तकलीफ़ें, सितम और ज़ुल्म
क़ुरैश के बड़े-बड़े मुशरिक अब जब भी नबी-ए-करीम को अकेला देखते, आप पर टूट पड़ते, आपका अपमान करते, यहाँ तक कि मारने-पीटने पर उतर आते थे। आपके सहाबा को सताने से भी बाज़ नहीं आते थे। एक दिन क़ुरैश के बड़े मुशरिक काबा शरीफ़ के पास बैठे थे। वे नबी-ए-करीम के बारे में बातें करने लगे: “जितना हमने इसे बर्दाश्त किया है, उतना किसी चीज़ को बर्दाश्त नहीं किया। यह हमें बेवक़ूफ़ कहता है, हमारे इलाहों को ज़लील करके उनकी बुराई करता है, हमारे दीन में ऐब निकालता है, हमारी बिरादरी को एक-दूसरे से जुदा करता है, फिर भी हम सब्र करते हैं और कुछ नहीं कहते।” ठीक उसी वक़्त हबीब-ए-अकरम काबा की ज़ियारत के लिए तशरीफ़ लाए। आपने हजर-ए-असवद (काले पत्थर) को चूमा और तवाफ़ शुरू किया। जब आप उनके पास से गुज़रे, तो मुशरिक नबी-ए-करीम को अपमान भरी बातें कहने लगे। रसूलुल्लाह को इस पर बहुत दुख हुआ, लेकिन आपने कुछ नहीं कहा और तवाफ़ जारी रखा। तीसरी बार उनके पास से गुज़रते हुए आप रुक गए और फ़रमाया: “ऐ क़ुरैश! मेरी बात सुनो! उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसके क़ब्ज़ा-ए-क़ुदरत में मेरी जान है, मुझे बताया गया है कि तुम तबाह-ओ-बर्बाद हो जाओगे!”
वहाँ मौजूद मुशरिक हैरान रह गए, समझ न सके कि क्या करें, और पत्थर की तरह जम गए। उनमें से कोई एक बात भी न कह सका। सिर्फ़ अबू जहल रसूलुल्लाह के सामने आया और गिड़गिड़ाने लगा: “ऐ अबुल क़ासिम! तुम कोई ग़ैर नहीं हो। हमारी बदतमीज़ी को न देखो, अपनी इबादत जारी रखो। तुम इतने नादान नहीं कि हम जैसे बन जाओ।” इस पर मुहम्मद अलैहिस्सलाम वहाँ से चले गए। अगले दिन मुशरिक उसी जगह इकट्ठा होकर नबी-ए-करीम के ख़िलाफ़ बुरी-बुरी बातें बकने लगे। उसी वक़्त रसूलुल्लाह वहाँ तशरीफ़ लाए। मुशरिक फ़ौरन अल्लाह तआला के हबीब पर टूट पड़े। उनमें सबसे बदबख़्त लोगों में से एक, उक़बा इब्ने अबी मुऐत ने हमारे प्यारे नबी का मुबारक गिरेबान पकड़ लिया। उसने आपकी मुबारक गर्दन इतनी ज़ोर से दबाई कि आप साँस न ले सकें। उसी वक़्त हज़रत अबू बकर वहाँ आ पहुँचे और रसूलुल्लाह को बचाने के लिए यह चिल्लाते हुए उनके बीच कूद पड़े: “क्या तुम एक ऐसे शख़्स को क़त्ल करोगे जो कहता है: ‘मेरा रब अल्लाह है’? वह तो तुम्हारे पास सारे जहानों के रब की तरफ़ से आयतें लाए हैं!…” मुशरिक हबीबुल्लाह को छोड़कर अबू बकर सिद्दीक़ पर टूट पड़े। उनके मुबारक सिर पर घूँसे और लातें मारने लगे। उत्बा इब्ने रबीआ नाम के एक बदबख़्त ने हज़रत अबू बकर के मुबारक चेहरे पर जूतों से मारा और उन्हें ख़ून में लथपथ कर दिया। उनकी ऐसी हालत कर दी कि वह पहचाने न जाते थे। अगर बनू तैम पहुँचकर उन्हें छुड़ा न लेते, तो वे उन्हें मारते-मारते जान से मार डालते। उनके क़बीले के लोग निढाल और बेहाल हज़रत अबू बकर को एक चादर में रखकर उनके घर ले गए। फिर फ़ौरन लौटकर काबा आए और कहा: “अगर अबू बकर मर गए, तो क़सम है, हम उत्बा को मार डालेंगे!” इसके बाद वे हज़रत अबू बकर के पास चले गए।1 हज़रत अबू बकर बहुत देर तक होश में न आ सके।
उनके वालिद और बनू तैम के लोगों ने उन्हें होश में लाने की बहुत कोशिश की। शाम होते-होते ही वह होश में आ सके। आँखें खोलते ही उन्होंने टूटी हुई आवाज़ में बस इतना कहा: “रसूलुल्लाह क्या कर रहे हैं? वह किस हाल में हैं? उन्हें भी तो बुरा-भला कहा गया था, उनका भी अपमान किया गया था।” लोगों ने उनकी वालिदा उम्मुल ख़ैर से कहा: “पूछकर देखो, क्या वह कुछ खाएँगे या पिएँगे?” अबू बकर सिद्दीक़ में बिल्कुल ताक़त न थी। वह कुछ खाना-पीना भी नहीं चाहते थे। जब घर में कोई न रहा, तो उनकी वालिदा ने पूछा: “क्या खाओगे, क्या पियोगे?” उन्होंने आँखें खोलीं और अपने दर्द और तकलीफ़ के बारे में नहीं, बल्कि अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारी हस्ती का हाल पूछा: “रसूलुल्लाह किस हाल में हैं, क्या कर रहे हैं?”
“ऐ क़ुरैश! मेरी बात सुनो! उस अल्लाह तआला की क़सम, जिसके क़ब्ज़ा-ए-क़ुदरत में मेरी जान है, मुझे बताया गया है कि तुम तबाह-ओ-बर्बाद हो जाओगे!” हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम
उनकी वालिदा ने जवाब दिया: “अल्लाह की क़सम, मुझे तुम्हारे दोस्त के बारे में कुछ भी ख़बर नहीं!” हज़रत अबू बकर ने उनसे कहा: “ख़त्ताब की बेटी उम्मे जमील के पास जाइए और रसूलुल्लाह के बारे में उनसे पूछिए!”
उम्मे जमील हज़रत उमर की बहन थीं और मुसलमान हो चुकी थीं। हज़रत अबू बकर की वालिदा उम्मे जमील के पास गईं और कहा: “मेरा बेटा अबू बकर तुमसे मुहम्मद अलैहिस्सलाम के बारे में पूछ रहा है। वह किस हाल में हैं?” उम्मे जमील ने कहा: “मुझे न मुहम्मद अलैहिस्सलाम के बारे में कोई ख़बर है, न अबू बकर के बारे में! तुम चाहो तो हम साथ चलें।” उम्मुल ख़ैर ने कहा: “ठीक है।” फिर वे दोनों हज़रत अबू बकर के पास आईं। अबू बकर सिद्दीक़ को इस बुरे हाल में, ज़ख़्मों और नीले निशानों से भरा देखकर उम्मे जमील ख़ुद को रोक न सकीं, चीख़ पड़ीं और कहा: “जिस क़ौम ने तुम्हारे साथ यह किया है, वह यक़ीनन सरकश और हद से गुज़रने वाली है। अल्लाह तआला से मेरी दुआ है कि वे अपने किए की सज़ा पाएँ।” हज़रत अबू बकर ने उम्मे जमील से पूछा: “रसूलुल्लाह क्या कर रहे हैं, किस हाल में हैं?” उम्मे जमील ने उनसे कहा: “यहाँ तुम्हारी वालिदा मौजूद हैं, वह मेरी बात सुन लेंगी।” इस पर हज़रत अबू बकर ने फ़रमाया: “उनसे तुम्हें कोई नुक़सान नहीं पहुँचेगा, वह तुम्हारा राज़ नहीं फैलाएँगी।” उम्मे जमील ने कहा: “वह ज़िंदा हैं, ख़ैरियत से हैं।” उन्होंने फिर पूछा: “इस वक़्त वह कहाँ हैं?” उम्मे जमील ने जवाब दिया: “अरक़म के घर में।” हज़रत अबू बकर ने कहा: “अल्लाह की क़सम, जब तक जाकर रसूलुल्लाह को देख न लूँ, न कुछ खाऊँगा, न कुछ पिऊँगा!” उनकी वालिदा ने कहा: “अभी थोड़ा ठहरो! जब सब सो जाएँ, तब चलेंगे।”
जब सब सो गए और गलियाँ सुनसान हो गईं, तो हज़रत अबू बकर अपनी वालिदा और उम्मे जमील का सहारा लेकर धीरे-धीरे रसूलुल्लाह के पास पहुँचे। उन्होंने आपसे लिपटकर आपको चूमा और अपने मुसलमान भाइयों से गले मिले। हज़रत अबू बकर की इस हालत ने नबी-ए-करीम को बहुत दुखी किया। हज़रत अबू बकर ने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! मेरे माँ-बाप आप पर क़ुरबान हों! मुझे कोई दुख नहीं, सिवाय इसके कि उस सरकश आदमी ने मेरा चेहरा ज़मीन पर रगड़कर मुझे पहचानने के लायक़ न छोड़ा! और यह जो मेरे साथ हैं, मुझे दुनिया में लाने वाली मेरी माँ सलमा हैं। मेरी इल्तिजा है कि आप इनके लिए दुआ फ़रमाएँ। उम्मीद है कि अल्लाह तआला आपके सदक़े इन्हें जहन्नम की आग से बचा लेगा।” इस पर हमारे प्यारे नबी ने सलमा के मुसलमान होने के लिए अल्लाह तआला से दुआ फ़रमाई। रसूलुल्लाह की दुआ क़बूल हुई। इस तरह उम्मुल ख़ैर भी हिदायत (सीधा रास्ता) पाकर मुसलमान हो गईं और पहले मुसलमानों में शामिल होने का शरफ़ पाया।
अबू लहब के हाथ सूख जाएँ
नबी-ए-करीम का घर अबू लहब और उक़बा इब्ने अबी मुऐत नाम के दो कट्टर मुशरिकों के घरों के बीच था। ये दोनों हर मौक़े पर हमारे प्यारे नबी को तकलीफ़ पहुँचाने की कोशिश करते थे। यहाँ तक कि रात को जानवरों की ओझड़ियाँ रसूलुल्लाह के दरवाज़े के आगे फेंक जाते थे। आपका चचा अबू लहब इसी पर बस नहीं करता था; वह अपने पड़ोसी अदी के घर से आप पर पत्थर फेंककर आपको सताता था।
उसकी बीवी उम्मे जमील भी अपने शौहर से कम न थी: वह काँटेदार पेड़ों की टहनियाँ इकट्ठा करती और उन रास्तों में बिखेर देती जिनसे रसूलुल्लाह को गुज़रना होता, ताकि वे आपके मुबारक पैरों में चुभें। एक दिन अबू लहब अपनी लाई हुई गंदगी नबी-ए-करीम के दरवाज़े के आगे डाल रहा था कि हज़रत हमज़ा ने उसे देख लिया। उन्होंने फ़ौरन दौड़कर अपने भाई अबू लहब को पकड़ लिया और उसकी लाई हुई गंदगी उसी के सिर पर डाल दी।
अबू लहब और उसकी बीवी की इन तकलीफ़ों के बाद उनके बारे में सूरह तब्बत नाज़िल हुई, जो “अबू लहब के हाथ सूख जाएँ, और वे सूख ही गए…” के अल्फ़ाज़ से शुरू होती है। अबू लहब की बीवी उम्मे जमील ने जब सुना कि उनके बारे में सूरह नाज़िल हुई है, तो वह नबी-ए-करीम को ढूँढने लगी। जब उसे पता चला कि आप काबा के पास हैं, तो एक बड़ा पत्थर हाथ में लेकर वहाँ जा पहुँची। ठीक उसी वक़्त हज़रत अबू बकर हमारे नबी की सोहबत के शरफ़ से मुशर्रफ़ हो रहे थे।
उम्मे जमील के हाथ में पत्थर देखकर उन्होंने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! उम्मे जमील आ रही है। वह बड़ी फ़ितनापरवर औरत है, मुझे डर है कि कहीं वह आपको कोई नुक़सान न पहुँचाए। अगर आप एक तरफ़ हट जाते, तो तकलीफ़ से बचे रहते।” रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “वह मुझे नहीं देख सकेगी।” उम्मे जमील हज़रत अबू बकर के सिर पर आ खड़ी हुई और घटिया बातें बकने लगी: “ऐ अबू बकर! जल्दी बताओ, कहाँ है तुम्हारा वह दोस्त! उसने हजो करके मेरी और मेरे शौहर की बुराई की है। अगर वह शायर है, तो मैं और मेरा शौहर भी शायर हैं। लो, मैं भी उसकी हजो करती हूँ। हम उसकी नाफ़रमानी करते हैं, उसकी नुबुव्वत को नहीं मानते और उसका दीन भी हमें पसंद नहीं। मैं क़सम खाती हूँ, अगर मैं उसे एक बार देख लेती, तो यह पत्थर उसके सिर पर दे मारती…” हज़रत अबू बकर ने फ़रमाया: “मेरे आक़ा शायर नहीं हैं और उन्होंने तुम्हारी हजो नहीं की।” यह सुनकर उम्मे जमील पलटकर चली गई। हज़रत अबू बकर ने नबी-ए-करीम की तरफ़ मुड़कर पूछा: “या रसूलल्लाह! क्या उसने आपको नहीं देखा?” आपने फ़रमाया: “नहीं देखा। अल्लाह तआला ने उसकी आँख को ऐसा कर दिया कि वह मुझे न देख सकी।”2
नबी-ए-करीम की मुबारक बेटियों में से हज़रत उम्मे कुलसूम की मंगनी अबू लहब के बेटे उतैबा से और हज़रत रुक़य्या की मंगनी उसके दूसरे बेटे उत्बा से हुई थी, लेकिन अभी उनकी शादी नहीं हुई थी।
जब सूरह तब्बत नाज़िल हुई, तो जहन्नमी अबू लहब, उसकी बीवी और क़ुरैश के सरदारों ने उत्बा और उतैबा से कहा: “उसकी बेटियों को लेकर तुमने उसका बोझ हल्का कर दिया है। उसकी बेटियों को छोड़ दो, ताकि वह मुश्किल में पड़ जाए। क़ुरैश में से जिस लड़की को तुम चाहो, हम तुम्हारे लिए ले आएँगे।” उन्होंने कहा: “ठीक है, हमने छोड़ दिया।” उतैबा नाम का कमीना और आगे बढ़ गया: वह हमारे नबी (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) की ख़िदमत में आया और इन अल्फ़ाज़ से आपका अपमान किया: “ऐ मुहम्मद! मैं न तुम्हें मानता हूँ, न तुम्हारे दीन को। तुम्हारी बेटी को भी मैंने छोड़ दिया। अब न तुम मुझसे मुहब्बत करो, न मैं तुमसे! न तुम मेरे पास आओ, न मैं तुम्हारे पास आऊँगा!…” फिर वह हमारे प्यारे नबी पर झपटा और आपका मुबारक गिरेबान पकड़ लिया। आपकी क़मीज़ फाड़ दी और आपकी तौहीन की। इस पर हमारे प्यारे नबी ने उसे बद्दुआ देते हुए फ़रमाया: “या रब! इस पर अपने दरिंदों में से कोई दरिंदा मुसल्लत कर दे!” बदबख़्त उतैबा ने अपने बाप के पास जाकर जो कुछ हुआ था, बताया, तो अबू लहब ने कहा: “मुझे अपने बेटे के बारे में मुहम्मद की बद्दुआ से डर लगता है।” कुछ दिनों बाद अबू लहब ने अपने बेटे उतैबा को तिजारत के लिए दमिश्क़ भेजा। क़ाफ़िला रात गुज़ारने के लिए ज़रक़ा नाम की जगह पर ठहरा। आसपास एक शेर घूमने लगा। उतैबा ने उसे देखते ही कहा: “हाय! मैं क़सम खाता हूँ, मुहम्मद (अलैहिस्सलाम) की बद्दुआ क़बूल हो गई। यह शेर मुझे खा जाएगा! वह ख़ुद मक्का में है, फिर भी मेरा क़ातिल वही है!” कुछ देर बाद शेर ग़ायब हो गया। लोगों ने उतैबा को एक ऊँची-सी जगह पर सुलाया। रात को शेर फिर आया। वह क़ाफ़िले वालों को एक-एक करके सूँघता हुआ उतैबा तक जा पहुँचा। वह उस पर झपटा, उसका पेट फाड़ दिया, उसका सिर दबोच लिया और भयानक तरीक़े से काटकर उसका काम तमाम कर दिया। उतैबा यह चीख़ते-चीख़ते मर गया: “क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि मुहम्मद लोगों में सबसे सच्चे हैं?” और जब अबू लहब ने सुना कि उसके बेटे को एक शेर ने चीर-फाड़ डाला है, तो वह रोते हुए बोला: “क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि मुझे अपने बेटे के बारे में मुहम्मद की बद्दुआ से डर लगता है?”3
“अबू लहब के हाथ सूख जाएँ (वह हलाक हो), और वे सूख ही गए। उसे न उसके माल ने (जो बाप से विरासत में मिला) और न उसकी कमाई ने कोई फ़ायदा दिया। वह भड़कती हुई आग में दाख़िल होगा, और उसकी बीवी भी, लकड़ियाँ ढोने वाली बनकर, इस हाल में कि उसकी गर्दन में बटी हुई रस्सी होगी” तब्बत: 1–5
हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) लोगों को हमेशा की ख़ुशनसीबी की तरफ़ बुला रहे थे; उन्हें अल्लाह तआला के वुजूद और उसकी वहदानियत की दावत देकर कोशिश कर रहे थे कि वे जहन्नम में न जलें। मगर मुशरिक “हमारे बाप-दादा का दीन यही है” कहकर बुतपरस्ती पर डटे हुए थे। नबी-ए-करीम उन्हें इंसानों की तरह जीने, इज़्ज़त और शरफ़ वाला बनने, बेक़द्री से निकलकर ऊँचे और बुलंद मर्तबों तक पहुँचने की दावत दे रहे थे। मगर वे अपनी ज़िद पर अड़े हुए थे। अपमान करने और तकलीफ़ देने वालों में अबू लहब सबसे आगे था। वह हर वक़्त रसूलुल्लाह के पीछे लगा रहता और कोशिश करता कि लोग आपकी बात सुनना छोड़ दें और उनके ज़ेहनों में शक पैदा हो जाए। मजलिसों और मेलों में जब भी रसूलुल्लाह फ़रमाते: “ऐ लोगो! ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ कहो, ताकि नजात पाओ!”, तो वह फ़ौरन पीछे से आ पहुँचता और कहता: “ऐ लोगो! यह बोलने वाला मेरा भतीजा है। ख़बरदार, इसकी बात पर हरगिज़ यक़ीन न करना। इससे दूर रहो!”
एक दिन मुहम्मद अलैहिस्सलाम काबा शरीफ़ के पास नमाज़ पढ़ रहे थे। क़ुरैश के सरदारों में से अबू जहल, शैबा इब्ने रबीआ, उत्बा इब्ने रबीआ और उक़बा इब्ने अबी मुऐत समेत सात मुशरिकों का एक टोला आया और रसूलुल्लाह के क़रीब एक जगह बैठ गया। वहीं आसपास एक दिन पहले ज़बह किए गए एक ऊँट की ओझड़ी और बची हुई आलाइश पड़ी थी। कमीने अबू जहल ने अपने साथियों की तरफ़ मुड़कर एक घिनौनी तजवीज़ रखी: “तुममें से कौन है जो यह ऊँट की ओझड़ी उठाए और जब मुहम्मद सज्दे में जाए, तो उसके दोनों कंधों के बीच रख दे?” वहाँ मौजूद लोगों में सबसे ज़ालिम, सबसे संगदिल, सबसे बेरहम और सबसे बदबख़्त उक़बा इब्ने अबी मुऐत “मैं करूँगा” कहकर फ़ौरन उठ खड़ा हुआ। जब हमारे नबी सज्दे में थे, तो उसने ओझड़ी को उसके अंदर की गंदगी समेत आपके मुबारक कंधों पर रख दिया। यह तमाशा देखने वाले मुशरिक हँसते-हँसते लोट-पोट होने लगे। नबी-ए-करीम ने अपना सज्दा लंबा कर दिया और मुबारक सिर नहीं उठाया। उसी वक़्त सहाबा-ए-किराम में से अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद ने यह हाल देखा। उन्होंने यह वाक़िआ इस तरह बयान किया है:
“रसूलुल्लाह को उस हाल में देखकर मेरा ख़ून खौल उठा। लेकिन मेरी कोई क़ौम या क़बीला न था जो मुझे मुशरिकों के हाथ से बचाता। मैं बेसहारा और कमज़ोर था। उस वक़्त मुझमें बोलने की भी ताक़त न थी। मैं खड़ा-खड़ा बड़े दुख के साथ रसूलुल्लाह को देखता रहा।
काश, उस वक़्त मेरे पास इतनी ताक़त होती या कोई हिमायती होता जो मुझे मुशरिकों से बचा सकता, और मैं वह चीज़ उठाकर फेंक देता जो उन्होंने रसूल अलैहिस्सलाम के मुबारक कंधे पर रखी थी! मैं इसी तरह खड़ा था कि रसूलुल्लाह की बेटी हज़रत फ़ातिमा को ख़बर दी गई। उस वक़्त फ़ातिमा छोटी थीं। वह दौड़ती हुई आईं और अपने वालिद के ऊपर रखी हुई चीज़ें हटाकर फेंक दीं। यह करने वालों को उन्होंने बद्दुआ दी और सख़्त बातें कहीं। रसूलुल्लाह ने इस तरह नमाज़ पूरी की जैसे कुछ हुआ ही न हो, और फिर तीन बार फ़रमाया:
‘या अल्लाह! क़ुरैश के इस टोले को मैं तेरे हवाले करता हूँ! या अल्लाह! अबू जहल अम्र इब्ने हिशाम को तेरे हवाले करता हूँ! या अल्लाह! उत्बा इब्ने रबीआ को तेरे हवाले करता हूँ! या अल्लाह! शैबा इब्ने रबीआ को तेरे हवाले करता हूँ! या अल्लाह! उक़बा इब्ने अबी मुऐत को तेरे हवाले करता हूँ! या अल्लाह! उमय्या इब्ने ख़लफ़ को तेरे हवाले करता हूँ! या अल्लाह! वलीद इब्ने उत्बा को तेरे हवाले करता हूँ! या अल्लाह! उमारा इब्ने वलीद को तेरे हवाले करता हूँ!’
अपने ख़िलाफ़ यह बद्दुआ सुनकर मुशरिकों ने हँसना छोड़ दिया और डरने लगे, क्योंकि उन्हें यक़ीन था कि बैतुल्लाह में की गई दुआ क़बूल होती है। रसूलुल्लाह ने अबू जहल से फ़रमाया: ‘अल्लाह की क़सम, या तो तुम इससे बाज़ आ जाओगे, या अल्लाह तआला तुम्हारे सिर पर कोई आफ़त उतारेगा।’ मैं अल्लाह तआला की क़सम खाकर कहता हूँ, रसूलुल्लाह ने जिन लोगों के नाम लिए थे, मैंने उनमें से हर एक को बद्र की जंग में क़त्ल होकर ज़मीन पर पड़ा देखा, फिर यह भी देखा कि गर्मी से सड़ चुकी उनकी लाशें बद्र के गड्ढे में भर दी गईं।”
एक दिन अबू जहल ने बैतुल्लाह में क़ुरैश के मुशरिकों से कहा: “ऐ क़ुरैश के लोगो! तुम देख रहे हो कि मुहम्मद हमारे दीन में ऐब निकालने से, हमारे बुतों और उन्हें पूजने वाले हमारे बाप-दादा पर ज़बान चलाने से और हमें बेअक़्ल समझने से बाज़ नहीं आता। मैं तुम्हारे सामने क़सम खाकर कहता हूँ कि कल जब वह यहाँ आकर नमाज़ पढ़ेगा और सज्दे में जाएगा, तो एक ऐसा पत्थर, जिसे मैं बड़ी मुश्किल से उठा पाऊँगा, पूरे ज़ोर से उसके सिर पर दे मारूँगा। फिर तुम चाहो तो मुझे बनू अब्दुल मुत्तलिब से बचाना, चाहो तो न बचाना। जब मैं उसे मार डालूँ, तो उसके रिश्तेदार मेरे साथ जो चाहें करें…” वहाँ मौजूद मुशरिकों ने उसे भड़काते हुए कहा: “हम क़सम खाते हैं, हम तुम्हें बचाएँगे भी और किसी के हवाले भी नहीं करेंगे। बस तुम उसे मार डालो!” सुबह अबू जहल हाथ में एक बहुत बड़ा पत्थर लिए काबा आया। वह मुशरिकों के पास बैठकर इंतिज़ार करने लगा। हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) हमेशा की तरह बैतुल्लाह तशरीफ़ लाए और नमाज़ पढ़ने लगे। अबू जहल अपनी जगह से उठा और हाथ का बड़ा पत्थर मारने के लिए रसूलुल्लाह की तरफ़ बढ़ा। सारे मुशरिक बड़ी बेचैनी से यह मंज़र देख रहे थे। अबू जहल जब रसूलुल्लाह के क़रीब पहुँचा, तो अचानक काँपने लगा। बड़ा पत्थर उसके हाथ से ज़मीन पर गिर पड़ा, उसके चेहरे का रंग राख की तरह उड़ गया और वह बड़े ख़ौफ़ के साथ पीछे हट गया। हैरान मुशरिक अबू जहल के पास आए और पूछा: “ऐ अम्र इब्ने हिशाम! बताओ, क्या हुआ?” अबू जहल ने कहा: “ठीक जब मैंने उसे मारने के लिए पत्थर उठाया, मेरे सामने एक भड़का हुआ ऊँट आ गया। मैं क़सम खाता हूँ, मैंने ज़िंदगी में न कभी इतनी ऊँची टाँगों वाला, इतने तेज़ दाँतों वाला, ऐसा हैबतनाक ऊँट देखा, न सुना। अगर मैं थोड़ा और क़रीब जाता, तो वह ज़रूर मुझे मार डालता।” एक और दिन अबू जहल ने मुशरिकों को इकट्ठा करके पूछा: “क्या अब्दुल्लाह का यतीम यहाँ नमाज़ पढ़ता है और अपना चेहरा मिट्टी पर रगड़ता है?” उन्होंने कहा: “हाँ।” अबू जहल तो इसी बात के इंतिज़ार में था; उसने कहा: “अगर मैंने उसे इस हाल में देख लिया, तो उसका सिर अपने पैर से कुचल दूँगा।” एक दिन नबियों के सरदार काबा के पास नमाज़ के लिए खड़े हुए थे। अबू जहल भी अपने साथियों के साथ बैठा था। वह अपनी जगह से उठा और रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की तरफ़ बढ़ा। वह बिल्कुल क़रीब पहुँच गया, लेकिन अचानक हाथ से अपना चेहरा पोंछता हुआ भागने लगा। मुशरिक उसके पास गए और कहा: “क्या हुआ? यह तुम्हारी क्या हालत है?” अबू जहल ने जवाब दिया: “हमारे बीच आग का एक गड्ढा ज़ाहिर हो गया। जब मैंने देखा कि कुछ लोग मुझ पर हमला कर रहे हैं, तो मैं लौट आया।” वलीद इब्ने मुग़ीरा, अबू जहल (अम्र इब्ने हिशाम), असवद इब्ने मुत्तलिब, उमय्या इब्ने ख़लफ़, असवद इब्ने अब्दे यग़ूस, आस इब्ने वाइल और हारिस इब्ने क़ैस जैसे मुशरिकों के सरदार जब भी रसूलुल्लाह को देखते, यह कहकर मज़ाक़ उड़ाते: “यह भी समझता है कि यह नबी है और इसके पास जिबराईल आता है।” इसी वजह से जिस दिन हबीब-ए-अकरम बहुत दुखी थे, उस दिन जिबराईल अलैहिस्सलाम आए और कुछ आयत-ए-करीमा लाए। उनका मफ़हूम यह है:
“(ऐ मेरे रसूल!) क़सम है, तुमसे पहले भेजे गए नबियों का भी मज़ाक़ उड़ाया गया। फिर उनका (नबियों का) मज़ाक़ और ठट्ठा करने वालों को उनके मज़ाक़ के बदले में बला और अज़ाब ने चारों तरफ़ से घेर लिया।”4 “बेशक हम तुम्हारा मज़ाक़ उड़ाने वालों के मुक़ाबले में काफ़ी हैं। ये वे लोग हैं जो अल्लाह तआला के साथ दूसरा इलाह मानते हैं। ये बहुत जल्द (अपने सिर पर आने वाला अंजाम) जान लेंगे। हम ख़ूब जानते हैं कि उनकी बातों से (उनके शिर्क करने, क़ुरआन-ए-करीम पर ज़बान चलाने और तुम्हारे बारे में मज़ाक़ भरी बातें कहने से) तुम्हारा सीना तंग होता है, तुम्हारा जी घुटता है।”5
“ऐ अबू जहल! अल्लाह की क़सम, या तो तुम इससे बाज़ आ जाओगे, या अल्लाह तआला तुम्हारे सिर पर कोई आफ़त उतारेगा” हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम
एक दिन कायनात के सुल्तान काबा मुअज़्ज़मा का तवाफ़ कर रहे थे कि जिबराईल अलैहिस्सलाम आए और कहा: “मुझे इनसे (मज़ाक़ उड़ाने वालों से) निपटने का हुक्म मिला है।” कुछ देर बाद वलीद इब्ने मुग़ीरा दोनों के सामने से गुज़रा। जिबराईल अलैहिस्सलाम ने पूछा: “यह गुज़रने वाला कैसा आदमी है?” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “यह अल्लाह तआला के सबसे बुरे बंदों में से एक है।” इस पर जिबराईल अलैहिस्सलाम ने वलीद की टाँग की तरफ़ इशारा किया और कहा: “मैंने इससे निपट लिया!” कुछ देर बाद आस इब्ने वाइल गुज़र रहा था। उसके बारे में भी पूछा और वही जवाब मिला, तो जिबराईल ने उसके पेट की तरफ़ इशारा किया और कहा: “इसे भी इसकी औक़ात बता दी!” असवद इब्ने मुत्तलिब गुज़रा तो उसकी आँख की तरफ़, और अब्दे यग़ूस को देखकर उसके सिर की तरफ़ इशारा किया। हारिस इब्ने क़ैस गुज़रा तो उसके पेट की तरफ़ इशारा किया और कहा: “या मुहम्मद! अल्लाह तआला ने आपको इनके शर से बचा लिया। बहुत जल्द इनमें से हर एक किसी न किसी आफ़त में फँसेगा।”
आस इब्ने वाइल के पैर में एक काँटा चुभ गया। लोगों ने बहुत इलाज किया, मगर उसके दर्द का कोई चारा न मिल सका। आख़िरकार उसका पैर ऊँट की गर्दन की तरह सूज गया और वह यह चीख़ते-चिल्लाते मर गया: “मुहम्मद के अल्लाह ने मुझे मार डाला!”
असवद इब्ने मुत्तलिब अंधा हो गया। जिबराईल अलैहिस्सलाम ने उसका सिर एक पेड़ से टकराकर उसे हलाक कर दिया।
असवद इब्ने अब्दे यग़ूस जब बाद-ए-समूम नाम की जगह पर था, तो उसका चेहरा और सारा जिस्म काला स्याह हो गया। जब वह घर आया, तो घर वालों ने उसे न पहचाना और दरवाज़े से भगा दिया। वह ग़म के मारे अपने घर के दरवाज़े पर सिर पटक-पटककर मर गया।
हारिस इब्ने क़ैस ने नमकीन मछली खाई थी। उसके अंदर जलन शुरू हुई, जो बढ़ती ही चली गई। वह जितना भी पानी पीता, उसकी प्यास न बुझती। आख़िरकार उसका पेट फट गया और वह मर गया। वलीद इब्ने मुग़ीरा की पिंडली में भी लोहे का एक टुकड़ा चुभ गया। उसका ज़ख़्म ठीक न हुआ, उसका बहुत ख़ून बह गया, और वह भी यह चीख़ते-चिल्लाते मर गया: “मुहम्मद के अल्लाह ने मुझे मार डाला!”
इस तरह उनमें से हर एक ने अपने किए की सज़ा पाई। इसके अलावा आयत-ए-करीमा में बताया गया कि मुशरिक हमेशा के लिए जहन्नम में रहेंगे। एक दिन हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की मुलाक़ात हकम इब्ने अबिल आस से हुई। जब हमारे नबी वहाँ से चले गए, तो हकम रसूलुल्लाह के पीछे मज़ाक़ उड़ाते हुए अपना मुँह, चेहरा और जिस्म टेढ़ा-मेंढा करके नक़लें उतारने लगा।
रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हकम की ये हरकतें नुबुव्वत के नूर से देख लीं और दुआ फ़रमाई कि वह इसी हाल में रह जाए। हकम के जिस्म को कँपकँपी ने आ घेरा, और वह ज़िंदगी के आख़िर तक इसी हाल में रहा।
सहाबा-ए-किराम पर किए गए ज़ुल्म
मुशरिक सिर्फ़ नबी-ए-करीम को ही तकलीफ़ नहीं देते थे। वे आपके शान वाले सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) को भी सताते थे। ख़ास तौर पर ग़रीबों और बेसहारा लोगों को चुनते, और उन पर बेझिझक ऐसे-ऐसे ज़ुल्म ढाते, जो अक़्ल में भी न आएँ। सबसे ज़्यादा सताए जाने वालों में बिलाल हब्शी, ज़िन्नीरा ख़ातून, ख़ब्बाब इब्ने अरत, अम्मार इब्ने यासिर और उनका घराना (रज़ियल्लाहु अन्हुम अजमईन) थे। इनमें से किसी को धूप की गर्मी में तपे हुए पत्थरों से दाग़ते, किसी को भूखा-प्यासा रखकर यह कहते हुए सताते: “मुहम्मद के दीन से फिर जाओ!” मगर वे इन नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त तकलीफ़ों पर सब्र करते और इस्लाम के दीन से हरगिज़ न फिरते।
अल्लाह एक है, अल्लाह एक है
हज़रत बिलाल उमय्या इब्ने ख़लफ़ नाम के एक मुशरिक के ग़ुलाम थे और हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ के ज़रिए मुसलमान हुए थे। उमय्या अपने बारह ग़ुलामों में सबसे ज़्यादा बिलाल को चाहता था, इसलिए उसने उन्हें बुतख़ाने का पहरेदार बना रखा था। हज़रत बिलाल जब मुसलमान हुए, तो उन्होंने बुतख़ाने के सारे बुतों को सज्दे की हालत में औंधा कर दिया। जब यह ख़बर उमय्या तक पहुँची, तो उस पर बड़ी दहशत छा गई। उसने उन्हें बुलवाकर पूछा: “सुना है तुम मुसलमान हो गए हो और मुहम्मद के रब को सज्दा करते हो, क्या यह सच है?” हज़रत बिलाल ने कहा: “हाँ। मैं बड़े और अल्लाह तआला को सज्दा करता हूँ।” उमय्या को यह जवाब नागवार गुज़रा, और उसने फ़ौरन बिलाल को तकलीफ़ें देना और सताना शुरू कर दिया। दोपहर को जब सूरज ठीक सिर पर आ जाता, तो वह उनके कपड़े उतार देता और गर्मी से तपे हुए पत्थर उनके नंगे जिस्म पर रखकर उन्हें दाग़ता। आग की तरह जलते पत्थरों में से कुछ उनकी पीठ पर और कुछ उनके पेट पर ढेर करके कहता: “इस्लाम के दीन से फिर जाओ!… लात और उज़्ज़ा बुतों पर ईमान लाओ!” और हज़रत बिलाल “अल्लाह तआला एक है! अल्लाह तआला एक है!” कहकर अपने ईमान का इज़हार करते।
उमय्या इब्ने ख़लफ़ जब भी उनका यह सब्र देखता, पागल-सा हो जाता; उन्हें काँटों पर घसीटकर उनका जिस्म ज़ख़्मी करता और सताता। मगर हज़रत बिलाल अपने जिस्म से बहते ख़ून की परवाह किए बिना कहते: “या अल्लाह! तेरी तरफ़ से जो आए, उस पर मैं राज़ी हूँ! या अल्लाह! तेरी तरफ़ से जो आए, उस पर मैं राज़ी हूँ!” और अपने ईमान पर डटे रहते। हज़रत बिलाल ने अपना यह हाल इस तरह बयान किया:
“वह ख़बीस उमय्या दिन की गर्मी में मुझे बाँधकर डाल देता और रात को अज़ियतें देता था। एक गर्म दिन था। हमेशा की तरह उसने फिर सताना शुरू किया। मुझे इस्लाम से फेरने के लिए जब भी वह कहता: ‘हमारे बुतों को पूजो! मुहम्मद के अल्लाह का इनकार करो, इनकार करो, इनकार करो!’, तो मैं कहता: ‘अल्लाह एक है! अल्लाह एक है!’ अपनी भड़ास निकालने के लिए उस दिन उसने एक बहुत बड़ी चट्टान मेरे सीने पर रख दी। उसी वक़्त मैं बेहोश हो गया। जब होश आया, तो देखा कि मेरे ऊपर से चट्टान हटा दी गई है और सूरज बादल के पीछे छिप गया है। मैंने अल्लाह तआला का शुक्र अदा किया और अपने आप से कहा: ‘ऐ बिलाल! अल्लाह पाक की तरफ़ से जो कुछ आता है, सब अच्छा है, ख़ूब है।’”
एक और दिन उमय्या इब्ने ख़लफ़ बिलाल हब्शी को सताने के लिए बाहर लाया। उसने उनके कपड़े उतारकर सिर्फ़ एक जाँघिया रहने दिया, झुलसाती गर्मी में तपती रेत पर लिटाया और उनके ऊपर पत्थर ढेर कर दिए। मुशरिक इकट्ठा होकर उन्हें सख़्त अज़ियतें देने लगे और कहने लगे: “अगर तुम अपने दीन से न फिरे, तो हम तुम्हें मार डालेंगे।” मगर बिलाल हब्शी इन नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त अज़ियतों के बीच भी कहते रहे: “अल्लाह एक है! अल्लाह एक है!” उसी वक़्त हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) वहाँ से गुज़र रहे थे। हज़रत बिलाल हब्शी का यह हाल देखकर आपको बहुत दुख हुआ और आपने फ़रमाया: “अल्लाह तआला का नाम लेना तुम्हें नजात देगा।”
हमारे नबी के घर लौटने के कुछ देर बाद हज़रत अबू बकर आपके पास आए। हमारे नबी ने अबू बकर सिद्दीक़ को बताया कि बिलाल हब्शी पर कैसे सितम ढाए जा रहे हैं, और फ़रमाया: “मुझे बहुत दुख हुआ।” हज़रत अबू बकर फ़ौरन वहाँ गए। उन्होंने मुशरिकों से कहा: “बिलाल के साथ ऐसा करने से तुम्हें क्या मिलता है? इसे मेरे हाथ बेच दो।” उन्होंने कहा: “दुनिया भर का सोना दो, तब भी नहीं बेचेंगे। लेकिन तुम्हारे ग़ुलाम आमिर से बदल सकते हैं।” हज़रत अबू बकर का ग़ुलाम आमिर उनका तिजारती काम सँभालता था और बहुत पैसा कमाता था। उसके पास अपने ज़ाती माल के अलावा दस हज़ार सोने के सिक्के थे। वह हज़रत अबू बकर का मददगार था और उनका हर काम चलाता था। लेकिन वह काफ़िर था और अपने कुफ़्र पर अड़ा हुआ था। हज़रत अबू बकर ने फ़रमाया: “मैंने आमिर को उसके सारे माल और पैसों समेत बिलाल के बदले तुम्हें दे दिया।” उमय्या इब्ने ख़लफ़ और दूसरे मुशरिक बहुत ख़ुश हुए और कहने लगे: “हमने अबू बकर को ठग लिया।”
“(ऐ मेरे रसूल!) क़सम है, तुमसे पहले भेजे गए नबियों का भी मज़ाक़ उड़ाया गया। फिर उनका (नबियों का) मज़ाक़ और ठट्ठा करने वालों को उनके मज़ाक़ के बदले में बला और अज़ाब ने चारों तरफ़ से घेर लिया” अनआम: 10
हज़रत अबू बकर ने फ़ौरन बिलाल हब्शी के ऊपर से भारी पत्थर हटा फेंके और उन्हें खड़ा किया। बिलाल हब्शी सख़्त अज़ियतों की वजह से बहुत निढाल हो गए थे। अबू बकर उनका हाथ पकड़कर सीधे हमारे प्यारे नबी की ख़िदमत में ले आए और अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! आज मैंने बिलाल को अल्लाह की रज़ा के लिए आज़ाद कर दिया।” रसूलुल्लाह बहुत ख़ुश हुए और हज़रत अबू बकर के लिए बहुत दुआ फ़रमाई। उसी वक़्त जिबराईल अलैहिस्सलाम सूरह लैल की 17वीं और 18वीं आयत-ए-करीमा लेकर आए, जिनमें अबू बकर के जहन्नम से दूर होने की ख़ुशख़बरी दी गई है। इन आयत-ए-करीमा में मफ़हूमन फ़रमाया गया: “जो शख़्स (हज़रत अबू बकर की तरह) बड़ा तक़्वा वाला होकर (शिर्क और गुनाह से बचकर), अल्लाह तआला के यहाँ पाक होने के लिए (और इलाही वादे को पाने के लिए) अपना माल भलाई की राह में ख़र्च करता है, वह उससे (जहन्नम से) दूर कर दिया गया है।”
ऐसा ज़ुल्म जो कभी न देखा गया
हज़रत ख़ब्बाब इब्ने अरत भी उन लोगों में से थे जिन पर उन्हें उनके दीन से फेरने के लिए ज़ुल्म किया गया। हज़रत ख़ब्बाब भी बेसहारा थे और उम्मे अनमार नाम की एक मुशरिक औरत के ग़ुलाम थे।
उनकी हिमायत करने वाला कोई रिश्तेदार न था, इसलिए मुशरिक इकट्ठा होते, उनके मुबारक जिस्म के कपड़े उतारते और उस पर काँटों से खरोंचते थे। कभी उनके नंगे जिस्म पर लोहे की क़मीज़ पहनाकर उन्हें धूप में खड़ा रखते। धूप में या आग में तपाए हुए पत्थर उनके नंगे जिस्म पर दबाकर कहते: “अपने दीन से फिर जाओ! लात और उज़्ज़ा को पूजो!” मगर ख़ब्बाब अपने ईमान पर डटे रहते और “ला इलाह इल्लल्लाह, मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” कहकर उनका मुक़ाबला करते।
एक दिन मुशरिकों ने इकट्ठा होकर एक मैदान में आग जलाई। वे हज़रत ख़ब्बाब को बाँधकर वहाँ ले आए। उनके कपड़े उतारकर उन्हें आग के ऊपर लिटा दिया। वे या तो उन्हें उनके दीन से फेरना चाहते थे, या आग में जला देना। हज़रत ख़ब्बाब आग के बीच पीठ के बल पड़े यह दुआ कर रहे थे: “या अल्लाह! तू मेरा हाल देख रहा है, मेरी हालत जानता है। मेरे दिल के ईमान को मज़बूत रख, मुझे बड़ा सब्र अता फ़रमा!” मुशरिकों में से एक ने अपने पैर से हज़रत ख़ब्बाब का सीना दबा दिया। लेकिन वे नहीं जानते थे कि अल्लाह तआला ईमान वालों की हिफ़ाज़त करता है।
बरसों बाद जब ख़ब्बाब से इस वाक़िए के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने अपनी पीठ खोलकर जलने के निशान दिखाए और कहा: “मेरे लिए एक आग जलाई गई, फिर मुझे घसीटकर उसमें डाल दिया गया। उस आग को सिर्फ़ मेरे गोश्त ने बुझाया था।”
जब बाहर हज़रत ख़ब्बाब को इस तरह सताया जाता, तो उनकी मालकिन उम्मे अनमार भी उन्हें उनके दीन से फेरने के लिए आग में लोहा तपाती और उनके सिर पर रखकर दाग़ती थी। वह अपने दीन की ख़ातिर ये सब तकलीफ़ें सहते, उनकी बात न मानते और अपने ईमान से न फिरते।
एक दिन हज़रत ख़ब्बाब हमारे प्यारे नबी की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! मुशरिक बाहर मुझे जहाँ देखते हैं, वहीं आग में जलाते हैं। घर में मेरी मालकिन उम्मे अनमार तपे हुए लोहे से मेरा सिर दाग़ती है। आपसे दुआ की इल्तिजा करता हूँ!” फिर उन्होंने अपनी पीठ और अपने सिर के जले हुए निशान दिखाए। हमारे नबी को उनके इस हाल पर बहुत तरस आया। ख़ब्बाब ने अपने दीन से न फिरने के लिए जो तकलीफ़ सही थी और उन पर जो ज़ुल्म हुआ था, आप उसे बर्दाश्त न कर सके और दुआ फ़रमाई: “या रब! ख़ब्बाब की मदद फ़रमा!” अल्लाह पाक ने अपने रसूल की दुआ उसी पल क़बूल फ़रमाई और उम्मे अनमार के सिर में सख़्त दर्द पैदा कर दिया। उम्मे अनमार सिर के दर्द से सुबह तक कराहती रहती। इलाज के तौर पर लोगों ने बताया कि आग में तपाए हुए लोहे से उसका सिर दाग़ा जाए। आख़िरकार उसने ख़ब्बाब को बुलाया और हुक्म दिया कि लोहे की छड़ आग में तपाएँ और उसका सिर दाग़ें… और हज़रत ख़ब्बाब लोहे से उसका सिर दाग़ा करते थे…
इस्लाम के शुरू के दिनों में मुशरिक ख़ब्बाब इब्ने अरत के मामले पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते थे। लेकिन हर गुज़रते दिन के साथ ईमान लाने वालों की तादाद बढ़ती जा रही थी। आख़िरकार न चाहते हुए भी वे इस मामले को संजीदगी से लेने पर मजबूर हो गए। फिर उन्होंने हज़रत ख़ब्बाब पर ज़ुल्म और बढ़ा दिया: बेहद मारा, पीटा, ज़ख़्मी किया, सितम पर सितम ढाए…
इस सबके बावजूद हज़रत ख़ब्बाब अपने ईमान से ज़र्रा बराबर भी पीछे न हटे। लेकिन तकलीफ़ें और ज़ुल्म नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त हो चुके थे। उन्होंने जो कुछ गुज़रा था, कायनात के सरदार से अर्ज़ किया और कहा: “या रसूलल्लाह! क्या आप दुआ नहीं फ़रमाएँगे कि हम इन अज़ियतों से छुटकारा पाएँ?”
इस पर रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: “तुमसे पहले की उम्मतों में ऐसे लोग थे जिनकी खाल और गोश्त लोहे की कंघी से छील-छीलकर उतारे जाते, फिर भी यह अज़ियत उन्हें उनके दीन से न फेर सकती। आरे से उन्हें सिर से चीरकर दो टुकड़े कर दिया जाता, फिर भी ये अज़ियतें उन्हें उनके दीन से न लौटा सकतीं। अल्लाह तआला यक़ीनन इस काम (इस्लाम) को पूरा करेगा। इसे तमाम दीनों पर ग़ालिब करेगा। यहाँ तक कि अपनी सवारी पर बैठकर सनआ से हज़रमौत तक अकेला सफ़र करने वाला शख़्स अल्लाह तआला के सिवा किसी से नहीं डरेगा, और अपनी भेड़ों के बारे में भी उसे भेड़िये के हमले के सिवा कोई फ़िक्र न होगी। लेकिन तुम जल्दी करते हो।” फिर आपने ख़ब्बाब के लिए दुआ फ़रमाई और उनकी पीठ पर हाथ फेरा। रसूलुल्लाह के इन प्यारे अल्फ़ाज़ ने, जो रूहों के लिए ग़िज़ा और शिफ़ा हैं, ख़ब्बाब के दर्द को ठंडा कर दिया।
हज़रत ख़ब्बाब का आस इब्ने वाइल पर, जो बड़ा ही सरकश मुशरिक था, काफ़ी क़र्ज़ था। ख़ब्बाब अपना क़र्ज़ माँगने उसके पास गए। आस इब्ने वाइल ने ख़ब्बाब से कहा: “जब तक तुम मुहम्मद का इनकार नहीं करोगे, तुम्हारा क़र्ज़ नहीं दूँगा।” हज़रत ख़ब्बाब ने जवाब दिया: “अल्लाह की क़सम, मैं न अपनी ज़िंदगी में और न मरने के बाद क़ब्र से उठकर कभी अपने नबी को झुठलाऊँगा, न उनका इनकार करूँगा। मैं हर चीज़ छोड़ दूँगा, मगर यह इनकार नहीं कर सकता।” इस पर आस इब्ने वाइल ने कहा: “क्या हम मरने के बाद ज़िंदा किए जाएँगे? अगर ऐसी कोई बात है, तो उस वक़्त मेरे पास माल भी होगा और औलाद भी। तुम्हारा क़र्ज़ मैं उसी दिन चुका दूँगा।”
आस इब्ने वाइल की इन बातों पर अल्लाह तआला ने क़ुरआन-ए-करीम में सूरह मरयम की 77–79वीं आयत-ए-करीमा में मफ़हूमन फ़रमाया: “(ऐ मेरे हबीब!) क्या तुमने उस शख़्स को (आस इब्ने वाइल को) देखा जिसने हमारी आयतों का इनकार किया और कहा: ’मुझे (क़यामत के दिन) ज़रूर माल और औलाद दी जाएगी’? क्या उसे ग़ैब की ख़बर मिल गई है, या उसने रहमान के यहाँ से कोई अहद ले रखा है? हरगिज़ नहीं! हम उसकी कही हुई बात लिख लेंगे (क़यामत के दिन इसका हिसाब लेंगे) और उसका अज़ाब बढ़ाते ही चले जाएँगे।”
बेहोश होने तक अज़ाब
मुशरिक सताने में औरत और मर्द का फ़र्क़ नहीं करते थे। पहले मुसलमानों में से ज़िन्नीरा ख़ातून भी, जिनका कोई सहारा न था, एक बाँदी थीं। जब मुशरिकों को पता चला कि वह मुसलमान हो गई हैं, तो उन्हें सताने से भी वे ज़रा न झिझके। ज़िन्नीरा ख़ातून को लात और उज़्ज़ा बुतों को पूजने पर मजबूर किया जाता, उनका गला दबाया जाता और इतना सताया जाता कि साँस रुक जाने से वह बेहोश हो जातीं। फिर भी वह अपने दीन से हरगिज़ न फिरतीं और उनकी बात न मानतीं। ख़ास तौर पर अबू जहल उन्हें बहुत सताता था। इसी वजह से ज़िन्नीरा की आँखों की रौशनी चली गई। एक बार अबू जहल ने कहा: “देखा? लात और उज़्ज़ा ने तुम्हारी आँख अंधी कर दी!” तो ज़िन्नीरा ख़ातून ने अपने ईमान का इज़हार करते हुए कहा: “ऐ अबू जहल! अल्लाह की क़सम, बात ऐसी नहीं जैसी तुम कहते हो। जिन्हें तुम लात और उज़्ज़ा कहते हो, वे बुत किसी काम के नहीं; उन्हें न अपने पूजने वालों की ख़बर है, न न पूजने वालों की। मेरा रब यक़ीनन इस पर क़ादिर है कि मेरी आँखों का नूर लौटा दे और मुझे पहले जैसी हालत में कर दे।”
“(ऐ बिलाल!) अल्लाह तआला का नाम लेना तुम्हें नजात देगा” हदीस शरीफ़
अबू जहल हज़रत ज़िन्नीरा का अटल ईमान देखकर हैरान रह गया। अल्लाह तआला ने ज़िन्नीरा की दुआ क़बूल फ़रमाई, और उनकी आँखें पहले से भी बेहतर देखने लगीं। अबू जहल और क़ुरैश के मुशरिकों ने यह देखा, फिर भी ज़िद पर अड़े रहे और ईमान न लाए। ऊपर से कहने लगे: “यह भी इनके नबी का एक जादू है! क्या तुम्हें मुहम्मद के रास्ते पर चलने वाले इन बेअक़्लों पर हैरत नहीं होती? अगर इनका रास्ता भला और सच्चा होता, तो इनसे पहले हम उस पर चलते। तो क्या हमसे पहले एक बाँदी ने सच्चाई पा ली?”
इस पर अल्लाह तआला ने सूरह अहक़ाफ़ की 11वीं आयत-ए-करीमा नाज़िल फ़रमाई। मफ़हूम यह है: “उन काफ़िरों ने ईमान लाने वालों के बारे में कहा: ’अगर उसमें (इस्लाम में) कोई भलाई होती, तो ये (ग़रीब, बेचारे) इस मामले में हमसे आगे न निकल पाते, हमसे पहले उसकी तरफ़ न दौड़ते।’ और चूँकि उन्होंने उसके ज़रिए (मोमिनों की तरह क़ुरआन-ए-करीम के ज़रिए) हिदायत नहीं पाई, (क़ुरआन-ए-करीम का इनकार करने के लिए) वे कहेंगे: ’यह क़ुरआन-ए-करीम (जिसे मुहम्मद ने गढ़ लिया है) एक पुराना झूठ है।’”
दारुल अरक़म
हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मुशरिकों के उन ज़ुल्मों और अज़ियतों पर बहुत दुखी थे जो वे आपके सहाबा पर करते थे। इस्लाम को फैलाने और सिखाने के लिए एक महफ़ूज़ जगह की ज़रूरत थी। नबी-ए-करीम ने इस मुक़द्दस काम के लिए हज़रत अरक़म का घर चुना।6 यह घर सफ़ा की पहाड़ी के पूरब में, एक तंग गली के अंदर, कुछ ऊँची जगह पर था। यहाँ से काबा मुअज़्ज़मा आराम से दिखाई देता था। घर में आने-जाने का रास्ता आते-जाते लोगों पर नज़र रखने के लिए बहुत मुनासिब था। इसके अलावा हज़रत अरक़म मक्का के बड़े और बहुत इज़्ज़त वाले लोगों में से थे। हबीब-ए-अकरम इस घर में अपने सहाबा को इस्लाम सिखाते थे। नए मुसलमान होने वाले यहाँ आकर इस्लाम के शरफ़ से मुशर्रफ़ होते और रसूलुल्लाह के मुबारक अल्फ़ाज़, जो दिलों की दवा हैं, सुनकर बरकत पाते थे। वे नबी-ए-करीम की बात इस तरह साँस रोककर सुनते, जैसे उनके सिरों पर परिंदा बैठा हो जो ज़रा बोलने से उड़ जाएगा। आपके मुबारक अल्फ़ाज़ को, एक लफ़्ज़ भी छोड़े बिना, मानो पी जाते और ज़बानी याद कर लेते थे। हमारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपने दिन अरक़म के घर में गुज़ारते और सुबह से शाम तक अपने सहाबा की तरबियत में लगे रहते। यह जगह मुसलमानों का पहला मरकज़, “दारुल इस्लाम” थी। पहले मुसलमान यहाँ इकट्ठा होते और इस तरह मुशरिकों की हर तरह की बुराई से महफ़ूज़ रहते थे।
मौत तक पहुँचा देने वाला अज़ाब
अम्मार इब्ने यासिर बयान करते हैं: “मैं दारुल अरक़म जाकर रसूलुल्लाह को देखना और मुसलमान होना चाहता था। दरवाज़े पर मेरी मुलाक़ात हज़रत सुहैब से हुई। मैंने पूछा: ‘तुम यहाँ क्या कर रहे हो?’ तो उन्होंने भी मुझसे यही सवाल किया। मैंने कहा: ‘मैं हज़रत मुहम्मद की ख़िदमत में हाज़िर होकर आपकी बातें सुनना और मुसलमान होना चाहता हूँ।’ उन्होंने कहा: ‘मैं भी इसी लिए आया था।’ हम दोनों साथ-साथ आपकी बुलंद और इज़्ज़त वाली मजलिस में दाख़िल हुए। आपने हमें इस्लाम पेश किया। हम ख़ुशी-ख़ुशी मुसलमान हो गए।”7
अम्मार उन मुजाहिदों में से थे जो अपने मुसलमान होने का खुलकर इज़हार करने से नहीं झिझकते थे। वह अपने दीन से न फिरने के लिए सबसे सख़्त अज़ियतें सहते थे। मुशरिक जब उन्हें अकेला पाते, तो मक्का की चट्टानों में रमज़ा नाम की जगह पर ले जाते, उनके कपड़े उतारकर लोहे की क़मीज़ पहना देते थे।
इस तरह उन्हें झुलसाने वाली धूप में खड़ा रखा जाता और सताया जाता। कभी उनकी पीठ आग से दाग़ी जाती, और वह कभी न ख़त्म होने वाली अज़ियतों से गुज़रते। हर बार वे कहते: “इनकार करो!… इनकार करो!… लात और उज़्ज़ा को पूजो और छुटकारा पा लो!…” मगर हज़रत अम्मार इन नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त अज़ियतों को बड़े सब्र से सहते हुए जवाब देते: “मेरा रब अल्लाह है, मेरे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम हैं।” इस पर मुशरिक और भी भड़क उठते, उनके सीने पर गर्मी से तपी हुई चट्टानें रख देते, और कभी कुएँ में फेंककर पानी में डुबोने की कोशिश करते। एक दिन अम्मार इब्ने यासिर जब हमारे प्यारे नबी की ख़िदमत में हाज़िरी के शरफ़ से मुशर्रफ़ हुए, तो अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! मुशरिकों का हम पर ज़ुल्म आख़िरी हद को पहुँच गया है।” हमारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को हज़रत अम्मार के हाल पर तरस आया और आपने फ़रमाया: “ऐ अबुल यक़ज़ान! सब्र करो!” फिर दुआ फ़रमाई: “या रब! अम्मार के घराने में से किसी को भी जहन्नम के अज़ाब का मज़ा न चखा!”
पहला शहीद, पहला ख़ून
हज़रत अम्मार के वालिद यासिर, वालिदा सुमय्या और भाई अब्दुल्लाह पूरे घराने समेत मुसलमान हो चुके थे। मुशरिक हज़रत अम्मार पर जितना ज़ुल्म करते, उससे भी ज़्यादा उनकी वालिदा, वालिद और भाई पर करते थे। सताते वक़्त मुशरिक चाहते थे कि उनसे कुफ़्र के अल्फ़ाज़ कहलवाएँ, मगर वे जवाब देते: “तुम हमारी खाल खींच लो, हमारे गोश्त के टुकड़े-टुकड़े कर दो, फिर भी हम तुम्हारी बात नहीं मानेंगे”, और कहते: “ला इलाह इल्लल्लाह, मुहम्मदुर रसूलुल्लाह।” एक और दिन बतहा नाम की जगह पर जब यासिर के घराने को एक साथ सताया जा रहा था, तो हमारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) वहाँ से गुज़र रहे थे। अपने सहाबा पर ये नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त सितम देखकर आपको बहुत दुख हुआ। हज़रत यासिर ने पूछा: “या रसूलल्लाह! क्या हमारा ज़माना हमेशा इसी तरह अज़ियतों में गुज़रेगा?” तो नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “ऐ यासिर के घराने वालो! सब्र करो! ऐ अम्मार के घराने वालो! ख़ुश हो जाओ! बेशक तुम्हारे इनाम की जगह जन्नत है।” एक और दिन मक्का के मुशरिक अम्मार को आग से सता रहे थे। रसूलुल्लाह वहाँ तशरीफ़ लाए और फ़रमाया: “ऐ आग! जिस तरह तू इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के लिए हो गई थी, उसी तरह अम्मार के लिए भी ठंडी और सलामती वाली हो जा!” बाद में जब अम्मार अपनी पीठ खोलते, तो आग का निशान दिखाई देता था। यह निशान रसूलुल्लाह की दुआ से पहले का था। एक और दिन, जब यासिर के घराने को सताया जा रहा था, तो मुशरिकों ने हज़रत यासिर और उनके बेटे हज़रत अब्दुल्लाह को तीर मारकर शहीद कर दिया। अबू जहल ने हज़रत सुमय्या के मुबारक पैर रस्सियों से बँधवाए। रस्सियों के सिरों पर दो ऊँट बँधवाकर उन्हें अलग-अलग सम्तों में हँकवाया और इस तरह हज़रत सुमय्या के टुकड़े करवाकर उन्हें शहीद कर दिया। जब नबी-ए-करीम और सहाबा-ए-किराम (अलैहिमुर रिज़वान) ने सुना कि बेरहम, संगदिल और ज़ालिम अबू जहल और दूसरे मुशरिकों ने यासिर के घराने को सता-सताकर शहीद कर दिया है, तो उन्हें बेहद दुख हुआ। यह वाक़िआ इस बात का सबब बना कि सहाबा एक-दूसरे से और भी ज़्यादा जुड़ गए और आपस में मज़बूती से एक हो गए।8 सहाबा-ए-किराम जब नमाज़ पढ़ना चाहते, तो ऐसी जगहों पर चले जाते जहाँ कोई न हो, और वहाँ छिपकर इबादत करते थे। ऐसे ही एक दिन साद इब्ने अबी वक़्क़ास, सईद इब्ने ज़ैद, अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद, अम्मार इब्ने यासिर और ख़ब्बाब इब्ने अरत मक्का की वादियों में अबू दुब नाम की जगह पर नमाज़ पढ़ रहे थे। उसी वक़्त अख़नस इब्ने शरीक़ और कुछ मुशरिक, जो उनका पीछा कर रहे थे, वहाँ आ पहुँचे और उनकी इबादत का मज़ाक़ उड़ाने और उसकी बुराई करने लगे। यह उनसे बर्दाश्त न हुआ, तो हज़रत साद इब्ने अबी वक़्क़ास और उनके साथी मुशरिकों पर टूट पड़े। हज़रत साद के हाथ ऊँट की एक हड्डी लगी; उन्होंने वह काफ़िरों में से एक के सिर पर मारकर उसका सिर फाड़ दिया। मुशरिक डरकर भाग गए। इस तरह मुसलमानों ने पहली बार किसी काफ़िर का ख़ून बहाया।
“ऐ अबू जहल! अल्लाह की क़सम, बात ऐसी नहीं जैसी तुम कहते हो। जिन्हें तुम लात और उज़्ज़ा कहते हो, वे बुत किसी काम के नहीं; उन्हें न अपने पूजने वालों की ख़बर है, न न पूजने वालों की। मेरा रब यक़ीनन इस पर क़ादिर है कि मेरी आँखों का नूर लौटा दे और मुझे पहले जैसी हालत में कर दे” ज़िन्नीरा ख़ातून (रज़ियल्लाहु अन्हा)
हज़रत अबू ज़र ग़िफ़ारी का मुसलमान होना
लोग एक-एक, दो-दो करके हिदायत पा रहे थे और इस्लाम का नूर मक्का के बाहर भी फैलकर दुनिया को रौशन करने लगा था। इस्लाम के ज़ाहिर होने और फैलने की ख़बरें सुनकर मुशरिक उसे रोकने के रास्ते ढूँढ रहे थे। आख़िरकार यह ख़बर बनू ग़िफ़ार क़बीले तक भी पहुँच गई। अबू ज़र ग़िफ़ारी ने यह ख़बर सुनते ही अपने भाई उनैस को मक्का भेजा और कहा कि वहाँ के हालात की छानबीन करके आए। उनैस मक्का जाकर नबी-ए-करीम की मजलिस में शरीक हुए। वह आपके गिरवीदा होकर लौटे। जब उनके भाई हज़रत अबू ज़र ने पूछा: “क्या ख़बर लाए?”, तो उन्होंने कहा: “भाईजान! अल्लाह की क़सम, मैंने एक बहुत बुलंद शख़्स को देखा, जो हमेशा भलाई और नेकी का हुक्म देते हैं और बुराइयों से रोकते हैं।” अबू ज़र ग़िफ़ारी ने कहा: “अच्छा, लोग उनके बारे में क्या कहते हैं?” तो उनके भाई उनैस ने, जो उस ज़माने के मशहूर शायरों में से थे, जवाब दिया: “लोग उन्हें शायर, काहिन, जादूगर कहते हैं। लेकिन उनकी बातें न काहिनों की बातों जैसी हैं, न जादूगरों की। मैंने उनकी कही हुई बातों का शायरों की हर क़िस्म की शायरी से भी मुक़ाबला किया। वे उनसे भी नहीं मिलतीं। इन बेमिसाल बातों को किसी की भी बात से नापा नहीं जा सकता। अल्लाह की क़सम, वह हक़ बताते हैं, सच कहते हैं। जो उन पर ईमान नहीं लाते, वे झूठे हैं और गुमराही में हैं।” इस ख़बर के बाद अबू ज़र ग़िफ़ारी ने मक्का जाने और नबी-ए-करीम को देखकर मुसलमान होने का फ़ैसला किया। हाथ में एक लाठी और थोड़ा-सा तोशा लेकर वह बड़े शौक़ से मक्का की राह पर चल पड़े। मक्का पहुँचकर उन्होंने अपना हाल किसी को नहीं बताया, क्योंकि मुशरिक नबी-ए-करीम और नए मुसलमान होने वालों से सख़्त दुश्मनी कर रहे थे और अपना ज़ुल्म दिन-ब-दिन बढ़ाते जा रहे थे। ख़ास तौर पर उन लोगों को बहुत ज़्यादा सताते थे जो मुसलमान हो जाते, जिनका कोई सहारा न होता और जो परदेसी होते। अबू ज़र मक्का में किसी को नहीं जानते थे। वह यहाँ परदेसी और अजनबी थे। इसलिए उन्होंने किसी से कुछ नहीं पूछा। वह काबा के पास रसूलुल्लाह को देखने के मौक़े की ताक में रहते और आप कहाँ हैं, यह जानने के लिए कोई निशानी ढूँढते रहते। शाम के वक़्त वह एक गली के कोने में जा बैठे। हज़रत अली ने अबू ज़र को देखा। समझ गए कि यह परदेसी हैं, और उन्हें अपने घर ले गए। अली ने उनका हाल नहीं पूछा, तो अबू ज़र ने भी अपना राज़ नहीं खोला। सुबह होते ही वह फिर काबा गए। शाम तक घूमते रहे, मगर अपनी मुराद तक न पहुँच सके। वह फिर पहले वाली जगह जाकर बैठ गए। हज़रत अली उस रात भी वहीं से गुज़र रहे थे। “यह बेचारा अब तक अपना ठिकाना नहीं ढूँढ पाया” कहकर वह उन्हें फिर अपने घर ले गए। सुबह अबू ज़र फिर बैतुल्लाह गए और अपने कोने में जा बैठे। हज़रत अली ने उन्हें फिर अपने घर बुलाया। इस बार उन्होंने पूछा कि वह कहाँ से और किसलिए आए हैं। हज़रत अबू ज़र ने कहा: “अगर तुम पक्का वादा करो कि मुझे सही जानकारी दोगे, तो बताऊँगा।” हज़रत अली ने कहा: “बताओ, मैं तुम्हारा हाल किसी पर नहीं खोलूँगा।” तो अबू ज़र ग़िफ़ारी ने कहा: “मैंने सुना है कि यहाँ एक नबी ज़ाहिर हुए हैं। मैं उनसे मिलने और उनकी ख़िदमत में पहुँचने आया हूँ।” हज़रत अली ने कहा: “तुमने सही रास्ता पा लिया, अक़्लमंदी की। मैं अभी उन्हीं के पास जा रहा हूँ। मेरे पीछे-पीछे आओ, जिस घर में मैं दाख़िल होऊँ, तुम भी उसमें दाख़िल हो जाना। अगर रास्ते में मुझे लगा कि कोई तुम्हें नुक़सान पहुँचाएगा, तो मैं ऐसे ज़ाहिर करूँगा जैसे अपना जूता ठीक कर रहा हूँ। उस वक़्त तुम मेरा इंतिज़ार किए बिना आगे बढ़ जाना।” अबू ज़र ग़िफ़ारी हज़रत अली के पीछे चल पड़े। आख़िरकार उन्हें हमारे नबी के मुबारक चेहरे को देखने का शरफ़ हासिल हुआ और उन्होंने “अस्सलामु अलैकुम” कहकर सलाम किया।
“ऐ यासिर के घराने वालो! सब्र करो! ऐ अम्मार के घराने वालो! ख़ुश हो जाओ! बेशक तुम्हारे इनाम की जगह जन्नत है” हदीस शरीफ़
यह सलाम इस्लाम में किया गया पहला सलाम था, और अबू ज़र ग़िफ़ारी सलाम करने वाले पहले शख़्स हुए। नबी-ए-करीम ने उनके सलाम का जवाब देते हुए फ़रमाया: “तुम पर अल्लाह तआला की रहमत हो।” फिर नबी-ए-करीम ने पूछा: “तुम कौन हो?” उन्होंने कहा: “मैं ग़िफ़ार क़बीले से हूँ।” हमारे नबी ने पूछा: “कब से यहाँ हो?” – “तीन दिन और तीन रातों से यहाँ हूँ।” – “तुम्हें किसने खिलाया?” – “ज़मज़म के सिवा मुझे खाने-पीने की कोई चीज़ नहीं मिली। जब भी ज़मज़म पिया, न कोई भूख महसूस हुई, न प्यास।” हमारे नबी ने फ़रमाया: “ज़मज़म मुबारक है। यह भूखे का पेट भर देता है।” इसके बाद अबू ज़र ग़िफ़ारी ने नबी-ए-करीम से अर्ज़ किया: “मुझे इस्लाम बताइए।” हमारे नबी ने उन्हें कलिमा-ए-शहादत पढ़ाया; उन्होंने भी उसे दोहराया और इस्लाम के शरफ़ से मुशर्रफ़ होकर पहले मुसलमानों में शामिल हो गए।9 मुसलमान होने के बाद हज़रत अबू ज़र ग़िफ़ारी ने हमारे नबी से अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! उस अल्लाह पाक की क़सम, जिसने आपको सच्चा नबी बनाकर भेजा है, मैं यह बात मुशरिकों के बीच खुलेआम कहूँगा।” वह काबा के पास गए और ऊँची आवाज़ में कहा: “ऐ क़ुरैश के लोगो! अशहदु अल ला इलाह इल्लल्लाह व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू – मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह तआला के सिवा कोई इलाह नहीं, और मुहम्मद अलैहिस्सलाम उसके बंदे और रसूल हैं।” यह सुनते ही मुशरिक फ़ौरन उन पर टूट पड़े। पत्थरों, लाठियों और हड्डियों के टुकड़ों से मार-मारकर उन्हें लहूलुहान कर दिया। यह हाल देखकर हज़रत अब्बास ने कहा: “इस आदमी को छोड़ दो, इसे मार डालोगे! यह उस क़बीले से है जो तुम्हारे तिजारती क़ाफ़िलों के रास्ते पर बसता है। इसके बाद तुम उस रास्ते से कैसे गुज़रोगे?” इस तरह उन्होंने हज़रत अबू ज़र को मुशरिकों के हाथ से छुड़ाया। अबू ज़र मुसलमान होने के शरफ़ की ख़ुशी में अपनी जगह टिक नहीं पा रहे थे। अगले दिन उन्होंने फिर काबा के पास पूरी आवाज़ से चिल्ला-चिल्लाकर कलिमा-ए-शहादत पढ़ा। मुशरिकों ने इस बार भी उन्हें पीटा, और वह ज़मीन पर गिर पड़े। फिर हज़रत अब्बास आ पहुँचे और उन्हें मुशरिकों के हाथ से छुड़ा लिया। नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हज़रत अबू ज़र ग़िफ़ारी को हुक्म दिया कि अपने वतन लौट जाएँ और वहाँ इस्लाम फैलाएँ। इस हुक्म के बाद वह अपने क़बीले में लौट गए और उन्हें अल्लाह तआला की वहदानियत के बारे में बताया और यह कि मुहम्मद अलैहिस्सलाम उसके रसूल हैं। उन्होंने बताया कि नबी जो कुछ बताते हैं, वह हक़ और सच है, और जिन बुतों को वे पूजते हैं, वे बातिल, खोखले और बेमानी हैं। उन्हें सुनने वाली भीड़ में से कुछ लोग एतिराज़ करने लगे। उस वक़्त क़बीले के सरदार ख़फ़्फ़ाफ़ ने चिल्लाने वालों को चुप कराया और कहा: “ठहरो, सुनकर देखें कि यह क्या कहता है।” इसके बाद हज़रत अबू ज़र ने अपनी बात इस तरह जारी रखी: “मुसलमान होने से पहले एक दिन मैं नुहम नाम के बुत के पास गया था और उसके सामने दूध रख दिया था। मैंने देखा कि एक कुत्ता क़रीब आया, दूध पी गया और बुत पर गंदगी कर गया। तब मुझे यक़ीन से समझ आ गया कि बुत में उसे रोकने की ताक़त नहीं है। जिस बुत की कुत्ता भी तौहीन कर दे, उसे पूजना तुम्हें कैसे अच्छा लगता है? क्या यह पागलपन नहीं? यही है वह चीज़ जिसे तुम पूजते हो।” सब सिर झुकाए खड़े थे। उनमें से एक ने कहा: “अच्छा, तो जिस नबी की तुम बात करते हो, वह क्या बताता है? तुमने कैसे समझा कि वह सच कहता है?” तो हज़रत अबू ज़र ने ऊँची आवाज़ में कहा: “वह बताते हैं कि अल्लाह तआला एक है, उसके सिवा कोई इलाह नहीं, वही हर चीज़ को पैदा करने वाला और हर चीज़ का मालिक है… वह लोगों को उस पर ईमान लाने की दावत देते हैं… भलाई, अच्छे अख़लाक़ और एक-दूसरे की मदद की तरफ़ बुलाते हैं। वह बताते हैं कि बेटियों को ज़िंदा दफ़न करना और तुम्हारी की हुई हर तरह की बुराई, नाइंसाफ़ी और ज़ुल्म कितना बुरा है, और इनसे बचना ज़रूरी है।” और उन्होंने इस्लाम को तफ़सील से समझाया। अपने क़बीले की गुमराहियों को एक-एक करके गिनाया। फिर उनके नुक़सान और उनकी बुराई बयान की।
उन्हें सुनने वालों में से, क़बीले के सरदार ख़फ़्फ़ाफ़ और ख़ुद अबू ज़र के भाई उनैस समेत, बहुत से लोग मुसलमान हो गए।10
काबा के पास खुलेआम क़ुरआन-ए-करीम की तिलावत
एक दिन सहाबा-ए-किराम एक सुनसान जगह पर इकट्ठा होकर आपस में बातें कर रहे थे। उन्होंने कहा: “अल्लाह की क़सम, रसूलुल्लाह के सिवा कोई ऐसा न निकला जो इन क़ुरैशी मुशरिकों को खुलेआम क़ुरआन-ए-करीम सुना सके। क्या कोई है जो उन्हें खुलेआम क़ुरआन-ए-करीम पढ़कर सुनाए?” वहाँ हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद भी मौजूद थे। उन्होंने फ़रमाया: “मैं सुनाऊँगा।” सहाबा में से कुछ ने कहा: “ऐ अब्दुल्लाह! हमें डर है कि कहीं मुशरिक तुम्हें कोई नुक़सान न पहुँचाएँ। हम ऐसा शख़्स चाहते हैं जिसकी ऐसी क़ौम और ऐसा क़बीला हो जो ज़रूरत पड़ने पर उसे मुशरिकों से बचा सके।” तो वह अपनी बात पर अड़े रहे: “तुम मुझे इजाज़त दो, मैं जाऊँगा। अल्लाह पाक मेरी हिफ़ाज़त करेगा।” अगले दिन चाश्त के वक़्त वह मक़ाम-ए-इब्राहीम पहुँचे। मुशरिक वहाँ इकट्ठा थे। इब्ने मसऊद ने खड़े होकर बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम पढ़ी और सूरह रहमान की तिलावत शुरू कर दी। मुशरिक एक-दूसरे से कहने लगे: “उम्मे अब्द का बेटा क्या कह रहा है? शायद वही चीज़ें पढ़ रहा है जो मुहम्मद लाया है” और उनकी तरफ़ लपके। घूँसों, लातों और थप्पड़ों से उनका चेहरा और आँखें नीली कर दीं और उन्हें पहचानने लायक़ न छोड़ा। मगर वह थप्पड़ों और घूँसों के नीचे भी तिलावत करते रहे। वह ज़ख़्मों और नील के निशानों से भरे चेहरे के साथ सहाबा-ए-किराम के पास लौटे। सहाबा-ए-किराम को इस पर बहुत दुख हुआ और वे कहने लगे: “हमें डर ही था कि तुम्हारा यही अंजाम होगा। आख़िर जिस बात का डर था, वही तुम्हारे सिर आ पड़ी।” लेकिन अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद बिल्कुल दुखी न थे। उन्होंने फ़रमाया: “मैंने अल्लाह तआला के दुश्मनों को कभी इतना कमज़ोर नहीं देखा जितना आज। तुम चाहो तो कल सुबह मैं उन्हें इतना ही और सुना सकता हूँ।” सहाबा-ए-किराम ने कहा: “नहीं, तुम्हारे लिए इतना काफ़ी है। तुमने उन सरकश काफ़िरों को वह चीज़ सुना दी जो उन्हें नापसंद है।”11
तुफ़ैल इब्ने अम्र का मुसलमान होना
जिन बरसों में हमारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मक्का में इस्लाम को खुलेआम फैलाने लगे थे, उन दिनों आप दिन-रात लोगों को नसीहत करते और उन्हें इस्लाम के दीन की दावत देते थे। मक्का के मुशरिक रसूलुल्लाह की इन कोशिशों को बेकार करने में लगे हुए थे। जो लोग आपकी बातें क़बूल करके ईमान लाते, उनके ख़िलाफ़ हर तरह का झूठ, बोहतान और ज़ुल्म वे जायज़ समझते थे। जब वे किसी को नबी-ए-करीम से मिलते और बात करते देखते, तो फ़ौरन उसके पास पहुँच जाते और हर तरह की चालबाज़ी और झूठ का सहारा लेते, ताकि वह आपकी बात न सुने और आपकी बताई बातों पर यक़ीन न करे। बाहर से मक्का आने वालों को आपसे मिलने न देने के लिए वे जो कुछ कर सकते थे, करने से बाज़ नहीं आते थे। जिस ज़माने में मुसलमान तंगी में थे और काफ़िरों के हाथों तकलीफ़ें उठा रहे थे, तुफ़ैल इब्ने अम्र दौसी मक्का आए। यह देखकर मुशरिकों के सरदार उनके पास गए और कहा: “ऐ तुफ़ैल! तुम हमारे शहर में आए हो। हमारे बीच अब्दुल मुत्तलिब का एक यतीम उठ खड़ा हुआ है, जिसके बहुत से अजीब हालात हैं। उसकी बातें जादू जैसी हैं। वह बेटे को बाप से, भाई को भाई से, शौहर को बीवी से जुदा कर देता है! अपने पेश किए हुए ख़यालात से उसने चारों तरफ़ उथल-पुथल मचा दी है। उसकी बात सुनने वाला बेटा अपने बाप की परवाह नहीं करता, उसके पीछे चल पड़ता है। अब कोई किसी की नहीं सुनता और मुसलमान हो जाता है। हमें डर है कि जुदाई की जो बला हमारे सिर आई है, वह तुम्हारे और तुम्हारी क़ौम के सिर भी आ जाएगी। हमारी तुम्हें नसीहत है कि ख़बरदार, उससे बात न करना! न उससे कुछ कहना, न उसकी बात सुनना। उसकी बातों पर कान न धरना! बहुत होशियार रहना। यहाँ ज़्यादा देर ठहरना भी नहीं। फ़ौरन चले जाना!” इसके बाद का हाल तुफ़ैल इब्ने अम्र इस तरह बयान करते हैं:
“अल्लाह की क़सम, वह हक़ बताते हैं, सच कहते हैं। जो उन पर ईमान नहीं लाते, वे झूठे हैं और गुमराही में हैं” हज़रत उनैस ग़िफ़ारी (रज़ियल्लाहु अन्हु)
“मैं क़सम खाकर कहता हूँ, उन्होंने यह बात इतनी बार दोहराई कि आख़िरकार मैंने फ़ैसला कर लिया कि न उनसे बात करूँगा और न उनकी बात हरगिज़ सुनूँगा। यहाँ तक कि जब मैं काबा में दाख़िल हुआ, तो एहतियात के तौर पर, इस डर से कि कहीं उनकी बातें कान में न पड़ जाएँ, अपने कानों में रुई तक ठूँस ली थी। अगले दिन सुबह मैं काबा गया। मैंने देखा कि रसूल अलैहिस्सलाम वहाँ नमाज़ पढ़ रहे हैं। मैं आपके क़रीब एक जगह ठहर गया। अल्लाह पाक की हिकमत से आपकी तिलावत का कुछ हिस्सा मेरे कानों में पड़ गया। जो अल्फ़ाज़ मैंने सुने, वे कितने ख़ूबसूरत थे! मैंने अपने आप से कहा: ‘मैं कोई ऐसा आदमी तो नहीं जो अच्छे-बुरे में फ़र्क़ न कर सके। ऊपर से शायर भी हूँ। मैं इनकी बातें क्यों न सुनूँ? अगर इनकी बातें अच्छी लगीं तो क़बूल कर लूँगा, अच्छी न लगीं तो छोड़ दूँगा।’ मैं एक तरफ़ छिप गया और जब तक रसूलुल्लाह नमाज़ पढ़कर अपने घर की तरफ़ रवाना न हुए, वहीं इंतिज़ार करता रहा। फिर मैं आपके पीछे चल पड़ा। जब आप अपने घर में दाख़िल हुए, तो मैं भी दाख़िल हो गया और कहा: ‘ऐ मुहम्मद अलैहिस्सलाम! जब मैं इस दयार में आया, तो आपकी क़ौम ने मुझसे ऐसा-ऐसा कहा… वे चाहते थे कि मैं आपसे दूर रहूँ। डर के मारे मैंने आपकी बात न सुनने के लिए कानों में रुई ठूँस ली। लेकिन अल्लाह तआला ने आपकी तिलावत का कुछ हिस्सा मुझे सुना दिया। मुझे वह बहुत ख़ूबसूरत लगा। अब आपको मुझसे जो कहना हो, बताइए! मैं क़बूल करने को तैयार हूँ।’ रसूलुल्लाह ने मुझे इस्लाम समझाया और क़ुरआन-ए-करीम में से कुछ हिस्सा पढ़कर सुनाया। मैं क़सम खाता हूँ, मैंने ज़िंदगी में इससे ज़्यादा ख़ूबसूरत कलाम कभी नहीं सुना था। मैंने फ़ौरन कलिमा-ए-शहादत पढ़ा और मुसलमान हो गया। उसी वक़्त मैंने अर्ज़ किया: ‘या रसूलल्लाह! मैं अपनी क़ौम में ऐसा शख़्स हूँ जिसकी बात सुनी जाती है और जिसकी इज़्ज़त है। उनमें से कोई मेरी बात नहीं टालता। मैं जाकर उन्हें भी इस्लाम के दीन की दावत दूँ। आप दुआ फ़रमाइए कि अल्लाह तआला मेरे लिए कोई निशानी, कोई करामत अता फ़रमाए! ताकि जब मैं अपनी क़ौम को इस्लाम की दावत दूँ, तो वह निशानी मेरे लिए आसानी और मदद बने!’ मेरी इस गुज़ारिश के जवाब में रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दुआ फ़रमाई: ‘या अल्लाह! इसे कोई आयत, कोई निशानी अता फ़रमा!’ इसके बाद मैं अपने वतन लौट आया। एक अँधेरी रात में जब मैं उस टीले पर पहुँचा जहाँ से मेरी क़ौम के पानी के चश्मे वाली बस्ती दिखाई देती है, तो मेरी पेशानी पर चिराग़ जैसा एक नूर पैदा हुआ और रौशनी देने लगा। तब मैंने दुआ की: ‘या अल्लाह! इस नूर को मेरी पेशानी से किसी और जगह मुंतक़िल कर दे! कहीं दौस क़बीले के जाहिल इसे देखकर यह न समझ बैठें कि इसने अपना दीन छोड़ा, इसलिए अल्लाह ने इलाही सज़ा के तौर पर इसकी पेशानी पर यह निकाल दिया है!’ वह नूर फ़ौरन मेरे हाथ के कोड़े के सिरे पर आकर चिराग़ की तरह लटक गया। जब मैं अपने क़बीले की बस्ती के क़रीब पहुँचकर ढलान से नीचे उतरने लगा, तो वहाँ मौजूद लोग मेरे हाथ के कोड़े के सिरे पर चिराग़ की तरह चमकते नूर को एक-दूसरे को दिखा रहे थे। इसी हाल में मैं ढलान से उतरकर अपने घर आया। सबसे पहले मेरे वालिद मेरे पास आए और मुझे इस हाल में देखा। मुझसे मुहब्बत की वजह से वह मेरे गले से लिपट गए। मेरे वालिद बहुत बूढ़े थे। मैंने उनसे कहा: ‘ऐ मेरे प्यारे अब्बा! अगर आप अपने पहले हाल पर रहे, तो न मैं आपका हूँ, न आप मेरे!’ मेरी यह बात सुनकर मेरे वालिद हैरान हुए और पूछा: ‘इसकी वजह क्या है, ऐ मेरे बेटे?’ मैंने उन्हें जवाब दिया: ‘अब मैं मुहम्मद अलैहिस्सलाम के दीन में दाख़िल होकर मुसलमान हो गया हूँ।’ इस पर मेरे वालिद ने कहा: ‘बेटा, जिस दीन में तुम दाख़िल हुए हो, मैं भी उसमें दाख़िल हो गया। तुम्हारा दीन मेरा भी दीन हो!’ और फ़ौरन कलिमा-ए-शहादत पढ़कर मुसलमान हो गए। इसके बाद इस्लाम के दीन के बारे में जो कुछ मैं जानता था, उन्हें सिखाया। फिर उन्होंने ग़ुस्ल किया और साफ़ कपड़े पहने। बाद में मेरी बीवी मेरे पास आई। उससे भी मैंने वही बातें कहीं। उसने भी क़बूल किया और मुसलमान हो गई। सुबह होते ही मैं दौस क़बीले के बीच निकला। उन्हें इस्लाम समझाया और सबको इस्लाम की दावत दी। लेकिन उन्होंने क़बूल करने में सुस्ती दिखाई। बहुत समय तक मुख़ालफ़त करते रहे। अपने गुनाह और बुराई वाले कामों से हाथ न खींचा। बल्कि और आगे बढ़कर आँखें मटका-मटकाकर मेरा मज़ाक़ उड़ाया। सूद और जुए की लत की वजह से उन्होंने मेरी बात न सुनी। इस्लाम की पैरवी से भागते रहे। अल्लाह और उसके नबी के नाफ़रमान हो गए।
कुछ समय बाद मैं मक्का आया और अपनी क़ौम की शिकायत करते हुए रसूलुल्लाह से अर्ज़ किया: ‘या रसूलल्लाह! दौस क़बीला अल्लाह तआला का नाफ़रमान हो गया है। इस्लाम में दाख़िल होने के लिए मैंने जो दावत दी, उसे उन्होंने क़बूल नहीं किया। उनके लिए दुआ फ़रमाइए!’ हर किसी पर बेहद शफ़क़त और रहमत करने वाले हमारे प्यारे नबी ने हाथ उठाए, क़िब्ले की तरफ़ रुख़ किया और दुआ फ़रमाई: ‘या रब! दौस के लोगों को सीधा रास्ता दिखा और उन्हें इस्लाम के दीन में ले आ!’ और मुझसे फ़रमाया: ‘अपनी क़ौम के पास लौट जाओ। उन्हें मुस्कुराते चेहरे और मीठी ज़बान से इस्लाम की दावत देते रहो! उनके साथ नरमी से पेश आओ!’ मैं फ़ौरन अपने वतन लौट आया और दौस के लोगों को इस्लाम की दावत देने से एक पल के लिए भी नहीं रुका।”12
मेलों में दावत
हर साल मुख़्तलिफ़ शहरों के लोग मुक़र्रर दिनों में काबा मुअज़्ज़मा की ज़ियारत के लिए मक्का आते थे। रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) आने वालों का इस्तिक़बाल करते और हर गिरोह को इस्लाम समझाते थे। आप उन्हें बताते कि अल्लाह तआला एक है, आप सच्चे नबी हैं और नजात इसी में है। एक दिन वलीद इब्ने मुग़ीरा ने मुशरिकों को इकट्ठा करके कहा: “ऐ क़ुरैश के लोगो! फिर काबा की ज़ियारत का मौसम आ गया है। मुहम्मद की आवाज़ सारे जहान में फैल गई है। अरब के क़बीले उसके पास आते हैं, उसकी मीठी बातों की तरफ़ झुक जाते हैं और उसके दीन में दाख़िल हो जाते हैं। इसके ख़िलाफ़ कोई तदबीर सोचनी होगी। आओ, हम सब एक बात पर मुत्तफ़िक़ हो जाएँ, ताकि उसके बारे में अलग-अलग बातें करके एक-दूसरे को झूठा न ठहराएँ।” क़ुरैश ने कहा: “ऐ अबू अब्दे शम्स! हममें सबसे दूर तक देखने वाले तुम हो। तुम जो कहने को कहो, हम भी वही कहेंगे।” वलीद ने कहा: “नहीं, तुम कहो, मैं सुनता हूँ।” तो उन्होंने कहा: “हम कहेंगे कि वह काहिन है।” वलीद ने फ़ौरन एतिराज़ किया: “नहीं! क़सम है, वह काहिन नहीं है। हमने बहुत से काहिन देखे हैं। वे सच भी और झूठ भी बेझिझक बोलते हैं। मुहम्मद जो पढ़ता है, वह काहिनों की गढ़ी हुई बातों से बिल्कुल नहीं मिलता। फिर हमने आज तक मुहम्मद से एक भी झूठ नहीं सुना। अगर ऐसा कहें, तो कोई यक़ीन नहीं करेगा।” इस बार उन्होंने कहा: “हम कहेंगे कि वह मजनूँ है, दीवाना है।” वलीद ने फिर एतिराज़ किया: “नहीं! क़सम है, वह न मजनूँ है, न दीवाना। हम दीवानों को भी जानते हैं और मजनूँओं को भी, दीवानगी की निशानियाँ भी समझते हैं। उसमें न दम घुटना है, न तड़पकर काँपना, न वहम में बहकना। अगर ऐसा कहें, तो लोग हमें झुठला देंगे।” क़ुरैश ने कहा: “हम कहेंगे कि वह शायर है…” वलीद ने फिर एतिराज़ किया: “वह शायर भी नहीं है! हम शायरी की हर क़िस्म को बहुत अच्छी तरह जानते हैं। वह जो पढ़ता है, शायरी से बिल्कुल नहीं मिलता।” इस बार उन्होंने कहा: “हम कहेंगे कि वह जादूगर है।” वलीद ने कहा: “वह जादूगर नहीं है। हमने जादूगरों को भी देखा है और उनके जादू को भी जानते हैं। उसकी बातों में जादू का नाम-ओ-निशान नहीं। मुहम्मद का कलाम सारे जहान पर ग़ालिब है। वह कोई अनजाना आदमी भी नहीं। हम लोगों को उससे अलग करके उनकी उससे बातचीत रोक नहीं सकते। फिर फ़साहत और बलाग़त में, ख़ूबसूरत और मानी-भरी बात कहने में वह अपने हमउम्रों से बढ़कर है। ग़रज़ हम उसके बारे में जो भी कहें, लोग समझ जाएँगे कि हमारी बात झूठी है।” जब क़ुरैश को कहने को कोई बात न सूझी, तो उन्होंने कहा: “हममें सबसे बड़े और तजुर्बेकार तुम हो; तुम जो कहो, हम उस पर राज़ी हैं।”
“हमारे नबी ने दुआ फ़रमाई: ‘या रब! दौस के लोगों को सीधा रास्ता दिखा और उन्हें इस्लाम के दीन में ले आ!’ और मुझसे फ़रमाया: ‘अपनी क़ौम के पास लौट जाओ! उन्हें मुस्कुराते चेहरे और मीठी ज़बान से इस्लाम की दावत देते रहो! उनके साथ नरमी से पेश आओ!’” तुफ़ैल इब्ने अम्र (रज़ियल्लाहु अन्हु)
इसके बाद वलीद इब्ने मुग़ीरा ने कुछ देर सोचा और अपने आसपास वालों को बहकाते हुए कहा: “फिर भी सबसे अच्छा यही है कि हम उसे जादूगर, टोना करने वाला कहें; अक़्ल को सबसे ज़्यादा यही बात लगती है, क्योंकि वह अपनी बातों से लोगों को उनकी क़ौम और रिश्तेदारों से जुदा कर देता है। भाई को भाई से, दो दोस्तों को एक-दूसरे से बेज़ार कर देता है।” क़ुरैश फ़ौरन बिखर गए और मक्का में अपने इर्द-गिर्द जमा किए हुए लोगों से कहने लगे: “मुहम्मद जादूगर है!…”, और यह बात लोगों में फैला दी। जब काबा की ज़ियारत के लिए क़बीले आने लगे, तो वे उनके सामने जा पहुँचे और कोई ऐसा आदमी न छोड़ा जिसे उन्होंने नबी-ए-करीम से मिलने से ख़बरदार न किया हो। मुशरिकों की इन हरकतों की वजह से सारे अरब मुल्कों में इस्लाम को जानने का शौक़ जाग उठा और ज़ेहनों में बुतों के बारे में शक और सवाल पैदा होने लगे। अल्लाह तआला ने काफ़िर वलीद इब्ने मुग़ीरा के बारे में आयत-ए-करीमा नाज़िल फ़रमाईं कि वह उसे दर्दनाक अज़ाब चखाएगा। चुनाँचे सूरह मुद्दस्सिर की 11–29वीं आयत-ए-करीमा में मफ़हूमन फ़रमाया गया: “(ऐ मेरे रसूल!) जिस शख़्स को मैंने अकेला (दौलत से महरूम हालत में) पैदा किया, उसका (वलीद इब्ने मुग़ीरा जैसे एक काफ़िर का) मामला (उसकी सज़ा) मुझ पर छोड़ दो! (उस काफ़िर को उसके लायक़ सज़ा मैं दूँगा।) मैंने उसे बहुत माल दिया (उस नाशुक्रे शख़्स को, जो किसी चीज़ का मालिक न था, बहुत से अंगूर के बाग़, बाग़ीचे और दौलत अता की, बाद में उसे बहुत सी नेमतों तक पहुँचाया)। मैंने उसे ऐसे बेटे दिए जो हर वक़्त उसके पास मौजूद रहते हैं (उसकी देखभाल और निगहबानी करने वाले, उस पर होने वाले किसी हमले को फ़ौरन रोकने के लिए तैयार, ताक़तवर और मज़बूत बेटे)। मैंने उसके लिए हर चीज़ आसान कर दी, उसे बहुत बड़े मौक़े अता किए (उसे ऐसा बना दिया कि हर चीज़ आसानी से हासिल कर ले, उसका रास्ता खोल दिया। मक्का में वह बड़े रुतबे तक पहुँचा। उसे ‘रैहानतुल अरब’ का लक़ब दिया गया। वह अपनी क़ौम के सामने ख़ुद को बहुत चुना हुआ शख़्स ज़ाहिर करता था)। फिर वह (वह लालची, नाशुक्रा शख़्स) इन सब मौक़ों के बाद चाहता है कि हम (उसके माल और औलाद को) और बढ़ाएँ (लालच से माँगता है, मिली हुई नेमतों की क़द्र पहचानकर उनका शुक्र अदा करने की कोशिश नहीं करता)। हरगिज़ नहीं! उसकी ख़्वाहिशें कभी पूरी नहीं होंगी! (उस इनकार करने वाले, उस लालची की आरज़ू पूरी नहीं की जाएगी; उसका माल और उसकी औलाद नहीं बढ़ाई जाएगी।) क्योंकि वह हमारी आयतों के मुक़ाबले में बेहद ज़िद्दी हो गया है। मैं उसे जहन्नम में उस फिसलनी चट्टान पर, जिस पर पैर नहीं टिकता, सख़्ती से चढ़ाऊँगा (जहन्नम के सख़्त और दर्दनाक अज़ाब में उसे उसकी लायक़ सज़ा दूँगा), उसे तंगी और मशक़्क़त में डालूँगा! (एक दिन नबी-ए-करीम काबा में ऊँची आवाज़ से क़ुरआन-ए-करीम की तिलावत कर रहे थे, तो आयत-ए-करीमा ने उस पर गहरा असर छोड़ा। वह क़ुरैश के पास गया और कहा: ‘मैंने मुहम्मद का पढ़ा हुआ एक कलाम सुना। यह किसी इंसान या जिन्न की बात नहीं हो सकती। यह बात न शायरी है, न काहिन की बात। यह आदमी झूठ भी नहीं बोलता। मैं बहुत सी जामे और गहरी बातें सुन चुका हूँ। लेकिन मैं इसे किसी चीज़ से मिला न सका। क्या तुमने कभी उसे झूठ बोलते देखा है?’ यह सुनकर क़ुरैश को बड़ी फ़िक्र लग गई और वे कहने लगे: ‘हाय! यह अक़्लमंद, यह मालदार, यह असर-रसूख़ वाला आदमी भी हमारे हाथ से निकल गया! मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की बातों ने इस पर भी असर कर दिया।’ उन्होंने फ़ौरन अबू जहल को उसके पास भेजा। अबू जहल आया और कहा: ‘क्या बात है कि मैं तुम्हें इतना उदास और ग़मगीन देख रहा हूँ? क्या मुहम्मद का जादू तुम पर भी चल गया, या उसके माल-ओ-मता में से कुछ तुम्हें भी मिल गया? हमने आपस में तय कर लिया है: अगर तुम्हें माल-दौलत का लालच है, तो हम तुम्हें जितना चाहो माल-दौलत देंगे। तुम ऐसी गुमराह राहों पर न पड़ो।’ वलीद इब्ने मुग़ीरा ने कहा: ‘क़ुरैश में सबसे मालदार मैं हूँ। तुम मेरे सामने ऐसी बात कैसे रख सकते हो?’ अबू जहल ने कहा: ‘अच्छा! तो फिर तुमने उसके पढ़े हुए क़ुरआन की तारीफ़ में बातें क्यों कहीं?’) (इस पर उस इनकार करने वाले शख़्स ने रसूलुल्लाह से सुने हुए क़ुरआन-ए-करीम पर ज़बान चलाने के लिए) अपने ज़ेहन में कुछ बातें गढ़ीं (सोच-विचार किया) और फिर एक राय क़ायम की (अपनी सोच का नतीजा बयान किया)। मारा जाए वह, उसने कैसा अंदाज़ा लगाया! (बेतुका, बेरब्त; अपनी पहली बात को ख़ुद काटने वाला, कभी न हो सकने वाला फ़ैसला सुनाया। इस आदमी ने महसूस किया कि अपनी कही हुई बातों की तावील करनी ज़रूरी है, और सोचा कि ये बातें मैं उन्हें कैसे समझाऊँ।)
“नहीं, मैं फिर जाकर तिलावत करूँगा। मैंने मुशरिकों को पहली बार ऐसी बुरी हालत में देखा। उनकी बेबसी से मुझे बड़ी ख़ुशी होती है। मुझ पर किए गए ज़ुल्म से मुझे कोई दर्द महसूस नहीं होता” अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद (रज़ियल्लाहु अन्हु)
फिर मारा जाए वह, उसने कैसा (ऐसा भयानक) अंदाज़ा लगाया! फिर उसने देखा (मामले पर ध्यान जमाया, उसे पूरी तरह अपने क़ाबू में लेने के लिए मामले पर दोबारा गहराई से सोचा)। फिर उसने त्योरी चढ़ाई और मुँह बिगाड़ा। फिर उसने हक़ से मुँह मोड़ा और घमंड किया। और कहा: ’यह तो बस एक जादू है जो लोगों से चला आ रहा है (जो लगातार एक से दूसरे तक पहुँचता रहा है)। यह तो सिर्फ़ इंसान का कलाम है!’” (हालाँकि उस शख़्स ने पहले अपनी क़ौम के बीच इक़रार किया था कि क़ुरआन-ए-करीम एक हैरतअंगेज़ कलाम है, इंसान और जिन्न की बातों जैसा नहीं। फिर उस इनकार करने वाले ने अपनी क़ौम को ख़ुश करने के लिए अपनी बात बदल दी और क़ुरआन-ए-करीम पर ऐसे बोहतान लगाए जो उसके हरगिज़ लायक़ नहीं। इस तरह उसने ख़ुद को इलाही अज़ाब का हक़दार बना लिया। अल्लाह तआला ने फ़रमाया:) “मैं उसे जहन्नम में (सक़र में, सख़्त आग के अंदर) दाख़िल करूँगा। तुम्हें क्या मालूम कि सक़र क्या है? (सख़्त आग क्या है, तुम क्या जानो? क्या तुम्हें उसकी ख़ूबियों की ख़बर है?) वह न बाक़ी रखती है, न छोड़ती है! (न इंसान को मारती है, न जीने देती है; अपने अंदर जाने वालों को न निकालती है, न अज़ाब से बाज़ आती है।) वह इंसान की सारी खाल उधेड़ देती है (जलाकर झुलसा देती है, काला कर देती है) और उसकी हड्डियाँ नंगी कर देती है।”
मुशरिकों का क़ुरआन-ए-करीम सुनना
मुशरिकों के सरदार तरह-तरह की चालों और ज़ुल्म से लोगों को ईमान लाने से रोकते थे। वे मक्का वालों को मुहम्मद अलैहिस्सलाम की पढ़ी हुई आयत-ए-करीमा सुनने से मना करते थे। मगर ख़ुद रातों को छिपकर उस घर के पास आते जिसमें हमारे प्यारे नबी मुहम्मद अलैहिस्सलाम होते, और एक कोने में छिपकर सुनते थे। सुबह होने पर जब उजाला फैलने लगता, तो मुशरिकों के सरदार देखते कि वे एक-दूसरे से बेख़बर रात को क़ुरआन-ए-करीम सुनने आए थे; वे एक-दूसरे को मलामत करते और कहते: “आइंदा ऐसा न करें।” लेकिन अगली रात फिर एक-दूसरे से बेख़बर जाकर एक कोने में छिपते और फिर सुनते। सुबह होती तो एक-दूसरे को देखकर हैरान रह जाते। वे फिर कभी ऐसा न करने की क़सम खाकर जुदा होते, मगर इससे बाज़ न आ पाते। लेकिन अपने नफ़्स की पैरवी करने, बड़ाई जताने, दूसरे मुशरिकों की मलामत से डरने और बहुत से दूसरे बेकार ख़यालों में पड़ने की वजह से वे ईमान न लाए और दूसरों को भी रोका। ऊपर से गलियों में चिल्लाते फिरे: “मुहम्मद जादूगर है।” एक शाम मुशरिक काबा के इर्द-गिर्द इकट्ठा हुए और कहने लगे: “मुहम्मद को बुलवाकर इस मामले पर बात कर लें! ताकि आख़िर में लोग हमें मलामत न करें और हमें माज़ूर समझें।” और उन्होंने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पास पैग़ाम भेजा। इस बुलावे पर नबी-ए-करीम काबा तशरीफ़ लाए और मुशरिकों के सामने बैठ गए। मुशरिकों ने कहा: “ऐ मुहम्मद! तुम्हें बुलवाने की वजह यह है कि तुमसे समझौता कर लें। हम क़सम खाते हैं, अरबों में तुम्हारे जैसा कोई शख़्स नहीं देखा गया जिसने अपनी क़ौम को इस तरह मुसीबत में डाल दिया हो! तुमने हमारे दीन में ऐब निकाला! हमारे इलाहों पर ज़बान चलाई! हमारी अक़्लों को हक़ीर समझा! हमारी एकता तोड़कर हमें एक-दूसरे से लड़ा दिया! कोई बुराई ऐसी न रही जो तुम हमारे सिर न लाए हो! अगर तुम इन हरकतों और बातों से मालदार बनना चाहते हो, तो हम तुम्हारे लिए तुम्हारी चाहत से भी ज़्यादा माल जमा कर देंगे। अगर इज़्ज़त और शोहरत चाहते हो, तो तुम्हें अपना सरदार मान लेंगे। अगर बादशाह बनना चाहते हो, तो तुम्हारी बादशाहत का एलान करके तुम्हारे गिर्द जमा हो जाएँगे। अगर तुम किसी चीज़ के असर में आ गए हो, तो तुम्हें उससे छुड़ा देंगे। अगर यह जिन्नात की तरफ़ से कोई बीमारी है, तो अपनी सारी दौलत लुटाकर उसका इलाज ढूँढेंगे!…” सारे जहानों के सरदार ने सब्र से उनकी बात सुनी और फिर यह अज़ीम जवाब दिया: “ऐ क़ुरैश के लोगो! तुमने जो बातें कहीं, उनमें से कोई भी मुझमें नहीं है। जो कुछ मैं तुम्हारे पास लाया हूँ, उसके साथ न तुम्हारा माल माँगने आया हूँ, न तुम्हारे बीच बड़ी इज़्ज़त और शोहरत कमाने, न तुम पर बादशाह बनने। बल्कि अल्लाह तआला ने मुझे तुम्हारी तरफ़ नबी बनाकर भेजा है और मुझ पर एक किताब भी नाज़िल की है। उसने मुझे हुक्म दिया है कि (तुममें से क़बूल करने वालों के लिए) ख़ुशख़बरी देने वाला (जन्नत की) और (क़बूल न करने वालों के लिए जहन्नम से) डराने वाला बनूँ।
मैंने भी अपने रब का यह हुक्म तुम तक पहुँचा दिया, तुम्हें नसीहत कर दी। अगर तुम मेरी लाई हुई चीज़ क़बूल कर लो, तो वह तुम्हारे लिए दुनिया और आख़िरत में हिस्सा और तोशा होगी। और अगर क़बूल न करके उसे ठुकरा दो, तो जब तक अल्लाह तआला मेरे और तुम्हारे बीच अपना फ़ैसला न सुना दे, मेरे ज़िम्मे यही है कि अल्लाह पाक के हुक्म को पूरा करने के लिए हर मुश्किल का सीना तानकर सामना करूँ और उसे सहूँ…” अबू जहल, उमय्या इब्ने ख़लफ़ और दूसरे मुशरिकों ने कहा: “ऐ मुहम्मद! तुम जानते हो कि रोज़ी-रोटी के मामले में हमसे ज़्यादा मुश्किल हालात में रहने वाला कोई नहीं। जब तुम नबी हो, तो अपने रब से माँगो कि हमें तंग करने वाले, हमारी रोज़ी मुश्किल बनाने वाले इन पहाड़ों को हटाकर दूर कर दे! हमारे इलाक़े को कुशादा करके उसमें शाम और इराक़ के दरियाओं जैसे दरिया बहा दे! इसके अलावा क़ुसई इब्ने किलाब से शुरू करके हमारे गुज़रे हुए बाप-दादा में से कुछ को ज़िंदा कर दे! क़ुसई इब्ने किलाब सच बोलने वाला, बड़ा आदमी था। हम उससे पूछें कि तुम्हारी बातें हक़ हैं या बातिल! अगर उसने तुम्हारी तस्दीक़ की और तुमने हमारी माँगी हुई चीज़ें कर दिखाईं, तो हम तुम्हारी तस्दीक़ करेंगे। इस तरह हमें तुम्हारे रब के यहाँ तुम्हारा मर्तबा भी मालूम हो जाएगा। अगर हमारे लिए ये काम नहीं करते, तो अपने लिए अपने रब से कुछ माँग लो। माँगो कि एक फ़रिश्ता भेजे जो तुम्हारी बातों की तस्दीक़ करे और हमें तुम्हारे पीछे पड़ने से रोक दे! और तुम्हारा रब तुम्हें बाग़, महल और ख़ज़ाने दे दे, ताकि तुम रोज़ी की परेशानी से छूट जाओ! क्योंकि तुम भी हमारी तरह बाज़ारों में फिरते हो, रोज़ी के लिए भाग-दौड़ करते हो!…” फ़ख़्र-ए-आलम ने उनसे फ़रमाया: “मैं तुम्हारे पास इन चीज़ों के साथ नहीं भेजा गया। अल्लाह तआला ने मुझे जिस चीज़ के साथ भेजा है, मैं अल्लाह पाक की तरफ़ से तुम्हारे पास सिर्फ़ वही लाया हूँ। मैंने उसे तुम तक पहुँचा दिया। मैं (माल-दौलत देने के लिए) अपने रब से माँगने वाला इंसान नहीं हूँ… अल्लाह तआला ने मुझे (तुममें से मेरी लाई हुई चीज़ क़बूल करने वालों के लिए जन्नत की) ख़ुशख़बरी देने वाला और (क़बूल न करके ठुकराने वालों के लिए जहन्नम से) डराने वाला बनाकर भेजा है।” फिर मुशरिकों ने कहा: “जब तुम्हारा रब जो चाहे ज़रूर कर देता है, तो माँगो कि यह आसमान फाड़कर हमारे ऊपर गिरा दे!… जब तक तुम यह नहीं करते, हम तुम पर ईमान नहीं लाएँगे!” नबी-ए-करीम ने फ़रमाया: “यह काम अल्लाह तआला का है। अगर वह तुम्हारे साथ यह करना चाहे, तो ज़रूर करेगा।” इस पर मुशरिक और आगे बढ़ गए और कहा: “ऐ मुहम्मद! क्या तुम्हारा रब नहीं जानता था कि हम तुम्हारे साथ बैठेंगे, तुमसे क्या पूछेंगे, तुमसे क्या माँगेंगे, कि उसने तुम्हें पहले से ख़बर देकर सिखा न दिया? उसने यह क्यों न बताया कि अगर हम तुम्हारी पहुँचाई हुई बातें क़बूल न करें, तो हमारे साथ क्या करेगा?… जब तक तुम अपनी बातों की सच्चाई पर फ़रिश्तों को गवाह बनाकर हमारे सामने न लाओ, हम तुम पर ईमान नहीं लाएँगे… अब तुम्हारे सामने हमारी कोई ज़िम्मेदारी बाक़ी न रही। हम क़सम खाते हैं, अब हम तुम्हारा पीछा हरगिज़ नहीं छोड़ेंगे! या तो हम तुम्हें मिटा देंगे या तुम हमें…” उन्हें क़रीब आने के बजाय इस तरह बिल्कुल दूर होते देखकर हमारे प्यारे नबी उनके पास से उठकर चले गए।13 जब मक्का के मुशरिकों ने कायनात के सुल्तान को ठुकरा दिया, तो अल्लाह तआला ने जिबराईल अलैहिस्सलाम के ज़रिए वह्य भेजकर आयत-ए-करीमा से उन्हें जवाब दिया। उन्हें उस दर्दनाक अज़ाब की ख़बर दी जिसमें वे पड़ने वाले थे। सूरह अनआम की आयत-ए-करीमा 4 से 11 तक मफ़हूमन फ़रमाया गया: “उनके पास उनके रब की आयतों में से कोई आयत (क़ुरआन-ए-करीम की आयतों में से कोई आयत, दलीलों में से कोई दलील या मोजिज़ों में से कोई मोजिज़ा) ऐसी नहीं आती जिससे वे मुँह न मोड़ लें।
“वहशी, सख़्त दिल जाहिल तुम पर ईमान नहीं लाते। उनमें से ज़्यादातर मुनाफ़िक़ (दोग़ले) हैं” तौबा: 97
इसी तरह जब हक़ (क़ुरआन-ए-करीम) उनके पास आया, तो उन्होंने उसे झुठलाया, ठुकरा दिया। मगर बहुत जल्द उनके पास उस चीज़ की ख़बर (सज़ा) आ जाएगी जिसका वे मज़ाक़ उड़ाते थे। क्या उन्होंने (मक्का वालों ने) नहीं देखा, यक़ीन से नहीं जाना कि उनसे पहले हमने कितनी नस्लों को हलाक कर दिया? हमने उन्हें वे सारे मौक़े दिए थे जो तुम्हें नहीं दिए। आसमान से उन पर ख़ूब बारिशें बरसाईं। (उनके बाग़ों, बाग़ीचों और महलों के) नीचे से नहरें बहाईं। फिर उन्हें (इन नेमतों का शुक्र न करने और) उनके गुनाहों की वजह से हलाक कर दिया। उनकी जगह दूसरी-दूसरी नस्लें पैदा कीं। अगर हम तुम पर काग़ज़ पर लिखी हुई कोई किताब उतारते और वे उसे अपने हाथों से छूकर भी देख लेते, तब भी वे काफ़िर अपनी ज़िद से यही कहते: ‘यह खुले जादू के सिवा कुछ नहीं।’ और उन्होंने कहा: ’काश, इन पर (मुहम्मद अलैहिस्सलाम पर) (ऐसा कि हम भी देख सकें) कोई फ़रिश्ता उतारा जाता (और वह हमें बताता कि यह नबी हैं)!’ अगर हम कोई फ़रिश्ता भेजते (और वे फिर भी ईमान न लाते), तो यक़ीनन मामला ख़त्म कर दिया जाता (उन सबको हलाक करने का फ़ैसला सुना दिया जाता)। फिर उन्हें पलक झपकने भर की भी मोहलत न दी जाती, उनकी तरफ़ देखा भी न जाता। और अगर हम उन्हें (नबी को) फ़रिश्ता बनाते, तो उन्हें भी ज़रूर मर्द (की सूरत में) ही दिखाते और उन्हें फिर उसी शक में डाल देते जिसमें वे अब पड़े हुए हैं। क़सम है, तुमसे पहले के नबियों का भी मज़ाक़ उड़ाया गया, और जिस चीज़ का वे मज़ाक़ उड़ाते थे, उसकी सज़ा, यानी बला और अज़ाब, ने उन्हें चारों तरफ़ से घेर लिया। कहो: ‘ज़मीन में चलो-फिरो, फिर देखो कि नबियों को झुठलाने वालों का अंजाम कैसा हुआ?’” सूरह फ़ुरक़ान की 7–10वीं आयत-ए-करीमा में भी मफ़हूमन फ़रमाया गया: “काफ़िरों ने कहा: ‘यह कैसा नबी है? हमारी तरह खाता-पीता है, गलियों में घूमता है। अगर यह नबी होता, तो इसके पास फ़रिश्ता आता। इसके मददगार होते, वे भी हमें ख़बर देते और जहन्नम से डराते। या इसका रब इसके लिए पैसों के ख़ज़ाने भेज देता, या इसके फलों के बाग़ और खेत होते, जिनसे यह जो चाहता खाता।’ उन ज़ालिमों ने एक-दूसरे से कहा: ‘अगर तुम इसकी पैरवी करोगे, तो एक जादू किए हुए आदमी की पैरवी करोगे।’ (ऐ मेरे हबीब!) देखो तो, उन्होंने तुम्हारे बारे में कैसी बुरी मिसालें दीं और हक़ के रास्ते से हटकर गुमराही में पड़ गए। अब वे गुमराही से निकलकर हिदायत का रास्ता नहीं पा सकेंगे। अल्लाह तआला की शान कितनी बुलंद है! अगर वह चाहे, तो तुम्हें (दुनिया में) इनसे बेहतर ऐसे बाग़ और बाग़ीचे दे दे जिनके नीचे नहरें बहती हों, और तुम्हारे लिए महल बना दे!” 21वीं आयत-ए-करीमा में भी मफ़हूमन फ़रमाया गया: “जो लोग हमसे मिलने की उम्मीद नहीं रखते, उन्होंने कहा: ’काश, हम पर फ़रिश्ते उतारे जाते (और वे बताते कि मुहम्मद सच कहता है), या हम अपने रब को देख लेते!’ क़सम है, उन्होंने अपने दिलों में ख़ुद को बहुत बड़ा समझा और बड़ी सरकशी से हद से गुज़र गए…” सूरह सबा की 9वीं आयत-ए-करीमा में मफ़हूमन फ़रमाया गया: “अगर हम चाहें तो उन्हें (हमारी खुली आयतें देखकर भी उन्हें झुठलाने की वजह से, क़ारून की तरह) ज़मीन में धँसा दें, या (जैसा हमने ऐका वालों के साथ किया) उन पर आसमान से टुकड़े गिरा दें।” सूरह इसरा की 97वीं आयत-ए-करीमा में भी मफ़हूमन फ़रमाया गया: “…हम क़यामत के दिन उन्हें अंधे, गूँगे और बहरे बनाकर मुँह के बल इकट्ठा करेंगे! उनका ठिकाना जहन्नम है; जब भी उसकी आग धीमी होगी, हम उसकी लपट और बढ़ा देंगे!” अपने बारे में नाज़िल हुई आयत-ए-करीमा सुनकर मुशरिकों ने अपनी दुश्मनी और भी तेज़ कर दी।
ख़ास तौर पर उबई इब्ने ख़लफ़ और उसका भाई उमय्या रसूलुल्लाह को बहुत दुख पहुँचाते थे। बदनसीब उबई एक गली-सड़ी हड्डी लेकर हमारे नबी की बुलंद ख़िदमत में आया। उसने कहा: “ऐ मुहम्मद! इस हड्डी के गल-सड़ जाने के बाद तुम्हारा अल्लाह इसे ज़िंदा करेगा, क्या यही बात है? यानी तुम समझते हो कि यह गल-सड़ जाने के बाद तुम्हारा रब इसे ज़िंदा करेगा, है न!” फिर उसने हड्डी को चूरा-चूरा कर दिया। फिर उसकी धूल हमारे प्यारे नबी की तरफ़ फूँक दी। अपनी बात जारी रखते हुए उसने कहा: “ऐ मुहम्मद! इसे इस तरह गल-सड़ जाने के बाद कौन ज़िंदा कर सकेगा?” नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “हाँ। अल्लाह तआला तुम्हें भी मारेगा और इसे भी… फिर तुम्हें ज़िंदा करेगा और जहन्नम में दाख़िल करेगा।” इस वाक़िए पर अल्लाह पाक ने ये आयत-ए-करीमा नाज़िल फ़रमाईं। मफ़हूम यह है: “क्या उस (इनकार करने वाले) इंसान ने नहीं देखा, यक़ीन से नहीं जाना कि हमने उसे एक नुत्फ़े से पैदा किया? फिर भी वह खुला झगड़ालू बन बैठा। अपनी पैदाइश को भूलकर हमारे लिए मिसाल देने लगा: ‘इन हड्डियों को, जब वे गल-सड़कर बिखर चुकी हों, कौन ज़िंदा करेगा?’ (ऐ मेरे रसूल!) कहो: ’उन्हें वही ज़िंदा करेगा जिसने उन्हें (जब वे न थीं) पहली बार पैदा किया, और वह (अल्लाह तआला) हर पैदा की हुई चीज़ को ख़ूब जानने वाला है। वह (अल्लाह तआला) वही है जो तुम्हारे लिए हरे-भरे पेड़ से आग निकालता है, और अब तुम उससे आग सुलगाते हो। जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया, क्या वह उन जैसों को पैदा करने पर क़ादिर नहीं? क्यों नहीं, ज़रूर क़ादिर है। वही हर चीज़ को पैदा करने वाला, हर चीज़ को जानने वाला है…’”14
ख़ालिद इब्ने सईद का ईमान
इस्लाम की दावत के शुरू के ज़माने में ख़ालिद इब्ने सईद ने एक ख़्वाब देखा। ख़्वाब में वह जहन्नम के किनारे खड़े थे और उनका बाप उन्हें धक्का देकर उसमें गिराना चाहता था। ठीक उसी वक़्त उन्होंने देखा कि हमारे नबी ने उन्हें कमर से पकड़कर जहन्नम में गिरने से बचा लिया। वह चीख़ मारकर जागे और कहा: “अल्लाह की क़सम, यह ख़्वाब सच्चा है।” बाहर निकले तो हज़रत अबू बकर से मुलाक़ात हुई, और उन्हें अपना ख़्वाब सुनाया। हज़रत अबू बकर ने उनसे कहा: “तुम्हारा ख़्वाब सच्चा है, यह शख़्स अल्लाह तआला के नबी हैं। अभी जाओ और उनकी पैरवी करो! तुम उनकी पैरवी करोगे, उनके लाए हुए दीन में दाख़िल होगे और उनके साथ रहोगे। और वह तुम्हें, जैसा तुमने ख़्वाब में देखा, जहन्नम में गिरने से बचाएँगे। रहा तुम्हारा बाप, तो वह जहन्नम में रह जाएगा!”
हज़रत ख़ालिद इब्ने सईद ख़्वाब के असर में थे। वक़्त गँवाए बिना वह फ़ौरन अज्याद नाम की जगह पर मुहम्मद अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में गए और पूछा: “ऐ मुहम्मद! आप लोगों को किस चीज़ की दावत देते हैं?”
नबी-ए-करीम ने उन्हें जवाब दिया: “मैं इंसान को उस एक अल्लाह पर, जिसका न कोई शरीक है न कोई मिसाल, और इस बात पर ईमान लाने की दावत देता हूँ कि मुहम्मद (अलैहिस्सलाम) उसके बंदे और नबी हैं; और उन पत्थर के टुकड़ों की पूजा छोड़ देने की दावत देता हूँ जो न सुनते हैं, न देखते हैं, न कोई नुक़सान पहुँचाते हैं न कोई फ़ायदा, और न अपने पूजने वालों को जानते हैं, न न पूजने वालों को।”
इस पर ख़ालिद इब्ने सईद ने फ़ौरन कहा: “मैं भी गवाही देता हूँ कि अल्लाह तआला के सिवा कोई इबादत के लायक़ इलाह नहीं, और यह भी गवाही देता हूँ कि आप अल्लाह तआला के नबी हैं!” और मुसलमान हो गए। उनके मुसलमान होने से हमारे नबी बहुत ख़ुश हुए। उनके बाद उनकी बीवी उमय्या भी मुसलमान होने के शरफ़ से मुशर्रफ़ हुईं। हज़रत ख़ालिद इब्ने सईद चाहते थे कि उनके भाई भी मुसलमान हो जाएँ और इसके लिए कोशिश करते रहते थे। उनमें से उमर इब्ने सईद मुसलमान हो चुके थे।
“हम क़यामत के दिन उन्हें अंधे, गूँगे और बहरे बनाकर मुँह के बल इकट्ठा करेंगे! उनका ठिकाना जहन्नम है; जब भी उसकी आग धीमी होगी, हम उसकी लपट और बढ़ा देंगे!” इसरा: 97
इस्लाम का सख़्त दुश्मन, उनका बाप अबू उहैहा, जब जान गया कि ख़ालिद और उमर मुसलमान हो गए हैं और मक्का की एक सुनसान जगह पर नमाज़ पढ़ते हैं, तो उसने अपने उन बच्चों को भेजा जो मुसलमान नहीं हुए थे और उन दोनों को अपने पास बुलवा लिया। फिर उनसे कहा कि अपने नए दीन को छोड़ दें। वह उन्हें डाँटने और पीटने लगा।
फिर उसने ख़ालिद इब्ने सईद से कहा: “क्या तुम मुहम्मद के पीछे चल पड़े हो? हालाँकि तुम देख रहे हो कि वह अपनी क़ौम के ख़िलाफ़ चलता है और अपने लाए हुए दीन से हमारे बुतों और हमारे बाप-दादा की तौहीन करता है!”
हज़रत ख़ालिद इब्ने सईद ने कहा: “अल्लाह की क़सम, मुहम्मद अलैहिस्सलाम सच कहते हैं। मैंने उनकी पैरवी की है। मर जाऊँगा, मगर अपने दीन से नहीं फिरूँगा!” यह सुनकर बाप का ग़ुस्सा और भड़क उठा। उसने उन्हें इतना मारा कि लाठी टूट गई, और कहा: “ऐ नालायक़ बेटे! जहाँ चाहे चला जा। क़सम है, मैं तुझे रोटी नहीं दूँगा!” हज़रत ख़ालिद ने कहा: “अगर आप मेरा ख़र्च बंद कर देंगे, तो अल्लाह तआला ज़रूर मुझे रिज़्क़ अता करेगा।”
बाप ने अपने दूसरे बच्चों को धमकाया: “अगर तुममें से किसी ने उससे बात की, तो तुम्हारे साथ वह करूँगा जो उसके साथ भी नहीं किया।” और हज़रत ख़ालिद को घर के तहख़ाने में बंद करवा दिया और तीन दिन तक मक्का की गर्मी में भूखा-प्यासा छोड़ दिया।
हज़रत ख़ालिद इब्ने सईद कोई तरकीब निकालकर बाप के हाथ से छूट गए। फिर उनका बाप सख़्त बीमार पड़ गया। अबू उहैहा बीमारी के बिस्तर पर पड़ा-पड़ा इस्लाम से अपनी दुश्मनी की वजह से कहता था:
“अगर मैं इस बीमारी से छूटकर उठ खड़ा हुआ, तो मक्का में हर कोई हमारे बुतों को पूजेगा। कोई भी उनके सिवा किसी की इबादत न कर सकेगा!…” हज़रत ख़ालिद ने, इस इरादे से कि उनके बाप की सच्चे दीन से दुश्मनी ख़त्म हो जाए और वह उनके मुसलमान भाइयों को कोई नुक़सान न पहुँचाए, हाथ उठाए और दुआ की: “ऐ सारे जहानों को पैदा करने वाले अल्लाह! मेरे बाप को इस बीमारी से न उठा!” अल्लाह पाक ने उनकी दुआ क़बूल फ़रमाई: अबू उहैहा बीमारी के बिस्तर से न उठ सका और मर गया।
मुसअब इब्ने उमैर का मुसलमान होना
मुसअब इब्ने उमैर (रज़ियल्लाहु अन्हु) क़ुरैश के एक शरीफ़ और मालदार घराने से थे। उन्होंने जब हमारे नबी के मुबारक अल्फ़ाज़ सुने, तो उनके दिल में आपकी बड़ी मुहब्बत पैदा हो गई। वह आपसे मिलने की तमन्ना में तड़प रहे थे। आख़िरकार वह दारुल अरक़म गए और मुसलमान हो गए। यह सुनकर उनके माँ-बाप ने उन्हें हर चीज़ से महरूम कर दिया और सताना शुरू कर दिया। उन्हें उनके दीन से फेरने के लिए घर के तहख़ाने में बंद करके दिनों तक भूखा-प्यासा छोड़ दिया। अरब के झुलसा देने वाले सूरज के नीचे उन्हें सख़्त और नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त अज़ियतें दीं। मगर हज़रत मुसअब इब्ने उमैर ने इन सख़्त और बेरहम अज़ियतों पर सब्र किया और इस्लाम से न फिरे।
हज़रत मुसअब मुसलमान होने से पहले अपने घराने की दौलत की वजह से ऐश-ओ-आराम में पले थे। हर कोई उन पर रश्क करता था। मुसलमान होने पर उनके घराने ने उन्हें हर चीज़ से महरूम कर दिया और तरह-तरह की तकलीफ़ों में डाल दिया। मुसअब इब्ने उमैर अपने दीन की ख़ातिर हर तरह की तकलीफ़ सहते रहे। एक दिन वह रसूलुल्लाह की ख़िदमत में आए। उनके इस आने का हाल हज़रत अली ने इस तरह बयान किया: “हम रसूलुल्लाह के साथ बैठे थे। उसी वक़्त मुसअब इब्ने उमैर आए। उनके बदन पर पैवंद लगा एक कपड़ा था और वह क़ाबिल-ए-रहम हालत में थे। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उनका यह हाल देखा तो आपकी मुबारक आँखें आँसुओं से भर आईं। मुसअब इतनी अज़ियतें और ग़रीबी झेलने के बावजूद अपने दीन से नहीं फिरे थे, इस पर रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: ‘उस शख़्स को देखो जिसके दिल को अल्लाह तआला ने नूर से भर दिया है। मैंने देखा है कि इसके माँ-बाप इसे सबसे अच्छे खाने और पीने की चीज़ें खिलाते-पिलाते थे। अल्लाह तआला और उसके रसूल की मुहब्बत ने इसे उस हाल तक पहुँचा दिया जो तुम देख रहे हो।’”
“या अल्लाह! इनके गुनाह माफ़ फ़रमा! क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं” हदीस शरीफ़
हक़ का ज़िक्र कर, जल-जलकर!
पाएगा बड़े एहसान जी भर,
खुल जाएँगे सब दर तुझ पर,
अयाँ होगा जमालुल्लाह।
शम्स-ए-तबरेज़ यह जाने है:
आलम न रहे, फ़ानी है,
सब मख़लूक़ मिट जानी है,
बाक़ी रहेगा बस अल्लाह।
सलातुल्लाह सलामुल्लाह,
अलैका या रसूलल्लाह।
हब्शा की तरफ़ हिजरत
