मेरे प्यारे नबी

मक्का की फ़तह

हिजरत का आठवाँ साल था। हुदैबिया के सुलहनामे की एक शर्त यह थी: “दोनों फ़रीक़ों से बाहर रहने वाले अरब क़बीले जिस फ़रीक़ की पनाह में चाहें, आ सकेंगे; वे मुसलमानों के साथ मिलें या मुशरिकों के साथ, इसमें आज़ाद होंगे।” इसके मुताबिक़ नबी-ए-करीम का हलीफ़ ख़ुज़ाआ क़बीला मुसलमानों की तरफ़ और बनू बक्र क़बीला मुशरिकों की तरफ़ हो गया। ख़ुज़ाआ क़बीला और बनू बक्र पुराने ज़माने से एक-दूसरे के दुश्मन थे और मौक़ा मिलते ही एक-दूसरे पर हमला कर देते थे। हुदैबिया की सुलह के बाद उन्होंने भी कुछ मुद्दत के लिए अपने हमले रोक दिए थे। लेकिन बनू बक्र इसकी पाबंदी सिर्फ़ दो साल कर सके। बनू बक्र के एक शख़्स ने हमारे प्यारे नबी की तौहीन करने वाला एक शेर पढ़ा; यह सुनकर ख़ुज़ाआ क़बीले का एक नौजवान बर्दाश्त न कर सका और उसका सिर फोड़ दिया। बनू बक्र ने इसे मौक़ा जाना और ख़ुज़ाआ क़बीले पर हमला कर दिया, जो मुआहदे की रू से ख़तरे से बेफ़िक्र था। इस हमले में क़ुरैश के मुशरिकों ने हथियार देकर और चुपके से आदमी भेजकर उनकी मदद की। हरम शरीफ़ में उन्होंने ख़ुज़ाआ क़बीले के बीस से ज़्यादा लोगों को क़त्ल कर दिया। झड़प के दौरान ख़ुज़ाआ क़बीले के कुछ मुसलमानों ने नबी-ए-करीम से मदद माँगी। ख़ुज़ाआ क़बीले पर रात में मारे गए इन छापों के ऐसे गवाह भी थे जिन्होंने बनू बक्र के बीच क़ुरैश के मुशरिकों को भी देखा था।

उस रात हमारे प्यारे नबी मदीना में हमारी माँ हज़रत मैमूना के घर में थे। आप नमाज़ के लिए उठकर वुज़ू कर रहे थे कि अल्लाह तआला की इजाज़त से मोजिज़े के तौर पर आपने सुना कि मक्का के मुसलमान आपसे मदद माँग रहे हैं। उनके जवाब में आपने फ़रमाया: “लब्बैक! मैं तुम्हारी पुकार पर हाज़िर हूँ!” मैमूना ने जब देखा कि नबी-ए-करीम के पास कोई न होते हुए भी आप इस तरह बात कर रहे हैं, तो पूछा: “या रसूलल्लाह! क्या आपके पास कोई है?”

हमारे प्यारे नबी ने उन्हें मक्का में होने वाले वाक़िए की और उसमें क़ुरैश के शरीक होने की ख़बर दी।

क़ुरैश के मुशरिकों ने बनू बक्र की मदद करके, ख़ुज़ाआ क़बीले पर छापा मारकर और उसके लोगों को क़त्ल करके हुदैबिया के सुलहनामे की शर्तों के ख़िलाफ़ काम किया था। इस तरह उन्होंने सुलहनामा तोड़ दिया था।

हमारे प्यारे नबी को यह ख़बर उसी पल मालूम हो गई थी। इसके अलावा वाक़िए के तीन दिन बाद ख़ुज़ाआ क़बीले के अम्र इब्ने सालिम चालीस सवारों के साथ आए और सारा हाल रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को सुनाया। लेकिन क़ुरैश का सरदार अबू सुफ़यान उस वक़्त तिजारत के लिए दमिश्क़ गया हुआ था; उसे इस वाक़िए की कोई ख़बर न थी। हबीबुल्लाह ने फ़रमाया: “अगर मैं बनू ख़ुज़ाआ की मदद न करूँ, तो मेरी भी मदद न की जाए!” और एक ख़त लिखवाया। क़ुरैश के मुशरिकों को भेजे गए इस ख़त में हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया था: “…या तो तुम बनू बक्र के साथ अपना गठजोड़ छोड़कर अलग हो जाओ, या बनू ख़ुज़ाआ के क़त्ल किए गए लोगों की दियत अदा करो! अगर तुमने मेरी कही इन बातों में से किसी पर भी अमल न किया, तो मैं एलान करता हूँ कि मैं तुमसे जंग करूँगा!…” क़ुरैश यह मेहरबानी भी न समझ सके। उन्होंने जवाब भेजा: “न हम अपना गठजोड़ तोड़ेंगे, न दियत अदा करेंगे! हम तो बस जंग कर सकते हैं।” लेकिन ऐसा करने पर वे हज़ार बार पछताए और डर के मारे इस इंतिज़ार में बैठ गए कि अबू सुफ़यान आकर मुआहदे को नया करवाए।

“(ऐ मक्का के मुसलमानो!) लब्बैक! मैं तुम्हारी पुकार पर हाज़िर हूँ!” हदीस शरीफ़

अबू सुफ़यान दमिश्क़ से लौटा तो उन्होंने उसे वाक़िआ सुनाया और कहा: “इस मामले को हर हाल में ठीक करना ज़रूरी है। अगर ठीक न हुआ, तो मुहम्मद हमें मक्का से निकाल देंगे!” अबू सुफ़यान ने कहा: “अगरचे मुझे इस वाक़िए की ख़बर नहीं थी, फिर भी सुलह को नया करने और उसकी मुद्दत बढ़वाने के लिए मुझे जल्दी जाना होगा”, और फ़ौरन मदीना की तरफ़ चल पड़ा।1 अबू सुफ़यान के मदीना पहुँचने से पहले ही हमारे प्यारे नबी ने अपने सहाबा-ए-किराम को उसके आने की ख़बर दे दी और फ़रमाया: “मैं यूँ समझता हूँ कि अबू सुफ़यान सुलह को नया करने और उसकी मुद्दत बढ़वाने के लिए आ रहा है। लेकिन उसकी मुराद पूरी न होगी, जैसे आया है वैसे ही लौट जाएगा!…”

अबू सुफ़यान, जो अभी मुसलमान नहीं हुआ था, मदीना मुनव्वरा आया। वह अपनी बेटी, मोमिनों की माँ और हमारे प्यारे नबी की मुबारक बीवी उम्मे हबीबा (रज़ियल्लाहु अन्हा) के घर गया। उसने हमारे प्यारे नबी के बिस्तर पर बैठना चाहा। हमारी माँ हज़रत उम्मे हबीबा ने उसके बैठने से पहले ही लपककर बिस्तर उठा लिया। उसका बाप इससे बहुत दुखी हुआ और हैरानी से बोला: “ऐ मेरी बेटी! क्या तुम यह बिस्तर मुझसे बचा रही हो?” इस पर मोमिनों की माँ हज़रत उम्मे हबीबा ने, जो रसूलुल्लाह की मुहब्बत को हर चीज़ से ऊपर रखती थीं, अपने बाप से कहा: “यह बिस्तर अल्लाह तआला के रसूल का बिस्तर है। इस पर मुशरिक नहीं बैठ सकते! तुम मुशरिक और नजिस (नापाक) हो! इस बिस्तर पर बैठना तुम्हें हरगिज़ ज़ेब नहीं देता!”

बाप ने कहा: “ऐ मेरी बेटी! मेरे घर से जाने के बाद तुम्हें कुछ हो गया है!” तो उन्होंने कहा: “अलहम्दुलिल्लाह, अल्लाह तआला ने मुझे इस्लाम नसीब फ़रमाया, और तुम हो कि अब तक न सुनने वाले, न देखने वाले पत्थर के बने बुतों को पूजते हो! ऐ अब्बा! तुम जैसा क़ुरैश का बड़ा और बुज़ुर्ग आदमी इस्लाम से दूर कैसे रह सकता है?…” उसका बाप बहुत ग़ुस्से में आ गया और बोला: “तुम मेरी इतनी बेअदबी कर रही हो और मुझ पर जहालत का इल्ज़ाम लगा रही हो! तो क्या मैं उन्हें छोड़ दूँ जिन्हें मेरे बाप-दादा बरसों से पूजते आए हैं और मुहम्मद के दीन में दाख़िल हो जाऊँ?!” और वहाँ से चला गया।2

क़ुरैश का सरदार हमारे प्यारे नबी की ख़िदमत में आया और बोला: “मैं हुदैबिया के सुलहनामे को नया करने और उसकी मुद्दत बढ़ाने आया हूँ। आइए, हमारे बीच के इस मुआहदे को एक तहरीर के ज़रिए नया कर लें!” हबीब-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “हम हुदैबिया के सुलहनामे के ख़िलाफ़ कोई काम नहीं करते और उसे बदलते भी नहीं!” क़ुरैश के सरदार ने बार-बार कहा: “सुलहनामा बदल लें! नया कर लें!…”, मगर हमारे प्यारे नबी ने उसे कोई जवाब न दिया। जब क़ुरैश के सरदार ने देखा कि उसकी सारी कोशिशें बेकार गईं, तो वह मक्का लौट गया और मुशरिकों को सारा हाल सुनाया। मुशरिकों ने उसे मलामत करते हुए कहा: “तो तुम कुछ भी किए बिना लौट आए, है न?!…” अब उनके लिए इंतिज़ार के सिवा करने को कुछ न बचा था।

जो मस्जिद-ए-हराम में पनाह ले

अबू सुफ़यान के मदीना से जाने के बाद हमारे प्यारे नबी ने मक्का फ़तह करने का फ़ैसला किया, क्योंकि क़ुरैश अपने अहद पर क़ायम न रहे थे और मुआहदा तोड़ दिया था। लेकिन आप इस राज़ को बहुत छुपाकर रख रहे थे: आप चाहते थे कि मुशरिकों को तैयारी का मौक़ा दिए बिना और हरम शरीफ़ में ख़ून बहाए बिना मक्का हाथ में आ जाए। यह एक जंगी तदबीर थी, क्योंकि मक्का फ़तह होने पर, कौन जाने, कितने ही लोग मुसलमान होने के शरफ़ से नवाज़े जाते। आपने यह बात सिर्फ़ हज़रत अबू बकर को और अपने सहाबा के कुछ बड़े लोगों को बताई। सहाबा को सफ़र की तैयारी का हुक्म दिया, लेकिन यह न बताया कि कहाँ जाना है। सहाबा-ए-किराम जिहाद की तैयारी में लग गए। इसके अलावा नबी-ए-करीम ने आसपास के मुसलमान क़बीलों – असलम, अशजा, जुहैना, हुसैन, ग़िफ़ार, मुज़ैना, सुलैम, ज़मरा क़बीलों और बनू ख़ुज़ाआ – को ख़बर भेजी। ख़बर में फ़रमाया गया था: “जो लोग अल्लाह तआला पर और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हैं, वे मुबारक रमज़ान महीने के शुरू में मदीना में मौजूद रहें।” इस तरह उन्हें जंग में शरीक होने की दावत दी गई।

हबीबुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने एहतियात के तौर पर मक्का जाने वाले रास्तों को रोककर वहाँ से राब्ता काट देने की ज़िम्मेदारी हज़रत उमर को सौंपी। हज़रत उमर ने फ़ौरन पहाड़ी रास्तों, दर्रों और दूसरे नाकों पर पहरेदार बिठा दिए और हुक्म दिया: “जो कोई मक्का जाना चाहे, उसे वापस लौटा देना!”

यह काम छुपकर अंजाम पाए, इसके लिए हमारे प्यारे नबी अल्लाह तआला से यूँ दुआ कर रहे थे: “या रब! जब तक हम अचानक उनके वतन न पहुँच जाएँ, क़ुरैश के जासूसों और ख़बररसानों को रोक ले, उन्हें न कुछ देखने दे, न सुनने दे। वे हमें अचानक ही देखें और सुनें!”

यह तअस्सुर देने के लिए कि उत्तर के मुशरिकों या रूम वालों पर चढ़ाई की जाएगी, नबी-ए-करीम ने हज़रत अबू क़तादा को एक फ़ौजी दस्ते के साथ उत्तर में इज़ाम घाटी की तरफ़ भेजा। इसी बीच हमारे प्यारे नबी ने मोजिज़े के तौर पर एक ख़त की ख़बर दी, जो मदीना की तैयारियों की इत्तिला मक्का के मुशरिकों को देने के लिए भेजा गया था। आपने हज़रत अली को भेजकर वह ख़त पकड़वा लिया।

रमज़ान महीने की दूसरी तारीख़ तक आसपास के क़बीलों से मदद आ गई और सब अबू इनबा कुएँ के पास वाली लश्करगाह में जमा हो गए। सहाबा-ए-किराम की तादाद बारह हज़ार तक पहुँच गई। इनमें चार हज़ार अन्सार, सात सौ मुहाजिर और बाक़ी आसपास के मुसलमान क़बीलों से थे।3

हमारे प्यारे नबी ने मदीना में अपनी जगह हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उम्मे मकतूम को छोड़ा।4 हज़रत ज़ुबैर इब्ने अव्वाम को दो सौ सवारों के एक दस्ते का सरदार बनाकर टोही दस्ते के तौर पर आगे भेजा। हिजरत के आठवें साल, मुबारक रमज़ान महीने की दसवीं तारीख़ को, बुध के दिन, सारे जहानों के सरदार अल्लाह तआला का नाम लेकर अपने बारह हज़ार के उस अज़ीम लश्कर के आगे-आगे मदीना से रवाना हुए, जिसके सिपाहियों के दिल अल्लाह तआला और उसके रसूल की मुहब्बत से भरे हुए थे। वे अपने वतन मक्का जा रहे थे, जहाँ से आठ साल पहले उन्हें सताकर और उन पर ज़ुल्म करके हिजरत पर मजबूर किया गया था। अज़ीम काबा को, जिसे बुतख़ाना बना दिया गया था, बुतों से पाक करने जा रहे थे…

अपनी ज़िद से किसी तरह बाज़ न आने वाले मुशरिकों को हक़, इंसाफ़ और रहमत दिखाने जा रहे थे… अल्लाह तआला के दीन को फैलाने और वहाँ के लोगों को जहन्नम के हमेशा के अज़ाब से बचाने का ज़रिया बनने जा रहे थे। या रब! यह कितनी बड़ी रहमत थी!… इस्लामी लश्कर ज़ुल हुलैफ़ा पहुँचा तो नबी-ए-करीम के चचा हज़रत अब्बास से मुलाक़ात हुई, जो अपने घर वालों के साथ मक्का से हिजरत करके आ रहे थे। हमारे प्यारे नबी अपने चचा के आने से बहुत ख़ुश हुए और उनका दिल बढ़ाते हुए फ़रमाया: “ऐ अब्बास! जिस तरह मैं नबियों में आख़िरी हूँ, उसी तरह तुम मुहाजिरों में आख़िरी हो।” आपने हज़रत अब्बास का सामान मदीना भेज दिया। हज़रत अब्बास नबी-ए-करीम के साथ रहे और मक्का की फ़तह में शरीक हुए।5 रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मक्का के क़रीब क़ुदैद पहुँचे तो आपने अपने शान वाले सहाबा को जंगी तरतीब में खड़ा किया। हर क़बीले को अलग-अलग झंडे दिए और उन्हें हर क़बीले के अलमबरदार के सुपुर्द किया। मुहाजिरों के झंडे हज़रत अली, ज़ुबैर इब्ने अव्वाम और साद इब्ने अबी वक़्क़ास (रज़ियल्लाहु अन्हुम) उठाए हुए थे। अन्सार के बारह अलमबरदार थे; अशजा और सुलैम क़बीलों के एक-एक, मुज़ैना क़बीले के तीन, असलम क़बीले के दो, बनू ख़ुज़ाआ के तीन और जुहैना क़बीले के चार अलमबरदार थे।6 मदीना से निकले दस दिन हो चुके थे। शाम होते-होते वे मक्का के बहुत क़रीब आ गए और इशा के वक़्त मर्रुज़ ज़हरान पहुँच गए। नबी-ए-करीम ने अपने सहाबा को यहाँ ठहरने का हुक्म दिया। साथ ही आपने हज़रत उमर को ज़िम्मेदारी देकर हर मुजाहिद को आग जलाने का हुक्म भी दिया।7 एक ही पल में दस हज़ार से ज़्यादा अलाव जल उठे तो मक्का रौशनी में नहा गया। किसी बात से बेख़बर मक्का के मुशरिक हक्के-बक्के रह गए। क्या हुआ है, यह जानने के लिए उन्होंने अबू सुफ़यान को भेजा। वह कुछ लोगों को साथ लेकर छुपते-छुपाते इस्लामी लश्कर की तरफ़ बढ़ा। उसी वक़्त हमारे प्यारे नबी ने अपने कुछ सहाबा से फ़रमाया: “अबू सुफ़यान पर नज़र रखो। तुम उसे ज़रूर पा लोगे!” क़ुरैश के लोग जितना आगे बढ़ते, उनकी हैरानी उतनी ही बढ़ती जाती और उनके दिलों पर ख़ौफ़ छा जाता। मक्का के आसपास कितना बड़ा लश्कर जमा हो गया था और उन्होंने कितनी ज़्यादा आग जलाई थी!… यही बातें करते-करते वे अराक नाम की जगह पहुँचे।

“या रब! जब तक हम अचानक उनके वतन न पहुँच जाएँ, क़ुरैश के जासूसों और ख़बररसानों को रोक ले, उन्हें न कुछ देखने दे, न सुनने दे। वे हमें अचानक ही देखें और सुनें!” हदीस शरीफ़

ठीक उसी वक़्त नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “अबू सुफ़यान इस वक़्त अराक में है।” तब हज़रत अब्बास ने अपने आप से कहा: “वहाँ ज़रूर किसी को ढूँढकर मक्का भेजूँ, ताकि वह उन्हें ख़बर दे कि इस्लामी लश्कर उन पर चढ़ा आ रहा है, और मक्का वाले जंग शुरू होने से पहले रसूल अलैहिस्सलाम के पास आकर अमान माँग लें”, और फ़ौरन अराक की तरफ़ चल पड़े। इसके लिए वहाँ किसी को ढूँढते हुए उन्होंने अबू सुफ़यान को उसकी आवाज़ से पहचान लिया और पुकारा: “ऐ अबू हंज़ला!” अबू सुफ़यान ने भी उन्हें पहचान लिया और कहा: “ऐ अबुल फ़ज़्ल! अरे, यह तुम हो! मेरे माँ-बाप तुम पर क़ुरबान!” फिर दोनों मिलकर इस्लामी लश्करगाह की तरफ़ चल पड़े…

रास्ते में अबू सुफ़यान ने हज़रत अब्बास से पूछा: “क्या ख़बरें हैं?” उन्होंने कहा: “ऐ अबू सुफ़यान! अफ़सोस है तुम पर! रसूल अलैहिस्सलाम ऐसे लश्कर के साथ तुम पर चढ़े आ रहे हैं जिसका तुम मुक़ाबला नहीं कर सकते। क़सम खाता हूँ, क़ुरैश का बहुत बुरा हाल होगा। हाय, उन पर क्या-क्या गुज़रने वाला है!” अबू सुफ़यान और उसके साथी बड़ी उम्मीद के साथ मुजाहिदों के बीच से गुज़रकर हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की मुबारक ख़िदमत में हाज़िर हुए। कायनात के सुल्तान ने उनका अच्छा इस्तिक़बाल किया और मक्का वालों का हाल पूछा। देर रात तक बातचीत के बाद आपने उन्हें इस्लाम की दावत दी। हकीम इब्ने हिज़ाम और बुदैल ने फ़ौरन कलिमा-ए-शहादत पढ़कर इस्लाम क़बूल कर लिया (रज़ियल्लाहु अन्हुमा)। लेकिन अबू सुफ़यान अब भी हिचकिचा रहा था। सुबह हुई तो रहमत के समुंदर हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “ऐ अबू सुफ़यान! अफ़सोस है तुम पर! क्या अब भी यह जानने का वक़्त नहीं आया कि अल्लाह तआला के सिवा कोई इलाह नहीं?” उसने कहा: “मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान! नर्म मिज़ाजी में, शराफ़त में और रिश्तेदारी का हक़ निभाने में आपसे बढ़कर कोई नहीं। हमने आप पर इतने ज़ुल्म किए, इसके बाद भी आप हमें हिदायत (सीधे रास्ते) की तरफ़ बुला रहे हैं। आप कितने करम वाले हैं! मैंने यक़ीन कर लिया कि अल्लाह के सिवा कोई इलाह नहीं… अगर कोई और इलाह होता, तो मुझे उससे कुछ फ़ायदा पहुँचता। आप अल्लाह के रसूल हैं।” इन अल्फ़ाज़ के साथ अबू सुफ़यान सहाबा-ए-किराम में शामिल होने के शरफ़ से नवाज़े गए, रज़ियल्लाहु अन्हु।8

हज़रत अब्बास ने कहा: “या रसूलल्लाह! क्या आप अबू सुफ़यान को कोई ऐसी चीज़ अता न फ़रमाएँगे जिससे मक्का वालों के बीच उनकी इज़्ज़त बढ़े?” नबी-ए-करीम ने इसे क़बूल फ़रमाया और फ़रमाया: “जो अबू सुफ़यान के घर में दाख़िल होकर पनाह ले, उसे अमान दी गई, वह क़त्ल होने से बच जाएगा।” हज़रत अबू सुफ़यान ने गुज़ारिश की: “या रसूलल्लाह! क्या आप इसे कुछ और बढ़ा देंगे?” तो हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “जो मस्जिद-ए-हराम में दाख़िल होकर पनाह ले, उसे अमान दी गई! जो अपना दरवाज़ा बंद करके घर में बैठा रहे, उसे अमान दी गई।” रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) चाहते थे कि अबू सुफ़यान इस्लामी लश्कर की हैबत और कसरत देखें और मक्का के मुशरिकों को इसके बारे में बताएँ; इसलिए आपने हज़रत अब्बास से फ़रमाया: “उन्हें उस पहाड़ी दर्रे पर ले जाओ जहाँ घाटी तंग हो जाती है और घोड़े ठसाठस होकर गुज़रते हैं। वह मुसलमानों की, अल्लाह तआला के लश्कर की शान-ओ-शौकत देखें।”

अबू सुफ़यान को यह देखना ही था, ताकि जिस मंज़र के वह गवाह बनें, उसे मुशरिकों को बताएँ और कोई मुक़ाबले पर न उठे… इस तरह हरम शरीफ़ में ख़ून न बहे… हज़रत अब्बास जब अबू सुफ़यान के साथ पहाड़ी दर्रे की तरफ़ जा रहे थे, तो मुजाहिदों ने जंगी तरतीब इख़्तियार कर ली। हर क़बीला अपने झंडे लहराता हुआ दर्रे से गुज़रने लगा। हर एक ज़िरह पहने हुए और हथियारबंद था। हर गिरोह गुज़रते वक़्त तकबीर कहता था। हज़रत अबू सुफ़यान पूछते: “ये कौन हैं?” और हज़रत अब्बास जवाब देते: “ये बनू सुलैम हैं! इनके सिपहसालार ख़ालिद इब्ने वलीद हैं!”, “ये बनू ग़िफ़ार हैं!”, “ये बनू कअब हैं!…” “अल्लाहु अकबर! अल्लाहु अकबर!” की सदाएँ ज़मीन और आसमान को भर रही थीं, मुजाहिदों की कसरत और हथियारों की चमक आँखों को चौंधिया रही थी। हज़रत अबू सुफ़यान को सबसे ज़्यादा जिनका इंतिज़ार था, वह फ़ख़्र-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) थे। वह आपके आसपास के सिपाहियों के गुज़रने का बड़ी बेचैनी से इंतिज़ार कर रहे थे और सोच रहे थे कि वे दूसरों से अलग होंगे। इसी लिए वह बार-बार यह पूछे बिना न रह पाते: “क्या यह रसूलुल्लाह का दस्ता है?”… आख़िरकार नबियों के सुल्तान, सारे जहानों के सरदार सूरज की तरह नूर बिखेरते हुए अपनी ऊँटनी क़सवा पर दिखाई दिए। आपके आसपास मुहाजिर और अन्सार थे। वे सब सिर से पाँव तक दाऊदी ज़िरहों में लिपटे हुए, हिन्दी तलवारें बाँधे, उम्दा नस्ल के घोड़ों और ऊँटों पर सवार थे।

उन्हें देखकर हज़रत अबू सुफ़यान ने बड़े शौक़ से पूछा: “ऐ अब्बास! ये कौन हैं?” उन्होंने कहा: “बीच में रसूल अलैहिस्सलाम हैं, और आपके आसपास शहादत के शौक़ में जलने वाले अन्सार और मुहाजिर हैं!…” उनके पास से गुज़रते हुए हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हज़रत अबू सुफ़यान से फ़रमाया: “आज वह दिन है जिसमें अल्लाह तआला काबा की शान बुलंद करेगा। आज वह दिन है जिसमें बैतुल्लाह पर ग़िलाफ़ चढ़ाया जाएगा! आज रहमत का दिन है… आज वह दिन है जिसमें अल्लाह तआला क़ुरैश को (इस्लाम के ज़रिए) इज़्ज़त देगा।”

हज़रत अबू सुफ़यान जो देखना था, देख चुके थे, जो सुनना था, सुन चुके थे। उन्होंने कहा: “मैंने रूम के बादशाह (क़ैसर) की भी और ईरान के बादशाह (किसरा) की भी सल्तनत देखी है, लेकिन ऐसी शान-ओ-शौकत वाली कोई नहीं देखी। मेरा कभी आज जैसे लश्कर और ऐसे मजमे से सामना नहीं हुआ। ऐसे लश्कर का कोई मुक़ाबला नहीं कर सकता। उन पर किसी का बस नहीं चल सकता।” और उन्होंने मक्का की राह ली…

“जो अबू सुफ़यान के घर में दाख़िल होकर पनाह ले, उसे अमान दी गई, वह क़त्ल होने से बच जाएगा… जो मस्जिद-ए-हराम में दाख़िल होकर पनाह ले, उसे अमान दी गई! जो अपना दरवाज़ा बंद करके घर में बैठा रहे, उसे अमान दी गई” हदीस शरीफ़

अबू सुफ़यान मक्का लौटे और बेचैनी से उनका इंतिज़ार कर रहे मुशरिकों के सामने अपने मुसलमान होने का एलान किया। फिर उन्होंने कहा: “ऐ क़ुरैश के लोगो! मुहम्मद अलैहिस्सलाम इतने बड़े लश्कर के साथ तुम्हारे सिर पर आ पहुँचे हैं जिसका तुम मुक़ाबला नहीं कर सकते। अपने आपको बेकार धोखा मत दो। मुसलमान हो जाओ, ताकि बच जाओ। मैंने वह देखा है जो तुमने नहीं देखा। मैंने अनगिनत बहादुर, घोड़े और हथियार देखे हैं। उन पर किसी का बस नहीं चल सकता। जो अबू सुफ़यान के घर में दाख़िल हो, उसे अमान दी गई, वह क़त्ल होने से बच गया। जो बैतुल्लाह में पनाह ले, उसे अमान दी गई। जो अपने घर में जाकर दरवाज़ा बंद कर ले, उसे भी अमान दी गई।”9

इस पर मुशरिकों के कुछ सबसे सरकश लोग हज़रत अबू सुफ़यान के ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए और उनकी तौहीन की। यहाँ तक कि वे इस्लामी लश्कर का मुक़ाबला करने के लिए जल्दी-जल्दी तैयारी करने लगे। लेकिन उनकी तादाद बहुत कम थी। बाक़ी लोग उनकी परवाह किए बिना अपने घरों की तरफ़ दौड़ पड़े। कुछ ने मस्जिद-ए-हराम में पनाह ली।

सरवर-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) और शान वाले सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ज़ी तुवा घाटी में आकर जमा हुए। सारे जहानों के सरदार ने अपनी मुबारक आँखों से अपने सहाबा-ए-किराम पर एक नज़र डाली तो आपको आठ साल पहले मक्का से अपना निकलना, अपनी हिजरत याद आ गई। आपको याद आया कि उस वक़्त मुशरिकों ने आपके सआदतख़ाने को घेर लिया था, आप सूरह यासीन की आयात-ए-करीमा पढ़ते हुए बाहर निकले थे, हज़रत अबू बकर के साथ किसी को दिखाई दिए बिना ग़ार-ए-सौर में दाख़िल हुए थे, और मक्का की सरहद से निकलने से पहले आख़िरी बार उसे देखकर आपने फ़रमाया था:

“(ऐ मक्का!) अल्लाह की क़सम, मैं जानता हूँ कि तू अल्लाह तआला की पैदा की हुई जगहों में सबसे बेहतर है। मेरे रब के नज़दीक भी और मेरे नज़दीक भी तू उनमें सबसे प्यारी है। अगर मुझे तुझसे ज़बरदस्ती न निकाला जाता, तो मैं तुझसे कभी न निकलता, कभी जुदा न होता।” आपको यह भी याद आया कि इस ग़म की हालत में जिबराईल अलैहिस्सलाम ने सूरह क़सस की 85वीं आयत-ए-करीमा पढ़कर आपके मुबारक दिल को तसल्ली दी थी और मक्का मुकर्रमा लौटने की ख़ुशख़बरी दी थी, और यह भी कि मुट्ठी भर सहाबा के साथ आपने बद्र में, उहुद में, ख़न्दक़ में, ख़ैबर में और मूता में दुश्मनों पर किस तरह फ़तह पाई थी। अब बारह हज़ार सहाबा परवानों की तरह आपके गिर्द थे और मक्का में दाख़िल होने के लिए आपके एक हुक्म के मुंतज़िर थे। सरवर-ए-आलम का दिल एहसानमंदी और शुक्र के सबसे गहरे जज़्बात से भर गया, और आपने उस अल्लाह तआला की हम्द की जिसने यह सब अता फ़रमाया था। आजिज़ी से अपना मुबारक सिर झुका लिया। फ़ख़्र-ए-कायनात ने अपने बहादुर सहाबा को चार गिरोहों में बाँटा। दाएँ बाज़ू की कमान हज़रत ख़ालिद इब्ने वलीद को, बाएँ बाज़ू की कमान हज़रत ज़ुबैर इब्ने अव्वाम को, पैदल सिपाहियों की सरदारी हज़रत अबू उबैदा इब्ने जर्राह को और बाक़ी गिरोह की सरदारी हज़रत साद इब्ने उबादा को सौंपी। हज़रत ख़ालिद को मक्का में दक्षिण से दाख़िल होना था, मुशरिकों में से जो मुक़ाबले पर आए उसे सज़ा देनी थी और सफ़ा पहाड़ी पर फ़ख़्र-ए-कायनात से आ मिलना था। हज़रत ज़ुबैर को मक्का में उत्तर से दाख़िल होकर हजून नाम की जगह पर अपना झंडा गाड़ना और सरवर-ए-आलम का इंतिज़ार करना था। पश्चिम से हज़रत साद इब्ने उबादा को आगे बढ़ना था।10

“आज वह दिन है जिसमें अल्लाह तआला काबा की शान बुलंद करेगा। आज वह दिन है जिसमें बैतुल्लाह पर ग़िलाफ़ चढ़ाया जाएगा! आज रहमत का दिन है… आज वह दिन है जिसमें अल्लाह तआला क़ुरैश को (इस्लाम के ज़रिए) इज़्ज़त देगा” हदीस शरीफ़

रसूल-ए-अकरम ने अपने सिपहसालारों से फ़रमाया: “जब तक तुम पर हमला न किया जाए, किसी से हरगिज़ न लड़ना। किसी को क़त्ल न करना।” लेकिन जिन लोगों के नाम बताए गए थे, उनमें से जो भी पकड़ा जाता, चाहे वह काबा के ग़िलाफ़ के नीचे ही क्यों न छुपा हो, उसकी गर्दन उड़ा दी जानी थी।11

हक़ आ गया, बातिल मिट गया

इकरिमा इब्ने अबी जहल, सफ़वान इब्ने उमय्या और सुहैल इब्ने अम्र, बनू बक्र और बनू हारिस के कुछ लोगों के साथ, ख़ालिद इब्ने वलीद के आने की ख़बर सुनकर रास्ते का नाका रोककर इंतिज़ार करने लगे। मुजाहिदों में सबसे पहले हरकत में आने वाले हज़रत ख़ालिद इब्ने वलीद थे। मक्का के दक्षिण में ख़न्दमा पहाड़ के दामन में पहुँचे तो उन्होंने देखा कि सरकश क़ुरैशी मुशरिक उन पर तीरों की बौछार कर रहे हैं। दो मुजाहिद शहीद हो गए: एक कुर्ज़ इब्ने जाबिर, दूसरे हबश इब्ने अशअर। हज़रत ख़ालिद ने जंगी तरतीब में खड़े अपने सिपाहियों को हुक्म दिया: “सिर्फ़ हारकर भागने वालों को क़त्ल नहीं किया जाएगा”, और वे आगे झपटे। एक ही पल में मुशरिकों को पीछे धकेलकर वे मस्जिद-ए-हराम तक बढ़ गए। झड़प के दौरान सत्तर मुशरिक मारे गए।12 मुशरिकों में से कुछ पहाड़ों की चोटियों पर और कुछ अपने घरों में भाग गए।

मक्का मुकर्रमा की फ़तह

मुक़द्दस मक्का में दूसरी तरफ़ों से दाख़िल होने वाले शान वाले सहाबा को किसी मुक़ाबले का सामना न करना पड़ा। जिनके क़त्ल का हुक्म दिया गया था, उनमें से पाँच पकड़े गए और उन्हें फ़ौरन सज़ा दे दी गई। बाक़ी मक्का से भाग गए। रमज़ान की बीसवीं तारीख़, जुमेरात के दिन मुजाहिद बड़े जोश के साथ, लहर-दर-लहर, “अल्लाहु अकबर! अल्लाहु अकबर!” की तकबीरों के बीच मक्का में दाख़िल हो रहे थे। सरवर-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपनी ऊँटनी क़सवा पर, अपने पीछे उसामा इब्ने ज़ैद को बिठाए, बड़ी आजिज़ी के साथ अपनी पैदाइश के शहर मुक़द्दस मक्का में दाख़िल हो रहे थे। आप उस अल्लाह तआला की हम्द कर रहे थे जिसने आपको ये दिन दिखाए, और मक्का की फ़तह की ख़ुशख़बरी देने वाली सूरह फ़तह की तिलावत फ़रमा रहे थे।

फ़ख़्र-ए-कायनात बड़ी ख़ुशी के साथ अपने फ़ातेह सहाबा के बीच काबा मुअज़्ज़मा की तरफ़ बढ़े। दाईं तरफ़ हज़रत अबू बकर और बाईं तरफ़ हज़रत उसैद इब्ने हुज़ैर के साथ आप काबा मुअज़्ज़मा के क़रीब पहुँचे। हजर-ए-असवद (काले पत्थर) की ज़ियारत के बाद आपने तल्बिया और तकबीर कही। सहाबा ने आपका साथ दिया और “अल्लाहु अकबर! अल्लाहु अकबर!” की आवाज़ों से मक्का मुकर्रमा का आसमान गूँजने लगा। इस बुलंद मंज़र के सामने मुसलमान ख़ुशी के आँसू बहा रहे थे, जबकि हरम शरीफ़ में पनाह लिए हुए या अपने घरों में बंद मुशरिक डर के मारे इंतिज़ार कर रहे थे।

फिर सारे जहानों के सरदार और आपके शान वाले सहाबा ने तवाफ़ शुरू किया। सातवाँ चक्कर पूरा करने के बाद हमारे प्यारे नबी अपनी ऊँटनी से उतरे और मक़ाम-ए-इब्राहीम पर दो रकअत नमाज़ पढ़ी। फिर हज़रत अब्बास का कुएँ से निकाला हुआ ज़मज़म का पानी पिया। आपने ज़मज़म से वुज़ू करना चाहा। फ़ख़्र-ए-कायनात जब वुज़ू कर रहे थे, तो सहाबा-ए-किराम वुज़ू का वह पानी, जो हमारे प्यारे नबी के मुबारक जिस्म को छूकर गिरता, ज़मीन पर पहुँचने से पहले ही हवा में लपकने लगे। यह देखकर मुशरिक हैरान रह गए और बोले: “हमने अपनी ज़िंदगी में ऐसा बादशाह न कभी देखा, न सुना।” सरवर-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने चाहा कि काबा के आसपास पत्थर और लकड़ी के बने तमाम बुत गिरा दिए जाएँ। आपने अपने मुबारक हाथ की छड़ी बुतों की तरफ़ बढ़ाई और वह आयत-ए-करीमा पढ़ी जिसका मफ़हूम है: “हक़ आता है तो बातिल चला जाता है; बातिल तो हमेशा मिटने ही वाला है।”13 जिस बुत को भी छड़ी छूती, वह एक-एक करके मुँह के बल गिर पड़ता। तीन सौ साठ बुत ज़मीन के बराबर कर दिए गए।14 ज़ुहर का वक़्त हुआ तो रसूल-ए-अकरम ने हज़रत बिलाल को काबा में अज़ान-ए-मुहम्मदी देने का हुक्म दिया। उन्होंने फ़ौरन यह मुक़द्दस ज़िम्मेदारी अदा की। अज़ान दी जा रही थी तो मोमिनों के दिलों में बेहद ख़ुशी पैदा हो रही थी, जबकि मुशरिक भारी दर्द और ग़म से घुले जा रहे थे।15

हमारे प्यारे नबी ने काबा की चाबी मँगवाई। चाबी लाई गई। अंदर की तस्वीरें और गिराए गए तमाम बुत बाहर निकलवाने के बाद आप काबा में दाख़िल हुए।

आपके साथ हज़रत उसामा इब्ने ज़ैद, हज़रत बिलाल और हज़रत उस्मान इब्ने तल्हा थे। अंदर नबी-ए-करीम ने दरवाज़े को अपने पीछे रखकर दो रकअत नमाज़ पढ़ी। हर कोने में तकबीर कहकर दुआ फ़रमाई। हज़रत ख़ालिद इब्ने वलीद दरवाज़े के सामने खड़े थे और लोगों को वहाँ भीड़ लगाने से रोकने की कोशिश कर रहे थे।

“हक़ आता है तो बातिल चला जाता है; बातिल तो हमेशा मिटने ही वाला है” इसरा: 81

कायनात के सुल्तान अपने दोनों मुबारक हाथों से काबा के दरवाज़े के दोनों पट थामे हुए थे। सारे क़ुरैश मस्जिद-ए-हराम में भर गए थे और डर मिली उम्मीद के साथ हमारे प्यारे नबी को देख रहे थे। क्योंकि उन्होंने नबी-ए-करीम की तौहीन की थी, आपको मारने पर उतर आए थे, आपकी जान लेने की कोशिश की थी!… आपके सहाबा पर हर तरह के ज़ुल्म ढाए थे। उनकी गर्दनों में रस्सियाँ बाँधकर उन्हें घसीटा था। आग में डालकर जलाने की कोशिश की थी। तपती चट्टानें उनके सीनों पर रखकर बेहोश होने तक उन्हें सताया था। आग में तपाई हुई सलाख़ें उनके जिस्मों में घुसेड़ी थीं। तीन साल तक उन्हें भूखा-प्यासा एक मोहल्ले में क़ैद करके हर चीज़ से महरूम रखा था। उनके पाँव ऊँटों से बाँधकर और ऊँटों को अलग-अलग तरफ़ हाँककर उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे। सबसे बढ़कर, उन्हें उनके वतन से निकाल दिया था। मानो इतना काफ़ी न हो, उन्हें पूरी तरह मिटा देने के लिए कितनी ही बार जंग की थी। लेकिन इन सब के बावजूद वे उम्मीद लगाए हुए थे, क्योंकि उनके सामने सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजे गए रहमत के समुंदर खड़े थे। कुछ देर उन्हें देखने के बाद हमारे प्यारे नबी ने फ़रमाया: “ऐ क़ुरैश के लोगो! अब तुम्हारा क्या ख़याल है, मैं तुम्हारे साथ क्या करूँगा?” उन्होंने कहा: “हम आपसे भलाई की उम्मीद रखते हैं, भलाई की आस लगाए हैं, क्योंकि आप करम वाले भाई हैं। आप करम और नेकी वाले हमारे भाई के बेटे हैं। आप हम पर ग़ालिब आ गए। हम आपसे भलाई की उम्मीद रखते हैं।” रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) उनकी तरफ़ देखकर मुस्कुराए और फ़रमाया: “मेरा और तुम्हारा मामला वैसा ही होगा जैसा यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपने भाइयों से कहा था। उन्हीं की तरह मैं भी कहता हूँ: ’आज मैं तुमसे तुम्हारे किए का कोई हिसाब नहीं लूँगा (तुम्हारी ग़लतियाँ तुम्हारे मुँह पर नहीं मारूँगा)। अल्लाह तआला तुम्हारी मग़फ़िरत फ़रमाए।’16 जाओ। तुम आज़ाद हो, तुम छोड़ दिए गए।”

इस अज़ीम रहमत ने सख़्त दिलों को नर्म कर दिया, नफ़रत को मुहब्बत में बदल दिया। सारे जहानों के सरदार ने उन्हें इस्लाम की दावत दी तो वे मुसलमान होने के लिए जमा हो गए।

हमारे प्यारे नबी सफ़ा पहाड़ी पर चढ़े, जहाँ आपने क़ुरैश को अपनी नुबुव्वत की ख़बर देकर पहली बार इस्लाम की दावत दी थी। वहाँ आपने फिर से छोटे-बड़े, औरत-मर्द, सारे मक्का वालों की बैअत क़बूल फ़रमाई। इस तरह क़ुरैश मुसलमान होकर सहाबा-ए-किराम में शामिल होने के शरफ़ से नवाज़े गए। मर्दों से अहद लेने के बाद औरतों से भी कुछ बातों पर वादा लिया गया।17 अल्लाह तआला के साथ शिर्क न करना, नबी-ए-करीम की नाफ़रमानी न करना, चोरी न करना, अपनी इफ़्फ़त और इज़्ज़त की हिफ़ाज़त करना, बोहतान (झूठा इल्ज़ाम) न लगाना और बेटियों को क़त्ल न करना इन्हीं बातों में से थे। नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ख़िदमत में मौजूद औरतों ने ये सब बातें क़बूल कीं और सिर्फ़ ज़बानी अहद किया। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उनके लिए भलाई की दुआ फ़रमाई और उनकी बख़्शिश चाही।

अबू सुफ़यान की बीवी और मुआविया (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) की माँ हिन्द (रज़ियल्लाहु अन्हा) भी उनमें थीं, बल्कि उनकी सरदार थीं। इस बैअत-ए-निसा (औरतों की बैअत) में औरतों की तरफ़ से उन्होंने बात की। (इस अहद की वजह से और इस इस्तिग़फ़ार की दुआ पाने की वजह से उनके कामयाब होने की बड़ी उम्मीद है। मुसलमान औरतों में से जो कोई भी इन शर्तों को क़बूल करके इन पर अमल करे, वह इस अहद में शामिल मानी जाती है और इस दुआ से फ़ायदा उठाती है।) मुसलमान होने वाले हर शख़्स ने अपने घर के सारे बुत तोड़ डाले। आसपास के क़बीलों में फ़ौजी दस्ते भेजे गए और वहाँ के बुत भी ज़मीन के बराबर कर दिए गए। इस तरह हक़ के आने से बातिल की जड़ उखाड़ दी गई।

सज़ा के हुक्म वाले लोग

इस्लाम के शुरू के दिनों से हिजरत के आठवें साल तक अलग-अलग जुर्मों की वजह से कुछ लोगों के क़त्ल का हुक्म दिया गया था। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उनके (मर्दों में से ग्यारह और औरतों में से छह के) नाम बताए और हुक्म दिया: “इन लोगों को जहाँ देखो, वहीं क़त्ल कर दो।” सज़ा के हुक्म वाले मर्द ये थे: इकरिमा इब्ने अबी जहल, वहशी इब्ने हर्ब हब्शी, अब्दुल्लाह इब्ने अबी सरह, हब्बार इब्ने असवद, सफ़वान इब्ने उमय्या, कअब इब्ने ज़ुहैर, अब्दुल्लाह इब्ने ज़बारी, अब्दुल उज़्ज़ा इब्ने ख़तल, हुवैरिस इब्ने मुआज़, मक़ीस इब्ने सबाबा और हारिस इब्ने तुला। औरतें ये थीं: हिन्द बिन्ते उत्बा, क़रीता, क़रीते, इब्ने हंज़ला की एक और कनीज़, बनू अब्दुल मुत्तलिब की कनीज़ सारा और उम्मे साद।

रहमत पाने वाले

हिन्द बिन्ते उत्बा: मुसलमान होने वाली औरतों में हज़रत अबू सुफ़यान की बीवी हिन्द भी थीं, जिनका नाम क़त्ल किए जाने वालों की फ़ेहरिस्त में था। लेकिन सारे जहानों के लिए रहमत हमारे प्यारे नबी ने उन्हें भी माफ़ कर दिया था। वह मुसलमानों को तकलीफ़ें और ईज़ाएँ पहुँचाती थी। हज़रत हमज़ा और उहुद के दूसरे शहीदों के साथ जो बदसुलूकी की गई थी, वह उसी के कहने पर की गई थी। मक्का की फ़तह के दिन फ़ख़्र-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) सफ़ा पहाड़ी पर चढ़कर बैठ गए। हज़रत उमरुल फ़ारूक़ आपसे नीचे बैठे। पहले मर्द, फिर औरतें आईं और एक-एक करके मुसलमान हुए। औरतों में हज़रत अली की बहन उम्मे हानी और हज़रत मुआविया की माँ हिन्द भी थीं। उन्होंने रसूलुल्लाह से बैअत की। औरतों की तरफ़ से रसूलुल्लाह से अहद किया। मुबारक दुआ से नवाज़ी गईं।

इकरिमा इब्ने अबी जहल: यह अबू जहल के बेटे थे। रहमत पाने वाले मर्दों में वह भी थे। फ़तह के दिन उसने एक सहाबी को शहीद किया और यमन भाग गया। यह ख़बर रसूलुल्लाह तक पहुँची तो आप मुस्कुराए। सहाबा ने इसकी वजह पूछी तो आपने फ़रमाया: “इकरिमा और जिसे इकरिमा ने शहीद किया, वे दोनों हाथ में हाथ डाले जन्नत में घूम रहे हैं।” उसकी बीवी उम्मे हकीम बिन्ते हारिस इब्ने हिशाम औरतों की बैअत में मुसलमान हुई थीं और उन्होंने रसूलुल्लाह से इकरिमा के लिए अमान माँगी थी। वह उम्मे हकीम के साथ मक्का लौटे और रसूलुल्लाह की ख़िदमत में हाज़िर होकर माफ़ी माँगी। रसूलुल्लाह ने भी हाथ उठाकर उनके लिए मग़फ़िरत की दुआ फ़रमाई। इकरिमा (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने ईमान लाने के बाद बड़ी मेहनत और जोश दिखाया। वह सहाबा-ए-किराम के बहादुरों में से हुए। उन्होंने उमान में और यमन में जिहाद किया और यरमूक की जंग में शहीद हुए।

वहशी इब्ने हर्ब हब्शी: उसने उहुद के ग़ज़वे में हज़रत हमज़ा (रज़ियल्लाहु अन्हु) को शहीद किया था। मुसलमान उसे क़त्ल करने के बहुत ख़्वाहिशमंद थे। उहुद में रसूलुल्लाह ने कुछ काफ़िरों के लिए बद्दुआ फ़रमाई थी। जब आपसे पूछा गया: “आप वहशी पर लानत क्यों नहीं करते?”, तो आपने फ़रमाया: “मेराज की रात मैंने हमज़ा और वहशी को बाँह में बाँह डाले एक साथ जन्नत में दाख़िल होते देखा था।” मक्का की फ़तह के दिन वहशी भाग गया। फिर पछताकर ताइफ़ वालों के साथ मदीना आए, मस्जिद में हाज़िर हुए और सलाम किया। रसूलुल्लाह ने उनके सलाम का जवाब दिया। वह ईमान ले आए और माफ़ी से नवाज़े गए। लेकिन उन्हें यमामा की तरफ़ जाने का हुक्म दिया गया। वह रसूलुल्लाह के सामने बहुत शर्मिंदा रहे और सिर झुकाकर ज़िंदगी गुज़ारी। फिर कभी मदीना न आए। ईमान लाने पर वह बिल्कुल पाक-साफ़ हो गए। तमाम औलिया से बुलंद हो गए।

“मेरा और तुम्हारा मामला वैसा ही होगा जैसा यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपने भाइयों से कहा था। उन्हीं की तरह मैं भी कहता हूँ: ‘आज मैं तुमसे तुम्हारे किए का कोई हिसाब नहीं लूँगा (तुम्हारी ग़लतियाँ तुम्हारे मुँह पर नहीं मारूँगा)। अल्लाह तआला तुम्हारी मग़फ़िरत फ़रमाए’ (सूरह यूसुफ़: 92)। जाओ। तुम आज़ाद हो, तुम छोड़ दिए गए” हदीस शरीफ़

हिजरत के ग्यारहवें साल यमामा में मुरतदों से बहुत सख़्त जंग हुई। मुसैलमा के लश्कर के बीस हज़ार और ख़ालिद इब्ने वलीद के लश्कर के दो हज़ार लोग मारे गए। पहले मुसलमानों के पाँव उखड़ने लगे। तब हज़रत वहशी ने बहादुरी से हमला किया और जिस नेज़े से हज़रत हमज़ा को शहीद किया था, उसी से मुसैलमतुल कज़्ज़ाब को मार डाला।18 यह देखकर मुसलमानों ने हमला किया और फ़तह हासिल हुई। रसूलुल्लाह ने किसी ज़माने में वहशी को यमामा की तरफ़ भेजा था; इसमें कितना बड़ा मोजिज़ा था, यह इस तरह ज़ाहिर हुआ। वह हिजरी बारहवें साल में होने वाली यरमूक की जंग में भी शरीक हुए और रूमियों के ख़िलाफ़ बड़ी बहादुरी दिखाई। हिम्स में बस गए और हज़रत उस्मान के ज़माने में वहीं उनका इंतिक़ाल हुआ।

गुनहगारों का उज़्र अपनी माफ़ी और मेहरबानी से क़बूल फ़रमाते थे,
बुलंद अख़लाक़ वाले, शफ़ीक़ और रहम-दिल थे, वह सख़ावत की खान।
दौलत को पसंद न करते, फ़क़्र को पसंद करते और उस पर फ़ख़्र करते थे,
मिस्कीनों को अपना भाई बना लेते थे, वह सख़ावत की खान।
अपने कपड़ों में पैवंद लगाते, लकड़ी की खड़ाऊँ भी पहनते थे,
हर बीमार के पास जाकर उसका इलाज करते थे, वह सख़ावत की खान।
अपने घर वालों के काम ख़ुद ख़ुशी से करते थे,
हर मुश्किल को आसान कर देते थे, वह सख़ावत की खान।
अगर जौ की रोटी और मसूर के शोरबे के लिए भी
दावत दी जाती, तो मेहमान बन जाते थे, वह सख़ावत की खान।
कभी ऊँट पर, कभी घोड़े पर, कभी ख़च्चर पर, कभी गधे पर सवार होते,
कभी नंगे पाँव चलते थे वह सुल्तान, वह सख़ावत की खान।