा! मेरी जान आप पर क़ुरबान हो! आपके बाद मेरा क्या हाल होगा? आपके मुबारक चेहरे के बाद मेरी आँखें किसको देखेंगी?” रसूलुल्लाह ने अपनी बेटी की दिलों को जला देने वाली ये बातें सुनीं, तो मुबारक आँखें खोलीं, उन्हें अपने पास बुलाया और दुआ फ़रमाई: “या रब! इसे सब्र अता फ़रमा।” फिर फ़रमाया: “ऐ फ़ातिमा! ऐ मेरी आँखों के नूर! तुम्हारे अब्बा जान-कनी की हालत में हैं!” इस पर उनका सिसक-सिसककर रोना और बढ़ गया। हज़रत अली ने कहा: “ऐ फ़ातिमा! ख़ुदा के लिए चुप हो जाओ, रसूलुल्लाह को और ज़्यादा ग़मगीन न करो!” तो हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “इसे दुख न दो, ऐ अली! इसे अपने बाप के लिए आँसू बहाने दो!…” फिर मुबारक आँखें बंद कर लीं और ऐसा लगा जैसे बेहोश हो गए हों। इसके बाद हज़रत हसन अपने मुबारक नाना के पास आए और रोते हुए कहा: “ऐ मेरे मुबारक नाना! आपकी जुदाई कौन बर्दाश्त कर सकेगा? अपने दिल का दुख हम किससे कहेंगे? आपके बाद मेरी अम्मी, मेरे अब्बा और मेरे भाई पर कौन शफ़क़त करेगा? आपकी पाक बीवियाँ और आपके सहाबा आपके वे अच्छे अख़लाक़ कहाँ पाएँगे?…” तो नबी-ए-करीम की मुबारक बीवियों में बर्दाश्त की ताक़त न रही, और वे सब मिलकर ख़ामोशी से रोने लगीं। बाहर सहाबा-ए-किराम बहुत ग़मगीन हालत में इंतिज़ार कर रहे थे। उन्होंने जब सुना कि नबी-ए-करीम की तकलीफ़ बहुत बढ़ गई है, तो उनके दिल जल उठे। वे रोने लगे। अपने प्यारे नबी के मुबारक चेहरे को आख़िरी बार ही सही, देखने के लिए दरवाज़े पर मिन्नत कर रहे थे: “ख़ुदा के लिए दरवाज़ा खोल दीजिए! रसूल अलैहिस्सलाम का मुबारक चेहरा एक बार और देख लें!…” अल्लाह तआला के हबीब, उसके प्यारे, सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजे गए थे। आपने जब अपने सहाबा की ये फ़रियादें सुनीं, तो रहम फ़रमाकर फ़रमाया: “दरवाज़ा खोल दो!” सहाबा में से बड़े लोग अंदर आए। हमारे प्यारे नबी ने उन्हें सब्र की नसीहत करने के बाद फ़रमाया: “ऐ मेरे सहाबा! तुम इंसानों में सबसे बुलंद और सबसे इज़्ज़त वाले हो। तुम्हारे बाद कोई भी आए, तुम उन सबसे पहले जन्नत में दाख़िल होगे। दीन को क़ायम रखने में मज़बूत रहो और अज़ीम क़ुरआन को इमाम (रहनुमा) बनाओ।

“ऐ मेरे सहाबा! तुम अल्लाह तआला की हिफ़ाज़त में हो और मैंने तुम्हें अल्लाह तआला के सुपुर्द किया! तक़्वा पर क़ायम रहो” हदीस शरीफ़

दीन के हुक्मों से ग़ाफ़िल न रहो।” फिर फ़रमाया: “या रब! क्या मैंने तबलीग़ कर दी?” और मुबारक आँखें बंद कर लीं। मुबारक चेहरे पर पसीना आ गया। हज़रत अली ने इशारे से सहाबा को बाहर जाने के लिए कहा। उनके चले जाने के बाद हज़रत आइशा हाज़िर हुईं और नसीहत चाही। नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ऐ आइशा! अपने घर के कोने में बैठकर अपनी हिफ़ाज़त करना!” इसके बाद आपकी मुबारक आँखों से आँसू बहने लगे। कायनात के सुल्तान रो रहे थे… वहाँ मौजूद लोगों के दिल ज़ख़्मी हो गए, कलेजे टुकड़े-टुकड़े हो गए। हमारी माँ हज़रत उम्मे सलमा ने पूछा: “मेरी जान आप पर क़ुरबान हो, या रसूलल्लाह! आप क्यों रो रहे हैं?” तो फ़रमाया: “अपनी उम्मत पर रहम किए जाने के लिए रो रहा हूँ।”

सूरज ऊपर की तरफ़ चढ़ रहा था। वक़्त क़रीब आ गया था… हमारे प्यारे नबी का मुबारक सिर हज़रत आइशा के सीने से टिका हुआ था। सारे जहानों के सरदार अब अपने आख़िरी लम्हे गुज़ार रहे थे, और आपके मुबारक होंठों से ये अल्फ़ाज़ निकल रहे थे: “ख़बरदार! ख़बरदार! अपने हाथों में मौजूद ग़ुलामों के साथ अच्छा सुलूक करो! उन्हें कपड़े पहनाओ, उनका पेट भरो। उनसे नर्मी से बात करो। नमाज़ की, नमाज़ की पाबंदी करो। अपनी औरतों और अपने ग़ुलामों के बारे में अल्लाह तआला से डरो!… या अल्लाह! मेरी मग़फ़िरत फ़रमा! मुझ पर अपनी रहमत अता फ़रमा!… मुझे रफ़ीक़-ए-आला की जमाअत से मिला दे!…” हज़रत फ़ातिमा के आँसू सैलाब की तरह बह रहे थे, उनकी आहें कलेजों को जला रही थीं। हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उन्हें अपने पास बिठाकर फ़रमाया: “बेटी, थोड़ा सब्र करो, मत रोओ, क्योंकि हामिलीन-ए-अर्श (फ़रिश्ते) तुम्हारे रोने पर रो पड़ते हैं।” आपने हज़रत फ़ातिमा के आँसू पोंछे। उन्हें तसल्ली दी, अल्लाह तआला से उनके लिए सब्र माँगा और फ़रमाया: “ऐ मेरी बेटी, मेरी रूह क़ब्ज़ की जाएगी। ‘इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन’ कहना। ऐ फ़ातिमा! आने वाली हर मुसीबत का बदला दिया जाता है।” कुछ देर मुबारक आँखें बंद रखने के बाद फ़रमाया: “इसके बाद तुम्हारे अब्बा को कोई रंज-ओ-ग़म नहीं होगा, क्योंकि वह फ़ानी दुनिया से, मेहनत-मशक़्क़त की जगह से छुटकारा पा रहे हैं।” फिर हज़रत अली से फ़रमाया: “ऐ अली! मेरे ज़िम्मे फ़लाँ यहूदी का इतना माल है। लश्कर तैयार करने के लिए लिया था। उसे अदा करना हरगिज़ न भूलना। तुम ज़रूर मुझे इस क़र्ज़ से छुड़ाओगे, और हौज़-ए-कौसर के किनारे मुझसे मिलने वालों में सबसे पहले तुम हो। मेरे बाद तुम्हें बहुत तकलीफ़ें पहुँचेंगी, सब्र करना; जब लोग दुनिया चाहें, तुम आख़िरत को चुनना।”

हज़रत उसामा फिर आए। रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “अल्लाह तआला तुम्हारा मददगार हो! चलो, जिहाद के लिए जाओ!” वह भी निकलकर अपने लश्कर की तरफ़ चले गए और फ़ौरन कूच का हुक्म दे दिया।10

सारे जहानों के सरदार अब आख़िरी साँसें ले रहे थे… वक़्त बिल्कुल क़रीब आ गया था… अल्लाह तआला ने इज़राईल अलैहिस्सलाम को वह्य भेजी: “मेरे हबीब के पास सबसे ख़ूबसूरत सूरत में जाओ! अगर वह इजाज़त दें, तो उनकी रूह बहुत नर्मी और आसानी से क़ब्ज़ करना। अगर इजाज़त न दें, तो लौट आओ!” इज़राईल अलैहिस्सलाम सबसे ख़ूबसूरत सूरत में, इंसान की शक्ल में, हमारे प्यारे नबी के मुबारक घर के दरवाज़े पर आए और कहा: “अस्सलामु अलैकुम, ऐ नुबुव्वत के घर वाले! क्या आप अंदर आने की इजाज़त देते हैं? अल्लाह तआला आप पर रहम फ़रमाए!”

हज़रत आइशा ने हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के बिल्कुल पास बैठी हज़रत फ़ातिमा से कहा: “इस आने वाले को तुम जवाब दो।” हज़रत फ़ातिमा दरवाज़े पर गईं और बहुत ग़मगीन आवाज़ में कहा: “ऐ अल्लाह तआला के बंदे! रसूलुल्लाह इस वक़्त अपने हाल में मशग़ूल हैं।” इज़राईल अलैहिस्सलाम ने फिर इजाज़त माँगी। वही जवाब दिया गया। तीसरी बार सलाम दोहराकर जब उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा कि उनका अंदर आना ज़रूरी है, तो नबी-ए-करीम को ख़बर हुई और फ़रमाया: “ऐ फ़ातिमा! दरवाज़े पर कौन है?”

हज़रत फ़ातिमा ने कहा: “या रसूलल्लाह! दरवाज़े पर कोई अंदर आने की इजाज़त माँग रहा है। मैंने कई बार जवाब दिया, लेकिन उसकी तीसरी आवाज़ पर मेरे रोंगटे खड़े हो गए।” इस पर रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “ऐ फ़ातिमा! जानती हो दरवाज़े पर कौन है? वह लज़्ज़तों को ढा देने वाला, मजलिसों को बिखेर देने वाला, औरतों को बेवा और बच्चों को यतीम छोड़ने वाला, घरों को वीरान और क़ब्रों को आबाद करने वाला मौत का फ़रिश्ता इज़राईल है। ऐ इज़राईल, अंदर आ जाओ!” उस वक़्त हज़रत फ़ातिमा ऐसे दर्द में डूब गईं जो बयान से बाहर है, और उनके मुबारक मुँह से ये अल्फ़ाज़ निकले: “हाय मदीना, तू वीरान हो गया!” नबी-ए-करीम ने हज़रत फ़ातिमा का हाथ पकड़कर अपने मुबारक सीने पर रखा और मुबारक आँखें बंद कर लीं। वहाँ मौजूद लोगों ने समझा कि आपकी मुबारक रूह क़ब्ज़ हो गई। हज़रत फ़ातिमा बर्दाश्त न कर सकीं, अपने वालिद के मुबारक कान की तरफ़ झुकीं और दिलों को ज़ख़्मी कर देने वाली आवाज़ में पुकारा: “ऐ मेरे अब्बा जान!…” कोई जवाब न आया, तो इस बार कहा: “मेरी जान आप पर क़ुरबान हो, या रसूलल्लाह! ख़ुदा के लिए अपनी मुबारक आँखें एक बार खोलिए और मुझसे कुछ फ़रमाइए…” सारे जहानों के सरदार ने मुबारक आँखें खोलकर अपनी बेटी के आँसू पोंछे और उनके कान में बताया कि आपकी वफ़ात होने वाली है। इस पर हज़रत फ़ातिमा रोने लगीं। इस बार आपने उनके कान में फ़रमाया: “मेरे अहले बैत में से सबसे पहले मेरे पास आने वाली तुम हो।” वह इस ख़ुशख़बरी से ख़ुश होकर तसल्ली पा गईं।

“या अल्लाह! मेरी मग़फ़िरत फ़रमा! मुझ पर अपनी रहमत अता फ़रमा!… मुझे रफ़ीक़-ए-आला की जमाअत से मिला दे!…” हदीस शरीफ़

हज़रत फ़ातिमा ने पूछा: “ऐ मेरे अब्बा जान! आज जुदाई का दिन है! आपसे फिर कब मिलूँगी?” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “ऐ मेरी बेटी! क़यामत के दिन मुझे हौज़ के किनारे पाओगी। अपनी उम्मत में से हौज़ पर आने वालों को मैं पानी पिलाऊँगा।” हज़रत फ़ातिमा ने पूछा: “अगर आपको वहाँ न पाऊँ, तो क्या करूँ?” तो नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “मीज़ान के पास पाओगी। वहाँ मैं अपनी उम्मत की शफ़ाअत करूँगा।”

हज़रत फ़ातिमा ने कहा: “अगर वहाँ भी न पाऊँ, या रसूलल्लाह?” तो नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “सिरात के पास पाओगी। मैं वहाँ अपने रब से फ़रियाद करूँगा: ‘या रब! मेरी उम्मत को आग से बचा!’”

इसके बाद हज़रत अली ने ग़मगीन आवाज़ में पूछा: “या रसूलल्लाह! आपकी रूह क़ब्ज़ होने के बाद आपको ग़ुस्ल कौन देगा, हम आपको किस कफ़न में लपेटेंगे, आपकी जनाज़े की नमाज़ कौन पढ़ाएगा, क़ब्र में कौन उतारेगा?” नबी-ए-करीम ने यूँ फ़रमाया:

“ऐ अली, मुझे तुम ग़ुस्ल देना, फ़ज़्ल इब्ने अब्बास तुम पर पानी डालते रहें। जिबराईल तुम्हारे तीसरे होंगे। ग़ुस्ल (नहलाने) का काम पूरा हो जाए, तो मुझे कफ़न पहनाना। जिबराईल जन्नत से ख़ुशबू लाएँगे। फिर मुझे मस्जिद में ले जाकर बाहर निकल जाना, क्योंकि सबसे पहले जिबराईल, फिर मीकाईल, फिर इसराफ़ील, फिर फ़रिश्ते गिरोह-दर-गिरोह मेरी नमाज़ पढ़ेंगे। उसके बाद तुम अंदर आना और सफ़-दर-सफ़ खड़े होना। कोई भी मुझसे आगे न बढ़े।”11 फिर आपने इंतिज़ार कर रहे इज़राईल अलैहिस्सलाम से पूछा: “ऐ इज़राईल! मिलने आए हो या मेरी रूह क़ब्ज़ करने?…” तो इज़राईल अलैहिस्सलाम ने कहा: “मैं मेहमान भी हूँ और अपना फ़र्ज़ अदा करने भी आया हूँ। अल्लाह तआला ने मुझे हुक्म दिया है कि आपकी ख़िदमत में इजाज़त से ही दाख़िल होऊँ। आपकी मुबारक रूह आपकी इजाज़त से ही क़ब्ज़ करूँगा। या रसूलल्लाह! अगर आप इजाज़त दें, तो आपके हुक्म की तामील करके आपकी रूह क़ब्ज़ करूँगा। वरना लौटकर अपने रब के पास चला जाऊँगा।” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ऐ इज़राईल! जिबराईल को कहाँ छोड़ आए?…” इज़राईल ने कहा: “जिबराईल को दुनिया के आसमान पर छोड़ आया हूँ। फ़रिश्ते आपकी वफ़ात की वजह से उनसे ताज़ियत कर रहे हैं।” वे इसी तरह बात कर रहे थे कि जिबराईल अलैहिस्सलाम आ गए। रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “ऐ मेरे भाई जिबराईल! अब दुनिया से कूच का वक़्त आ गया है। अल्लाह तआला के यहाँ मेरे लिए क्या है? मुझे उसकी ख़ुशख़बरी दो, ताकि इत्मीनान-ए-दिल से अमानत उसके मालिक के सुपुर्द कर दूँ।” जिबराईल अलैहिस्सलाम ने कहा: “ऐ अल्लाह तआला के प्यारे! मैं आसमान का दरवाज़ा खुला छोड़ आया हूँ। फ़रिश्ते सफ़-दर-सफ़ खड़े होकर मुहब्बत से आपकी रूह का इंतिज़ार कर रहे हैं।” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “हम्द अल्लाह तआला ही के लिए है। तुम मुझे ख़ुशख़बरी दो! मेरे रब के यहाँ मेरे लिए क्या है?…” जिबराईल अलैहिस्सलाम ने कहा: “या रसूलल्लाह! आपके तशरीफ़ लाने की वजह से जन्नत के दरवाज़े खोल दिए गए हैं, जन्नत की नहरें बहा दी गई हैं, जन्नत के पेड़ झुक गए हैं, हूरें सज-धज गई हैं।”

नबी-ए-करीम ने फिर फ़रमाया: “हम्द अल्लाह तआला ही के लिए है। मुझे कोई और ख़ुशख़बरी दो, ऐ जिबराईल!…” जिबराईल अलैहिस्सलाम ने कहा: “या रसूलल्लाह! क़यामत के दिन सबसे पहले शफ़ाअत करने वाले और जिनकी शफ़ाअत सबसे पहले क़बूल होगी, वह आप हैं।” हमारे प्यारे नबी ने फिर फ़रमाया: “हम्द अल्लाह तआला ही के लिए है। ऐ जिबराईल! मुझे कोई और ख़ुशख़बरी दो।” तो जिबराईल अलैहिस्सलाम ने कहा: “या रसूलल्लाह! आप किस चीज़ के बारे में पूछ रहे हैं?…” इस पर नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “मेरी सारी फ़िक्र, मेरा ग़म और मेरा रंज मेरी वह उम्मत है जिसे मैं अपने पीछे छोड़कर जा रहा हूँ।” हज़रत जिबराईल ने कहा: “ऐ अल्लाह तआला के हबीब! अल्लाह तआला क़यामत के दिन आपकी उम्मत को तब तक बख़्शता रहेगा जब तक आप राज़ी न हो जाएँ। तमाम नबियों से पहले आपको और तमाम उम्मतों से पहले आपकी उम्मत को जन्नत में दाख़िल करेगा।” हमारे प्यारे नबी ने जिबराईल अलैहिस्सलाम से फ़रमाया: “अल्लाह तआला के यहाँ मेरी तीन मुरादें हैं: पहली यह कि मुझे मेरी उम्मत के गुनाहगारों का शफ़ाअत करने वाला बनाए। दूसरी यह कि दुनिया में किए हुए गुनाहों की वजह से उन्हें अज़ाब न दे। तीसरी यह कि जुमेरात और पीर के दिन मेरी उम्मत के आमाल मेरे सामने पेश किए जाएँ। (अगर उनके आमाल अच्छे हों, तो दुआ करूँगा, अल्लाह तआला क़बूल फ़रमाएगा। अगर बुरे हों, तो शफ़ाअत करके दरख़्वास्त करूँगा कि आमालनामे से मिटा दिए जाएँ।)” जिबराईल अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला की तरफ़ से ख़बर पहुँचाई कि आपकी ये तीनों मुरादें क़बूल कर ली गई हैं। इस पर हमारे प्यारे नबी को इत्मीनान हो गया।

अल्लाह तआला ने वह्य भेजी: “ऐ मेरे हबीब! अपनी उम्मत से इतनी मुहब्बत और शफ़क़त करना तुम्हारे मुबारक दिल में किसने डाला?…” नबी-ए-करीम ने जवाब दिया: “मुझे पैदा करने और परवरिश करने वाले मेरे रब तआला ने।” अल्लाह पाक ने फ़रमाया: “तुम्हारी उम्मत पर मेरी रहमत और मेहरबानी तुम्हारी रहमत से हज़ार गुना ज़्यादा है। उन्हें मुझ पर छोड़ दो।” फिर हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “अब मुझे इत्मीनान हो गया। ऐ इज़राईल! तुम्हें जिस काम का हुक्म दिया गया है, उसे पूरा करो!” इज़राईल अलैहिस्सलाम अपना फ़र्ज़ अदा करने के लिए कायनात के उस सुल्तान के क़रीब आए, जिनकी ख़ातिर वह ख़ुद पैदा किए गए थे। हमारे प्यारे नबी ने पास रखे पानी के बर्तन में अपने दोनों मुबारक हाथ डुबोए, भीगे हाथ अपने मुबारक चेहरे पर फेरे और फ़रमाया: “ला इलाह इल्लल्लाह! या अल्लाह! रफ़ीक़-ए-आला!…” इज़राईल अलैहिस्सलाम ने सारे जहानों के सरदार की मुबारक रूह क़ब्ज़ करनी शुरू की। रसूलुल्लाह का मुबारक चेहरा कभी लाल हो जाता, कभी ज़र्द पड़ जाता। आपने इज़राईल अलैहिस्सलाम से फ़रमाया: “क्या मेरी उम्मत की जान भी इसी तरह सख़्ती और ज़ोर से निकालोगे?…” तो उन्होंने जवाब दिया: “या रसूलल्लाह! मैंने किसी की जान इतनी आसानी से नहीं निकाली।” हमारे प्यारे नबी आख़िरी लम्हे में भी अपनी उम्मत को न भूले; आपने फ़रमाया: “ऐ इज़राईल! जो सख़्ती मेरी उम्मत पर करोगे, वह मुझ पर कर लो! क्योंकि वे कमज़ोर हैं, बर्दाश्त न कर सकेंगे…” फिर फ़रमाया: “ला इलाह इल्लल्लाह! रफ़ीक़-ए-आला!…” और आपकी मुबारक रूह क़ब्ज़ कर ली गई और आला-ए-इल्लिय्यीन तक पहुँचा दी गई…

शफ़ाअत, या रसूलल्लाह!
दख़ीलक, या रसूलल्लाह!
अस्सलातु वस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह!
अस्सलातु वस्सलामु अलैका या हबीबल्लाह!
अस्सलातु वस्सलामु अलैका या सय्यिदल अव्वलीना वल आख़िरीन!

जिबराईल अलैहिस्सलाम ने नबी-ए-करीम से विदा होते हुए कहा: “अस्सलामु अलैकुम, ऐ अल्लाह तआला के रसूल! मेरा मक़सद और मेरी तलब आप ही थे। अब मैं फिर कभी ज़मीन पर नहीं आऊँगा!…”

रसूल-ए-अकरम की मुबारक रूह जब आलम-ए-बाला की तरफ़ चली गई, तो हज़रत फ़ातिमा और नबी-ए-करीम की पाक बीवियाँ (अज़वाज-ए-ताहिरात) (रज़ियल्लाहु अन्हुन्न) ख़ामोशी से रोने लगीं।12 उसी वक़्त एक आवाज़ ने, जिसका कहने वाला दिखाई नहीं देता था, सलाम किया:

“ऐ फ़ातिमा! जानती हो दरवाज़े पर कौन है? वह लज़्ज़तों को ढा देने वाला, मजलिसों को बिखेर देने वाला, औरतों को बेवा और बच्चों को यतीम छोड़ने वाला, घरों को वीरान और क़ब्रों को आबाद करने वाला मौत का फ़रिश्ता इज़राईल है” हदीस शरीफ़

“अस्सलामु अलैकुम, ऐ अहले बैत! व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू।” फिर सूरह आले इमरान की 185वीं आयत-ए-करीमा पढ़ी, जिसका मफ़हूम है: “जान लो कि हर जानदार मौत का मज़ा चखेगा। और क़यामत के दिन तुम्हें तुम्हारे अज्र पूरे-पूरे दिए जाएँगे।” फिर उन्हें तसल्ली देते हुए ताज़ियत की: “अल्लाह तआला के एहसानों और इनामों पर भरोसा रखो। उसी का दामन थामो, उसी से उम्मीद रखो। चीख़-पुकार न करो! असल मुसीबत-ज़दा वह है जो सवाब से महरूम रह जाए!”

ये बातें वहाँ मौजूद सब लोगों ने सुनीं और सलाम का जवाब दिया। ये बातें कहने वाले ख़िज़्र अलैहिस्सलाम थे।13 रसूल-ए-अकरम में जब मौत की निशानियाँ दिखाई दीं, तो उम्मे ऐमन ने अपने बेटे उसामा को ख़बर भेजी। उसामा, हज़रत उमर और अबू उबैदा यह कड़वी ख़बर पाते ही लश्कर से अलग होकर मस्जिद-ए-नबवी में आ गए। आइशा सिद्दीक़ा और दूसरी ख़वातीन रोने लगीं, तो मस्जिद शरीफ़ में मौजूद सहाबा-ए-किराम हैरान रह गए। समझ न सके कि क्या हुआ है। ऐसे हो गए जैसे सिर पर चोट लगी हो। हज़रत अली मुर्दे की तरह बेहरकत रह गए। हज़रत उस्मान की ज़बान बंद हो गई। हज़रत अबू बकर उस वक़्त अपने घर में थे। दौड़ते हुए आए और फ़ौरन हुजरा-ए-सआदत में दाख़िल हुए। फ़ख़्र-ए-आलम का चेहरा खोला और देखा कि आपकी वफ़ात हो चुकी है। आपका मुबारक चेहरा और सारा जिस्म लतीफ़ और पाकीज़ा होकर नूर की तरह चमक रहा था। उन्होंने कहा: “आपकी मौत भी आपकी ज़िंदगी की तरह कितनी ख़ूबसूरत है, या रसूलल्लाह!” और आपको चूमा, बहुत रोए, फिर मुबारक चेहरा ढाँप दिया और घर वालों को तसल्ली दी। फिर मस्जिद शरीफ़ में आए। मिम्बर पर चढ़कर सहाबा-ए-किराम के सामने ख़ुत्बा पढ़ा। अल्लाह तआला की हम्द-ओ-सना की और रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर दुरूद पढ़ने के बाद फ़रमाया: “जो कोई मुहम्मद अलैहिस्सलाम पर ईमान लाया है, वह जान ले कि मुहम्मद अलैहिस्सलाम की वफ़ात हो गई। और जो कोई अल्लाह तआला की इबादत करता है, वह जान ले कि अल्लाह हय्य (ज़िंदा) और बाक़ी (कभी न मरने वाला, हमेशा रहने वाला) है।” फिर सूरह आले इमरान की 144वीं आयत-ए-करीमा पढ़ी, जिसका मफ़हूम है: “मुहम्मद (अलैहिस्सलाम) रसूल हैं। उनसे पहले भी रसूल आ चुके हैं। वह भी वफ़ात पाएँगे। अगर उनकी वफ़ात हो जाए या वह शहीद कर दिए जाएँ, तो क्या तुम अपने दीन से फिर जाओगे? जो अपने दीन से फिर जाए, वह अल्लाह तआला का कुछ नुक़सान नहीं कर सकता। वह अपना ही नुक़सान करता है। जो अपने दीन से न फिरें, अल्लाह तआला उन्हें सवाब देगा।” सहाबा-ए-किराम को नसीहत करके माहौल को संभाला।14 इस तरह सबको यक़ीन आ गया कि रसूलुल्लाह की वफ़ात हो चुकी है। ग़म और रंज सहाबा-ए-किराम के दिलों में ज़हरीले ख़ंजर की तरह उतर गया। आँखें रो रही थीं, आँसू उमड़ रहे थे, जुदाई की आग हर एक का कलेजा जला रही थी। सहाबा-ए-किराम (अलैहिमुर्रिज़वान) ने सबसे पहला काम यह किया कि तमाम कामों का इंतिज़ाम करने के लिए हज़रत अबू बकर को ख़लीफ़ा चुना। उनसे बैअत की, उनकी इताअत की और उनके हुक्म के मुताबिक़ काम चलाने लगे।15 रसूल-ए-अकरम हिजरत के ग्यारहवें साल (632 ईसवी) में, रबीउल अव्वल महीने की 12 तारीख़ को, पीर के दिन, दोपहर से पहले आख़िरत की तरफ़ रेहलत फ़रमा गए। उस वक़्त आपकी उम्र क़मरी साल के हिसाब से 63 (शम्सी साल के हिसाब से 61) साल थी।16

नबी-ए-करीम को हज़रत अली, हज़रत अब्बास, हज़रत फ़ज़्ल इब्ने अब्बास और हज़रत उसामा इब्ने ज़ैद ने ग़ुस्ल दिया।17

“अल्लाह तआला के एहसानों और इनामों पर भरोसा रखो। उसी का दामन थामो, उसी से उम्मीद रखो। चीख़-पुकार न करो! असल मुसीबत-ज़दा वह है जो सवाब से महरूम रह जाए!” ख़िज़्र अलैहिस्सलाम

मेहराब शरीफ़ – रौज़ा-ए-मुतह्हरा / मस्जिद-ए-नबवी

नबी-ए-करीम (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) की मस्जिद शरीफ़ का वह हिस्सा,
जिसे “रौज़ा-ए-मुतह्हरा / जन्नत का बाग़” कहा जाता है।
वह मेहराब दिखाई दे रहा है जहाँ हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)
इमाम बनकर नमाज़ पढ़ाया करते थे।
इस तस्वीर में दिखाई नहीं देती, मगर बाईं तरफ़ आपकी मुबारक क़ब्र शरीफ़
(हुजरा-ए-सआदत) मौजूद है।

मिम्बर शरीफ़ – रौज़ा-ए-मुतह्हरा / मस्जिद-ए-नबवी

वह मिम्बर दिखाई दे रहा है जिस पर हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जुमा का ख़ुत्बा पढ़ा करते थे। उस ज़माने का मिम्बर शरीफ़ तीन सीढ़ियों वाला और एक मीटर ऊँचा था। वह 654 (1256 ईसवी) की आग में पूरी तरह जल गया। अलग-अलग सालों में अलग-अलग मिम्बर बनाए गए। आज का बारह सीढ़ियों वाला, सात मीटर ऊँचा संगमरमर का मिम्बर सुल्तान मुराद ख़ान सालिस ने हिजरी 998 (1590 ईसवी) में इस्तांबुल से भेजा था।

ग़ुस्ल के दौरान आपके मुबारक जिस्म से ऐसी मुश्क की ख़ुशबू फैली कि अब तक किसी ने ऐसी ख़ुशबू नहीं सूँघी थी। फिर मुबारक कुर्ता बदन पर रहते हुए तीन बार ग़ुस्ल दिया गया और तीन परत नए सफ़ेद कफ़न में लपेटकर कफ़नाया गया। एक तख़्त पर उठाकर मस्जिद में लाया गया। जैसा कि हमारे प्यारे नबी ने पहले ख़बर दी थी, सब लोग मस्जिद से बाहर निकल गए। फ़रिश्तों ने गिरोह-दर-गिरोह आकर आपकी जनाज़े की नमाज़ पढ़ी। फ़रिश्तों की नमाज़ ख़त्म हुई, तो एक आवाज़, जिसका कहने वाला दिखाई नहीं देता था, कह रही थी: “अंदर आओ! अपने नबी की जनाज़े की नमाज़ पढ़ो!” इस पर सहाबा-ए-किराम अंदर आए। वे भी गिरोह-दर-गिरोह आकर बग़ैर इमाम के हमारे प्यारे नबी की जनाज़े की नमाज़ पढ़ते रहे। बुध के दिन शाम तक जाकर ही इसे पूरा कर सके। सहाबा-ए-किराम ने हमारे प्यारे नबी की मुबारक क़ब्र खोदने के मामले में उस हदीस शरीफ़ पर अमल किया जो हज़रत अबू बकर ने याद दिलाई थी: “नबी जहाँ अपनी रूह सुपुर्द करते हैं, वहीं दफ़न किए जाते हैं।” हज़रत अबू तल्हा अन्सारी ने जो क़ब्र शरीफ़ लहद की शक्ल में खोदी थी, उसमें मंगल को बुध से मिलाने वाली रात (बुध की रात) आधी रात के क़रीब आपको दफ़न किया गया। हज़रत अब्बास के बेटे क़ुसम क़ब्र का काम पूरा करके सबसे आख़िर में निकलने वाले थे। उन्होंने कहा: “रसूलुल्लाह का मुबारक चेहरा सबसे आख़िर में देखने वाला मैं हूँ। आपके मुबारक होंठ हिल रहे थे। मैंने झुककर कान लगाया, तो आप फ़रियाद कर रहे थे: ‘या रब! मेरी उम्मत!… या रब! मेरी उम्मत!…’”18 जिस दिन हमारे प्यारे नबी ने आख़िरत की तरफ़ रेहलत फ़रमाई, हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने ज़ैद ने दुआ की: “या रब! मैं यह आँख तेरे हबीब के मुबारक नूरानी चेहरे को देखने के लिए चाहता था। जब वह दिखाई न देंगे, तो अब इसका क्या करूँ! या रब, मेरी आँख ले ले!” और उनकी आँखों की रौशनी चली गई…

रसूलुल्लाह की वफ़ात पर आपकी मोहतरम फूफी सफ़िय्या बिन्ते अब्दुल मुत्तलिब (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने यह मर्सिया कहा:

या रसूलल्लाह! आप ही हमारी उम्मीद थे,
आप ही हम पर हमेशा भलाई करने वाले थे।
आप कभी नाइंसाफ़ी करने वालों में से न थे,
आप शफ़क़त वाले और राह दिखाने वालों में से थे।
और आप बयान से बाहर इल्म का समुंदर थे,
आज रोने वालों की फ़रियाद आप ही के लिए है।
आपकी राह पर मेरे सब बाप-दादा क़ुरबान हों!
मेरा माल, मेरी जान, मेरा सारा वुजूद क़ुरबान हो।
आह! काश आप अब हमारे दरमियान ज़िंदा होते,
आप रह जाते, तो हम कितने ख़ुश होते।
हक़ तआला का यही हुक्म है, हम “सब्र!” कहते हैं,
नहीं जानते क्या करें, बस फ़रियाद करते हैं।
अल्लाह का सलाम आप पर हो, या रसूलल्लाह!
जन्नत-ए-अद्न में दाख़िल होकर वहीं रहें, या रसूलल्लाह!